Thursday, 31 October 2013

अपने ज़खम दुखाने आते है

Sudha Raje
सूख रहे ज़ख़्मों पर फिर
फिर नमक
लगाने आते हैं।

भूल चुके सपनों में अपने आग
जगाने
आते हैं।

किसी बहाने
काटी लेकिन कट
तो गयी ये कब देखा।

बची हुयी दर्दों की फसलें
रोज़
उगाने आते हैं ।

उफ् तक कभी न की जिन
होठों से
पी गये हालाहल सब ।

सुधा उन्हीं पर
गंगा जमुना सिंध
तराने आते हैं।

आज़ न बह पाये तो फिर ये
आँसू आग
के दरिया में ।

अहबाबों अलविदा ज़माने
छेङ
बहाने आते हैं ।

एक लम्स भर
जहाँ रौशनी ना थी वहीं
ग़ुज़र कर ली।

हाँ हमको जलना आता है
अज़्म
बचाने आते हैं।

कौन तिरा अहसान
उठाता खुशी तेरे
सौ सौ नखरे ।

हम दीवाने रिंद दर्द के
पी पैमाने।
आते हैं ।

आबादी से बहुत दूर थे
फिर
भी खबर लगा ही ली ।

कोंच कोंच कर
दुखा दिया फिर।
दवा दिखाने आते हैं।

वीरानों की ओर ले
चला मुझे
नाखुदा भँवर भँवर।

जिनको दी पतवार
वही तो नाव
डुबाने आते हैं।

अंजानों ने मरहम देकर नाम

पूछा मगर हमें ।

जानबूझ कर डंक चुभोने सब
पहचाने
आते हैं ।

मासूमी ही था कुसूर बस
औऱ
वफ़ा की गुनह किया ।

हमको हमसे
मिला दिया ग़म यूँ
समझाने आते हैं।

वर्षों हो गये मरे हुये ।
शबरात मनायी तलक
नहीं ।

बाद मर्ग़ के सुधा ग़ैर
भी सोग़ उठाने आते
हैं
©सुधा राजे ।
©¶®©®Sudha Raje
Apr 27

सपना देखें

Sudha Raje
एक शाम कोई नहीं था वहाँ ।
जहाँ हम थे ।
सिर्फ जंगल और हवा ।रेत और पानी ।
पत्थर और मिट्टी ।
पंछी और बनैले पशु ।
मुझे डर नहीं लगा ।
तुम जो थे साथ ।
मैंने कोयल से होङ लगाकर गाया ।
मृगी से होङ लगाकर दौङी ।मयूर से
प्रतियोगिता कर नृत्य किया ।
मैं झरने से जी तोङ खिलखिलायी ।
सारा ब्रह्मांड मेरे थिरकते पैरों के साथ
नाच रहा था ।
मैं देख रही थी सिर्फ तुम्हें ।सिर्फ तुम्हें
।तुमने देखा मुझमें चाँद सूरज तारे
तितली पंछी दरख़्त जंगल नदी और झरने ।
तुम डर गये ।तुम्हें लगा ये प्रकृति तुमसे
मुझे छीन लेगी ।
तुमने चाहा मुझे छिपाना ।
बया हो गयी मैं कठफोङवे की तरह रात
दिन तुम्हारे लिये का सृजन करती रही ।
तुमने कब बताया था कि ये तुम्हारे
नहीं सिर्फ मेरे लिये है ।
तय तो हुआ था हम दोनों का साथ ।
जब मैं तुम्हारे लिये क़ुदरत से होङ लेकर
इंसान रच रही थी तुम चुपके से मेरे रंग
आवाज अक्षर स्वर ध्वनि दृश्य स्पर्श गंध
रूप को छोङ आये बाहर ।
अब
तुम्हें भय नहीं था ।
नृता ताल लास्य यति तत्व
व्यष्टि टंकार रंग गांभीर्य ।
सब खो गये ।
तुम निश्चिंत हो गये ।
मैं जब तुम्हारा संसार रच कर
उठी तो देहली के ठीक नीचे खाई थी और
खिङकियों पर परदे ।
लेकिन तुम उदास क्यों थे ।मेरे पंखो पर
आते जाते ।
तुम सिर्फ बाघ खोजते मारते रहे ।
क्योंकि जंगल में न मोर थे न हरिण न
पंछी न झरने न नदी ।
चाँद टूट गया सूरज को ग्रहण लग
गया तारे धूँध में खो गये ।
पर तुम भूल गये ।
स्त्री थी मैं ।बचा के
रखती रहती रहती थी हमेशा एक बीज
हर पौधे का ।
मैने छत पर गमलों में जंगल बो दिया ।
तुम्हें आश्चर्य क्यों हो रहा हैं ।
आओ नृत्य करे ।
आज बहुत से फूल आये हैं पारिजात पर ।
©Sudha Raje
May 6

फिर मुँह दिखाई सी

Sudha Raje
वो सूखी डाल पे
नन्ही हरी पत्ती लजायी
सी

जो देखा आपने हँसकर,
लगी फिर
मुँह दिखायी सी।

लगा फिर
आईना मुझको बुलाने अपने
साये में,।

सुनी जब आपके होठों ग़ज़ल
मेरी बनायी सी ।

लगी वो फिर शक़ीला इक़
गुलाबी फूल को तकने ।

शहाना शोख़ चश्मी से
झरा जैसे बधाई सी।

बजे हर तार दिल का आपकी आवाज़ सुनकर
यूँ ।।

नदी की धुन समंदर के हो सीने में समाई
सी।

न भूला दिल सरो-अंदाम
ज़लवा आपका पहला ।

ख़ुमारी फिर वही चेहरे पै
सेहरे के सगाई सी ।

हमारी उम्र फ़ानी ये दिलो ज़ां बस निशानी है ।

हमारी रूह में ख़ुशबू मुहब्बत की बनायी सी ।

सरकती रात की चादर वो ढलते लाज के घूँघट।

हज़ीं वो ज़ां सितानी ज़ां पे बनती याद आई सी।

असीरी उम्र भर की है
सुधा किश्वर क़फस नफ़सी।

क़यामत हो कि ज़न्नत आपके पहलू
समाई सी ।
©Sudha Raje
©®©SUDHA Raje
Dta'Bjnr
May 6

सुधा राजे
एड

फतेहनगर,
शेरकोट
बिजनौर
उप्र
246747
मो7669489600

लगी फिर मुँह दिखाई सी

Sudha Raje
वो सूखी डाल पे
नन्ही हरी पत्ती लजायी
सी

जो देखा आपने हँसकर,
लगी फिर
मुँह दिखायी सी।
लगा फिर
आईना मुझको बुलाने अपने
साये में,।
सुनी जब आपके होठों ग़ज़ल
मेरी बनायी सी ।
लगी वो फिर शक़ीला इक़
गुलाबी फूल को तकने ।
शहाना शोख़ चश्मी से
झरा जैसे बधाई सी।
बजे हर तार दिल का आपकी आवाज़ सुनकर
यूँ ।।
नदी की धुन समंदर के हो सीने में समाई
सी
न भूला दिल सरो-अंदाम
ज़लवा आपका पहला ।
ख़ुमारी फिर वही चेहरे पै
सेहरे के सगाई सी ।
असीरी उम्र भर की है
सुधा किश्वर क़फस नफ़सी।
क़यामत हो कि ज़न्नत आपके पहलू
समाई सी ।
©Sudha Raje
©®©SUDHA Raje
Dta'Bjnr
May 6

मेंढकी की नाल और घोड़े का तालाब

Sudha Raje
एक था हय और बहुत ही हृष्ट पुष्ट अश्व
होने से उसे मालिक ने नीलाम कर
दिया क्योंकि वह सरपट तेज
भागता था और देखने में
बङी ही ऊँची प्रजाति का लगता था ।
नये मालिक ने नाक में नकेल पहनायी और
पैरों में नाल ठुकवायी । बधियाकरण
कराया और मुँह पर
मुसीका बाँधा आँखों पर ब्लिंकर चढ़ाये
और पीठ पर जीन कस दी जीन पर झूल
डाली जबङे में लगाम फँसायी और रेस में
जॉकी उस पर बैठकर दौङा । दर्शकों ने
दाँव लगाये और लाखों का कारोबार
होने
लगा । "हय"को घमंड हो गया । कि वह
तो बहुत ही महान धावक है वह
प्राणों की बाजी लगाकर दौङता और
जीतता मालिक । बदले में मिलते चने और
हरी घास और सईस करता मालिश । एक
दिन जब वह अति घमंड में चूर
था तो इतनी तेज दौङा कि एक नये
नौजवान घोङे से हार गया । मालिक के
साथ लाखों लोगों की बाजी डूब गयी और
मालिक ने गुस्से में उसे एक ताँगे वाले
को बेच दिया । ताँगे वाले ने दस दस
सवारी की फेरी करनी शुऱू कर दी और
बदले में मुँह पर तोबङा टाँग देता जिस में
होती चने की भूसी धान का चोकर । हय
को बङा गुस्सा आता वह
नहीं खाना चाहता मगर
खाना पङता क्योंकि चाबुक पङते अगर
दिन भर पंद्रह बीस फेरी नहीं होती ।
हय बूढ़ा होने लगा और कमजोर भी एक
दिन मालिक ने परेशान होकर एक
कुम्हार को बेच दिया और नया घोङा ले
आया कुम्हार सुबह चार बजे दोनों तरफ
सलीते की थैली पीठ पर टाँग देता और
मिट्टी की ढाँगों से मिट्टी भर कर
लाता । जितनी देर कुम्हार
मिट्टी खोदता हय को एक तालाब के
किनारे छोङ देता वह
वही कुचली रौंदी गायों की चरी हुयी घ
चरता क्योंकि चारागाह घोङों के लिये
नहीं गायों के लिये थे सो ग्वाले जब देखते
डंडा मारकर भगा देते ।हय तेज भाग
नहीं सकता था । क्योंकि दो टाँगों में
रस्सी बाँध दी थी कुम्हार ने सो एक
दिन डंडे से चोट लगी औऱ वही पर सलीते
की काठी रगङने से घाव
हो गया जो दर्द करता । रात
को कुम्हार गधों के बगल में बाँध देता ।
जो दुलत्ती मारते रहते । एक दिन
तालाब के मेढकों को देखकर
घोङा ललचाया काश वह भी आज़ादी से
छलांग लगा पाता । मेंढक की तरह तैर
पाता कूद पाता परिवार कुनबे और पसंद
के भोजन के साथ रह पाता । मेढक से
बोला भाई तुम मुझे छलांग
लगाना सिखाओ. मेंढक बोला देख दोस्त
तेरे बस की बात नहीं ये सङक नहीं नगर
की गाँव का जंगल औऱ तालाब है कीचङ
तली में है । तेरे पैर में रस्सी नाक में नकेल
मुँह पर मुसीका पीठ पर काठी और खुर में
नाल ठुकी है । नहीं माना हय बोला मुझे
दिखाओ में सीखूगा मैंने बङी बङी रेस
जीती । मेंढक की छलाँग देख कर मन में
गाँठ बाँध ली । कुछ दिन बाद रेस वाले
मालिक के बेटे की शादी थी और कुम्हार
हय को ले गया सजाकर
दूल्हा बिठाया और बारात चल
पङी रास्ते में स्विमिंग पूल देख हय
को मेढक की याद आयी और उसने छलाँग
लगा दी दूल्हा पूल में गिर पङा । दूल्हे के
बाप ने घोङे को गोली मार दी । लाश
जंगल वाले तालाब के पास फिंकवा दी ।
मेंढक की आँख में आँसू भर आये बोला ""मेंढक
की नाल
वाली कहानी तो झूठी थी दोस्त लेकिन
घोङे की शान वाली गुलामी से जंगल के
पोखर वाली मेंढकीय
आजादी ज्यादा अच्छी है । कौये ने चोंच
मारी कहा सही मेंढक तालाब में छपाक से
कूद गया कहकर हर किसी के बस में
नहीं जंगलनिवास ।
©®¶©®¶copy right
Sudha Raje
Wednesday at 9:40pm
जून

दिल अंगारे और भी है

Sudha Raje
Sudha Raje
आहिस्ता आहिस्ता हौले हौले पी जा गम
सारे ।
दर्द के मारी दुनियाँ है तुम हम से हारे
और भी हैं ।
सोज़े दरू पे सुलग रहे अहसास धुयेँ में बहने दे

सेराबी आतश आईना दिल अंगारे और भी हैं

तू ही तो इक नहीं आबला पा पुर ख़ार रहे
मंज़िल ।
बे पर ताईर हैं बुलंद परवाज़ के न्यारे और
भी है ।
चाहा था हो गयी सिवा उसके ये ज़ीस्त
है ऐसी शै ।
आग लगी इस पार वहाँ खाई है किनारे
और भी हैं ।
सुधा "ख़यालों की बस्ती में ग़ोरे मुहब्बत
पर पै जलते ।
ता हयात दीवाने पागल इश्क़ के मारे और
भी हैं
©सुधा राजे ।
Today at
1:01am ·
May 23

दुनियाँ मिटाने में लगे हैं

Sudha Raje
हम टिटहरी से समंदर को सुखाने में लगे हैं

अहले-दुनियाँ दम परों को आज़माने में लगे
हैं।

यूँ तो वाक़िफ है मेरी आदत से
तेरा वो ख़ुदा ।
सात दिन उसको बनाने पल मिटाने में
लगे है ।

नाम सुनकर नाक भौँ मुँह सब मरोङे कल
तलक
हम नशे हैं वो अब हमको मनाने में लगे हैं
।।
पाँव पै सर रखके जिनसे दी दुहाई प्यार
की ।
वो सबक सीखा सुधा रिश्ते जलाने में
लगे है।
दोस्तो मत भूल जाना ठोकरें देना इसे ।
ये ज़माना प्रेत है क्यों सिर चढाने में लगे
हैं।
मानते हैं दर्द हद से बढ़ चुका है आँख नम ।
देख तो ले दम कि हम हँसने हँसाने में लगे हैं

©सुधा राजे
dtabjnr
May 24

Wednesday, 30 October 2013

सुधा कहानी लहू भरी लिखती हूँ जो अ'श'आरो

Sudha Raje
Sudha Raje
बेशक मेरा नाम नहीं पहचान
नहीं अखबारों में ।
लेकिन जब जब जो देखेगा
कहे पली अंगारों में ।
मँझधारों का रूख मैंने भी मोङा बिन
पतवार लिये ।
गाज़ा नहीं लहू है दिल का लबो दहन
रूख़सारों में।
देख आईने सहम न
जाना इतनी तीखी तब्दीली ।
बुनियादों की ईंटेँ लेकर फिरते हम
बंजारों में।
कलम चलाना भी कुदाल भी आग
जलाना बंदूकें
छाती से बच्चे बाँधे है जूझे भी तलवारों में।
हम अपने वीरान खंडहर मन वन रोज़ जिये ऐसे ।
जैसे संदल शजर महकते साँपों के संग ख़ारों में
एक न इक दिन कोई तो आकर
पुर्जे दिल के पढ़ लेगा ।
सुधा""कहानी लहू भरी लिखती हूँ मैं
अशआरों में ।।।
©सुधा राज
May 24

सुबूत और स्त्री

Sudha Raje
सुबूतों की आवश्यकता मुझे कभी नहीं थी ।
कभी नहीं थी मुझे शिकायतों की ज़रूरत।

मुझे चाहिये थे हिमायती ।न कभी खोजे
प्रसंशक संरक्षक और अनुयायी।
क्योंकि ।
मैं स्त्री हूँ ।
संपूर्ण स्त्री ।
जिसे हमेशा गाँव जन्मभूमि कुनबा और
परिवेश त्याग कर जाना होता है
नितांत अपरिचित के साथ ।
जहाँ न कोई पुरानी पहचान होती है न
कोई प्रमाण ।
सब फिर से बनाने होते हैं नये नवीन और
पृथक।
सीखना ही नहीं सिद्ध
भी करना होता है।
कोई
नहीं आता बचाने ।
न शब्दों के प्रहार से

पदार्थ के वार से
नितांत
एकाकी ।
कोई प्रमाण साक्ष्य
नहीं होता वहाँ उसके साथ घट रहे दुख
का न ही टूट रहे मन का न बिखर रहे
साहस का न ही विलीन हो रहे अस्तित्व
का ।
अज़नबी शहर गली घर लोग
हवा पानी पदार्थ और विचार।
कोई पहचान नहीं रहती उसकी ।
रह जाती है बस उसपर
थोपी गयी रिवायतें उम्मीदें और फर्ज़ ।
अधिकारों की सूची तो कब की लाल जोङे
की तरह तह करके रख दी जाती हैं
लपेटकर । कभी कभी देखकर मन भिगो लेने
के वास्ते ।
कब कह पाती है वह सहेली से भाभी से
माँ से ।
नीले कत्थई दागों की बातें ।
रक्त के छीटे।
फफोले
और
कब समझ पाते हैं पिता भाई मित्र सुर्ख
होठों कजरारी आँखों पर
दमकती हँसी का रात के अँधेरों में धुल
जाना ।
कोई ग़वाह कब होता है दीवार पर
टकराते सिर का । कब अनुकरण चाहती है
वह अपने तिल तिल मरण का । कोई
हिमायती कब ला पाती है वह अपने माथे
पर लगे निपूती होने के धब्बे का । कब
साबित हो सका है दर्द मन से तन के एक
एक पोर तक बिछी कीलें
कहाँ दिखा पाती है । प्रेम की फसलों के
सपनों का घूँघट डाले वह हर
चलती रहती है चटकते रेगिस्तान में
ओढ़कर
धानी चुनरी ओंठ पर नम बूँदे आँख मूँदकर
पीती कभी माथे से बहता खून
कभी आँखों से बहते आँसू।
इस बोध में भी हर बार भेजना होता है
सुसमाचार । जन्मभूमि के बिछुङे
प्रदेशों को ताकि वे हरे रह सकें आँसुओं के
बादलों से ।
sudha Raje
©सुधा राजे
Apr 23

मुझे जाना पङेगा

तुम विरह का शोक मत
करना क्षमा करना मुझे ।
विश्व की है टेर आकुल गीत ये
गाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
रूप रस लावण्य यौवन देह कुंतल मधु अधर

