Saturday, 22 July 2017

सुधा राजे की कविता - मेरे देश!!!

मेरे देश !!
अक्सर ही तो सब  कहते हैं 
बहुत भावुक हूँ मैं 
मेरा मन भर आता है हर बार 
जब भी देखतीं हैं आँखे अमर जवान ज्योति की लौ 
टकटकी लगाकर बस यूँ ही 
किसी सैनिक की बेटी की तरह 
और उसमें से हँसने लगता है 
लपटों से दहकता मुखड़ा किसी पिता का 
मन कहने लगता है जयहिंद और हिचकियों से रुँध जाती है मेरी गूँजती आवाज वन्देमातरम् !!!!
मेरे देश 
सब कहते हैं बहुत कल्पनाशील हूँ मैं 
मेरा मन यूँ ही सोच लेता है 
वे सब दर्द बहिनों के 
जब जाते हैं वर्दियों में आँखें भरकर हँसते हुये वीर
 जल्दी आने को कहकर
 फिर तकती रहती है लड़की 
चुपचाप रोज दरवाजा और डरती रहती है 
कहीं कुछ अनहोनी न हो जाये 
आ ही जाती है किसी न किसी के घर
 एक हृदय चीरती खबर 
और मैं भरभरा कर रो पड़ती हूं 
हर बार हर खबर हर सैनिक की अमर यात्रा पर 
अपने हाथों में कल्पना की रोली अक्षत रेशमी डोरियां थामे सिसकती आँखें मेरी  हो हो जाती हैं केसरिया 
तिरंगे में लिपटे हर अमरबलिदानी के साथ मेरी पुकार कहने को बिलखती है भारत माता की जय ,
मेरे देश !!
सब कहते हैं बहुत जिद्दी हूँ मैं 
मुझे हर बार ही तो धुन सवार होती है 
देश की माटी छानने की 
जिसमें से हर गद्दार नमकहराम देशद्रोही
 बीज खाद पौधे फल कलम सब 
समूल सवृन्त सशाख पत्र नष्ट करने की 
और मैं जब कुछ नहीं कर पाती 
तो लिखने लगती हूँ कुश की जड़ों पर मट्ठे से अक्षर
 और डालती रहतीं हूँ कंटकों की जड़ों पर 
मुझे लगता है अभी कोई वीर यहां से निकलेगा
 और यह समूल कंटक कुचला ही जायेगा 
रोज ही यमद्वितीया के कांटेकूचने की प्रथा निभाती ही रहती है मेरी कलम 
और मैं इतने प्रहार से लिखने लगती हूँ कि
 चीखने लगते अक्षर जयहिंद जयभारत वन्देमातरम् !!! 
मेरे देश सब कहते हैं बहुत आस्तिक हूँ मैं ,
मेरे लिये प्रेम की पराकाष्ठा का रूप हो जाता है मेरा अमूर्त राष्ट्र और परमात्मा की प्रतिमा हो जाता है हिमालय सिन्धु अरावली विन्ध्य गंगा यमुना कावेरी कृष्णा व्,यास चिनाब रावी झेलम सतलज चंबल पहूज गोदावरी तुंगभद्रा ब्रह्मपुत्र और थार से लेकर अरुणाचल तक सारा विराट् ब्रह्म विग्रह मेरे प्रेम के परमध्यान में मुस्कराने लगता है ,
गाने लगता है ,हर स्वर पर तिरंगा ऊँचा और ऊँचा और ऊँचा लहराने लगता है ,जनगणमन जय हे जय हे जय हे 
मेरे देश !!
सब कह देते हैं लिखने से क्या होगा 
बावली हूँ मैं !!
और मैं उठा लेती हूँ उसमें से एक शब्द 
"बावली"उस के लिये पत्थर की तरह
जिसमें  मेरा राष्ट्र साकार हो जाता है 
हवा में पानी में आग में आकाश में मिट्टी में और मुझमें
 मैं नन्हे बच्चों को फूलों के पौधों की तरह
 राष्ट्र के नक्शे पर रखने लगती हूँ 
यह आकाश का प्रहरी यह सागर 
का यह शिखर का यह हवा का 
यह मिट्टी का और यह मेरी स्वतंत्रता का 
ये अभिनय जीवंत होने लगता है 
और हर सैनिक हर देश रत्न युवा 
मुझे मेरा सुपुत्र लगने लगता है 
मेरी ममता भरभरा कर हृदय में हूकने लगती है 
हाथ में रोटी माखन फल दूब तिलक लिये मैं कल्पित तिलक कर करके हर पुत्र को कहने लगती हूँ 
देश नहीं रुकने देना देश नहीं झुकने देना 
उन सब चौड़े माथों 
और ऊँचे कंधों पर मेरे अंतरमन के आशीष बरसने लगते हैं और हर दिन हर शाम हर पुत्र को विजयी देखने के लिये दीप धरने लगते हैं ,
दूर कहीं से आवाजें आती हैं वन्दे मातरम मां तुझे सलाम ,मन हुलस कर कहने लगता है
 मेरे लाल तू है देश की शान 
,जयहिंद के तीखे स्वरों के बीच 
हर बार हर माँ की कराह और आह  सुनकर भिगो लेती हूँ अपनी भी आँखें चुपचाप ,
चाहें तो पागल भावुक कल्पनाशील जिद्दी बावला भी कह सकते हैं मुझे आप !!
©®सुधा राजे

Tuesday, 18 July 2017

सुधा राजे का लेख - ​सबसे पहले देश।

​​
कड़वा आँखें खोल देने वाला सच ,
यह हालत कश्मीर में भी वहां सब लोग हिंदुस्तानी कहकर दुत्कारते हैं ,
,
यह हालत महाराष्ट्र में है वे भइये कहकर दुत्कारते हैं ,
यही हालत ,
पंजाब में है ,
वे भी गैर सिख को दुत्कारते हैं पुरबिया कहकर ,
यही हालत ,
पश्चिमी यूपी में है ""बिहारी बंगाली नेपाली गढ़वाली ""को
वे लोग भी ,
दुत्कारते हैं पुरबिया कहकर ,
,
मारते पीटते और बंधुआ तक बना कर रखते रहे हैं ।
,

उत्तराखंड आपदा ने पहाड़ियों के सब सरलता त्याग बलिदान के किस्से पिलपिले कर दिये वहां भी बहुत से लोग मैदानियों से नफरत करते हैं ।
,
सवाल है ,
​​
हिंदुस्तानी कौन हैं ??
??
यह समझाया ,समझा क्यों नहीं गया कि सब भारतवासी ,
कच्छ से काराकोरम तक नाथूला से अंडमान तक लक्ष्यद्वीप से डोकलाम चंबूघाटी तक ,
,
सब भारतीय हैं ,
,
,
यह संदेश क्यों नहीं पेबस्त हो पाया सीनों में ????
~
~
मध्यप्रदेश में सिंधी आत्मसात हो तो गये परंतु कुछ पृथक से ,
,
इलाहबाद में बंगाली त्यौहार तो हुये कुछ अलग से ,
,
दिल्ली में सिख पनप तो गये बस कुछ अलग से ,
,
महाराष्ट्र में छठ मनने तो लगा पर कुछ अलग से ,
,
,
पटना में रहता है उपेक्षित गुजराती मारवाड़ी और ,
,
एक प्रांत की बेटी दूसरे प्रांत ब्याही जाकर जीवन भर पनप ही नहीं पाती ,
,
,क्यों फेल हो गये सब दिमागदार लोग एक एक जन जन को यह समझा पाने में तुम सब ही तो हिंदुस्तान हो !!!!!!!!,
,
,
बस यही कुसूर है मुख्यधारा वाले लोगों का कि कोनों तक गये क्यों नहीं खबर प्रचार जागरण अपना देश के उजाले ,
,
,
यह अलगाव तो हर बस में सीट पर बैठती गैर प्रांतीय गैर मजहबी गैर जातीय सवारी पर हावी है ।
,
परंतु अरुणाचल तीनबीघा और कच्छ से नाथूला सियाचिन तक ""भारत भारतीय !!!!!!!!कहना कब आयेगा हर नागरिक को ????
,
,
हमने देखा "अनेक बार देखा ""
दिल्ली से दूर के सब प्रांत जिनकी सीमायें पाकिस्तान बांगलादेश चीन भूटान म्यनमार से सटी है """"""भारत "को एक पृथक चीज मानते हैं 
:
:ये किस की कमी रही कि "हम हिंदुस्तानी "एक अनपढ़ ग्रामीण से बुद्धिजीवी तक नहीं आत्मसात कर पाया ??
ये जु़ड़ न पाने की बीमारी कितनी बढ़ गयी थी किसी युग में कि जब बिहार पर गोलियां चलती थीं तो दख्खन में कोई नाराज नहीं होता था ,परंतु जो जो जानता है वह वह अधिक जिम्मेदार है मेरे भाई कि टूटन की वजह है क्या ,,,,,न जाति न मजहब ,,,,हमारा अंतस का निजाभिमान कि हिंदुस्तान बाद में पहले मेरी जाति ,मेरा मजहब मेरी इलाका ,

अपने अपने इलाके की गुंडई करने वाले जब दूसरे के इलाके में घुसते हैं तब पता चलता है कि हिंदुस्तानी होना क्या है
एक शायर धमकी देता है कि किरायेदार हो मकान मालिक नहीं तुम्हारे बाप का भारत नहीं ,
सोच ये पढ़े लिखों की है ,
निरक्षर का तो गांव ही हिंदुस्तान है
कशमीर की लड़कियों को "इंडिया " वालों को कोसते सुनकर कान में लावा सा गिरता है ,
बंधु यही रोना है ,
विभाजन की भयानक त्रासदी से गुजरे सिख ""पृथक खालिस्तान की गोद में जा बैठे थे ,
एक समय था कि हम सब सिख देखते ही ""थर्रा जाते थे "
फिर 
आज नक्सलाईट को देखकर ,
,
कश्मीरी को देखकर कुछ संदेह पनपने लगता है ,
आईये 
मिलकर 
कुछ हल खोजें कि ,
हर नागरिक दूसरे से कम से कम यह ताना तो न दे सके कि ""इंडिया वालो ""
यह गहन शोध का विषय है ,
कि 
क्यों एक क्षेत्र का व्यक्ति ,
शेष भारत के किसी नागरिक को "हिकारत से देखने लगता है ।
सामान्यीकरण करना पलायनवाद होगा ,समस्या की जड़ें हैं कहीं इतिहास के कड़वे अनुभवों में दफन । आज अमेरिकी लड़के किसी दाड़ी मूछ वाले को देखते ही उसपर हमला कर बैठते हैं ,यह ग्राऊण्ड जीरो उनकी सोच में बसा है ।
हम 
काला बुर्का टोपी दाड़ी ऊँचा पाजामा देखकर कुछ कपड़े ठीक करके परदा सा करने लगते हैं ।,
यह सोच कहीं है कि इस कम्युनिटी में एक स्त्री की स्वतंत्रता नाग़वार है ,
बिहारी जब महाराष्ट्र में होते हैं तो कुछ स्थानीय श्रमिकों के श्रम रोजगार छिनते हैं और वे नहीं चाहते कि उनसे कम रेट पर कोई काम करे भाव गिरे ,परंतु जाके पांव फटी बिंवाई सो ही जाने दर्द दवाई ,बिहारी मजदूर कहीं भी सबसे सस्ते दर भाव पर काम करने लगता है ।
गिरमिटिया कहकर मलेशिया मारीशस इंडोनेशिया और साऊथ अफ्रीका में भी बहुत विरोध बिहारी मजदूरों का हुआ परंतु वे बसते गये
कोई 
भी भारतीय किसी एक जाति या क्षेत्र का नहीं हर क्षेत्र से उठे यहां तक विदेश में बसे भारतीय और गैर भारतीय जो भारत की आजादी के समर्थक थे उनका ऋणी है ।
हां हर भारतीय
,
बदलना तो सोच को ही पड़ेगा ,
समस्या है कैसे ??
यूपी वाला गुजराती को गरियाने लगता है ,
जब गुजरात में फँसता है तब हिंदुस्तान याद आता है ।


