Thursday, 27 February 2014

अकविता :दहेज कभी पीछा नहीं छोङता

दहेज?
कभी भी भारतीय स्त्री का पीछा नहीं छोङता ।

लगभग हर विवाह का बहुत बङा खलनायक दहेज है ।क्योंकि जो जो दहेज नहीं ले
पाता या तो नालायक समझा जाता है या मूर्ख.
औऱ जो खुद त्याग देता है वह स्त्री "बेचारी "को बिना दहेज अपनाने का महान
श्रेय जरूर ले लेता है ।
हर कमी पर आ ही जाता है ज़ुबां पर ग़म न दहेज ही मिला न कोई अनोखा सुंदर
या कमाऊ सनम

यहाँ तक कि हर वह विवाह जिसे दम ठोंककर गर्व से पुरुष या स्त्री यदा कदा
""दहेज रहित ""विवाह घोषित करके वाहवाही पा लेते है चंद दिन चंद जगहों पर


यहाँ तक कि लगभग हर प्रेम विवाह भी जिसमें लङकी माँ पिता के घर को
त्यागकर खाली हाथ केवल पहने हुये कपङों में चली जाती है प्रेमविवाह करके
अपने प्रेमी पति के घर।

दहेज कभी पीछा नहीं छोङता भारतीय स्त्री का ।

याद करना तब जब विवाह के तुरंत बाद जुटे लोगों की भीङ सबसे पहले जानना
चाहती है ""मिला क्या क्या और नकदी रकम कितनी "
याद करना जब सबसे पहले दुल्हन की अगवानी को आयी बहिनें माँयें जेठानियाँ
ननदें पङौसिने और छोटे बङे कुटुंबी
खोजने लगते है नेग "दस्तूर की कीमत "शुल्क विवाह में शामिल होने का ।
कपङे
बर्तन
रुपया
गहने
फल मेवे मिठाईयाँ।

याद करना जब
जानबूझकर
परिजन लगा देतें हैं घर के सबसे पुराने कबाङ हो चुके कक्ष में दीमक लगे
पुराने पलंग पर सबसे पुराना अनुपयोगी बिस्तर
क्योंकि
दहेज
में आया ही नहीं पलंग और नेग के गद्दे चादर रजाई दुताई दरी तकिये परदे और
कमरे का फरनीचर ।
तब अचानक कमरे से फूल भी ग़ायब हो जाते है और ग़ायब हो जाते हैं दूध
बादाम के गिलास मिठाई की थाली और कोई नहीं रोकती देहरी को नेग के लिये ।
मिला ही क्या जो देगे ""बेचारे "
दहेज कभी पीछा नहीं छोङता ।
भारतीय दुलहन का ।

पहलौठे बच्चे का पालना नहीं लातीं बुआ और ना ही बाँसुरी सुनाने आते हैं
रिश्ते के चाचा ।
ना ही ननिहाल को भेजी जाती है गुङ सोंठ ना ही कुटुंब में बँटती है दूब औऱ वंदनवार ।
अचानक चरुआ गायब हो जाता है हरीरे की पतीली भी रीती रह जाती है और मैथी
बिसवार कम पङ जाते है पंसारी की दुकान पर ।
दहेज
कभी पीछा नहीं छोङता भारतीय पत्नी का ।
याद करना बार बार दाँत भीँचकर भुलाये गये उलाहने और कभी मँहगी साङी ना
खरीदने की मन ही मन ज़िद बचत की आदत और हक़ महसूस ना कर पाना किसी
फ़रमाईश पर । इंगित और कथित अमर्ष झुँझलाहट में ठुकराये गये विषाद औऱ
हर्ष.
ग़ायब होता जाता प्यार और याद रह जाता "पूँजी कम होने की वजह से पिछङता व्यापार "
घुमा फिराकर वही किस्सा,, ज़ायदाद में तुम्हारा भी तो है हिस्सा!!!
कभी नहीं छोङता पीछा दहेज भारतीय माता का
पहले ""भात मायरा चीकट तो लायें मायके वाले तब ही मुँह देखे बहू और जामाता का।
नहीं
माँगा नहीं लिया दहेज तो चढ़ाये जाते है हर रोज अहसान पहले पति परमेश्वर
फिर महामानव अवतारी भगवान ।
दहेज कभी पीछा नहीं छोङता भारतीय विवाहिता का ।

दहेज नहीं लायी इसीलिये हर गुण फीका और अवगुण तीखा रहा नवेली ब्याहता का
बंधुआ मजदूर बनकर रह जाती है बिना दहेज की ज़ोरू चाहे करे दफतर मिल चाहे
करे खेत डंगर गोरू।
©®सुधा राजे

व्रत- उपवास की असल अवधारणा।

माँ सा कहतीं थीं कि व्रत उपवास
का अर्थ है अपने हिस्से का भोजन
बचाना ।
और इसीलिये हर शुक्रवार गूँगा फकीर
हर मंगलवार अखाङे के पंडित जी । हर
शनिवार जोशी डकौत और हर
नवरात्रि गाँव जाकर कन्यायें
खिलाना और हर साल
सुहागिनों को कार्तिक भोज
कराना उनका नियम रहा।
आज महसूस होता है कि उपवास
की परंपरा का सही अर्थ ही भूल चुके हैं

भारत में अकाल सूखा ओला और बाढ़
जैसी विपदाओं से जूझने का साधन
रहा उपवास
उपवास सार्थक तभी है जब आप अपने
हिस्से का नाश्ता लंच डिनर और सपर
सब भोजन किसी भूखे गरीब परिवार
को भिजवा दें और प्राकृतिक अवस्था में
उपलब्ध सामग्री ही अतिशय असह्य भूख
होने पर फलाहार स्वरूप लें ।
यदि आपने रोज के दैनिक आहार
को किसी भूखे गरीब को दान
नहीं किया तो उपवास निरर्थक है ।
और दैनिक आहार से अधिक कीमत
या मात्रा का वैकल्पिक फलाहार
ग्रहण कर लिया तो वह ढकोसला है
उपवास नहीं ।
सोचिये कि आपने ने उपवास का व्रत
लिया है या ढकोसले का भ्रम?
दरअसल ये माना गया है
कि परमात्मा ने साँसें और आहार गिनकर
तौलकर प्रत्येक जीव के लिये बख़्शे हैं ।
संयम से नियम से श्वाँस को गहराई से
लेना(पूरक ) और देर तक फेंफङों में रोकने
का अभ्यास बढ़ाना[कुंभक) फिर धीरे
धीरे देर तक छोङना और सारी वायु
निकालना (रेचक) फिर खाली रहना देर
तक फिर धीरे धीरे साँस लेना
ये सब मिलाकर प्राणायाम कहलाता है

और गिनती में कम किंतु गहरी और उत्तम
साँसें लेने को योग कहते है।
ये आयु बढ़ाता है।
ठीक इसी तरह नित्य अपनी कुल भूख से
कुछ कम भोजन लेकर दान करना और उदर
को प्रातः सायं साफ
रखना खाली रखना जल पीना और अन्न
केवल आधा लेना शेष फल सब्जी मूल शाक
लेना और सप्ताह या पखवारे में उपवास
रखना भी मात्रा कम किंतु उत्तम
क्वालिटी का भोजन लेने से आयु
बढ़ाता है चयापचय
क्रिया सही रहती है और गरीब
को अगर हर सक्षम प्रतिसप्ताह एक
दिन का राशन दान करे तो कोई
भूखा ही क्यों मरे ?
यही है शुद्ध भारतीय उपवास
का विज्ञान
©®सुधा राजॆ

Wednesday, 26 February 2014

अकविता :- कब त्यागा था आत्मबल!!!!!!!

बाग़ी मन बीहङ बीहङ बीहङ फरार
ही रहता किंतु भावुक हृदय के बीच दबे कुछ
नाते।
आ गये समझाने कि आओ और जियो
समाज की मुख्यधारा में ।
बस कुछ ही समय रहना होगा सुधारगृह
की कारा में ।
शर्त रखी थी अपने आत्मसमर्पण की
बीहङ के दस्यु विचार बाग़ी मन सरदार
ने ।
एक मुट्ठी अपनी ज़मीन और
दोनों बाँहों भर अपना आसमान ।
रख दिये अस्त्र शस्त्र और बारूद के जखीरे

पहन लीं सुधार गृह की जंजीरें ।
किंतु यह केवल छल था और था धोखा।
भावुक मन के
नातों का कपटभरा लेखा जोखा ।
तरक्की मिली उनको जिनके नाम हुआ
खूँख्वार बागी को समाज के बीच
ला दिखाने का पदक और तमाशा ।
नाता जो दिखता रहा हितैषी वही था छल
से अपना बल और धन बचाता बढ़ाता।

धरती रही

रहा आकाश
अपना
मुक्ति और जीवन की मुख्यधारा
दोनों ही रहे सपना ।
कभी समाज ने दस्यु को नहीं अपनाया
कभी दस्यु ने वह सब छल कपट
नहीं भुलाया।
किंतु भ्रम में थे नाते जो थे प्रसन्न और
विजयोन्माद में गाते मुसकाते ।
कि
हथियार रख देने से
होता है क्या
बारूद बनाने वाले हाथ
कभी
भी बीहङ को भूल नहीं जाते
न ही भूल पाते है धोखा कपट और छल
रखा तो हथियारों का जखीरा गया था रे
कपटी!!!
कब रखा था आत्मबल!!!!!!!
बहुत पा ली प्रसंशा और ले लिये उत्कोच
बीहङ तो आज भी दिल में बसता है अब तू
अपनी सोच!!!!
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

Tuesday, 25 February 2014

कहानी हैलो क्रिस्टी।

कहानी
""""""
हैलौ क्रिस्टी! तुम कल स्कूल आ रही हो?

हाँ नंदी क्यों!!

कुछ खास नहीं बस तुम मेरे लिये लीव लगवा देना और एस एस टी के नोट्स ले लेना ।

पर क्यों नंदी?
बस यूँ ही जरा आज फिर माँ की तबियत खराब है ।

ओह नो नॉट अगेन!!!तुम्हारी माँ को हुआ क्या है? क्यों हर महीने दो चार
दिन तुम्हारी लीव लग ही जाती है? इफ सी इज इल योर डैड शुड टेक हर प्रॉपर
हॉस्पिटल एंड डायग्नोसिस सेंटर टू क्योर एक्यूरेटली!!!!

वी आर केयरिंग हर क्रिस्टी! डोन्ट वरी ।

Wednesday, 19 February 2014

Justice at the doorstep --article by sudha raje

Justice At The
Doorstep
- by Sudha Raje
Since I started advocacy from 1993 , I had always been spreading
awareness among my clients and others, and had the opinion : The main
problem of the Indian democracy, which is the main source of disorder
in the society is the centralization of institutions. The advanced
levels of jurisdictory institutions are centralized, leading to much
discomfort and troubles for the people. For instance, a person wanting
to appeal in high court have trouble doing so due to its inaccesibilty
i.e. very much long distances. Most of the common people, in the fear
of disrupting their routine, do not approach the jurisdiction. The
state high courts, are located far away from some regions of the state
that a person can not up-down directly to the hearing and reach back
home just in one day. Such traveling usually takes three to four days
and thus is nearly inaccessible to the people who have just one
earning member in the family. Also the people who already have a case
at the court have to wait for long intervals of time, due to very high
number of cases already filed there, delaying the process further.
Moreover the convicts have to be transported for the hearing rendering
them either able to escape or hazarding their lives.
If the state high court is decentralized into branches at district
level or provinces and the session courts at tehsil level, then the
same person will be more at ease and will be able to participate
actively in the jurisdiction process. The process will be much more
accurate, time and energy efficient. The victims and witnesses will be
also at a safe up-downable distances from their home and more secure
and safe. The convicts have lesser chance of escaping and lesser
machinary will be involved, where only a score or two of the staff
will have to travel to the branches, it will be major relief to lacs
of people..The second step of improvement in the process of
jurisdiction would be the availability of justice to people in their
own language which I will dicuss in later articles, where The Indian
Law and Constition and all its literature is dominated by English,
demanding a complete translation in other Indian languages.
©®Sudha Raje
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.p.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
Written originally by Sudha Raje
translated by :- Yashasvi Raje
10th standard
St.mary's School,Dhampur

Tuesday, 18 February 2014

कभी नहीं

तुम कभी सुखी नहीं रह सकती!!!!!!!
कभी नहीं!!!!
वह रह भी कैसे सकती है
सुखी जिसको विधि प्रकृति ने
ही सुखदायिनी तो बनाया हो सुखभोक्त्री कदापि नहीं ।
कैसे समझे कोई
कि जीवन उसकी धङकनों में भी है
जबकि उसकी नियति ही कर
दी गयी हो बिस्तर बच्चे और रसोई!!!!
कभी सोचना
बचपन से ही जिसके जन्म पर घिर जाती है
आसपास एक अनचाही उदासी ।
एक अवांछित शिशु!!!!!
जीवित रहे तो न रहे तो!!!
जीवित शिशु के हाथों से छीन लिये जाते है
कंचे पतंगे रैकेट बल्ले और फुटबॉल
थमा दी जाती है गुङियाँ गुड्डे
नकली गृहस्थी
सुई धागे ऊन सलाई
बेलन चकले कूचे बुहारू और परांत
कङाही पतीली चमचे कलछियाँ ।
अभी होश भी नहीं आया होता है कि रोक
दिया जाता है पेङों पर
चढ़ना तैरना कूदना और बाहर छत
गली का खेलना ।
हर महीने रखने लगतीं है माँयें दिनों के
हिसाब और दर्द के लिये गोलियों के
ज़वाब ।
थाली पर होने लगते है नियंत्रण
कभी वजन के बढ़ने के बहाने कभी पुत्र
पुत्री के भेदभाव जाने या अनजाने ।
छुङा दी जाती है प्रतियोगी परीक्षायें
किताबें और बङी तालीम ।
बढ़ती लङकी जैसे घर की नींव पर
कङवा नीम ।
जङों से काटकर रख दी जाती है अकसर
कलम
किसी अजनबी मिट्टी हवा पानी प्रदेश
और परिवेश में ।
अजनबी हो जाती है सोन चिरैया अपने
ही घर नगर प्रदेश और देश में ।
दायरों पर दायरे और
कर्त्तव्यों की सूचियाँ अनुसूचियाँ
चंद महीनों के बाद रह जातीं हैं
थालियाँ
कचरे
सजावटें
संग्रह
बचत
और यदा कदा सहानुभूति या स्वानुभूत
किंचिंत प्रेम कम धर्म और फर्ज़
की अनुभूतियाँ।
फिर बढ़ती आकांक्षायें उम्मीदें और
नौ मास के पल पल त्रास ।
जन्म मरण की देहरी पर पुनर्जीवन के
अभित्रास
चक्रव्यूह के बीच मारा जाता योद्धा मन
मस्तिष्क प्रेम संकल्प सपनों का अभिमन्यु
प्रयास और हर बार
सुख
उङाता रह जाता दुर्योधनी उपहास
हरण हो जाता
स्वाधिकार की वैदेही का
और स्वजीवनेच्छा की अहिल्या हर बार
प्रस्तरीकृत रह जाती बन कर पश्चाताप
रह जाती विरहिन राधिका और
उपेक्षिता रुक्मिणी ।
सुकन्या को वर ले जाता कर्त्तव्य
का नपुंसक च्यवन और सावित्री की तलाश
हमेशा समाप्त हो जाती अल्पायु दरिद्र
प्रेम के जीवित रखने के यमसंघर्ष में ।
महिमामंडित
रहती शक्ति की सती को कूदना होता है
स्वजनक के तानों में ।
स्त्री
और
सुख??
ये एक विचित्र प्रश्न है और स्त्री हुये
बिना न समझा जा सके न कहा जा सके ।
सुख तो मन की एक अवस्था है जो चीखों के
बाद लथपथ पसीने लहू से अचेत होती आँखें
देख नन्हीं काया मुस्करा देतीं पीङा के
श्लथ अकथ बयानों में ।
©®सुधा राज

Living screams... Dead people

When screaming voices echoed in the dark alleyways,
you did not arise....
When sobbing voices reverberated inthe house,
you did not respond....
When screeching tones boomed in your own heart,
Then too.... you muted them..
Then listen ... and listen well
Any of my cries is not meant for you,
Nor do I wish to call out to your heart, because ...