सुप्त श्लथ सुत संग श्यामल सौम्य लोचन
स्वप्न भर ।
कंचुकी पट मन सरकता क्षीण
ओढ़ाना पङेगा ।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
हूँ व्यथित संकल्प कातर देह प्रण
अभ्यर्थना।
तव चरण नत माथ भावी वेदना तव
यातना ।
यातना ।
देवि!!!! हे हृदयेश्वरी ।
पिय मोह झुठलाना पङेगा
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
आह !!! जाता हूँ पलटता टूटता मन भग्न
खंडित ।
शोक वारिद् तप्त पय बिनु मीन भव हित
आत्मदंडित ।
वक्ष खण्डित ये व्यथा हृद् चीर सह
जाना पङेगा
सह जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
©सुधा राजे
जा रहा हूँ चोर्यकर्मी प्रेमभीरू प्रिय
विदा
अब रहा अवशेष कंटकपथ चलूँ प्रण
संविदा ।
मात्र
अपराधी तुम्हारा ही नहीं पितु, पुत्र
का ।
बाल यौवन जीर्ण वय हे देवि
समझाना पङेगा ।
प्रिय मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
नाम से सिद्धार्थ मैं दिक्हीन सत पथ पर
चला ।
जन्म यौवन मृत्यु जीवन ईश
अंशी क्यों भला ।
खोज में चिर शांति तप की हूँ तो जल
जाना पङेगा
प्रिय!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा

मुझे जाना पङेगा

तुम विरह का शोक मत
करना क्षमा करना मुझे ।
विश्व की है टेर आकुल गीत ये
गाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
रूप रस लावण्य यौवन देह कुंतल मधु अधर

सुप्त श्लथ सुत संग श्यामल सौम्य लोचन
स्वप्न भर ।
कंचुकी पट मन सरकता क्षीण
ओढ़ाना पङेगा ।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
हूँ व्यथित संकल्प कातर देह प्रण
अभ्यर्थना।
तव चरण नत माथ भावी वेदना तव
यातना ।
यातना ।
देवि!!!! हे हृदयेश्वरी ।
पिय मोह झुठलाना पङेगा
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
आह !!! जाता हूँ पलटता टूटता मन भग्न
खंडित ।
शोक वारिद् तप्त पय बिनु मीन भव हित
आत्मदंडित ।
वक्ष खण्डित ये व्यथा हृद् चीर सह
जाना पङेगा
सह जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
©सुधा राजे
जा रहा हूँ चोर्यकर्मी प्रेमभीरू प्रिय
विदा
अब रहा अवशेष कंटकपथ चलूँ प्रण
संविदा ।
मात्र
अपराधी तुम्हारा ही नहीं पितु, पुत्र
का ।
बाल यौवन जीर्ण वय हे देवि
समझाना पङेगा ।
प्रिय मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
नाम से सिद्धार्थ मैं दिक्हीन सत पथ पर
चला ।
जन्म यौवन मृत्यु जीवन ईश
अंशी क्यों भला ।
खोज में चिर शांति तप की हूँ तो जल
जाना पङेगा
प्रिय!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा

दीवारों में हमको चिन गये

Sudha Raje
उल्फत उल्फ़त छलक रही थी जिन
आँखों की झीलों में ।
उनके भरे समंदर जिनमें
वहशत वहशत रहती है ।
इक दीवाने आशिक़ ने इक रोज़
कहा था चुपके से ।
मेरे दोस्त तेरे दम से दम हरक़त हरकत
रहती है ।
हुये बहुत दिन शहर बदर
थीं मेरी नज़्मों यूँ शायर ।
इस पहलू में दिल के भीतर ग़ुरबत गुरबत
रहती है ।
काला जादू डाल के नीली आँखें साक़ित कर
गयी यूँ ।
दिल का हिमनद रहा आँख में फ़ुरक़त फ़ुरक़त
रहती है।

ग़म का सहरा दर्द की प्यासें ज़ख़म वफ़ा के गाँव जले ।

क़ुरबानी के रोज़ से रिश्ते फुरसत फुरसत रहती है ।

झीलों की घाटी में वादी के पीछे दो कब्रें हैं ।
जबसे बनी मज़ारे घर घर बरक़त बरकत रहती है।

दीवारे में जब से हमको चिन गये
नाम फरिश्ता है
वो अब जिनकी ज़ुबां ज़हर थी इमरत इमरत रहती है
सुधा"ज़ुनूं से डर लगता है ।
अपने बाग़ीपन से भी ।
दर्द ज़जीरे सब्ज़ा हर सू ।
नफ़रत नफ़रत रहती है ।
©सुधा राजे
May 22

हवा शरमाई सी क्यूँ है

Sudha Raje
कि जैसे छू लिया तूने ।
हवा शरमायी सी क्यूँ है ।
ख़ुमारी तेरी आँखों में अभी तक
छायी सी क्यूँ है ।
बहुत आहिस्ता गुंचा- बर्गो -शाखो-ग़ुल
को छूती है।
चमन में आई तो तेरी तरह
अलसायी सी क्यूँ है।
नज़र लब ज़ुल्फ़ अबरू पै इशारे ये तबस्सुम
ज्यूँ
लगे तेरी तरह मयनोश ये घबरायी सी क्यूँ
है ।
बहक़ कर लग्जिशे पा फिर सँभल कर
गुनगुनाती सी ।
अदा भी है अदावत भी ले यूँ
अँगङाई क्यूँ है।
""सुधा ""वो शोख बातें
सरसराती गोशबर
ख़ुशबू ।
तेरे आग़ोश में ग़ुम कसमसाती आई सी क्यूँ
है।
©सुधा राजे Sudha Raje
Dta-Bjnr
May 23

मैं तेरा ज़ाम हो जाऊँ

Sudha Raje
Sudha Raje
न जाने क्या तेरे ख़ुम में कि साग़र में
कि शीशे
में ।
कि जी चाहा लबों पे ज़ान धर दूँ ज़ाम
हो जाऊँ ।
पलक पे नींद तारी मुस्कुराना फिर भी यूँ
तौबा ।
तबाही आज आनी है तो तेरे नाम हो जाऊँ

कहाँ से होश लायें आपकी खामोश नजरों से

मेरी नज़्मों से कह देना तेरा पैग़ाम
हो जाऊँ ।
अभी तो शब ज़वां हुयी है अभी सैरे क़मर
बाक़ी ।
उठा पैमाना ए दिल तू मैं बस खय्याम
हो जाऊँ।
मेरे मालिक़ मेरे आक़ा तेरी मयनोश नज़रों में ।
मेरी जन्नत मेरी दुनियाँ तेरा इक़राम हो जाऊँ ।
मुझे रहने दे बाँहों में निग़ाहों में पनाहों में ।
तेरी ग़फ़लत के सदके मैं तेरी हर शाम हो जाऊँ
सुधा ग़र ख़्वाब है ये तो मुझे सोने दे खोने
दे ।
बिता दूँ ज़िदग़ी इसमें अज़ल की शाम
हो जाऊँ।
©सुधा राजे

कोई याद आ रहा है

चाँदी की उस नदी में ,
वो बिंब चंद्रमा का ।
थे व्योम उर्वि सँग सँग
वो दिन था पूर्णिमा का ।
दो सिन्धुनील नैनों ने
मेरी ओर ताका ।।।।
थे बाहुपाश में ज्यों ।
नक्षत्र नभ के सारे ।
मंदाकिनी थी मन में ।
जिस दिन थे तुम हमारे
कोई यूँ न मन को हारे
जैसे धरा पै तारे ।।।
आकाशपुष्प संभव ।
उस दिन कहीं खिले थे ।
ज्योतिर्वलय कहीं पर ।
ब्रह्माण्ड में मिले थे ।।।।
सुरलोकचाप वर्णा
कंजों पै खग हिले थे ।
स्मित अधर किसी के।
विहँसे मुझे पुकारे ।।।।
कोई यूँ न मन को हारे ।।
जैसे धरा पै तारे ।
मंदाकिनी थी मन में
जिस दिन थे तुम हमारे ।
©¶©®¶©®¶
Copy Right
SUDHA RAJE
BJNR''DTA
May 27

निशा किसे बुला रही

Sudha Raje
Sudha Raje
मंद्र मदिर तंद्र पवन गुनगुना रही ।
मत्त मधुर तप्त गगन को सुना रही।
भुवन मोहिनी सुरो पे धुन
बना रही ।
निशा किसे बुला रही ।
निशा किसे बुला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।।
ये किसकी याद आ रही ।
पल्लवित सुमन सुवास से भरे भरे ।
उल्लसित ये द्रुम हुलास से हरे हरे ।
चंचरीक पुष्पराग तन झरे झरे
पुंडलीक मन नयन सपन डरे डरे ।
जिन्हें विभा रुला रही ।
जिन्हें विभा रूला रही ।
ये किसकी याद आ रही
ये किसकी याद आ रही ।
©®¶©®सुधा राजे ।
निष्पलक मृगांक देखता विभोर हो।
ज्यों पुलक विहंग वंशिका किशोर हो ।
परिश्रांत परिश्लेष पोर पोर हो ।
ध्रुव नक्षत्र ज्यों पलक की कोर कोर
हो ।
हृदय लता झुला रही।
हृदय लता झुला रही
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
©®¶©®
सुधा राजे
मद्गलीन ज्योत्सना में शीत लीनता ।
दूर पंथ पार सरित् वन्हि क्षीणता।
बिंब सर हिमांशु तङित् की प्रवीणता।
तरू मधूक छाँव नृत्य मन नवीनता ।
मदन सुधा पिला रही ।
मदन सुधा पिला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
Sudha Raje
Copy right
all ®¶®©27-6-2012

गीतों के गाँव गाँव के सपने

एक था गाँव
जीवन की छाँव
छाँव थी सपना
गाँव था अपना
अपना था बाग
बागों में राग
राग था खेत
नदिया औऱ् रेत
रेतों के घर
कल कल निर्झर
झरने औऱ् ताल
पीपल बङ साल
सालों के रिश्ते
लड्डू घी पिश्ते
सोहर सहाने
फागुन के गाने
मँजी का ब्याह
जी भर उछाह
नाची बारात
बेला औऱ् भात
दुखती विदाई
सावन घर भाई
छट्टी के तंदुल
तालों पे पंडुल
पोखर में डंगर
जामुन पे बंदर
मंदिर पै जाग
मरघट पै आग
तेऱईँ और मौत
फुलवा भई सौत
सौतन जुन्हैया
परदेशी सैयाँ
आया ले छल्ला
सब घर में हल्ला
पाकङ पे उल्लू
झुरमुट में लल्लू
लल्लू सँग लाली
कल्लू सँग काली
काली का चौरा
पीला पिछौरा
जिसमें गुङ धान
बखरी का मान
पनचक्की तुक तुक
दो दिल थे धुक् धुक्
ईखों में जोङे ।
संझा बिछोङे ।
पनघट पे गगरी
इडरी और तगरी
तगरी में घुँघरू
कछरे में कुँदरू
कुँदरूँ परवल
बगुले और हल
कल कल रहट
धुन वंशीवट
पीतल की थाली
जीजा और साली
लकचा महेरी
बिरचन गँडेरी
ढेँकुर और कओर
गन और गनगौर
कच्ची हर भीत
पक्की हर प्रीत
प्रीतों का घाव
इमरतिया नाव
नावों के बेङे
लू के थपेङे
पीली वो धूल
फूले बबूल
कनकौये काटे
घी के परांठे
मठ्ठा और प्याज
गहने और ब्याज
इमरतिया रोयी
चुनरी भिगोयी
चुन्नी पे बेल
बचपन का खेल
खेलों में चंदन
मन का अभिनंदन
चंदन का गाँव
जी का दुराव
जी में था घाव
घावों पर लेप
गीतों की खेप
गीतों में सपना
सपना था अपना
अपनों के गीत
सपनों के गीत
©¶©®¶ सुधा राज

Tuesday, 29 October 2013

राजेन्द्र यादव के अमूल्य शब्द। सुधा राजे की डायरी से एक साक्षात्कार के दौरान।

1. मेघदूत अकबरनामा रघुवंश
राजतरंगिणी आदि व्यवस्थायें मात्र
अपनी कल्पनाशील दृष्टि से
गढ़ी हुयी या राजाओं की प्रसंशा पाने के
लिये या केवल
सुविधाभोगियों द्वारा गढ़ी हुयी हो स
# राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात सुधाराजे की डायरी से
नोट्स 1994

2. मेरे विचार से जब नवरस गढ़े गये तब
श्रंगार को रसराज मानने के पीछे यह
भी तथ्य हो सकता है कि स्त्री के
प्रति राजाओं
या कवियों का वासनात्मक लगाव
भी अधिक रहा हो #राजेन्द्रयादव एक
मुलाकात सुधा राजे की डायरी से 1994

3. उपन्यास
की अवधारणा पश्चिमी धारणा है। और
सारी औपन्यासिक कसौटियाँ पश्चिमी हैं
।अस्तु भारतीय उपन्यास कैशोर्य
अवस्था में हैं ।हमारे लेखक ज़िंदगी भर
लिखते रहेगे किंतु हमारी तुलना सदैव
पश्चिमी उपन्यासों से की जाती रहेगी।
हमारे उपन्यासों की ओरिजनल
कॉपी यूरोप में रखी हुयी है ।
अतः उपन्यास का विकास
हो ही नहीं सकता #राजेन्द्रयादव एक
मुलाकात सुधा राजे की डायरी 1994

4. "Devotion is that value which
clouds your vision."
- #RajendraYadav

5. उपन्यास लोकतंत्र की गाथा है और
महाकाव्य सामंतवाद की गाथा है।जब
हम अपनी जङों की खोज करते हैं
तो मात्र सामंतवाद की ओर लौटते हैं ।
# राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात
सुधाराजे की डायरी
1994

6. हमारी आईडियल
स्त्री महिला लेखिकाओं ने छीन लीं और
स्वयं कोई स्त्री क्रियेट नहीं कर सकीं ।
# राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात
सुधा राजे की डायरी के नोट्स 1994

7. श्रद्धा कोई चीज नहीं होती है
आस्था होती है ।
श्रद्धा एक घातक हथियार है। कृष्ण एक
सफल वकील की तरह थे । गीता
रण की प्रेरणा का साहित्य!!! श्रद्धा के
ढकोसले ने
शांति का बनाया!!!! कैसा आश्चर्य है !!!!!
जो हर पल कहता है लङ लङ लङ । उससे
लोगों को शांति मिलती है । ????
एक मुलाकात # राजेन्द्रयादव से
सुधा राजे की डायरी के नोट्स 1994

8. लिखा हुआ इतिहास या प्रयास से
उत्पन्न किया गया साक्ष्य सदैव
सही हो यह आवश्यक नहीं है ।यह
तो मात्र् एक
शक्ति शाली व्यक्ति की अपनी दृष्टि मस
इंदिराजी का कालपात्र गाढ़ देना। #
राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात सुधा राजे की डायरी

9. लिखा हुआ इतिहास या प्रयास से
उत्पन्न किया गया साक्ष्य सदैव
सही हो यह आवश्यक नहीं है ।यह
तो मात्र् एक
शक्ति शाली व्यक्ति की अपनी दृष्टि मस
इंदिराजी का कालपात्र गाढ़ देना। #
राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात सुधा राजे की डायरी

10. सोशल गिल्ट लोग ही आत्मशांति तलाशते
हैं ।ये आत्मशांति बङी खतरनाक वस्तु है
इसे तलाशने वाले लोग प्रायः स्व में
केन्द्रित होकर घनिष्ठ से घनिष्ठ के
प्रति गैरजिम्मेदार हो जाने
की प्रेरणा देते है।
# राजेन्द्रयादव
एक मुलाकात मेरे नोट्स 1994

11. मेरे विचार से हमारे विकास की सबसे
बङी बाधा ये ईश्वर नाम की संकल्पना है

# राजेन्द्रयादव
से अनौपचारिक बातें नोट्स मेरे

12. ज्ञान का विकास सिर्फ उन्होंने
किया है जिन्होने अननोन को जानने
का प्रयास किया।
श्रद्धा हमें मुक्ति मोक्ष संतोष देती है
किंतु ज्ञान नहीं ।
इसीलिये श्रद्धा पर जीविका चलाने
वाले प्रश्न को नकारते है
।# राजेन्द्रयादव

13. अंधश्रद्धा के स्थान पर जब तक घोर
अश्रद्धा न हो तब तक ज्ञान का विकास
नहीं हो सकता यह एज ऑफ फेथ से एज ऑफ
रीजन की यात्रा है "" राजेन्द्रयादव
मेरे नोट्स और युगपीङा भोपाल
को भेजी रिपोर्ट स

14. विवेकी व्यक्ति के लिये शरीर का कुछ
भी पवित्र या अपवित्र नहीं होता बस
महत्तवपूर्ण होता है ।
"" # राजेन्द्रयादव

15. हमारे विकास
हमारी सभ्यता का इतिहास ईश्वर
की क्षमताओं को कम करने ईश्वर
की शक्तियों को छीनते चले जाने
का इतिहास है जब हम आस्था से प्रश्न
करते हैं तो ईश्वर को चुनौती देते हैं ।""
राजेन्द्र यादव
16-10-1994
दतिया
सेमिनार में
एक मुलाकात सुधाराजे की डायरी
©®sudha raje

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परछांई

Sudha Raje
2 minutes ago ·
अंतस के नटरंगमंच पर सब आ आ कर चले गये

बचे खुचे थे दीप यवनिका के गिरने तक जले
गये ।
छले गये जो ढले आँसुओं में अभिनय
की माया है ।
©®™सुधा राजे
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Sudha Raje
11 minutes ago ·
मेरे साथ सदा ही चलता रहा निराकृत
एकाकी।
अनाहूत निर्लिप्त हृदय में कौन
कहाँ टिक पाया है ।
©®™सुधा राजे
4 · Unlike · Comment · Add
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Sudha Raje
16 minutes ago · Edited ·
वो मेरी परछांईँ थी या ये मेरी परछांई
है ।
मैंने तो हर बार स्वयम को निराकार
ही पाया है ।
©®™सुधा राजे
8 · Unlike · Comment · Add

