Monday, 29 July 2013

देश मेरा देश

Sudha Raje
पश्चिमी यू पी के कुछ खास कस्बे अचानक
महानगरीय शैली के बहुमंजिला भवनों से
सजते जा रहे हैं ।
आय का स्रोत पता नहीं पाँच साल से
भी कम समय में ये चमत्कार तो महानगर
की हाई फाई जॉब से भी असंभव है।
क्या कोई जानता है अनजान बन रहा है
कि कहीं कुछ भी घटता है तार
यहीं निकल आते क्यों हैं । बैंक से
अरबों रुपया विदेश से
आना जाना मामूली मजदूरो के खातों में ।
सिम कार्ड नकली पहचान पर मिलना।
अचानक कुछ कस्बों में विदेशी मेहमान
ज्यादा दिखने लगना । पागल
भिखारी और टेंट वाले दवाखाने बढ़ते
जाना
Jul 18

Sunday, 21 July 2013

सैलाब::कहानी::

Sudha Raje
सैलाब:: कहानी::(Written
byसुधा राजे®©®09-07-2013//­
12:07Pm
++++++++++++
अम्मी ये ज़रीना को समझा लीजिये

यूँ रोज़ रोज़ जब देखो तब
उसका हिन्दुओं के घर
आना जाना ठीक नहीं ।
ज़माना ख़राब है । ख़ून सफेद पङते
देर नहीं लगती ।बाक़ी आप
समझदार हैं।"
मुज़ाहिद ने दस्तरख्वान पर
बिस्मिल्लाह करके चार निवाले
खाये ही थे कि ज़रीना को बाहर से
आती देखकर वह झल्ला सा उठा था।
अम्मी ने सालन परोसते हुये बङे नरम
स्वर में कहा ।
""इस साल इंटर कर लेने दो इसे फिर
घर से निकलना भी बंद करवा दूँगी।
पढ़ाई
का तग़ादा तालीमयाफ्ता लङकी क
तो तुम्हारे फूफीजाद ने
ही लगाया है। हमने तो कह
दिया पेशकश फेर दो मेरी बहिन
का बेटा हर दम तैयार बैठा है अब
भी । ""
आप भी किन नामुरादों का ज़िकर
लेकर बैठ गयीं दुलहिन?
वो हमारी ज़रीना के क़ाबिल
लङका है क्या न घर न तालीम न
तहज़ीब । आपकी बहिन का खयाल न
होता तो यहाँ से वो वो सुनाकर
दफा करते हमलोग कि यार रखते
शब्बन मियाँ।
अबकी बार
ज़रीना की दादी हज्जन
सायरा बङबङायीं । तसबीह
हाथों में ही थामे तखत पर बैठे बैठे
सुहैल को आँखें दिखाकर बोली।
""अरे तूली उसके ही दर्ज़े में पढ़ती है
।उसके पास निजी कमरा है कूलर
पंखा टेबल कुरसी ठंडक और सुक़ून
का माहौल है । वहाँ कोई खलल
नहीं डालता पढ़ने में इसी लिये
चली जाती है । यहाँ तो हर वक्त
गोश्तमंडी बनाकर रखी हुयी है
वो बेचारी इम्तिहान
की तैयारी कैसे करे ।
दादी की डाँट खाकर सुहैल चुप
हो गया । लेकिन दिल में ऐंठन जरूर
रह गयी । धीरे से छोटे भाई ने
कहा """ दादीअम्मी हम
सबको ही टोक रही हैं कि हम
पाँचों भाई ज्यादा शोर
शराबा करते हैं । और आपा को पढ़ने
नहीं देते। लेकिन
अपना नहीं कहतीं कि सारा सारा
पान चबाती मुहल्ले भर
की बूढ़ी औरते यहीं जमा होकर
टी वी देखती रहतीं हैं । ऊपर से
अम्मी और चाची के कपङे और मसाले
कुटते रहते हैं तो कभी सिलाई मशीन
घरघराती रहती है ।
------**------
तूली और ज़रीना जैसे ही स्कूल वैन से
उतरीं सुहैल बाईक लेकर आ
गया जरीना भाई के
पीछे बैठ गयी और
तूली हमेशा की तरह रिक्शे में चढ़
गयी।
सुहैल ने तूली को घूरकर
खा जानेवाली नज़रों से देखा ।
तूली ने हमेशा की तरह हुँह
की उपेक्षा का भाव लाकर मुँह
टेढ़ा मेढ़ा किया।
बाईक भागी जा रही है और
रिक्शॉ पीछे छूट गया ।
""बाज़ी ये आपकी सहेली तूली है न
एकदम बक़वास लङकी है । लङकों जैसे
कपङे पहनती है और एकदम
चिङियाघर से भागी हुयी लगती है
। कोई तमीज़
की सहेली नहीं मिली आपको!! शकल
तो देखो । भूतनी की तरह खा जाने
को तैयार।""
सुहैल की बङबङ अब रास्ते भर
नहीं रुकने
वाली ज़रीना जानती है।
वह हँसी दबाती हुयी बमुश्किल
बोल पाती है ।
क्या करूँ सबके घर दूर दूर हैं और सब
अपने अपने भाईयों के साथ जाती हैं
या पापा चाचा वगैरह के ।
तूली का भाई तो अभी दस साल
का बच्चा ही है ।
पापा कलकत्ता रहते हैं । तो जब
तक कोई दूसरी क़ाबिल
सहेली नहीं मिलती इसी से काम
चलाना है।"
ज़रीना जानती है सुहैल आजकल
इज़्तमा और ज़मातों में ज्यादा जाने
लगा है।
अब्बू ने भी बीमा पॉलिसी बंद
करादी । ब्याज़ पर बैंक में
पैसा रखना बंद करके मुसलिम फंड में
रखना शुरू कर दिया ।
ज़रीना को बुरखा पहनना पसंद
नहीं मगर स्कूल के अलावा हर ज़गह
अब बुरखा पहनना ही पङता है ।
उन सबको लङकियों का पढ़ना बिन
दुपट्टे घूमना और ज्यादा एक्टिव
रहना पसंद नहीं।
""गरमी लगे या घबराहट अब
तो पहनना ही पङेगा "
चाचा ने साफ साफ कह दिया।
तूली हमेशा की तरह
रिक्शा रोककर घर के मोङ पर से
सब्जी खरीदती है और डेयरी से दूध
की थैली भी।
""माँ आज सिंघङ के कोफ्ते
बनाना ज़रीना की पसंद के बेसन
वाले"
बना तो दूँगी तूली पर कान खोलकर
सुन ले । हम ठहरे बिना लहसुन
प्याज की खाने वाले वैष्णव और और
वो तेरी सहेलियाँ ज़रीना और
नमीरा खाती हैं माँस मच्छी अंडे ।
बस मेहरबानी करके उन
लोगों को क्रॉकरी घर वाली मत
देना मैं नया सेट लायी हूँ
तेरी माँसाहारी सखियों के स्वागत
को खाओ पिओ और माँज धोकर
आलमारी में रख देना ।
माँ!!!
ज़रीना और नमीरा मेरे साथ स्कूल में
भी तो खातीं हैं!! वैसे ठीक है आपने
बता दिया मैं खयाल रखूँगी ।
तूली की माँ को ज़रीना नमीरा ही नहीं
सहेलियाँ बेहद पयंद हैं । वे आये दिन
नयी नयी चीजें बनाकर
खिलाती भी हैं । बस बहुत
सादगी से बहुत सात्विक आहार
की वजह से माँसाहारियों से
हिचकती हैं बरतन साझा करना बस