.....because only the one who lives, who is alive is being call ...
....not you
.....and only the one who has a pair of hands, two legs, ears and voice...
.....only the one with brain and a heartbeat ...
....will respond.
You go ...
.....go and sleep
...I am not calling. you but someone else..
... For if my voice reached there, he will arise
....and even if my voice failed me ...
....then the ones , who are still alive will carry my message
.... ON AND ON
©®Sudha Raje
translation - y raje

Monday, 17 February 2014

सुधा राजे की अकविता:- "तुम मेरा गंतव्य नहीं।"

मैं स्त्री हूँ ।
मुझे जन्म दिया एक स्त्री ने ।
मुझे नौ माह कोख में ढोया एक स्त्री ने।
मैं कोख के भीतर एक स्त्री का रक्त
मज्जा वसा माँस अस्थि शोषण
करती रही।
मेरे जन्म की अपार पीङा सही एक
स्त्री ने ।
मुझे दूध पिलाकर चलने लायक बनाया एक
स्त्री ने ।
एक स्त्री मुझे देती रही रसोई में तप तप
कर आहार और हर बार जब
गलती की तो किया सुधार एक स्त्री ने

एक स्त्री ही थी जो मेरे सारे मैल
धोती रही और वह भी एक
स्त्री थी जिसने समझाया मुझे भेद
स्त्री और शेष प्राणियों का अंतर ।
मेरे जीवन का ध्येय पुरुष है ।
ये जब एक स्त्री ने समझाया तो मुझे
स्त्री होना पहली बार नहीं भाया ।
क्योंकि कभी नहीं देखा था किसी पुरुष
का ध्येय स्त्री थी।
हर पुरुष
के आस पास तमाम स्त्रियाँ थी जिन्हें
वह भिन्न भिन्न नामों से
पुकारता था किंतु ।
उसका ध्येय
था
स्त्री से पृथक परे और इतर
धन के पहाङ
यश के शिखर
कीर्ति के आकाश
शक्ति के नक्षत्र
सुख के उद्यानभवन
विलास के राजमहल
वैभव के साम्राज्य
अमरत्व के गृह उपग्रह और ग्रहमंडल
उच्चपद के विस्तार
जयजयघोष के महानाद
आनंद
के महारास
और आत्मोत्थान के महाप्रयाण
स्त्री कहीं भी अनुपस्थित नहीं थी
किंतु ध्येय नहीं साधन मात्र थीं वैसे
ही जैसे अन्य और पदार्थ जङ चेतन
संसाधन ।
इसलिये एक लक्ष्य़ पूरा होते ही वह
त्याग सकता था स्त्री किसी वस्तु
की भाँति ।
किसी भी पुरुष ने कभी इस तरह से
निन्दा नहीं की स्त्री के त्याग
की बल्कि जयकार किये कि वह महान् है
कि स्त्री जैसे महामोहकारी बंधन से
मुक्त हो पाया ।
"स्त्री गँवाना हानि विशेष
नहीं"यही सिद्धांत रहा ।
जो जो स्त्री नहीं त्याग सका निन्दित
रहा औऱ उपहास का पात्र ।प्रेम
की लीलायें मंच पर मनोरंजन की विषय
वस्तु रहीं किंतु यवनिका के नेपथ्य में
स्त्री के सुख साधन पर किसी भी तुच्छ
नाते या वस्तु तक से अधिक समय और
ध्यान देने वाला उपहास का पात्र
कहा गया।
नेपथ्य में हर बार स्त्री को देहरी के
भीतर सिसकता सोता छोङकर जाने
वाला महापुरुष कहा गया।
किसी महापुरुष
का
ध्येय
स्त्री नहीं थी।
किंतु
किसी महान स्त्री का ध्येय उस के
जीवन में थोपे गये
या यदा कदा स्त्री द्वारा चुने गये
पुरुष से अधिक कुछ नहीं माना गया।
जो जो
स्त्री अपने जीवन का स्वामी घोषित
कर दिये गये पुरुष के सिवा ।
किसी भी धन, पद,यश,कीर्ति,रा
ज्य,समाजसुधार,कला,मोक्ष,वैभव
विलास, आध्यात्म, शक्ति, अविष्कार,
अमरत्व,ज्ञान,व्यक्ति देव या ईश को
लक्ष्य
या
ध्येय बनाती
व्यंग्य निंदा उपहास उत्पीङन
प्रताङना कलंक की पात्र घोषित कर
दी जाती।
जिस
जिस
स्त्री को ये षडयंत्र समझ आया
उसे सब मानसिक दासता के अनुकूल
बना दी गयीं स्त्रियों के लिये वर्जित
कर दिया गया।
कभी इस भय को तोङा जिसने वह
""व्यंग्य में पुकारी गयी-लङकी है
या चंडिका! !
इतिहास लिखता रहा वीरांगना
किंतु समाज टोंचने देता रहा-"स्त्री है
या झाँसी की रानी ?
.... फिर तो मुझे भी यही कहना है कि तुम मेरी मंजिल नहीं सहयात्री हो
जहाँ तक राहें साथ हैं चलो क्या जरूरी है कि मंज़िल एक हो ''हो तो अच्छा
ही है" न हो तो शिक़वा न रखना
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.p.
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

Saturday, 15 February 2014

माँ से सुनी कहानी ।

एक गाँव में सात लकङहारे नौजवान अपने
पिता के साथ रहते थे ।
सब कहते लङके का ब्याह कर लो घर बस
जाये किंतु कोई लङकी न देता ।
एक बिना माँ की बेटी को सौतेली माँ ने
दहेज बचाने के फेर में ब्याह दिया ।नाम
था करमजली ।सौतेली माँ रात दिन
काम कराती बे कदरी से रखती ।
लङकी ने आके देखा आठ चूल्हे एक कतार से
बरामदे में बने हैं आठ मिटकङाहे रखे हैं ।
शाम को सब आये और चने लगे भूनने आठ
चूल्हों पर सेर सेर भर चना भून कर सब
अपनी अपनी खाट पर खाने लगे नमक
मिर्च से बङे लङके को पीछे
की कोठरी मिली ।वह सोचने लगा अब
बीबी को भी रोज बाँटना पङेगा ।
दूसरी शाम सब आये तो देखा सब चूल्हे
गायब पूरा घर लीप पोत कर साफ है और
एक अहाता कच्ची दीवार का तैयार
जहाँ मिट्टी के बरतनों में शीतल जल
रखा है ।
बङे नाराज हुये सब कि ये क्या किया!!!!!
भूख से हालत खराब और अब एक चूल्हे पर
आठ किलो चने कैसे कब तक भुनेगे??
बहू बोली लाओ सब मुझे दो तुम सब तब
तक मट्ठा पिओ और हाथ मुँह धो लो ।
पङौस से लायी हूँ ।
बहू पङौस में गयी पाँच किलो चने देकर
आटा बदल लायी और दो किलो चने देकर
दाल मसाले आलू नमक ।एक सेर चने
पीसकर बेसन बना लायी।
जब तक सब हाथ मुँह धोकर बैठे सबको आठ
आठ रोटी और दाल के साथ आलू
का भुर्ता भी मिल गया ।
दो दो रोटी सुबह जंगल जाते हुये
भी थमायी तो सब चकित
कहाँ तो सारे चने फाँकने के बाद भी भूख
लगती रहती थी कहाँ पेट भर खाने के
बाद भी दोबारा रोटी चटनी प्याज
मिल गये ।
बहू ने कहा अब से सब लोग दस दस
लकङी घर के वास्ते भी लाना ।
शाम को रोटी तैयार थी और दाल के
साथ चटनी और कढी भी।
सब चकित अभी एक दिन की कमाई
दो दिन कैसे चल गयी!!
बहू सब लकङी मिलाकर पङौस में देकर
कुछ और सामान लायी गुङ तेल घी और
दीपक ।
रोज एक गट्ठर अधिक आता और बहू
सामान लाती कभी बरतन कभी कपङे ।
घर के अहाते में साग सब्जियाँ बो दी और
पङौस में पीसने फटकने के काम से कुछ पैसे
बचा लिये ।
बहू ने कहा केवल चने क्यों लाते हो?
लङके बोले कि दाम ले लो या अनाज
मरजी है सो हम चने ले लेते हैं कि और
क्या करेगे ।
बहू ने आगे से
चने की बजाय बदल बदल कर अनाज
लकङी के बदले लाने को कहा तो चावल
सूजी मैदा चीनी दाले मटर भी आने लगे ।
ससुर को दुकान खुलवा दी ।
और
देवरों को लकङी के हल पहिये औजार
बनाने के काम पर लगा दिया। बरामदे
के आगे मिट्टी से सब की मदद से आँगन और
आठ कमरे बना लिये ।
दो साल बीतते एक खेत ले लिया और चार
गाय भैंस ।पति दूध दही का कारोबार
करने लगा ।
और छोटों की एक एक करके नयी दुकाने
बन गयीं ।
जब उसके अपने बच्चे बढ़े हुये तो गाँव के
अमीरों में गिनती होने लगी ।
देवरों की बहुयें पढ़ी लिखी आयीं और एक
स्कूल खोल लिया ।
सब उसे अब बहूलक्ष्मी कहते और ।
घऱ के देवर लक्ष्मी भाभी ।
सौतेली माँ ने सुना तो जल
गयी कि करमजली जाने क्या जादू
जानती है ।
(प्रस्तुति सुधा राजे)
माँ से सुनी कहानी बचपन में ।
जो कभी नहीं भूली ।

प्रजानामचा :- संन्यासी या शासक।

भारतीय जनता की लीक लीक सोच है कि जो जो सत्ता त्यागकर चलता है वही वही
महान है । जबकि यूरोप अमेरिका में शासक के व्यक्ति अवगुण जनता अनदेखा
करती रही जब जब कि शासक कोई ऐसा कुशल प्रशासन देता रहा हो जो देश की जनता
के हित में हो । देश को विश्व पटल पर ताकतवर देश बना रहा हो । देश की
सीमाओं शक्तियों और प्रभुत्व दबदबे का विस्तार करता रहा हो ।
इसीलिये हमेशा जहाँ पश्चिमी शासक बढ़ते रहे भारतीय शासक अपने कुशल और
जनकल्याणक कार्यों के बावजूद निजी जीवन में हर छोटी बङी बात के लिये
दखलंदाज़ी के शिकार रहे । भारतीय जनता शासक को कुशल रणनीतिकार प्रबंधक
कूटनीतिक और देश समाज जनता को विश्वस्तरीय ताकत पहचान दबदबा दिलाने की
ताकत के बावजूद निजी जीवन के मामूली छिद्रान्वेषण के शिकार बनाये जाते
रहे ।
अयोध्या त्यागकर राम को एक खास मिशन के तहत भेजा गया कैकयी ऋषियों और
देवताओं द्वारा किंतु उनको महान कहा गया केवल राजसिंहासन ठुकराने की वजह
से। जब लंका विजयी करके सारे आतंकवादी मार डाले तब महान लंका का राज
त्यागने की वजह से महान कहा गया । किंतु वही राम जब छोटे राज्यों को
अयोध्या साम्राज्य में विलीन करते चले गये सीमाविस्तार और कुशल प्रबंधन
के साथ शांतिपूर्ण राज्य किंतु आलोचना हुयी पराये घर चारमहीने कैद स्त्री
को अपनाने की वजह से!!!! और लोकोपवाद वश जब स्त्री त्याग दी तो निन्दा
हुयी राज्य पर बने रहने और स्त्री के साथ जंगल ना जाने की वजह से ।
एक अच्छा वीर बलशाली रणनीतिकार कुशल कूटनीतिज्ञ साम्राज्य को ताकत दबदबे
और विश्वपटल पर देश को सम्मानित पहचान दिलाने वाला शासक ही जहाँ पश्चिमी
राज्यों की पहली पसंद रहा । और इसीलिये ब्रिटिश राज का सूरज कभी डूबता
नहीं था ।
आज भी वहाँ नेता के निजी जीवन को बहुत फोकस नहीं किया जाता वह ठाठ से
रहता है जितने चाहे विवाह तलाक कर सकता है किंतु मूल पसंद नापसंद की वजह
होती है कुशल शासन और देश की अर्थव्यवस्था प्रतिव्यक्ति आय संसाधनों की
रक्षा और विश्व पटल पर देश की छवि ।
किंतु भारतीय जनता नेता के प्रशासनिक गुण शासन करने चलाने और कूटनीतिक
ताकत की कुशलता की बजाय उसमे त्याग करने वाला बाबा वैरागी और कभी भी बीच
मँझधार में सत्ताप्रबंध छोङने वाले को महान समझती है ।
जबकि हर हाल में शासन को व्यवस्था कानून बनाये रखने के लिये जब तक कि कोई
दूसरा ड्राईवर/कप्तान आकर न सीट सँभाले शासन के जहाज /वाहन को चलाते
रहने वाले को लालची और निकृष्ट समझती है ।
अब फिर कौन बने कप्तान????? जो बनेगा उसके राजनीतिक प्रशासनिक कूटनीतिक
गुणो कुशलता की बजाय कपङे गहने बोली भाषा चलने बैठने के ढंग पर
छिद्रानवेषण किया जायेगा ।

वह कैसा शासन चलायेगा कितना जानता है राजनय कूटनीति विश्व परिवेश और देश
के हालात चुनौतियाँ समस्यायें दायरे और मजबूरियाँ इससे बहुत कम लोगो को
वास्ता होता है ।

कोई हेयर स्टाईल पर फिदा
कोई रंगरूप बोली भाषा जाति धर्म पर फिदा
तो कोई उसके भाषणों का फैन या निंदक ।

ये कोई रेम्प कैटवॉक नहीं!!!!!!!!!!!
देश की चुनौतियाँ ग्लोबलाईजेशन के बीच संप्रभुता के साथ सामंजस्य का
विकराल युगप्रश्न है ।

यहाँ कोई गवैया या वक्ता कैसा है से काम नहीं बनेगा । ना कोई शाकाहारी
माँसाहारी या सादा या फैशनेबुल का कम्पटीशन ।
!!!!!!
देश और बेशक राज्य चलाने के लिये ताकतवर दिमाग तेज निर्णय चुस्त और क्रूर
कुशल रणनीतिकार और कोई ताङ न सके ऐसा योजनाकार प्रशासक चाहिये जो

आतंकवाद
नक्सलवाद
मजहबवाद
जातिवाद
भाषावाद
नस्लवाद
सीमाविवाद
सीमाअतिक्रमण
देश पर बढ़ते कर्ज
मँहगाई
ग्लोबल वार्मिग से निबटना
तकनीकी और वैज्ञानिक शोध आविष्कार में बढ़ना ।
प्रतिव्यक्ति आय रोजगार भोजन पानी आवास दवाई पढ़ाई सुनवाई के साथ
युद्ध से निजात
बिजली सङक ट्रेफिक
और
अपराध बलात्कार मानव व्यापार तस्करी और नशाखोरी से निजात
सीमापार के अवैध व्यक्तियों का आना और बस कर रह जाना
बढ़ती जनसंख्या सिकुङती जमीन और घटते जंगल कटते पशु और अंधाधुंध
प्राकृतिक संसाधनों का आपराधिक दोहन

वगैरह वगैरह वगैरह
समस्याओ से अपनी टीम अपनी पार्टी के दम पर निबट सके ।

कोई है क्या ऐसा नेता?
निजी जीवन में वह क्या खाता पहनता रहता है कोई वजह नहीं । वह देश के
अनुकूल देश के वैश्विक स्तर पर दबदबे के कितने अनुकूल है यही मुख्य बात
है ।
तलाश जारी है ।
©®सुधा राजे।
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.p.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है ।

प्रजानामचा ""केजरीवाल का इस्तीफा

एए पी
चीफ ने बहुत दूर तक की सोचकर बहुत सही वक्त पर सही कदम आ आ पा
और खुद अपने हित में उठाया है ।
और मानना पङेगा कि दिमाग में तेज राजनीति है ।
जो भी सलाहकार है वो सही सलाह दे गये इस वक्त ।

क्योंकि
ये त्याग पत्र इस समय कानी उँगली का बहुत बढ़ चुका नाखून कटाकर
बलिदानी शहीदों में नाम लिखाने जैसा कदम है ।

और

आ आ पा
के समर्थकों द्वारा इस इस्तीफे को शहादत त्याग कुरबानी और सत्ता से वैराग
परम सिद्धान्त वगैरह घोषित भी किया जा रहा है ।