Monday, 28 October 2013

सुधा राजे की 8 कविताएँ।

1. भूख जब हो गयी मुहब्बत से बङी ऐ
ज़िंदग़ी!!!!!!!
बेचकर जज़्बात लायी भात
मैं तेरे लिये
दिल से ज्यादा पेट में जब
आग हुयी ऐ बंदग़ी!!!!!!
ख्वाब
सी पिसता रही दिन
रात मैं तेरे लिये
बुतपरस्ती से
ख़ुदा मिलता न था ,रोज़े से भी
रोटियों लिखती रही सफ़हात मैं तेरे
लिये
टूटती रह गयी बदन
की ख्वाहिशें पर्दों में यूँ बिक
गयी थी रेत सी हर
रात मैं तेरे लिये
आग लग गयी जब मेरे
रिश्तों के पुल पर ,भीङ थी
तैरती मुर्दों पे थी हालात मैं तेरे लिये
गाँव में गुरबत के जब सैलाब आया दर्द का
छोङ गये सब हाथ
खाली हाथ मैं तेरे लिये
हुस्न के परतौ पे आशिक़ भूख का मारा हुआ
नाचती रह गयी सङक
अब्रात मैं तेरे लिये
बस ज़ने -फ़ासिद थी उल्फ़त पेट के इस दर्द
को
मौत लायी कोख पर ज्यूँ
लात मैं तेरे लिये
सब चले गये छोङकर कल तक
जो मेरे थे वली
कब्र या ससुराल औरत ज़ात मैं तेरे लिये
एक टूटा ये कटोरा ज़िस्म ,दीवारें क़बा
साँस माँगे भीख ज्यूँ ख़ैरात मैं तेरे लिये
चंद टुकङे काग़जों के कुछ निवाले अन्न के
चंद चिंथङे ये
सुधा "औक़ात मैं तेरे लिये
चाँद तारे फूल तितली इश्क़ और शहनाईयाँ
पेट भरने पर हुयी शुहरात मैं तेरे लिये
किस नदी की रूह
प्यासी हूँ मैं सबकी प्यास में
रेत पी गयी शायरी क़ल्मात मैं तेरे लिये
चंद गीली लकङियों पर
आखिरी कुछ रोटियाँ
जोहते बच्चे हुयी शह -मात मैं तेरे लिये
बाप था ज्यादा कि बेटा कौन
भूखा क्या पता
खा गयी चोरी से आलू
सात मैं तेरे लिये
आज तक तो रोज
मिलती रह गयी उम्मीद
सी
आयी ना खुशियों की वो बारात मैं तेरे
लिये
सब कुँवारे ख़्वाब पी गयी इक
ग़रीबी की हिना ।
तीसरी बीबी सुधा ग़ैरात मैं तेरे लिये।

2. माचिसों में
तिलमिलाती आग सी ये लङकियाँ
माँओं के
ख्वाबों की खिङकी ताज
सी ये लङकियाँ
कालकोठी में
पङीं जो भी तमन्ना खौफ़
से
उस अज़ल का इक मुक्म्मिल राज़ सी ये
लङकियाँ
तोङकर डैने
गरूङिनी हंसिनी के
बालपन
हसरतें छू ती ख़ला परवाज़ सी ये लङकियाँ
घूँघटों हिज़्जाब में घुट गयीं जो चीखें हैं
दफ़न
वो उफ़ुक छूती हुयी आवाज़ सी ये लङकियाँ
ग़ुस्ले-आतश में
हुयी पाक़ीजगी के
इम्तिहाँ
इंतिहा उस दर्द के अंदाज़ सी ये लङकियाँ
आह में सुर घुट गये
रोटी पे मचली नज़्म के
तानपूरे औऱ् पखावज़
साज़ सी ये
लङकियाँ
अक्षरों चित्रों सुरों छैनी हथोङों की दफ
जंग खायी पेटियों पर
ग़ाज सी ये लङकियाँ
ग़ुमशुदा तनहाईयों में दोपहर की नींद सी
एक
बिछुङी सी सखी ग़ुलनाज़
सी ये लङकियाँ
दहशतों की बस्तियों में रतजगे परदेश के
पंछियों सँग भोर के आग़ाज सी ये लङकियाँ
वंशदीपक दे न पाने पर
हुयी ज़िल्लत लिये
कोख दुखते ज़ख़्म पर हिमताज़ सी ये
लङकियाँ
रूखसती के बाद से
हो गयी परायी धूल तक
गाँव से
लाती वो पाती बाज़
सी ये लङकियाँ
सब्र की शूली पे
जिंदा ठोंक
दी गयी हिम्मतें
बाईबिल
लिखती सुधा अल्फ़ाज
सी ये लङकियाँ।

3. पत्थर चाकू लेकर सोये
गाँव शहर से परे हुये
रात पहरूये बरगद रोये अनहोनी से डरे
हुये
कब्रिस्तान और शमशानों
की सीमायें जूझ पङीं
कुछ घायल ,बेहोश ,तङपते
और गिरे कुछ मरे हुये
रात-रात भर समझाती नथ-
पायल ,वो बस धोखा है
ख़त चुपके से लिखे फ़गुनिया जब -जब सावन
हरे हुये
फुलझङियाँ बोयीं हाथों पर
बंदूकों की फसल हुयी
जंगल में जो लाल कुञ्ज थे
आज खेत हैं चरे हुये
बारीकी से नक्क़ाशी कर बूढ़े 'नाबीने
'लिख गये
पढ़ कर कुछ हैरान मुसाफिर रोते आँखे भरे
हुये
हिलकी भर कर मिलन
रो पङा
सूखी आँख विदायी थी
वचन हमेशा शूली रखे
चला कंठ दिल भरे हुये
ज्यों ज्यों दर्द खरोंचे
मेरी कालकोठरी पागल सा
मेरे गीत जले कुंदन से
सुधा "हरे और खरे हुये।

4. पढ़ना सुनना आता हो तो पत्थर पत्थर
बोलेगा
जर्रा जर्रा,पत्ता पत्ता अफसानों पे
रो लेगा
वीरानों से आबादी तक
लहू पसीना महका है
शर्मनाक़ से दर्दनाक़ नमनाक़ राज़
वो खोलेगा हौलनाक़ कुछ हुये हादसे लिखे
खंडहर छाती पे
नाखूनों से खुरच
लिखा जो, इल्म शराफ़त तोलेगा कुएँ
बावड़ी तालाबों
झीलों नदियों के घाट तहें खोल रहे हैं
ग़ैबी किस्से पढ़ के लहू भी खौलेगा आसमान
के तले जहाँ तक
उफ़ुक ज़मी मस्कन से घर कब्रिस्तानों से
श्मशानों क्या क्या लिखा टटोलेगा चेहर
रिसाला
नज़र नज़र सौ सौ नज़्में हर्फ़ हर्फ़
किस्सा सदियों का वरक़
वरक़ नम हो लेगा
हवा ग़ुजरती हूक तराने अफ़साने
गाती सुन तो
"सुधा" थरथराता है दिल
भी ख़ूनी क़लम
भिगो लेगा ।

5. जाने किससे मिलने आतीं ' सर्द हवायें
रात गये
बस्ती से आतीं हैं सिसकती दर्द कराहें
रात गये
दूर पहाङों के दामन में छिपकर सूरज
रो देता
वादी में जलतीं जब दहशतग़र्द निग़ाहें
रात गये
चाँद को लिख्खे चिट्ठी
ठंडी झील बरफ के
शोलों पे
ख़ामोशी से कोहरे की
फैली जब बाँहे रात गये
परबत के नीचे तराई में हरियाली चादर
रो दी
फूलों कलियों की गूँजी
जब गुमसुम आहें रात गये
कितने आदमखोर मुसाफिर रस्ते से गुजरे
होंगे
मंज़िल तक जाने से डर गयीं लंबी राहें
रात गये
पेङ तबस्सुम नोंच के खा गये नाजुक
नन्ही बेलों के
धरती रोती शबनम भरके
मौत की चाहें रात गये
प्यार वफ़ा के गाँव में अमराई
पर लटकी लाशें थीं
सुधा" मुहब्बत छोङ के चल
दी
पीपल छाँहे रात गये।

6. मन के वन को जेठ जिंदगी
सावन बादल तुम साजन!!!!
थकते तन को मरुथल सा जग मनभावन जल
तुम साजन!!!!
पाँव के नीचे तपी रेत पर छल के गाँव
सभी नाते ।
कङी धूप में हरा भरा सा शीतल अंचल तुम
साजन!!
आशाओं के शाम सवेरे दुपहर ढलकी उम्मीदें

निशा भोर से पंछी कलरव चंचल- चंचल तुम
साजन ।
सुधा परिस्थियों के काँटे नागफनी के दंश
समय
हरे घाव पर चंदन हल्दी रेशम मलमल तुम
साजन!!!
डरे डरे दो नयन अँधेरों से रस्मों से
घबराये ।
स्मित अधर सरल आलिंगन । मंचल मनचल
तुम साजन
इकटक लक्ष्यबेध शर लेकर । मैं
भूली कर्तव्य सभी । मेरी सफलता पर
खुशियों के । नयना छल छल तुम साजन!!।

7. दिल में कुछ होठों पर कुछ है कलम लिखे कुछ
और सुधा।
जहां न हो ये हलचल इतनी चल चल चल उस
ठौर सुधा।
कल तक थी उम्मीद रोशनी की घुटनों पर
टूट गयी।
अक़्श नक़्श ज्यों रक़्श दर्द का ये है कोई
और सुधा।
किसे समझ
आयेगा वीरानों का मेला कहाँ लुटा ।
कौन सजाये नयी दुकाने रहे परायी पौर
सुधा।
बाँध लिये असबाब बचा ही क्या था बस
कुछ गीत रहे।
भँवरी हुये सिरानी सरिता रही एक
सिरमौर सुधा।
©® Sudha Raje
सुधाराजे
फतेहनगर
शेरकोट
बिजनौर
उप्र
246747

कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते है ऐ दिल सहने दो

Sudha Raje
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ऐ दिल!!!!!
सहने दे ।
मुश्क़िल है अंज़ुमन में आना ,अब,मुझे
अकेला रहने दे।
कुछ ग़म ख़ामोश पिये जाते हैं पीने दे औऱ्
ज़ीने दे ।
कुछ ज़ख़्म छिपाये जाते है,, ख़ुद चाक़
ग़रेबां सीने दे।
बेनुत्क़ तराने ऐसे कुछ बे साज़ बजाये जाते
हैं
कुछ अफ़साने चुपचाप दर्द, सह सह के
भुलाये जाते हैं ।
हर साज़ रहे आवाज़ रहे ।ख़ामोश!!!!न आँसू
बहने दे
।।।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ।
ऐ दिल!!!!!!
सहने दे ।
कुछ यादें होतीं ही हैं बस दफ़नाने और
भुलाने को ।
हर बार कोई कब होता है देकर आवाज़
बुलाने को ।
कुछ पाँव पंख घायल पागल बेमंज़िल मक़सद
चलते हैं ।
कुछ तारे चंदा सूरज हैं चुपचाप पिघल कर
जलते हैं ।
कुछ ज़ख़्म लगे नश्तरो-,नमक बे मरहम हर
ग़म
ढहने दे ।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ।।
ऐ दिल!!!!!
सहने दे ।
©सुधा राजे ।।
Sudha Raje
©सुधा राजे ।
Sudha Raje
©®¶
May 1

दर्द को रिंद के मानिंद पिये जाती है

Sudha Raje
आग के फ़र्श पे इक रक़्श किये जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिंद पिये जाती है ।
इक जरा छू दें तो बस रेत
सी बिखरती है ।
एक दुल्हन है जो हर शाम को सँवरती है ।
एक शम्माँ जो अँधेरों को जिये जाती है ।
दर्द रिंद के मानिंद पियेजाती है ।
कुछ तो सीने में बहकता है दफ़न होता है ।
आँख बहती भी नहीं बर्फ़ हुआ सोता है ।
तन्हा वादी में छिपे राज़ लिये जाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

जो भी मिलता है धुँआ होके सुलग जाता है

इश्क़ है रूह है आतश में जो नहाता है ।
अपनी ही धुन में वो शै क्या क्या किये
जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

सख़्त पत्थर की क़लम है कि वरक़ वहमी हैं

कितनी ख़ामोश जुबां फिर भी हरफ़
ज़ख्मी हैं

ज्यों सुधा दश्त-ए-वहशत में दिये बाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है
।30/4/2013
All rights ©®¶©®©सुधा राजे ।
Sudha Raje

हवा शरमायी सी क्यूँ है??

Sudha Raje
कि जैसे छू लिया तूने ।
हवा शरमायी सी क्यूँ है ।

ख़ुमारी तेरी आँखों में अभी तक
छायी सी क्यूँ है ।

बहुत संज़ीदग़ी से बर्गो -शाखो-ग़ुल
को छूती है।

चमन में आई तो तेरी तरह
अलसायी सी क्यूँ है।

नज़र लब ज़ुल्फ़ सब इतने इशारे ये तबस्सुम क्यूँ

लगे तेरी तरह मयनोश ये घबरायी सी क्यूँ है ।

बहक़ कर लग्जिशे पा फिर सँभल कर
गुनगुनाती सी ।

अदा भी है अदावत भी ये यूँ
अँगङाई सी क्यूँ है।

सुधा वो शोख बातें सरसराती गोशबर
ख़ुशबू ।

तेरे आग़ोश में ग़ुम कसमसाती आई सी क्यूँ है।

©सुधा राजे Sudha Raje
Dta-Bjnr
May 22

हवा शरमाई सी क्यूँ है

Sudha Raje
कि जैसे छू लिया तूने ।
हवा शरमायी सी क्यूँ है ।

ख़ुमारी तेरी आँखों में अभी तक
छायी सी क्यूँ है ।

बहुत संज़ीदग़ी से बर्गो -शाखो-ग़ुल
को छूती है।

चमन में आई तो तेरी तरह
अलसायी सी क्यूँ है।

नज़र लब ज़ुल्फ़ सब इतने इशारे ये तबस्सुम क्यूँ

लगे तेरी तरह मयनोश ये घबरायी सी क्यूँ है ।

बहक़ कर लग्जिशे पा फिर सँभल कर
गुनगुनाती सी ।

अदा भी है अदावत भी ये यूँ
अँगङाई सी क्यूँ है।

सुधा वो शोख बातें सरसराती गोशबर
ख़ुशबू ।

तेरे आग़ोश में ग़ुम कसमसाती आई सी क्यूँ है।

©सुधा राजे Sudha Raje
Dta-Bjnr
May 22

ठहरो ये उत्तर प्रदेश

Sudha Raje
ठहरो!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
दिल दिमाग़ बीमार हृदय में कलह द्वंद्व
दुख भार क्लेश है ।
हरा भरा ऊपर कंबल है । भीतर भीतर
धब्बे फटा वेश है ।
ठहरो!!!!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
यहाँ प्रशासन की मनमानी ।
न्याय भरे नेता घर पानी।
मज़हबवाद जाति के दंगे।
आरक्षण की रार पुरानी।
शीश काट ले गये गढ़वाली ।
किकर्तव्य विमूढ़ लेश है ।
ठहरो!!!!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
यहाँ बेटियाँ घर घर मरतीं ।
पत्नी पर ठोकर हैं पङतीं।
जलती हैं अब तक दहेज में ।
बहुयें जो धन सेज न चढ़तीं ।
यहाँ रुपैया ही रिश्ता है ।
राजनीति ब्रह्मा महेश है ।
ठहरो!!!!!!
ये उत्तर प्रदेश है।
बच्चे है मजदूर भिखारी ।
युवा शराबी वृद्ध जुआरी।
औरत घर घर विवश सिसकती।
वृद्धावस्था बस लाचारी।
रिश्वत बिना जले ना मुरदा ।
प्रौढ़ भरा ज्यों ऊब तैश है ।
ठहरो!!!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
प्रतिभा कौशल की बे क़दरी ।
चालाकी को मखमल सदरी।
निष्ठा रौंदी जाती जी भर।
चुप ईमान, ,मिलावट बगरी।
नकल नकलची की जय जय है ।
ढोंगी पाखंडी प्रजेश हैं।
ठहरो ये उत्तर प्रदेश है ।
सिसक रही जमुना और गंगा।
रक्त कीच विष मिले कुढंगा ।
त्राहि त्राहि उजियार ना रोज़ी।
बङा लुटेरा साधु मलंगा।
दादा नेता भैया बाबा ।
चारों का ही राजवेश है ।
ठहरो!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
©सुधा राजे ।
©Sudha Raje
तंत्र मंत्र अपहरण लूट है।
चोरी धोखा श्वेत झूठ है।
गंडे पंडे ताबीजों की ।
एक बुलाओ पाँच छूट है।
भयादोहनी धंधा चंदा ।
जोऱ शोर मज़लिस है प्रेस है ।
ठहरो!!!!
ये उत्तर प्रदेश है ।
©सुधा राजे।
Apr 24

ग़म यूँ समझाने आते हैं

Sudha Raje
सूख रहे ज़ख़्मों पर नश्तर - नमक लगाने
आते हैं।

भूल चुके सपनों में अपने से आग जगाने आते हैं।

किसी बहाने किसने कैसे कितनी काट
गयी कब कूता।

बची हुयी दर्दों की फसलें लूट चुराने आते
हैं ।

उफ् तक कभी न की जिन होठों से पी गये
हालाहल सब ।

सुधा उन्हीं पर गंगा जमुना सिंध तराने
आते हैं।

जब जब गूँगे अश्क़ बहे तो आबशार आबे-आतश।

अहबाब-औ-अख़लाख ज़माने बाँध गिराने
आते
हैं ।

एक लम्स भर
जहाँ रौशनी ना थी वहीं ग़ुज़र कर ली ।

तिल तिल मरे हमें तिनकों से अज़्म बनाने
आते
हैं।

कौन तिरा अहसान उठाता खुशी तेरे
नखरे ।
भी उफ्


हम दीवाने रिंद दर्द पी पी पैमाने आते
हैं ।

आबादी से बहुत दूर थे फिर भी खबर
लगा ही ली ।

कोंच कोंच कर दुखा दिया फिर
दवा दिखाने आते हैं।

वीरानों की ओर ले चला मुझे नाखुदा भँवर-भँवर।

जिनको दी पतवार वही तो नाव डुबाने
आते हैं।

अंजानों ने मरहम दे घर नाम न पूछा मगर
हमें ।

जानबूझ कर डंक चुभोने सब पहचाने आते हैं

सुधा हमारी मासूमी सिन वफ़ा ग़ुनाहों में थे बस ।

हमको सिला मिला सच का" ग़म यूँ समझाने
आते हैं।
©सुधा राजे ।
Apr 26
All Right ©®©®

सुधा चाँद की नींद खुली

Sudha Raje
मैंने सबकुछ दाँव लगाकर
हारा जिसको पाने में ।।
वही इश्क़ लेकर आया अब दर्दों के मयखाने
में ।।
दिल पर ऐसी लगी ,कि सँभले बाहर,,
भीतर बिखर गये ।।
पूरी उमर गँवा दी हमने बस इक घाव
सुखाने में ।।
अक़्सर बिना बुलाये आकर
जगा गयीं पुरनम यादें ।।
दर्द रेशमी वालिश रोये पूरी रात
सुलाने में
।।
अपना बोझ लिये गर्दन पर कब तक ज़ीते
यूँ मर गये ।।
एक ज़नाजा रोज उठाया ।
अपने ही ग़मखाने में ।।
ता हयात वो खलिश नहीं गयी चार लफ्ज़
थे
तीरों से ।।
जलते थे औराक़ लबों पर जलती प्यास
बुझाने में ।।
आहों के अंदाज़ दर्द के नग्मे खुशी भर
गाता
।।
कितने दरिया पिये समंदर ।
दिल -सहरा को बहलाने में ।।
नदी रेत में चली जहाँ से
भरी भरी छलकी छलकी ।।
सबको मंज़िल मिले नहीं था ये आसान
ज़माने में ।।
शायर जैसी बातें करता पागल कमरे के
अंदर ।।
ले गये लोग शायरी पागल फिर भी
पागलखाने में ।।
कभी यहीँ पर एक रौशनी की मीनार
दिखी तो थी ।।
हवा साज़िशे करती रह
गयी जिसको मार गिराने में ।