बरसात का मौसम आ चुका है और
पूरा इलाका पानी से सराबोर है ।
********************-**-
*****
आधी रात को ये कैसा शोर है!!!
घरों में लोग जाग पङे ।
बैराज पर की तोप से फायर
किया गया है । या ख़ुदा रहम!!
ज़रीना नहीं समझ पा रही है
अम्मी इतनी क्यों बौखला रहीं हैं ।
घर के सब बङों ने फटाफट सामान
बाँधने शुरू कर दिये है । अब्बू राशन
और अनाज की बोरियाँ क़रीब
ही सबसे ऊँचे टीले पर बने
चौधरी हरवंश के तिमंजिले पर रखने
जा रहे हैं । वहाँ से आकर हर
बता रहे है
-""पूरा इलाका घुटनों भर गया ।
सब का सामान चौधरी के तिमंजिले
में नहीं
आ सकता ।
कपङे उठा लो फर्नीचर रस्सियों से
बाँध दो खिङकियों से ।
सुहैल की अम्मी तबाही आ गयी हम
बर्बाद हो गये ।""
ख़ुदा ख़ैर करे बच्चों को लेकर
निकलो बाहर
सरकारी गाङी खङी है ।
अपना खयाल रखना हम सब बाद में
आते हैं ।""
तभी तेज सायरन के साथ मस्जिदों से
ऐलान होने लगा ।
"""""""ज़ान बचाईये हज़रात!!!
सैलाब आ चुका है । बैराज का फाटक
खोल दिया गया है पानी पंद्रह
मिनट से पेश्तर कस्बे में भर
जायेगा । जो जहाँ जिस हाल में
कस्बे से बाहर निकल कर शहर के
स्कूलों में पहुँच जायें """
अचानक
अँधेरा छा गया बिजली ध्वस्त
हो गयी । ट्रांसफार्मर फुँक गया ।
और सप्लाई काट
दी गयी वरना करंट फैल जाता ।
लोग भाग रहे हैं अंधाधुंध ।
ट्रैक्टरों बैलगाङियों कारों और
पैदल जहाँ तक पानी में चलना संभव
है ।
आसपास के शहरों गाँवों के
रिश्तेदारों को फोन लगाये जा रहे
हैं मदद भेजो ।
चीख पुकार और रोने की आवाजों के
साथ बारिश और बिजली की कङक
तङक दहशत ही दहशत ।
पानी की दहशत । पानी बिलों में
भर जाने से बाहर निकल कर तैरते
साँप बिच्छुओं जहरीले
कीङों की दहशत। अपनों से बिछुङ
जाने की दहशत ।
अपना बसा बसाया तिनके तिनके
उमर भर जोङा घर और गृहस्थी के
बहने टूटने चोरी होने और ढह जाने
की दहशत । डूबकर मर जाने
की दहशत ।
लोग करीब के शहर के स्कूल पहुँच
तो गये लेकिन दस पंद्रह
कमरों का स्कूल तत्काल
बरामदों सहित भीङ से भर गया ।
स्कूल के प्रांगण में गाय भैंस बैल
बकरियाँ और मुर्गियाँ डेरा जमाये
हुये हैं । हर तरफ गीले कपङे पहने
लोग आने वाले जत्थे की तरफ दौङकर
देखते हैं उनके अपने कौन कौन आये ।
ऑफिस में एस डी ओ साहब और
महकमा जमा है प्रिंसिपल और
शिक्षक चाय नाश्ते से इंप्रेशन
जमाने में लगे हैं । कुछ लोगों के
रिश्तेदार आसपास से आ आ कर
गाङियों में उनको ले ले जा रहे हैं।
इसी बीच कुछ पत्रकार ठसे फिर रहे
हैं और अचानक भीङ में से दो चार
युवकों ने कलेक्टर पर पत्थर
चला दिये । वह अभी तक बाढ़
की विभीषिका की रिपोर्ट केंद्र
और
राजधानी को देना नहीं चाहता ।
ना ही नावें मँगा रहा है
करीबी महानगर में पी ए सी है और
सामाजिक कार्यकर्तागण राशन
पकवाने कपङे जुटाने के इंतज़ाम में लग
गये हैं ।
सुहैल नहीं दिख रहा बङी बी!!
दादी ने घबराकर बहू से पूछा ।
सब के सब ट्रैक्टर के अंदर बैठे हैं ऊपर
से बरसाती काली पन्नी तान
रखी है । सब भीगे हुये हैं और भूखे
भी ।
कस्बे में पानी पंद्रह फीट तक भर
चुका है । सबके
घरों की पहली मंज़िल डूब चुकी है ।
जिनके घर दो मंजिले तिमंजिले हैं बचे
खुचे लोग राशन कपङों गहनों समेत
उनके घरों की छतों पर जा बैठे हैं ।
प्लास्टिक की बोरियाँ छाते और
टीन सब नाकाफी हो रहे हैं ।
माचिसें भीग गयी हैं
बैटरियाँ डाऊन हो चुकीं हैं तेज
हवा पानी की मूसलाधार के साथ
घुप्प अँधेरा । औरतें रो रहीं हैं बच्चे
चीख रहे हैं । नौजवान खाट और
छप्पर से लकङियाँ रस्सियाँ जुटाकर
बेङे बना रहे हैं । बेङों पर सामान
राशन कपङे और बच्चों को तैराकर
खुद पानी में भाला लाठी लेकर
बहती कूङियों गंदगियों और
साँपों से जूझते आगे बढ़ रहे हैं ।
तभी भरभरा के एक दोमंजिले
का लिंटर ढह गया ।
छत पर चढ़े लोगो के अचानक नीचे आ
गिरने से चीखपुकार मच गयी । लोग
कमजोर मकानों से दूर भाग रहे हैं ।
शहर से अब तक कोई मदद
नहीं आयी ।
अलबत्ता कराबी गाँवों के
किसानों ने जहाँतक संभव है वहाँतक
ट्रैक्टरों को ट्रेन की तरह कतार में
परस्पर बाँधकर लगा रखा है । लोग
पहिये के टायरट्यूबों और बाँस फूस के
बेङों ले अगर ट्रैक्कटर तक पहुँच
जा रहे हैं तो कई ट्रालियाँ फलाँगते
हुये आखरी ट्राली में भरकर शहर
भिजवाये जा रहे हैं वहाँ डंलप और
बैलगाङियाँ भैंसा गाङियाँ रब्बे और
साईकिले लगा रखी हैं
समाजसेवी लोगों ने । रात
बीती जा रही है । सब बिछुङते
जा रहे है । बिना सुने कोई
भी मददगार
किसी को भी कहीं भी भेज दे रहा है
। कुछ लोग कस्बे को चोर लुटेरों से
बचाने को पहरा देने रुके हैं । न आग
है न बिजली न रौशनी । न खाना ।
पानी में बहकर पेङ तरबूज खरबूज आ
रहे है जिसको जो हाथ लगता है
खा रहे हैं ।
प्यास से परेशान लोग नल तो सब
डूब गये कुँयें भी । हर तरफ पच्चीस
फीट से पंद्रह फीट तक
पानी भरा है । आसमान की तरफ
मुँह खोलकर पानी पी रहे हैं ।
सद्यः प्रसूता माँयें गीले
कपङों काँपती हुयीं बच्चों को शरीर
से चिपकाये भीगने से बचाने
की नाकाम कोशिश कर रही है।
तभी पता चला किसी की बहू ने बेङे
पर बच्चे को जन्म दिया । और
वहाँ तक सब कपङे भेजने
को किसी बहादुर की तलाश में है ।
बेङे पर स्त्री का पति नहीं है
बूढ़ी सास और बालिका ननद है
जो डंडे के सहारे बेङा किसी किनारे
ले जाने की कोशिश में थीं ।
पति वापस तैरकर लौटा है कपङे और
छाया जुटाने । छतों से औरतों ने
पोटली प्लास्टिक के कट्टे में भरकर
सामान फेंका है और पति थक चुका है
तैरकर मगर जा रहा है वापस
किसी की दी हुयी एक
लंबी तख्ती पर सामान रखकर डंडे से
तख्ता तैराता हुआ ।
तूली!!!!
तूली अब क्या होगा बेटा?
निचली दोनों मंज़िलों में पानी भर
चुका है ।
माँ!!
घबराने से क्या होगा आप भाई
को लेकर सबसे ऊपर वाली मंजिल पर
पहुँचो हो सकता कोई मदद
को दिखाई दे तो बुला लेना । मैं
जरूरी सामान टांडों पर चढ़ाने
की कोशिश करती हूँ ।
तीनो घबराये हुये प्राणी ईश्वर से
मदद माँगने लग गये ।
मगर वहाँ मदद नहीं नाक मुँह बाँधे
मछली पकङने वाली डोंगी पर
सवार । प्लास्टिक के कपङों से ढँके
चार प्रेत पहुँचे ।
बाहरी चारदीवारी से लटक कर
एक छत पर चढ़ गया ।
दो डोंगीनाव में रुके रहे
दूसरा भी चढ़ गया ।
तूली की माँ चीखी । नक़ाब पोश ने
मुँह भींच लिया । दूसरे ने झपट कर
दस साल के बेटे के गले पर साँस
नली पर तेज धार दार चाकू रख
दिया ।
विवश आतंकित माँ ने सारे गहने
उतार कर नक़ाबपोशों के सामने फेंक
दिये । और बच्चे
की जिंदग़ी की भीख माँगने लगी ।
भाग-2-अगले पृष्ठ पर
Jul 9
Sudha Raje
लङकों ने छत से नीचे
सीढ़ी उतरी और तीसरी मंजिल के
कमरों से हल्के और कीमती सामान
उतारने शुरू कर दिये । खिङकी से
आँगन में झाँका तो दूसरी मंजिल
खिङकियों तक डूबी थी । एक
लङका सीढ़ियों की तरफ
बढ़ा भी तो पहली चार
सीढ़ियाँ डूबी देखकर डरकर वापस
आ गया पानी अब भी बढ़
रहा था रफ्तार हालांकि कम थी।
तूली अब भी दूसरी मंजिल पर
घुटनों तक पानी में किताबें राशन
और जीवनोपयोगी सामान
पॉलिथीन में पैक करने में
लगी हुयी थी । और उठा कर
टाड़ों पर दुछत्ती पर और पंखे कुंडे
खूँटियों से लटकाने में लगी थी ।
भारी फरनीचर छोङकर लगभग
सारा जरूरी सामान उसने पैक करके
टाँग दिया था । और अब माँ और
भाई के लिये चाय बना रही थी ।
किचिन सेंकेड फ्लोर पर था ।
तभी बाहर सङक की तरफ
खुलती किचिन की खिङकी से
समानान्तर एक लाश तैरती निकल
गयी । फिर कुछ साँप और टॉर्च
जलाये डोंगी पर बैठे नकाबपोश
दिखे ।
तूली का तेज दिमाग सरसराहट से
भर गया ।
ये लोग छत की तरफ देख रहे हैं मतलब
माँ और भाई खतरे में हैं और वहाँ इनके
साथी पहुँच चुके हैं ।
तूली ने गौर से आहट ली ।
तीसरी मंजिल पर प्लास्टिक के
नागरा जूतों की आवाजें सुनी । उसने
अंदाजा लगाया चार पाँच लोग
होगें । वह अगर जाती है तो???
युवा लङकी और सैलाब में अज्ञात
लुटेरे।
क्या करे । माँ भाई की कोई आवाज
नहीं आ रही ।
मोबाईल अब भी जेब में था । उसने
एस ओ एस मैसेज किये । मैसेज हैल्प
ब्रॉडकास्ट किये ।
ज़रीना को रिंग किया । अंत में
सुहैल का नंबर याद
आया जो ज़रीना ने
लिखवाया था इसलिये कि लौटते
वक्त सुहैल कभी कभी देर से बाईक
लाता था तो उसे रिक्शे से जाने से
तूली को रोकना पङता था ।
तूली तो रुक जाती लेकिन रिक्शे
वाला बङबङ करता था। नंबर
इतनी बार लगाया कि याद
हो गया ।
सुहैल ने फोन उठा लिया ।
कहाँ स्वीमिंग की जा रही है
बङी बी!!!? आज
तो नहीं ला सकता बाईक । डूब कर
मर गयी वो तो ।
सुहैल ने जैसे ज़ख्मों पर नमक
छिङका ।
तूली ने दाँत भींचे डाँटते हुये
सारी बात कही ।
उधर से सन्नाटा छा गया ।
जबकि वह बोलती जा रही थी ।
शायद बैटरी खत्म हो गयी होगी ।
तूली ने चार पाँच चाकू
मिर्ची पाऊडर और हेयरस्प्रे । जेब
में डाला । एक बङा सा लोहे
का रॉड लेकर बे आवाज़
तीसरी मंज़िल
की सीढ़ियाँ चढ़नी शुरू की ।
आखिरी सीढ़ी पर दीवार से चिपक
कर बैठ गयी । तो देखा दो लङके
खाना खा रहे हैं । जो उसने बचाकर
ऊपर लाकर रख दिया था । गरम
चाय एक बंद टँगने वाले कंटेनर में
लटकाये तूली ने जेब से
मिरची निकाली और पीछे से जाकर
लङकों की आँखों में झोंक दी ।
लङकों ने बाज की तरह झपट कर
तूली का हाथ पकङ लिया और
आँखों की पीङा से चीखपुकार करते
हुये उसपर लात घूँसे मारते टूट पङे ।
एक लङके को कम
ही मिरची लगी थी उसने तूली के
कपङे खोलने की हरक़त की और
भयानक इरादे से उसे जकङ कर नीचे
गिरा लिया।
एक हाथ में अब भी पकङा गरम चाय
का डिब्बा तूली ने खोला और एक के
मुँह पर उछाल दिया । वह फर्श पर
गिर कर बिलबिलाता चीख पुकार
मचाने लगा । दूसरा अंधे साँड
की तरह तूली को खोज रहा था ।
तूली ने जेब से चाकू निकाल कर
पूरी ताकत से उसकी जाँघ में घोंप
दिया ।
वह छत की तरफ भागी और कमरे के
दरवाजे बंद कर दिये ।
माँ और भाई को बाँध
दिया था दुष्टों ने । तूली ने
दोनों को खोला और रो पङी ।
चाय फेंक दी थी और
खाना उसी कमरे में पीछे बंद था ।
छत से चुपके से झाँका डोंगी अब
भी दूसरी मंजिल की खिङकी से
सटी तैर रही थी । तूली ने आस पास
नजर दौङाई । पिछले साल के मकान
के फर्श की टूटी फूटी टाईल्स और
कुछ अद्धे ईँटों के पङे थे एक कोने में ।
उसने कुरते की झोली सी भरी और
एक साथ पूरी ताकत से डोंगी पर
बरसा दिये ।
अचानक आयी इस आफत के लिये
नकाबधारी लङके तैयार नहीं थे ।
डोंगी उलट गयी । लङकों को चोटें
लगी । मगर वे तैरकर भाग निकले
डोंगी अब भी वहीं उलटी तैर
रही थी ।
तूली ने आसमान की तरफ देखा बादल
छँट गये थे और दशमी का चाँद चमकने
लगा था ।
वह आर्त्तनाद सा करते हुये
चीखी बचाओ!!!!!!!!!!!! मदद!!!!!!!!!
हैल्प!!!!!!
कहीं दूर तक कुछ भी नहीं था ।
सुबह की प्रतीक्षा के सिवा और
कोई उपाय नहीं था ।
कमरे से चीखने और थपथपाने
की आवाजें बंद हो गयीं थीं ।
माँ बेटे चिपककर एक कोने में आँखें मूँदे
पङे थे । तूली ने रोना शुरू कर
दिया । पूरा दिन पूरी रात से वह
लगातार मेहनत कर रही थी ।
एक टूटे स्टूल पर सिर रखकर उसने
प्रार्थना में आखें बंद कर लीं ।
भोर हो गयी आज न
अज़ानों की आवाजें थीं न
घंटा आरती माईक । वह चौंक कर
उठी । सामने सुहैल बैठा था फर्श
पर पूरी तरह भीगा ।
तुम कब आये?
अभी जब तुम चैन से जहाज के सपने देख
रहीं थीं ।
कैसे आये??
ट्रैक्टर की ट्यूब से ।
सारी रात भटकता रहा मैं मुझे अँधेरे
में कुछ दिख ही नहीं रहा था ।
अभी बस आधा घंटे पहले चाँद चमकने
लगा तब दिशाओं का पता चला
चलो
कहाँ?
पता नहीं मगर ये जगह सुरक्षित
नहीं । बाँध से पानी और
भी छोङा जा सकता है ।
तुम कहाँ थे??
हम सब बङी मस्जिद में इकट्ठे हैं ।
वहाँ और भी तमाम औरतें हैं ।
ये लो दो बुरके लाया हूँ चुराकर
किसी तरह पहन लो ।
क्यो मगर??
सवाल मत करो तूली
और हाँ कहीं कुछ भी बोलना मत
याद रखना तुम सदमे हो एक
बाढॉ पीङित औरत ।
तूली को माँ को कुछ
भी नहीं समझाना पङा । वे कई
दशक पहले बाढ़ झेल चुकी थी । कम
या ज्यादा पर तूली डर
रही थी एक मुसलिम लङका ।
दोनों ट्यूब पर
बँधी रस्सियों को पकङकर
तीनों बैठ गये ।
आगे डोंगी बह रही थी जिसे सुहैल ने
पकङ कर खींचा और पानी में उतरकर
सीधा किया । सब आराम से मुसलिम
बस्तियों में तैर रहे थे । जगह जगह
पशु मरे पङे थे । कपङे और
कूङा फरनीचर पङा था । इस इलाके
से कभी दिन के उजाले तक में
नहीं गुजरी तूली डर इतना था ।
डोंगी बङी मसजिद के पास पहुँचने से
पहले ही । ट्यूबों पर सामान
बटोरते कुछ लङकों ने सुहैल को रोक
दिया । कहाँ जा रहे हो कौन है?
मेरी मंगेतर और सास है । कल
ही आयीं थीं आज मुसीबत में फँस
गयीं ।
लङके हो हो हो करके हँस दिये ।
बढ़िया वस्ताद!!
पूछ लेना कहीं डर कर
मँगनी तो नहीं तोङ देंगी ।
आओ जल्दी छोङके फिर चलते हैं कुछ
धंधेपानी की जुगाङ पर ।
तूली अब बुरके में थरथर काँप
रही थी डर ठंड और भूख ने
तूली की हालत बिगाङनी शुरू कर
दी थी ।डोंगी मसजिद से आगे निकल
गयी । तब तूली ने पूछा हम
कहाँ जा रहे हैं?
पता तो मुझे भी नहीं तूली बस इस
खतरनाक जगह से तुम
सबको निकालना चाहता हूँ ।
मेरा परिवार
भी पता नहीं कहाँ किसके कैंप में है
।हैली कॉफ्टर!!!!
इतनी देर में पहली बार
मुन्ना बोला ।
पैकेट गिरे मगर दूर ।
सुहैल ने फिर भी दो पैकेट उठा लिये