(सादर कृपया उत्तर दें )
सविनय 
सुधा राजे

Saturday, 15 July 2017

राष्ट्रवाद का सिरमौर बंगाल हाशिये पर क्यों??? --- सुधा राजे का लेख।


राष्ट्रवाद का सिरमौर बंगाल हाशिये पर क्यों ?
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••सुधा राजे का लेख 
°°°°°°°°°°
हम तो आज भी कहते हैं कि पत्रकारिता शिक्षा स्वराज्य हर तरह का पहला जागरण बंगाल से ही हुआ ।बंगाल देश की सबसे पहली आधुनिक शिक्षा संचार और जनजागरण की नगरी रहा है । बंगाल को केवल आज के सांप्रदायिक स्वरूप और बांगलादेशियों की समस्या से ग्रस्त जाननेव
और न जानने वाले समझ लें  कि 1905का बंगाल विभाजन उसी स्वराज एकता से उपजे आंदोलन को कुचलने के लिये हुआ था । न बंगाल बँटता न बंगाली राष्ट्रवाद घटता ।
बंगाल में आजादी की लड़ाई खुदीराम बोस की फांसी से प्रारंभ और सुभाषचंद्र बोस के लापता होने पर समाप्त हुयी ।वन्देमातरम एक बंगाली बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ने रचा और जनगणमन भी एक बंगाली रविन्द्रनाथ टैगोर ने  ।पहला हिंदी समाचार पत्र उदंत मार्तंड पं.जुगलकिशोर  का  बंगाल से चला ।पहला अखबार ही बंगाल गजट था जेम्स आॅगस्ट हिक्की का जिसे जेल हुयी अंग्रेजों के खिलाफ सत्य के कहने के लिये ।पहली रूढ़िवादिता पर विरोध की कानूनन मान्यता बंगाल से मनवायी गयी सती प्रथा और बाल विवाह की रोक पर ।विधवा पुनर्विवाह की मुहिम और स्त्री शिक्षा की मुहिम ,कन्याओं का पाठशाला जाना बंगाल से प्रारंभ हुआ । भारत में स्त्रियों के प्रति रूढ़िवादिता का पहला विरोध बंगाल से हुआ । राष्ट्रवाद के लिये सुलग उठा पूरा बंगाल जब नेताजी को अपना एक एक पुत्र और तुलादान में सोना देकर आजाद हिंद फौज के लिये हर बंगाली आगे आकर निर्धन निर्वंश होने से भी नहीं डरा । बाल लाल पाल की तिकड़ी ने बंगाल से दिल्ली मुंबई तक स्वराज्य की लौ जगाकर हर भारतवासी को समझाया था कि अंग्रेज क्या कर रहे हैं। विवेकानंद ने विश्व में भारतीय हिंदू धर्म के आध्यात्मिक उच्चादरश की दृढ़ता से स्थापना की । राष्ट्रवादी और हिन्दू संस्कृति के बंगाली रूप में रचे बसे मुसलिमों वाला बंगाल साड़ी रेशम मलमल चित्रकला संगीत साहित्य कविता दार्शिक तर्क वितर्क और मित्रतावाद का अद्भुत उदारण रहा । अपने समाज की कुरीतियों से स्वयं बंगाली जितना जूझे और पार भी पाये उतना किसी और समाज में उदाहरण तक नहीं मिलता । कलकत्ता एक समय भारत ही नहीं लंदन तक राष्ट्रवाद स्वराज और भारतीयता की थर्राहट का नाम था ।
उपलब्धियां गिनाने बैठें तो बंगाल की कहानी से ही ग्रंथ पूरे भर जाये ।
भारत की प्रथम स्नातक महिला कादंबिनी गांगुली और चंद्रमुखी बसु रहीं । भारत की प्रथम महिला चिकित्सक कादंबिनी गांगुली ।फिल्मकार सत्यजीत राॅय ,अर्थशास्त्रीअमर्त्यसेन, महर्षिअरविन्द घोष,उपन्यासकार शरत्चंद्र,लेखक ताराशंकर वन्द्योपाध्याय,समाजसुधारक विद्यासागर, राजाराममोहन राॅय, वैज्ञानिक राजेन्द्र मित्र,डाॅक्टर आॅफ लैटर्स जोसफ घोष ,..............यह सूची बहुत लंबी है किंतु यहां हम केवल उस बात पर ध्यान दिलाना चाहते हैं जो है बंगालियत । सीमावर्ती बन गया राज्य जबसे बंगाल तबसे उपेक्षा की भी शिकार ही रहा है । 1947में ही 
विभाजित बंगाल को पाकिस्तान में दे देना ही पाप था ;वे मुसलिम हिंदू ईसाई जो जो बांग्लादेश चले गये तब तक बिंदी सिंदूर होली दुर्गापूजा बंगला गीत संगीत वसंतपंचमी दशहरा  मलमल ,रेशम ,हथकरघा ,तांत,  समुद्र ,मछली भात सोन्देश छैना रोसोगुल्ला और साझे तीज त्यौहारों रहन सहन से जुड़े थे ।पृथक होने पर  उन पर अत्याचार कट्टरवादी अलगाववादी  पाकिस्तानियों ने किये ही इसीलिये थे कि ,बंगला संस्कृति साड़ी केश बिंदी बंगाली सुहाती न थी उनको । "
"आमार सोनार बांगला "
गाते मरते गये हजारों लोग ;मुक्तिवाहिनी के साथ भारत निष्ठा के कारण ही जुड़े थे उनको लगा कि उनका घर एक भारत में ही रह गया ।
बांगलादेश पाकिस्तान से आजाद हुआ तब कई हजार बांगलादेशी भारत शरणार्थी बनकर आये तो यही मानसिकता थी कि उनका भारत से नाता है पुराना ।इंदिरा गांधी के शासनकाल में भारतीय सीमावर्ती क्षेत्र में ही बसते चले गये बांग्लादेशी हिंदू भी थे मुसलिम भी और उनको लगता था अब यहीं शरण मिल जायेगी या वापस जाकर घर रोजी रोटी देश मिलेगा । गरीबी बेरोजगारी के तले पिसते लोग ,भड़काऊ पाकिस्तानी साजिशों और भारत में ही छिपे और प्रकट रह रहे भितरघातियों के संपर्क में आकर संक्रमित मानसिकता के शिकार होते चले गये ।जिसमें साफ साफ दो तरह की विचार धारायें काम कर रहीं थी वामपंथी कट्टर साम्यवाद और बंगाली को आधार बनाकर पूरा ही पूर्वी पश्चिमी बंगाल एक करके भारत से पृथक करवाने की अलगाववादी मजहबी कट्टरपंथी धर्मपरिवर्तनकारी प्रत्यक्ष और परोक्ष साजिशें । वहीं सीमा से सटे पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों का आना जाना दोनों ही बंगाल से रहता रहा ढाका और कलकत्ता से जुड़ी रही सारी वैचारिक अलगाववादी सुलगन चुपचाप एक दिन में तो नहीं ज्वालामुखी बनी होंगी । बंगाल विभाजन से बहुत पहले ही भारतीय स्वराज्य के विरोध और समर्थन के दो पृथक समूह बंगाल में उदय हो चुके थे जिनकी ही साजिशों का सारा परिणाम पूर्बी बंगाल का पाकिस्तान में चला जाना था । वहां जाकर जब शिया सुन्नी और उर्दू फारसी बनाम बंगला असमी भाषी का विद्वेष हावी होता गया तो विरोध बढ़े जिनको दबाने के लिये हुये अत्याचारों की कोख से बंगलादेश का जन्म हुआ जिसमें दाईमाँ की भूमिका भारतीय मुक्तिवाहिनी के सिख बंगाली सैनिकों ने सबसे अधिक निभायी । जिस हार और विभाजन का घाव पाकिस्तान को सालता ही रहता है और वहीं से जहरीले षडयंत्रकारी वैचारिक अभियान संपूर्ण बंगाल के पृथक होकर एक नया देश बनाने के लिये चलते रहते हैं ।किंतु हर बात के दोष का ठीकरा पाकिस्तान के सिर फोड़कर भारतीय बरी नहीं हो सकते । भारतीय मध्य हिन्दी एवं सहायक भाषा भाषी पट्टी के लोग उनका मीडिया ,दिल्ली मास्को वाशिंगटन लंदन पेरिस मुंबई के बीच इतने अधिक मशगूल हो गये कि उनका ध्यान न तो चरमसीमा तक की दीवानगी जुनून पैशन बन चुके युवा साम्यवाद पर गया न ही तेजी से लुप्त होती गयी "बंगालियत "पर गया जिसमें गंभीर थियेटर था यथार्थवादी कालजयी फिल्में थी ,युगांतरकारी लेखन था काॅफीहाऊस ट्राम और छाजा बाजा केश तमाशा मेला की   अटूट हिस्सेदारी थी । जहां मुसलिम की बनी साड़ी दुर्गाठाकुर को चढ़ती और ईसाई के लिखे डायलाॅग धार्मिक मंचन में बोले जाते और हिंदू की बनायी मिठाईयां ईद और इफ्तार में खायीं जातीं । बहुत पीछे न जायें तो अमिताभ नूतन वाली सौदागर देखें वहां पता ही नहीं चलता कि नायक मुसलिम है या हिंदू और पहनावा बोली तीज त्यौहार रोजगार कला संगीत लेखन अभिनय व्यापार के बाद ईडन गार्डेन और माछ भात से एक ही जैसा पहनते बोलते खाते रहते बंगाली एक एक दिन थोडा और पृथक होते गये । इस पृथकाव में जेहादी कट्टरपन और वामपंथी नास्तिकता ने जितना काम किया उससे कम दोषी मध्योत्तरीय भारत की राजनीति और मीडिया नहीं ?हिंदी के किस चैनल और अखबार पर सीमावर्ती राज्यों पर चर्चा रहती रही ?कितना कम जानता है दिल्ली मुंबई जयपुर लखनऊ पटना  के बीच बसा भारतीय बंगाल आसाम मणिपुर त्रिपुरा सिक्किम नागालैंड मेघालय मिजोरम को ! पहले सब बंगाली महाभारतीय महाहिंदू महाराष्ट्रीयतावादी रहे 
बाद में सब जेहादी लोग वहां हावी हो गये और सोच रहन सहन हर जगह से "बंगालियत "मिटायी जाने लगी ।
यह पश्चिम बंगाल में भी षडयंत्र जारी है और पूर्वी बंगाल यानि बांगलादेश में भी ।शेखमुजीबुर्रहमान के समय तक भारत से ही बांगलादेश की आत्मा अधिक जुड़ी थी ।आज भी बंगाली संस्कृति बांगलादेश से मिटाने का षडयंत्र चल रहा है ।जिसमें दुर्गापूजा ,वसंतोत्सव ,गायन वादन ,कविता लेखन ,और साड़ी बिंदी बंगाली भाषा निशाने पर है ।पाकिस्तानी भारत में आसानी से पहचाना जाता है किंतु बांगलादेशी को पहचानना बहुत कठिन आज भी चाहे तसलीमा हों या खालिदा जिया या कोई भी बंगाली संस्कृति से गहरे से जुड़ा व्यक्ति कम या अधिक भारतीय ही लगता है ,किंतु आज बंगाल में बढ़ते कट्टरवाद की वजह से उस बंगाल में जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी के लिये तर्क वितर्क सभा खुले शास्त्रार्थ होते थे ,कलाकारो लेखकों और अभिनेताओं संगीतकारों तक पर जुबानी या वैचारिक या भीड़ का हुल्लड़वादी हमला हो जाने लगा है । 
वामपंथ का तीस साल नहीं ,सन् 1937से ही रूसी चीनी दीवारें खिसककर भारत तक आने लगीं थीं । रूस के प्रति नरमी के पीछे शोषण से मुक्ति का सुनहरा सपना था और कठोर साम्यवाद का माओवादी चिंतन दूसरी तरफ से तिब्बत को च्यांगकाईशेक सरकार को हड़पने फारमूसा को भकोसने के लिये सुनहरे वैचारिक जाल बुनने लगा था यह भारत की आजादी से पहले ही प्रारंभ हो चुका था ।
कानू सान्याल ज्योति बसु तो बहुत बाद की कहानियां हैं । लालढांग
और नक्सलबाड़ी
जगह के नाम थे किसी विचार के नहीं ।
यह विचार तो एक सपना बेच गये लोगों ने पैदा किया जो गरीबी बेरोजगारी अकाल पूंजीपतियों के शोषण मिलों के एकाएक बंद होने से उपजी त्राहि त्राहि पर एक फाहा नरम विचार की गरम सेंक का रखते थे कि हमारे दुखों का अंत पूँजीपतियों और ईश्वर के अंत में छिपा है ।
नारीमुक्ति की पहली खेप ही बंगाल से चली और दमन का थ्योरी आॅफ रिलेटिबिटी विस्फोट के रूप में साम्यवाद दबाया गया तो और और भड़का ......................तब भारतीय मुख्यधारा दिल्ली के आसपास से मास्को और वाशिंगटन तक ही झूलती रह गयी

उग्र राष्ट्रवाद का मतलब हिंदू नहीं हो सकता न ही दिल्ली की लखनऊ की पटना जयपुर अहमदाबाद भोपाल मुंबई का राजनीति । हमें सीमा तय करनी ही होगी देश के भूगोल की भी और राष्ट्रवाद के वैचारिक उग्रपन से वैश्विक मानव के मूल्यांकन के सामंजस्य की भी । क्षेत्रवाद और भाषावाद कोई बाधा नहीं एक रोचक वैविध्य ही लगेगा तब ।
यह बंगालियत की अंतिम सीमा का पराभव जैसा है ।बंगाल  राष्ट्रवाद का प्रारंभ शक्ति, सरस्वती की पूजा से जुड़ा है तो मुसलिम कला उदारवाद देशभक्ति से भी जो अपने को हिंदू से पृथक नहीं समझते थे ।आज वही बंगालियत बचेगी तो भारतीय उपमहाद्वीप में शांति और कला का भारतीय स्वरूप जीवित रहेगा ।
बांगलादेशी आपराधिक शरणार्थियों के बहाने बंगाली लोग और संस्कृति को आहत करने वाले लोग अपने गिरेबान में झांके कि उनके अपने कुल परिवार प्रांत गांव नगर जिले का भारत की आजादी विकास और संस्कृति में कितना योगदान है !!
आज दुख होता है बंगाल याद आते ही दुर्दशा गरीबी घृणा बेरोजगारी गंदगी पशुवत मानव परिश्रम बेघर लोग भिखारी और भारत का नाम खराब करने वाली पुरस्कृत फिल्में,मानवदेह  व्यापार , बंगाल के दंगे ,हिंदुओं का पलायन ,मुसलिमों में बढ़ता राष्ट्र के प्रति असंतोष ,जाति मज़हब की कुत्सित राजनीति ,तंत्र मंत्र के अंधविश्वास और घटिया धंधेबाजी ,पर्यटकों तक से बुरा व्यवहार ,अपराध और जलते कुटीर उद्योग उफ् ..........
कम से कम पुराने बंगाल और बंगालियत के लिये 
हम निजी तोर पर सकते हैं 
"आमार सोनार बंगाल आमि तोमाके भालो वासी "

स्वामी विवेेकानंद का भारत बंगाल में यदि आज वामपंथ के चंगुल में से जेहाद के पिंजरे में जा फँसा है तो कारण दिल्ली मीडिया और मुंबई जनसंचार के साथ चर्चा से नदारद सीमा वाले प्रांत भी हैं ।
आप देखे तो कि पूर्वोत्तर राज्यों के नाम तक कितने लोगों को सही सही याद है ?
कौन खबर लेता है मारवाड़ कच्छ में क्या घट रहा है ?
किसे सुध रही कि कश्मीर धीरे धीरे मसजिदों का राज्य बन गया ?
कौन याद रख पाया कि यहीं दिल्ली की नाक के नीचे पश्चिमी यूपी में तालिबान पनपने लगा ?
अतिथि सत्कार और अजनबी की मदद करने वाले घटते गये ।
यह हाशिये पर रह जाना ही तो गुनाहों के लिये अनुकूल जगह है।
बंगाल का बुद्धिजीवी वामपंथ की जकड़न में छात्रों को जकड़ कर एक भीड़ अपने लिये बनाकर सत्ता पर चढ़ता रहा ,उधर जोश खरोश से भरा बंगाली युवा वर्ग बेरोजगारी गरीबी के बीच बेहद विचारशील प्रतिभा कला से संपन्न होकर....
क्या करें की अवस्था में ,
 एक फ्रस्ट्रेशन में सामने आ पड़ा वामपंथी मार्ग ही समाधान मानकर अपनाता रहा । आग पर फूस का काम सोवियत और चीनी मार्क्सवादी समाचारों ने किया दल के दल बनते गये "राष्ट्र गौढ़ और वर्गवाद प्रधान हो गया । पूँजीपति कहकर शरणार्थी बंगलादेशी लगभग 99हजार लोगों के साथ बंगाल का गरीब वर्ग मिलकर एक भीड़ बन गया और कलकत्ते मिदनापुर दुर्गापुर के बीच वामपंथी होना सम्मान बुद्धिमत्ता महानता  की बात हो गया । विचारों की जकड़न ही ऐसी थी कि हर मजबूरी गरीब की हर समस्या का समाधान लगता था वामपंथी विचारधारा में ही है । एक बंगाली ही इस बंगालियत को खोते जाने का दर्द समझ सकता है । 
©®सुधा राजे

सुधा राजे का लेख - बचाईये बचपन लड़को का भी ।

बचाईये बचपन लड़को का भी
••••••••••••••••••••••••••••••••(सुधा राजे का लेख )
लड़कियों के बारे में बतियाते लोग प्राय:
लड़कों पर चुप लगा जाते हैं । मलिक राजकुमार के उपन्यास "बाईपास "में जो
समस्या घटनाक्रम में आयी है वह कितने ही पुरुषों के बाल्यकाल का भयानक
सत्य हो सकती है ।
एक मातृविहीन बच्चा जो हमारी संडे क्लासेस इन विलेज का हिस्सा रहा ,
उसका सच सुनकर झुरझुरी छूट जाती है ।
बरसों हो गये हर जगह से दबी सी कहीं खबर मिल जाती है परंतु लोग कान आंख
बंद करते रहते हैं ।
"""""बच्चाबाज़ी"""""
कहकर जिसे अघोषित स्वीकृति कुछ खास तरह के समूह समुदायों में मिली हुयी
है । थर्ड जेंडर और छोटे बच्चे जेल के कैदी और बाॅयज बुलीईंग के शिकार
लड़के ,
कभी इस समस्या पर सजगता नहीं दिखती ।
क्योंकि इससे
""पुरुष पवित्रता अपवित्रता का विचार नहीं जुड़ा है ""
घर के बड़ों और मुहल्ले के बड़ों के बीच बार बार बुलाया जाता ,और तोहफे
पाता आपका बच्चा या बच्चा रिश्तेदार कहीं इस तरह के ,,,,नर यौन शोषण का
शिकार तो नहीं हो रहा ।
बलात्कार की तरह इसपर भी कानून तो बना है ,परंतु लड़के की मर्यादा या
इज्जत आबरू लुटने जैसा विचार इससे जुड़ा न होने के कारण ,प्राय:अपराधी बच
जाते हैं मारपीट या डांट फटकार के बाद ।
म्यूचुअल रिलेशन के आधार पर ऐसे तमाम जोड़े आपकी आँखों के आसपास हो सकते
हैं किंतु सवाल उनका नहीं ,अबोध लड़कों और किशोरों का है जो घर के या पास
पड़ौस या स्कूल के छिपे हिंस्र पशुओं का शिकार बनकर भी चुप रह जाते हैं
और अपराधी को बल मिलता जाता है । ऐसे अनेक युवा प्रौढ़ लोग हैं जो बचपन
में ऐसे पशुवत हिंस्रनरपशुओं के यौनशोषण का शिकार रहे परंतु होश आने बड़े
और सक्षम होने पर भी न तो दंड दिला सकते न ही सामाजिक निंदा करके ऐसे
नरपशुओं का नकाब उतार सके । लड़कियों की सुरक्षा के साथ लड़कों की
सुरक्षा भी आज बहुत बड़ी आवश्यकता है ।©®सुधा राजे

Friday, 14 July 2017

सवर्ण कहकर दमन कब तक ?कब तक तिरस्कार ?--(सुधा राजे)

सवर्ण कहकर दमन कब तक ?कब तक तिरस्कार ?
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••(सुधा राजे)

राजपूत जाट और सिख योद्धा कौम है ।देश के हर नागरिक अनागरिक पर इनका लहू कर्ज है ।
 आजाद हिंदुस्तान के लिये त्याग के नाम पर राजपूतों से रियासतों का विलय करवाया गया और गणतंत्र की स्थापना के लिये जागीरों की भूमि भूदान में ले ली गयी ,काॅग्रेस की निजी खुन्नस के चलते सैकड़ों सहयोगियों का आश्रय बने राजाओं के प्रिवीपर्स बंद कराये गये और किलों महलों हवेलियों गढ़ी टाॅकीजों  जेलों फार्महाऊसों राजकीय स्कूलों काॅलेजों अस्पतालों क्लबों और राजकीय मंदिरों धर्मशालाओं को अधिग्रहीत करके म्यूजियम दफ्तर सरकारी आवास और तमाश घर बना दिये ।
फिर आरक्षण की चक्की में उनकी संतानें पिसतीं रहीं और नालायक अयोग्य लोग ठेल ठेल कर ऊपर चढ़ाये जाते रहे ।
हर जगह मामूली सी बात पर उनको अपमानित प्रताड़ित और उपेक्षित किया गया । स्वभाव से स्वाभिमानी लोग यह तिरस्कार पी पी कर जैसे तैसे देश मेरा है कहकर स्वयं को समझाते रहे तो उनके बीच उभरते हर दृढ़ और शक्तिशाली नायक को कुचलने की पूरी साजिशें रचीं गयीं जिसका नतीजा बगावत ही होता है और इसी कारण आज सिख जाट राजपूत तीनों ही स्वयं को देश के नाम पर ठगा हुआ महसूस करते हैं । अस्त्र शस्त्र और शत्रु को जीतकर अन्याय से लड़कर कमजोर की रक्षा करने वाली कौम अपने पुरखों के नाम पर मजाक उपहास फिल्मी झूठे चरित्र कब तक सहती इससे साबित किया जा रहा था कि जाट गंवार ,सिख मूर्ख और राजपूत अत्याचारी होते हैं । देश को बांधकर रखने की ताकत प्रशिक्षण से नहीं आती है प्रकृति ही देती है किसी को बुद्धि किसी को साहस और बलिदान अब यदि उसको दबाया कुचला जायेगा तो वह विस्फोट करेगा ही । दमन से रुकने वाली कौम न तो सिख जाट हैं न ही राजपूत । बुन्देलखंड पूर्वांचल हरियाणा गुजरात और अब राजस्थान ???????कौन है मिसट्रीटमेंट का शिकार स्पष्ट करें । जातीय रोजी रोजी छीनकर दूसरों की रक्षा का ही इतिहास विकृत करके फिर आरक्षण में आजाद हिंदुस्तान उनको  वापस जा सौंपा जिनके पुरखे ही आतताई रहे तब असंतोष न आये तो क्या हो ????हर राजपूत सिख जाट एक असंतोष से भरा है । प्रतिभाओं के दमन और सरकार की भेदकारी राजनीति साफ समझ में आती है । राजस्थान में आज जो हो रहा है वह एक तरफ तो फिल्मी नौटंकीबाज इतिहास बदलने की साजिशें कर रहे हैं कुंठित लोगों की शह पर ।दूसरी ओर सरकार सुनवाई की बजाय दमनचक्र चला रही है !!!!!!
अब ????????
इस संताप का फल कौन भुगतेगा ??
सत्ता के मद में बलिवीरों के वंशज कब तक दबाये जा सकेंगे ????
राज्य सरकार का नशा कहीं केंद्र सरकार को भारी न पड़ जाये ???
मध्यप्रदेश राजस्थान गुजरात की उपेक्षा और बंगाल कशमीर की खबरें ,
अशांत हृदय को क्या सांत्वना दे सकतीं हैं ,