मर मर कर ज़िंदा हो जातीं प्यासी रूहें
रात गये ।।
सब आशोब तराने गाते है
डरना बस्ती जाने में ।।
हाथ न छू इक ज़मला बोली
"""ये मेंहदी है जली हुयी""" ।।
मौत मेरे दरमियाँ कसम है तुझको गले
लगाने में।
मुट्ठी में भर आसमान ले बाहों में
जलता सूरज ।
सुधा चाँद की नींद खुली तो टूटे ख़ुम
पैमाने में
©®¶©®¶
सुधा राजे
sudha Raje
पूर्णतः मौलिक रचना सर्वाधिकार लेखिका सुधा राजे बिजनौर /दतिया

हमारे मर्ग़ पे भी आँख नम नहीं रखता

Sudha Raje
हर एक शख़्स मोहब्बत का दम
नहीं रखता।

दर्द आमेज़ राह पर क़दम नहीं रखता ।

वो एक शै कि जिसे इश्क़ कहा करते हैं ।

ख़ुदा के बाग़ में हव्वा अदम नहीं रखता।

जिसे है कुछ भी तमन्ना ज़हां में पाने की।

वो अपने दिल में युँ क़ाफ़िर सनम
नहीं रखता।


ये लौ है ऐसी बुझाओ तो औssर भङके है ।

विसाले यार की हसरत ये ग़म
नहीं रखता ।

कहाँ वो शख़्स जिसे ज़िन्दग़ी सुधा समझा।

हमारे मर्ग़ पे भी आँख नम नहीं रखता।

वफ़ा की ज़िद में कोई आग़ से नहाये ज्यूँ ।

दुआ को जिसके कोई है वहम नहीं रखता ।
©®सुधा राजे
Sudha Raje
at 7:59pm
Jun 29

बिटिया हरखूबाई की

Sudha Raje
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की।

अम्माँ मर गई पर कैं आ
गयी जिम्मेदारी भाई
की।

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की।

आठ बरस की उमर
अठासी के
बाबा
अंधी दादी।


दो बहिनों की ऐसों
करदी बापू ने जबरन शादी।

गोदी धर के भाई हिलक के
रोये याद में माई की।

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की।

चाचा पीके दारू करते
हंगामा चाची रोबै।

न्यारे हो गये ताऊ चचा सें
बापू बोलन नईं देबे।

छोटी बहिना चार साल
की
उससे छोटी ढाई की।

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की।

भोर उठे अँगना बुहार कै
बाबा कहे बरौसी भर।

पानी लातन नल से तकैँ।

परौसी देबे लालिच कर।

समझ गयी औकात
लौंडिया जात ये पाई
-पाई की..


कैसे इतनी व्यथा सॅभाले
बिटिया हरखू बाई की।

गोबर धऱ के घेर में
रोटी करती चूल्हे पे रोती।

नन्ही बहिन उठा रई
बाशन
रगङ राख से वो धोती।

बापू गये मजूरी कह गये
सिल दै खोब
रजाई की।

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की।

भैया के काजैं अम्माँ ने
कित्ती ताबीजें बाँधी।

बाबा बंगाली की बूटी
दादी की पुङियाँ राँधी।

सुनतन ही खुश हो गयी
मरतन ""बेटा ""बोली दाई
की।

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की।

जा रई थी इसकूल रोक दई
पाटिक्का रस्सी छूटे।

दिन भर घिसे बुरूश
की डंडी।

बहिनों सँग मूँजी कूटे
दारू पी पी बापू रोबै

कोली भरैं दुताई की।

कैसें इतनी व्यथा सँभालै बिटिया हरखूबाई की।


बाबा टटो टटो के माँगे
नरम चपाती दादी गुङ।

झल्ला बापू चार सुनाबै
चाची चुपके कहती पढ़।

छोटी बहिन
पूछती काँ गई
माई!!! रोये हिलकाई की

कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू बाई की????
©®¶¶©®¶Sudha Raje
Datia --Bij
Mobile Uploads · Jun 18 ·

Sunday, 27 October 2013

खाक़ मले जा आईना

Sudha Raje
किरचें टुकङे तिनके क़तरे
रेज़ा रेज़ा आईना ।

दिल सी हस्ती ग़म सी बस्ती चाक़
कलेजा आईना।

रूह की गहरी तहों में बैठा हर
पल शक़्ल दिखाता सा।

कभी चिढ़ाता कभी रूलाता किसने
भेजा आईना।

जब भी दिखा दिया अहबाबों को, सारे
ही रूठ गये।

राहत का तकिया हमको था
उनको नेज़ा आईना।

जिस दिन से पीछे से उसने ग़ौर से
देखा था चुपके ।

क़दर बढ़ गयी इसकी तबसे अब
*आवेज़ा-आईना।

जो कोई ना देख सके ये
"सुधा" वही दिखलाता है।

या तो इसको तोङ फोङ दूँ या रब।
ले जा आईना।

लगा कलेजे से हर टुकङा नोंक ख्वाब
की सूरत सा।

टुकङे टुकङे था वज़ूद भी युँही सहेज़ा आईना ।

जब तक कोई तुझे न तुझ सा दिखे रूह
की राहत को ।

तब तक तनहा तनहा यूँ ही मिले गले
जा आईना ।

मंदिर की देहली पर जोगन ,,जोगन
की देहली मोहन ।

मोहन की देहलीज़ ये टूटा जगत् छले
जा आईना ।

दागदार चेहरे भी हैं इल्ज़ाम आईने पर ऱखते ।

जितना तोङे अक़्श दिखाकर ख़ाक मले
जा आईना ।

चुभी सचाई लहू निकल कर चमक उठे **औराक़ भी यूँ ।

तोङ के जर्रों में फिर नंगे पाँव चले
जा आईना ।
©®Sudha Raje
Dta/Bjnr
Apr 13
आवेज़ा =झुमका
औराक़=पृष्ठ

vande mataram bol

Sudha Raje©®
दुश्मन की ललकार मिटा दे
भुनगों की गुंजार मिटा दो।
तिनकों की दीवार मिटा दे ।
उठा उठा तूफान
बाजुओं
क़दमों से भूडोल ।
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल ।
बोल बोल जयहिन्द -
हिन्द की सेना की जय बोल ।
वन्दे मातरम् बोल ।
उठो तिरंगा झुक ना जाये
उठो ये गंगा रुक ना जाये
उठो कि बच्चे चिंहुँक ना जाये ।
भून भून दो कीट पतिंगे ।
तोपों के मुँह खोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्देमातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल ।
बोल बोल जयहिन्द हिन्द
की सेना की जय बोल ।
©®Sudha Raje
है कश्मीर हमारी क्यारी
काटो जो करते ग़द्दारी।
शौर्य देख ले दुनियाँ सारी।
सीमा पर दुश्मन की लाशें
बिछा बदल भूगोल ।
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
बोल बोल जयहिन्द
हिन्द की सेना की जय बोल ।
सबसे पहले देश का नारा
जय विज्ञान किसान हमारा।
हर सीने पर लिखे तिरंगा हर जवान
अनमोल।
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
बोल बोल जयहिन्द!!!!!!!!!!!!
हिन्द की सेना की जय बोल
वन्दे मातरम् बोल ।
मानचित्र नयी सीमा खींचों
दुश्मन के लोहू से सींचों ।
नमक चुकाओ आँख न मींचों
मज़हब भाषा जात भूल
कर मिलो आज़ जी खोल ।
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
बोल बोल जयहिन्द!!!!!!!!
हिन्द की सेना की जय बोल!!!
छोङो छोङो अब रंगीनी ।
दुश्मन ने कमज़ोरी चीन्ही।
है नापाक़ इरादे ख़ूनी।
संगीनों की नोंक पे रख दो ।
सबकी साज़िश तोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम् बोल
वन्दे मातरम बोल
वन्दे मातरम बोल
बोल बोल जय हिन्द!!!
हिन्द की सेना की जय बोल
वन्दे मातरम् बोल
Jai hind!!!!
Written by Sudha Raje
©®
सुधा राजे
Dta-Bjnr
जयभारत
Aug 8 at 11:46am

वन्दे मातरम् बोल।

Sudha Raje
Sudha Raje
पढ़ना सुनना आता हो तो पत्थर
पत्थर बोलेगा
जर्रा जर्रा,पत्ता पत्ता अफसानों पे
रो लेगा
वीरानों से आबादी तक
लहू पसीना महका है
शर्मनाक़ से दर्दनाक़
नमनाक़ राज़ वो खोलेगा
हौलनाक़ कुछ हुये हादसे
लिखे खंडहर छाती पे
नाखूनों से खुरच
लिखा जो, इल्म शराफ़त
तोलेगा
कुएँ बावड़ी तालाबों
झीलों नदियों के घाट तहें
खोल रहे हैं ग़ैबी किस्से
पढ़ के लहू भी खौलेगा
आसमान के तले जहाँ तक
उफ़ुक ज़मी मस्कन से घर
कब्रिस्तानों से
श्मशानों क्या क्या लिखा टटोलेगा
चेहरा चेहरा एक रिसाला
नज़र नज़र सौ सौ नज़्में
हर्फ़ हर्फ़
किस्सा सदियों का वरक़
वरक़ नम हो लेगा
हवा ग़ुजरती हूक तराने
अफ़साने गाती सुन तो
"सुधा" थरथराता है दिल
भी ख़ूनी क़लम
भिगो लेगा
©सुधा राज

पत्थर पत्थर बोलेगा

Sudha Raje
Sudha Raje
पढ़ना सुनना आता हो तो पत्थर
पत्थर बोलेगा
जर्रा जर्रा,पत्ता पत्ता अफसानों पे
रो लेगा
वीरानों से आबादी तक
लहू पसीना महका है
शर्मनाक़ से दर्दनाक़
नमनाक़ राज़ वो खोलेगा
हौलनाक़ कुछ हुये हादसे
लिखे खंडहर छाती पे
नाखूनों से खुरच
लिखा जो, इल्म शराफ़त
तोलेगा
कुएँ बावड़ी तालाबों
झीलों नदियों के घाट तहें
खोल रहे हैं ग़ैबी किस्से
पढ़ के लहू भी खौलेगा
आसमान के तले जहाँ तक
उफ़ुक ज़मी मस्कन से घर
कब्रिस्तानों से
श्मशानों क्या क्या लिखा टटोलेगा
चेहरा चेहरा एक रिसाला
नज़र नज़र सौ सौ नज़्में
हर्फ़ हर्फ़
किस्सा सदियों का वरक़
वरक़ नम हो लेगा
हवा ग़ुजरती हूक तराने
अफ़साने गाती सुन तो
"सुधा" थरथराता है दिल
भी ख़ूनी क़लम
भिगो लेगा ©सुधा राजे
Dec 24, 2012

माँ की बङ बङ

Monday via Mobile
दिन भर बङबङ बङबङ बङ!!!!!
माँ है कि
एफ एम चैनल
जी करता है कोई म्यूट बटन
होता तो वॉल्यूम जीरो कर देती।
बाउजी कुछ नहीं कहते
बस कभी कभी जब बङबङ
ज्यादा हो जाती है कहीं बाहर निकल
जाते हाथ ठोक देते हैं ।
लेकिन माँ हैं कि तब और
ज़्यादा बङबङाती है ।
कभी कभी सोचती हूँ ये माँयें इतना बङबङ
क्यों करती हैं ।
बङी दया भी आती कभी कभी ।
मगर अक्सर मैं झल्ला ही जाती हूँ।
दादा की दवाई
पापा के कपङे जूते टाई
भैया की फीस नाश्ता ट्यूशन
मेरा भी हर वक्त पहरा
कहाँ थी? क्या पहना? किससे बोली?
वो कौन था? ये क्लिप कब ली?
पूजा नहीं छोङी कितने दिन बाक़ी है?
उफ्फ उफ्फ!!!!
ये माँ है या वाच टावर या आई बी.?
एक दिन बस यूँ ही कह दिया मैंने भोपाल
वाली मौसी से ।
आज तक पछताती हूँ ।
क्या बोली वो पता है??
ये
तेरी माँ मेरी जीजी कभी माँ से ऊपर कुछ
बन ही नहीं सकी।
पाँच साल की हम दोनों को सँभालने
लगी ।
दस साल की रसोई
पंद्रह की हुयी तो अम्माँ को
सत्तरह की सारा घर
और जब सबको इसने गोद ले लिया
तो सब बच्चे बिछुङ गये इसके।
ससुराल
आयी तो वहाँ भी डोली से उतरते
ही माँ बन गयी ।
और जब
खोजा सहारा तो मिली दुत्कार ताने
मार गालियाँ।
अब इतना सह पी झेल घोंट
गयी कि जीजाजी भी हार गये जीवट के
आगे।
जीजी जल गयी
माँ मर गयी
मर गयी औरत
रह गये सूखे कर्त्तव्य और गाँठें
लगा लगाकर जोङे रूखे नाते।
वह तो बस एक ढोलक बची है ।
ताङना की अधिकारी नीच नारी।
वह
चुनौती देती है
मारो मारो और मारो
क्योंकि अब जितनी ताङना
उतना ही शोर
मैं कई दिन से महसूस कर रही हूँ।
माँ चकित है
मैं अब जरा भी नहीं झल्लाती
बस हाथ बँटा लेती हूँ।
किंतु माँ फिर भी खुश नहीं है
यही
तो एकमात्र उपयोगिता रह
गयी थी उसकी
वह अब
ढोलक से स्त्री कैसे बने?
मैं
शायद उसकी माँ लगने लगी हूँ उसे
वह चुपचाप मेरी बात मान जाती है।
बरसों बाद वह रो पङी बस यूँ
जैसे भीगी सीली ढोलक कम आवाज़
करती है
आजकल माँ
बङ बङ नहीं करती
©®sudha Raje
Aug 1

पत्थर चाकू लेकर सोये

Sudha Raje
पत्थर चाकू लेकर सोये
गाँव शहर से परे हुये
रात पहरूये बरगद रोये
अनहोनी से डरे हुये
कब्रिस्तान और शमशानों
की सीमायें जूझ पङीं
कुछ घायल बेहोश तङपते
और गिरे कुछ मरे हुये
रात रात भर समझाती है
पायल वो बस धोखा है
ख़त चुपके से लिखे फ़गुनिया
जब जब सावन हरे हुये
फुलझङियाँ बोयीं हाथों पर
बंदूकों की फसल हुयी
जंगल में जो हरे कुञ्ज थे
लाल खेत हैं चरे हुये
बारीकी से नक्काशी कर
बूढ़े नाबीने लिख गये
पढ़ कर कुछ हैरान मुसाफिर
रोते आँखे भरे हुये
ज्यों ज्यों दर्द खरोंचे मन की
कालकोठरी पागल सा
मेरे गीत जले कुंदन से
सुधा "हरे दुख खरे हुये।
©®sudha raje
Jul 20

साँवली का घर

Sudha Raje
सांवली लङकी
सोचती रही देखती रही एक सपना ।
एक घर हो अपना।
रेत पर पाँव जमाये कितने ही घरौंदे
बनाये।
ये अहाता
ये बगीचा
ये चारदीवारी
ये बैठक ये दफ्तर
ये रसोई
ये भंडार
ये पूजाघर।
ये अतिथि कक्ष
ये मेरा कमरा
ये गाय का
ये कुत्ते का
ये संतरी का
ये बङों का
ये बच्चों का
ये कमरा सबका।
लेकिन यथार्थ रेत तो नहीं ।
मिट्टी कम पङ गयी कम पङ गयीं ईटें
पत्थर पानी समय और सहयोग
अगला घरघूला बना माटी का चौका चूल्ह
जिसमें कमरे रह गये बस चार
कुत्ता गाय
गाङी संतरी को मिला बरामदा और
कमरे हो गये छोटे।गुङियों की शादी में
सब बैठे खुले आकाश तले।
किंतु यथार्थ
गुङियों का घरघूला ही तो नहीं!!!
सांवली को गोरा करने की तमाम
कोशिशें थक गयीं ।
घर की कल्पनायें
गोरे रंगरूप पर अटक गयीं
बार बार हलदी चंदन उबटन फिर
नहीं मिला वर की पसंद का तन ।
एक समझौता हुआ रंग के तराजू पर तुल
गया बाबुल का बटुआ।
घर अब
और छोटा हो गया
सांवली की जगह उसमें और भी कम ।
एक कमरा एक बिस्तर वह भी आधा ।
अब नहीं था मरज़ी का मोहन
संझा की राधा।
हर तरफ आदेश उपदेश और श्रम का निवेश।
सपना फिर उङ चला ।
चल किसी नये बङे शहर चलें
जी मचला
बना लिये मानचित्र
पसंद के कमरे
कमरों के मनमाने चित्र।
अखबार जब आता।
विज्ञापन के घर पर दम अटक जाता ।
पचास लाख!!!!!!!!!
और
सपने हो जाते खाक़
एक दिन सपना धूल मिट्टी से अँट गया
घर छह टुकङों में बँट गया।
सांवली
दिनों दिन बुढ़ाती जाती
फिर फिर फिर घर का सपना सजाती।
पूरा कमरा
पूरा बिस्तर
पूरा दफ्तर
पूरी आलमारी।
मन ही मन करती रोज पसंद के घर में
गृहप्रवेश की तैयारी।
कहीं नहीं है आज भी जो घर ।
बच्चे हो गये सयाने बङे और समझदार
विवाहित होते ही घर टुकङे हो गये
चार।
दो टुकङे मिले सांवली को
कौन समझाये बावली को ।
एक कमरा कमरे में अब भी गत्ते काँच
का खिलौना घर।
एक रसोई
झमाझम जिसमें हर रात रोई
घर है कि कहीं नहीं है
लेकिन
सपना छोङ दे सांवली
अब तो मुझे भी लगता है
ये कहना सही नहीं है।
पिछली दीवाली पर बङा बेटा पोती के
साथ रहने आया
सांवली ने छत पर माटी का बङा सा घर
पोती की गुङियों के लिये बनाया।
घर
?कौन कहता है दीवारों कमरों से
बनता है।
इसे तो औरत का दिल
बच्चों ही की तरह लहू लहू हो
हो कर जनता है।
©®सुधा राजे
Sudha.Raje
Aug 6