जबकि
जरा दूसरी तरफ देखें
1-आ आ पा के बिन्नी और तीन अन्य विधायक खुद आ आ पा के खिलाफ़ हो कर बाहर
निकलने पर आआपा कमज़ोर
2-आआपा पर कांगो की महिलाओं के साथ सबके सामने यूरीन सैम्पल देने को
मजबूर करने की वजह से और सत्ता में आने से पहले कानून मंत्री पर अनेक
आरोप से बौखलाहट
3-आआपा के दो विधायक विधानसभा में सोते पाये गये जिनकी तसवीरे खूब शेयर की गयीं ।
4--गणतंत्र दिवस पर चप्पलें पहनकर विश्वभर में भारतीयों का मज़ाक बनवाने
की अजीब जिद जबकि या तो धोती कुर्ता टोपी नागरा जूतों की पारंपरिक
भारतीय पोशाक पहनकर देशी या कुर्त्ता पाजामा मफलर में या अचकन शेरवानी
या कोट पैंट जूते पहनकर सही और फॉर्मल हुआ जा सकता था क्योंकि वहाँ वरदी
में सेना पुलिस और छात्र थे वरदी में ही गणतंत्र का अनुशासन तब विदेशियों
के बीच भारतीय मुख्यमंत्री क्या संदेश देना चाहते थे कि आआपा न भारतीय
पोशाक जानती है न गणवेश का अनुशासन?
5-संविधान के अंतर्गत तीन सूची हैं कार्य विभाजन की १""राज्य सूची
२''केन्द्रसूची ३""समवर्ती सूची
ये तीनों सूचियाँ उन कार्यों के विभाजन को घोषित करतीं हैं जहाँ राज्य
किन किन मामलों पर शासन चलायेगा और केंद्र कहाँ । स्पष्ट उल्लेख है कि
जहाँ किसी भी राज्य का कोई नियम विनियम अध्यादेश विधायन यदि केन्द्र
द्वारा पारित विधायन नियम विनियम अध्यादेश के विपरीत या बाधक हो तब
केन्द्रीय संसद द्वारा पारित नियम को ही लागू और सर्वोपरि माना जाये ।
ए ए पी
को जरूरत है कि एक बार किसी एल एल बी किये साथी के साथ बैठकर पूरा
संविधान और आई पी सी को सी आर पी सी के साथ
प्रस्तावना से लेकर समस्त संशोधनों तक गंभीरता से इर्थ सहित पढ़ लें समझ
लें और उन सब विषयों की पूरी सूची तैयार कर लें जिन जिन पर "राज्य "
कानून बना सकता है और ""केंद्र ""के बनाये कानून के विपरीत ना हो कोई
कानून इसलिये कोई कानून बनाते समय उसी विषय पर केंद्र का कानून कब कहाँ
कैसे किस रूप में लागू है यह भी पता करके पढ़ समझ लें

6--ए ए पी की समस्या है अरविन्द और मनीष सिंह के अलावा कोई दमदार वक्ता
या सटीक जानकार रणनीतिकार नहीं । बेशक पूर्व पत्रकार आशुतोष प्रवक्ता बन
गये और पीछे तमाम धनकुबेर और प्रमोटर भी समर्थन में है बङे बङे मीडिया
संपादक भी अघोषित एजेन्ट के तौर पर काम भी कर रहे है महान आम साधारण आदि
के महिमामंडन के साथ किंतु यही महिमामंडन भारी पङ रहा है क्योंकि
वास्तविक साधारण आदमी
ये महसूस कर रहा है कि साज़िश क्या है आखिर????? क्यों एक राज्य के
मुख्यमंत्री पर कैमरा लगातार टिका हुआ है जबकि बङी से बङी खबर कार्यक्रम
सूचना शेष सत्ताईस राज्यों की केवल सरसरी पर सिमट जाती है!!!!!!!!! और
यहाँ एक आकलन निकल कर आता है कि "आ आ पा "के कंधे के पीछे से नरेन्द्र
मोदी विरोधी खेमा काम कर रहा है । तो दूसरी ओर कॉग्रेस जो सोचती थी कि
चौधरी चरण सिंह मोरारजी देसाई देवगौङा वाला हश्र कर के आआपा का लाभ उठाकर
नरेंद्र मोदी के वोट कटवाये जा सकेंगे वहाँ दाँव उलटा पङ गया और केवल
दिल्ली की रसोई सँभालने वाली """मम्मी """"बनाकर बिजली पानी सङक सुरक्षा
भ्रष्टाचार में उलझा देने के मंसूबे से आगे निकलकर जब"" ए ए पी "ने ताल
ठोंकनी शुरू कर दी अमेठी से!!!!! और लोकसभा के लिये भी तब बौखलायी
कॉग्रेस और हङबङायी भाजपा । नतीजा विधानसभा के भीतर से बाहर मुख्यमंत्री
के घर तक हर तरह से बौखला डालने लगातार बोलते रहने और चीखने धरना देने
भीङ से भाग खङे होने मकान बदलने पर मजबूर कर दिया गया ।
ये पुरानी राजनीति का बङा सरल सा नमूना कि भीङ इतनी कर दो फरियादियों की
कि होश ही न मिले काम करने का ।
7-
हालात के साथ अल्पमत की आआपा सरकार जो
कि अपने धुर विरोधी कॉग्रेस के समर्थन से चल रही थी।
के सामने अपने ही मोहरे पिट चुके थे ।
अब अगला कदम कॉग्रेस जरूर उठाती
और ऐन किसी मर्म प्रहार के मौके पर उठाती
समर्थन वापस लेने की देर थी कि सरकार धङाम हो जाती ।
सरकार
गिरना तय हो चुकी थी कि आआपा को भी बेचैनी होने लगी थी ।
कि न तो दिल्ली प्रशासन सहयोग कर रहा है जो कि इसलिये कि लोकसभा चुनाव
सामने पङा है और पता नहीं 2014 में कौन मुखिया बन बैठे??
दूसरी तरफ कॉग्रेस के गले में हड्डी फँस गयी कि हम समर्थन भी दें और
गाली भी खाँयेँ!!!!!!
अब इससे पहले कि''' आआपा ""
आंतरिक कलह से बिखर कर समाप्त हो जाये और कॉग्रेस समर्थन खींचकर बेइज्जत
करे बढ़िया दाँव ::::
कि
बिल्ली खायेगी नहीं तो लुढ़कायेगी जरूर

अब विधानसभा भंग करने की सिफ़ारिश कर दी गयी

सबकी विधायिकी खत्म!!!!!!!
इसे कहते है धोबीपाट

आ जाओ लला मैदान में और फिर करो तैयारी । पाँच साल ये विधान सभा इस तरह
चलाना असंभव भी तो था ।
क्योंकि जिस तरह एक एक नाम घोटालेबाज़ों के सामने ला ला कर हङकंप कर रखा
था वहाँ न भाजपा साथ दे सकती थी और ना कॉग्रेस ।
अब
जनसाधारण को जो जो मीडिया दिखाये देखना पङेगा । बाकी है लोकसभा चुनाव की तैयारी ।
जिसे दिल्ली की अल्पमत विधानसभा में बैठकर ""मम्मी ""की तरह बच्चे रसोई
बिल बरतन सफाई में उलझकर नहीं किया जा सकता था ।

कोई बच्चा भी समझ सकता है कि ये कोई सत्ता त्याग या शहादत बलिदान वगैरह नहीं है ।
बल्कि पुख्ता राजनीति है।इस समय इससे कूटनीतिक चाल कुछ हो ही नहीं सकती ।

अब

आआपा
दिल्ली की चिल्लपों और बिजली पानी सङक क्राईम से मुक्त!!!!!!!!!!

चलो गली कूचे जंतर मंतर और करें धरना प्रदर्शन भाषण लोकसभा और पूर्ण
बहुमत पाने की तैयारी!!!!

यही है सोचा समझा दाँव
और अब भाजपा कॉग्रेस के पाले में है गेंद

अगर भाजपा को कॉग्रेस समरथन दे तो लोकसभा में क्या मुँह दिखाये!!!!!

नतीजा दिल्ली में दुबारा चुनाव और पक्की सहानुभूति आआपा के पक्ष में ऊपर
से मोदी विरोधी मीडिया जबरदस्त प्रचार कवरेज के मूड में ।
और
केजरीवाल के पास बढ़िया बहाना
देख लो भाईयों हम तो सही कर रहे थे हमें सत्ता का मोह नहीं हमारा माईक
तोङ दिया कागज फाङ दिये ।
अब हम केन्द्र में जाकर बदलेगे कानून ।

आ जाईये मैदान में

फिलहाल तो आ आ पा ने कॉग्रेस का दाँव कॉग्रेस के गले में डाल दिया है ।
देखना दिलचस्प रहेगा कि
अगर
केजरीवाल को नुकसान किया गया तो अंबानी और तीन सौ घोटाले बाजों की करतूत
कहा जायेगा ।

और
अगर विधान सभा चुनाव दुबारा होते है तो एएपी सिरदर्द बनकर सत्ता या
विपक्ष दोनों में धरने पर ।

लोकसभा में भी निःसंदेह कम या ज्यादा दखल होना सुनिश्चित है ।
©®सुधा राजे
सर्वाधिकार सुरक्षित लेख
Dta-Bjnr

Friday, 14 February 2014

लेख -"प्रेम प्रपंच।"

आप अपनी सोच किसी पर थोप नहीं सकते।
आप किसी को आदेश देने का हक़ जब तक नहीं रखते जब तक कि आप उसके सुख दुख
आजीविका के जिम्मेदार नहीं ।
देखा ये जा रहा है कि लोग जो खुद को जरा सा भी ताकतवर समझते है किसी भी
मायने में ओहदा पैसा बुद्धि शिक्षा या दैहिक बल वगैरह वगैरह वगैरह में
वे जैसे खुद को अपने से कमजोर सब लोगों पर जबरन सलाह और आदेश थोपने लगते
है । यह करो यह ना करो ।यह सही है क्यों मैं ज्यादा जानता हूँ मैंने
दुनियाँ देखी मेरे पास पावर है अनुभव है वगैरह वगैरह ।
हो
होगा
तो???????
आप दूसरे के निजी जीवन के ठेकेदार कैसे हो गये ??
कैसे आप दूसरे की सोच बदलने को तमाम फतवे संहितायें गढ़ने वाले हो गये???
किसी का वोट किसे देना है ये उसकी मरज़ी है ।
किसी को किस तरह के कपङे पहनना है ये उसकी मरजी है ।
किसी को क्या खाना है और किसके साथ रहना है ये भी उसकी मरजी है ।
कौन किस धर्म को माने या ना माने ये भी उसकी मरजी है ।

आप को भारतीय प्राचीन परंपराये प्रिय हैं आप रहिये आराम से घर में पूरा
आर्यावत बनाकर
आपको वैश्विक ग्लोबलाईजेशन पसंद है तो आप भी अपने घर को होनोलुलू शंघाई
लंदन शिकागो लेनिनग्राड बनाकर रहिये कौन रोकता है ।
रहा
प्रेम???
आपका प्रेम सेक्स तक ही सीमित है तो जो आपको पसंद करता है जाईये और ऐश कीजिये ।
और अगर आपका प्रेम मानसिक है देहिक नहीं तो आप अपने प्रिय के साथ अपने
दुख सुख बतियाईये ।
किंतु
ये कहने का हक़ किसी को नहीं कि प्रेम केवल भौतिक होता है पदार्थ होता है
मेटर है और सेक्स के परिणाम में बदलना ही मंजिल है बाकी सब बकवास है!!!!
उसी तरह जैसे वैचारिक आध्यात्मिक मानसिक प्रेमवादियों को यह कहने का हक
नहीं है कि दैहिक संबंध गुनाह है पाप है और जो प्रेम की मंजिल आखिर दैहिक
संबंध बना लेना मानते है वे सब पापी अज्ञानी और मूर्ख हैं ।
क्योंकि
यह संसार विविधता से ही सुन्दर है ।
कहीं विचार ही परम है कहीं पदार्थ ।
कुछ लोग किसी भी कीमत पर अपने प्रेमी को पा लेना चाहते है और घर से भागना
आत्महत्या करना हत्या करना और प्यार न मिलने पर तेज़ाब फेंक देना या
बलात्कार ब्लैकमेल करना उनको सही लगता है क्योंकि वे मानते है प्यार और
युद्ध में सब जायज है ।
वहीं कुछ लोग अपने प्रेम को परिवार समाज और अपने कर्त्तव्यों पर कुरबान
कर देते हैं कभी उजागर तक नहीं करते कि कभी किसी को चाहा और प्रेम किया
और बिछुङ गये तो कभी बैर द्वेष इलजाम तक नहीं रखा ।
कर्म और विचार
पदार्थ और चेतना
ये दोनों ही तत्व जरूरी है ।

जैसे एक वेश्यागामी के मन में कदाचित ही कभी उस वेश्या के प्रति प्रेम
उमङता हो जिसको वह बिस्तर पर भोगता है और दैहिक सुख पाता है ।

जबकि एक ऐसा व्यक्ति जिसने कभी उस स्त्री को स्पर्श तक नहीं किया हो वह
पूरा जीवन उस स्त्री से प्रेम करता रह सकता है और रह सकता है उसके लिये
शुभ कामनायें करता मदद करता भी जबकि कभी वह भूल से भी नहीं चाहता कि वह
स्त्री उसके करीब भी आये ।
पदार्थ यहाँ गौण है
और चेतना प्रधान ।

वहीं ऐसे भी व्यक्ति है जो पत्नी के साथ रहते हैं पत्नी के प्रति पूरे
कर्त्तव्य निभाते हैं उसके लिये भोजन वस्त्र आहार दवा और घर आदि का पूरा
पूरा इंतिज़ाम करते हैं पत्नी के साथ दैहिक संबंध भी रखते है संतान भी
होती है और सामाजिक तौर पर एक आदर्श दंपत्ति भी ।
किंतु
प्रेम नहीं ।
ये प्रेम अभाव तब भी रहता है जबकि दोनों साथ है और प्रायः प्रसन्न और सुखी ।
दूसरी ओर एक ऐसा जोङा है जहाँ पति या पत्नी में से कोई किसी बीमारी
दुर्घटना या प्राकृतिक विकलांगता या हादसे का शिकार हो गया ।
किंतु दूसरा साथी न तो उसे छेङकर चला गया ना ही कभी प्रताङना या उपेक्षा की
बल्कि प्रेम और बढ़ता रहा क्योंकि एक की अशक्ता दूसरे ने थाम ली और साथ
रहते रहते प्रेम दैहिक कदापि नहीं रहा कभी संबंधों पर प्रेम पर ये शिकवा
भारी नहीं पङा कि दैहिक विकलांगतावश दूसरा साथी अपने प्राकृतिक संबंध
नहीं निभा पा रहा है या निभा पा रही है । कुछ मनोरोगी हो जाते हैं किसी
हादसे में कुछ पागल तक किसी की याददाश्त चली जाती है किसी को फालिज मार
जाता है कोई आँख हाथ पाँव खो देता है कोई संपत्ति नौकरी और मान सम्मान
किंतु प्रेम है प्रेम बना रहता है प्रेम बढ़ जाता है और दुख अपने साथी के
दुख का हो जाता है कि अपने साथी को विकलांगता निर्धनता कुरूपता या मानसिक
विचलन का शिकार होकर दयनीय होने का अहसास तक नहीं होने दिया जाता और
निभता है रिश्ता ये प्रेम है ।
इस प्रेम को व्यक्त करने के लिये जितने भी पर्व मनाये जायें कम हैं
करवाचौथ होली वसंतोत्सव अक्षय तृतीया विवाह की सालगिरह और वेलेन्टाईन डे
कम हैं ।
किंतु
जिस को जो भाये वही सुहाये ।
एक
व्यक्ति जो अकसर अपना बेड पार्टनर बदलता रहता है उसको लगता है बस यही प्रेम है ।
दूसरा जो एक के नाम पर सारा जीवन वैराग में काट देता है उसके लिये वही प्रेम है
तीसरा जो साथ साथ है और अपने बे वफ़ा साथी के प्रति भी पूरी तरह वफ़ादार
है वह सोचता है
यही प्रेम है ।
चौथा जो अपने साथी की बेबसी बरबादी को चुपचाप ओढ़कर बाँटलेता है और
मनोदशा के अनुरूप अपना तनहा सफर भी साथ निभाते हुये जारी रखता है उसे
लगता है वही प्रेम है ।
पाँचवे को लगता है दोनों साथ है और बेडपार्टनर भी है होमपार्टनर भी है तो
वही प्रेम है ।