टॉर्च दवाई और
सूखा खाना पानी का पाऊच।
चारों ने
थोङा थोङा लिया बाकी बचा लिय
डोंगी किनारे लगी ।
वहाँ जहाँ कभी स्कूल था ।
सैकङों लोग पङे थे बेघर और लाचार

सबने ने उतर कर । कैंप पर
खोजना शुरू किया । थोङी ही देऱ
में सुहैल का परिवार मिल गया ।
लेकिन अब्बू चाचा और
दादा का पता नहीं था ।
वे लोग घर की सामग्री बचाने
को कस्बे में रूके थे ।
सुहैल तूली और ज़रीना ने
कपङों को सिलना शुरू किया । और
एक तंबू सा ट्रैक्टर पर तान
लिया । लोग अफरा तफरी में थे ।
गीले बुरके निकाल कर सूखने डाल
दिये थे । ज़रीना की अम्मी ने
खाना निकाला ।
बहिन जी कुछ खालो!
तूली की माँ हिचकिचाई
जरीना ने तूली की तरफ देखा ।
वहाँ बरतन कहाँ थे कुछ माँडे अचार
ही रख पायीं थीं ।
तूली ने जेब से रूमाल निकाला एक
बङी सी रोटी रखी और खानी शुरू
कर दी । तूली की माँ ने
भी शुक्रिया कहा और
खाना खा लिया ।
रात होनी थी सो हो गयी ।
कलेक्टर साब आये एक एक प्लास्टिक
शीट और समाज सेवियों के बने खाने
के पैकेट ही शाम तक की मदद रहे ।
रात को तूली की नींद
खुली देखा कुछ लोग ट्रैक्टर के
चारों तरफ मँडरा रहे हैं ।
उसने सबको चौकन्ना कर दिया ।
पाँच औरते पाँच बच्चे एक युवक सुहैल
निहत्थे । दूर पुलिस वाला बैंच पर
ढाबे के बाहर लेटा डंडा लिये
सो रहा था ।
स्कूल के भीतर लोग अब भी बाते कर
रहे थे लेकिन सङक किनारे मंदिर के
मेला मैदान में खङे ये वाहन अँधेरे में
डूबे थे ।
सुहैल ने ट्रैक्टर स्टार्ट करके
भगाना शुरू कर दिया । स्कूल
की तरफ जो एक फर्लांग
की दूरी पर था ।
पाँचो साये ताबङतोङ वार करने
लगे सुहैल के हाथों पर पीठ पर ।
रफ्तार नहीं छोङी उसने और स्कूल के
फाटक के भीतर ट्रेक्टर ले आया ।
उतर कर फाटक बंद किया और
वहाँ पुलिस को सब खबर की ।
रात में वहाँ पेट्रोमैक्स लेकर
कॉम्बिंग की कोई नहीं मिला ।
बाढ़ उतर गयी ।
लोग घरों को लौटे । लुटे पिटे
परिवार बसने लगे ।
कुछ दिन बाद तूली के परिवार
को थाने बुलाया गया । सुहैल
को साथ ले गयी तूली ।
इन लोगों को पहचानती हो?
ये दोनों बेहोश घायल पानी में पङे
तुम्हारे घर से बरामद हुये थे ।
आँखों की मिरचे धोने सीढ़ियों पर
गये और फिसल गये ।
इनको हमारी टीम ने
बचाया घरों की तलाशी में ।
नहीं सर!!!
ये चोरी करने आये थे । जान बचाने
का मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।
मगर मैं पहचानता हूँ सर!!
ये मेरे मुहल्ले के छँटे दादा है और वह
जाँघ पर पट्टी बाँधे
बैठा मेरा तयेरा भाई है। इन
लोगों ने और भी चोरियाँ की ।
तभी तूली की नजर थाने के बीच
मैदान में नीम तले शान से बैठे पाँच
लोगों पर गयी ।
ये यहाँ क्या कर रहे हैं?? सर!!
ये लोग मेला ग्राउण्ड में चल रहे
राहत कार्यों के स्वयम् सेवक हैं ।
एक संस्था भी चलाते हैं
नारी निकेतन।
बे सहारा लङकियों के पुनर्वास
की।
यहाँ से राहत सामग्री लेने आये हैं
जो थाने की कस्टडी में हैं ।
होगा सर!!
परंतु ये वही पाँच लोग हैं जो उस
रात मुझे और ज़रीना को उठा ले
जाने और ट्रेक्टर पर
बङा मोटा माल मिलकर लूटने
का प्लान बना रहे थे ।मैंने साफ
देखा एकादशी के चाँद में फिर
ट्रैक्टर की रोशनी में । मुझेऔऱ
जरीना को तो लगभग खींच
ही लिया था ।
इनको मालूम था कि वहाँ मुसलिम
परिवार रूके हैं मेला ग्राउंड में ।
वो है लंबा तगङा गोरा सा अधेङ
वो मेरे सगे चाचा हैं ।
जिनको पता नहीं था कि बुरके में
मम्मी और मैं हूँ मैं हमारे घर से
चौथा घर इनका है । हम बगिया में
मकान बनाकर रहने लगे चार साल से
इन्होनें हमें बाप की तरह पाला है
। मगर उस रात कह रहे थे
लङकियों को लेकर सीधे अड्डे पहुँच मैं
यहीं रहकर हाल चाल लूँगा तीन
पाँच बजे सुबह तक ।
सुहैल नें सैकङों डंडे खाये फिर
भी स्टेयरिंग नहीं छोङा ।
ये न होता तो????
हम तो एक हफ्ते से इन लोगों के
ही घर रह रहे है सर ।
हमारे तो घर में अब
भी पानी भरा है ।तभी सुहैल
बोला ।
हाँ साब सैलाब में सब बह गया ।
दबी छुपी डर की गठरियाँ भी ।
बाज़ी!!!!!रो मत
बरबाद तो सभी हुये ।
पर मैं आपकी हिम्मत को सलाम
करता हूँ । आप सचमुच भूतनी हो।
पगला!!!
बहिनों के नाम बिगाङना कब
छोङेगा??
जब आप मुझे
कठमुल्ला कहना छोङोगी ।
अब नहीं कहूँगी मेरे छोटू!!
तूली हिलक कर रो पङी ।
घऱ आकर
सुहैल जरीना से बोला ऐ नज़ाकत
बानो ।
हमारी तलवारतूली बाज़ी से कुछ
तो सीख लो।©®¶
Jul 9

Saturday, 20 July 2013

माटी गाँव की :बुंदेली गीत

Sudha Raje
Sudha Raje
रोरी हरदी धर टीका भर
माटी अँचरा छाँव
की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर जौ
माटी मोरे गाँव
की।।
बाबुल मोरी पठौनी धर जौ ।
माटी मोरे गाँव की ।।
****
थोङौ नीर नदी कौ ।
थोङी धोवन तोरे
पाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर
जौ माटी मेरे गाँव
की।।
*****
पईयाँ पईंयाँ जब लरकैयाँ चली पकङ
बाबुल की बईंयाँ
उतर घुटरूअन चाटी माटी मार सपाटे लै
गई कईंयाँ
।।
तनक सियानी भएँ मोरी मईया।
परदेशी खौँ सौंपी बईयाँ।।।।
माटी बालेपन की गुईंयाँ----—°°°°°°°
''''''यादें छूटे
ठाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मोरे
गाँव
की।।
***********
बेर मकोर करौंदे
टेंटी ।।कैंथा इमली झरबेरी।।
डाँग जलेबी ,होरे भुन्टा महुक कसेरू और
कैरी।।
तरस तरस गई मामुलिया खौँ ।
भई ससुरार महा बैरी ।।।।
ज्वार की रोटी दूध महेरी°°°°°°°°°°°°°
°° "काँय"^
)वीर
के नाँव की"।।
KAA'NY EK MITTI KI KONE HOTI
HAI JO BHAI KE LIYE BAHINE gaur
ko charhati hai navratri mein
Suaataa ke khel mei
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव
की।।
******
माटी के शंकर गनगौरें हाथी घोङे
माटी के।।।
एङी गल गुच्ची घरघूले चाक गिंदौङे
माटी के।।
माटी खेल बङे भये सपने
काया जोङे माटी के ।।
मिट्टी के वे चूल्हे बाशन•••••••••••
वो हाँडी गुङियाओं की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव
की।।
°°°°^°°°°°°°°°°°
मिचकी पींग हिलौंरे होरी।
कीच रंग भँग हुङदँग की।।
कोह्नी घुटने छिले
मली वो माटी बूटी अँग अँग की।।
कनकौए कंचे बौ अक्ती संकरात सुध सतरँग
की ।।
केश धो रही भौजी खा गयी••••••••••••
•••••• सौंधी महक
कथाओं की।।
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की
©®¶©®¶
माटी मोरे देश की माटी ।।
हा •••••बिछुङे
परिवेश की माटी....
पूरे संस्कार संस्कृति की गुरूअन के उपदेश
की माटी।।।
सत्ती माई के चौरे की।
भसम शहीद चिताओं
की।।
अम्मा मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव
की
©®¶©®¶
SUDHA RAJE
DATIA**★Bijnor
Jan 29