प्रवासी देश की माटी

Sudha Rajeप्रवासी बेटी परदेशी।।



रोली हल्दी धर टीका कर थाती आँचल
छाँव
की

अम्माँ मेरी पठौनी धर ये माटी मेरे गाँव
की।
बाबुल मेरी पठौनी धर ये माटी मेरे गाँव की।


थोङा नीर नदी का थोङी धोवन तेरे
पाँव की।


अम्माँ मेरी पठौनी धर ये माटी मेरे गाँव
की

1-पईयाँ पईंयाँ जब लरकैयाँ चली पकङ
बाबुल की बईंयाँ
उतर घुटरूअन चाटी माटी
मार सपाटे ले
गई कईंयाँ
माटी बालेपन की गुईंयाँ ''''''यादें छूटे
ठाँव की
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की

2-बेर मकोर करौंदे
टेंटी कैंथा इमली झरबेरी
डाँग जलेबी होरे भुट्टे महुक कसेरू और कैरी
ज्वार की रोटी दूध महेरी "काँय"1वीर
के नाँव की"
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की


2--माटी के शंकर गनगौरें हाथी घोङे
माटी के
एङी गल गुच्ची घरघूले दिया गिंदौङे
माटी के
मिट्टी के चूल्हे बाशन
चक्की हाँडी गुङियाओं की
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की


4--मिचकी पींग हिलौंरे होली कीच रंग
की वो भँग की
कोहनी घुटने छिले
मली वो माटी बूटी अँग अँग की
केश धो रही भाभी खा गयी सौंधी महक
कथाओं की
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की
5-
माटी मेरे देश की माटी हा बिछुङे
परिवेश की माटी
पूरे संस्कार संस्कृति की गुरूओं के उपदेश
की माटी
सत्ती माई के चौरे की भस्म तेरी चिंताओं
की
अम्मा मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की
©®¶©®¶
SUDHA RAJE
DATIA**★Bijnor
Jan 29

जिंदगी कोई गुलाबी खत नहीं

ज़िन्दग़ी तेरा गुलाबी ख़त नहीं सपना नहीं ।


तल्ख़ियों ने ये सिखाया है कोई अपना नहीं ।


चाँदनी के छोर पर जलता हुआ तारा नहीं ।
सिर्फ़ शब ख़ेज़ी नहीं है वक़्त उजियारा नहीं ।

ज़िन्दग़ी कोई सुनहरा पर नहीं ना शायरी ।


लब सिले जलती हुयी आतश में पहली डायरी ।

जिंदग़ी धङकन नफ़स या ज़िस्म की हरकत नहीं ।

आँसुओं से तर ब तर वालिश पे ग़ुम बरक़त नहीं ।

अब सुधा कहना भी कहना सा मेरा कहना नहीं ।
जिंदग़ी कोई ग़ुलाबी ख़त कोई सपना नहीं ।
©®™ all the rights ®सुधा राजे 1:20AM

Friday, 25 October 2013

पगली माँ और पाप का बच्चा

Sudha Raje
Sudha Raje
पेट में बच्चा नहीं बाबू
किसी का पाप है
???????
पर वो पगली क्या बताये
कौन इसका बाप है!!!!
रात को फुटपाथ
पर सोयी बिछाकर
वो ज़मीं
आसमां नोचे
गया किसको यहाँ
संताप है
???
चार दिन से कुछ
नहीं खाया जलेबी
लूट गयी
देह मैली किंतु औरत
का बदन अभिशाप है
कोई
भी उसका नहीं छूता कटोरा भीख
का
खा गये हैवान जिसकी
रूह तक हम आप है
कौन थे वो लोग जो इक
रात इसको छोङ गये
एक तो लङकी वो भी
पागलअभागिन शाप है
खूब चिल्लायी वो रोयी
कोई भी जागा नहीं
बस सुनी गयी रात
कई-कई
जोङियाँ पदचाप है
पेट लेकर घूमती थी
रोज पत्थर मारती
मर्द को देखे तो चीखे
साँपअल्ला साँप है
खूब हँसते हैं तमाशाई दुकानें
खोलकर
चीथङों पर रक्त
देखो तो कलेजा काँप है
प्यार से
दो रोटियाँ कपङा दिया तो रो पङी
दर्द है बोली बहिन जी
औऱ् बदन में ताप है
कल छप़ा अखबार में
बच्चा जना फुटपाथ पर
अब लिये हँसती है रोती
क़ल्मा है या जाप है
भेङियों की नस्ल के
वहशी हैं बस्ती में छुपे
कौन है अगला निशाना
खोजते नई माप है
आप नैतिकता की बातें
धूप में समझा रहे??
रात ने क्या डँस लिया
क्या इसका पश्ताचाप है
कौन पालेगा ये पागल
कोख का फल पाप का??
क्यों तुम्हारी संस्कृति में
जात मजहब खाँप है???
अब भी उस पर गीध वाली
घूरतीं नज़रें कई
कोई जो आता निकट
वो चीखती आलाप है
क्या समाजों की दुहाई??
सभ्यता इंसाफ क्या
हम जरा सा रो लिये बस
आप भी चुपचाप हैं
क्या कभी सोचा "हरामी"
शब्द का क्या अर्थ है??
क्या बनेगा ये बढ़ा होकर
कोई अनुमाप है??
कौन??? पूछेगा सुधा ये
कौन मजहब धर्म था???
उफ कि बस कैसे कहूँ
वो पापिनी निष्पाप है
©®¶©®
Sudha
Raje
Dta★Bjnr
Mar 5

रो बैठे

सबके ग़म की भीङ में अपना दर्द भुलाकर
रो बैठे ।
इक अंजानी बच्ची पथ पर गले लगाकर
रो बैठे ।
लबे सङक हर उजङी कुटिया आप
कहानी बयाँ करे ।
जले गाँव में सब घर की तसवीर दिखाकर
रो बैठे ।
रात रात भर पके "खथा' से दूखे नयन
नहीं सोये .(Foda)
भोर पहरुये बस्ती को झकझोर जगाकर
रो बैठे ।
सुधा जहाँ तक नज़र सोचती मिले
कारवाँ दर्दों के ।
दिल के दुखते घाव बदन
की पीर छिपाकर रो बैठे ।
©®SudhaRaje
जंगल जंगल खबर फैल गयी जब जब आये
शिकारी कुछ।
चंद रोज़ बच्चों को दाने नीर चुराकर
रो बैठे
Sunday at 8:24pm8-8-2013

सुधा दोस्ती दिल की है या फिर है असबाबों की

Sudha Raje
तुमने उसका घर ही देखा ।
दिल ज़ज्बात नहीं देखे ।
मैले कपङे तो देखे दुख सुख में साथ नहीं देखे

वो उधार
की चापलूसियाँ क्यों करता क्या ग़रज
उसे

तुमने झूठा दोस्त कहा आँसू इफ़रात
नहीं देखे ।
उसके घर की ईँटों से तेरे संगेमरमर
को क्या????
तू ने आह भरी तो उसने दिन औ रात
नहीं देखे ।
शिक़वा तेरे जलसे में जो ना आ पाने
का तुझको है ।
नौनिहाल बीमार हैं उसके ग़म हालात
नहीं देखे ।।
बेशक़ तू मुख मोङ गया पर वो तो अब
भी याद करे ।
ईद पे ईदी शीर इतर हलुये शुबरात
नहीं देखे ।
सुधा दोस्ती दिल से दिल की है या फिर
असबाबों की ।
सस्ती थी सौग़ात दुआ में उठते हाथ
नहीं देखे।
©Copy right सुधा राज
May 25

बागी देश

Sudha Raje
चंबल जंगल सहरा बागी ।
हिमशेखर कश्मीर ।
पंचनदी सतभगिनी बागी सुधा विन्ध्य
की पीर।
©सुधा राजे
कच्छ कछार दुआबों चलती बारूदी बरसात

धधक रही सूखी अरावली ।
नीलगिरी रव रात ।
सुधा धुँधाता भद्रदेश है बहका मध्यप्रदेश

खादर बाँगर भाभर जूझे ।
किधर शांतिमय देश????
नेताओं के राजभवन में ऐयाशी के ठाठ ।
गाँव जहाँ पग धरे नही अब तक वो देखें
बाट
थप्पङ जूता गाली लाठी बम बारूद
विचार ।
मोटी चमङी अब तो चेतो शत्रु
रहा ललकार ।
मंदबुद्धि तो नहीं कि ना जानो क्या हैँ
व्यापार ??
भूखों के घर कौन भेजता
आयातित हथियार ।
सुधा खून में ज़हर बो रहा लाल
सलामी सोच ।
नेता और प्रशासक डूबा लेने में उत्कोच
धरती माँगे लहू -नमक
सुन ज़ंग लगी शमशीर!!!
जो जो हो ग़द्दार वतन धर टुकङे टुकङे
चीर
©®¶©©सुधा राजे
Sudha Raje
May 28 at 3:25pm

मनचल मनचल तुम साजन

Sudha Raje
मन के वन को जेठ जिंदगी
सावन बादल तुम साजन!!!!
थकते तन को मरुथल सा जग
मनभावन जल तुम साजन!!!!
पाँव के नीचे तपी रेत पर छल के
गाँव सभी नाते ।
कङी धूप में हरा भरा सा शीतल
अंचल तुम साजन!!
आशाओं के शाम सवेरे दुपहर
ढलकी उम्मीदें ।
निशा भोर से पंछी कलरव चंचल-
चंचल तुम साजन ।
सुधा परिस्थियों के काँटे
नागफनी के दंश समय
हरे घाव पर चंदन हल्दी रेशम
मलमल तुम साजन!!!
डरे डरे दो नयन अँधेरों से रस्मों से
घबराये ।
स्मित अधर सरल आलिंगन ।
मंचल मनचल तुम साजन
इकटक लक्ष्यबेध शर लेकर ।
मैं भूली कर्तव्य सभी ।
मेरी सफलता पर खुशियों के ।
नयना छल छल तुम साजन!!
®©¶सुधा राजे ।
©Sudha Raje
May 5

निशा तुम्हें बुला रही

Sudha Raje
मंद्र मदिर तंद्र पवन गुनगुना रही ।
मत्त मधुर तप्त गगन को सुना रही।
भुवन मोहिनी सुरो पे धुन
बना रही ।
निशा किसे बुला रही ।
निशा किसे बुला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।।
ये किसकी याद आ रही ।
पल्लवित सुमन सुवास से भरे भरे ।
उल्लसित ये द्रुम हुलास से हरे हरे ।
चंचरीक पुष्पराग तन झरे झरे
पुंडलीक मन नयन सपन डरे डरे ।
जिन्हें विभा रुला रही ।
जिन्हें विभा रूला रही ।
ये किसकी याद आ रही
ये किसकी याद आ रही ।
©®¶©®सुधा राजे ।
निष्पलक मृगांक देखता विभोर हो।
ज्यों पुलक विहंग वंशिका किशोर हो ।
परिश्रांत परिश्लेष पोर पोर हो ।
ध्रुव नक्षत्र ज्यों पलक की कोर कोर
हो ।
हृदय लता झुला रही।
हृदय लता झुला रही
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
©®¶©®
सुधा राजे
मद्गलीन ज्योत्सना में शीत लीनता ।
दूर पंथ पार सरित् वन्हि क्षीणता।
बिंब सर हिमांशु तङित् की प्रवीणता।
तरू मधूक छाँव नृत्य मन नवीनता ।
मदन सुधा पिला रही ।
मदन सुधा पिला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
Sudha Raje
Copy right
all ®¶®©
May 30

पा लिया सर्वस्व खोकर जो वही भव सार था

प्रेम झंझावात् सा आया उङा कर ले
गया ।
इस जगत् की वाटिका में जो भी कुछ
निस्सार था ।
थे अपरिचित से कई नाते कई संबंध भी ।
तोङ डाले सूखते द्रुम व्यर्थ जो
विस्तार था ।
थी त्रिपथगा नेह की मन आत्मा तन
जीव जग ।
उत्तप्लवन में बह गया सब मैल
जो अधिभार था ।
आँसुओं ने धो दिये सारे कलुष हर
कामना ।
प्रेम डूबी सुक्ति मुक्ता शुद्ध
शुचि संसार था ।
खोये बिन पाता नहीं कोई यहाँ कुछ
भी सुधा ।
पा लिया सर्वस्व खोकर जो वही भव
सार था ।
©सुधा राजे
sudha Raje
May 29

भँवरी हुये सिरानी सरिता

Sudha Raje
Aug 16 ·
दिल में कुछ होठों पर कुछ है कलम लिखे कुछ
और सुधा।
जहां न हो ये हलचल इतनी चल चल चल उस
ठौर सुधा।
कल तक थी उम्मीद रोशनी की घुटनों पर
टूट गयी।
अक़्श नक़्श ज्यों रक़्श दर्द का ये है कोई
और सुधा।
किसे समझ
आयेगा वीरानों का मेला कहाँ लुटा ।
कौन सजाये नयी दुकाने रहे परायी पौर
सुधा।
बाँध लिये असबाब बचा ही क्या था बस
कुछ गीत रहे।
भँवरी हुये सिरानी सरिता
रही एक सिरमौर सुधा।
©®Sudha Raje
Dta-Bjnr

Thursday, 24 October 2013

रस्ते पर मर जाना है

Sudha Raje
रिश्तों की दुनियाँ से आगे बढ़ कर देख
ज़माना है ।

मरना सीख लिया हो जिसने उसने
जीना जाना है ।

नफ़रत के बदले में नफ़रत प्यार के बदले प्यार करे ।

हमसे पूछो क़ातिल का घर दिल से रोज़ सजाना है।

सिर पर छत हो पेट में रोटी पैरों के नीचे धरती ।

तो फिर तुमने किया नया क्या
बस दिल को बहलाना है ।

जंज़ीरों का नाम नया था कंगल पायल नथ बिंदिया।

दीवारों से परे कोहकन साँसों से पिघलाना है।

बस्ती बस्ती वही मुहब्बत की झूठी बातें सुनकर ।

सपने देख जल गयी तितली
जंगल को कट जाना है ।

सूखे सूखे फूल महकते वरक वरक़ पर दरक उठे ।

नम आँखों की बूँद से कल तक ये अक्षर धुल जाना है।

रुको अभी वो बात बतानी थी जो शब्द नहीं कहते
अंगारों पर फूल खिले हैं और मुझे मुस्काना है।

जाने कैसे पा गये वे सब अपनी मंज़िल
बस यूँ ही

हमने राह बनायी थी पर रस्ते पर मर जाना है ।

सुधा समय की रेत ही नहीं क़िस्मत के
पत्थर पर लिख।
बाक़ी सोज़
दिलों की जिंदा जलता वही तराना है।
©®™सुधा राज

घर स्त्री की टाँगों से बँधा होता है

ऐ लङकी!!!!!!!!
ओये छोकरी!!

बहुत मॉडर्न हो गयी????
अब ये भी सुनती जा

बक बक बक करने से तेरा फ़लसफ़ा सब नहीं मानने लग जायेंगे!!!!!!!!

देखा ही क्या है तूने अभी???

कभी पीठ पर बूढ़ा बाप ढोया?
कभी खाँसती हुयी दादी को रात में पानी गरम करके लौंग भूनकर दी??

कभी प्रसूता भाभी के नन्हें के पेट पर जाङे की रात में हींग मलकर गरम रूई बाँधी????