ये प्रेम
बहुरूपिया है

आप कैसे एक याददाश्त गुम हो चुके फालिज के शिकार साथी के पार्टनर को
उपदेश दे सकते है कि सेक्स ही प्रेम है? क्या वह चल देगा किसी स्वस्थ
सुंदर पराये व्यक्ति के साथ रात बिताने अगर उसको लगता है उसका प्रेम सही
है?
या आप कैसे समझा सकते है उस व्यक्ति को कि प्रेम आध्यात्मिक मानसिक
वैचारिक और चेतना की अवस्था है जब देह मन हृदय बुद्धि भावना सब एकाकार
होकर विस्मृत हो जाये स्व बिसर जाये और प्रिय याद रहे जब समाधिस्थ हो रहे
मन तन विचार चेतना!!!!
"उसने कहा था" एक कहानी पदार्थ से चेतना की तरफ जाती है और "लेडी
चैटर्लीज लवर्स "चेतना से पदार्थ की तरफ बढ़ती है ।
वस्तुत अपनी अपनी सोच है ।
कोई विवश नहीं कर सकता किसी को किसी से प्रेम करने के लिये ।
जिस पश्चिम को दुत्कारा जाता है भारतीय संस्कारों की दुहाई के नाम पर
वहाँ भी पोर्शिया और ब्रूटस के प्रेम जैसे उदाहरण भरे पङे हैं ।
वैसे ही जैसे एक शराबखोर को शराब ही परमानंददायिनी लग सकती है वैसे ही ।
एक सात्विक आहारी को शहद और दूध दही परम रस ।
हो सकता है शराबी सोचता रहे कि ये डरपोक शराब खरीदने पीने की दम नहीं
रखता और शराब को ललचाता होगा डर वश पीता नहीं ।
जबकि शायद ऐसे भी शाकाहारी हैं जिनके घर में मेहमानों के लिये एक से एक
शराब मँगायी जाती हो किंतु उसे खुद शराब से घृणा और बदबू अरूचि और बुरी
तरह परेशानी हो जो नाकाबिले बर्दाश्त हो ।
एक" स्पेस "का अर्थ समझने वाले दंपत्ति एक दूजे को एकान्त और प्रायवेसी
प्रोवाईड कराते हैं जबकि कुछ पजेसिव जोङे रात दिन वाचडॉग की तरह हर पल हर
हरकत पर पीछे पङे रहते है ।
अपना
अपना
सलीका
प्रेम कहीं बाँहों में साथी होने पर भी मन न मिलने का विरह है
तो कहीं दूर सियाचिन और गाँव के बीच जुङे मन के तार का चिरमिलन ।
ये
राग जिसने प्रेम नहीं किया वो भी कभी कभी इतना समझे कि जैसे आटे को रसोईया ।
ये राग कभी कभी प्रेम आकंठ डूबा प्रेमी तक इतना ना समझे जितना दिल का
महारोगी महाधमनी महानाङी

रक्तपरिसंचरण तंत्र को जैसे चिकित्सक की भाषा

मेरठ के फेरीवाले को इजिप्शियन भाषा
©®सर्वाधिकार सुरक्षित रचना
सुधा राजे
DTA...BJNR... ।

Thursday, 13 February 2014

सुधा राजे की व्यंग्य रचना --- "म्हारे डिग्गे की मुहब्बत।"

"स्वीट हार्ट आई लव यू डार्लिंग"!!!
सुनकर बङी चहक लहक के साथ इतराने
लगी नई मेम साब।
और चट से बोल बङी ""मी टू लव यू हनी!! "
परंतु
वहीं पोंछा लगाती फूलमती की समझ में
नहीं आया ये सब क्या है ।
इतना तो वह भी जानती है पढ़े लिखे
घरों में बीस बरस से काम जो करती है
कि क्या है इन ज़ुमलों का मतलब लेकिन
मतलब तो नहीं समझ में आया मतलब के
पीछे के मतलब का ।
अभी कुछ ही महीनों पहले
की ही तो बात है ।
!!!!!!
छोटे साब के लिये रोज रिश्ते आते और
बङी मेम बङे साब तसवीरें छोटे साब
को दिखाते ।
जब दरजन भर तसवीरों में से कोई
तसवीर पसंद आती तो लङकी वालों के
घर सूचना भेज दी जाती । लङकी के
पिता भाई चाचा मामा आते और
लंबी बातचीत के बाद दहेज पर
मामला अटकने पर हताश होकर
शर्मिन्दा लौट जाते ।
फिर नयी तसवीरे नये विवरण
नयी मुलाकातें चलने लगतीं ।
कभी कभी बात लङकी देखने तक
जा पहुँचती ।
किसी होटल मंदिर पार्क या घर में
छोटे साब कभी छोटी बहिन
कभी दोस्तों के साथ लङकी देखने पहुँच जाते लङकी वालों का जमकर
खर्चा करवाते फिर घर आकर एक फोन कर देतीं बङी मेम साब कि लङकी पसंद नहीं आई ।
बस इसी तरह सैकङा भर
लङकियाँ गयीं दो तीन साल में ठुकराई।
पिछले साल बात सगाई तक
जा पहुँची और तमाम तोहफे ले देकर
अँगूठियाँ भी पहन लीं लङके वाले
तो हमेशा ही लेते हैं सो हजारों के
तोहफों से बिन मौसम दीवाली कर ली।
फिर कुछ दिन घूमे फिरे बतियाये और एक शाम लङकी को कार के मॉडल पर
मना कर आये।
ये शादी भी लाखों की नहीं करोङों की बैठी।
तभी तो नई मेम साब अभी तक नखरों में
ऐंठी ।
माना कि हनीमून भी हो लिया और मन
गयी सुहागरात ।
लेकिन पचास लाख बीस तौला और
बीएम डब्ल्यू से शादी करने
वाला लङका कैसे कह सकता है
किसी लङकी से प्रेम होने की बात!!!!!!!
और कैसे कोई लङकी मान सकती है उस दैहिक उपभोग के रिश्ते को प्यार जब
यही वाक्य किसी लङके ने पहले
भी किसी लङकी से दुहराया हो बार
बार!!!!!
कैसे कह सकती है खरीदे हुये बिस्तर के
स्थायी सेवक गुलाम को कोई
लङकी कि है प्रेम जबकि ये
सारा रिश्ता तो है
नीलामी की ऊँची बोली का ।
पैसा सोना मशीनों के लिये मोल तोल
करके लङकी का दैहिक सहभागी बनने
को तैयार होने
वाला लङका तो स्थायी लुटेरा है
परंपराओं की ठिठोली का।
सोचती है फूलमती छोटी मेम के शौहर से
तो कई गुना ज्यादा प्यार करता है
डोंगरदास उसको सोलह
की थी तभी भगा लाया और हर सुख दुख में निभाया ।
कभी कभी कच्ची पीके खूब रोता है
कहता है फूलो तुझे रानी बनाके
रखता जो में सेठ होता ।
सोचती है फूलमती "यो रूपयों की हुंडी "
से ज्यादा "म्हारे डिग्गे को मिझसे मुहब्बत हती। "

©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
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यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

अकविता--जिंदा ज़िस्म मुरदा ज़मीर

जब गली में चीखती आवाज़ें गूँजी तुम
नहीं उठे ।
जब घर में सिसकने की आवाजें गूँजी तुम नहीं उठे
जब खुद तुम्हारे हृदय में चीखने के स्वर गूँजे
तब भी तुम नहीं उठे!!!!!!

तो सुनो मेरी कोई भी पुकार तुम्हारे लिये
थी ही नहीं किसी की कोई पुकार तुम्हारे लिये हो सकती है
क्योंकि पुकारा सिर्फ़
जीवितों को जाता है और सुनकर सिर्फ वे
ही दौङ कर आते हैं जो हाथ पाँव कान और आवाज रखते हैं
ना होते हुये भी सुनने कहने देखने की दैहिक क्षमता के बावज़ूद वे सब
तुमसे बेहतर है जो दिमाग रखते नहीं केवल उसे इस्तेमाल भी करते हैं । उस
दिमाग और दिल की धधक और
धङक के साथ

जाओ ।
जाओ तुम सो जाओ
मैं तुम्हें
नहीं किसी और को बुला रही हूँ अगर
मेरी आवाज वहाँ तक पहुँचेगी तो वह जरूर उठेगा और मेरी आवाज थक
गयी तो? तो भी जिंदा लोग मेरी बात
वहाँ तक पहुँचाते रहेगे ।
वहाँ जहाँ जीने का मतलब सिर्फ नब्ज का चलना और फेँफङों का हवा खींचना
छोङना मात्र नहीं ।
वहाँ जहाँ सुख का मतलब पेट भर पकवान और नींद भर बिस्तर और देह भर देहभोग नहीं ।
वहाँ जहाँ अपनों का मतलब एक बिस्तर के नर-मादा और उनसे पैदा बच्चे नहीं ।
जहाँ समाज का मतलब एक जात एक इबादतख़ाना एक बुतखाना एक सभा नहीं ।
वहाँ हाँ वहीं पहुँचानी है मुझे अपनी आवाज़ ।
क्योंकि जिंदा क़ौम ही मुर्दों को ढो सकतीं हैं और जब तबाही आती है टूटते
हैं पहाङ सैलाब आते है दरियाओं में और समन्दर किनारे की मर्यादा भूल जाते
हैं तब
तब जब हर तरफ होती हैं लाशें ही लाशें और गीध काग सियार गीदङ उल्लू सङे
गले माँस को खाने के लिये तब ।
तब जब मरे हुये गूँगे बहरे ज़मीर को कंधों पर उठाये प्रेत भूत पिशाच नोंच
रहे होते हैं चमकीली धातुयें कीमती पत्थर और धन अदा करने के वचनपत्र वाली
कागज़ी मुद्रायें तब ।
मुट्ठी भर ज़िंदा लोग मेरी आवाज़ में अपनी आवाज़ मिलाते हुये जलाने
दफनाने लगते हैं लाशें और उठा लाते है साँस खींचते छोङते फेफङों वाले
शरीर जिनकी नब्ज और धङकन चल रही होती है ।
तब सङाँध को रोकने के लिये पालते हैं मछलियाँ कछुयें और मेंढक । जिनका होना ।
तुमसे ज्यादा जरूरी है
क्योंकि प्रकृति की योजना में हर धङकती चीज का कोई न कोई समष्टिगत उपयोग जरूर है ।
और जो जो सृष्टि के समष्टिगत उपयोग की विराट योजना के मानचित्र में नहीं है ।
ये सृष्टि न उनकी है न उनके लिये है ।
कदाचित खाद बन जाते झरे हुये पत्तों और अपशिष्ट का भी हिस्सा है तो ऐसे
लोग जो किसी चीख पर चौंकते नहीं किसी हिलकी पर चौकने नहीं होते किसी
आर्त्तनाद की पुकार पर चल नहीं पङते ।
मृत अवशेष से भी कम महत्त्व के हैं क्योंकि जब उनको काटा जायेगा उनकों
कोंचा जायेगा जब उनके फूलते पिचकते दिल जकङ दिये जायेंगे और साँस खीचते
फेंफङों को घोंटा जाने लगेगा तब वे चीखेंगे ।
पुकारेगे और छटपटायेंगे किंतु उनको शायद कभी याद नहीं आयेगा कि ये
प्रतिबिंब तो उनका खुद का कैद किया हुआ है जो अब झलक रहा है । तो सो जाओ
तुम चैन से और पालो आराम से पेट परिवार और बच्चे पैदा करो जुटाते रहे देह
के सुख साधन ।
क्योंकि
किसी की भी कोई भी पुकार तुम्हारे लिये नहीं है ।
ना ही
मेरी कोई आवाज़ ।
चिढ़ो और चिङचिङाओ मत आदमी नाम के और भी प्राणी इस जंगल में रहते हैं ये
केवल तुम्हारा हुलिया और नाम है मैं उनको पुकार रही हूँ जिनकी नस्ल और
क़ौम है आदमी ।
©®सुधा राजे

Tuesday, 11 February 2014

टुकङे-टुकङे खत।

एक पत्र जो कभी नहीं लिखा गया ।
लिखता रहा मन टुकङों टुकङों में
कभी प्रेस किये गये कोट पर टँके काढ़े गये
रूमाल की इबारत में ।
कभी सुबह सुबह सोते हुये गुलाबी चेहरे
पर जानबूझकर टपकायीं गयीं भीगे
बालों की बूँदों की शरारत में ।
एक खत
जो लिखना था जो कभी नहीं लिखा गया
टुकङों टुकङों में
भेजा जाता रहा कभी एक एक फंदे बुने गये
ऊन के नमूने और स्वेटर मफलर दस्तानों में

कभी बङी बुजुर्ग
जेठानियों ननदों काकियों से पूछ पूछ कर
बनाये गये अजनबी पकवानों में ।
एक खत जो लिखना था फिर
भी कभी नहीं लिखा गया पूरा ।
वही खत टुकङों टुकङों में
बँटता रहा अधूरा ।
कभी सरप्राईज के लिये बनवायी कमीज
पतलून और घङी में ।
कभी
बेबसी से निभाये गये कोंचते
रिश्तेदारों की हथकङी में ।
एक खत जो तुमने कभी नहीं पढ़ा जो मैंने
कभी नहीं लिखा वही जो लिखना ज़रूरी
टुकङों टुकङों में लिखा गया ।
कहीं भी तुमसे दूर जाने की इच्छा पर रूठ
जाने पर मनाने के लिये लिखी गयी चिट
"सॉरी "औऱ दिये गये किसी अय़ाचित
उपहार के बाद कॉफी के प्याले के नीचे
रखे परचे पर लिखे "थैक्स" में ।
अब तक मुझे इंतिज़ार है उन ख़तों के ज़वाब
का जो मैंने कभी नहीं लिखे और तुमने हर
बार बिना पढ़े रख दिया ।
एक उदास चेहरा
एक फीकी मुसकान
एक गुमसुम सवेरा
एक बेस्वाद नाश्ता
एक बिना प्रेस की कमीज ।
एक खामोश शाम
एक एकांत चहलकदमी ।
मुझे एक खत लिखना था
जो मैंने कभी नहीं लिखा
क्योंकि कभी पहले लिखे गये अलिखित
किसी खत का ज़वाब नहीं आया ।आज
फिर एक टुकङा तहरीर लिखती हूँ "आई
विल कीप माई एव्हरी प्रॉमिस एट
एनी कॉस्ट"
©®सुधा राज

Sunday, 9 February 2014

रोये बिना मुमकिन नहीं

हवाओं में अज़ब ख़ामोशियाँ है ।
बङी ख़ामोश दिल की वादियाँ हैं।
पहाङों पे अजब सी सनसनी है ।
फ़िज़ा में फिर वो खुशबू अनमनी है।
मैं खुद को याद करना चाहती हूँ।
बिना रोये मगर मुमकिन नहीं है।
©®सुधा राज

दोहा

का वसंत आकैँ धरै ।
का फागुन हुरियाये ।
जी के जी में नईँ सुधा ।
बई बखरी उरियाये ।
©®सुधा राज

प्रेम का होना ही परम था।

प्रेम!!!!!
इतने बङे सपने और इतने ऊँचे पैमाने
बना लिये गये इस एक शै के
कि जो प्रेमपथगामी हुआ वह नाकाम
होकर रह गया संसार के जीवन में ।
जबकि जितने सांसारिक तौर पर
क़ामयाब रहे वे प्रेमाभाव के दर्द से
व्यथित रहे ।
प्रेम एक शै जो रहा किसी के पास
भी नहीं ना सांसारिक सफल के पास और
ना ही प्रेमपथगामी सांसारिक विफल
के पास ।
सुख को दो भागों में चीर दिया हो जैसे
प्रकृति की योजना ने कि एक को प्रेम
मिलेगा बस और कुछ नहीं । बाकी सब के
लिये वह दुखी रहे और एक को सांसारिक
उपलब्धियाँ मिलेगी किंतु प्रेम नहीं ।
फिर भी अपवाद बनकर रहे क्योंकि हर
छाया पर प्रकाश भाग से आती वायु ने
आलोक डाले और हर आलोक में रखे
पदार्थों की छाया बन गयी।
इन्हीं में पनप गये वे मन जो संसार में
होकर वीतरागी रहे और प्यार में होकर
भी सांसारिक ।
किंतु बावले हो ही गये प्रकाश के
फोटॉन कण और ऊर्जा के परमाणु जब जब
प्रेम ने पदार्थ का अभाव महसूस
किया और पदार्थ ने प्रेम
पाना चाहा यहाँ विभाजन की चरम
परिभाषा सार्थक हो गयी ।इसलिये
ही प्रेम पर पहला हक़ सिर्फ
उसका रहा जो जीता रहा वांछित
को पाने की क्षमता रखकर भी उससे दूर
रहा पाने की कामना किये बिना प्रेम
में रहा त्याग भी खुश रहा पीङा में
नहाता कि बस उसे प्रेम है
तो यही विडंबना है कि प्रेम सिर्फ उसे
मिला जिसने प्रेम तो किया किंतु प्रेम
पाना कभी लक्ष्य नहीं रहा।
यह पारस केवल उसे
ही दिखता रहा मिलता रहा जो इसे
पाना नहीं चाहता था प्रेम
का होना ही परम था पाना जानबूझकर
छोङ दिया गया कि वहाँ अनुभव ऐसे हुये
कि छोङने में ही सुख
रहा उसका जिसको प्रेम ने चुना पाने के
लिये बिना हक जताये जब कोई बहुत
करीब से सब कुछ चुपचाप धरकर लौट
जाये । और मैं जब कहती हूँ कि प्रेम पर
मेरा पहला हक़ है तो तो अपने अर्थों में
सही तो ही कहती हूँ ।
©®सुधा राज