गीत::एक मीरा नहीं और भी नाम हैं

Sudha Raje
भीगी पलकें न छेङो हमारी पवन!!!!
कहीं फिर से न बरसें भरे से नयन ।
आये—जाये जो सावन तो मैं क्या करूँ!!!!
ना रँगों से डरी ना मैं घन से डरूँ।
होलिका दामिनी बर्फ हो या अगन ।
कहीं फिर से न बरसें भरे से नयन।
सबको रोने को काँधा मिले भी तो क्यों!!
हो निठुर श्याम राधा खिले
भी तो क्यों।
बाँसुरी मूक है सुर बधिर है जमुन ।
कहीं फिर से न बरसें भरे से नयन।
एक मीरा नहीं और भी नाम हैं।
इक कबीरा नहीं राम या श्याम हैं
साधना में कई हैं दफन भू गगन ।
कहीं फिर से न रो दें भरे से नयन ।
अपनी ही खोज में जो रहे डूब गये ।
विश्व की व्यर्थता देखते ऊब गये।
है भ्रमण मात्र ही जागरण जग शय़न ।
है कहीं --------------
©®सुधा राजे
sudha Raje
Yesterday at 1:42pm

कव्वाली

Sudha Raje
कोई ख़ाक डरायेगा उसको जो शख़्स
मुहब्बत सह जाये।
जो इश्क़ पिये औऱ् हिल न सके ।वो आग़ में
ज़िन्दा रह जाये।
वो फ़र्दे -बशर 1-ग़म हो या ख़ुशी हर
वक़्त नशे में रहता है।
वो ग़ैबो-ग़ज़ब -2इस दुनियाँ के।
कब गिनता है कब डरता है।
ठहरे तो ग़रीके जन्नत हो ।
उबले तो अज़ाईम 3-बह जाये ।
ये ग़ैरमुक़म्मलपन उसका
सरबाज़ बनाता जाता है।
ये दर्दे सिजन 4-सरताबी से
परवाज़ बढ़ाता जाता है।
बे ज़ार वो अपनी हस्ती से।
हो सीना सिपर कब ढह जाये ।
©®Sudha Raje
सुधा राजे
©®सुधा राजे
Sudha Raje

Friday, 19 July 2013

हम गँवार ::कविता

Sudha Raje
ग्रामवासिनी
हम गँवार
बाबूजी समझें
गाली है
शहर
खा गये सब कुछ मेरे गाँव
की झोली खाली है
दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते
फल खाते माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के
रमदसिया मरने वाली है
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये
आम आँवले बेर तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख
पिसी तिल धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
काली भई घरवाली है
भैया जी केँ गये एक दिन शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है
धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर
काट काट कें चिक्कर गये
अव्वल की ये
डिगरी ऊँची बिन रिश्वत
बेमाली है
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी मिक्सर
कहाँ कुदाली है
©®¶©®
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है
ले जाते मजदूर बनाकर बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे मजदूर
की फूटी लोटा थाली है
©®¶©®¶
कहाँ कौन सा देश और
सरकार !!!!!!
हमें तो थाना है
इज्जत जाये कतल हो चाहे
पंचों की दल्लाली है
पाँच साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है
पटबारी को पैसे नई गये
पैमाईश में फँसा दियौ
गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोके
अबके कान की बाली है
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे
शहर पढ़ाबें
जी
काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर
तबीजें करते रये
तीन
छोकरी हो गयी तिस पे
अब आया बंगाली है
रोज रात के हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोये
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे
खोटी, किस्मत वाली है
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है
सुधा भात पे चीज
चढैगी भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें
चिंता नींद उङाली है
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी मेट
की भेंट चढ़ाली है
हस्पताल की दवा डागधर शहर
बेचते चोरी से
दाई जनाबे बच्चा मर गयी
बिंदू की घरवाली है
मच्छर बाढ़ बुखार चोर
भी अब ओझा ने पंडित ने
बची खुची बिगङी औलादें
इनकी भली चलाली है
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला में
जो केबें परधान वो होबे
देश सवाली है
हमसे घृणा करें रिश्ते भी
नही बताते देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा
हम तो बैठै ठाली है
®©¶¶©®
SudhaRaje
datia --bijnor
Jun 18 at 9:47am

अतृप्त आत्मा ::कहानी

Sudha Raje
17-7-2013//7:03pm
अतृप्त आत्मा ::कहानी खंड चतुर्थ:अंतिम
कङी :
••••••
इंस्पेक्टर काळे का कहना था भूत
हो सकता है नर्तकी हो ।
या राजपुरोहित
या छोटी रानी या कोई भी ।
किंतु मेरा मन नहीं मान रहा था।
आखिरी प्रयास के तौर पर मैंने स्थानीय
पुलिस द्वारा निकाली गयी कार देखने
का फ़ैसला किया।
उसमें गयंद के चारों भाई परिवार सहित
मृत पाये गये थे । दस व्यक्ति के बैठने
लायक वह एक मँहगी कार थी जिसे
खरीदना उन किसानों के बूते के बाहर
की चीज थी ।
मैं लौटना ही चाहता था कि मुझे कुछ
दिखा ।
वह एक माला थी ।
साधारण सी वस्तु जो डैशबोर्ड से फिसल
कर इग्नीशन में फँसी चाभी पर लटक
रही थी आधी टूटी माला । जिसके हर
गुरिये पर एक गाँठ लगी थी।
आधी कहाँ है??
मैंने बरामद सामान देखा और सारी कार
छानबीन करायी डैड बॉडीज पर
भी आधी माला नहीं थी।
कार बंद थी और कोई सामान नदी में
बहा नहीं था।
फिर आधी माला कहाँ गयी ।
लाल चंदन की वह माला मेरे दिमाग में
ठक ठक कर रही थी।
तभी काळे ने कहा ।
यार बनर्जी!!! मुझे लगता है मैंने
माला कहीं देखी है ।
कहाँ काळे याद करो ।
किसी के हाथ में ।
मैंने एक एक करके सबके नाम लिये जिनसे
हम दोनों पिछले सप्ताह मिले थे।
राजगुरु!!!!!!
काळे चीखा
व्हाट
???
हम लोगों ने कार फिर नगर की तरफ
घुमा दी ।
थोङी ही देर में हम दोनों राजगुरू
की टूटी फूटी आलीशान हवेली में थे।
वृद्ध व्यक्ति धवल श्वेत दाङी पगङी और
उत्तरीय पहने अपने भव्य व्यक्तित्व से
किसी का भी मन मोह ले ।
काळे ने पूछा
पंडितजी माला कहाँ है ।
राजगुरू मुसकराये । कौन
सी माला दरोगा जी?
ये?
उनके हाथ में हू ब हू वैसी ही एक और
माला थी जिस पर जाप लगातार
जारी था।
हमने उल्लुओं की तरह एक दूसरे को देखा।
पंडित जी ये खास चंदन है दुर्लभ
मलयगिरि चंदन
जो यहाँ किसी जोगी बिसाती पर
नहीं मिलता । आप बतायेंगे ये माला किस
किस के पास हो सकती है?
ये मैं कैसे बता सकता हूँ? लेखक साहब?
वृद्ध के चेहरे पर परम शांति थी।
हम लोग लौटने लगे ।
तभी एक नौकर चाय पानी ले आया ।
मेरा ध्यान आधी माला पर था।
तभी काळे ने पूछा पंडित जी आप आनंद के
क्या लगते हैं??
पुत्र!!
व्हाट??
उनका तो """""""
नर्तकी रतनदेवी से प्रेम था!! यही न?
उस ज़माने में बाल विवाह होते थे ।
आनंद मेरे पिता थे । मेरी माँ से सात वर्ष
की आयु में विवाह और बारह वर्ष
का गौना होकर सोलह वर्ष की आयु में
मेरा जन्म हुआ था ।
तभी माँ को पता चला पिताजी के
संबंधों का और बीस वर्ष की आयु में
उन्होंने विष खाकर प्राण त्याग दिये ।
मुझे दादी ने पाला।
मैं कभी पिताजी का प्रेम
नहीं पा सका ।
मैंने फिर विवाह ही नहीं किया ।
ये माला मुझे पिताजी ने काशी से मेरे
जन्म पर लाकर पहनायी थी । तब से
ही मेरे पास है।
मैंने देखा वृद्ध अशक्त है और ऐसे कांड
नहीं कर सकता।
हमने वापसी से पहले हवेली के शेष
पुजारियों से मिलने की ठानी ।
तीन से मिलकर निराश हो चुके
तो इंस्पेक्टर ने दुबारा डाक बंगले पर
आकर शेरसिंह से पीने खाने का इंतज़ाम
करने को कहा और हम
आखिरी व्यक्ति मंदिर के महंत से मिलने
चल पङे ।
महंत कोई पचास साल का प्रौढ़
गौरवर्ण हृष्टपुष्ट था । चाँदी से सफेद
बाल और बढ़ी हुयी दाङी पीले वस्त्र ।
जाने क्यों इसबार गौर से देखने पर मुझे
उसकी शक्ल राजगुरू की तरह ही लगी।
बस आयु में बीस साल का अंतर ।
हम लोगों ने मंदिर दर्शन करके कुछ
फोटो निकाले और पूछा कि
-""महंत साब आप यहाँ कब से हैं??
यही कोई तीस साल से ।
कैसे आये यहाँ?
गयंद जी ने हमें रोक लिया हम तो अनाथ
बाल ब्रह्मचारी थे बस यहाँ संगीत मेले
पर आ जाते थे साधुओं के साथ!
पहले कहाँ थे?
महोबा
वहाँ कहाँ से आये?
किसी साधु को पङे मिले थे जंगल में ।
जंगल!!!!!!
हाँ कोई वहीं एक देवी के चौरे पर छोङ
गया था।
अचानक काळे ने मेरा हाथ दबाया।
टूटी हुयी माला का आधा भाग नटराज
की प्रतिमा के चरणों में चढ़ा था ।
और महंत के हाथ में कोई
नयी माला थी आज । मुझे याद आया कुछ
और मैंने पुराने फोटो निकाले ।
महंत साब इन्हें पहचानते हैं?
हाँ
ये राजगुरू है ।
और इन्हें?
ये हमारे राजपुरोहित आनंद का चित्र है
महल का।
ये देखो दो मालायें इनके गले में हैं
हाँ
एक राजगुरू के पास है ।
तो?
दूसरी आप के पास थी?
नहीं तो
ये रही महंत साब आधी माला ।
अब????
काळे अरेस्ट हिम ।
जब हम लोग महंत साब को हवालात
भेजकर डाकबंगले लौटे सामान उठाने
तो मीडिया का हुजूम और गाँव के लोग
हमारे खिलाफ नारे लगा रहे थे।
थोङी देर में हमारे बयान के बाद
सन्नाटा छा गया।
महंत
दरअसल नर्तकी रतनदेवी और आनंद
का पुत्र था। जिसे जन्म के समय चंदन
माला पिता ने पहनायी थी ।
नर्तकी रात के अँधेरे में ज़ान बचाने
तालाब में कूदी तो तैरकर दूसरे छोर पर
जा पहुँची । वहाँ बच्चे को घाट पर रख
ही रही थी कि फिसल कर वापस
जा डूबी । कुछ चोरों ने बच्चे के जेवर
उतारे और जाकर जंगल में साधुओं के टोले
को आता देख बच्चा छोङकर जा छिपे।
बच्चा जब साधुओं ने उठाया तो राजोचित
पोशाक़ देखकर पाल लिया और
महोबा दरबार में पुजारी को सौंप
दिया। चंदन माला और राजमुद्रा देख कर
पुजारी सब समझ गये
नर्तकी का पता लगाया किंतु वह
नहीं मिली । तालाब से उसकी लाश
मिली ।
पुजारी ने जब अरिदमन के परिवार
की कथा जान ली तो मरते वक्त सब कुछ
महंत ज्ञानेंद्र को सुनाया। और
निशानियाँ सौंप दीं ।
माँ पिता के प्रतिशोध ने उसे उस धन
को और परिवार को तबाह करने की जिद
दी और वह गयंद के नशे और जुये की लत
का फायदा उठाकर मंदिर में आ डटा।
वहाँ से सारा धन लगातार वह
निकालता और
अनाथालयों साधुकावासों और
नारी निकेतनों में बाँटता।
बलिष्ठ और युद्धकला में माहिर
ही नहीं वेश बदलने में निपुण ज्ञानेंद्र
नर्तकी का वेश रखकर
लोगों को डराता और जब डर जाते
तो मार देता।
जिसने भी देख लिया कुछ शक भरा वह
भी फाँसी से या धकेल कर मार देता।
किरायदार की बीबी प्रसाद में मिले
स्लो पॉयजन से मरी तो लङकों को खुद
घरवालों ने मरवा दिया जब महंत को भूत
भगाने का उपाय करवाने बुलवाया।
वह आराम से बाहर आकर
कहता रखवाली करना द्वार पर और
रात में जाकर बेहोश
व्यक्ति को लटका देता ।
गाँव के घर एक मंजिला और लोग डरपोक
पोस्टमार्टम कौन कराता।
गयंद के भाई भी महंत को प्रेतमुक्ति के
लिये गये थे । जब गयंद का चुराया धन
हाथ लगा तब।
कार को महंत चला रहा था और मोङकर
कूद गया नदी में । किंतु माला द्वार बंद
करते टूट गयी
महंत राजगुरू का भाई है ।
©®सुधा राजे
Wednesday at 8:18pm