जा पहले जाकर गाँव गाँव घूम
देख कि पानी भरे कीचङ वाले धान के खेत में घुटनों तक खप खप कर चलती
अगहनिया जब पटेला पर बैठे ललकू को देखती है तब पीछे पीछे बैल हाँकता
पसीने से तर बङकू की मछलियाँ उछलकर उसके घूँघट को उङा देती है और आँखों
में कौंध जाता साँस तक महकता सुनहरा सेला चावल गमकौआ बासमती मुट्ठी में
लेकर पारण करती नवान्न पर गोवर्धन का भोज गजरभत्त होकर तेरे

ठेलों ढाबों होटलों की पिज्जा बरगर चाऊमीन को कूङे से ज्यादा कुछ नहीं मानता ।

क्योंकि पनेसर की नवोढ़ा फालिज मारने पर छोङ नहीं जाती ससुराल

अङकर कमाती है गाय गोबर गेवङा और गेंहूँ से ।
क्योंकि
सङक किनारे गवार फली गुल्लक और गंडेरियाँ बेचती गिन्निया की पतोहू का जी
कब्बी नहीं ललचाता

अंडे चाट आईसक्रीम छोले पटाके गोलगप्पे टिक्की समोसे कटलेट कबाब पर ।

वह सारा दिन भूखी रहकर शाम को घर जाकर फिर मजूरी से लौटे मरद और कारखाने
से लौटे बालकों को भोजन पकाकर देने के बाद बासी रोटी नमक मिर्च अचार से
खाकर खिलखिला सकती है ।
और तब थैले से रेवङी गजक निकाल कर मुनिया को दे सकती है जब बरसों से
बालूशाही का मन भूल गयी।
जब गोदी में तीसरा बच्चा लगातार दूध चूसता रहता है और सूत अँटेर सकती है
देर रात तक

उसको आता है सौ के सौ भेङियों कुत्तों गीदङों कौओं से अपना बदन छिपाकर
भी दिनभर सङक किनारे रुपिया गिनकर घर लाना और रात को ठाठ से दोनो तरफ
बच्चे चपेटकर सो जाना अपनी झिलगी खाट पर ।

वह फालिज की दवा लगाते चार गालियाँ खाकर सास के लिये पानी का घङा भर कर
रख जाना नहीं भूलती और न ही कभी भूलती है कंधा हथेली छूने को बढ़ते मेट
आङतिया और सब्जी लेने वाले बाबुओं को डपट देना ।

तुम नहीं समझोगी
वह किसी जिम नहीं जाती लेकिन तुम्हें मरोङ सकती है
औऱ
लगातार संयम की पराकाष्ठा के शिखर पर खङी रह सकती है जब

हरे दुपट्टे ओढ़कर तुम हर दसवें मरदाने चेहरे पर हवस पढ़कर भी अनजान बनी
रहती हो नौकरी के वास्ते

वह फङ की जगह बदल कर फेरी लगा सकती है
क्योंकि जब तुम अपने पाँचवे बॉयफ्रैंड से ब्रेकअप पर थीं

वह सोच रही थी मेरे गिन्नी से ज्यादा खूबसूरत मर्द दुनियाँ में कोई हो
ही नहीं सकता

तब जब तुमने पहली बार ताना मारा था मंगेतर को कमाई का
वह
चुपके से पायल बेचकर मालिश का तेल खरीद रही थी।
और
जब तुम बॉस की गिजगिजी बातों पर हँस रही थी
वह पुङियाँ बाँट रही थी बच्चों को हलवे के साथ क्योंकि गिन्नी चलने लगा
था।और एक लात जोर की गुस्से में कमर पर पङी क्योंकि
वह नहीं चाहता कि धनियाँ
अब भट्टे पर जाये ।
वह
हँस रही थी और बक रही थी तमाम गालियाँ
सात पीढ़ी को

तब जब तुमने महसूस किया कि कंपनी मालिक
तुम पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान है तो क्यों न शादी करके सैटल हो जायें वह
बीबी बच्चे तलाक़ दे तो रहा है
तब कल्ली ने भूरे को जमकर पीटा वह
सुन आई थी शहर की नीली बस्ती गया था ।

तुम नहीं समझोगी
क्योंकि -""घर कभी कहीं नहीं जाता
जाते हैं घरवाले-""

कभीं से भी घूम भटककर
सब रास्ते घऱ आ जाते हैं
क्योंकि
घर औरत की टाँगों से बँधा होता है
कहीं ऐसा न हो घर चल दे
राह भटक जाये
तो बित्तू बाबा कैसे खोजेंगे
लाठी
औऱ मुनिया पढ़कर आय़ेगी तो किसकी दीवार डाँट खायेगी कि अभी लीपापोती की
थी अभी फिर लिख दिया
??कर्ज़ा बढ़ायेगी क्या
लिखने पर!!
"घ-से घर मीन्स होम
चाहे वह झोपङा हो या हवेली
©®™Sudha Raje
सुधा राजे

Wednesday, 23 October 2013

माँ हो तुम

Sudha Raje
माँ हो तुम!!!!
और माँ ही रहना ।
तुम्हारी सृष्टि का मूल कारण है ।
माँ और माँस भर बनने के बीच का एक
पतला सा अंतर ही तुम्हें ।
तेज से तज
बना देता है ।
यह भार भी है और प्रकृति का आभार
भी ।
संपूर्ण जङ चेतन कहे अनकहे
अपनी अपनी जननी का ऋणी है हर जीव

माँ हो तुम तब भी जब माँ की कोख में
हो।
माँ हो तुम जब माँ की गोद में हो ।
माँ हो तुम जब तुम शिक्षा प्रशिक्षण और
संयम की चरम पराकाष्ठा के परीक्षण से
गुजर रही हो ।
माँ हो तुम तब भी जब दैहिक विकृति ने
माँ बनने का हक़ छीन लिया और प्रजनन
की शक्ति नहीं रही तब भी ।
माँ हो तुम तब भी जब प्रेम के उद्दाम
ज्वार में अपना अस्तित्व बिसर गयी तब
भी ।
ये सारा तिलिस्म
ही सृष्टि को पुनर्जीवन पुनर्नवीनीकरण
करते रहे जाने की ही निरंतरता का व्यूह
है।
माँ तुम ही रहोगी
तब भी जब तुम निर्णय कर
लोगी किसी को भी जन्म न देने का तब
भी ।
तुम जिस जिस दिन ये माँ होना भूल
जाओगी सदा को ।
तुम नष्ट हो जाओगी ।
क्योंकि
धरती नदी स्त्री और प्रकृति
कभी लेती नहीं देना ही धर्म है
उनका धारण करती है वह दाता होने
का शाश्वत अविरल प्रवाह।
जब जब कोई भूलता है
तुम्हारा माँ होना ।
वह
कृतघ्न नष्ट हो जाता है ।
पिता के लिये पुत्री माँ है
भाई के लिये भगिनी माँ है
देवर के लिये भाभी माँ है
माँ है पौत्री दादा के लिये
और दोहित्री नाना के लिये
माँ है भाँजी मामा के लिये
और भतीजी काका के लिये माँ है ।
पत्नी है माँ क्योंकि वह देती पुरुष
को पुनर्जन्म और पुत्री के रूप में
माँ का नवीन विग्रह।
पत्नी की बहिन भी माँ है क्योंकि वह
पुरुष के बच्चों की "माँ सी" है।
जिसे जिसे याद रहा वह वह महान
युगप्रवर्तक बना।
ईसा
बुद्ध
विवेकानंद
दयानंद
रविन्द्रनाथ
गाँधी।
भगतसिंह
लाल बाल पाल
कबीर
सूर
रैदास
वाल्मीकि
जो भूला कि स्त्री माँ है
वह वह
कंस रावण दुर्योधन दुशासन बालि ।
रक्तबीज
महिष
जो भी भूला स्त्री का माँ होना
प्रकृति नदी पृथ्वी स्त्री और ब्रह्माण्ड
मातृहंता को कभी क्षमा नहीं कर सकते ।
क्षमा नहीं मिलेगी कभी पृथ्वी को नदी
वह माँ होना अस्वीकृत करके
अपना क्षीर नीर द्रुम फल नष्ट करने
लगेगी
यह
सारा ब्रह्माण्ड जिस नियम से बँधा चल
रहा है वह है प्रेम मातृत्व पोषण और
त्याग करने दुःख सहने
की तुम्हारी क्षमता पर
क्या तुम समझती हो???
केवल उत्तेजना की भौंडी मूर्ति का मांस
भर माप नहीं हो तुम ।
???©®™Sudha Raje
सुधा राजे
14 minutes ago

Tuesday, 22 October 2013

मजदूरी ते इब थारी तकदीर बणैगी नेत्ताजी

Sudha Raje
Sudha Raje
मेहनतक़श की हिम्मत
हीS ज़ागीर
बनेगी नेता जी।
मज़दूरी ते इब थारी तक़दीर
बणेगीं नेता जी।
कामचोर कामी ज़नसेवक
नमकहरामी जो करता
कराधान से हम Uपिसते
वो पिश्ते खा साँसे भरता
तणें बाँधणें कूँ घर घर
ज़ंजीर
बणेंगी नेता जी।
ये किराये के गुंडे चमचे
जो तेरी जूठन पलते
हम किसान मज़दूर खनिक
कारीगरD है दीपक जलते
चिंगारी हर गली सङक
तदबीर बणेगी नेता जी।
मेरे नौनिहाल hपलते है हाथ
पाँव आरी लेकर
खून हमारा रँग लायेगा aघर घर
अगयारी देकर
नन्हें rहाथों की छैनी
शमशीर बणेगी नेता जी।
ये 'आधा संसार'
हमारा aलिये कुदाली सुई
धागे
उधङेंगे jबखिया के टाँके
घर झाङू चूल्हे जागे
रूखी सूखी eरोटी हलवे
खीर
बणेगी नेता जी।
चिकने हाथ घूस लेते
जो हाय लगे सब जल जाये
जो ग़रीब का हक़ मारे
बद्दुआ लगे सङ गल जाये
कीङे पङें गिरे बिजली दुख
तीर बणेगी नेता जी।
खून सना इसमें गरीब
का महक रहा शोषण
भारी
चिकने कौर तुम्हारे मुँह में
और भूखी है लाचारी।
सपना है सच लोकतंत्र
ताबीर बणेगी नेता जी।
त्याग
तुम्हारा नहीं आचरण जब
तुममें नेतृत्व नहीं
आते क्यों हो किस लालच
में जनसेवा है नृत्य नहीं
सत्य अहिंसा त्याग
धीरता वीर
जणेगी नेता जी।
कमा कमा sकर भरा पाप
का घङा एक दिन फूटेगा
तुमसे बङाu लुटेरा कोई
काल तुम्हें भी लूटेगा
लहू
बेबसी की dआँखों का नीर
बनेगी नेता जी।
"सुधा "उठो hतो एक बार
हुँकार कि aधरती गगन हिले
चलो हाथ से हाथ जोङ
जनता rजनार्दन हृदय खिले
गद्दारों aकी कब्र
जगी हुयी jभीङ
बनेगी eनेता जी
©®¶©®¶
Sudha Raje
Dta★

Sunday, 20 October 2013

सुधियों के बिखरे पन्ने ::एक थी सुधा

सजना के लिये ------(सुधा राजे पुखराज सिंह)मो.76694896—9358874117/
———---bijnor@mrt.jagran.com
-*-*-*-*-*--*-
शादी जिद करके बिना दहेज की थी।
टीटोटेलर वर की जिद में । हालांकि अरेंज मैरिज थी परंतु इस के लिये आधा
दशक छानबीन की गई थी। राजपूताने से दूर सात सौ किलोमीटर बिजनौर ।
अनजानी बोली अनजाने रिवाज़ और अनजाने खान पान नितांत अनजानी संस्कृति
।बताने वाला कोई नहीं उपहास करने वाले सैकङों ।
महानगर से एकदम अचानक देहात के सबसे पिछङे एक कस्बे में ।

और वहाँ भी न सास ननद न देवरानी जेठानी ।न कोई सहानुभूति न अपनापन ।
एक वृद्ध ससुर जो मानसिक रोगी और एक कुटुंब जो ज़ायदाद के बँटवारे के
बाद से चिढ़ा हुआ था पति से ।

हमें बहू गृहलक्ष्मी की कहानी याद आ गयी जो बचपन में पढ़ी थी। साबित करने
की चुनौती थी कि बिना दहेज विवाह भी सफल हो सकते हैं और एक महानगर की
उच्चशिक्षित स्वावलंबी लङकी कृषक ग्रामीण परिवार को निभा सकती है ।
दो साल लगातार साफ सफाई और गृहस्थी जुटाने में हम दोनों ही अंधाधुंध लगे
रहे । हनीमून के दिन क्यारियाँ सुधारने और अधिक मेहनत करके पुराने बेढंगे
मकान के भीतर घर तराशने में लगे रहे बमुश्किल दो तीन बार ही नैहर गये और
घर की चिंता में तुरंत लौटे । जिस घर में दशकों से वृद्ध पिता और दिन भर
बाहर रहकर देर रात को घर आने वाले पुत्र के अलावा स्त्री तो क्या किसी
महिला का चित्र तक नहीं था । वहाँ अब हर जगह स्त्री स्थापित करना अत्यंत
दुरूह था ।
पहली करवा चौथ पर हम बुखार में तप रहे थे रात भर चाँद नहीं निकला और तब
अंदाज़ से जिधर चाँद था वहीं को घनघोर बारिश में एक घंटे देर से जल दे कर
पूजा की ।

दूसरी करवा चौथ ।पर पति दर्द से बेहाल थे । और हम लगातार उनके पैरों की
मालिश सिंकाई करते व्यायाम कराते नसें काली पङती जा रहीं थीं । कोई आडंबर
नहीं बस मूक हाहाकार मौन रुदन और प्रार्थनायें ।हर संभावित वज़ह को
डायग्नोसिस कराने की भीगदौङ। दुख ही दुख हर तरफ था । बङी बेटी होने के
बीस दिन बाद ही वे बिस्तर से चलने फिरने से लाचार हो गये । शादी के मात्र
सवा साल बाद ही ।
तीसरी करवा चौथ

मई में गाजियाबाद से दिल्ली और तमाम जगह से निराश होकर हम जयपुर पहुँचे ।
वहाँ पति का मेजर ऑपरेशन हुआ । बेटी गर्भ में थी पूरे आठ की । संतोकबा
दुरलभ जी अस्पताल की तीसरी मंजिल रोज चढ़ना और फिर रिक्शॉ से एक किलोमीटर
दूर जाकर पथ्य लाना । पति की शेविंग करना नाश्ता वार्ड में पकाना और
स्पंज देना बेडपेन नित्यक्रिया कराना । वे तब हिल भी नहीं सकते थे बिस्तर
से । हर बार पानी उबालना तब चम्मच से देना ।यूरीन बैग बदलना और पैरों की
लगातार मालिश सिंकाई और सब कुछ करना जो एक माह के शिशु से छह माह तक माँ
कराती है। कभी कभी पति कहते इतनी परेशानियाँ तो माँ ने भी नहीं उठायीं
होंगी। गर्भावस्था उल्टियाँ और साथ में दूसरी बेटी डेढ़ साल की ।
पर पति बेड पर थे । रीढ़ की हड्डी में विवाह से कुछ वर्ष पूर्व
एक्सींडेंट की चोट लगी थी जो तीन कशेरूकाओं में स्लिप डिस्क बनकर उभरी ।
ऑपरेशन सितंबर में जयपुर में नवरात्रि में हुआ वहीं लगातार नवदुर्गा व्रत
रखे और एक बच्चा गोद में दूसरा पेट में और पति बेड पर लिये हम अकेले जूझ
रहे थे अपने परिवार और अपने संकट से । गहने और ज़मीन बेचकर पैसे जुटाये
थे । ससुराल के सब रिश्तेदार तरह तरह की बातें बनाकर दूर हो गये और मायका
दूर था ही । धन पानी की तरह बह रहा था सब डरे हुये थे कुछ मदद न माँग लें
हम । ठान लिया कि किसी को कुछ नहीं बताना है ।
डॉक्टर काटजू डॉक्टर झणाणे ने जब अस्पताल से छुट्टी दी पति को ज्यादा देर
बैठने खङे होने से रोक दिया ।
आराम कराना जरूरी था लगभग सात आठ सौ किलोमीटर बिजनौर तब आना खतरनाक था सो
हम एक रिश्तेदार के घर बूँदी गये । वहाँ पङौस में एक कमरा किराये का
लिया और बच्ची के साथ रहते हुये पति की सेवा में जुट गये । हमारी हालत
दिनों दिन बिगङ रही थी रक्ताल्पता से चेरे पर गहरी काली झाँईया और तनाव
अनिद्रा से ब्लडप्रेशर हाई ।
करवा चौथ पर पुराने जेवर तुङाकर वहीं एक मंगलसूत्र बनवाया ।एक जोङी लँहगा
चूनरी खरीदी और व्रत रखा । डॉक्टर ने बारह नवम्बर तारीख दी थी प्रसव की ।
नौवा महीना चालू था ।
शाम को सब स्त्रियाँ बूँदी की बेहद ऊँची पहाङी पर "करवा चौथ माता ""के
अत्यंत प्राचीन मंदिर जाने लगी ।हम दोनो भी सबकी जिद पर रिश्तेदारों की
गाङी में बैठकर चले गये । नगर से दो तीन किलोमीटर दूर रात के आठ बजे ।
सब मंदिर चढ़ गये तेज गति से हमें गाङी के पास छोङ गये । मैं नवें मास की
गर्भवती और पति का अभी एक पखवाङा पहले ही ऑपरेशन हुआ था रीढ़ का। हम
दोनों ही चढ़ने लगे एक एक सीढ़ी साथ में पौने दो साल की बच्ची पता ही
नहीं चला कब हम तीन सौ सीढ़ियाँ चढ़कर पहाङी पर जा पहुँचे ।सब चौंक गये ।
हम दोनो दरबार में बस रो रहे थे बुरी तरह तरबतर आँसुओं से । और बच्ची
ताली बजा रही थी -"जय चौथ माता की माँ सा बापू सा कहो जय चौथ माता की "
आज विवाह के सोलह वर्ष बीत गये ।और हर करवा चौथ पर मन बूँदी की उस पहाङी
पर से माता के दरशन करके चाँद देखकर कहता है जय चौथ माता की ।
------पूर्णतः सत्य घटना । मौलिक लेख ।Copy right सुधा राजे

Friday, 18 October 2013

रात गये

रात गये .