Saturday, 8 February 2014

एकान्त और शान्ति।

एकान्त और शान्ति
ये
मेरे अपने पुनर्वरण पुनर्चयन
और चयन जो रहे शेष हो गये अवशेष ।
ये हस्तक्षेप ही रहा जो जो तुमने मुझपर
रीझकर कहा ।
एक हिस्सा चलता रहा तुम्हारे साथ ।
और एक रह गया शेष स्थिर अविचल
अचयनित ।
जिसे न तुम सुन सके न चुन सके ।
मुझे उसके बिना रहने पर हर बार
लगा अपना होना इतना अधूरा कि तुम्ह
अविभाजित एकाकीपन मेरे एकान्त चयन
के बाद भी नहीं हो सका पूरा ।
सुषुम्ना क्रियाओं की तरह आदी हो गये
तुम मेरे होने के और मुझे हर बार दाखिल
करनी पङी तुम्हारी हाज़िरी ।
कुबूल कर भी लूँ तो क्या तुम नहीं समझोगे
कि मैंने ही दुबारा चुन लिये है तुम्हारे
करीब रहकर भी नितान्त एकांन्त और
विराट शान्ति ।
©®सुधा राजे

अंजाने गंतव्य

प्रेम """
एक परिकल्पना
एक स्वप्न ।
एक तृषा
एक लक्ष्य
एक औत्सुक्य
एक बुभुक्षा
एक आकांक्षा कामना इच्छा अभीप्सा और आकर्षण """"""
इन सब से कुछ कुछ अलग वह एक भाव,,,,
जिसे शब्द दे पाना कहाँ इतना सहज जहाँ होश आते ही पहली जरूरत प्रेम और
पहली तृषा प्रेम नहीं अपितु रहा पीङा में डूब जाना ।
और जन्म के साथ ही जुङवा हो जैसे उस वेदना को हर पल पाले रहना ।
कल्पना के स्थूल रंग भी जहाँ तक नहीं पहुँच सकते वहाँ एक भाव भूमि पर हरा
भरा बियाबान जिसमें विचरता एक निदेह अदेह विदेह अनुभूत दर्द ।
प्रेम ही प्रेम से भरा मकरंद मन या आत्मा या प्राण ।
जिसने सदा प्रेम किया एक सुनहरे उजले असीम प्रकाश से । प्रेम ही प्रेम
किया एक परिकल्पित आकार प्रकार आभास और अनस्तित्व से ।
सब कुछ जो जो दिखता और छुआ जा सकता था से पलायित होकर मुँह फेरकर एक अनंत
आभा से बतियाता मन ही मन हर पल हर दुख सुख और संसार की हर घटना ।
प्रेम ही प्रेम से भरे उस आभासीय परिकल्पित अनस्तित्व के साथ गहरी अनुभूतियाँ ।
अकस्मात
किसी ने जगाकर कहा यही है वह स्वर्णाभा वह आलोक वह प्रकाश ।
परिकल्पना के अनुभूत अनस्तित्व को सामने वाले छुये जाते दिखते और सुनते
हुये यकीन करना कठिन लगा और मान मनाया कि यही वह है । किंतु ऐसा हो नहीं
सका ।
प्रेम ही प्रेम वह संसार वह प्रकाश ही प्रकाश वह स्वर्णाभा कांति और
विगलित एकात्मकता नहीं हो सकी साकार ।
तुम नहीं समझोगे
तुम्हारे "मैं तुम्हें प्यार करता हूँ"
कहने और मेरे ""मेरे हाँ मैं भी बहुत ""
की यात्रा के बीच कहीं पसरा सा था एक पूरा संसार ।
हाँ मुझे तुमसे प्रेम है और तुम्हें मुझसे ये मानने के बाद भी ।
आँख बंद करते ही
मैं सोचने लगती हूँ अकसर
मैंने तुम्हें वह समझकर बहुत उल्लास से प्रेम किया था किंतु तुम वही नहीं हो ।
नहीं हो वही ।
फिर भी मुझे तुमसे प्यार है यह तुम्हारा वाक्य मुझे स्वीकार है । किंतु
तुम्हें नहीं समझा सकती कि तुम्हें प्यार मैं भी करती हूँ कहने के बाद भी
कहीं वह सुनहरा नन्हा सा संसार है जहाँ एक नन्हीं सी सात साल की बच्ची के
सपने औऱ सुनहरी रौशनी से भरे कौंधते नगर में है एक अलौकिक अमूर्त मानवीय
दमकती आकारवाली छवि तुम इतने अपने कभी नहीं हो सके । मुझे तुमसे कोई
शिकायत नहीं किंतु वेदना के इस स्वर्णिम संसार में अब पूर्णतः एकाकी मैं
उस छवि को खोजने पर भी नहीं पाती हूँ और तुम वही हो ये नहीं मान पाती
हूँ।मुझे आज भी साँझ कर देती है उदास तब भी जबकि तुम होते हो बहुत पास
©®सुधा राजे

मुक्तक :भार सृजन का

Sudha Raje
प्रेम मात्र है एक अनोखा अनुपलब्ध
उपहार सृजन का ।
ये अपूर्ण चुनकर रक्खा है इस पर
सारा भार सृजन का।
सुधा तृषा ही तृषा और है तृप्ति मात्र
भ्रम विभ्रम मिलना ।
विरह अजर है अमर वेदना मिलन मात्र
त्यौहार सृजन का ।
©®सुधा राज

Friday, 7 February 2014

गीत-- पहली बार मंच पर।

Sudha Raje
-----
""चलो री गुईयाँ मिल-जुल
गुनकर पढ़ लें और पढ़ायें
चतुरई से घर-बार सँवारे
अक्षर दीप जलायें ।

पढ़ने से ही रूढ़ि प्रथाओं ।
की जंजीर कटेगी ।
पढ़ने लिखने से अँधियार
हटेगा पीर छँटेगी।
पढ़ने लिखने से ही सखियो
नई तकदीर बँटेगी
चलो चलें घर घर संदेशा
पढ़ने का पहुँचायें ।

चतुरई से घरबार सँवारें
अक्षर दीप जलायें ।

कह दो माँ से बाबुल से
पढ़ना है अभी बढ़ना है।
भारत की बेटी की नयी
तसवीर हमें गढ़ना है ।
बाँधो मत कंकन पायल
के बंध शिखर चढ़ना है।
अपने अपने पाँव खङे होकर
गुईयाँ दिखलायें ।

चतुरई से घर बार सँवारे
अक्षर दीप जलायें ।

पढ़ लेंगे हम तो उजियारा
बहिनों घर घर होगा ।
नहीं रहेगा दुख दरिद्र
ना शोषण का डर होगा ।
होगा ज्ञान सहारा अपना
देश गाँव घर होगा ।

अब अपने अधिकार और
कर्त्तव्य समझ समझायें।

चतुरई से घर बार सँवारे
अक्षर दीप जलायें

सुधा उमर बाली है बेटी
ना परदेश पठईयो ।
बिना ज्ञान अँधियारा जीवन
लंबी उमर बतईयो ।
कहो न बच्ची पर्दा बच्चे
घर ससुराल निभईयो ।

पढ़ने लेने दो 'विद्या वीरन
बहिनें विनय सुनायें
चतुरई से घर बार सँवारे
अक्षर दीप जलायें ।

©®सुधा राजे
मूल रचना एक वार्षिकोत्सव में
कक्षा सातवीं की छात्रा"
"
कुमारी सुधा राजा सूर्यवंशी "
के नाम से लिखकर फिर इसी पर स्वयं
भाव नृत्य किया था सितंबर अक्टूबर सन्
1979-80में स्थान घाटीगाँव
जिला ग्वालियर म.प्र ।
इस रचना से पहले की अस्फुट रचनायें
सखियों को पत्र होते थे जो हर बार
पिताजी का तबादला होने से बिछुङ
जातीं थी । कविता कक्षा छह से
शनिवारीय बाल सभा में कहनी प्रारंभ
की थी तब वहाँ स्कूल में एक आशुकवि आये थे
जिनको हम सबसे मिलवाया गया था नाम
तो याद नहीं सन् 1978-79की बात है
कवि ने धोती कुर्ता पहन रखा था और
कविता थी उनकी -

----देख तमाशा लकङी का
लकङी का भई लकङी का
पलने से श्मशान तलक है साथ
हमारा लकङी का --

बङी लंबी कविता थी । बाल मन पर
ऐसी छाप पङी कि फिर चुटकुले
कहानी रास नहीं आते और
सखियों भाभियों दीदियों को पत्र में
हर संदेश कविता में लिखने की आदत
सी हो गयी । किंतु तब ये
पता नहीं था कि कविता है क्या और कैसे
सँजोकर रखें ये कवितायें ।
लोकगीतों को गाने का शौक था किंतु नये
नये गीत कहाँ से लायें
सो बन्ना बन्नी सोहर दादरा सरल
अंतरा लगाने के साथ सुने हुये गीत के
ज़वाब में बनाकर लिखते दिन भर सोचते
और शाम की महिला मंडली में
नायिका बन जाते कि वाह
गुड्डो राजा बहुत सुंदर गाती हो कहाँ से
लाती हो नये नये गीत । अब अंदर
तो खुशी नाचती कि वाओ क्या गीत
रचा मगर इतना डर
भी लगता कि बच्ची ने रचा है सोचकर
कहीं कोई हँसी ना करे इसलिये
गायिका तो प्रसिद्ध रहे किंतु
कवियत्री भी हम ही हैं ये
काफी दिनों बाद पोल खुली ।
पहला भाषण मद्यनिषेध पर था 1980में
तब मन ही मन कहीं शराब से
तीखी नफरत थी जो ज्यों की त्यों कह
डाली वही पहली बार अखबारों में नाम
छपा और यही पहला मौलिक लेख था ।
कक्षा छह में कुछ बीटीआई शिक्षक आते थे
दतिया लक्मीबाई स्कूल में जो ट्रेनिंग कर
रहे थे उनमें ही कुछ शिक्षक प्रश्नोत्तर
रोचक तरीके से पूछते थे
कि पढ़ना अच्छा लगता और निबंध तब से
रटे कभी नहीं । फिर तोमर सर ने
कक्षा सात में निबंध क्या है और कैसे
लिखा जाता है समझा दिया तो फिर
तो हर औसत विषय पर निबंध तत्काल
लिख डालने की आदत हो गयी किंतु
रचनायें सहेजना तब
नहीं आता था क्योंकि पता ही नहीं था कि हम
कुछ मौलिक लिख रहे हैं और यह कोई
साहित्य है । पढ़ना ज़ान बचाने के लिये
जरूरी था बस क्योंकि घर में तब सब
लङकियाँ लगातार घरेलू कार्यों में कुशल
बनाने की कार्यशाला चलती थी स्कूल
मुक्तिधाम होते थे । अस्तु कह सकते हैं
कि यह पहली रचना भी जिसके कुछ अंश
भूल गये हैं क्योंकि लंबागीत था जिसपर
नृत्य करना और गाना ये सब हमने स्वयं
किया । जो साथ की लङकियाँ थीं ढोलक
पर और आवाज में सुर मिलाने को उनमें से
अधिकांश का विवाह
आठवीं की परीक्षा देते
ही हो गया था और हमारे घर भी तब
हमारी पाँचवीं की परीक्षा पास करते
ही विवाह की बातें चलने लगीं थीं सबने
सोच लिया था बस आठवीं कराके घर
बिठा देना है । मन में भय और रेडियो पर
स्त्री शिक्षा के प्रचार लिये एक
सपना पल रहा था हम हायर
सेकेन्ड्री करेंगे ।
जबकि परिवार तो हमारा विवाह हमारे जन्म के भी पहले तय कर चुका था जिसकी
जानकारी हमें थी ही नहीं ।

सातवीं कक्षा में ही शाम
का पूरा भोजन हमें पकाने की ताकीद
थी कि लङकी हो गृहकारज सीखो अब
ससुराल जाना है ।
आज सब अविश्वसनीय सा लगता है
कि हमने दसवीं कक्षा पंद्रह साल की आयु
से ही उत्सवों में साङी पहिननी शुरू कर
दी थी कौटुम्बिक उत्सवों में तब सब
लङकियाँ यही करती थीं ।तब पढ़ना जैसे
याचना प्रार्थना और
हाहाकारी अरमान
ही था लङकियों का । सिलाई कढ़ाई
बुनाई रोटियों और घरेलू कलाओं
की निपुणता प्राप्त करने की शर्तों के
बाद सबकी सेवा के बाद बचे समय में पढ़ने
की शर्त पर पढ़ना। हमारे लिये तब एक
असंभव कल्पना थी कि कभी हम हाईकोर्ट
के क्रिमिनल लॉयर का कोट पहनेगे
या एम ए एल एल बी एम जे एम सी करेगे ।
किंतु मन गंभीर चिंतन में
रहता कि क्या करें
कि पढ़ना ना रोका जाये । तब दरजन
भर बढ़े भाई हर समय निगरानी पर रहते
और दरजन भर बङी महिलायें चौकसी पर
दुख था कहीं गहरे बगावत के बीजों के
साथ
कि क्यों लङकियाँ इतनी जल्दी स्कूल
माँ बाप घर छोङ दें । तब ये गीत
आठवीं की सीनियर लङकियों की विदाई
पार्टी के लिये आयोजित वार्षिकोत्सव
में किया गया गया जिन में से अधिकतर
लङकियाँ सगाई की चूङियाँ पहन
चुकीं थीं । हमारी भाभियाँ तक पंद्रह
सोलह साल की थीं और माँ बन चुकीं थीं ।
कठिन हालात परदा और ससुराल
का आतंक एक कमजोर सी आशा पढ़ाई तब
लगता था अगर पास होते रहेगे तो स्कूल
नहीं छुङाया जायेगा और जितनी देर
स्कूल उतनी देर गृहकारज
की प्रशिक्षणशाला से मुक्ति।तलवार की धार पर चलना था लङकियों का पङना
मामूली शिकायत और पढ़ाई छुङाकर शादी कर दी जाती लंबे घूँघट साङी और
चादरों का जमाना था । तब टीवी मोबाईल और लैपटॉप नहीं थे ।
©®सुधा राजे
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Thursday, 6 February 2014

अकविता-- स्त्री और ध्येय।

मैं स्त्री हूँ ।
मुझे जन्म दिया एक स्त्री ने ।
मुझे नौ माह कोख में ढोया एक स्त्री ने।
मैं कोख के भीतर एक स्त्री का रक्त मज्जा वसा माँस अस्थि शोषण करती रही।
मैंने जन्म की अपार पीङा सही एक स्त्री ने ।
मुझे दूध पिलाकर चलने लायक बनाया एक स्त्री ने ।
एक स्त्री मुझे देती रही रसोई में तप तप कर आहार और हर बार जब गलती की तो
किया सुधार एक स्त्री ने ।
एक स्त्री ही थी जो मेरे सारे मैल धोती रही और वह भी एक स्त्री थी जिसने
समझाया मुझे भेद स्त्री और शेष प्राणियों का अंतर ।
मेरे जीवन का ध्येय पुरुष है ।
ये जब एक स्त्री ने समझाया तो मुझे स्त्री होना पहली बार नहीं भाया ।
क्योंकि कभी नहीं देखा था किसी पुरुष का ध्येय स्त्री थी।
हर पुरुष
के आस पास तमाम स्त्रियाँ थी जिन्हें वह भिन्न भिन्न नामों से पुकारता था किंतु ।
उसका ध्येय
था
स्त्री से पृथक परे और इतर
धन के पहाङ
यश के शिखर
कीर्ति के आकाश
शक्ति के नक्षत्र
सुख के उद्यानभवन
विलास के राजमहल
वैभव के साम्राज्य
अमरत्व के गृह उपग्रह और ग्रहमंडल
उच्चपद के विस्तार
जयजयघोष के महानाद
आनंद
के महारास
और आत्मोत्थान के महाप्रयाण