अतृप्त आत्मा ::कहानी

16-7-2013//5:35Pm
अतृप्त आत्मा ::कहानी ::*तृतीय खंड ।।
°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°
जब मैं डाक बंगले पर लौटा तो दिमाग में
छोटी रानी राजपुरोहित आनंद
राजा रिपुदमन और राजनर्तकी रतन
की प्रेम कथा त्रासदी और
बेबसी की कथा किसी चलचित्र सी दौङ
रही थी ।
मैंने इंस्पेक्टर काळे से
पूछा -""क्या कहती है पुलिसिया नाक?
यहाँ लगभग पचास मौतें हुयीं हैं । एक
दो को छोङकर ज्यादातर आत्महत्यायें
रहीं । क्या लगता है यहाँ? प्रेतात्मायें
या कोई गिरोह? ""
यार बनर्जी!!! मेरी भी खोपङी घूम
रही है ।
काळे ने पैग बनाया और बर्फ डालकर मुझे
थमाया ।
ओहो तुमने फिर इतना सारा सोडा कर
दिया!!!
बंगाली का पीना और कलकत्ते
का ज़ीना सबके बस की बात
नहीं इंस्पेक्टर!!
मैंने वाईन का मिक्सचर ठीक किया ।
देर रात तक कहानी का दूसरा भाग
लिखकर जब मैं निशाचर वृत्ति वश बाहर
बरामदे में आया शेरसिंह
बीङी पी रहा था । मैंने सिगरेट
जलायी और वहीं अलाव के पास कुरसी पर
बैठ गया ।
शेरसिंह!! यहाँ कस्बे में बाहरी लोग
भी आते जाते हैं?
नहीं बाबू!
कभी किसी का दूर दराज़ का रिश्तेदार
आ जाये तो जल्दी ही पहचान में
बोली की वज़ह से आ जाता है । जबसे रैम्जे
भाई का स्कूल बंद हुआ कोई नहीं आता ।
लेकिन हाँ पुरातत्व वाले और कोई कोई
शौकिया फोटोग्राफर जरूर आ जाते हैं ।
मेरी उत्सुकता बढ़ी ।
वे लोग रुकते कहाँ हैं?
यहीं साब और क्या रखा यहाँ ।
उनके कुछ नाम पते?
ठहरिये साब मैं रजिस्टर लाता हूँ।
पाँच मिनट में लगभग ग्यारह बजे मैं
डाकबंगले की सूची पढ़ रहा था । मैंने कुछ
नाम पते नोट किये और ट्रांसमीटर से कुछ
दूर दराज के साथियों को संदेश दिया उन
पतों की हक़ीकत निकालने का ।
सुबह हम लोग नौ बजे तक शेष मालिकों से
मिल चुके थे ।जो सब पुजारी कुटुंब से ही थे

और बाकी कहानी जो पता चली वह एक
करुण कहानी थी।
छोटी रानी को न तो राजा अरिदमन
का प्यार मिला न राजपुरोहित आनंद
का । बङी के विवाह के पाँच साल बाद
मँझली आयीं थीं और दस साल बाद छोटी ।
इसलिये सारा महल
बङी रानी का वफादार था । महल
को चार लंबी दालाने चारों कोने पर बने
दस दस कमरों के पृथक भवनों से
जोङती थी वरना सब खंड अलग ही थे ।
तीन कोने तीन रानियों के । नैऋत्य में बने
भवन में राजा पुरूष कर्मचारियों सहित
रहते जो अंदर नहीं जाते । कुछ किन्नर और
दासियाँ ही अंदर आतीं जातीं थीं।
किन्नर बाहर आ जाते थे ।
दासियाँ सिर्फ रानियों के साथ
ही बाहर आतीं।
इन्ही में एक किन्नर सुंदर बलिष्ठ
भरती हुआ "नवल बाई"। जिसका प्रभाव
हवेली पर पङने लगा था कि सुबह रोज
संगीत की कक्षा चलने लगी थी और
छोटी रानी को संगीत सीखने का शौक़
लग गया ।
राजा का रतनदेवी पर प्रेम
बढ़ता गया । जो नहीं होना था वह
चमत्कार हो गया ।
रतनदेवी गर्भवती हो गयी । विवाह के
बीस साल बाद!!! संतान!!
वो भी राजनर्तकी के गर्भ में ।
राजा को नर्तकी के चरित्र पर संदेह
हुआ। जासूसी की गयी जो व्यर्थ रही।
राजा चिंता में जिस संतान को तरसते
उम्र गुजर गयी वह
मिली भी तो किसकी कोख से!!!
ना स्वीकारते बनता ना ही दुत्कारते ।
अंत में गुप्त रूप से एक बुजुर्ग पुरोहित
को बुलवाया गया कहने लगा कि ये पुत्र है
। और जन्म ले लिया तो सम्राट
हो जायेगा । किंतु इस पर कालसर्प योग
है जो मृत्यु योग बना रहा है।
छोटी रानी को जैसे ही पुत्र के आने
का पता चला उसने तालाब के पार नवल
किन्नर को बुलवा लिया । पाँच साल के
वियोग ने उसको निष्ठुर और को व्याकुल
बना दिया था ।नवल ने रानी से
कहा कि राजा केवल पुत्र पैदा होने तक
नर्तकी को महल में रखेंगे और वह
आपका पुत्र कहलायेगा ।
। रानी ज़िद मान
बैठी नर्तकी को हटाने की हठ ठान ली ।
नवल केवल ज्ञानी का कर्त्तव्य
उठा रहा था।
रानी के आदेश पर नवल को गिरफ्तार कर
लिया गया ।
ज़ुर्म राजमहिषी के खजाने पर बुरी नज़र

नवल असफल प्रेम के इस प्रतिशोध पर
ठठाकर हँसा।
कैदखाने में पङी नवलबाई । राजभवन में
आने से निषिद्ध रतनदेवी ।
सत्ता जाने की चिंता में बङी रानी और
वियोग में जलती छोटी रानी।
राजा की हठ पर नयी हवेली की तामीर
शुरू हुयी जहाँ रहना था अब
तीनों रानियों को । और "अरिदमन
विलास
"में रतन देवी रहने लगी एक खंड में ।
नर्तकी महल में आ गयी । बङी रानी दूर
राजधानी चलीं गयीं मँझली रानी के साथ
वहीं अपने लिये मुकर्रर भवन में दत्तक
पुत्र गयंद को ले गयीं ।
छोटी रानी!!
जिसे अभी तक
पता ही नहीं था कि राजपुरोहित आनंद
उसे प्रेम करते हैं या नहीं ।
वह सिर्फ बंजर जमीन सी जलती रहती।
राजा कभी कभार उसके रूप यौवन पर
तरस खाकर आ जाते और एक लंबे अरसे
को फिर रतनदेवी की ओढ़नी में
जा छिपते।
सारे महल में रतनदेवी के चित्र सजने लगे ।
राजा महान कलाकार थे रतन देवी अब
सिर्फ राजा के लिये नाचती अंतःपुर में ।
ठीक समय पर पुत्र का जन्म हुआ ।
कैदी रिहा किये गये नवलबाई को सेवा के
लिये रतनदेवी ने माँग लिया।
राजा उत्सव में मगन थे। काशी को खबर
भेजी पता चला आनंद वहाँ से भाग गया ।
कहाँ? वृद्ध दादा ने खोज करायी।
पता नहीं चला । रमल
लगाया जो कहता आनंद यहीं है
कहीं नहीं गया ।
एक रात
राजा छोटी रानी के महल में थे। वहाँ से
जब अचानक आधी रात को पुत्र को देखने
की इच्छा हुयी तो रतन देवी के कक्ष में आ
गये दबे पाँव कि नींद न खुले माँ बेटे की ।
लेकिन ये क्या!!!!
ये नवलबाई का स्त्रीवेश तो नीचे कालीन
पर पङा है । और एक पुरूष रतनदेवी के
साथ सो रहा है लिपटकर
दोनों निर्वस्त्र!!!
राजा ने तलवार निकाली औऱ
दोनों का सिर धङ से अलग करने चल पङे ।
तभी पुरूष की नींद खुली ।
ओहह ये तो राजपुरोहित आनंद है ।
इतना बङा धोखा।
दोनों ने पैर पकङ लिये ।
ब्राह्मण की हत्या मत करो राजा ।
हम राज्य छोङकर चले जायेंगे ।
रतनदेवी चीखी।
दोनों ने अपने वही वस्त्र लपेटे चाँदी के
पालने से रेशम पर सोते पुत्र को उठाया।
ठहरो!!!
ये तो मेरी संतान है । ये
कहीं नहीं जायेगा।
अब नर्तकी हँसी ।
"राजा आप नहीं जानते हम
दोनों ही कैशोर्य के प्रेमी । किंतु
देवदासी ब्राह्मण से से विवाह नहीं कर
सकती थी। न ही कोई इस सच को जानकर
आनंद को नगर में रहने देता न मुझे मंदिर में
। राजगुरू को तो नर्तकी की छाया से
भी पाप लगता है।
तब तक आप हम पर रीझ गये ।
हमने लाख वास्ता दिया आप नहीं माने
मनमानी की ।
राजभय ने हमें विवश किया कि आप ही से
विवाह करलें ताकि हमारा पुत्र
राजकुमार कहलाये "भांङ" नहीं । किंतु
बीच में छोटी रानी बेला जाने कहाँ से आ
गयीं आनंद पर मर मिटीं । और आपने दंड
हेतु उन्हें काशी भेज दिया।
वहाँ से मैंने उसे नवलबाई के रूप में
बुलवा लिया संगीत मंडली में ।आनंद मेरे
लिये आया है ये छोटी रानी तो मात्र
खिलौना है ।
आपने छोटी रानी ने हमें अलग कर
दिया और विवश भी ।
राजा आप किसी से झूठ बोलो स्त्री से
क्या बोलोगे?। आपका मान सम्मान आतंक
रुतबा कितना ही महान हो भय से
रानी चुप रह सकती है नर्तकी नहीं ।आप
एक पुरूष वेश्या से ज्यादा कुछ नहीं ।
मात्र वासना के खिलौने । न स्त्री से
प्रेम किया न संतान दी। पौरूष के कई
अर्थ होते हैं राजा सिर्फ स्त्री पर
पाशविक विजय मात्र नहीं । हृदय
भी जीतना पङता है । मेरा रोम रोम
आनंद का है । हम कोई सती और
पतिव्रती नहीं नर्तकी हैं । जो एक
की हो तो भी लांछित अनेक
की हो तो भी कलंकिनी।
जब आपने लोकभय से विवाह की रस्म
नहीं की । पुत्र चाहा ताकि आप
छोटी रानी का बेटा कहकर वारिस
भी पा जायें और बदनामी भी न हो ।
मैंने सोचा था तब तक रानी बनी रहूँ ।
किंतु नर्तकी तो हूँ कोई
राजकुमारी नहीं ।न तो धन बिना रह
सकती हूँ न आनंद के बिना ।
आनंद पश्चाताप से भर उठा था । उसने
तलवार उठाकर कहा मैं
आपको ब्रह्महत्या से मुक्त करता हूँ और
तलवार पेट में पूरी ताकत से भौंक ली।
पीछे छोटी रानी राजा को वापस ले
जाने आय़ी थी उसने वहीं से आनंद की बातें
सुनी जब नीचे गिरते देखा तो ग्लानि वश
झरोखे की तरफ भागी और सबसे ऊँची छत से
छलाँग लगा दी ।
नर्तकी पुत्र को लिये खङी थी भाग
खङी हुयी । राजा ने महल से बाहर
पहरेदारों को जिंदा या मुरदा गिरफ्ता
करने का आदेश दिया । वह कोई बचाव न
देखकर । तालाब में कूद गयी बच्चा गले में
बाँधकर।
चीखती हुयी
""राजा मैं पुत्र सहित डूब रही हूँ ।
जो भी अब इस महल में रहेगा या इस
दौलत को ले जायेगा मेरी ही तरह विवश
खुद अपनी मौत मरेगा ।""
राजा लुटे पिटे हृदय के साथ सुबह सबके
सामने कहानी बना रहे थे कि नकाबपोश
शत्रु के आक्रमण और नवलबाई
की बहादुरी की। जिसे वापस स्त्रीवेश
पहनाकर जला दिया गया था।
महल पर"" नव ''जोङ दिया गया ।
"""नवरतन महल """
बङी मँझली रानी गयंद को लेकर आ गयीं ।
एक रात मँझली रानी के महल से नशे में
राजा छत से गिरे और मर गये।
मँझली सती हो गयी ।
बङी रानी ने गयंद को सत्ता सौंपकर
वैराग ले लिया । और गंगा में एक दिन
तीर्थस्नान में बह गयीं।
गयंद अफीम के नशे में बिगङता गया । और
महाजनों साहूकारों दरबारियों के
हाथों लुटने लगा।
रतनदेवी को जो धन राजा ने दिया जिस
दिन सब बिक गया गयंद की पत्नी ने क्लेश
में शंखिया पीसकर खा लिया औऱ मर
गयी।
तीन बेटियों और एक पुत्र को गयंद के ससुर
लिवा ले गये जो साथ में
बचा कीमती सामान भी ले गये थे
लङकियों की आम परिवारों में शादी कर
दी । लङके को साँप ने डँस लिया।
एक दिन गयंद नशे में जुऐ में सबकुछ हार
गया तो हवेली पुजारी को बेचकर अपने
औरस पिता के गाँव जा बसा। वहाँ से
भी भाईयों से धन लेकर कहीं चला गया ।
तब से कोई नहीं जानता । वह कहाँ है।
हवेली तबसे लगातार किसी न
किसी की मौत से बदनाम
होती गयी बिकती गयी।
सुना है गयंद कहीं ज्यादा अफीम खाकर
मर गया ।
मुझे अलग अलग नगरों के खास तीन
आदमियों का पता चला जो कई बार
फोटोग्राफी और पुरातत्व के नाम पर आये
थे ।
गयंद की तीनों बेटियों के पति ।
जो उन लङकियों के मुँह से बचपन कैशोर्य के
वैभव की कहानियाँ सुनकर खजाने
की तलाश में आये थे । क्योंकि न तो गयंद में
राजपरिवार का खून था न ही हवेली पर
कानूनन हक़।
मैंने केस के सारे पहलू देखे मुझे कहीं से कोई
लॉजिक नहीं समझ में आ रहा था ।
आत्महत्याओं का।
अगले दिन मैंने फाईनल रिपोर्ट
लगा दी कि महज इत्तेफाक है
जो किसी की मौत का तार हवेली से जोङ
दिया गया ।
शाम का अखबार
महाराणा प्रताप नगर के अपने फ्लैट में
पढ़ रहा था कि चौंक पङा ।
मैंने काळे को तुरंत फोन लगाया ।
तुमने ईवनिंग न्यूज देखी?
हाँ यार ये कैसे संभव है?
एक व्यक्ति कार लेकर परिवार सहित
शो रूम से आ रहा था और अचानक कार
मोङकर खुद ही कार सहित पुल की रेलिंग
तोङते हुये नदी में कार डुबो कर सुसाईड
कर दिया सपरिवार!!!!!
वो गयंद का भाई और परिवार थे
जरूर कुछ मोटा माल लाये होंगे ।
शेष फिर
©®सुधा राजे
Tuesday at
8:30pm ·