Sudha Raje
जाने किससे मिलने आतीं '
सर्द हवायें रात गये

बस्ती से आतीं हैं सिसकती
दर्द कराहें रात गये

दूर पहाङों के दामन में
छिपकर सूरज रो देता

वादी में जलतीं जब
दहशतग़र्द निग़ाहें रात गये


चाँद को लिख्खे चिट्ठी
ठंडी झील बरफ के
शोलों पे


ख़ामोशी से कोहरे की
फैली जब बाँहे रात गये

परबत के नीचे तराई में
हरियाली चादर रो दी


फूलों कलियों की गूँजी
जब गुमसुम आहें रात गये

कितने आदमखोर मुसाफिर
रस्ते से गुजरे होंगे

मंज़िल तक जाने से डर गयीं
लंबी राहें रात गये

पेङ तबस्सुम नोंच के खा गये
नाजुक नन्ही बेलों के

धरती रोती शबनम भरके
मौत की चाहें रात गये

प्यार वफ़ा के गाँव में
अमराई
पर लटकी लाशें थीं


सुधा" मुहब्बत छोङ के चल
दी
पीपल छाँहे रात गये
©®¶©®¶SudhaRaje
Jan 23।2012/

Thursday, 17 October 2013

मन के दहके दावानल

Sudha Raje
तुम अपने सीने में आग दबा लेना ।
मैं अपनी हर आह प्रबल
पी जाऊँगी।
तुम बस आना नहीं गाँव मेरे अबसे ।
पीर प्रतीक्षा लोचन जल
पी जाऊँगी ।
मेरी सब स्मृतियाँ तुम
जो जला सको ।
मैं भी सुधियों के सब गीत बेच
दूँगी।
तुम पलकों पर मेघ छुपा लेना हँस के

मैं सावन भादों छल छल
पी जाऊँगी।
मिटा सको हृत्पट से जो तुम नाम
मेरा ।
मैं ये महाकाव्य धू धू कर फूँकूँगी ।
तुम पलाश वन से जो कभी न
दहको तो ।
मैं ग़ुलमुहर वाटिका दल
पी जाऊँगी ।
हर पल जमता एक हिमालय ।
एकाकी।
मेरे वक्षस्थल में नीर नहीँ होगा ।
तुम वह सिन्धु ज्वार सारा ।
जो थाम सको।
इंदु बिंदु ये निलय अधीर
नहीं होगा ।
तुम ऋतुओं का परिवर्तन
ठुकरा देना ।
मैं समीर क्रंदन चंचल पी जाऊँगी ।
चलो अपरिचित हो लें लौटें बिछुङे
हम ।
स्वप्न सत्य को सत्य बिंब में ढल
जाये ।
व्याकुल करूणा व्यथा वेदना रख
भी दो ।
मीत प्रीत का विरह नेग भी पल
जाये
सुधा तुम्हारी निष्ठा पर ।
कोई प्रश्न न हो ।
बहका दहका मन हलचल
पी जाऊँगी ।
©सुधा राजे ।

2-5-2012at 5:00am ·

हम औरत है घूरा

Sudha Raje
Sudha Raje
Sudha Raje
थोङा थोङा रोज़ मरे
तो कभी मर गये पूरा
हम औरत हैँ मुरदा बाबू
हम कूङी और घूरा
शहर रहे तो रहे फूलदान से
भये देहात बिटूरा
हम औरत है मुरदा बाबू
हम कूङी और घूरा
काहे का ये
का रोना धोना
पेट मरें या मरे बिछौना
मार मार कर मरे न मरती
मुई मौत भी करे खिलौना
औरत के मरते क्या रोना
जी जंजाल धतूरा
हम औरत हैं मुरदा बाबू हम
कूङी और घूरा
किलस किलस कर
पाली जावै
बिन माँगे जनमे जी जाबे
बढ़ै हाङ सी ताङ न चाहैँ
कितना बचा खुचा ही खाबै
मरन मरन की मन्नत खुद
ही माँगे
जिये अधूरा
हम औरत हैं मुरदा बाबू
हम कूङी और घूरा
पकङे इकले जबर कलाई
नोंचे खाबे स्यार कसाई
बाहिर रखते कुकुर खसोटें
भीतर मूस दूर के भाई
गुँथे हुये आटे सी किस्मत
सेंक जले भरपूरा
हम औरत है मुरदा बाबू
हम कूङी और घूरा
हमरी इज्जत का है?
बताशा!!!
जो भी खाये करे तमाशा
बाहर का जो लूटे कोई
चाहे शौहर तोङे आशा
धूल में मिलना मिलके
होना बूरा चकनाचूरा
हम औरत हैं मुरदा बाबू हम
कूङी हम घूरा
कोख हमारी खेत खतौनी
संताने परगेह पठौनी
नाम गाम क्या है
हमरा जी
परदेशी की पर घर
की होनी
ना माटी ना धान
ना गहना ना गुरिया ना धूरा
हम औरत हैं मुरदा बाबू
हम कूङी और घूरा
जीने का हक़ है का हमको
माँगे जो भी पूत बलम को
गंदा घर का साफ करें हम
ढोयें जुलम को सङे नियम
को
फेंकें बाबुल परदेशी घर
वो राखै मज़दूरा
बाबू
हम
कूङी
हम
घूरा
बाबू
आज मर गये पूरा
©®¶©®
Sudha
Raje
Dta★Bjnr
Feb 12

टूटे ताले हैं

Sudha Raje
दरवाजे है दीवारें हैं प्याले
और निवाले हैं
भरे भरे इस शहर भरे घर ताले हैं घरवाले हैं
रातें हैं बातें हैं चुपके
चलती मेल मुलाकातें
घातें ऊँची नीची जातें
घुटे हलक में नाले है
मिट्टी है चिट्टी है
मिटी है गाँव में माँ कच्चे
घर सी
खेत रेत हो गये बाप से
काँपे रसद रिसाले है
रंगे अह्मर redअबके
होली गोली तीखी बोली हुयी
बँटवारा निबटारा न्यारा
आलमआरा साले हैं
चुन चुन बरतन भाँडे छाँटे
काटे भाई भतीजे माँ
सारा का सारा घर डाँटे
छाँटे हंडे थाले हैं
सुधा कहानी वीरानी सी एक
निशानी बेगानी
अंजानी सी पीर
सयानी कही जुबाँ पे छाले
हैं
©®¶©©¶
Sudha Raje
DTA†Bjnr
Mar 10

व्यंग कविता ---लानत्त

Sudha Raje
औरतें यूँ सिर उठायें बोल दें !!!! लानत्त है
खुद रचें नयी संहिता पर खोल दें लानत्त
है
कह रहीँ है बेटियाँ अब
दफ्तरों को जायेगीँ
मर्द घेरें घर वो टालमटोल दें लानत्त है
घूँघटा कैसे उठेगा?? हौसले ही पस्त हैं
है दुल्हन पतलून में औऱ् बोल दें लानत्त
है
ट्रैक्टर पर गुलबती ने
ढो लिया खलिहान भी
एक विधवा जेठ को यूँ झोल दे लानत्त है
आज लङका देख के बबली ने ना कह
दी सुनो
शक्ल बंदर सी दहेजू मोल दें लानत्त है
रामधन की छोकरी चढ़
गयी कचहरी ब्याह को
वो भी दूजी जात का वर ढोल दे
लानत्त
है
औऱ तो सुनिये मिसिर
पुत्री ने काँधा दी अगन
ताऊ पट्टीदार छोङे पोल दे लानत्त है
मार के भुरकुस किये जाता था अब थाने में
है
कल्लुआ ज़ोरू को माफी
घोल दे लानत्त है
चल रही बंदूक भी गाङी चला कॉलेज
भी
नयी बहू शौहर रसोई तोल दे लानत्त है
©®¶©®¶
Sudha Raje
Feb 20

भूख और मुहब्बत

Sudha Raje
Sudha Raje
भूख जब हो गयी मुहब्बत से बङी ऐ
ज़िंदग़ी!!!!!!!

बेचकर जज़्बात लायी भात
मैं तेरे लिये

दिल से ज्यादा पेट में जब
आग हुयी ऐ बंदग़ी!!!!!!
ख्वाब
सी पिसती रही दिन
रात मैं तेरे लिये

बुतपरस्ती से
ख़ुदा मिलता न था रोज़े से
भी रोटियों लिखती रही सफ़हात मैं तेरे
लिये

टूटती रह गयी बदन
की ख्वाहिशें पर्दों में यूँ

बिक गयी थी खेत सी हर
रात मैं तेरे लिये


आग लग गयी जब मेरे
रिश्तों के पुल पर भीङ थी
तैरती मुर्दों पे थी हालात मैं तेरे लिये


गाँव में ग़ुरबत के जब सैलाब आया दर्द का
छोङ गये सब हाथ
खाली हाथ मैं तेरे लिये

हुस्न के परतौ पे आशिक़ भूख का मारा हुआ
नाचती रह गयी सङक
अबऱात मैं तेरे लिये

बस ज़ने -फ़ासिद थी उल्फ़त पेट के इस दर्द
को
मौत लायी कोख पर ज्यूँ
लात मैं तेरे लिये

सब चले गये छोङकर कल तक
जो मेरे थे वली
कब्र या ससुराल औरत ज़ात मैं तेरे लिये

एक टूटा ये कटोरा ज़िस्म, दीवारें क़बा
साँस माँगे भीख ज्यूँ ख़ैरात मैं तेरे लिये

चंद टुकङे काग़जों के कुछ निवाले अन्न के
चंद चिंथङे दम
सुधा ""औक़ात" मैं तेरे लिये

चाँद तारे फूल तितली इश्क़ और शहनाईयाँ
पेट भरने पर हुयी शुहरात मैं तेरे लिये

किस नदी की रूह
प्यासी हूँ मैं सबकी प्यास में
रेत
पी गयी शायरी क़ल्मात
मैं तेरे लिये

चंद गीली लकङियों पर
आखिरी कुछ रोटियाँ
जोहते बच्चे हुयी शह -मात मैं तेरे लिये

बाप
था ज्यादा कि बेटा कौन
भूखा क्या पता
खा गयी चोरी से आलू
सात मैं तेरे लिये

आज तक तो रोज़
मिलती रह गयी उम्मीद
सी

आयी ना खुशियों की वो बारात मैं तेरे
लिये
सब कुँवारे ख़्वाब पी गयी ये
ग़रीबी की हिना ।
तीसरी बीबी सुधा ग़ैऱात मैं तेरे लिये
©®¶©®¶
Sudha Raje
Mar 3।2013/
·

पत्थर चाकू लेकर सोयेगाँव शहर से परे हुय

Sudha Raje
Sudha Raje
पत्थर चाकू लेकर सोये
गाँव शहर से परे हुये

रात पहरूये बरगद रोये
अनहोनी से डरे हुये

कब्रिस्तान और शमशानों
की सीमायें जूझ पङीं

कुछ घायल ,बेहोश ,तङपते
और गिरे कुछ मरे हुये

रात-रात भर समझाती नथ-
पायल ,वो बस धोखा है

ख़त चुपके से लिखे फ़गुनिया
जब -जब सावन हरे हुये

फुलझङियाँ बोयीं हाथों पर
बंदूकों की फसल हुयी

जंगल में जो लाल कुञ्ज थे
आज खेत हैं चरे हुये

बारीकी से नक्क़ाशी कर
बूढ़े 'नाबीने 'लिख गये

पढ़ कर कुछ हैरान मुसाफिर
रोते आँखे भरे हुये

हिलकी भर कर मिलन
रो पङा
सूखी आँख विदायी थी

वचन हमेशा शूली रखे
चला कंठ दिल भरे हुये

ज्यों ज्यों दर्द खरोंचे मेरी
कालकोठरी पागल सा

मेरे गीत जले कुंदन से
सुधा "हरे और खरे हुये
©®¶¶©®¶SudhaRaje
Jan 24

आपदा और आम आदमी का प्रबंधन बनाम सरकारी अमला

Sudha Raje with Om Thanvi
21--06--2013//3:41pm---
^^^^^^^लेख***कब तक
अनदेखी धमनियों की माँसपेशियों की **खं
प्रलय एक चेतावनी।
*****★★****★******((सुधा राजे))
—----
बाढ़ सूखा भूकंप बादल फटना भूस्खलन
अग्निकाण्ड तङित्पात् और
सुनामी आदि का होना बे वज़ह
कभी नहीं होता । कार्य कारण संबंध
की तरह प्रत्येक दुर्घटना के पीछे एक
बङा लंबा सिलसिला मनुष्य के लालच और
ग़लतियों का चला आ रहा है ।
विज्ञान इतनी उन्नति कर चुका है
कि वह इन सब विपदाओं
की भविष्यवाणी पहले ही कर सकता है
और करता भी रहता है । स्वार्थवश
ऐसी चेतावनियों की अनदेखी की जाती है

लेकिन ये भविष्यवाणियाँ तभी काम की हैं
जब इनपर तत्परता से एक्शन लिया जाये
और ऐसा एक्शन लेने को चौकस और तैयार
तंत्र सतत अभ्यास करता रहे ।
पिछली बिजनौर बाढ़ में गाँव डूबने
का कारण ये था कि पिछले पाँच सालों से
हरेवली डैम के फाटक कभी सूखी नहर पर
भी खोलकर ग्रीस और पेंट तक नहीं किये
गये थे । जब फाटक नहीं खुला तो गेट मैन
गाँव छोङकर भाग गया और
आला अधिकारियों ने क्रेन से फाटक
खिंचवाये तो टूट गया फाटक और बे जरूरत
बे इंतिहा तबाही पानी ने मचा दी ।
विश्व के विविध वैज्ञानिक
संगठनों रिसर्च सेन्टर्स ने धरती के
विभिन्न पारिस्थितिक
तंत्रों ज्वाला मुखी सुनामी भूकंप
उल्कापात अतिवृष्टि आँधी हरीकेन बवंडर
और भूस्खलन तक के क्षेत्र धरती के
मानचित्र पर चिह्नित करके । संबंधित
सरकारों पर्यावरण और पर्यटन और
पारिस्थितिक तंत्र विभागो मौसम
विभागों को सौंप रखीं हैं । समय समय
पर ये सूचनाये आज के तीव्र सेटेलाईट युग
में अपडेट भी जायी जातीं रहती है ।
देश भले ही अलग अलग राजनैतिक
इकाईयाँ हों लेकिन कागज के नक्शे पर
नहीं पृथ्वी । वह एक
जीती जागती गतिशील ब्रह्माण्वीय
इकाई है । भूमि के एक हिस्से
का परिवर्तन परोक्ष या प्रत्यक्ष पूरे
धरती ग्लोब पर प्रभाव डालता है । जैसे
ध्रुवीय हवायें और अल्ट्रवॉयलेट किरणें ।
जहाँ तक भारत का परिप्रेक्ष्य है ।
नदियाँ भारत रूपी देह की धमनियाँ और
नहरें शिरायें हैं जो हिमालय रूपी हृदय से
समुद्र रूपी गुर्दों तक निर्बाध
बहती रहें इसी में राष्ट्र रूपी देह
का परिसंचरण तंत्र सही काम करता रह
सकता है । पहाङ पर्वत गिरि भूधर इस
राष्ट्र रूपी देह की अस्थियाँ और कंकाल
तंत्र हैं । मिट्टी माँस और पेङ व्वचा हैं ।
घास रोम कूप हैं तो खनिज विविध
पुष्टिवर्धक संकलन । हिमालय
ही मस्तिष्क है निःसंदेह । और
कृषि मैदान वक्ष और उदर है । पठार
भुजदंड हैं और तट पाँव पंजे । द्वीप
अंगुलियाँ हैं ।
हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर उत्तराखंड
पश्चिमी उत्तर प्रदेश हरियाणा पंजाब
का पूर्वी भाग और सात
बहिनों का राज्य आसाम मेघालय मणिपुर
त्रिपुरा सिक्किम अरूणाचल प्रदेश तक
का क्षेत्र । कच्चे नरम गोल बेडोल भुरभुरे
पत्थरों के छोटे बङे बोल्डरों से बने
विश्रंखलित पहाङों से निर्मित है इनमें
रेत कंकङ मिट्टी का मलबा हिमालय के
अपरदन विखंडन क्षरण और जलप्लावन के
संयोग से किसी परमल मक्के या बूँदी के
लड्डू की तरह गठित भू संरचना है ।
यहाँ पक्के शैल नहीं है । ना ही पठार हैं
। मिट्टी जमकर पत्थर और पत्थर टूटकर
मिट्टी बनते बिगङते रहते हैं ।
हिमालय से निकलने वाली सब
नदियाँ जो भारत से होकर भूटान
म्यनमार नेपाल चीन बांगलादेश तक
बहतीं हैं । वर्षा काल में जब उफनती हैं
तो पहाङ के पानी की ही वजह से जो हर
तरफ से बह कर इन
नदियों नालों झरनों और झीलों से होकर
बङी नदियों तक बहता चला आता है ।
इस समय तङित्पात बादल फटने और
अतिवृष्टि से पहाङ भूस्खलन से गुजरते हैं ।
नये झरने और नदी धारायें बन जाते हैं ।
नदी वर्षा के उपरान्त जगह कई बाद
बदल लेती है । ये कटान वहाँ भयंकर रूप से
दिखता है जहाँ पहाङ खत्म होते हैं और
मिट्टी का डेल्टा पंक और
जमी हुयी भूमि जलोढ़ क्षेत्र
को नदी कगार बनाकर काट डालती है ।
वनस्पति इस पर लेप का काम करती है ।
घास फूस कुश और
छोटी झाङियाँ जहाँ मिट्टी से काई और
गोंद का काम लेकर पत्थरों को लड्डू
की तरह आपस में बाँधते हैं बङे पेङ बादल
और नदी के वेग को धीमा कर डालते हैं ।
और इसतरह सदियों से जमते रहते
पहाङों पर हरियाली का कवच चढ़ा रह
कर पहाङ के कंकङ पत्थरों को बिखरने से
रोके रखता है ।
अफ़सोस की बात ये है कि ये सब समझते हुये
भी । नौकरशाह नेता प्रशासक ठेकेदार भू
माफिया टिम्बर माफिया ट्रान्पोर्ट
माफिया । ट्रैवल एंड टूरिज्म
माफिया धर्म के ठेकेदार और अय्याशी के
शौकीन धनिक लोग ।
सारे मानको की जानबूझकर अवहेलना
करते हुये जब बहुमंजिले भवन पापङ
सी पतली दीवारें बिना मजबूत
इंफ्रास्ट्रक्चर के मिलावटी रेत सीमेन्ट
और घटिया निर्माण सामग्री से
रातदिन एक करके पहाङ को खोद डालते
हुये नदियों के किनारे खङे करते चले जाते
हैं तो ।सारा बँधा हुआ पहाङ हिल
जाता है । भीतर ही भीतर खिसकन शुरू
हो जाती है ।
नदियों पर बाँध जब बनाये जाते हैं
तो पूरे क्षेत्र में पहाङ की दरारों से
पानी रिसता रिसता पूरे इलाके
को नमी से भर देता है ।
यही कारण है कि उत्तर काशी से
बिजनौर तक मकानों में भयंकर शीलन
रहती है ।
नदियों पर अत्याचार ये होता है कि हर
साल मार्च से जुलाई तक जब पहाङ
का बारिश में नहाने और गंगा बादल
पहाङ के नृत्य का उत्सव यौवन पर
रहता है तभी । मैदानों से तफरीह के
शौकीन छुट्टी मनाने वाले हनीमून मनाने
पिकनिक मनाने और इश्क़ लङाने वाले
जोङो के अलावा एडवेंचर और तीर्थ
यात्रा का एक पंथ चार काज वाले
पर्यटन पर आ जाते हैं ।
दुधमुँहे बच्चे अशक्त जर्जर बूढे । मोटे
भारी भरकम लोग :और तब पहाङ पर एक
से दस लाख यात्री का धमकता यातायात
पहाङ की शांति को भंग कर देता है ।
वाहनों लाउडस्पीकरों म्यूजिक सिस्टम
टीवी और बातों का शोर पहाङ में
कितना गूँजता है इसे सिर्फ
मूलनिवासी ही महसूस कर सकता है ।
शोर क्षरण बढ़ाता है ।
इन यात्रियों के खाने रूकने और ढोने में
सहायक कार्मिक और सुरक्षा तंत्र
का भी उतना ही भार बढ़ जाता है ।
सीजन में पश्चिमी यू पी का बहुत
बङा हिस्सा पहाङों पर रोजी कमाने
चल पङता है ।
इनके रुकने खाने और घूमने की वजह से अवैध
टेम्परेरी निर्माण और ट्रैकिंग होती है
। पहाङ खोदना और
लकङी काटना जारी रहता है ।
नौकरशाह भ्रष्ट कमीशन खोर
नेता मिलकर घटिया सङकें पुल बनवाते
रहते हैं ।
जब ये यात्री लौटते है तो पीछे छोङ
जाते हैं कचरे का अंबार । मल और
प्लास्टिक पॉलिथीन पाउच सिरिंज
गुटखा और सिरिंजें लेटेक्स और शराब
की बोतलें दवाओं के रैपर पेस्ट क्रीम
की ट्यूबें ब्रश और टूटे जूते चप्पल और
टनों ऐसा कचरा जो खाद नहीं बनता न
गलता है । न ही बहता है ।
नदियों में पटक दिया जाता है सारा ।
पहाङ पर से बारिश में बहकर जब आता है
तो नदी को न केवल
जहरीला बनाता वरन् मार्ग भी रौंध
कर प्रवाह का मार्ग बदलने पर विवश
करता है ।
नदियाँ बाढ़ से साफ करतीं हैं स्वयम्
को । नदी में बाढ़ जरूरी है ।
लेकिन नदी का मार्ग मत रोको ।
जगह जगह
फैक्टरियाँ अलकनंदा भागीरथी रामगंगा
गंगा बाणगंगा मालन पिंडर सरयू
यमुना खो पीली तक ये
रिफाईनरियों का मैला नदियों में पटक
दिया जाता है ।
पहाङ का पानी तराई भांबर खादर
को तबाह करता है । क्योंकि ये
पानी सहारनपुर बिजनौर मुरादाबाद
पंजाब हरियाणा तक पहुँचतो बहाब
धीमा होने से खङा ही रहता है
महीनों तक खेत भर जाने से ईख और धान
की फसलें गल जातीं हैं ।
मवेशी और खेत ही रोजी का मुख्य
ज़रिया हैं ढोर मरने और खेत भरने से
बरबाद किसान मजदूर । कच्चे
घरों को भी भरभराकर गिरता बेबसी से
देखते हैं । साल भर के लिये जमा अनाज और
अगली फसल का बीज सङ गल बह जाता है
।कपङे फर्नीचर ईँधन प्राय जो कंडे उपले
होते है खत्म और अब फैक्टरियों के कब्जे के
कारण फूस भी विगत दस सालों से
नहीं मिलती ।
तो पलायन को विवश ये भाँबर तराई के
लोग अपराध और खानाबदोश
ज़िंदगी की और धकेले जाते हैं ।
नहरों बैराजों डेम और बाँझ के
पार्कों की साफ सफाई गाद और सिल्ट
साफ करने का बजट हर साल जनता के खून
की कमाई से आता है लेकिन कागज पर सब
होता है । सिंचाई कॉलोनियों के
मिलीवटी निर्माण
वाली पूरी कॉलोनी बिजनौर के
खो बैराज पर दस साल पहले बह
गयी थी नाम निशान तक नहीं ।
हजारो हैक्टेयर उपजाऊ अव्वल भूमि पर
रेत कंकङ पत्थर भर गया और दलदल बन
गये । नहरों की सिल्ट साफ न होने से हर
साल कई दरजन पशु और मानव खप कर मर
जाते हैं । और रेत खनन्
माफिया मछली पलेज और
सिघाङा आदि के लिये अवैध रूप से ये
तटपट्टियाँ लोगों को अवैध रूप से लाभ
लेकर दे दी जाती है । करोङो के बजट
मस्टर रोल में भरने के बावज़ूद आज तक
बिजनौर के खो बैराज का ना तो पुल
चौङीकरण हुआ नहीं रेलिंग सुधरी न
ही नया पुल पैदल और वन वे
की सुविधा हो सकी हर बाढ़ में चार
पाँच सो गाँव बिना बिजली के और शेष
भारत से संपर्क से कटे रहते हैं
वे जो लाभ कमाते हैं उनको पहाङ
या तराई खादर भाँबर के दर्द से कोई
वास्ता नहीं । राहत बचाव के नाम पर
किसी नदी तट के नगरपालिका में मानसून
के पहले नावें तक तैनात नहीं रहतीं ।
बाढ़ में आसपास के अपराधी गिरोह और
सक्रिय हो जाते हैं । राहत कार्यों में
नौकरशाहों की कोठियाँ महानगरों में
फटाफट खङी हो जातीं है ।
पहाङ ने अभी तो सिर्फ पीठ हिलायी है
कहीं अनदेखी की तो बिजनौर सहारनपुर
मेरठ से दिल्ली ज्यादा दूर नहीं ।
©®©सुधा राजे
All right ®
Sudha Raje