स्त्री कहीं भी अनुपस्थित नहीं थी
किंतु ध्येय नहीं साधन मात्र थीं वैसे ही जैसे अन्य और पदार्थ जङ चेतन संसाधन ।

इसलिये एक लक्ष्य़ पूरा होते ही वह त्याग सकता था स्त्री किसी वस्तु की भाँति ।
किसी भी पुरुष ने कभी इस तरह से निन्दा नहीं की स्त्री के त्याग की बल्कि
जयकार किये कि वह महान् है कि स्त्री जैसे महामोहकारी बंधन से मुक्त हो
पाया ।
"स्त्री गँवाना हानि विशेष नहीं"यही सिद्धांत रहा । जो जो स्त्री नहीं
त्याग सका निन्दित रहा औऱ उपहास का पात्र ।प्रेम की लीलायें मंच पर
मनोरंजन की विषय वस्तु रहीं किंतु यवनिका के नेपथ्य में स्त्री के सुख
साधन पर किसी भी तुच्छ नाते या वस्तु तक से अधिक समय और ध्यान देने वाला
उपहास का पात्र कहा गया।
नेपथ्य में हर बार स्त्री को देहरी के भीतर सिसकता सोता छोङकर जाने वाला
महापुरुष कहा गया।
किसी महापुरुष
का
ध्येय
स्त्री नहीं थी।
किंतु
किसी महान स्त्री का ध्येय उस के जीवन में थोपे गये या यदा कदा स्त्री
द्वारा चुने गये पुरुष से अधिक कुछ नहीं माना गया।
जो जो
स्त्री अपने जीवन का स्वामी घोषित कर दिये गये पुरुष के सिवा ।
किसी भी धन, पद,यश,कीर्ति,राज्य,समाजसुधार,कला,मोक्ष,वैभव विलास,
आध्यात्म, शक्ति, अविष्कार, अमरत्व,ज्ञान,व्यक्ति देव या ईश को
लक्ष्य
या
ध्येय बनाती
व्यंग्य निंदा उपहास उत्पीङन प्रताङना कलंक की पात्र घोषित कर दी जाती।
जिस
जिस
स्त्री को ये षडयंत्र समझ आया
उसे सब मानसिक दासता के अनुकूल बना दी गयीं स्त्रियों के लिये वर्जित कर दिया गया।
कभी इस भय को तोङा जिसने वह ""व्यंग्य में पुकारी गयी-लङकी है या चंडिका! !
इतिहास लिखता रहा वीरांगना
किंतु समाज टोंचने देता रहा-"स्त्री है या झाँसी की रानी ?
©®सुधा राजे

Wednesday, 5 February 2014

सुधा राजे की कहानी -- झुमकी।

झुमकी
---------------
कहानी ।।
---------
मेरे लिये बस एक नाम
थी हजारों क्लाईंट्स में से एक । लेकिन
ज्यों ज्यों तारीखें लगतीं गयीं वह एक
अनोखा अनुभव हो गयी ।
औसत से कम कद की साँवली गठे बदन
की झुमकी की देहयष्टि इतनी संपन्
की कोई भी स्त्री ईर्ष्या कर उठे ।मुझे
भी हुयी ।कभी लगता सब उसे घूर रहे हैं
तो मैं उसे चैंबर से बाहर ले जाती चाय
पीने के बहाने बार कैंटीन के लेडीज केबिन
में ग्वालियर हाईकोर्ट तब पुराने महल में
ही चल रहा था और
पत्थरों की नक्क़ाशी का अद्भुत
नमूना वह महल एक बेहद ऋतुअनुकूलित नक़्शे
से बना था । सी जे कोर्ट चौथी मंज़िल
पर लगता था । और कैंटीन प्रथम तल पर
।झुमकी अपने पूर्व पति के ख़िलाफ़ एक
मुकदमा लङ
रही थी । अपने बच्चे पाने के लिये ।
उसके पति ने भी मुकदमा ठोक
दिया था ।विवाह के
प्रति चरित्रहीनता का आरोप । और
ग़ज़ब ये था कि ये मुकदमा मैं अपने कट्टर
आलोचक रिश्ते के एक भाई से लङ
रही थी जो झुमकी के पति की पैरवी कर
रहे थे । एक ऐसा इंसान जो ये
मानता था कि औरत को वकालत
नहीं रसोई सँभालनी चाहिये झुमकी
की शादी छह साल की उम्र में सत्तरह के
लल्लू काछी से
हो गयी । और गौने पर दस साल
की झुमरी बलात्कार
झेलती रही बीस साल के युवक का । एक के
बाद एक तीन बेटियाँ पैदा होने से
झुमरी की कदर ही खत्म
हो गयी । बीस की झुमरी तीन
बेटियों की माँ हो गयी । काछी लोग
सब्जी का धंधा करते हैं
सो झुमरी सारा दिन
मिरची टमाटर नींबू धनिया सेम तोऱई
पर निराई गुङाई रोपाई
पानी करती ।।शाम सवेरे बूढ़े ससुर
की गालियाँ खाती और रात को दारू
पीकर मंडी से
सब्जी बेचकर लौटे मरद की हवस में
रौंदी जाती ।
ये तकलीफे कम नहीं थी कि,
बङी बहिन मर गयी औऱ
झुमरी बङी बहिन के दो बेटे
जो अभी बहुत छोटे थे साथ ले
आयी क्योंकि जीजा शहर में ठेली लगाकर
सब्जी की फेरी करता कछवार
सँभालता औऱ माँ बाप पहले ही मर चुके थे

लल्लू काछी बाहर को दाँत निकले उलटे
तवे सा काला औऱ दैत्याकार शरीर
का आदमी था ।
शराब और जुआ के साथ ठीये
की दुकान होने से
बढ़िया आमदनी होती थी ।लेकिन जैसे
जैसे झुमरी मेहनत करती जवान और
गठीली होती जा रही थी लल्लू का बदन
आलस औऱ शराब ने
खोखला कर दिया ।
ऊपर से वह सस्ती बस्तियों में
भी जाता रहता तब जब झुमरी पेट से
होती या जचकी पर खटिया पर रहती ।
या मायके चली जाती झुमरी की मेहनत से
कछवार में हर मौसम के फल लगने लगे थे और
छोटी लङकियाँ टोकरी चबूतरे पर धरकर
दिनभर फल
सब्जी बेचती रहती ।
बकरियाँ अलग से पाल ली थीं और
बङी बेटी ने जब रसोई औऱ छोटे भाई
बहिन सँभाले । झुमरी भी सिर पर
टोकरी रख कर दिन में एक चक्कर पास
की पॉश कॉलोनियों तक लगाकर
काफी पैसे कमा लेती ।
जीजा पैसे देते तो बच ही जाते बेटे पढ़ने
जाते तो झुमरी ने
दोनों छोटी बेटियाँ भेजनी शुरू कर दी ।
जीजा हम उम्र
साँवला सलौना युवक
क्योंकि जीजी गोरी थी सो जीजी हो गयी
थी ।
झुमरी साँवली को पसंद कौन
करता सो जो मिला शराबी बाप ने
मौङी ठिकाने लगा दी । फुरसत पायी
।जब बदन की जरूरत नही थी लल्लू
हड्डियाँ झिंझोङता रहा ।
जब झुमरी गदरायी । तब लल्लू
बूढ़ा हो चला था । कई साल से तो बस
कपङे खोलते
ही सो जाता ।
झुमरी गीली लकङी सी सुलगती रह
जाती । जीजा जब आते अहसान उतारने
को कुछ उपहार झुमकी के लिये भी लाते ।
स्वभाव से मधुर
भाषी जीजा मरी बीबी को याद करते
रोते तो कभी हँसते ।
एक दर्द का रिश्ता बन
गया दोनों में । पाँचों बच्चे जीजा के
साथ किलकते ।
जबकि लल्लू बेटियों को जब तब
पीटता कोसता गरियाता ।
एक दिन पिटते पिटते
झुमकी का धैर्य जवाब दे गया औऱ
मेहनतकश हाथों ने लल्लू को याद
दिला दिया कि वह सह
रही थी लेकिन दम नहीं रहा लल्लू में ।ये
चुनौती नागवार गुजरी और लल्लू ने
कुल्हाङी उठा ली । कि पीछे से जीजा ने
आकर कलाई थाम ली। लल्लू पूरी ताक़त से
जूझा लेकिन हाथ
नहीं छुङा पाया ।
औऱ जब हर तरह हार गया तब
गालियाँ बकने लगा और कह
दिया वो जो झुमरी के सीने में जा धँसा ।
कि वह
तो जीजा की रखैल है ।
बङी बेटी चीख पङी तब औऱ
सारा विश्लेषण जो झुमरी ना कह
सकी कह दिया । बेटी को फेंक कर
लोटा मार दिया।
उस शाम सब रोते रहे ।
जीजा को पहली बार
पता चला कि झुमकी झूठ
कहती रही।
बेटों को लेकर जब जीजा चले तो बच्चों ने
रो रो कर बुरा हाल कर लिया कुछ दिन
की मदद
को सोचकर झुमकी बेटियाँ लेकर जीजा के
घऱ आ गयी।
लल्लू ने
मुकदमा चोरबदचलनी अपहरण
और
चरित्रहीनता का लगा दिया ।। अब
तो झुमरी गुस्सा ही हो गयी ।। बस जब
लल्लू घर
नहीं था सारी चीज बसत उठाकर दहेज के
बाशन कोठरी में ताला लगाकर धरके
चली आयी । पुलिस आयी और
जीजा साली हवालात में । जीजा के
दोस्तों ने वकील किया मेरे सीनियर
को ।
और ज़मानत पर छूटकर झुमकी जिद पर अङ
गयी कि अब
नहीं जायेगी ।कभी उस खब्बीस
की गुलामी करने ।
मामला हमें सौंपा गया और
सारी कहानी धीरे धीरे सामने
आती गयी ।
मेरी सहानुभूति झुमकी के साथ
होनी स्वाभाविक थी । लेकिन जिस तरह
औरत
को निशाना बनाकर घिनौने इल्ज़ाम
विरोधी वकील ने लगाये और झुमकी के
मामले में समाज को नज़ीर पेश करने के
लिये जीजा को जेल और झुमरी पर लल्लू
का कब्ज़ा करने गुहार न्याय के नाम पर
लगायी ।
मुझे निजी तौर पर
प्रतिष्ठा का प्रश्न लगा । घर पर
हमारी कजिन से
गर्मा गर्मी होती रहती नैतिकत
सवालों पर ।
टोटम जनजाति और प्राचीन रस्मों के
आधार पर जब मैंने मुकदमा जीत लिया तब
झुमकी ने माला डालकर जीजा से
शादी कर ली ।
झुमकी की माँ बङी रोई । मैंने पूछा अब
क्यों रोती हो । तो ठेठ चंबली में
बोली """लै मोई मौङी खौँ चार
रोटी की भूँक हती बितै दोई
नईय़ाँ तौ कित्तौ रोउत
ह्वेगो बाको जीउ .....
मैं अवाक्
सारे सिद्धांत धङधङाकर गिर पङे थे।
सत्य कथा ।
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot
bijnor
U.P.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