ऐसी सैकड़ों कहानियां है जब भटक गये कम्युनिटी वारियर कानून से ही टकरा बैठे परंतु बाद में समझाने समझने से सरेण्डर करके सामान्य प्रायश्चित्त के बाद नागरिक बन रहे ।
मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सैकड़ों डाकुओं तक के आत्मसमर्पण करवाये ।फूलन ,मलखान ,तक के ।
क्या सीबीआई जांच नहीं करायी जा सकती थी ?राजस्थान मामले की ??क्यों ??क्या सच तो नहीं राजपूतों का आरोप कि सरेंडर करने जा रहे आनंद पाल को जानबूझकर मारा गया ??और अब ??इस दमन का परिणाम और नये बागी !!!!!!
केंद्र और मीडिया सब सोते रहे ?
सिख ने धर्म बदल लिया और विदेशों में उनको ताकत मिली कनाडा अमेरिका इंगलैंड तक ,
भारतीय जाट कृषि उर्वर हरियाणा और यूपी के कारण पनप गये ।
किंतु राजपूत सूखे गुजरात सूखे मध्यप्रदेश सूखे मारवाड़ मेवाड़ में कृषि की सबसे खराब स्थिति वाले कृषक मजदूर रह गये ।
और टेलीविजन फिल्म वाले प्रारंभ से ही एक जेहाद राजपूतों के खिलाफ चलाये जा रहे हैं जिनमें जमकर ठाकुर बलात्कार करते हैं राजपूत औरतें बदचलन आवारा नाजायज बच्चों की मां बनती है राजपूत लड़कियां घर से दलित अल्पसंख्यक प्रेमी के साथ भाग जाती है वह दलित अल्पसंख्यक प्रेमी बाद में समूचे ठाकुर खानदान को तबाह कर डालता है ।
यहाँ 
यह याद रखने वाली बात है कि ठाकुर साब का बनिया मुनीम गद्दार होता है और 
पंडित पुजारी लालची ...
किसी भी फिल्म में न तो कोई जोजफ खराब होता है न ही कादिर।
जब राजपाट बरबाद हुये तब अंग्रेज नहीं मुगल थे ,बचा खुचा बरबाद बागी घरानों को अंग्रेजों और गद्दार नवाबों ने कर डाला ,रही सही कसर भूमिअधिग्रहण भूदान और जमीन्दारी उन्मूलन से हो गयी ,
जब बच ही गये तो सोचा कि चलो नौकरी करें हुनर से कमा खा कर आम साधारण प्रजा बनकर ही जी लें ,
तो ताने तिरस्कार दुत्कार उपेक्षा बच्चों को मिली कि ""तुम तो राजपूत हो ब्राह्मण हो ,सवर्ण हो ""
तब भी सोच लिया कि चलो सामाजिक समरसता के लिये यह सब ठीक है ,
तो सब हमारे ही अपने हैं न क्या जाति क्या धर्म ,
तब 
आरक्षण का जुआ कंधों पर धरकर ,
बैल बनाकर कह दिया घूमते रहो 
कुछ भी कर लो कहीं नहीं पहुँचोगे अब ,
जो कुछ भी है सब केवल 
आरक्षित लोगों का है ,
तुम सब के सब सवर्ण केवल ,
आयकर बिक्रीकर भवन कर जलकर बिजलीकर भूमिकर पथकर पूजाकर अन्नकर वस्त्रकर भरो ,
और 
तुम किसी भी हुनर या योग्यता के माहिर हो जाओ गरीबी से लड़कर भी तो भी ,
ऊपर चढ़ते समय ,
सवर्ण कहकर राजपूत ब्राह्मण बनिया कायस्थ कहकर नीचे धकेलते ही रहेंगे ।
एक और साजिश चला दी कि ,
,
तुम्हारा मुख करिया करने को वंश इतिहास पुरखों सबको कलंकित करते रहेंगे ।
,
कांग्रेसी नेता  पांच औरतों से बिना विवाह के रिश्ते रख सकता है बुढ़ापे में भी परंतु युगानुसार राजा संधि और समय की मांग के हिसाब से पांच विवाह करके कलंकित बताया जाता है ।
आज तक कोई ऐसी फिल्म या टीवी सीरियल नहीं मिला जिसने ऐसा षडयंत्र न किया हो । डाकू ठाकुर ,
जबकि समय बताता है कि गड़रिया ढीमर मल्लाह गूजर कुरमी सब जातियों से अपराधी डाकू रहे हैं ।
लालची लिप्सावाला वासना का कीड़ा होगा ""लाला ""और .......नीच से घृणा करके गद्दार होगा पुजारी ,,
,
,
जाति केवल संबोधन के लिये या लोकगीत में आयी हुयी है तो फिल्म के टाईटिल और गीत के बोल बदलने पड़ जाते हैं वहीं ,
सवर्णों के गोत्र चौहान राठौड़ पांडे शुक्ला सूर्यवंशी तक कहकर फिल्म में बुरा बता दिया जाता है ।
चुनौती है कि सत्यकथा खोजकर साबित करें सब ।
वरना तो यह तय है कि सवर्णों को अब जातिसूचक शब्द पर बैन लगाने के लिये सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ेगा ।
कला के नाम पर ,
छल नहीं चलेगा।
सिखों का सम्मान ,
भारतीय नहीं करते किंतु कनाडा में उनकी इज्जत है । पंजाब की सीमा के प्रहरी सिख ,न होते तो देश का आधा नहीं पूरा पंजाब चला गया होता । 
राजस्थान यदि प्राचीर न बनता तो नक्शा दिल्ली तक ही सिकुड़ गया होता ।
सेना में सवर्ण सबसे अधिक मरते आ रहे हैं देश के लिये 1947से अब तक का इतिहास उठायें तो सच सामने आये । या तो हर जगह से हर तरह से सरकारी स्तर पर जातिवाद को खत्म कर दिया जाता ।
न स्कूल अस्पताल काॅलेज जनगणना परिचय पत्र कहीं पर जाति मजहब पूछते न ही जाति के आधार पर नौकरी वजीफे विवाहअनुदान और सहूलियते दीं जातीं ।
या फिर इतना अन्याय न होने देते कि जिनकी मातायें घरों में बाजरा पीसकर बच्चे को वीरता सिखती रहीं और देश के लिये सुहाग भेजतीं रहीं ,
वे बलिवीरों की संतान होकर दबाये अपमानित किये और तिरस्कृत किये जाते ।
एक तमाशे में नारेबाज किसी ने मां बाप के जेल जाते समय अंग्रेजी जेल हो आये तो आज तक ,
****स्वतंत्रता संग्राम सेनानी *****कहकर पेंशन पाये जा रहे हैं !!!!!!!!

एक पूरी कौम पीढ़ी दर पीढ़ी देर के दुश्मनों से लड़ती रही बरबाद घरों से निकलकर भी देश आबाद करती रही उसको एक सामाजिक स्वीकृति तक नहीं ??????
ये 
किसकी साजिशें है??
केवल भारत के द्रोही नमकहराम और मतलबी सियासती कंसों की जो नहीं चाहते कि लोग देशभक्त हों । वीर हों और राजपूत सिख जाट ब्राह्मण की तरह कट्टर भारतीय हो।
गुर्जर प्रतिहार जो राजपूत ही थे उनमें भी भेदभाव डाले गये ,
और ,
युद्ध से घर लौटे वीर सूखी रूखी खाकर टूटी फूटी खंडहर हवेली में देशगीत गाते रह गये।
जबसे सिखों में धर्मपरिवर्तन कराने और संख्या बढ़ाने की होड़ लगी है तबसे ही "
""नशा आलस वीरत्व ह्रास विलासिता और देश के प्रति अनिष्ठा वाले गुट भी बनते गये ""।
बंदा बैरागी भी राजपूत लक्ष्मण सिंह ही तो थे।
महावीर और पद्मनाभ ने सुधार किये जैन पंथ चलाया ,
सिद्धार्थ ने सुधार किये बौद्ध पंथ चलाया 
रणजीत सिंह ने सुधार किये सिख पंथ चलाया ,
राजपूत 
कभी जातिवादी नहीं रहे ,
राष्ट्रवादी अवश्य रहे ।
और यही उनका गुनाह रहा जिसके लिये राम से लेकर ,
राजू तक सबको आज सरकारी पिट्ठू  राजनीतिक सामाजिक जनसांचारिक षडयंत्र से नष्ट करना चाहते हैं ।
वीर होना अभिशाप हो जायेगा तो क्या ,
कविताओं के पुलंदे मारे जायेंगे दुश्मन को ?
फिर 
ताना क्यों क्षत्रियत्व का ।
आज तक क्ष से क्षत्रिय पढ़ने पर विवश बालक को दूसरा उचित शब्द तक तो मिला नहीं।
पुराने पन्नों में बहुत कुछ जलाया गया परंतु लिखित ही तो सब नहीं अभ्यास भी है गढ़वाल में सूर्यवंशी परमार सब तरह के ठाकुर हैं जो आज तक देश पर पहली कतार के सिपाही हैं।
ब्राह्मण बुद्धि की संतान रहे उनका दमन ब्राह्मणवाद कहकर केवल इसीलिये किया जाता रहा कि वे यदि बढ़ गये तो लहू पसीने में तरबतर जाट सिख राजपूत कहीं उसकी बातें सुनकर पढ़ लिखकर आगे बढ़कर देश को न सँभाल लें।
सारा राज्यव्यय सारे कर सारे टैक्स कौन भरता है ??क्योंकि बाकी तो कर मुक्त है ?
और उलटे पूर्वजों की बनायी निशानियां मिटाकर नये नये टुच्चे पीएडी लोग नकली डिगरी में सबका इतिहास तक बदले जा रहे है ।
राजपूतों का इतिहास भारत का सच पढ़ना हो तो ,
कर्नल टाड 
जेम्स स्लीमन ,
और विदेशी प्राचीन शोध देखनी होंगी ।
देश के मीडिया ने सबका सब वास्तु मुगलई घोषित कर डाला ।
कैसे एक गर्म लहू का वंशज इतना दबेगा ?
ब्राह्मणों को राजपूतों का साथी होने की बजाय शत्रु कहकर खड़ा करना भी एक साजिश ही रही जहां """शेख बरहमन """पादरी कहकर पुजारी लोग अलग कर दो योद्धा तो लड़ने से जब होश मिलेगा तब जानेगा हुआ कहां क्या । जिसका शिकार नयी घृणित राजनीति आयी और दलित को समझाया गया कि ब्राह्मणों की वजह से तुम सब गरीब हो ,जबकि ,
ब्राह्मण का था ही क्या !!!
राजपूत मंदिर बनवाले ब्राह्मण पुजारी दान की जमीन पर पूजा पाठ से जीता ।
पढ़ाता रहा ।
कर्मकार तो हर व्यवसाय का लोहा ,कपड़ा चमड़ा ,तांबा, पीतल, सोना, मिट्टी, पानी, गौधन, पर ही बंटकर परंपरागत रोजी रोटी कमा खा रहा था ।
ये रोजियां किसने छीनी ?????
वे 
लोग जो उन चीजों के लुटेरे थे ,
वे
आक्रमणकारी साम्राज्यवादी लोग जो उन चीजों को खुद बनाकर बेचना चाहते थे ,
,
न तो राजपूत ने ,
न ही ,
ब्राह्मण ने ,
,
किसी भी रोजी नहीं छीनी ,
गरीब कौन ??
बेरोजगार और कौन !!!!
,
,
याचक कौन ??
बेरोजगार ,
,
तो बजाय रोजी रोटी निर्विघ्न कमाते हुये लुटेरे से छीनी गयी रोजी की बात समझे ,
,
दिमाग में ठूँसकर बैठ गये लोग कि ,
लोहा पीटना बुरा काम है ,
लकड़ी का सामान बनाना बुरा काम है ,
,
,
तकनीक और दिमाग के बल पर जिस भारत की संपन्नता की कहानियां सुनकर लोग भागे आ रहे थे ,
,
वे ही ,
पूजे जाने लगे ,और कारण बताया गया गरीबी का पंडित जी को सिपाही को ?




©®सुधा राजे

Saturday, 8 July 2017

धरती का ऋण कुछ तो हों उऋण - आज का वृक्ष, सहजन

धरती का ऋण कुछ तो हों उऋण
<<<<<<<सुधा राजे *>>>>
वर्षोत्सव मनायें ,चलो कुछ फलदार वृक्ष लगायें
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
आज का वृक्ष,
सहजन
सुरोंजना
सुहांजन
मुनगा
शेवगा
सिंगड़
**********
मुनगा या सहजन दो तीन प्रकार का होता है ।दक्षिण भारतीय प्रकार का मुनगा बारहों महीने फलियां देता रहता है ।जबकि उत्तर मध्यभारतीय मुनगा वर्ष में एक बार ग्रीष्म से लेकर पावस तक फलियां देता है ।यह बहुत जल्दी लगने पनपने और बहुत जल्दी ही फलियाँ देने लगता है ।गृहवाटिका चबूतरे पिछवाड़े और बड़े गमले में भी कुछ प्रजातियाँ लगायीं जा सकतीं हैं । मुनगा के फूलों की पकौड़ियाँ कोफ्ते सब्जी साँभरदाल दहीबड़े और सैंडविचेज बनते हैं ।सहजन की फली की सब्जी को मुर्गा मछली मांस की तुलना में शाकाहारियों के लिये विकल्प माना जाता है और उसी विधि से बनायी खायी जाती है ।हम सब तो मुनगे की फलियां चूसकर ढेर लगाते तो सब चिढ़ाते
""जे धरे देखो घास फूस के हाड़ चौँख केँ ""
मुनगा 300से अधिक बीमारियों का समापन करता है ऐसा आयुरवेदाचार्य मानते हैं ।सबसे अधिक पौष्टिक शाकाहार में मुनगा सबसे पहले आता है । यौनदौर्बल्य सहित अनेक कमजोरियों का निदान मुनगा के फूल और फलियों के सेवन से होता है । इसका पेड़ पाँच से पच्चीस फीस तक लंबा घना छायादार हो जाता है ।फूल के समय पत्तियां नगण्य रह जाती हैं और फलियाँ एक से तीन फीट तक लंबी हो सकती हैं ।

बीज को लगाने से पहले रात भर पानी में डाल कर भिगो ले,
अब भिगोए हुए बीज फली को बीच से फाड़ दे
और इसका छिलका निकाल दे |
अब एक 18×12 का प्लास्टिक में 3 भाग मिट्टी और 1 भाग बालू के मिश्रण वाले मिट्टी से भर दे,
अब इसमें 2-3 cm गड्डा कर के 2-3 बीज को लगाए |
अब इस मिट्टी में नमी बनाए रखे |
5-12 दिन में बिज अंकुरित हो कर पौधा निकल आएगा,
जब पौधा 60-90 cm का हो जाए तो इसे अपने खेतो में लगाए |
अगर आप नर्सिंग नहीं करना चाहते है
तो आप 10 cm मोटी वाले डाल 45 cm से 1.5 m लम्बे डाल को सीधा लगा कर पेड़ तैयार कर सकते है |
एक बागवान
लाखों रुपये सहजन की खेती से कमा सकता है ।

इसमें 92 तरह के मल्टीविटामिन्स, 46 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 36 तरह के दर्द निवारक और 18 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं।
पशुओं के चारे के रूप में उपयोगी
चारे के रूप में इसकी पत्तियों के प्रयोग से पशुओं के दूध में डेढ़ गुना और वजन में एक तिहाई से अधिक की वृद्धि की रिपोर्ट है। कुपोषण, एनीमिया (खून की कमी) में सहजन फायेदमंद होता है।

एक एकड़ खेत में सहजन के 250 ग्राम बीज की जरूरत होती है,लाइन से लाइन की दूरी 12 फिट और प्लांट से प्लांट की दूरी 7 फिट रखी जाती है, एक एकड़ खेत में 518 पौधे लगाए जाते हैं |
अप्रैल महीने में बुवाई के बाद सितम्बर महीने में फलियां बाजार में बिकनी शुरू हो जाती हैं। "
गर्मी के मौसम में 10 रुपए किलो और सर्दियों के मौसम में 40 रुपए किलो के हिसाब से बिकती हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर सहजन के पेड़ में दो बार फलियां लगती हैं और एक बार सहजन लगाने के बाद 4 साल तक लगातार पैदावार होती है। एक पौधे में लगभग 20 किलो तक सहजन की फलियां लगती हैं।