Jun 22

हुयी शह मात मैं तेरे लिये

Sudha Raje
भूख जब हो गयी मुहब्बत से
बङी ऐ ज़िंदग़ी!!!!!!!

बेचकर जज़्बात लायी भात
मैं तेरे लिये

दिल से ज्यादा पेट में जब
आग हुयी ऐ बंदग़ी!!!!!!

ख्वाब
सी पिसता रही दिन
रात मैं तेरे लिये

बुतपरस्ती से
ख़ुदा मिलता न था रोज़े से भी
रोटियों लिखती रही सफ़हात
मैं तेरे लिये

टूटती रह गयी बदन
की ख्वाहिशें पर्दों में यूँ

बिक गयी थी रेत सी हर
रात मैं तेरे लिये

आग लग गयी जब मेरे
रिश्तों के पुल पर भीङ थी

तैरती मुर्दों पे थी हालात
मैं तेरे लिये

गाँव में गुरबत के जब सैलाब
आया दर्द का

छोङ गये सब हाथ
खाली हाथ मैं तेरे लिये

हुस्न के परतौ पे आशिक़ भूख
का मारा हुआ
नाचती रह गयी सङक
अब्रात मैं तेरे लिये

बस ज़ने -फ़ासिद थी उल्फ़त
पेट के इस दर्द को
मौत लायी कोख पर ज्यूँ
लात मैं तेरे लिये

सब चले गये छोङकर कल तक
जो मेरे थे वली
कब्र या ससुराल औरत ज़ात
मैं तेरे लिये

एक टूटा ये कटोरा ज़िस्म
दीवारें क़बा

साँस माँगे भीख ज्यूँ ख़ैरात
मैं तेरे लिये

चंद टुकङे काग़जों के कुछ
निवाले अन्न के
चंद चिंथङे ये
सुधा "औक़ात मैं तेरे लिये

चाँद तारे फूल तितली इश्क़
और शहनाईयाँ
पेट भरने पर हुयी शुहरात मैं
तेरे लिये

किस नदी की रूह
प्यासी हूँ मैं सबकी प्यास
में

रेत
पी गयी शायरी क़ल्मात
मैं तेरे लिये

चंद गीली लकङियों पर
आखिरी कुछ रोटियाँ
जोहते बच्चे हुयी शह मात मैं
तेरे लिये

बाप
था ज्यादा कि बेटा कौन
भूखा क्या पता
खा गयी चोरी से आलू
सात मैं तेरे लिये

आज तक तो रोज
मिलती रह गयी उम्मीद
सी
आयी ना खुशियों की वो बारात
मैं तेरे लिये

सब कुँवारे ख़्वाब पी गयी इक ग़रीबी की हिना ।
तीसरी बीबी सुधा ग़ैरात मैं
तेरे लिये
©®¶©®¶
Sudha Raje
Mar 3।2013/
©®SUDHA Raje
511/2, peetambara aasheesh
fatehnagar
sherkot- 246747
bijnor
mob - 7669489600
9756373114
email- sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक ह

Wednesday, 16 October 2013

ये हिंद स्त्रियों का भी हिंदोस्तान हो।

संविधान अब बदल
नया विहान हो
ये हिंद स्त्रियों का भी
हिंदोस्तान हो
जिस देश के नियम करें
विभेद न्याय में
क्या दुर्दशा कि
ऱिश्वतें हैं मान्य आय में
ये देश आधा जब न
दर्द का ग़ुलाम हो
ये हिंद औरतों का भी
हिंदोस्तान हो
जब तक हैं बेटियाँ
विवश कि, बोझ स्त्रियाँ
कानून व्यर्थ
व्यर्थ तंत्र व्यर्थ
व्यर्थ कुर्सियाँ
गणतंत्र का न
अर्थ
व्यर्थ तामझाम हो
ये हिंद बेटियों का भी
हिन्दोस्तान हो
कैसै रूकें ये
डोलियाँ दहेज में जलीं
कैसे बचें ये मेंहदियाँ
जो प्रेम में छलीं
नर वासना में
बच्चियाँ
ना क़त्ले आम हों
ये हिंद खबातीनों का
हिंदोस्तान हो
कैसा वतन कि देश
मातृभूमि सरज़मी?????
बेघर है लावतन है
दुख्तराते हिंदवी
रहने-उङान
भरने
ज़मी--आसमान हो
ये हिंद बच्चियों का भी
हिंदोस्तान हो
हो क्यों कतल ग़रीब
की बेटी की हसरतें
क्यों टुकङे टुकङे माँस
काटती ज़रूरतें
लाशें न पेट से गिरें
ये घर की शान हों
ये हिंद नारियों का भी
हिंदोस्तान हो
है ख़ौफ से क़फस में
जब तलक ये लङकियाँ
मज़बूर हैं बढने से
और पढने से बेटियाँ
तब तक फिजूल हैं
विकास के बखान हो
ये हिंद लङकियों का भी
हिंदोस्तान हो
हमने भी जान दी है मुक्त
देश के लिये
जौहर किये है
भूख सही
होंठ सी लिये
अब देश पे शहादतों
का इम्तिहान हो
जयहिंद
देश मेरा भी
हो
आनबान हो
आज़ादियाँ
गुलामियों से मिलके
खो गयीं
साज़िश है
मज़हबों की
या सरकार सो गयी
फिर से
नयी ये
जंगे आजादी
का गान हो
कहते हो जन्म भूमि
इसे मादरे वतन
जननी को गालियाँ

बेटियों को
बस कफ़न
??????
छीने है जीने के
हुकूक़
बेईमान हो
गायेंगे
वंदेमातरम् जय
जयदेशगान हो
©®¶©®¶
We want justice
AAdha Desh Humara Ho
©®SUDHA Raje
511/2, peetambara aasheesh
fatehnagar
sherkot- 246747
bijnor
mob - 7669489600
9756373114
emaul- sudha.raje7@gmail.com

सह रचना पूर्णतः मौलिक है
©®SUDHA Raje
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यह रचना पूर्णतः मौलिक है

तिमिर नेह का भूखा।

Sudha Raje
तिमिर नेह का भूखा
रोज बुलाता तारे
दीप देहली पर धर धरके
साँझ सकारे
लेकिन भोर चले जाते
एकाकी करके
दिन भर कालकोठरी
रोता तिमिर हहर के
कभी न होगा तम
की पीङा का निर्वाचन
उजियारे का अभिनंदन है
तम का क्रंदन
जब गिरोह भर कर प्रकाश
अँधियारा लूटे
स्वस्तिवचन करते सूरज
का पंछी झूठे
दुर्लभ कुंद खिले तम के आँचल
में रोते
सदियाँ हुयीं अँधेरे अब तक
लानत ढोते
सुधा अँधेरों ने लिख्खी
सच की तहरीरें
झूठ भऱे आलोक शोर में डूबी पीरें
तम के होंठ सिंये रहते हैं
नन्हें तारे
चंदा सूरज दीप कहें ना
गरब के मारे
©®SUDHA Raje

प्रकाशन हेतु रचना--: निकलो लङ़ते भात पे भूखे

मिट्टी धूल पसीने मैले कपङें
के परचम लेकर।
निकलो लङते भात पे भूखे
ये जकङे दमखम लेकर।

दो आवाज़
गली खेतों हाटों बस्ती सङकों ढाबों।
निकलों स्याह
सुरंगों पाटों भठ्टी चक्कों मेहराबों।
नारा दो हम एक हैं
मेहनतकश घायल मरहम लेकर।
निकलो लङते भात पे भूखे ये
जकङे दमख़म लेकर।

करो बात क्या झूठ है सच
क्या
पूछो चीखो चिघ्घाङो।
पकङो हाथ हाथ में दे दे
चालाकी सबकी ताङो।
हुंकारो सच्चाई जोर से ग़म
पकङे सरगम लेकर।
निकलो लङते भात पे भूखे
अब जकङे दमख़म लेकर

बैठो मत डरकर वरना फिर सुबह
कहेगी क्या खायें
पूँजी भूँजेगी मूँजी सा इंक़लाब चल उठ गायें
काली रात भूख बीमारी तम बिगङे
मौसम लेकर
निकलो लङते भात पे भूखे अब जकङ दमखम
लेकर

तोङफोङ गुंडागीरी ये आगजनी पत्थर
छोङो
चक्का छैनी हल मिलकर बाज़ारवाद
की दमतोङो
हरे सलेटी रंग एक हो कलम फावङे नम
लेकर
निकलो लङ़ते भात पे भूखे अब जकङे संयम
लेकर

पूछो मेरी रोटी चावल नमक प्याज
मिरची का क्या
छानी छप्पर दवा पढ़ाई न्याय वस्त्र
अरजी का क्या???
ये सफेद रंगीन महफ़िलें
ज़ाम जश्न हमदम लेकर
निकलो लङते भात पे भूखे अब जकङे दमखम
लेकर

दिल्ली हो या राजभवन क्या धूप
गरीबी दर्द सहा???
सामाजिक हो न्याय कहा था संविधान ने
कहाँ रहा
रिश्वत कोढ़ी सरकारी कारिंदें दम पर
दम लेकर

कितना सूद
मुनाफा कितनी मजदूरी क्या भाव फसल
जान आन कुरबान करे जो मरे बुढ़ापे बिन
तिल तिल
अय्याशी कुछ कम तो हो अब
लङो सुधा संयम लेकर
©®¶©®
©® sudha raje
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagara
Sherkot-246747
mob-7669389600
email- sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।
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Tuesday, 15 October 2013

हम गँवार गंदे किसान की फूटी लोटा थाली

ग्रामवासिनी
हम गँवार देहातिन बाबू !!
गाली है
शहर खा गये सब कुछ
मेरे गाँव
की झोली खाली है

1-दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते फल खाते
माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के
रमदसिया मरने
वाली है

2-
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये आम आँवले बेर
तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है

3-
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख पिसी तिल
धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है

4-
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
जोरू बिटिया काली है

5-भैया जी कें गये थे इक दिन
शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है

6-धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर काट काट
कें
चिक्कर गये
"अव्वल की यो
डिगरी "ऊँची "बिन रिश्वत बेमाली है

7-
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी
मिक्सर
कहाँ कुदाली है

8-
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है

9-
ले जाते मजदूर बनाकर
बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे किसान
की फूटी लोटा थाली

10-
कहाँ कौन सा देश और
सरकार हमें तो थाना है इज्जत जाये
कतल
हो चाहे पंचों की दल्लाली है

11-
पाँच साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है

12-
पटबारी को पैसे नई गये पैमाईश में
फँसा दियौ गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है

13-
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोरो
अबके कान की बाली है

14-
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे शहर पढ़ाबें
जी काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है

15-
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर
तबीजें करते रये
तीन छोकरी हो गयीं
तिस पे अब आया बंगाली है

16-
रोज रात कूँ हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोबे
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे खोटी, किस्मत
वाली है

17-
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है

18-
सुधा भात पे 'चीज'
चढैगी
भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें चिंता नींद
उङाली है

19-
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी
मेट की भेंट चढ़ाली है

20-
हस्पताल
की दवा डागधर
शहर बेचते चोरी से
दाई जनाबै बच्चा मर गयी बिंदू
की घरवाली है

21-
मच्छर, बाढ़, बुखार
चोर ,नट
ओझा पंडिते दर्रोगा
बची खुची बिगङी औलादें
नाबालिग धौँचाली है

22-
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला
में
जो केबें परधान वो होबे शासन देश
सवाली है

23-
हमसे घृणा करें रिश्ते भी नही बताते
देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा "सुधा "गाँव
में
ठाली है

24- पुरखों की ऊसर जमीन पर कित्तों को रुजगार मिलै
""दादालाई"" बँटवारे पे टूट गई खुशहाली है।
©® sudha raje

हम गँवार गंदे किसानकी फूटी लोटा थाली

ग्रामवासिनी
हम गँवार देहातिन बाबू !!
गाली है
शहर खा गये सब कुछ
मेरे गाँव
की झोली खाली है

1-दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते फल खाते
माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के
रमदसिया मरने
वाली है

2-
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये आम आँवले बेर
तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है

3-
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख पिसी तिल
धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है

4-
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
जोरू बिटिया काली है

5-भैया जी कें गये थे इक दिन
शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है

6-धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर काट काट
कें
चिक्कर गये
"अव्वल की यो
डिगरी "ऊँची "बिन रिश्वत बेमाली है

7-
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी
मिक्सर
कहाँ कुदाली है

8-
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है

9-
ले जाते मजदूर बनाकर
बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे किसान
की फूटी लोटा थाली

10-
कहाँ कौन सा देश और
सरकार हमें तो थाना है इज्जत जाये
कतल
हो चाहे पंचों की दल्लाली है

11-
पाँच साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है

12-
पटबारी को पैसे नई गये पैमाईश में
फँसा दियौ गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है

13-
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोरो
अबके कान की बाली है

14-
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे शहर पढ़ाबें
जी काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है

15-
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर
तबीजें करते रये
तीन छोकरी हो गयीं
तिस पे अब आया बंगाली है

16-
रोज रात कूँ हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोबे
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे खोटी, किस्मत
वाली है

17-
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है

18-
सुधा भात पे 'चीज'
चढैगी
भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें चिंता नींद
उङाली है

19-
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी
मेट की भेंट चढ़ाली है

20-
हस्पताल
की दवा डागधर
शहर बेचते चोरी से
दाई जनाबै बच्चा मर गयी बिंदू
की घरवाली है

21-
मच्छर, बाढ़, बुखार
चोर ,नट
ओझा पंडिते दर्रोगा
बची खुची बिगङी औलादें
नाबालिग धौँचाली है

22-
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला
में
जो केबें परधान वो होबे शासन देश
सवाली है

23-
हमसे घृणा करें रिश्ते भी नही बताते
देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा "सुधा "गाँव
में
ठाली है

24- पुरखों की ऊसर जमीन पर कित्तों को रुजगार मिलै
""दादालाई"" बँटवारे पे टूट गई खुशहाली है।
©® sudha raje