Tuesday, 4 February 2014

कहानी :सुधा राजे

"सतभाँवरी "
अम्माँ आपने फिर वही परांठा रख
दिया!!!!
रोज रोज परांठे!!!!
बाओजी!! लाईये पाँच रुपये दीजिये मैं
स्कूल में ही खा लूँगी ।""
अरे मेरा प्यारा बच्चा!! स्कूल में
क्या क्या मिलता है
भला हमारी "मिष्ठी" को ।
आलू की टिक्की, पिज्जा,बर्गर,समोसे,क­
चौरी,डोसा,चाऊमीन,और केक और और और
हाँ पाव भाजी पानी की टिक्की और
भजिया और ब्रैडबडा।
तो ठीक है आज आप अपनी पसंद का लंच ले
लेना लेकिन कल से घर
की ही बनी चिज्जी ले जाना ओ के!!
मेरे अच्छे बाऊजी!बाय टाटा ।
मैं मिष्टी
बाऊजी कहते हैं मेरी आवाज़ बहुत मीठी है
इसलिये मिष्ठी हूँ। अम्माँ कहतीं हैं मैं
मीठा ज्यादा खाती हूँ इसलिये
मिष्ठी हूँ।
मैं बस जाने
ही वाली थी कि बाऊजी को अम्माँ ने
फिर टोक दिया ।
""क्यों इसे बिगाङ रहे
हो परायी अमानत है आदत खराब
हो गयी तो कौन झेलेगा ।एक
लङकी हो जाने की वज़ह से ही तो आज तक
सब झेल रही हूँ । ""
बाओजी गुर्राये ---"तुझे हम नहीं झेल रहे
हैं क्या? वो मेरी बेटी है तुम्हारी तरह
किसी भूदानी की नहीं "
अम्माँ फिर छलछलाती आँखें लिये
चलीं गयीं। पता नहीं क्यों मुझे
अम्माँ का यूँ हर बात चुप होकर आँखें भर
लेना अच्छा नहीं लगता ।अब मैं
माँ का पक्ष लेती हूँ तो भैया की तरह
बाऊजी मुझसे भी नाराज रहेंगे और
खर्चा पानी बंद।
ये क्या कि जरा कुछ कहा बाओजी ने बस
भर रो पङीं।
बाओजी तो अक़्सर कह देने है
-"रानी जी के जब देखो तब नैना मुतासे"
छिः छिः ऐसे नहीं कहते ।
मिष्टी!!
क्यों रौनक?
""ये तो गाली है । तुम्हारे बाओजी ऐसे
क्यों डाँटते रहते है अम्माँ को?
हाँ! रौनक रोज का कांड है।
और अम्माँ रो पङतीं हैं? मिष्टी?
नहीं रौनक!!
वो रोती नहीं बस चुपचाप आँसू पोंछ कर
कहीं काम में लग जाती हैं ।
पागल है तू मिष्ठी!! तेरी माँ तेरे कितने
काम करती है और तुझे परवाह ही नहीं?
हाँ तो अम्माँ तो सबकी ही काम
करती हैं रौनक!! मेरी अम्माँ कुछ
ज्यादा करती है बस सिंपल!
मिष्ठी!! कैसी बेटी है तू?
सबकी अम्माँ रोती नहीं रहती चुप चुप।
तू आठवीं में आ गयीं और ये जानने
की कभी कोशिश तक
नहीं की कि अम्माँ रोती क्यों रहती हैं!!!!
रौनक की बातें दिमाग में ठक ठक
करतीं हैं । नवीं में पढ़ती है पर जैसे
सsssssssssब्ब्ब जानती है । कोई
भी सवाल पूछो ज़वाब हाज़िर ।
कई साल बीत गये अम्माँ कुछ
नहीं बतातीं । अब पहले
जितना नहीं रोतीं मगर जहाँ पहले रोज
रोती थी बाओजी रोज डाँटते थे अब
महीनों में एकाध बार जमकर
झगङा होता है दोनों में । अम्माँ ज़वाब
देने लगीं हैं शार्दूल भैया बङे हो गये हैं
बाओजी अब अम्माँ न पीट सकते हैं न
ही गालियाँ दे सकते हैं ।
पिछली दीवाली पर
अम्माँ को गाली देकर पीटने लगे
तो भैया ने हाथ पकङ लिये थे ।
बाओजी बङी देर तक छूटने को छटपटाते
रहे लेकिन भैया की गिरफ़्त में हिल
भी नहीं पाये जी भरके । फिर
क्या था लगे भैया को ही गाली बकने
कोसने । तब तमतमा कर अम्माँ ने भैया से
कहा छोङ दे शालू!!! खा लेने दो इन्हें
मुझको । इनके हाथों मरूँगी तो पाप कटेंगे
मुक्त हो जाऊँगी।
शार्दूस भैया ने दाँत पीस कर कह
दिया था ।
---"""ये लीजिये बेंत जितना चाहे मेरे
ऊपर गुस्सा निकाल लीजिये । मैं उफ
नहीं करूँगा । लेकिन अम्माँ पर एक
उंगली भी मारने के लिये या एक शब्द
भी गाली के लिये मैं बर्दाश्त
नहीं करूँगा । आप उनके पति हैं तो मैं
उनका बेटा हूँ।""
भैया के कंधे तक ही तो हैं बाओजी । हाथ
में बेंत लिये बाओजी के सामने भेंट
की मुद्रा में खङे भैया की लाल आँखें
छलछलाते आँसू काँपता बदन और
तपता सुर्ख चेहरा ।
बाओजी ने एक बार शार्दूल भैया को गौर
से देखा और चुपचाप बिना कुछ कहे
नीची निगाह थकी गरदन लिये
अपनी बैठक में चले गये ।
मैंने रौनक
को बताया तो लगी तालियाँ बजाने ""-
ग्रेट वाओ वंडरफुल"
तुम्हारे भैया को दिल से सेल्यूट ।
रौनक अब बी एड कर रही है और मैं
बी एस सी फायनल।
अब भी हम लंच साथ करते हैं और बहुत
सारी बातें भी
रौनक!!
एक बात पूँछू?
दो पूछो मेरी मिठाई!!
अगर बाओजी नहीं कमायेंगे तो माँ भैया मैं
और सुब्रत क्या खायेंगे?
ये कपङे फीस किताबें साईकिल सब
बाओजी ही तो लाते हैं । अम्माँ तो बस
पका देती हैं वह भी रोज
वही दलिया दाल पूरी परांठे
पोहा राजमा!!
मिठैया!!
तू सठैया हो गयी क्या!!
माँ का पक्ष तू केवल अच्छे कपङे पैसे चाट
चटोरी और सुख सुविधाओं के बंद हो जाने
के डर से नहीं लेती??
लानत्त है ।इससे तो तुम्हारे
भैया को सैकङों शाबाशी जो हमेशा से
माँ की सेवा भी करते हैं और
माँ को उनकी ही वजह से अब तेरे
बाउजी न मारपीट पाते हैं न गाली दे
पाते हैं ।तेरी माँ में जो हिम्मत आयी है
ज़वाब देने की वो तेरे भैया के सहारे से ।
बेटा हो तो ऐसा हो । तू बेटी न
होती तो तेरी अम्माँ कब की बेटे के
सहारे हर यातना से आज़ाद
हो गयीं होती ""
मैं? मैं उनकी मजबूरी हूँ? रौनक??
हाँ मिष्ठी!!
एक बेटी पैदा करने वाली माँ को अगर
सही जीवन साथी नहीं मिलता तो हर
तरह से यातना हो जाती है
उसकी जिंदगी।
रौनक़ की बातें मेरे दिल दिमाग़ पर
हथौङे सी बज रहीं थीं ।
शाम को बाओजी की थाली लेकर बैठक में
गयी तो बारूद से भरे बैठे थे ।
देखा मिष्ठी!!
वो कल का छोकरा पढ़ाई छोङकर कार
शो रूम पर काम करने लगा है ।
पहली कमाई दिखाकर माँ के हाथ पर
रखी । इतनी तो महीने भर की सिगरेट
पान तंबाकू शराब और जूते की पॉलिश में
फूँक देता हूँ मैं ।
ये दो कौङी की औरत!!!
मुझे आईना दिखाने चली है!!!
मुझे???? राय साहब दिव्येनंद्रनाथ को!!!
बाओजी!!!
वो अम्माँ है हमारी । आप क्यों हर बात
को इतना तूल देते हैं? जाने दीजिये ।
आखिर आपकी पत्नी है । विवाह किया है
आपने उनसे ।
ये औरत!!!
ये तो एक रांङ थी । बाल विधवा ।गौने
के पहले ही तालाब में डूब
गया था इसका पहला पति
।और वो इसका भूदानी भाई
कांग्रेसी नेता भूदानी बनकर सब जाग़ीरें
दान करता चला गया और बाप
क्रांतिकारी बनकर जेल पर जेल
काटता मारा गया ।
बची विधवा माँ और कुछ कुटुंबी सो हर
रोज जंगल जंगल भटकते रहे । भूखे प्यासे
बेहाल । सिरफिरे आजादी के दीवाने ।
अंग्रेजी और गुलाम यहीं छोङ गये ।
इसका वो समाजसुधारक भाई
इसकी शादी किसी ग़ैर जाति के बेवकूफ़
समाजसुधारक ब्राह्मण से करवाये दे
रहा था। तब
अपनी जाति की बेचारी क़िस्मत
की मारी अबला को सहारा देने की इसके
काका ताऊ की ग़ुहार पर मैंने इसका हाथ
पकङ लिया था। वरना इसको किसी गैर
जाति के घर की काक बिङारनी बनाके
डाल देता इसका भूदानी भाई। कुछ
भी नहीं बचाया स्साले कंगले कबाङी ने ।
सन्न
सन्न
सन्न
करके एक के बाद एक जैसे विष बुझे बाण
हों ।
तो बाऊजी मुझे ये सब क्यों बता रहे हैं?
क्या सिर्फ इसलिये कि माँ पर बाऊजी ने
अहसान किया?? महान् हैं बाऊजी तो एक
बाल विधवा का हाथ थाम लिया??
या ये बङप्पन दिखा रहे हैं कि अगर
रायसाहब उस बेचारी का हाथ न थामते
तो कोई ग़ैर जाति का बेवकूफ
बनिया ब्राह्मण कायस्थ गले मढ़
देता उस अभागी का भूदानी भाई???
या ये अफसोस और शर्मिन्दगी है
बाउजी को कि सर्वगुण संपन्न अम्माँ एक
बालविधवा है?
पता नहीं क्यों बाओजी ने
कही तो थी सब बात
अम्माँ को मेरी नज़र में गिराने और खुद
का अहसान महानता दिखाने को । मगर
पहली बार अम्माँ की पीङा और
बाओजी का ओछापन
भैया की महानता और खुद की क्रूरता मुझे
साफ साफ नज़र आ रही थी ।
बाऊजी अपने बच्चों को दौलत के दम पर
अम्माँ से काटते रहे थे । ये चाल मेरी समझ
में आ चुकी थी । लेकिन बाऊजी भूल गये
प्यादा भी वज़ीर की जगह आने पर वज़ीर
बन जाता है । मैंने एक सीधी चाल चल
दी जहाँ तक सब खाने रिक्त थे ।
बाऊजी!!!
आपने अम्माँ से शादी ही क्यों की? आप
इतने बङे रायबहादुर!!! एक बाल
विधवा से विवाह
की क्या मजबूरी रही ।
अब क्या बतायें मिष्ठी!!
बङी लंबी कहानी है ।
मेरी पहली पत्नी थी अनपढ़ और शरीर से
कमजोर । मेरे बङे भाई गाँव रहते थे ।
माँ बाप मर गये थे । भाभी जब हैजा में
मर गयीं तो एक बेटे के साथ हमने
पहली पत्नी को गाँव भेज दिया घर
किसानी रसोई छोटी बहिनों और भाई
की सेवा को
।भाई थे शराब ताङी के नशे में और पाप
कर बैठे । मैं क्रोध और परिवार
की इज्जत की बेबसी में घर पत्नी और
बच्चे सब छोङकर चला आया ।
यहाँ बदलाव की लहर चल रही थी । एक
दोस्त ने बताया एक सुंदर औरत का ।
इसके कजिन और माँ से बात हुयी तो लगे
तमाम देश समाज और क्रांति की बातें ।
घर तो मैं वापस जा नहीं सकता था ।
पुलिस से भाई को बचाने के बाद
पहली पत्नी को मृतक कह कर छोङ
आया था । तब सोचा बाल
विधवा बेचारी घर में पङी रहेगी ।
दो जून की रोटी चार कपङे एक छत
मिलेगी मेरी भी सेवा करेगी जीवन
आसान रहेगा।
धाँय
धाँय
धाँय
जैसे बारूद के धमाके हो रहे हों । ये
क्या कह रहे हैं बाऊजी?? क्या कोई
ऐसा क्रूर भी हो सकता है??
बलात्कारी नशेङी अन्यायी बङे भाई
को दंड देने की बजाय । पुत्र सहित एक
बेबस कमज़ोर अबला निरीह
स्त्री को उसी वहशी दरिन्दे के
रहमो करम पर छोङ आये जिसने उस
लाचार की आबरू लूटी हो?????
पाप किसका!!!!!
और सज़ा किसको!!!!
धङ धङ धङ धङ धङाम्।
बाऊजी की बनी बनायी सारी बहादुरी री मिसालें
तसवीरें सब गौरव की मीनारें खंडहर
हो गयीं ।
बाऊजी तो आपकी पहली तब
जिंदा थी जब माँ से शादी की???ये बात
माँ को बतायी थी?
नहीं बतायी थी ।उस वक्त
वो मरी ही समान थी ।
सो तुलसी गंगा कसम लेकर कह
दिया कि पत्नी बच्चे दोनों मर गये
लेकिन जब गाँव से बङे भैया ने
चिट्ठी लिखी मनाने को तब इसने पढ़
लिया और हंगामा मचा दिया ।
कुँयें में कूदने चल पङी थी शार्दूल को पेट में
लेकर एक अहीर ने बचाकर वापस
भेजा कि बदनामी तो बाल विधवा की।
बाओजी फिर आपकी पहली पत्नी के पास
आप कभी नहीं गये? वे कहाँ रहीं ।
कहाँ रहतीं? कुछ दिन माँ बाप के घर
रहीं फिर पेट में दूसरा बच्चा था सो उन
लोगों ने वापस वहीं गांव भेज दिया ।
भैया एक सङक दुर्घटना में मर गये । उधर
उनके माँ बाप मर गये । सो मुझे
जाना पङा खेत खलिहान
चचेरों को बटाई पर दिये और हर महीने
तब से पूरा खरचा भेजता हूँ ।
बाऊजी तभी हर साल छुट्टी में गाँव जाते
हैं चार महीने रह कर आते हैं । लेकिन उस
स्त्री को कैसा लगता होगा जिसका"घटभंजन
श्राद्ध"करके प्रतिज्ञा कर आये थे
हमेशा को छोङकर वापस न आने की ।
बाऊजी!!
आपकी पहली पत्नी का क्या कुसूर
था उनको क्यों छोङा ????
कुसूर??
अरे लाख मँहगा हो बरतन औरत
तो मिट्टी का ही भांडा है ।एक बार
जब विष्ठा घोल दी गयी हो तो । कोई
पीना तो दूर नहाने कपङे धोने
का भी ना सोचे ना बरते । मैं
घृणा क्यों न करता।
ये बाबूजी के विचार हैं उफ!
तो अब आपकी पहली पत्नी के दोनों बेटे
क्या करते हैं??
दो??
दो नहीं चार बेटे हैं । दो की नौकरी लग
गयी दो पढ़ रहे हैं ।पत्नी को मरे दस
साल हो गये ।
मतलब???
आपने उनको अपना लिया????
क्यों न अपनाता??
जब मैं एक बालविधवा का हाथ पकङ कर
निभा सकता था तो
वह तो फिर भी मेरी सतभाँवरी थी।©®सुधा राजे

कहानी -- झुमकी

May 9 ·
Sudha Raje
झुमकी
---------------
कहानी ।।
----------++-
मेरे लिये बस एक नाम
थी हजारों क्लाईंट्स में से एक । लेकिन
ज्यों ज्यों तारीखें लगतीं गयीं वह एक
अनोखा अनुभव हो गयी ।
औसत से कम कद की साँवली गठे बदन
की झुमकी की देहयष्टि इतनी संपन्
की कोई भी स्त्री ईर्ष्या कर उठे ।मुझे
भी हुयी ।कभी लगता सब उसे घूर रहे हैं
तो मैं उसे चैंबर से बाहर ले जाती चाय
पीने के बहाने बार कैंटीन के लेडीज केबिन
में ग्वालियर हाईकोर्ट तब पुराने महल में
ही चल रहा था और
पत्थरों की नक्क़ाशी का अद्भुत
नमूना वह महल एक बेहद ऋतुअनुकूलित नक़्शे
से बना था । सी जे कोर्ट चौथी मंज़िल
पर लगता था । और कैंटीन प्रथम तल पर
।झुमकी अपने पूर्व पति के ख़िलाफ़ एक
मुकदमा लङ
रही थी । अपने बच्चे पाने के लिये ।
उसके पति ने भी मुकदमा ठोक
दिया था ।विवाह के
प्रति चरित्रहीनता का आरोप । और
ग़ज़ब ये था कि ये मुकदमा मैं अपने कट्टर
आलोचक रिश्ते के एक भाई से लङ
रही थी जो झुमकी के पति की पैरवी कर
रहे थे । एक ऐसा इंसान जो ये
मानता था कि औरत को वकालत
नहीं रसोई सँभालनी चाहिये झुमकी
की शादी छह साल की उम्र में सत्तरह के
लल्लू काछी से
हो गयी । और गौने पर दस साल
की झुमरी बलात्कार
झेलती रही बीस साल के युवक का । एक के
बाद एक तीन बेटियाँ पैदा होने से
झुमरी की कदर ही खत्म
हो गयी । बीस की झुमरी तीन
बेटियों की माँ हो गयी । काछी लोग
सब्जी का धंधा करते हैं
सो झुमरी सारा दिन
मिरची टमाटर नींबू धनिया सेम तोऱई
पर निराई गुङाई रोपाई
पानी करती ।।शाम सवेरे बूढ़े ससुर
की गालियाँ खाती और रात को दारू
पीकर मंडी से
सब्जी बेचकर लौटे मरद की हवस में
रौंदी जाती ।
ये तकलीफे कम नहीं थी कि,
बङी बहिन मर गयी औऱ
झुमरी बङी बहिन के दो बेटे
जो अभी बहुत छोटे थे साथ ले
आयी क्योंकि जीजा शहर में ठेली लगाकर
सब्जी की फेरी करता कछवार
सँभालता औऱ माँ बाप पहले ही मर चुके थे