ज्योति -1नामक प्रजाति बहुत फलियां देती है

दमा टीबी कैंसर और हड्डियों के दर्द ,रूसी बाल और त्वचा के अनेक रोग सहजन से दूर होते हैं

बंगाल का एक मुनगा बिलासपुर में रेलवे के इलाके से कई जगह शहर में खूब लोक प्रिय हो रहा है। पांच फीट की डाल काट खेत मे फसल के बाद या इन दिनों गड़ा देते है। बारिश में उसकी जड़ और पीके निकल आते है। फरवरी मे फलियां आ जाती हैं।

यह कलम से भी लगता है और बहुत जल्दी हर तरह के तापमान में कामयाब हो जाता है ।

मुनगे की पत्तियां देह पर से त्वचा रोग खत्म करती है खेत पर से कीट पतंगे



तो चलें न केवल अपने अपितु अन्य सबके लिये भी लगायें मुनगा ,सहजन ,
सादर निवेदन अनुरोॆध सहित
©®सुधा राजे

वर्षोत्सव मनायें कुछ फलदार वृक्ष लगायें - आज का वृक्ष कटहल

वर्षोत्सव मनायें कुछ फलदार वृक्ष लगायें 
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आज का वृक्ष 
कटहल 
कँटहफल 
जैकफ्रूट
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोग इसे बड़हल कहते हैं परन्तु यह बड़हल नहीं है "कांटेदार फल होने के नाते कँटहाफल है ।बड़हल पर बाद में लिखेंगे ।
यह बहुत ही अद्भुत वृक्ष है जो जड़ से फुनगी तक तने डालियों पर फलों से लद जाता है । एक फल कम से कम दो किलों से बीस किलो तक का बड़ा हो सकता है ।सामान्य कटहल तीन से पांच किलो तक का होता है ।
इसकी सब्जी तब ही बढ़िया लगती है जब कच्चा फल हो दूध निकल रहा हो डंठल से काटने पर ।पकने पर इसके बीज के ऊपर लिपटी परत बिलकुल केले के पके गूदे समान मीठी नरम और स्वादिष्ट रहती है । पके बीज कवर का कस्टर्ड हलवा खीर कुल्फी मलाईरबड़ी में भी बढ़िया उपयोग होता है ।बीज एक प्लास्टिक जैसी झिल्ली से कवर रहता है और भीतर सिंघाड़े की ही तरह का सफेद स्टार्च होता है ।बीज छीलकर सब्जी में राजमा की विधि से बनाकर खाायी जाती है और पीसकर दूध मावा मेवा डालकर हलवा बीजों के चूर्ण से बनाते हैं । कटहल के कोफ्ते कबाब और पकौड़े खाकर अरविंद जी जेटली जी को कबाब खाता दिखा कर वायरल कर जो दिया। मेरा मानना है कि प्रकृति का वरदान है कांदू कटहल जिमीकंद सूरन रतालू सोयाबीन मृणाल और कटहल अब कोई क्यों मांस खाये ।इनमें तो मांसाहार से भी बढ़िया पौष्टिकता और कबाब बिरियानी पुलाव कोफ्ते पकौड़े परांठे लच्छे पिज्जा सब बनाने की सुविधा है ।व्यंजन विधिया आप "सुधा रसोई "मेरे ब्लाॅग पर बाद में पढ़ लें। यहां वृक्ष लगाने की बात है कि यह बहुत छाया दार बहुत फल देने वाला धनकमाऊ और सब्जी मीठा फल मांसाहार से छुटकारा हरियाली देने वाला दीर्घायु फल है जो बस दो से पांच साल का होते होते फलने लगता है ।पत्ते तक बढ़िया दोने पत्तल पशुआहार है । पनपता भी बहुत जल्दी है ।नम जमीन में बीज गाढ़ दें या नर्सरी से लाकर लगा लें ।कुछ प्रजातियां जिनके कांटे चपटे होते हैं उनकी तुलना में खड़े कांटेदार कटहल की सब्जी बहुत स्वादिष्ट होती है ।पके कटहल बच्चों बूढ़ों के लिये ऊर्जा और वजन कम करने वाले ताकतवर आहार हैं । दुर्बलता में भी कटहल के सब्जी फल खीर हलवा बढ़िया है ।एक पेड़ से हजारों रुपये कमाये जा सकते हैं खेत बाग घर चबूतरे कहीं भी लगायें ।बड़ी टंकी गमले में भी लगाये जा सकते हैं। तो निवेदन है अनुरोध है कि कुछ वृक्ष लगायें न केवल अपने लिये अपितु दूसरों के लिये भी जब भी जहां भी जगह मिले यह पावस व्यर्थ न जाये ।सादर नमस्कार ,जयहिंद 
©®सुधा राजे

Thursday, 6 July 2017

(सुधा राजे) धरती माँ का ऋण ,कुछ तो हों उऋण *** आज का वृक्ष - करौंदा कर्मदा,

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*************(सुधा राजे)
धरती माँ का ऋण ,कुछ तो हों उऋण 
<>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>वर्षोत्सव मनायें ,चलो कुछ फलदार वृक्ष लगायें 
*************************
आज का वृक्ष _^_
करौंदा
कर्मदा, 
करौंदा कर्मदा और क्रेनबेरी पृथक हैं पहले यह समझ लें ।भारतीय करौंदा लाल गुलाबी हरा रानी रंग और काला तथा गहरा जामुनी तक होता है । आकार में छोटे बेर के बराबर होता है । बहुत खट्टा फल है । यह फल बहुउपयोगी है । अचार चटनी मुरब्बा सलाद जैम जैली साॅस सब्जी और सुखाकर पिट्ठी बनाने तथा चूर्ण बनाकर रखने पर अमचूर की भाँति प्रयोग करने हेतु बहुत ही उपयोगी है । तरह तरह की दालों साग सब्जियों तरकारियों और घुघरी ,कोंयीं ,छोले तथा भरवाँ अचार के मसालों के साथ मिलाने के भी बहुत काम का है ।गुड़ चीनी डालकर इसकी कलौंजी ,लौंजी ,खटमिट्टी मैथीदाना ,बनायी जाती है ।
करौंदे का जूस काले नमक के साथ पीने से तेजी से चरबी घटती जाती है । यह विषांतक है कैंसर रोधक तत्व इसमें है । करौंदे की पत्तियां पीसकर पिलाने से मिर्गी रोग ठीक हो जाता है ।गर्भवती स्त्री को प्रारंभ में जो उलटियां होती है तब करौंदा मुख स्वाद ठीक रखता है ।
एक तरह से बहुत शीघ्र पनपने वाला पौॆधा है नींबू की ही भाँति शीघ्र बढ़कर फलने लगता है ।बंगले की बाऊँड्री के लिये बढ़िया कवरिंग फैन्सिंग है । फूल सुगंधित होते हैं । मिर्च करौंदे का अचार बहुत स्वादिष्ट मिश्र अचार बनता है ।चाहें तो किसी भी फल के साथ फ्रूट सलाद चाट या अचार रूप में ले सकते हैं । पेड़ दो से दस फीट तक का हो जाता है । गमले में भी लगाया जा सकता है बस कटिंग समय समय पर करते रहें यह पुनः हरा भरा हो जाता है ।नम भूमि पर लगा दें छह माह की ही देख रेख में पनप जाता है।हमें तो अजवाईन वाली बेसन की बासी पूरी के साथ मिर्ची करौंदे का तला हुआ नमक हींग अजवाईन मिक्स पसंद है । यह हर मौसम में लग सकता है बरसात में बहुत शीघ्र बढ़ता है । तो चलो लगायें केवल स्वयं नहीं सबके लिये कहीं भी जहां भी जगह मिले , एक कर्त्तव्य करे पूरा ,पेड़ लगाये चाहे वन हो घर हो या हो घूरा _/\ _सादर 
©®सुधा राजे

सुधियों के बिखरे पन्ने- एक थी सुधा - संस्मरण - सेंवढ़ा।

संस्मरण ..
.........

सेंवढ़ा
सनकुआ मार्ग के मोड़ पर फाॅरेस्ट बंगले के पास ही ऐन सड़क पर एक पंडित जी खूब ऊँचे चबूतरे पर तुलसी चौरे के सामने बैठे देवी जाप और भजन करते रहते थे । हम बच्चे जब सनकुआ प्रपात या गुफा वाले शंकर जी या राजराजेश्वी पूजा के लिये टोली में निकलते या वहीं तब किंडर गार्टन था वहाँ जाते तो पंडितजी जोर से मंत्र बुलवाते राह छेंककर ,हम कुछ तेज थे सीखने में सो जैसा बोलते कह देते ,बाद में याद रह जाता ""नमस्तस्मै""सो उन पंडित का कोड नेम हम बच्चों में हो गया नमस्तस्मै पंडितजी । वहीं पास में बी एस एफ रेजीडेन्स थी और कंपनी कमान्डेन्ट भीम सिंह थापा जी हम लोगों को रोक कर मारवाड़ी गीत सुनाते "
,,,,पैदल चलना मन्ने ना सुहाता ल्याओ मोट्टर कार अजी पम् पम् पम्
"छूट गयी नौकरी मिले न पगार कां से ल्याऊँ मोट्टर कार ""अजी पम् पम् पम् ......

और उनका नाम रख लिया '""पम् पम् काका ""

हमें तब पीछा छुड़ाकर सिन्ध में नहाने और वहां प्रपात की अर्राती धारा को देखने की शीघ्रता रहती सो ""दो पंक्तियाँ जल्दी गा देते फ्राॅक घुमाकर नाचते हुये हमें सिखाने के चक्कर में भीमसिंह काका ,अपनी खाकी हाफ पैन्ट तो कभी खाकी फुल पैन्ट पकड़ कर लड़की वाली मुद्रा बनाते ,हम सब हँस देते और काका हम सबको कुछ चिज्जी देकर जाने देते ।

उधर नमस्तस्मै पंडित जी का यही हाल था कि कन्याओं के चरण छूकर प्रसाद देते परंंतु पहले "
"जय श्रीकृष्ण राधे श्याम ""कहना पड़ता कई बार तब प्रसाद मिलता ।मिश्री तुलसीदल पेड़ा हमारी प्रिय मिठाई रही । हम कह तो देते परंतु हथेली नन्हीं सी ऊपर कर देते और नीचे का प्रसाद छिपाकर दुबारा प्रसाद ठग लेते ।
फिर दूर जाकर मुँह चिढ़ाते हुये कूदकर भागते हुये चिल्लाते """सीताराम सीताराम राम राम राम """
पंडित जी दंड कमंडल धोती सँभालते कुछ दूर पीछा करते _ठैर जाओ ठैर जाओ धौंचाली कऊँ के हमिन सिर्री समज लओ अबई बतईत कैसी राम राम ""

हम सब बहुत प्रसन्न होते । हमारे साथ हमारी सहेलियां भी रहतीं लीडर तो हम ही रहते बालटोली के ।जब किंडर गार्टन या सनकुआ से वापस आते तो फिर पम् पम् काका
राह छेंक लेते , हम कभी मूड होता तो पहले ही सुना देते "
"दादा मारवाड़ में दीनी रे दीनी रे औछौ पहिरौ घाघरो मैं लाजन मर गयी रे ""

,,,बाजरा जी का जंजाल मोरा बाजरा ,,

पम् पम् काका नेपाल के थे और वहाँ मेरी ही आयु की उनकी बेटी थी जो खूब नाचती गाती कूदती रही होगी जैसा वे कहते थे । उनकी आँखें भर भर जातीं कभी कभी और कभी कभी खूब लड़की की तरह बंदूक रिवाॅल्वर सबकुछ बांधे भी नाचने लगते हैट मुँह पर रखकर ।

टैक्स था कविता सुनाना और पुरस्कार थे मैस के फल
,
उधर तनिक ही पग बढ़ते नमस्तस्मै पंडितजी पंथ छेंक कर आ जाते दंड खटकाते अब कओ कितखौं निकर हौ वानर यूथं ??हम सब हँकर हाथ जोड़कर दूर से ही नारा लगाते ""जयश्रीकृष्ण राधे श्याम ""
हाँ अब कई नौनी ,
बौ कभऊँ जिनकईयो जौन पैलऊँ कै रये ते ,
हम सब हाँ में सीधे बनकर मुंडी हिलाते ।
आगे दौड़कर निकलते और फिर नारे लगाते

""सीताराम सीताराम जय श्रीराम राम राम राम ""
पंडित जी फिर पीछे आने का उपक्रम करते दौड़ते फिर ठिठक सुनाते
~""कढ़ियो काल दुआरे सैं हम बतैहें कैसौ सीताराम "

आज यादों में यूँ ही आता है कि न तो पंडितजी कभी ठगे गये न बुद्धू बने बल्कि हम सब को दो बार चार बार हथेली छिपाते देखकर भी अनजान बनते थे और न ही वे हमारी सीताराम या नमस्तस्यै को नमस्तस्मै कहने से ही चिढ़ते थे वह प्रसाद रिश्वत नहीं बालकों को प्रोत्साहन था ।
न ही पम् पम् काका हमें गाने नाचने के बदले फल देते रहे बस उनकी नेपाल में रहती बेटी की यादें उनको हमारी सूरत में कुछ पल का पितृत्व सुख देतीं रहीं ।
नमन आप दोनों को ।पता नहीं कौन कहां है ।
बरसों बाद रिटायरमेन्ट के कहीं दूर से पम् पम् काका आये तो रहे एक बार परंतु तब हम हाईकोर्ट के वकील बन चुके थे । बस दो चार बातें की चकित से देश लौट गये । हम कह ही नहीं पाये कि पम् पम् काका आप हमारे बचपन की सबसे सुन्दर स्मृतियों में से एक हो । शब्द कहां साथ देते हैं हर जगह ।तब हम धाय माँ कौँसाबाई की देखरेख में रहते थे क्योंकि माँ साथ नहीं रहतीं थीं वे बहुत व्यस्त सामाजिक जीवन में दूर नगर में रहतीं थी ।
आज ,
यह क्यों नहीं समझते लोग कि बच्चों में यह प्रवृत्ति होती है कि आप चिढ़ोगे तो वे और और चिढ़ायेंगे । बस हिंसक हो उठते हैं ।

कहीं कोई चिप होती मस्तिष्क के बालपन के चित्रों को निकालने की तो बड़ी मोहक मुद्रा होती थी पम् पम्
काका की
ये तो बाद में पता चला कि यह पम् पम् दरअसल मोटर की आवाज का भोंपू है ,
कुछ स्थूल से ठिगने नेपाली काका ,वरदी में हैट मुख पर लगाकर बिना अपने असिस्टेन्ट कर्मचारियों और सिपाहियों की परवाह के छोटी बच्ची बनने का अभिनय करते नाचते तो हम सोचते काका को ठीक नहीं आता हम अधिक होशियार हैं और सारे स्टेप ठीक करके ठुमकने लगते ।

नमस्तस्मै पंडितजी तो बस राम नाम से चिढ़ने के बहाने ही राम राम कहते कहाते साथ ही देवीसूक्त भी ।
तब कहाँ समझ आता था तब तो लगता था हम बालक ही विजेता है पंडित जी तो बुद्धू बन गये हमने प्रसाद भी दुगुना तिगुना ठग लिया और फिर से रामसीतारमा भी कह दिया

हाँ क्योंकि वे पहले राजस्थान रहे और वहाँ बरसों रहकर आये थे ,हम लोग राजपूत हैं और उनको कदाचित वह सब बढ़िया लगता रहा । वे स्वयं भी राजपूत ही थे । सशस्त्र बल के लोग कब कहां रहते हैं पता नहीं । यहां यहीं बहुत विचित्र बात है आज कि नेपाली वे स्वयं आपस में बतियाते परंतु हम लोगों के लिये हिन्दुस्तानी गीत गाते ।भारत से प्रेम था परिवार के मित्र रहे

हमारे पिताजी और काका शाम की किसी छुट्टी में पीने खाने बैठते तो पिताजी भोजपुरी गीत बहुत गाते थे ।

हमें जैसे बुन्देली प्रानन प्यारी लगती है। 

ग्वालियर अथवा झाँसी से बस मार्ग है ,दतिया जिले में कसबा है तहसील है ,और प्राचीन उप रियासत है ,
आदिब्रह्म के चार पुत्रों की तपोभूमि है सेवढ़ा ,यहां सिन्ध नदी पर प्राकृतिक प्रपात है पहाड़ हैं जंगल है और किसी समय बाघ थे ,
परिजनों के साथ शिकार पर फिर लिखेंगे। 

नमस्तस्मै पंडित जी के घर के पास ही एक पटैरिया जी का घर था और उन दिनों बहुत धनिक परिवार रहे वे लोग ,उस समय चर्चा करते सब कि उनका पोता ही दादा का पुनर्जन्म है वह पिछले जन्म की बातें सुना रहा है । हम बच्चे कुछ किस्से सुनने के शौकीन थे ही ,घर में ग्वाला रहते थे और एक अर्दली भाई थे ,उनकी कहानियों में धन सदा ही चूल्हे के नीचे ही छिपा निकलता था ,
तो उसी कल्पना में एक बार हमारी बाल टोली उनके घर किसी पूजा में गयी तो पूछ लिया कि ""चूल्हे की नीचे भी खोदकर देखा कि नहीं ""सब ने इतना हँसा कि खिसिया कर रह गये ,,,चले थे विद्वान बनने। 

तब बहुसुन्दर हरा भरा और रामलीला कृष्णलीला की नगरी थी । बहुत सारे तो बहुरुपिये रहते थे जो नगर में तब निकलते तो हम लोग चकित होकर पीछे लग जाते । उस समय एक फूफाजी वहां पशुचिकित्सक थे सो पशु अस्पताल के सामने वाले अस्पताल के सामने तक जाने की छूट थी और वहीं डाॅक्टर फूफा जी के बंगले पर छुट्टी के दिनों में एक शाम डाॅक्टर बुआजी को रोज तंग करती बिल्ली हम चारों कजिन्स ने बंद कर ली बच्चों वाले कमरे में । बिल्ली कपड़ों की लकड़ी वाली आलमारी में एक काँच टूटा होने से छिप गयी हम बहादुर बालिका बनने के तमगे में बिल्ली को हाथों से दबोच बैठे ,बिल्ली ने पूरी ताकत से दाँत मार दिये उंगलियों पर हमने चीखकर बिल्ली छोड़ दी बुआ जी घबरातीं आयीं तो देखा मध्यमा के नाखून से पार हो गये दांत ,
बहुत सारी डाँट पड़ी पट्टी सुई और रोज की मरहम पट्टी के बाद जब दर्द कम हुआ तो तमगा मिल ही गया "एक बात तो है हमारी बिटिया है बहुत निडर बहादुर "खदेड़ कर हाथों से बिल्ली पकड़ ली तब से आयी ही नहीं .....