अतृप्त आत्मा ::कहानी

13-07-2013///11:53///AM
अतृप्त आत्मा ::कहानी ::
********
मैं जब भोपाल से चरखारी पहुँचा तो रात
होने लगी थी । कार से मैं और सब
इंस्पेक्टर संभाजी काळे डाक बंगले पर
पहुँचे । रात को एगकरी और
चपातियाँ खाकर जब हम दोनों सोने गये
तो कुक की तारीफ करनी पङी । छोटे से
कस्बे में इतना स्वादिष्ट खाना मिलने
हमें उम्मीद नहीं थी
लेकिन काळे कहता
""ड्यूटी के लिये तो मैं घास खाकर भी रह
सकता हूँ ""
जबकि मैं हमेशा कुछ रेडीफूड बैग में लेकर
चलता । मिल्क पाउडर कॉफी पाउच ।
सत्तू चने और बिस्किट।
एक सत्यकथा लेखक । जो इत्तेफाक से
इंटेलीजेन्स ब्यूरो का अदना सेवक
भी था किंतु जाहिरा तौर पर पुरातत्व
खोजी शोधार्थी था ।
काळे को विभाग से मेरे साथ आने के आदेश
मिले थे सुरक्षा के लिये ।
लेकिन मुझे खोजनी थी परतें रहस्यमय
मौतों के सिलसिले की ।
बाहर दो कांस्टेबिल बरामदे में सो रहे थे
बरामदा पूरी तरह ग्रिलों से बंद था।
रात ही मेरी संगिनी थी । टेबल पर अब
भी आधा खाली बैगपाईपर सोडामिक्स
रखा था लेकिन मैं होश में
रहना चाहता था ।
सिगरेट ऐश ट्रे में बुझाकर मैं कोट डालकर
बाहर आ गया । लॉन में चाँद चमक
रहा था । बाऊण्ड्री के दूसरे छोर पर
दो कमरों में से खर्राटों की आवाजें आ
रहीं थी । तभी लालटेन लाठी टॉर्च
लिये चौकीदार कमरे से निकला ।
""कौन??
साब आप!!! ये इलाका परदेशियों के लिये
खतरनाक है साब आप अंदर जाओ। मैं बंगले
के चक्कर लगाकर आता हूँ। ""
रूको शेरसिंह मैं भी साथ चलता हूँ ।
चलिये बाबू मोशाय!
वह हँस पङा ।
चाँदनी में चक्कर लगाते जब हम लोग छत
पर पहुँचे तो दूर शांत सफेद
काली चट्टानों के झुंड
सी तनी खङी हवेली चमक रही थी।
शायद स्ट्रीट लाईट की वजह से
आधा भाग चमक रहा था।
शेर सिंह!!!
हवेली में पिछला जो कांड हुआ है उसके
बारे में कुछ जानते हो बताओ!!! मुझे एक
कहानी मिल जायेगी । पापी पेट
का सवाल है । "
शेर सिंह ने रजिस्टर में
यही लिखा देखा था 'सत्यकथा लेखक'
वह हिचकिचाया लेकिन पचास रुपये ने
उसकी ज़ुबान खोल दी ।
संक्षेप में जो पता चला वह ये कि -
मुंबई का सारा बिजिनेस चौपट होने के
बाद रैम्जे भाई के पास वापस
चरखारी लौटने के और कोई
चारा नहीं था । बम बलास्ट
की ताबङतोङ दुर्घटनाओं में
इलेक्ट्रॉनिक्स का उनका सारा सामान
ही नहीं पूरी दुकान उस इमारत सहित
नष्ट हो गयी थी जहाँ दादर में
उनका कमरा भी दुकान के ठीक पीछे
था तीसरी मंजिल पर । सैकङों दुकाने जल
गयीं थीं अफरा तफरी मची थी । सरकार
ने मुआवज़े की मामूली रकम अदा कर
दी थी जिसमें किसी खोली की पगङी तक
अदा नहीं की जा सकती थी । मुंबई
जहाँ के बारे में सही विख्यात है
"नौकरी मिलेगी छोकरी मिलेगी लेकिन
रहने की जगह!!!!! न बाबा न ।
रैम्जे! यानि रामजीलाल ।
कई साल पहले अपने साथ पढ़ने वाली एक
मास्टर की शहरी लङकी को लेकर मुंबई
भाग गये थे ।
कुछ दिन दोनों परिवारों ने
थाना कचहरी और लंबी लंबी पंचायतें
कीं फिर एक मुकाम पर बोलचाल बंद और
मामला ठंडा ।शहरी परिवार दूसरे शहर
चला गया।
रामजीलाल नाबालिग लङकी भगाकर ले
गये थे सो मुंबई पहुँच कर रैम्जे हो गये ।
गायत्रीदेवी ""ग्रेसिया "हो गयीं। एक
ड्रामाकंपनी वाले दोस्त के मेहमान रहे
जब तक घर से चुराये हुये पैसे रहे और जब
कंगाली छाने लगी तो उसकी कंपनी में
बिजली मिस्त्री हो गये ।
ग्रेसिया को दिन भर बल्बों की झालरें
बाँधने में अच्छे खासे पैसे मिल जाते रात
को दफ्तर की चौकीदारी में बङी सी मेज
पर सोते सोते एक दिन एक बिल्डिंग
की चौथे माले की दुकान किराये पर मिल
गयी और रैम्जे मैकेनिक से प्रोपराईटर
ऑफ "ग्रेसिया इलेक्ट्रॉनिक्स"" हो गये
जेवर काफी चुराये थे दोनों ने घर से
सो बिजली के सामान को पूँजी मिल
गयी । चौदह साल में धंधा चल
निकला और एक कमरे के फ्लैट सहित
निजी दुकान के मालिक हो गये ।
बरबादी कहकर
नहीं आती अलबत्ता दुबारा आबाद होने
के लिये तिल तिल मरना खटना और
सोचना पङता है। बारह साल
का बेटा साथ में लिये रैम्जे भाई जब
चरखारी के छोटे से जनशून्य स्टेशन पर
उतरे तो शाम हो चुकी थी । कस्बे में
सरदी का मौसम था और हर तरफ गेंहूँ चने
के खेत।मन में डर के साथ उम्मीदें
भी थी रैम्जे के भाई प्यारेलाल ने फोन के
ज़वाब में तसल्ली दी थी भैया आ जाओ कुछ
न कुछ रास्ता मिल ही जायेगा।
घर
घर के नाम पर छह कमरों का एक
छोटा सा मकान था आगे से पक्का और
पीछे से कच्चा । पक्के कमरे छोटे के थे कच्चे
कमरों में बूढ़े माता पिता शिफ्ट हो गये
और दो आधे कच्चे आधे पक्के यानि फर्श पर
गोबर दीवारें सीमेन्टेड कमरे रैम्जे भाई
ग्रेसिया और ग्रेगरी को मिल गये।
मुआवजे की रक़म से तङातङ कलर
टीवी फ्रिज कूलर गैस स्टोव और एक
सेकेण्ड हैण्ड मारुति वैन खरीद ली ।
गैसकिट लगायी और छोटे के छोटे से स्कूल
के छोटे से ग्राउण्ड में खङी कर दी।
बच्चे कम थे और ज्यादातर पैदल
ही मीलों दौङकर जाने वाले
देसी छोकरे। खरचा कैसे निकले ।
ब्यूटी पार्लर और रेडीमेड बेकरी फूड
की आदत कम की गयी मगर बात
नहीं बनी।
मुंबई रिटर्न बाबू
को खासी प्रसिद्धि और स्वीकृति मिल
गयी थी रहन सहन और शक्ल सूरत से
फॉरेन रिटर्न लगते तीनों । हर कोई
बात करने को उतावला रहता । आखिर
छोटे से मिलकर तय किया कि स्कूल
पार्टनरशिप पर चलाया जाये और
बङी इमारत बङे ग्राउण्ड वाली जगह
शिफ्ट कर लें ताकि कुछ साईड बिजनेस
किताबें ड्रैस वाहन किराया और डांस
आदि के कोर्स से भी कमाई हो सके ।
वहाँ से कुछ मील दूर एक
हवेली थी "नवरतन पैलेस"
वीरान इस हवेली में कोई
नहीं रहता था। हवेली भुतही विख्यात
हो चुकी थी । किसी समय शानशौक़त
वैभव का नायाब नमूना रही होगी।
रैम्जे भाई बीबी को कस्बा घुमाते घुमाते
जब वहाँ से निकले तो ग्रेसिया ने पेशकश
कर दी हवेली को पट्टे पर लेकर स्कूल
खोलने की ।
चालीस कमरे विशाल आँगन सामने
खुला मैदान और मैदान से आगे तालाब पीछे
प्राचीन मंदिर बावङी और उसके पीछे
दूर तक हरे भरे खेत उसके भी पीछे घने जंगल
करधई कीकर बबूल पलाश सागौन बेर
नीम शिरिष सलईय़ा औऱ खैर के ।
रैम्जेभाई को पता था कि बचपन में धोखे
कभी इस ओर निकल आते तो दादी और
अम्माँ तमाम राई नमक धूनी गूगल
लौहबान गंधक जलातीं भूत भगातीं थीं ।
डर से कुछ सिहरन सी फिर गयी रीढ़ में ।
ग्रेसिया ने सारी बातें सुनकर
बङा मजाक बनाया । मुंबई में तो लोग
कब्रों तक पर रह रहे हैं ।
हवेली की शान और मालकिन होने
का ख्वाब पाले ग्रेसिया ने जब सुझाव
दिया कि
""मुंबई से जान पहचान के आर्टिस्ट
यहाँ आकर शूटिंग करेगे तो करोङों मिलेंगे
ऐसी लोकेशन मिलती कहाँ है!!!!
रैम्जे भाई की समझ में सब आ गया ।
दो चार दिन में ही उन्होने हवेली के
वारिस औऱ
स्वामियों का पता लगा लिया ।
पता चला कि मालिकों का परिवार
तो खत्म हो गया जङ मूल सहित लेकिन
मरने से पहले
हवेली पुजारी को गिरवी रखी थी फिर
कई हाथों से गुजरता हुआ
बैनामा वर्तमान में एक पंडा जी के कब्जे
में है ।
उन्होने इसमें किरायेदार भऱ दिये थे ।
जो रहस्यमयी मौतों का शिकार हो गये
। बचे खुचे भाग गये । तब से जो किस्से थे
और पुख्ता हो गये ।
रैम्जे भाई ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे लेकिन
ग्रेसिया के सामने कायर और बैकवार्ड
नहीं कहलाना चाहते थे । पंडा जी खुश थे
कि भागते भूत
की लँगोटी ही मिली वरना अब तक
पछता ही रहे थे। हवेली दस साल के लिये
