Sunday, 12 January 2014

अकविता :-आध्यात्म बाहरी ज्ञान है

Sudha Raje
आध्यात्म बाहरी ज्ञान है
प्रेम भीतर जब विराट् असीम
अनंत हो जाये तब मानव स्वयं प्रेम
पुञ्ज होकर आत्मेश हो जाये
दर्शन भी केवल एक खास दूरी तक
राह का साथी है
प्रेम नहीं रहेगा????
तो ईश्वर नहीं रहेगा
कर्मकांड आरती नमाज पाठ केवल
सकाम आराधना के मार्ग हैं
जब तक ईश मानव दो हैं
जब मानव ईशमय हो जाये तब
सारा आध्यात्म लुप्त हो जाता है
दर्शन विलीन
तब तो जैसे कोई बाहरी दर्शक उस
आत्माराम को देख
रहा हो यही रह जाता है
प्रेम मानव की देह की सीमा से
प्रारंभ और समाप्त है तो वह
सीधा सा तन मन की जरूरत
का विज्ञान है
विरह प्रेम का आवश्यक तत्व है
तूलिके!!!!!
विरह से मानव की देह विलीन
होकर मन से मन के संवाद प्रारंभ
होते हैं और प्रेमी की मनोमय
तस्वीर ईश का विग्रह होते होते
सदालीन दुखानंद है जैसे अपने से
दूर होकर हर ओर से प्रेम
की पुकार तब अतःचक्षु खुलते है
पीङा का वार होने पर
ही पता चलता है ईश
का होना और पदार्थ
की निरर्थकता
यह मोहन का राधेमय होकर
गीता हो जाना है
Mar 3 ·

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