अब तो बहुरुपिया शब्द केवल लेखन में रह गया है तब हम लोग सचमुच के बहुरुपिये देखते थे ,,,
एक कक्का मास्साब थे और कमला भैन जी ,वे हमें विशिष्ट खोपड़ी कहते रहे ।
उस समय कामिनी दी सेंवढ़ा काॅलेज में पढ़तीं थी बहुत सुंदर थी बंगले के ही सामने से सब निकलते काॅलेज तब किले में ही था अब का तो पता नहीं , मामा जी के लड़के उस समय सहपाठी थे उनके और खरे जी तब वहां हिंदी के व्याख्याता थे ,
हमारी यादें कुछ धुँधली हैं परंतु याद हैं कि तब चुनाव हो रहे थे और इंदिरा जी के विरोध में कोॆई कुछ बोलता नहीं था परंतु ऊपर काॅलर पर "गाय बछड़ा "नीचे बटन पट्टी के दीपक का निशान दिखाकर चुपके से सब वोट माँगते थे ।
सायनी मुहल्ला में रामलीला होती थी और नाजिर की बगिया से ताजिये निकलते थे ।हम सब वी आई पी ही जैसे जाकर सबसे आगे बैठते और रामलीला देखकर खूब रोते

बहुत गूढ़ है सेंवढा वहां के कवि रहे ""अक्षर अनन्य ""राजा पृथ्वीसिंह "रसनिॆधी " बहुत सारे डर लगते थे हम बच्चों को जब रात को देर में बड़ों के साथ मरघटों के करीब से निकलते ,रामलीला देखकर । तब चूँकि पहले चंबल किनारे रहे फिर सिन्ध किनारे सो डाकू शब्द से डर नहीं लगता था । कई लोग ऐसे थे बहुत बहुत बाद में पता चला अरे ये तो डाकू थे ।

फूलन के समय हम लोग शिवपुरी क्षेत्र में आरोन थे वहां आगरा बाॅम्बे हाईवे पर फूलन का दल अकसर मँडराता रहता था परंतु आतंक नहीं रहा वैसा जैसा मोहर सिंह माधो सिंह मलखान सिंह और दऊआ का था बेहमई कांड के बाद फूलन कानपुर इलाके में जाकर छिप गयी थी ,
छोटे मोटे डाकू सीधे सामने नहीं पड़ते थे तब "आशा गोपालन बहुत दिलेर एसपी रहीं ग्वालियर की और अनगिनत एनकाऊन्टर कर डाले ""

पूरी रात वहाँ लोकगायक सनकुआ के मेले में नाचते गाते थे । मेला तो पुल पार टेकरी वाली माता तक लगता रहा । तब पुल नीचे वाला था नये की नींव पड़ने लगी थी नीचे पुल पर पावस में जल भर जाता रहा । हम सब मीलों दूर फैले मेले में हिंडोला झूलते । बाद में सेवढ़ा हर साल कवि सम्मेलन में जाते रहे बसंत पंचमी पर मेले में ही राजराजेश्वरी जी के सामने पहाड़ी पर मंच लगता जहां कभी सोमठाकुरजी कभी अवस्थी जी कभी भैयालाल व्यासजी जी और पूरे भारत के अनेक कवियों के साथ देर रात तक काव्य पाठ भी किया हरिकेश जी ने तब किशोरमन की वीर कविताओं पर घर बुलाकर लड्डू खिलाये मैथी सोंठ वाले और "मीरा "पर हस्ताक्षर करके आशीर्वाद स्वरूप कुछ किताबें भी दीं । करये दिनन में जब महालया की लक्षमी पूजा चलती हम कन्याओं को ""रोज सोरह "ढारने जाना बढ़िया लगता । एक बार बह गये होते सनकुआ में कई घूँट पानी पी गये तब सनकुआ से नीचे शांत जल में पत्थर पर स्नान कर रहे थे नियम था सोलह करके एक स्नान हुआ और ये फिर सोलह बार करना है ,लोटे से ही सिर पर दूब लगाकर ढारने थे सो लोटा तेज धार में बह गया ,सोचा पानी कम है पकड़ लेगें किंतु कुँआर का पानी तेज बहाव बह गये ,वे तो वहाँ एक अजब सिंह भदौरिया जी थे बापू के कलीग उनकी पत्नी भदौर्नी काकी रहीं लंबी मजबूत भिंड की ठकुराईन कूद कर पकड़ लिया वरना आज ये कहानी नहीं लिख रहे होते ,

गोलकोठी में अकसर लुका छिपी और उछलकूद के लिये साथियों सहित पहुँच जाते सब ही अपने थे रोक टोक तो थाने से काॅलेज तक कहीं थी ही नहीं । नाक कान तक तो वहीं मेले में बिंधवाये रहे हमारे । पकड़ा दिये पेड़े बताशे और जड़िया जी ने कब कान में बालियां डाल दी पता ही नहीं चला । नाक बिंधी तो बड़ा झगड़े हम धाय मां से और बापू से भी । तब एक रस्म ही थी कर्णवेॆध लड़कों के भी होते थे । गुरूमंत्र वहीं मिला पहली रामायण पाठ वहीं राजराजेश्वरी के दरबार में अखंड पाठ से हुआ और पहली चौपाई ही वही ""संपुट ""याद हुआ ...देवि पूजि पद कमल तुम्हारे सुर नर मुनि सब होंहिं सुखारे ....
तब से बरसों हुये नवाह्न परायण जब भी उठा संपुट कोई रखा परंतु "सहसंपुट यही रहा ,,

पहली रोटी वहीं मेले से खरीदे नन्हे चौका चूल्हा गृहस्थी के उर्साबिल्ना पर ही से सीखी । कौंसाबाई थी एक ढीमर थीं वहीं हमारा भोजन पकातीं थीं एक डोंगर सिंह थे डिरौली पार के एक सेंगुवा के गंधर्व सिंह थे सब की बहुत देखभाल रहती । हुकुमसिंह यादव उस समय परिवार के आल इन वन प्रबंधक रहे । कोंसा बाई डरतीं कि कहीं बापू ने देख लिया रोटी बेलते तो डांट पड़ेगी परंंतु हम जिद करके सीखते । गुड्डे गुड़ियों के घर में एक पिल्ला पाल लिया "मोती" कुछ सहेलियां थीं तो पूजा का लोटा उनकी देखा देखी मांजते रगड़कर रेत से फिर तुलसी कक्का डांटते प्यार से ये आपका काम नहीं हमिन करन देओ ।

जिंदपीर के जंगलों भरे क्षेत्र में तब स्त्रियाँ ""बिलना खाने ""जातीं थीं । और वहाँ खंडहरों में बने मंदिर मजार पर हम लोग डरते कि कहीं यहा भूत आयेगा तो ,
,
दूर लोकेन्द्रपुर के किसी गांव में बहुत ऊँची सी पहाड़ी पर एक मंदिर है देवीमाँ का धुँधली सी याद है कि वहां डिरौली से होकर जीप से हमलोग शिकार पर गये और वहीं ,से बाघ के बच्चे किसी शिकारी से छुड़ाये गये थे एक हिरण शावक भी जो बहुत दिनों तक हमारे साथ ही खेलता कूदता रहा फिर एक दिन राहत कार्य मे वनवासियों को जो अनाज बाँटा जाता था उसके भंडार में हम सब जा छिपे ,वह शावक अनाज खाने लगा ।नादान बालक हम समझ ही नहीं पाये कि यह खतरा है सो खाने दिया ,वह बहुत ही अधिक अनाज खा गया हम खुश कि अब जल्दी बड़ा होगा ,किंतु उसका पेट फूलता गया और जब तक सही इलाज हो पाता शावक मर गया । हम सब कई दिन रोते रहे छिप कर । लाल सफेद सुनहरा वह हिरण शावक आज तक ूाँहों के स्पर्श से मन की वीडियों चलचित्र में जैसे बड़ी बड़ी बड़ी काली आँखों से देखकर हमारी तरफ दौड़ लगा देता है ।

बाघ के बच्चे बिल्ली बराबर बड़े प्यारे थे ,एक चीतल भी बहुत दिन पला रहा ,फिर एक परिजन ले गये ,नेवला गिलहरी सफेद चूहे और भी बहुत सारे जीव आते जाते रहे ।

सचमुच सबसे प्यारी जगह ,,,,तब कन्या जेवाईँ जातीं तो एक नया पैसा मिलता था चौकोर ,उससे पाँच टाॅफी आती थी एक बड़ी कुल्फी आ जाती थी आज तो वैसी कुल्फी बननी ही बंद हो गयीं बस कभी कभी घर पर बनाने का प्रयास करते हैं परंतु फ्रिज से वह पेटी वाली कुल्हड़ की कुल्फी नहीं बन पाती



सुधा राजे की तीन कवितायेँ।

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विस्थापित कश्मीरियत  

बात करते हो हिमालय की नयन में नीर है 
​​
न्याय की दहलीज बैठा रो रहा कश्मीर है ....

स्वर्ग से सुन्दर धरा को लग गयी किसकी नज़र 
झील तालों पर्वतों गांवों नगर में  था जहर 
काल की कर्कश पुकारों पर सिसकता धीर है 
न्याय की दहलीज बैठा रो रहा कशमीर है 


स्त्रियों पर गीध लाशों पर वो मानव थे कि क्या 
पर्वतों को किस कदर लग गयी सियासत की हवा 
छोड़ गये जलते दिये घर ताकते शहतीर है 
न्याय की दहलीज बैठा रो रहा कशमीर है 


एक थाली इक दिवाली ईद राखी होलियां 
इक मुहल्ला था  चलायीं क्यों गयीं फिर गोलियां 
बेबसों को कत्ल करके सोचता रणवीर है 
न्याय की दहलीज बैठा रो रहा कशमीर है 


ये लहू जिन जिन के हाथों पर लगा वो सब के सब 
पीढ़ियों तक पाप के भागी रहेंगे अब कि तब 
जब क़यामत हो कि होगा फैसल -ए -तक़दीर है 
न्याय की दहलीज बैठा रो रहा कशमीर है 


घाव ये कैसे भरेंगे दर्द कैसे हो ये कम 
झुक गयी अन्याय के ही पक्ष में कुंठित कलम 
हो गयी  क़ातिल के हित में  बिक चुकी तहरीर है 
न्याय की दहलीज बैॆठा रो रहा कशमीर है 

कश्मीर की पीर 

कागज से ,भरभरा लिपट कर ,
कलम रो पड़ी  हम 
भी 
 रोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे ,
अक्षर अक्षर  लहू डुबोये ,

चीखों से बिलबिला रहा था,
आसमान धरती हिलती थी 
जिधर नजर जाती थी केवल 
कोरी मानवता जलती थी ।
कोई बचाता नहीं किसी को
 पिघले   पर्वत  पीर सँजोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे ......

हिमगिरि तक जल गया रात भर,
चिता जली थी  मानवता की 
जहर दे दिया बेटी को फिर  ,
लोरी गायी थी  ममता की 
सूखे नहीं तभी से आंसू , 
 पोर   पोर में  व्यथा भिगोये    
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे .......


केसर की क्यारी झीलों की 
नगरी सरस्वती का दर  घर 
लहू लहू हो गयी चिनाब भी 
डगर डगर वहशत थी झर झर 
बिलख पड़े सब महल झोपड़े 
सूने  गांव   गये   दुख    बोये 
इतना दर्द लिखू तो कैसे ......

समाचार पत्रों कहानियों 
चित्रों  में खबरें ना चिट्ठी 
हर चौराहे कातिल बैठे 
गली गली थी भीड़ इकट्ठी 
छोड़ो घर कश्मीर चीखती 
वादी में परिवार न सोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे ..........

गज भर कफन न थाली भर
चावल था किसके दर जाते ?
महल हवेली वाले रह गये 
बस दर दर ठोकर  खाते 
कुलदीपों  के छिन्न भिन्न
क्षत -विक्षत अंग गये खोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे .....

किस सहिष्णुता की दुहाई 
देते हो बोलो समझाओ ?
पागल स्मृतिहीन हुये जो 
उनके परिजन लौटाओ 
इस गुनाह में सने हुये वे 
हाथ कहाँ अब तक धोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे ......


क्या बोलो अपराध मार डाले 
गये लोगों का निकला 
पराकाष्ठा बर्बरता की थी 
या मजहब का बदला 
?​
जो हो गये निर्वंश उजड़ गये 
बेघर आँसू गये पोये 
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे 
अक्षर अक्षर लहू डुबोये 



​​
क्यों इतनी बर्बरता क्यों ये 
रक्तपात आतंक हुआ 
​​
प्रश्न करें वीरान खंडहर 
​​
उत्तर में बस मूक दुआ !!
बहुत हो चुकी पक्षपात की बात 
न्याय का पथ जोए ,
इतना दर्द लिखूँ तो कैसे .....

लगी लहू की हाय ​

​​
वेदना के वे चरम अध्याय पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर अन्याय पढ़कर रो पड़े 

कल वहां जो पर्वतों के साथ हँसते थे नगर 
कल वहाँ जो झील के मन्दिर किनारे थी डगर 
कल वहां जो खिलखिलातीं लड़कियां थी नाव पर 
उनके रक्तिम अंत का अभिप्राय पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर अन्याय पढ़कर रो पड़े 

क्यों पड़ौसी बंधु भाई मित्र हो गये काल यूँ 
धर्म ने मजहब से बदला क्यूँ लिया विकराल यूँ 
भूल ही गये पूर्वजों के गोत्र नाते जाल यूँ 
गूँजते नारे "नगर से जाय" पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर अन्याय पढ़कर रो पड़े ,


स्त्रियाँ बालक धरा संबंध जन्मों के गये 
तोड़ कर नाते जड़ों से सूखते पौधे नये 
वे गुलाबी खूबसूरत लोग जो घर से गये 
खंडहर हो गये 
​​
लगी वो हाय पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर अन्याय पढ़कर रो पड़े 

यातनाओं के चरम पर चीखते स्वर थम चुके 
रक्त के नाले नहर नदियाँ भले ही जम चुके 
खंडहर श्मशान वीरानों के सुर मद्धम चुके 
कूकती वादी हुयी मृतप्राय पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर  अन्याय पढ़कर रो पड़े 

पाप प्रायश्चित्त के ही आँसुओं से घुल सके 
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कौन रोयेगा वो आँसू रक्त जिनसे धुल सके 
टूट गये विश्वास डोरी गाँठ कैसे खुल सके 
मूक हैं क्यूँ लोग यूँ मुख बाय पढ़कर रो पड़े 
मित्र तेरी पीर फिर अन्याय पढ़कर रो पड़े 