किश्तों में मूल्य अदायगी की शर्त के साथ
दे दी।
छोटे की बीबी ने लाख समझाया मगर
दौलत का लालच बङे डर से भी बङी चीज
है।
स्कूल हवेली में शिफ्ट हो गया ।
दूसरे ही दिन दो दरजन स्थानीय
बच्चों ने नाम कटवा लिया ।
लेकिन ग्रेसिया रैम्जे भाई ग्रैगरी के
साथ वैन से गाँव गाँव प्रचार को गये
आसपास के पचास किलोमीटर व्यास
का दायरा उनके प्रभाव में आ गया स्कूल
चल पङा । नारियल तोङ फीता काट
तहसीलदार साब उद्घाटन कर गये। कुछ
रिक्शे लग गये।
घर के कच्चे कमरों की तुलना में हवेली के
''गच"के फर्श और तीन तीन फीट आसार
की चौङी दीवारे भव्य रहन सहन लुभाने
लगा और ग्रेसिया एक दिन जिद करके
हवेली के बायें तरफ ईशान कोण में बने
अतिथि गृह कहलाते तीन कमरों वाले
पोर्शन में रहने आ गयी ।
सुख और आराम के पल पूरे सोलह साल बाद
जीवन में आये ।
ग्रेसिया भूल गयी कि वह एक
मामूली परिवार की मामूली मजदूर
स्त्री रही है ।
हवेली की पुरानी पेंटिंग्स देखकर पुराने
रहन सहन जीवन वैभव में
खोती जा रही थी वह मन ही मन
कल्पना करती कि वही इस आलीशान
महल की रानी है ।उसने ठीक
चित्रशैली के कपङे पहनने की कोशिश शुरू
कर दी । चंदेरी से साङिया महोबा से
नकली मोती और पॉलिश वाले गहने ले
आयी ।
हवेली के चालीस में से सिर्फ बीस कमरे
ही खोले गये थे। बाकी दस में
सारा कबाङ औऱ फर्नीचर भरा था । शेष
दस कमरों का एक पोर्शन
जहाँ हमेशा ताले पङे रहते कोई
वहाँ जाता ही नहीं ।
ग्रेसिया को एक दिन लगा कि हवेली में
बॉयज हॉस्टल चलाया जा सकता है ।
तो उसने कबाङ वाले कमरे खुलवा डाले ।
वहाँ कोई कीमती सामान
नहीं था लेकिन प्राचीनता की वजह से
हर चीज संग्रणीय थी । छोटे के
मना करने के बावज़ूद सारी चीजें
झाँसी ग्वालियर आगरा की एंटीक
की दुकानों पर जा पहुँची । उस दिन
ग्रेगरी तालाब में डूबते डूबते बचा । पूछने
पर बचाया कि वह सीढ़ियों पर
बैठा मछलियों को 'लाई'
खिला रहा था कि किसी ने पीछे से
धक्का दे दिया । वहाँ कोई
था ही नहीं । जरूर कोई लङका भाग के
किसी पेङ के पीछे छिप गया होगै ।
बात आई गई हो गयी । छोटे के मन में
खटका लग गया । उसने दो चार दिन में
प्रस्ताव रख
दिया कि भैया पूरा ही स्कूल
तुम्हारा मेरी तो लागत और मेहनत
का पैसा दे तो पास के कस्बे में
किताबों की दुकान खोल कर एक
टैक्सीकार भी डाल दूँ ।
छोटे के अलग होने से ग्रेसिया खुश थी।
अगले हफ्ते उसने पंडा जी से शेष दस
कमरों की चाभियाँ माँगी । पंडा जी ने
ताक़ीद की कि वे कमरे खुलते ही अनिष्ट
होता है । ग्रेसिया ने तसल्ली दी औऱ
चाव से हवेली आकर ताले खोल डाले । वह
चकित रह गयी । सारे कमरे एक पृथक
मकान नुमा पोर्शन बनाते थे जिसके आँगन
में पाँच कमरे नीचे फिर तीन ऊपर फिर
दो कमरे सबसे ऊपर की मंजिल पर थे ।
पूरी हवेली इस तरह चार सर्वथा पृथक
आँगनों से जुङे विशाल आँगन में
मिलती थी जो एक स्थानीय चौकचितेउऱ
की रंगोली का डिजायन होता था।
जिसे सुरांती कहते हैं।
कमरे सजे धजे औऱ नये के नये थे । सबमें पलंग
सोफे टेबल औऱ फानूस लगे हुये थे ।
कीमती कालीन दीपाधार
फायरप्लेस तक सही सलामत थे । कमरों में
अजीब सी खुशबू फैली थी।
ग्रेसिया पागलों की तरह नाच
सी उठी ।
भागी भागी रैम्जेभाई को पकङ कर ले
आयी । एक पलंग से दूसरे पर लोटती वह
रानियों महारानियों की तरह अकङ कर
चलने का अभ्यास करने लगती कभी हँस
पङती । सारे सपने यूँ पूरे हो जायेंगे
कभी सोचा भी नहीं था।
ग्रेसिया ने उस रात वहीं सबसे ऊपर वाले
सबसे आलीशान कमरे में सोने
का फैसला किया । रैम्जे का डर निकल
चुका था । एक खंड में चालीस लङके दस
कमरों में रहने लगे थे ।
आधी राज के बाद जब
सारा कस्बा सन्नाट में डूबा था तेज चीख
सुनी
शेष
14-7-13//3:07AM--*कहानी*
""अतृप्त आत्मा::द्वितीय भाग::
==========
चीख की आवाज़ से सारा क़स्बा जाग
गया ।
सारा क़स्बा जाग गया ।
कुछ बुजुर्गों के मना करने के बावज़ूद
उत्साही नौजवाव लाठी डंडे टॉर्च लेकर
हवेली की तरफ दौङ गये । मैं भी तब
ज़वानी को जोश में था बनर्जी साब!!!!
लेकिन जो देखा उसे याद करके आज
भी झुरझुरी छूट जाती है ।
हॉस्टल की वार्डेन हवेली के विशाल
आँगन में गिरी पङी थी धङ पर सिर
नहीं बचा था कई टुकङों में बिखर
गया था दूर दूर तक । हॉस्टल के लङके सब
एक कमरे में इकट्ठे होकर कुंडी अंदर से बंद
करके चुपचाप डरे सहमे बैठे थे ।
हम सब ऊपर पहुँचे तो ग्रेसिया कमरे के
बाहर बरामदे में बेहोश पङी थी और रैम्जे
बेधङक सो रहा था ।
हम सब लगभग बीस नौजवानों की आवाज़
से भी जब वह नहीं उठा तो पता चला वह
नशे में है या बेहोश है ।
उनका बच्चा ग्रैगरी लङकों के साथ
ही हॉस्टल में पढ़ाई करने सोता था।
पुलिस सुबह तङके ही आयी और साफ सफाई
की गयी ।
ग्रेसिया और रैम्जे दोनों को दूसरे
शिक्षक अस्पताल ले गये ।
और लौटकर
बताया कि ग्रैसिया हृदया और
पैरालायसिस अटैक से मर गयी । रैम्जे ने
उस रात जमकर शराब पी थी कि वह
बेसुध था ।
लङके दहशत में एक एक करके हॉस्टल छोङते
चले गये और मजबूर रैम्जे बेटे के साथ
हवेली में अकेला रह जाता हर रात
क्योंकि घर का हिस्सा वह छोटे को बेच
चुका था। हवेली के अंदरूनी दसों कमरों में
फिर से ताले डाल दिये गये थे । दो साल
तक कोई अनहोनी नहीं हुयी। लोग उस
रात को हादसा समझ कर भूलने लगे ।
रैम्जे ने सादगी पूजापाठ और प्रोटोकोल
अपना लिये थे दिन को दो बजे स्कूल के
बच्चों के जाने के बाद ताले लगा कर वह
सिर्फ अतिथिशाला तक सीमित रह
जाता । हर कक्षा और दफ्तर में उसने सब
धर्म की तसवीरें लगा रखीं थीं ।
एक दिन एक लङका चोरी के इरादे से बंद
भाग में चला गया । पता नहीं उसने
क्या चुराया या नहीं लेकिन लेकिन उसने
घर जाकर दूसरे ही दिन फाँसी लगा ली।
लोगों ने इस बात को हवेली से
जोङा लेकिन रैम्जे
नहीं माना घटना दूसरे गाँव में घटी थी।
कुछ जुगाङ से रैम्जे ने वहाँ एक
दंपत्ति को किरायेदार बनाकर रख
लिया जो शहरी थे लेकिन
आदमी की ड्यूटी गाँव की पुलिस
चौकी होने से परिवार कस्बे में
रहता था। उसकी किरायेदारिन
की कजिन से एक दिन रैम्जे ने धूमधाम से
शादी कर ली ।लङकी अनाथ थी और
ग्रैसिया से ज्यादा महातत्वाकांक्षी ।
उसने स्कूल में तरह तरह के प्रशिक्षण शुरू
कर दिये । एक दिन स्कूल का एक
लङका गाँव जाकर पेट दर्द से मर
गया जो बेहद मेधावी लङका था। छह
महीने बाद ही रैम्जे की माँ और
दो चाचा एक मामा मर गये
ग्रैगरी की नानी एक
मौसा का भी देहांत हो गया ।
किरायेदारिन भी बीमार पङी तो फिर
नहीं उठी । कम किराये ज्यादा आराम के
लालच ने सिपाही को हटने
नहीं दिया जब हटा तब बीबी मर
गयी और एक भाई मर गया ।
ये सब वे लोग थे जो कभी न
कभी हवेली गये और रैम्जे को हवेली अपने
कब्जे में करके ठाठबाट से रहने की सलाह
दी । रैम्जे की नई बीबी एक दिन
सीढ़ियों से गिरी और टाँग तुङा बैठी ।
छोटे का बेटा छत से गिरा और मरते मरते
बचा। ये उस दिन हुआ जब वह ताई के कहने
पर हवेली दावत खाकर लौटा।
आखिर कार रैम्जे के वृद्ध पिता ने
अपना हिस्सा और छोटे से खरीदकर
दो कमरे रैम्जे को देकर नई बहू को वापस
मकान में बुला लिया। लेकिन सुना है रैम्जे
की बहू का अबॉर्शन होने के बाद उसे
सदाबाँझ घोषित कर दिया डॉक्टरों ने
। सब कहते हैं जिसने भी हवेली हथियाकर
उस पर राज करने
की सोची या वहाँ की कोई भी चीज
चुराकर लाया मर गया या बर्बाद
हो गया। अब हवेली में ताला पङा है और