लल्लू काछी बाहर को दाँत निकले उलटे
तवे सा काला औऱ दैत्याकार शरीर
का आदमी था ।
शराब और जुआ के साथ ठीये
की दुकान होने से
बढ़िया आमदनी होती थी ।लेकिन जैसे
जैसे झुमरी मेहनत करती जवान और
गठीली होती जा रही थी लल्लू का बदन
आलस औऱ शराब ने
खोखला कर दिया ।
ऊपर से वह सस्ती बस्तियों में
भी जाता रहता तब जब झुमरी पेट से
होती या जचकी पर खटिया पर रहती ।
या मायके चली जाती झुमरी की मेहनत से
कछवार में हर मौसम के फल लगने लगे थे और
छोटी लङकियाँ टोकरी चबूतरे पर धरकर
दिनभर फल
सब्जी बेचती रहती ।
बकरियाँ अलग से पाल ली थीं और
बङी बेटी ने जब रसोई औऱ छोटे भाई
बहिन सँभाले । झुमरी भी सिर पर
टोकरी रख कर दिन में एक चक्कर पास
की पॉश कॉलोनियों तक लगाकर
काफी पैसे कमा लेती ।
जीजा पैसे देते तो बच ही जाते बेटे पढ़ने
जाते तो झुमरी ने
दोनों छोटी बेटियाँ भेजनी शुरू कर दी ।
जीजा हम उम्र
साँवला सलौना युवक
क्योंकि जीजी गोरी थी सो जीजी हो गयी थी ।
झुमरी साँवली को पसंद कौन
करता सो जो मिला शराबी बाप ने
मौङी ठिकाने लगा दी । फुरसत पायी
।जब बदन की जरूरत नही थी लल्लू
हड्डियाँ झिंझोङता रहा ।
जब झुमरी गदरायी । तब लल्लू
बूढ़ा हो चला था । कई साल से तो बस
कपङे खोलते
ही सो जाता ।
झुमरी गीली लकङी सी सुलगती रह
जाती । जीजा जब आते अहसान उतारने
को कुछ उपहार झुमकी के लिये भी लाते ।
स्वभाव से मधुर
भाषी जीजा मरी बीबी को याद करते
रोते तो कभी हँसते ।
एक दर्द का रिश्ता बन
गया दोनों में । पाँचों बच्चे जीजा के
साथ किलकते ।
जबकि लल्लू बेटियों को जब तब
पीटता कोसता गरियाता ।
एक दिन पिटते पिटते
झुमकी का धैर्य जवाब दे गया औऱ
मेहनतकश हाथों ने लल्लू को याद
दिला दिया कि वह सह
रही थी लेकिन दम नहीं रहा लल्लू में ।ये
चुनौती नागवार गुजरी और लल्लू ने
कुल्हाङी उठा ली । कि पीछे से जीजा ने
आकर कलाई थाम ली। लल्लू पूरी ताक़त से
जूझा लेकिन हाथ
नहीं छुङा पाया ।
औऱ जब हर तरह हार गया तब
गालियाँ बकने लगा और कह
दिया वो जो झुमरी के सीने में जा धँसा ।
कि वह
तो जीजा की रखैल है ।
बङी बेटी चीख पङी तब औऱ
सारा विश्लेषण जो झुमरी ना कह
सकी कह दिया । बेटी को फेंक कर
लोटा मार दिया।
उस शाम सब रोते रहे ।
जीजा को पहली बार
पता चला कि झुमकी झूठ
कहती रही।
बेटों को लेकर जब जीजा चले तो बच्चों ने
रो रो कर बुरा हाल कर लिया कुछ दिन
की मदद
को सोचकर झुमकी बेटियाँ लेकर जीजा के
घऱ आ गयी।
लल्लू ने
मुकदमा चोरबदचलनी अपहरण
और
चरित्रहीनता का लगा दिया ।। अब
तो झुमरी गुस्सा ही हो गयी ।। बस जब
लल्लू घर
नहीं था सारी चीज बसत उठाकर दहेज के
बाशन कोठरी में ताला लगाकर धरके
चली आयी । पुलिस आयी और
जीजा साली हवालात में । जीजा के
दोस्तों ने वकील किया मेरे सीनियर
को ।
और ज़मानत पर छूटकर झुमकी जिद पर अङ
गयी कि अब
नहीं जायेगी ।कभी उस खब्बीस
की गुलामी करने ।
मामला हमें सौंपा गया और
सारी कहानी धीरे धीरे सामने
आती गयी ।
मेरी सहानुभूति झुमकी के साथ
होनी स्वाभाविक थी । लेकिन जिस तरह
औरत
को निशाना बनाकर घिनौने इल्ज़ाम
विरोधी वकील ने लगाये और झुमकी के
मामले में समाज को नज़ीर पेश करने के
लिये जीजा को जेल और झुमरी पर लल्लू
का कब्ज़ा करने गुहार न्याय के नाम पर
लगायी ।
मुझे निजी तौर पर
प्रतिष्ठा का प्रश्न लगा । घर पर
हमारी कजिन से
गर्मा गर्मी होती रहती नैतिकत
सवालों पर ।
टोटम जनजाति और प्राचीन रस्मों के
आधार पर जब मैंने मुकदमा जीत लिया तब
झुमकी ने माला डालकर जीजा से
शादी कर ली ।
झुमकी की माँ बङी रोई । मैंने पूछा अब
क्यों रोती हो । तो ठेठ चंबली में
बोली """लै मोई मौङी खौँ चार
रोटी की भूँक हती बितै दोई
नईय़ाँ तौ कित्तौ रोउत
ह्वेगो बाको जीउ .....
मैं अवाक्
सारे सिद्धांत धङधङाकर गिर पङे थे।
सत्य कथा ।
©®¶सुधा राज

अकविता :बजाओ तालियाँ बजाओ

तुम तालियाँ बजाते रहोगे और गाँव शहर
की तरफ भागते भागते गिर पङेगे
झुग्गियों के समंदर में
तुम लाईन में लगकर राशन खरीदते रहोगे
और नयी पीढ़ी सीख जायेगी गिरते हुओं
को कुचल कर आगे बढ़ जाना ।
तुम हाथ और सीटी का संतुलन बनाते रह
जाओगे
और काले सिर गेंहुआ सांवले गोरे चेहरे सीख
जायेंगे हर लाल बत्ती को अनदेखा करके
रफ्तार से भाग जाना ।
तुम गला साफ करके माईक टेस्ट करते रह
जाओगे और
ज़माने भर का शोर तुम्हारे दिमाग़
की दसवीं मंज़िल पर कत्थक सिखाते
सिखाते ब्रेक करने लगेगा ।
रह जाओगे तुम जल जंगल जमीन करते और
सब नगर निगल जायेंगे गाँव आकर ।
राख ही राख बचेगी
हर तरफ
तब तुम सिर्फ ताली बजाना क्योंकि तुम
और कर भी क्या सकते हो ।
ये पीपल तब खा चुका होगा तुम्हारे
पैरों के नीचे खङा राजपथ और
ताली बजा रहा होगा नगर का कंक्रीट
डामर और सुलग कर जल
चुकी होंगी तुम्हारी हथेलियाँ तब तुम
सिवा ताली बजाने के किसी लायक
नहीं रहोगे बजाओ तालियाँ बजाओ
©®सुधा राज

Monday, 3 February 2014

अकविता:मुक्ति एक सोच ही तो है

एक सोच ही तो है जो ग़ुलाम है ।
वरना तो कभी न हवा क़ैद हुयी है न खुशबू और दूर चिनार चीङ फर और पाईन
देवदार के नीचे कभी न बर्फ कैद हुयी है न आग ।
एक सोच ही तो है जो रखती है दायरों पर दायरों के दायरे बनाकर दीवारों पर दीवारें
वरना दूर कच्चे जामुन आम इमली कैंथ बेल जंगल जलेबी झरबेरी मकोर करील और
चकोतरे के झाङ अब तक वैसे ही मह मह महक रहे हैं नहीं बची तो उनके नीचे अब
नन्हीं नन्ही हथेलियाँ और झोलियाँ ।
एक सोच ही तो होती है बाँध और बंधन वरना
चचाई सनकुआ झिरना और सहस्त्रधारा धुँआधार अब भी चिघ्घाङ रहे है चाँदी की
बूँदों के साथ और काँप जाती है अब भी हलकी सरदी में भी नजदीक खङी कोयलें
तोते श्यामा बुलबुल और कठफोङवे अब भी ठक ठक कुरेदते रहते है काठ बया
बुनती है उलटे दरवाज़ों के नीङ और हुदहुद के सिर अब भी तीखी कलगियाँ है
जलमुरगी तैरकर मछलियाँ खोजती है ।
एक सोच ही तो नाता है
वरना
तो आज भी खारी जमुना का जल मीठी मंदाकिनी से अलग दिखता है और चंबल का
समझौता हर ग्रीष्म पर टूट जाता है अरावली से विन्ध्याञ्चल के भार का
प्रतिवाद हिमालय की वादियों में करते कच्चे पहाङ खिसक जाते है वारणावत
टूट जाता है डूब जाती है टिहरी और संगम में सरस्वती ना होते हुये भी मान
ली जाती है जबकि वह कभी वहाँ थी ही नहीं ।
गोदावरी से नहीं सँभलता बंगाल का शोक और गंडकी का हर पत्थर सालिगराम हो
कर गोमती के चक्रप्रस्तर खोज कर पूजता नर्मदा के शंकर कंकर तलाशता
दक्षिणावर्ती शंख जल पीता मन
दरिद्र ही रह जाता सारे कनकधारा यंत्रों के बीच ।
मुक्ति एक सोच ही तो है वरना मैदानों पहाङों नदी झरनों से लौट लौट आती
प्रतिध्वनि केवल मेरी न होती ।
पदार्थ से परे जो है वही मैं हूँ
अस्तित्व एक सोच ही तो है
वरना तो सब जलेगा औऱ दफन होकर गलेगा सङकर खत्म होने को
अमृत एक सोच ही तो है वरना तीर्थस्नान से कोई पवित्र नहीं हो जाता ।
©®सुधा राजे

अकविता "सत्य की प्रतिज्ञा ।"

एक प्रतिज्ञा की थी एक दिन
कि सत्य के साथ ही चलना है और
सत्य की ही जय कहनी है । किंतु
इतना आसान नहीं था सत्य के साथ
ज़ी पाना पहले ही पङाव पर अनेक चेहरे
बेनक़ाब हो गये जो मेरे अपने थे जिनपर
अथाह विश्वास था और मन
थरथरा गया कि अपनों को त्यागूँ
या सत्य को ऐसा सत्य मेरे किस काम
का? अपने सौगंध उठाकर
अपनों की लोकप्रिय मिथ्या बोलने लगे
और मुझे अकेले ही तय
करना पङा आगे का मार्ग ।
सोचा अब सत्य का साथ छोङने से
क्या लाभ जब सब साथ छोङ गये ।
किंतु तब वे लोग साथ हो लिये जो उन
अपनों के पराभव पर प्रसन्न थे और
मुझे गर्व होने लगा सत्यपथ
यात्री होने पर सत्य की जय जय कार
गूँजी कई बार और शांत हो गयी । यह
षडयंत्र भी उधङ गया और ज्ञात
हो गया कि लोग मेरे पीछे इसीलिये खङे
थे कि अपनों को खोकर अपनी विरासत
जङें और अनुवांशिक पहचान खोकर
मैंने अर्जित की थी एक पहचान क्रूर
सत्यपथ की मूर्ख यात्री और उपहास
के व्यवहारिक उपनामों के बाद भी एक
अटूट सम्मान । कोई तत्काल मान
लेता अगर वही बात मेरे
द्वारा कही गयी ये जान लेता ।
हुज़ूम एकाएक ग़ायब हो गया जब
घोषणा की मैंने सत्य के लिये एक एक
की परीक्षा लिटमस पत्र पर लेने की ।
अम्ल ऐर क्षार घोषित होने से डर गये
लोग और ।
अगले कई पङाव मुझे फिर अकेले
ही तय करने पङे ।
लोग और अपने सब जानते थे मुझे
बहुत गहरेमन में मानते भी थे कि मृत्यु
की तरह सुंदर और जीवन की तरह
वीभत्स सत्य ही मेरे सृजन हैं किंतु
कोई कभी भी किसी मंच से
कभी नहीं ले सका मेरा नाम ।
लोग एकांत में आते अपनी जरूरत के
मुताबिक मेरे सृजन में से
प्रेरणा की टहनियाँ काटकर ले जाते
और लगा लेते अपने अपने ग़ुलदस्ते में
। सत्य की क़लम पर उगे मिथ्या के
फूल भी सुंदर होते कि सत्य की खुशबू
आती ।
वह सत्य नहीं था बस सत्य के कलम
पर लगाया झूठ का कलेवर था ।
लोग उसे ही सत्य समझते रहे औऱ
भीङ झूमती रही कालबेलिया के नृत्य
पर ।
लोग धन वर्षा कर सत्य की जय कहते
रहे किंतु जिसे वे सत्य कह रहे थे वह
सत्य नहीं था वह केवल कपट था ।
कपट छल और कतरनों से जोङकर
बनाया षडयंत्र था क्योंकि सुंदर और
लाभकारी मिथ्या होते हुये भी
संस्कारवश लोग कभी नहीं कहते रहे
कि ""झूठ की जय""
सत्य अकेला निर्मम क्रूर और
अकिंचन ही घोर विजन में बेतरतीब
बढ़ता फलता फूलता जहाँ थे विषदंतक
के मगन महारास जिनकी धुन पर नाचते
रहे कालबेलिये और लोग
कभी नहीं जानपाये कि सत्य फणिक
का नृत्य होता कैसा है ।
सत्य को केवल मृत्यु और सृजन ने
पहचाना और दोनों को एकांतवास
मिला ।
सृजन और मृत्यु के बाद उत्सव मनाते
लोग
सत्य की जय कहते झूठ की धुनों पर
नाचते रहे ।
मुझे पता चल गया था कि मेरे सृजन
कभी झूठ के मंच पर स्वीकार नहीं किये
जायेंगे और ना ही कभी स्वीकार करेगे
कलम काट कर ले जाने वाले
कालबेलिये कि उनके गुलदस्तों में
सत्य के चुराये सृजन की उर्वरा है ।
क्योंकि झूठ के पांव और जङ नींव और
आधार नहीं होते ।
झूठ जब भी नाचता सत्य की जमीन पर
जङों पर आधार पर ही नाचता ।
अब मेरे अपने ही चेहरे पर थीं खराशें ।
मेरे अपने ही पाँवों थे छाले और मुझे
कभी स्वीकार नहीं कर
पाना था अपनी ही हाथों मार
दिया गया अपने में उगता झूठ. औऱ य़े
हत्या बोध कभी गर्व नहीं करने दे
सका कि किंचिंत आकार ही सही झूठ
का एक मुकुलन मुझमें से
भी हुआ ..मृत्यु की तरह सुंदर और
जीवन की तरह वीभत्स वह
आत्मस्वीकृति कभी नहीं बन
सकी सृजन और मेरी छह उंगलियों में से
एक उंगली काटनी पङी मुझे झूठ
की उंगली जिसे काटने पर सबसे अधिक
पीङा सहनी पङी ।
जितनी पीङा कभी पंख और पांव काटने
पर भी नहीं हुयी तब क्योंकि सत्य
मेरा सर्वांग था और जो काटा वह
सत्य ही था सत्य की वेदना ग्राह्य
मोहक और क्रूर सह्य रही सदा।
स्वयं पर मुकुलित स्व स्वरूप सुंदर
मिथ्या को काटने की यातना के बाद मैं
नितांत एकांत में हूँ अब कोई नहीं ।
और अब सत्य मुखर नहीं समाधिस्थ
है कोयले की खान से हीरे सदियों बाद
निकाले जाते है ज्वालामुखी के तापमान
पर पिघल कर वज्र होते रहने
की पीङा अब जिस सृजन की ओर है
उसकी कोई काट कलम और खुशबू
नहीं होती केवल कौंध होती है चाहे
कभी सामने आये या दबा रहे अतल के
काले संसार में सात रंग की धूप से
मिलने की चाहत में ।
©®सुधा राज

Sunday, 2 February 2014

अकविता :मुख्यअतिथि

Sudha Raje
मेरे सब कपङे पुराने थे और सब गहने सस्ते
मेरे पास समय अधिक था और मक़सद कुछ
भी नहीं ।
कहीं जलसे और जश्न में जाने लायक न
साधन थे न वाहन ना ही नज़दीकी ।
कुछ जन्मदिन कुछ शादियों कुछ गृहप्रवेश
कुछ दशटोन के निमंत्रण पत्र रखे थे
सामने ।
एक एक करके सबसे अपने को तौला और देने
के लिये उपहार भी आँका पिछले व्यवहार
भी कसौटी पर कसे फिर कुछ लिफाफों में
पैसे रखे और डाकखाने से वापस आकर पैदल
ही बच्चों सहित करीब के सबसे ग़रीब
रिश्तेदाऱ के घर शादी में जा पहुचे हम ।
उन सबको यक़ीन ही नहीं आ
रहा था कि हम सब वहाँ पैदल चलकर आये
हैं!!!!!
उस दिन और उस रात हमारा परिवार
ही मुख्य अतिथि रहा खुशियाँ हमारे
आसपास छलक रहीं थीं और कोई
पानी मिठाई नाश्ते लेकर दौङ
रहा था तो कोई मेरे बच्चों को हँसाने
खिलाने में मगन था ।
बरसों बाद नानी माँ के सिखाये गीत
बरबस कंठ से फूट पङे और उंगलियों ने
ढोलक से पहचान
बढ़ा ही ली बरसों बाद सुना कि मैं
कितना अच्छा गाती हूँ और छोटू
का नाच देखकर सब नजर न्यौछावरें
डालकर नाच रहे थे ।
हमारी छोटी सी सी भेंट
बङा सा तोहफ़ा होकर सबके सामने सबसे
ऊपर रखी दुलहन के संदूक में और आते समय
सब रो रहे थे । दुबारा कब आओगे
की मनुहार दूर तक पीछा कर
रही थी घर आकर खोली पिटारी में थे
चंद कपङे मिठाईयाँ और ढेर सारी यादें

एक बार माँ ने कहा था कि बङों के घर
चाहे जश्न में न जाओ उनको कमी न
होगी किंतु अपने से छोटे के घर जरूर
जाना उनका ही नहीं आपका भी कई
गुना बढ़ जायेगा ।
मुन्ना पूछ रहा है अब हम कब चलेगे गुल्लू
के घर?ये खुशी न किसी थियेटर में थी न
मेले में ?धन्यवाद माँ!!
©®सुधा राज

Saturday, 1 February 2014

नज़्म

Sudha Raje
3 minutes ago ·
खुद से मिलती हूँ तो दुनियाँ से बिछङ
जाती हूँ ।
रोज इक गाँव बसाती हूँ
उजङ जाती हूँ ।
Roz ik gaOn
basati hoon
bchhur
jati hun