©®सुधा राजे 

​भूमि पुत्र हम कृषक दीन क्यों ?(लेख)-सुधा राजे

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भूमि पुत्र हम कृषक दीन क्यों ?
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सुधा राजे 
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भारत का अधिकांश ग्रामीण नागरिक कसबाई और वनवासी समाज कृषि या कृषि आधारित व्यवसायों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर है ।भूमि का भारत का कुल क्षेत्रफल 329मिलियन हेक्टेयर है कुल कृषि योग्य क्षेत्र 195मिलियन हैक्टेयर है और उसमें भी कृषि बोयी जाती  भूमि मात्र 141मिलियन हैक्टेयर है जिसमें कुल सिंचित भूमि 65.3मिलियन हैक्टेयर है  ।
पअब चाहे वे अनाज फल सब्जी के सीधे सीधे विक्रेता हों ,आढ़त वाले ,भारवाहक, माल संरक्षण शीतगृह संचालक, ड्राईवर ,वाहन मालिक ,डिब्बाबंद रस शरबत जैम जैली मुरब्बा अचार पापड़ चिप्स दलिया फ्लैक्स बिस्किट्स आटा सूजी मैदा बेसन आरारोट, तेल ,घी, दूध, दही ,पनीर, मावा, छैना, मट्ठा, लस्सी, छाँछ,मिल्क पाऊडर, सब्जियों के आयात निर्यात से जुड़े लोग हों या मसाले दालें ,चीनी खांड, गुड़ चावल गेंहूं मक्का ज्वार बाजरा रागी जौ आदि के उत्पादक विक्रेता निर्यातक प्रसंस्करणमिल फैक्ट्री संचालक हों या कृषि भूमि पर श्रमिक ।सबके हित अहित धरती पर हुयी उपज से ही प्रारंभ होते हैं ।किंतु आज भी कृषक होना सम्मान की बात नहीं समझी जाती ।जब बात आती है परिवार का परिचय बताने की तो बहुत गर्व से कहा जाता है डाॅक्टर इंजीनियर आई ए एस विधायक सांसद वकील पत्रकार मैनेजर इंस्पेक्टर मेजर कर्नल पायलट किंतु कृषक पिता भाई माता या नाते रिश्तेदार का परिचय बहुत झिझक हीनभावना दबे स्वर के साथ बताना पड़ता है अन्यथा एक तरह से इस उल्लेख से तब तक बचा जाता है जब तक कि विवशता न हो ।उच्च शिक्षित लोग तक भू स्वामी होना तो स्वीकारते हैं किंतु स्वयं कृषक होना स्वीकारने में हिचकते हैं ।इसका कारण है कृषक की छवि ,जो सदियों से आधी धोती आधा कुरता आधी पगड़ी मैली कुचैली ,धूप में जलता बदन काला रंग बूढ़ा शरीर हल बैल गोबर मिट्टी कीचड़ पसीना और निरक्षरता की बनायी जाती रही है ।भारत की तुलना में यूरोप अमेरिका का कृषक सम्मानित व्यक्ति है ।कारण है वह अत्याधुनिक यंत्रों के सहारे उन्नत से उन्नत तकनीक अपनाकर संपूर्ण कृषि करता है ।अत्याधुनिक सुविधाजनक वस्त्र पहनता है और अत्याधुनिक तकनीक के सहारे कृषि सहायक अन्य कार्य जैसे पशु पालन मत्स्य पालन कुक्कुट पालन मधुमख्खीपालन रेशम उत्पादन खाद्यान्न प्रसंस्करण एवं फल फूल सब्जी आदि सहफसलों का उत्पादन मदिरा जैम जैली शरबत अचार स्नैक्सेज और अन्य परिवर्धित संवर्धित वस्तुओं का भी उत्पादन करता है ।भारत में आज भी आधुनिक संपन्न कृषक बहुत हुआ तो ट्रेक्टर थ्रेसर कल्टीवेटर टीलर हैरो पानी की मोटर या इंजन और स्पेलर से ही परिभाषित हो जाता है ।बहुत कम और दुर्लभ दृश्य है कि एक कृषक उच्चशिक्षित होकर भी कृषि को मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाकर वहीं रहकर पशुपालन साग सब्जी फल फूल जड़ीबूटियां  बकरी गायभैंस मधुमख्खी रेशम मत्स्य कुक्कुट पालन और अन्नादि का उत्पादन तथा अंतिम अवस्था तक संपूर्ण प्रसंस्करण से जुड़ा है और निर्यात व्यापार दोनों कर रहा है । ऐसा अब तक इस मानसिकता के ही कारण है कि खेती तो अनपढ़ गवार गंदे असभ्य और पिछड़े लोगों का काम है ।इसी कारण कोई कलेक्टर डाॅक्टर एक्टर का बेटा तो विरासत सँभालने के सपने देखता है परंतु कृषक की संताने पढ. लिखकर कृषि से पीछा ही छुड़ाना चाहतीं हैं ।परिणाम युवा शक्ति और शिक्षित वर्ग का कृषि में योगदान नगण्य होता आ रहा है । शहर से पढ़कर लौटा बेटा तो लकदक सूट टाई पेन्ट कोट में खेत पर जाता कृषक पिता तक को नहीं सुहाता वह जाये भी तो बापही कह देता है रहन दे अब मेरी तो कट गयी जैसे तैसे किंतु तू क्यों कीचड़ माटी में सन रहा है । कृषक कुरूपता कठोरता भदेसपन और असभ्यता का प्रतीक ही जैसे बन गया । विश्व भर की पेट की आग और तन पर का वस्त्र सब कृषि की ही उत्पादक क्षमता पर निर्भर हैं क्योंकि व्यक्ति चाहे चांद पर रहने लगे अंततः खायेगा तो फल सब्जी अन्न मांस दूध मसाले ही किसी न किसी रूप में !!!!न प्लास्टिक लोहा बिजली खा सकता है न मशीने मुद्रा कंक्रीट ही ।तब भी आज तक विश्व भर के नवनिर्माण पर कृषि प्रथम प्राथमिकता पर नहीं है ।क्योंकि आय का सीधे सीधे स्रोत खनिज शराब मिलें यंत्र अस्त्र शस्र और पर्यटन हैं ।
भारत के संपूर्ण कृषि रकबे को देखें तो भारत अन्य देशों की तुलना में बहुत भाग्यशाली राष्ट्र है ।परंतु आजभी बहुत पिछड़ी तकनीकों से वन्यक्षेत्रों के वनवासी ग्रामीण और कृषक खेती करते हैं ।कारण कि हमारे वैज्ञानिकों की पहुँच अब तक उनके घर में नहीं है । हाथ से चावल बिखेरकर ही छत्तीसगढ़ जैसी बेहद उपजाऊ भूमि पर वनवासी धान की खेती करते हैं ।आज की सबसे बड़ी और पहली आवश्यकता है कि प्रत्येक कृषक के पास एक बाईक जैसा ट्रैक्टर हो जिसे कम स्थान पर रखा जा सके पतली पगडंडियों से ले जाया जा सके और जो कीचड़ गहरी गारेदार भूमि में खपे नहीं न ही ऊपड़ खाबड़ पगडंडियों पर उलटे पलटे ,जिसकी कीमत इतनी कम हो कि दस बीघे का मालिक कृषक भी खरीद सके ।और जिसे चलाना सीखना इतना आसान हो कि साठ वर्ष का प्रौढ़ कृषक भी सरलता से सीख सके । क्योंकि भारतीय कृषि का भार औसतन चालीस से सत्तर वर्ष की आयु के ही लोगों पर है । युवा किशोर और अतिवृद्ध लोग प्रायः कृषि से दूर ही रहते हैं ।पढ़ाई लिखाई के बाद बहुत भटकने पर भी जब नौकरी धंधा कामयाब नहीं होता तब भी कृषक का बेटा कृषि की तरफ लौटता है। यह एक थक हार कर अपनाया गया रोजगार है । हालांकि बहुत से पढ़े लिखे लोग जिनको विरासत में बहुत बड़ी भू संपत्ति मिली है वे जब नौकरी मनचाही नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं तब कृषि में बहुत नवाचार और वैज्ञानिक पद्धति से कार्य करने लगे हैं परंतु ऐसे आधुनिक कृषक प्रदेश तो क्या पूरे देश में भी उंगलियों पर गिने चुने हैं । आवश्यकता है कि इनकी पद्धति और सफलता को घर घर तक हर कृषक के सामने लाईव टेलीकास्ट या वीडियो के द्वारा पहुँचाया जाये ।परंतु कृषिविभाग नामक महकमा भी भारतीय सरकारी भ्रष्टाचार की बीमारी से ग्रस्त है और बहुत अधिक कारण इसका यह है कि कृषि पर बजट तो है घोषणायें तो हैं योजनायें तो हैं परंतु जिन कृषकों को इससे लाभ लेना होता हैवही नहीं जानता कि कृषि विभाग नामक महकमा है क्या क्यों है और उससे उसे क्या क्या समझना सीखना देखना और अपने लाभ लेना है ।निरक्षरता तो है ही अब तक इसका बड़ा कारण जिला मुख्यालयों से वास्तविक कृषकों की बहुत दूरी भी है ।उदाहरणार्थ अब तक शत प्रतिशत कृषकों के शत प्रतिशत खेतों की मिट्टी का परीक्षम तक नहीं हो सका ।जिसके कारण उनके खेत की मिट्टी में कम क्या है अधिक क्या है और कौन कौन सी फसलें बोनी चाहिये कौन सी नहीं तथा क्या क्या उर्वरक नहीं डालने है वरना मिट्टी और खराब हो जायेगी तथा कौन कौन से तत्व कम है जिनको पूरा करना अत्यावशयक है वरना खेत बंजर हो सकते हैं यह अब तक शत प्रतिशत कृषक नहीं जानते और अंधाधुन्ध खाद रसायन कीटनाशक यूरिया फास्फोरस पोटाश आदि भरे चले जाते हैं । ऐसा नहीं है कि सरकारी कर्मचारी ऐसा नहीं कर सकते ,परंतु बात यही है कि संकल्प शक्ति नहीं है नैतिक बल नहीं है ऐसा करने के लिये । एक विधायक गांव गांव पुरा पुरा द्वार द्वार जब वोट माँगने जा सकता है तो कृषि विभाग चाहे तो हर पांच साल पर प्रत्येक खेत का प्रत्येक नगर गांव कसबे के कृषक का खेत देखकर वहां की मिट्टी का परीक्षम करवाकर चार्टवार कम्यूटर पर सारी जानकारी आॅनलाईन इंटरनेट पर ही उपलब्ध करवा सकता है जिसे दूरूह से दूरूह दुर्गम क्षेत्र तक का कृषक अपने आधार कार्ड के सहारे जोड़कर घर बैठे पढ़कर या बच्चों से पढ़वाकर सुन समझ और तदनुसार लाभ भी उठा सकता है ।प्रायः कृषक सरकारी नौकर कर्मचारियों अधिकारियों के षडयंत्रों का ही शिकार है ।उदारणार्थ मेरे ही निरक्षर ससुर ने जब मेरे यहां आने से पूर्व कर्ज लिया इंजन बैल चकबंदी आदि के लिये तब कर्ज की रकम लिखी कागज पर कुछ और थी मिली हाथ में कुछ और ,साथ ही यह भी कि उनको यह ज्ञात ही नहीं था कि यह अवैध अनैतिक एवं भ्रष्टता का कार्य है । दस हजार से पचास हजार रुपये तक जब जिस देश के बैंक कर्मचारी अनपढ़ या कम पढ़े लिखे कृषक से लोन मंजूर करवाने दिलाने के नाम पर खरचा बताकर वसूल लेते हों और सुबूत कुछ न रहता हो तब कहना कुछ गलत नहीं होगा कि बैंक और कृषि विभाग की चालाकी का आसान शिकार है कमपढ़ा लिखा या सीधा सादा निरक्षर संसाधन विहीन गरीब कृषक । आज भी बैंक से पहले और बाद में भी किसान स्थानीसाहूकारों के पास बीज खाद मशीनें डीजल लागत आदि की एकमुश्त रकम का इंतजाम करने को कर्जा ले लेता है ।ऐसा बहुत कम होता है कि कृषक के पास अपनी ही क्षमता से अगली फसल बोने जोतने जेल्हने पाटने निराने सींचने गोड़ने और खरपतवार हटाने काटने दाअने उसाने ढोने और बेचने तक की प्रक्रिया तक को सब लागत पहले से ही एकत्र रहे । बहुत बड़े कहे जाने वाले कृषक भी इस दुष्चक्र का शिकार हैं । हमारा परिवार पूर्णतः कृषक है । लगभग पचास बीघे भूमि हमारे पास शेष है जिसमें से पचास बीघे भूमि ऐसे ही दुषचक्रों की भेंट चढ़ गयी । ससुरजी ने कर्ज लिया भूमि सँवारने को और चुकाने को भूमि बेचकर चुकाना पड़ा । पुश्तैनी कृषि के कागज ठीक न रखने की कीमत चुकाई ग्रामसमाज की भूमि कहकर पटवारी ने भूमि वह छीनी जो सदियों से उनके बापदादे जोतते बोते चले आ रहे थे उनको पता तक नहीं था कि यह एक दिन चकबंदी में छीन ली जायेगी । रास्ता निकाल दिया चौड़ा नौ फीट का खेतों पर से और मीलभर तक की उपजाऊ भूमि सड़क बनकर रह गयी । नहर निकाल दी खेत में से और वहां से पीछे खिसक गये खेत जलभराव का शिकार हो गये क्योंकि बहुत पढ़े लिखे साहबों ने कागज पर मिट्टी ढोकर लाने के पैसे डकारे परंतु वास्तव में बगल के ही किसानों के खेतों से मिट्टी उठवाकर सड़क पर बिछायी । समझिये कि बरसों लगते हैं खाद उर्वरक डालकर उपजाऊ बनाने में मिट्टी को वही ऊपरी परत सड़क पर खेंच कर बिछा दी गयी !!!किंतु मद लिखी गयी कि मिट्टी बाहर से लाकर डाली । इसके बाद भूमि चोरी होती गयी कि शातिर लोग हर बरसात के बाद अपनी मेंड़ तनिक और सरकाते रहे । आज पांच बीघे भूमि गायब है जो कि कागज पर है परंतु मौके पर कम है । अब न पूरा ब्लाॅक माप नाम होगा न ही वह चोरी की भूमि प्राप्त होगी ।किस का दमखम है जो सरकारी पटवारी गिरदावल कानूनगो तहसीलदार और क्लर्क के मुँह के दांत गिने !!किसान इस तरह मजबूर कर दिया जाता है पाई पाई को मोहताज ।कहने को हम भू स्वामी है परंतु भोर तीन साढ़े तीन चार बजे से रात देर तक लगातार बारहों महीने श्रम करने के बाद भी एक शिक्षक या क्लर्क के बराबर भी न बचत है न ही रहन सहन का सुख आराम । कारण कि उतने मँहगे कृषि यंत्र खरीदने लायक एकमुश्त पूँजी नहीं । कृषि किसी एक व्यक्ति का कार्य है भी नहीं ।जा फसल बोयी जाये तब भी बहुत सारे मानव श्रम लगते हैं एक साथ काटी जाये तब भी लगते हैं । यह समूह का कार्य है । श्रमिक को तत्काल मजदूरी चाहिये । मशीन को तत्काल डीजल बिजली पेट्रोल चाहिये । खेत को तत्काल बीज खाद उर्वरक कीटनाशक और निराई गुड़ाई सिंचाई चाहिये । एक अकेला व्यक्ति तो चौबीस घंटे भी काम करके दस बीघे तक की कृषि नहीं कर सकता ।इसलिये कृषक को एक मुश्त पूँजी चाहिये ।परंतु उसकी फसल ही उसकी पूँजी है समस्त देनलेन का एर मुश्त परिणाम ।वह चाहे अनाज के रूप में फल सब्जी के रूप में हो या गन्ना कपास दाल तिलहन के रूप में ।जब कटकर ढोकर नगर पहुँचेगी तो भारवाहक और वाहन चालक को तौलवाले को भी तुरंत रुपया चाहिये ।परंतु किसान को तो फसल का दाम कभी एकमुश्त एक साथ मिलता ही नहीं है । हम लोग अक्टूबर से मई तक लगातार मिलों को गन्ना सप्लाई करते जाते हैं और रुपया हर मजदूर हर वाहन हर श्रम का हाथों हाथ चुकाते रहते हैं परंतु हमें रुपया मिलों से दो दो हजार कभी पांच हजार कभी दस हजार करके पूरे साल दो साल कभी तीसरे साल तक में मिल पाता है । अब यदि इस धन को तत्काल जो जो देना पड़ता है बैंक से लेकर न दें तो करें क्या । परंतु बैंक तो ब्याज लगाता है न ??जबकि मिलें हमारा माल लेकर हमें कोई ब्याज नहीं देतीं चाहे रुपया दस महीने बाद दें या दो साल बाद। यानि हम कृषक अपनी सब पूँजी मिल या सरकार को सौंपकर दीनहीन पराधीन परवश कातर रह जाते हैं कि दाम दो तो कर्जा उतारें । उ.प्र. सरकार अबकी बार एक लाख तक का कर्जा माफ किया है परंतु वह भी केवल तीन हैक्टेयर तक के ही कृषक का । परंतु ऐसी कोई नीति नहीं बनी है कि फसल इस हाथ ले दाम तत्काल दे । बैंक के माध्यम से रुपया आने पर हमने व्यवहारिक कठिनाई यह झेली कि उन्हीं दिनों हम सपरिवार खेत पर होते हैं और उन्हीं दिनो कतार में बारह बारह घंटे लगने पर पता चल रहा कि  मुद्रा समाप्त कल आना । किंतु खेत पर खड़ा वाहन मजदूर इंजन तो कल नहीं आयेगा !!तो मरता क्या न करता फिर किसान स्थानीय साहूकारों के पास कर्ज लेने तला ही जाता है चाहे प्रतिभूति में घर रखना पड़े या जेवर या खसरा खतौनी ।
कृषक का धन एक मुश्त दिखता है कि तीन लाख पांच लाख की फसल हुयी । परंतु उसे बारह महीने वही सब से दस आदमी का परिवार भी चलाना है यह किसी के ध्यान में नहीं आता । प्रायः कृषक आर्थिक अवव्यवस्था का शिकार इस एक मुश्त रकम की सोच के कारण भी हो जाते हैं । मजदूर की मजदूरी आज औसत पांच सौ रुपये है । 365×500=182500 रुपये एक व्यक्ति की जो कि भूमि हीन है औसत मजदूरी हो जाती है । यदि किसी के परिवार में दो या तीन मजदूर है तो वह एक बड़े किसान से अधिक धन कमा लेता है ।यही कारण है कि दस पंद्रह साल बाद मजदूर मजदूर नहीं रहता परंतु कृषक वहीं का वहीं रह जाता है पचास वर्ष बाद भी क्योंकि परिवार पूरा का पूरा रात दिन खेती में ही लगा रहता है । मेरी दिनचर्या ठीक चार बजे भोर से प्रारंभ होती है सफाई भोजन पहले बाकी कार्य बाद में । कृषक खेत पर चला जाता है तो रात होने पर ही घर आता है । इसमें कोई छुट्टी नहीं कोई पिकनिक नहीं कोई बोनस नहीं कोई उत्सवी फंड नहीं न ही मनोरंजन के अवकाश हैं । बहुत अधिक बीमार हो जाना विवशता है अन्यथा कृषक परिजनों नातेदारों के घर भी कम ही जा पाते हैं । पच्चीस वरष के वैवाहिक जीवन में हम पांच पांच साल पर ही मायके जा पाते हैं क्योंकि मायका पांच सौ किलोमीटर दूर जो है । इसीलिये कृषक अपने नाते रिश्ते आसपास बीस से पचास किलोमीटर के ही दायरे में करते हैं । क्योंकि उनके पासमय ही नहीं खेत छोड़कर कहीं रात रुकने का । घर पर ताला तो कभी लग ही नहीं सकता क्योंकि गाय बैल भैंस को दाना पानी सानी कुट्टी खल गोबर साफ करना बांधना छोड़ना खूँटा बदलना नहलाना दुहना ,एक दिन तो क्या एक प्रहर के लिये नहीं रोका जा सकता । इसीलिये कृषक सपरिवार पूरा परिवार कहीं रात रुकने नहीं जा सकते बारी बारी से ही आते जाते हैं वह भी प्रायः बरसात के बाद के कुछ दिन जब बुआई हो चुकी हो । तब भी जलभराव के होने पर भर भर बरसती बरसात मेंभी घुटनों कमर तक जल नें भी मेंड़ काटने या बांधने पौध रोपने या गठियाने खेत पर जाना ही पड़ता है । नगर महानगर के फ्लैट कल्चर वाले लोगों को लगता है खेत ही घर होता होगा किसान का क्योंकि उनके दिमाग में फार्महाऊस के यूरोपियन खेत होते हैं ।परंतु कठोर नग्न सत्य यह है कि प्रायः खेत सांपों बिच्छुओं जंगलों वनों दलदलों नदियों तालों पहाड़ों पठारों और दुर्गम भूमियों के बीच होते हैं । अकसर किसान का सामना बाढ़ बरसात भूमि कीट मधुमख्खी सांप बिच्छू ततैया शेर तेंदुआ भेड़िया लोमड़ी गीदड़ सियार लकड़बग्घे और अजगर गोह छिपकली गोजर पटार जोंक आदि से होता ही रहता है । हमने ही पहले ही बरसैकड़ों बिच्छू सांप मारे ततैयां जलायीं और चूहे जोंक से जूझते रहे । उच्च शिक्षिता होने से उपहास नहीं होने दिया कृषक परिवार का परंतु स्वयं को संशय से देखा जाना सदैव चुभता रहा । कृषक परिवार की स्त्री न तो दिन में सो सकती है न दिन चढ़े तक सो सकती है न ही वह कोमल हाथ और नाजुक देह वाली रह सकती है । कठोरता रा ही जीवन अपनाना पड़ता है । संपन्न कृषक महिला मतलब क्विंटलों अनाज भरना फटकना छानना उड़ाना सहेजना और दाल तेल सब्जी साग समाले स्वयं ही कूटना पीसना तैयार करना । परिश्रम सपरिवार प्रत्येक आयु के व्यक्ति को करना पड़ता है । हमारी बच्चियां अबोध आयु से हर बार बुआई कटाई में खेत पर साथ होतीं हैं ,मेधावी होने से क्या होता है फीस तो कृषि से जाती है तो दो मजदूरों की मजदूरी बचती है न वही बहुत आसरा है । जंगल में हैं हमारे खेत जहां जल भर जाता है और बाघ तक आ जाते हैं । एक बार कालागढ़ डैम से अचानक पानी छोड़ दिया गया और सारे किसान पेड़ों पर चढ़कर पूरी रात लटके रह गये । जंगल में क्या पता चलता है भोर चार बजे घर से निकलजाने वालों को कि नगर में क्या सूचना समाचार है !!और कहां सब किसान अखबार पढ़ते हैं या टीवी रेडियो सुनते हैं । कृषक की रोटी सदा ही ठंडी और बहुत देर की रखी ही तो होती है । भोर चार बजे का पकाया भोजन नौ बजे खाता है  खेत पर तीन चार घंटे काम करके फिर दो तीन बजे वही खाना खाना है । बीच में पानी भी कहां सब खेतों पर होता है । शहर के लोग समझते है हर कृषक का अपना कुँआ और अपना इंजन अपना हैंडपंप अपना बोरिंग या अपना ट्रैक्टर हल बैल होता है । कितना भ्रम है !!