रैम्जे ने शहर के स्कूल में नौकरी कर ली ।
ग्रैगरी एक आवारा बदमाश लङका बनकर
घूमता रहता है। नई बीबी अब रात दिन
कलह करती और बीमार रहती है । अनेक
तांत्रिकों से धागे ताबीज
करवाती रहती है । कोई हवेली की तरफ
सूरज ढलने और उदय होने के बीच
नहीं जाता न कोई सुगंधित क्रीम
पाउडर इत्र लगाकर गुजरता है न घी दूध
खाकर न ही पीले चावल या कढ़ी खाकर
। जो भी जाता है हींग प्याज
कोयला चाकू लेकर जाता है वो भी सिर्फ
दिन में ।
शेरसिंह की कथा से कुछ भी खास बात
पता नहीं चली थी ।
सुबह होने वाली थी और मुझे
इतनी कहानी से पहला भाग लिखने
की सामग्री मिल गयी थी । मैं कमरे में
आकर सोया तो नौ बजे सब इंस्पेक्टर काळे
ने कॉफी लाकर जगाया ।
""उठिये शरलॅक होम्स साहब!!!!
कहानियाँ और पुरातत्व पुकार रहे हैं ।
""
जब हम लोग तैयार होकर शेरसिंह और
कांस्टेबिलों के साथ हवेली पहुँचे दस बज
चुके थे । जनवरी की सुहानी धूप
खिली थी ।
मेरा ध्यान
महलनुमा हवेली की नामपट्टिका पर
गया । जो किसी समय पत्थर कुरेद कर
उसमें रंगघुले मीना काँच आदि भरकर
म्यूरल से लिखा गया था । ""न व र त न
म ह ल"
मैंने ग़ौर किया कि '"व '"अक्षर
कटा फटा धुँधला हो गया है लोग अभ्यास
वश नवरतन महल पढ़ते हैं जबकि ""न _र त
न म ह ल"
ही शेष बचा है ।
अक्षर काफी बङे थे लगभग एक वर्गफुट में
एक अक्षर लिखा था।
शेर सिंह परंपरानुसार हमें पहले पिछले
हिस्से में बने कालीमंदिर ले
गया जहाँ नटराज की एक अद्वितीय
ताम्र प्रतिमा थी और दूसरे कक्ष में
दसभुजा काली की ।
मंदिर के तीसरे कक्ष में बहुत
छोटी मूर्ति महारास करते कृष्ण
की थी ।
मुझे जाने क्यो "नरतन महल "याद आ
गया । मंदिर का हर कक्ष में
देखना चाहता था । सारे कमरे निवास
करने लायक थे और
लगता था पुजारी यात्री साधु
कभी यहीं रहते होंगे । अज़ीब बात
थी हर मंदिर का शिखर कलश गायब
था । पूछने पर शेर सिंह ने
बताया कि छोटे राजा अरिदमन के
निसंतान मरने के बाद उनके गोद लिये
लङके ने सारे कलश उतरवाकर बेचकर
खा उङा डाले जो कभी अष्टधातु के थे।
मंदिर का आखिरी कमरा बहुत बङा हॉल
था जो हर दिशा में तीन
दरवाजों वाला सभागार था ।
वहाँ से जब मैंने महल की तरफ देखा तो मैं
पूछ बैठा कि वह दस कमरों कोणभवन कौन
सा है? और जैसा मेरा अनुमान था वह
सत्य निकला । कोण भवन मंदिर के ठीक
कोने था और उसके हर कमरे
की बङी सी खिङकी बारजे
बालकॅनी सहित मंदिर के सभागार से
साफ दिखती थी । यानि कोणभवन के
दसों कमरों से हर मंजिल से मंदिर
पूरा पूरा दिखता था ।
हॉल से सटी कोठरी में धूल से सने टूटने
की कगार पर पङे सितार वीणा तबले
हारमोनियम ढोलक पखावज घुँघरू मंजीरे
झाँझ ढफ रखे थे ।
मैंने कल्पना की महल की खिङकी में
राजा अरिदमन बैठे हैं और सुंदर
स्त्री यहाँ चबूतरे पर नृत्य कर रही है
हॉल में सफेद गद्दों पर साज बज रहे हैं ।
दस फीट ऊँचे चबूतरे से नीचे प्रजा खङी है
और जय जयकार हो रही है । सब प्रसाद
लेकर जा रहे है तभी कोण भवन से
मोतियों की माला गिरती है
सीधी नर्तन करती स्त्री पर । वह
प्रणाम करके पीछे हटती जाती है ।
शेर सिंह देख कर चकित हो रहा था कि मैं
नृत्य की मुद्रायें बनाकर
क्यों फिरकियाँ लगा रहा हूँ।
बाबू मोशाय!!!
कोई बंगाली पूजा है क्या ये???
काळे ने पूछा व्यंग्य से ।
जब मैंने
अपनी कल्पना बतायी तो शेरसिंह चकित
रह गया ।
साब!!!!आप तो अंतर्यामी हैं । मेरे
दादाजी ने मुझे बचपन में लगभग
ऐसा ही हूबहू वर्णन बताया था हवेली के
मँझले राजा का। जो अपनी स्टेट छोङकर
यहाँ इतनी दूर आ बसे थे । पिता से
नाराज होकर जबकि छोटे
को सेनापति और बङे को राजा बनाकर
मँझले को ये सिर्फ एक सौ एक गाँव
जागीर में दिये जाकर दरबार में कोई पद
नहीं मिला।
सुनते है तब यहाँ सिर्फ साधु
या शिकारी आते थे ।
मैंने हवेली का सरसरी भ्रमण किया और
कुछ तसवीरें लीं । जहाँ जहाँ दुर्घटनायें
हुयीं थीं ।
लंच के समय जब हम सब डाकबंगले पर पहुँचे
पुजारी हाजिर था ।
सारे उपलब्ध दस्तावेज़ों सहित । महल के
एक के बाद एक यह पाँचवा मालिक था ।
जिसे रैम्जे ने पाँच साल किश्तें दी थी और
अब किराया काटकर वापस माँग
रहा था । पुजारी पर मुकदमा करने
की धमकी दे रहा था।
हम लोग शाम तक रजिस्ट्रार ऑफिस से
एक के बाद एक पाँचों मालिकों का नाम
पता निकालने में सफल हो गये । पहले
तो क्लर्क ने रुपये माँगे बाद में
नाश्ता मँगाकर माफी । क्योंकि हम
लोग सफेद और रंगीन कपङों में थे ।
शाम सात बजे हम लोग राजपुरोहित के
आलीशान खंडहर होते जा रहे मकान के एक
दुरुस्त कमरे में बैठे चाय पी रहे थे । पीले
कपङों में जर्जर वृद्ध की कहानियों और
दिखायी गयी कुछ
चिट्ठियों तसवीरों और राजपत्रों से
पता चली कहानी एक
घिसी पिटी राजकथा थी । कि जब मँझले
राजा अरिदमन यहाँ आये तो शिकारगाह
को ही महल बनवाकर रहने लगे । राज्य
और जागीर से पर्याप्त धन मिल
जाता था । मँझले राजा मनचले रसिक
व्यक्ति थे संगीत और नृत्य
ही नहीं चित्रकला में भी महारत
थी उन्हें । पिता को उनमें वीरोचित
गुणों का अभाव भले ही दिखता रहा किंतु
वे शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण थे ।
निसंतान होने की वजह से एक के बाद एक
तीन विवाह किये और जब प्रौढ़ हुये
तो युवती रानी के गरीब भाई की सात
में से संतान को गोद ले लिया। ये बात
गुप्त रखी गयी किंतु खुल ही गयी।
छोटी रानी बेहद सुंदर थी किंतु
किसी हारे हुये सामंत की बेटी होने
की संधि में विवाह करके
लायी गयीं थीं । सम्मान और वैभव
भी उनको शांति न दे सके ।
राजा बलशाली रसिक सुंदर सहृदय होकर
भी आयु में पिता के बराबर थे और
पुत्रोत्पत्ति में निष्फल ।
रानी को माँ बनने
की लालसा थी या हमउम्र
की प्रीतेच्छा कि राजपुरोहित से
आकर्षित हो बैठीं । राजा हर उपाय
करते उनके दिल बहलाने का लेकिन मन
की आग दबाये रानी और और और प्रबल
होती जाती अंततः इस दुर्व्यवहार
का कारण खोजने पर राजा ने एक
दूती को लगाया । और शीघ्र
ही पता चला कि रानी का अचानक समय
मंदिर में बढ़ गया है आने जाने का ।
युवा राजपुरोहित ने जब से
पिता की गद्दी सँभाली है मंदिर में
रौनक होने लगी । शाम
को राजनर्तकी का नृत्य होता गिरधर
के महारास और नटराज
की आरती को तो जनता जुट
जाती राजपुरोहित का वीणावादन और
राजनर्तकी का नृत्य देखने।
रानी तब कोण भवन के झरोखे में
टकटकी बाँधे बैठी रहती । दत्तक पुत्र
गयंद को दास दासी सँभालते और जब
शरारते करता तो अफीम चटाकर
सुला देते ।
राजा कई कई सप्ताह राजधानी दरबार
और जागीर भ्रमण पर रहते तो अचानक
शांतिपाठ हवन ग्रहाराधन और
कुंडली देखना बढ़ जाता । राजपुरोहित
आनंद की वीणा तो केवल मुरलीधर के
सामने ही बजती लेकिन वीणा से भी मधुर
प्रवचन कोण भवन में चलते रहते ।
बङी रानी और मँझली रानी एक ही कुटुंब
से थीं जो ये सब कतई बर्दाश्त नहीं कर
सकती थीं वे ऊँची संपन्न रियासतों से
थीं। नतीज़ा राजा के आते
ही बङी रानी के आदेश से राजपुरोहित
को आगे पढ़ने काशी भेज दिया गया। और
उनकी जगह अस्थाई तौर पर दूसरे
पुजारी लगा दिये गये । राजा खुद
संध्या आरती के समय झरोखे पर विराजने
लगे ।
होनहार बलवान् है
सो राजनर्तकी का जादू राजा पर चल
गया। जो नहीं होना था वही हुआ ।
राजनर्तकी महल में आने लगी।
जो परंपरा के खिलाफ
था हतहृदया रानी राजा के भी प्रेम और
शैया से वंचित रहने लगी ।
राजनर्तकी पर मोती न्यौछावर।
July 14 at
5:45pm · Like ·