जबकि एक कुआँ किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये पर पानी लेते हैं । एक ट्रैक्टर किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये पर जुताई बुआई ढुलाई कराते हैं ।एक वाटरइंजिन किसी के पास है तो सैकड़ों किसान किराये  लेकर सिंचाई कराते हैं । कहां पीने को ताजा ठंडा पानी होता है ?हमारे ही जिस खेत पर बोरिंग है वहां से मील भर दूर दूसरा खेत है तो बंद तालेवाली बोरिंग से दूसरे के खेत से पानी नहीं पी सकते इसलिये जब सींच नहीं चल रही तब पानी लेकर ही घर से जाना पड़ता है पहले घिल्ले घड़े छागलें थीं अब बोतलें चल पड़ी परंतु पानी ठंडा कहां !!कहां वहां कूलर पंखा छाया और बिस्तर है ?पेड़ भी दूर दूर ही तो होते हैं खेत में । घनी छाया तो खेत से दूर ही मिलती है सब काम निबटाकर जब रोटी खाने बैठते हैं तब जाकर तनिक तौलिया बिछाकर जमीन पर ही रोटी खाकर पानी  पीकर कमर सीधी करने किसान लेट लगा लेता है । कृषक के घर में रहना आसान नहीं है सारी ही दिनचर्या और वर्ष भर के सब कार्यक्रम कृषि चक्र के हिसाब से ही चलते हैं जब महानगरों के गैर कृषक लोगों की छुट्टियाँ होतीं हैं तब ही तो सबसे बड़ा और अधिक काम कृषकों के घर होता चैत काटने फसल गहाई करने दाअने उसाने और ढोकर मंडी तक बचे हुये को बंडा तक ला ला कर बंद करने रखने का क्योंकि तनिक सी देर हुयी और आग या बरसात सब खत्म कर डालेगी । आपदायें कौन सी कम हैं ओले बाढ़ कीड़े खरपतवार नीलगाय जंगली हाथी शूकर और हिरण प्रायः हमारे खेतों की ताक में रहते हैं । विगत एक दशक से हम लोगों ने दालें और ईधन चारे वाला ढेंचा बोना बंद कर दिया विवश होतर ,क्योंकि नीलगाय माहे सुअर और हिरण बहुत आने लगे हैं । नगर के लोग सोचते हैं कि बस खेत तो एक हरा भरा मैदान है और किसान करता ही क्या है सब तो मशीनों से होता है ।यह सोच केवल किताबी ज्ञान पर ही सिनेमाई दर्शन पर ही टिकी है । हमारे ही गांव में अब तक आज तक बिजली गिने चुने घंटों के ही लिये आती है ।मसाला सिलबट्टे पर पिसता है कपड़े हाथों से धुलते हैं पानी हैंडपंप चलाकर भरना पड़ता है और दालें चकिया से ही दलीं जातीं है अलबत्ता आटा अवश्य डीजल चक्की से पिसने लगा है और बैलगाड़ी की बजाय अब गांव से कसबे तक आॅटो और विक्रम बसे तथा ई रिक्शा चल पड़े हैं क्योंकि गांव से करीब से  हाईवे निकल रहा है । हमारे बच्चे मिट्टी के तेल की ही रोशनी में पढ़ते बढ़े हुये हैं ।रात को घर में घुप्प अंधकार गांव में भी अंधकार ही रहता है ।खेत जाने के लिये बस कुछ दूर ही सड़क है बाद में मीलों दूर तक कच्चे ऊबड़ खाबड़ जलभराव वाले रास्ते ही हैं जो बरसात में तैरकर तक जाने पड़ जाते हैं ।लड़के तो बस ट्रक की  ट्यूब से ही जा पाते हैं नदी पार के खेतों तक ।38से  48 °तापमान में जब लोग कूलर पंखे एयरकंडीशनर के सामने बैठे कोल्ड डिरिंक पी रहे होते हैं किसान को उस अप्रैल मई जून में अपनी फसल बचाने के लिये लगातार पानी बर्हाने जाना पड़ता है ।एक खेत से दूसरे खेत तक कभी नालियां बनाकर कभी पाईपलाईन बिछाकर पानी पहुँचाना पड़ता है और इंजन को उठाकर गाड़ी में चढ़ाकर फिर एक खेत से दूसरे खेत तक पहुँचाना पड़ता है ।इसी पर जंगल चोर सक्रिय हो चुके हैं जो तनिक से लोहे के लालच में कृषि यंत्र चुराकर बेच देते हैं । एक कृषक को सैकड़ों औजारों की आवश्यकता पड़ती है ।दरांती ,हँसिया ,खुरपी, फावड़ा ,गेंती ,कुदाली गँडासा ,रेती ,छैनी, कुल्हाड़ी ,बखिया ,टीलर, हल ,बखर, पटेला,कल्टीवेटर ,ट्राॅली ,इंजन ,या मोटरपंप, हथौड़ी,  आरी,  स्प्रिंकलर,कुप्पी ,बांट, तराजू, जुआ, पिआ, मउनी, सूप ,छलनी, दौरिया, सिकौली, अरई रस्सी ,टोकरा ,सलीता ,झल्ली ,बोरा ,बोरी , कुट्टी मशीन ,और वजन लाने ले जाने के लिये बैलगाड़ी या ट्रैक्टर ।कृषक का कार्य लुहार ,बढ़ई ,आढ़ती, मैकेनिक ,मोची, मिस्त्री, से लेकर बाजार के सब कृषि संबंधिक कार्य व्यापार और औजार या उत्पादन लेने देने वाले से पड़ता ही है ।किंतु इनमें से बहुत कम लोग सीधे कृषक के खेत पर जाते हैं ।भयंकर उमस के बीच जब सब गरमी घुटन की शिकायत करके घरों में दुबक जाते है टीवी इंटरनेट और रेडियो मोबाईल पर तब कृषक ताप घाम पसीने त्वचा के टैन और काले होने की परवाह किये बिना ही लगा रहता है कटाई गहाई ढुलाई में लगातार महीनों बिना नागा हर दिन ।हम लोगों को पहले सब अंग्रेजी जोड़ी कहकर चिढ़ाते रहे आज पच्चीस वर्ष कृषि पर रहकर दोनों ही सांवले और कठोर ग्रामीण वनवासी ही लगते हैं । चाहे कितने भी बहाने बनायें लोग किंतु सत्य यही है कि कृषि चीखती तो रही सरकार परंतु भारतीय प्रशासन शासन के मुख्य बिंदु पर कृषक सचमुच कभी नहीं रहा । वोट और राजनीतिक गुटबंदी के समीकरण तो जातिवाद सांप्रदायिकता और क्रिकेट क्राईम सिनेमा से ही प्रारंभ होते रहे हैं ।मीडिया में कृषक केवल तब आता है जब टिकैत की तरह का कोई नेता हंगामा खड़ा करता है या फिर किसान आत्महत्या कर लेता है । क्योंकि वास्तव में ही कृषि और कृषक की दशा और दिशा सुधारने का संकल्प सरकार और समाज में होता तो सबसे पहले बिना जाति मजहब के भेदभाव के पूर्ण कृषक के बच्चों को कृषि विज्ञान की तो शिक्षा कम से कम निशुल्क कर ही दी होती ताकि एक विरासत सँभालने वाली पीढ़ी स्वेच्छा से तैयार होती रहती । दूसरे जो सबसे बड़ी समस्या है वह है मानव बल ,यदि कृषक को अनेक मजदूर नहीं मिसते तो फसल बोने और काटने या सींचने में दो दिन की देरी तक का मतलब बरबादी हो जाता है ।आज तक हजारों मशीनें बन गयी परंतु एक आॅटोरिक्शा के आकार का ट्रैक्टर नहीं बन सका जो पहाड़ पर चढ़ सके चार पाँच फीट पानी में से निकल सके और जिसमें एक विक्रम बराबर तो सामान ढोया ही जा सके ।जिससे छोटी पूँजी वाले किसान अपने खेत स्वयं जोत जेल्ह बो, पाटा लगा  सकें । पाँच लाख का ट्रैक्टर वह कृषक कैसे खरीदेगा जिसकी कुल समस्त उपज का मूल्य एक वर्ष में तीन लाख हो जिससे कि बारह महीने परिवार पालना और अगली फसल की लागत भरनी है ।सस्ते और छोटे ट्रेक्टर थ्रेसर कटाईमशीने गहाई वाली ट्रालियां आज बहुत बड़ी आवश्यकता हैं ।भारतीय वैज्ञानिकों के समक्ष सैन्य आवश्यकता के यंत्रों से भी विकट चुनौती कृषि कार्यों के लिये सस्ते सरल संचालन वाले और छोटे किंतु शक्तिशाली यंत्रों का निर्माण है ।मुझे तो हर बार लगता है कि अब तक तो हल- बखर -पटेला तक का ही सही विकल्प नहीं ।क्योंकि विशालकाय भारी भरकम ट्रेक्टर केवल समतल पथ के ही खेतों पर जा पाता है ,जबकि भारत के प्रायः खेत पगडंडियों ढूहों ढाँणियों जंगलों पहाड़ों पठारों ऊबड़ खाबड़ जगहों के बीच दलदल नाला नदी नहर गड्ढों के पार बसी भूमि पर हैं जहां वह कंधे पर हल या बखर और बगल में बैल डुरियाये हुये ही ठीक से जा पाता है ।ऊपर से डीजल पेट्रोल महँगा है और उसके लिये नगर कसबे तक जाना पड़ता है । यहाँ जिम काॅर्बेट और चीला अभयारणय ,राजाजी अभयारणय  के आसपास के सारे ही खेत ऐसी ही जगहों पर है बस सड़क किनारे वाले छोड़कर ।सो सड़क किनारे के खेतों को तेजी से नगरीकरण होटल ढाबे रिसोर्ट और यूनिवर्सिटी बनाने वाले धनपति औने पौने दामों में विवश करके किसान से खरीद लेते हैं और कृषि भूमि का रकबा कम से कम होता जाता है ।
क्या भ्रष्टाचार की अघोषित किन्तु सर्वज्ञात बीमारी से ग्रस्त प्रशासन ऐसा कोई सचमुच ही कारगर कदम उठा सकेगा जिससे कृषि योग्य भूमि पर होटल ढाबा
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रिसोर्ट बहुमंजिली इमारतें काॅलेज यूनिवर्सिटी मसजिद मन्दिर मजार कब्रिस्तान श्मशान स्विमिंगपूल वाटरपार्क बाजार माॅल गैराज मिल फैक्ट्री आदि लगाना भयंकर अपराध घोषित हो और न कोई कृषक गैर कृषक कार्य हेतु भूमि बेच सके न ही कृषि रह चुकी भूमि कोई गैर कृषि कार्यों हेतु खरीद सके ?।
कृषि की भूमि को बंजर और बेकार बिना कागजी हेर फेर के और बड़ी सरलता से दिखाकर जिस तरह से आज पूरी सड़कों बस्तियों कालोनियों और हाईवे किनारों आदि के खेत कंक्रीट सीमेन्ट रोड़ी पत्थर ईंट से बरबाद कर दिये जा रहे हैं वे फिर कभी खेत नहीं बन सकेंगे यह सत्य है । क्या हमारी सरकार पूरी तरह सचमुच इस समस्या पर गंभीर है ?क्योंकि आज पचहत्तर वर्ष होते होते तो कहीं ऐसी सख्ती नहीं देखी गयी कि कृषि भूमि पर कुछ कंक्रीट बनने लगा हो और रोक दिया गया ?
फिर तो वह दिन दूर नहीं जब रेलमार्ग सड़कमार्ग बस्तियों और गांवों नगरों के आसपास तो कहीं खेत बाग बगीचे आदि हो ही नहीं सकेंगे । तब सोचकर हिसाब लगायें कि जिस तेजी से सड़कीकरण रेलवेकरण और नगरी करण चालू है उसके अनुपात में कितनी कृषिभूमि लीलता निगलता जा रहा है "विकास "? इस तरह के अनियोजित मूर्खतापूर्ण विकास का मूल्य कितनी कृषि भूमि को खोकर चुकाना पड़ेगा देश को और विश्व को भी ।क्योंकि यदि एक हिस्से में भी पृथ्वी के जल वन पौधे कषि है तो बहुत सारे हिस्सों तक निर्यात किया जा सकता है ।कहीं भी किसी भी देश की कृषि भूमि का विनाश पूरी पृथ्वी के लोगों के आहार और पोषण औषधि और मूलभूत जीवन आवश्यकताओं पर कटौती विनाश ही तो है । कृषक की गरीबी का उपहास आत्महत्याओं पर राजनीति और कृषि विकास के नाम पर राजनेता और प्रशासनिक कर्मचारियों का भ्रष्टाचार घोटाला यह सब तो बहुत चर्चा का विषय बनता रहा है किन्तु ऐसे उपायों पर बहुत कम प्रगति चिंतन और क्रियान्वयन होता है जिनसे कृषक को गंदा न रहने पड़े वह गरीब न रहे वह समाज की मुख्यधारा से कटा न रहे कृषि और कृषक सम्मानित हों तथा नवीन तकनीक प्राचीन ज्ञान अनुभव के सामंजस्य से सरल कार्य होता जाये कृषि । लागत कम से कम हो इसके लिये श्रमिकों की मानव श्रमों की कमी पहली आवश्यकता है जुताई, जेल्ह ,बखराई ,बुआई ,पटेला ,बर्हाई, नलाई, निराई,खरपतवार हटाई, कटनदावनी ,उसावनी ,उड़ावनी, ढुलाई, तुलाई, आढ़त, मिल, मंडी ,पुकार प्रचार ,निर्यात पैकिंग ,शीतग्रह भंडारण ,और रखरखाव में पूरी एक लंबी मानव श्रंखला लगती है जिसका सारा मूल्य किराया लागत बनकर केवल कृषक के हाथों से धनलाभ छीनता जाता है ।सार सार रूप में जो बचता है वह भी  उसकी शुद्ध आय नहीं कहा जा सकता क्योंकि बढ़ती दर से आगामी फसल के लिये पुनः पूँजी निवेश करना होता है ।डीजल के दाम दो रुपये बढ़ते हैं तो ट्रक- ट्रैक्टर वाले और इंजन आदि की लागत कई हजार रुपयों तक बढ़ा दी जाती है ।
देखा जाये तो कृषक स्वभाव से होते हैं लोग रोजगार की वजह से कम ।यानि खेती करते हैं क्योंकि खेती करने से मन का स्वाभिमान संतुष्ट रहता है । वरना क्या कारण है कि हम लोग आज सदी भर से कृषक हैं न पूर्वज कुछ खास विरासत छोड़ पाये न हम ही इन तीस चालीस वर्षों की खेती में कभी ऐसा समय आया कि कर्ज में नहीं रहे ।एक ऋण उतारते ही दूसरा हर हाल में लेना ही पड़ता है ।क्योंकि कृषि की लागत तो कई लाख रुपया है और जब आती है उपज सब निकालकर तब बचता बस कुछ सार संग्र ही है जो बारह महीने रहने खाने पहनने को भी और पुनः पुनः कई लाख लगाने को भी चाहिये होता है । इस कर्ज के चक्रव्यूह को तोड़ा कैसे जाये जब हम सोचते हैं तब ,ही सामने आता है कि यदि इतनी हिम्मत आश्वासन गारंटी होती कि लिया गया ऋण हम चुका ही लेंगे तो कुछ और अधिक कर्ज लेकर ,एक नवाचार करते मशीने लेते राईस मिल लगाते ,स्वयं का फूड प्रोसेसर पैकिंग और सेलिंग सिस्टम खड़ा करते । सहफसली चीजें बोते । बाऊण्ड्री लगाकर नीलगाय हिरण गीदड़ लोमड़ी शूकर आदि का आना रोकते ।चूहामार दवायें रखते और नयी से नयी बीज खाद तकनीकी मशीनें लगाते ।
परंतु एकमुश्त रकम घर खेत गिरवी रखे बिना देगा कौन ?ऊपर से मानसून पर ही तो सबकुछ निर्भर है ।विगत वर्ष अप्रैल और मई में दो तीन बार बरसात हो गयी हमारा तीस चालीस हजार रुपया बच गया बच्चों की साईकिलों के लिये जुगाड़ हो गया और कर्ज का ब्याज पटा दिया । इस वर्ष जून तक गन्ना बचाने को चार बार सिंचाई देनी पड़ी सब खर्च बंद हो गये और तो और रसोई में भी टीन कनस्तर डिब्बे खाली ही रह गये न कहीं आये गये क्योंकि सब तो खेत पर सींच के नाली बरहाने और इंजन धरने उठाने पाईपलाईन बिछाने समेटने में ही लगे रहे ।अब कल परसों से वर्षा प्रारंभ हुयी तो जान में जान आई ।चार साल पहले सारी धान बाढ़ में डूब गयी थी चारा पुआल तक नहीं हो पाया था । उसके पहले एसाल खड़ी बालियों पर ओले पड़ गये गेंहूँ तो दूर भूसा तक नहीं निकला । एक वर्ष इतना सूखा पड़ा ऊपर से डीजल कतार में लगकर ब्लैक तक में लेना पड़ रहा था कि 1/4खेत परती ही रह गये बिना बोये ही खरपतवार तक नहीं हुये ।भारतीय कृषि मौसम ओले बाढ़ सूखा मानसून और एक एक दिन की वर्षा की देर सवेर पर ही आज तक निर्भर है । यूरोप चीन अरब ब्राजील अमेरिका  में कृषि पर बहुत सारे उपाय लागू करके उसकी आकस्मिक हानि को कम से कम किया जा रहा है वहीं भारतीय किसान की संपूर्ण कृषि एक सट्टा एक जुआ एदाँव किसमत का हर बार हर फसल पर होती है । लग गया तो जिन्दगी नहीं तो बस बरबादी । एक वर्ष बाढ़ ओला तो दूसरे वर्ष सूखा पड़ने पर जो जो कृषक सब कुछ लागत तबाह कर चुके हैं उनसे यह पूछकर तो देखे कि उन दो बरसों में हालात कैसे थे ?न तो मजदूरों का रोका जा सकता है न डीजल खाद बीज बैंक और ढुलाई का रुपया तो किसान कर्ज नहीं लेगा क्या करेगा ?उपज खत्म होते ही बरबाद नहीं होगा तो कहां से जीयेगा परिवार कैसे खाना कपड़ा किताबें फीस चुकायेगा ?अगर अनुमान से कम हुयी उपज तो भी किसान के हाथ खाली ही रह जाते हैं । हमारे बगल की चक्की वाले का परिवार तीन मंजिला कोठी कार और अब नयी फैक्ट्री तक पहुँच गया क्योंकि उसका पूँजी निवेश बस एक बार का था प्रतिवर्ष तो केवल लाभ ही लाभ लेना था और पूँजी तो भी बढ़ती ही रहनी है । दुकान मिल व्यापार रीयल स्टेट और वाहन वालों की पूँजी बढ़ती ही तो रहती है दाम के अनुपात में लागत घटती जाती है लाभ के अनुपात में और एक दिन ऐसा आ जाता है कि लागत निकल आती है बस फिर लाभ ही लाभ होता जाता है ।किंतु कृषक की पूँजी मिट्टी से मंडी तक लगती है हर वर्ष पहले से अधिक निवेश के साथ बाजार भाव से बढ़ते क्रम में और उपज का दाम एक रुपया गिरते ही बाजार में उसका दांव हार जाता है लाभ और लागत की बारी ।बताते हैं ,सचमुच ही  हमने घर की आँगन वाली जगह खोदकर सब्जियां बोयीं बीज आया पचास रुपया पुड़िया ।कीटनाशक लगा तीन सौ रुपये का ।खाद डाली पाँच सौ की । पानी तो सब्जी में हर रोज ही लगता है पूरे दो घंटे सींच का बिल आया एक हजार रुपया महीना से तीन हजार । जब हमने बोयी थी सब्जी रेट था चालीस से साठ रुपये किलो । जब हमने बेचने भेजी तो आढ़त पर दाम गिर गये और हो गयी बीस रुपये की पाँच किलो सब्जी । यह विगत वर्ष की बात है । हमने बाजार तक भेजने की ही एक दिन की लागत नहीं निकाल पायी ,जबकि एक सब्जी तीन महीने से चार महीने के परिश्रम लागत और रखवाली से तैयार होती है । महानगर के साहब लोग दारू कोल्ड ड्रिंक कपड़ा साबुन पेस्ट क्रीम पाऊडर कंघी ब्रुश बाल्टी मग फर्नीचर रीचार्ज मोबाईल इंटरनेट बस कार रेल भाड़ा सिनेमा लग्जरी सोना चांदी स्टील तांबा पीतल का दाम हर साल सैकड़ा हजार के अनुपात से बढ़ने पर भी कुछ शोरगुल नहीं करते ना ही मुद्रा विनिमय दर पर कुछ शोर मचाते हैं परंतु टमाटर प्याज दूध आलू मिर्ची धनिया दाल गेहूँ गुड़ चावल का एक रुपया दाम भी बढ़ जाता है तो सड़कों पर उतर कर हंगामा मचा डालते हैं !!
क्या जितनी तनख्वाह उनकी बढ़ती है स्कूलों कालेजों की फीस बढ़ती डीजल पेट्रोल नमक साबुन यात्रा ढुलाई बिजली बिल और कपड़ा कागज का दाम बढ़ता है वह हम सब किसानों को नहीं भरना पड़ता ?वकील साहब की फीस पाँच सौ पाँच हजार और ट्यूशन की फीस पचास रुपये से दो हजार हो गयी परंतु सब्जी अन्न दाल अनाज दूध आज भी बीस रुपये से नीचे नीचे ही चाहिये ?कैसे होगा ?बाजार तक भेजने की भी तो एक लागत और मानव श्रम होता है ?वह वाहन भी हर साल महँगा हजारों के हिसाब से होता जाता है कैसे करें खेती और पशुपालन ?डीजल बिजली मजदूरी बीज खाद चारे खल दवाई तक की लागत ही न निकले तो कौन करेगा ?फिर काहे को रोते हो दुखड़ा कि नकली दूध मावा दही मिल्क पाऊडर घी मख्खन और मिलावटी दाल तेल मसाले आ रहे हैं बाजार में ?व्यापारी बाजार में बैठा है वह रोज दाम का रेट जानता है ,किसान तो गांव से भी और इंटीरियर भीतरी जंगलों में जाकर खेती करके फसल और चारा लाता है उसके पास कहां तो समय है और कहाँ संसाधन कि समझे बाजार की तिकड़में चालाकियाँ और भाव दर सौदेबाजी लाभ के आँकड़े ?इसीलिये किसान सदी भर की हाड़तोड़ लगातार बारहों महीने बिना नागा बिना पारिश्रमिक लिये किये गये श्रम और कर्ज ले ले कर लगायी गयी हर साल की पूँजी के दाँव ईमानदार सप्लाई के बाद भी गरीब गंदा उपेक्षित बदहाल रह जाता है और बिचौलिये व्यापारी हर साल पहले से भी और धनवान सरकारी कर्मचारी पहले से भी और संपन्न होते चले जाते हैं ।श्रमिक तक दस साल बाद मालिक बन जाता है वाहन दुकान सामानों का परंतु कृषक फिर मौसम कीड़ो मानसून बाजार भाव लागत और सरकारी दाब धौंस दलालों की साजिशों के बीच किसमत की बाजी पर बरबादी या पुनर्जीवन का जुआ लगाकर आशा करता रह जाता है मैला पसीने से तरबतर गंदा बदसूरत और उपेक्षित।
©®सु

Wednesday, 5 July 2017

सुधियों के बिखरे पन्ने - एक धी सुधा ,संस्मरण।

संस्मरण ..
.........

सेंवढ़ा
सनकुआ मार्ग के मोड़ पर फाॅरेस्ट बंगले के पास ही ऐन सड़क पर एक पंडित जी
खूब ऊँचे चबूतरे पर तुलसी चौरे के सामने बैठे देवी जाप और भजन करते रहते
थे । हम बच्चे जब सनकुआ प्रपात या गुफा वाले शंकर जी या राजराजेश्वी पूजा
के लिये टोली में निकलते या वहीं तब किंडर गार्टन था वहाँ जाते तो
पंडितजी जोर से मंत्र बुलवाते राह छेंककर ,हम कुछ तेज थे सीखने में सो
जैसा बोलते कह देते ,बाद में याद रह जाता ""नमस्तस्मै""सो उन पंडित का
कोड नेम हम बच्चों में हो गया नमस्तस्मै पंडितजी । वहीं पास में बी एस एफ
रेजीडेन्स थी और कंपनी कमान्डेन्ट भीम सिंह थापा जी हम लोगों को रोक कर
मारवाड़ी गीत सुनाते "
,,,,पैदल चलना मन्ने ना सुहाता ल्याओ मोट्टर कार अजी पम् पम् पम्
"छूट गयी नौकरी मिले न पगार कां से ल्याऊँ मोट्टर कार ""अजी पम् पम् पम् ......

और उनका नाम रख लिया '""पम् पम् काका ""

हमें तब पीछा छुड़ाकर सिन्ध में नहाने और वहां प्रपात की अर्राती धारा को
देखने की शीघ्रता रहती सो ""दो पंक्तियाँ जल्दी गा देते फ्राॅक घुमाकर
नाचते हुये हमें सिखाने के चक्कर में भीमसिंह काका ,अपनी खाकी हाफ पैन्ट
तो कभी खाकी फुल पैन्ट पकड़ कर लड़की वाली मुद्रा बनाते ,हम सब हँस देते
और काका हम सबको कुछ चिज्जी देकर जाने देते ।

उधर नमस्तस्मै पंडित जी का यही हाल था कि कन्याओं के चरण छूकर प्रसाद
देते परंंतु पहले "
"जय श्रीकृष्ण राधे श्याम ""कहना पड़ता कई बार तब प्रसाद मिलता ।मिश्री
तुलसीदल पेड़ा हमारी प्रिय मिठाई रही । हम कह तो देते परंतु हथेली नन्हीं
सी ऊपर कर देते और नीचे का प्रसाद छिपाकर दुबारा प्रसाद ठग लेते ।
फिर दूर जाकर मुँह चिढ़ाते हुये कूदकर भागते हुये चिल्लाते """सीताराम
सीताराम राम राम राम """
पंडित जी दंड कमंडल धोती सँभालते कुछ दूर पीछा करते _ठैर जाओ ठैर जाओ
धौंचाली कऊँ के हमिन सिर्री समज लओ अबई बतईत कैसी राम राम ""

हम सब बहुत प्रसन्न होते । हमारे साथ हमारी सहेलियां भी रहतीं लीडर तो हम
ही रहते बालटोली के ।जब किंडर गार्टन या सनकुआ से वापस आते तो फिर पम्
पम् काका
राह छेंक लेते , हम कभी मूड होता तो पहले ही सुना देते "
"दादा मारवाड़ में दीनी रे दीनी रे औछौ पहिरौ घाघरो मैं लाजन मर गयी रे ""

,,,बाजरा जी का जंजाल मोरा बाजरा ,,

पम् पम् काका नेपाल के थे और वहाँ मेरी ही आयु की उनकी बेटी थी जो खूब
नाचती गाती कूदती रही होगी जैसा वे कहते थे । उनकी आँखें भर भर जातीं कभी
कभी और कभी कभी खूब लड़की की तरह बंदूक रिवाॅल्वर सबकुछ बांधे भी नाचने
लगते हैट मुँह पर रखकर ।

टैक्स था कविता सुनाना और पुरस्कार थे मैस के फल
,
उधर तनिक ही पग बढ़ते नमस्तस्मै पंडितजी पंथ छेंक कर आ जाते दंड खटकाते
अब कओ कितखौं निकर हौ वानर यूथं ??हम सब हँकर हाथ जोड़कर दूर से ही नारा
लगाते ""जयश्रीकृष्ण राधे श्याम ""
हाँ अब कई नौनी ,
बौ कभऊँ जिनकईयो जौन पैलऊँ कै रये ते ,
हम सब हाँ में सीधे बनकर मुंडी हिलाते ।
आगे दौड़कर निकलते और फिर नारे लगाते

""सीताराम सीताराम जय श्रीराम राम राम राम ""
पंडित जी फिर पीछे आने का उपक्रम करते दौड़ते फिर ठिठक सुनाते
~""कढ़ियो काल दुआरे सैं हम बतैहें कैसौ सीताराम "

आज यादों में यूँ ही आता है कि न तो पंडितजी कभी ठगे गये न बुद्धू बने
बल्कि हम सब को दो बार चार बार हथेली छिपाते देखकर भी अनजान बनते थे और न
ही वे हमारी सीताराम या नमस्तस्यै को नमस्तस्मै कहने से ही चिढ़ते थे वह
प्रसाद रिश्वत नहीं बालकों को प्रोत्साहन था ।
न ही पम् पम् काका हमें गाने नाचने के बदले फल देते रहे बस उनकी नेपाल
में रहती बेटी की यादें उनको हमारी सूरत में कुछ पल का पितृत्व सुख देतीं
रहीं ।
नमन आप दोनों को ।पता नहीं कौन कहां है ।
बरसों बाद रिटायरमेन्ट के कहीं दूर से पम् पम् काका आये तो रहे एक बार
परंतु तब हम हाईकोर्ट के वकील बन चुके थे । बस दो चार बातें की चकित से
देश लौट गये । हम कह ही नहीं पाये कि पम् पम् काका आप हमारे बचपन की सबसे
सुन्दर स्मृतियों में से एक हो । शब्द कहां साथ देते हैं हर जगह ।तब हम
धाय माँ कौँसाबाई की देखरेख में रहते थे क्योंकि माँ साथ नहीं रहतीं थीं
वे बहुत व्यस्त सामाजिक जीवन में दूर नगर में रहतीं थी ।
आज ,
यह क्यों नहीं समझते लोग कि बच्चों में यह प्रवृत्ति होती है कि आप
चिढ़ोगे तो वे और और चिढ़ायेंगे । बस हिंसक हो उठते हैं ।©®सुधा राजे