Friday, 31 May 2013

तंद्र पवन।

Sudha Raje
Sudha Raje
मंद्र मदिर तंद्र पवन गुनगुना रही ।
मत्त मधुर तप्त गगन को सुना रही।
भुवन मोहिनी सुरो पे धुन
बना रही ।
निशा किसे बुला रही ।
निशा किसे बुला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।।
ये किसकी याद आ रही ।
पल्लवित सुमन सुवास से भरे भरे ।
उल्लसित ये द्रुम हुलास से हरे हरे ।
चंचरीक पुष्पराग तन झरे झरे
पुंडलीक मन नयन सपन डरे डरे ।
जिन्हें विभा रुला रही ।
जिन्हें विभा रूला रही ।
ये किसकी याद आ रही
ये किसकी याद आ रही ।
©®¶©®सुधा राजे ।
निष्पलक मृगांक देखता विभोर हो।
ज्यों पुलक विहंग वंशिका किशोर हो ।
परिश्रांत परिश्लेष पोर पोर हो ।
ध्रुव नक्षत्र ज्यों पलक की कोर कोर
हो ।
हृदय लता झुला रही।
हृदय लता झुला रही
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
©®¶©®
सुधा राजे
मद्गलीन ज्योत्सना में शीत लीनता ।
दूर पंथ पार सरित् वन्हि क्षीणता।
बिंब सर हिमांशु तङित् की प्रवीणता।
तरू मधूक छाँव नृत्य मन नवीनता ।
मदन सुधा पिला रही ।
मदन सुधा पिला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।
किसे निशा बुला रही
Sudha Raje
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Yesterday at 4:31pm

Thursday, 30 May 2013

सुधा राजे के गीत, गज़ल और मुक्तक।

गीत

1→प्रेम झंझावात् सा आया उङा कर ले
गया ।
इस जगत् की वाटिका में जो भी कुछ
निस्सार था ।
थे अपरिचित से कई नाते कई संबंध भी ।
तोङ डाले सूखते द्रुम व्यर्थ जो
विस्तार था ।
थी त्रिपथगा नेह की मन आत्मा तन
जीव जग ।
उत्तप्लवन में बह गया सब मैल
जो अधिभार था ।
आँसुओं ने धो दिये सारे कलुष हर
कामना ।
प्रेम डूबी सुक्ति मुक्ता शुद्ध
शुचि संसार था ।
खोये बिन पाता नहीं कोई यहाँ कुछ
भी सुधा ।
पा लिया सर्वस्व खोकर जो वही भव
सार था ।
©सुधा राजॆ

2→ मंद्र मदिर तंद्र पवन गुनगुना रही ।
मत्त मधुर तप्त गगन को सुना रही।
भुवन मोहिनी सुरो में धुन
सुना रही ।
निशा किसे बुला रही ।
निशा किसे बुला रही ।
ये किसकी याद आ रही ।।
पल्लवित सुमन सुवास से भरे भरे ।
उल्लसित ये द्रुम हुलास से हरे हरे ।
चंचरीक पुष्पराग तन झरे झरे
पुंडलीक मन नयन सपन भरे ।
जिन्हें विभा रुला रही
निष्पलक मृगांक देखता विभोर हो।
ज्यों पुलक विहंग वंशिका किशोर हो ।
परिश्रांत परिश्लेष पोर पोर हो ।
ध्रुव नक्षत्र ज्यों पलक पलक की कोर
कोर हो ।
हृदय लता झुला रही
किसे निशा बुला रही
©®¶©®
सुधा राजे


गज़ल

1→ पाँव खुद काट के दिये उसने
जैसे बैसाखियों के कहने पै ।।
चुन लिया दर्द का घना जंगल ।
जैसे आबादियों के कहने पै ।।
जो गिरा दें तो उठ नहीं पाते
साथ वो उनको ले चली आयी ।।
हर तरफ अज़नबी निग़ाहें थी ।
सख़्त बरबादियों के कहने पै ।
जल उठे जब जहेज़ के दोज़ख ।
सुर्ख जोङे बरीं के रोते थे ।
तख्ते शब आँसुओं की शहनाई
झूठ की शादियों के कहने पै
इक सहेली की याद यूँ आई
तू जो ज़िंदा है खुद उठा ख़ुद को ।
ग़ैर के दोश पर ज़नाजे सी ।।
क्यों सुधा हादियों के कहने पर ।
©सुधा राजे
Sudha Raje
'dtabjnr"

2.→ उसके चेहरे से कई दर्द अयां होते हैं।
कुछ भी कहता है कई राज़ बयां होते हैं

सख़्त लब हैं कि कोई नाम दफ़्न सीने में ।
चश्मे नम नीची नजर अश्क़ नुमां होते है

वो किसी को भी देखता ही नहीं अब
मुङके ।
ज़िस्म ढलते है मग़र इश्क़ जवां होते हैं

आसमां लेके मुठ्ठियों में फलक़ से आया ।
वर्ना धरती पै ऐसे शख़्स कहाँ होते हैं।

हम सितारों को भी दामन में भरे रोते हैं

थीं दुआ उसके लिये सर्फ़े रवां होते हैं ।
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सुधा राजे।


मुक्तक

1→ चाँदी की उस नदी में ,
वो बिंब चंद्रमा का ।
थे व्योम उर्वि सँग सँग
वो दिन था पूर्णिमा का ।
दो सिन्धुनील नैनों ने
मेरी ओर ताका ।।।।
थे बाहुपाश में ज्यों ।
नक्षत्र नभ के सारे ।
मंदाकिनी थी मन में ।
जिस दिन थे तुम हमारे
कोई यूँ न मन को हारे
जैसे धरा पै तारे ।।।
आकाशपुष्प संभव ।
उस दिन कहीं खिले थे ।
ज्योतिर्वलय कहीं पर ।
ब्रह्माण्ड में मिले थे ।।।।
सुरलोकचाप वर्णा
कंजों पै खग हिले थे ।
स्मित अधर किसी के।
विहँसे मुझे पुकारे ।।।।
कोई यूँ न को हारे ।।
जैसे धरा पै तारे ।
मंदाकिनी थी मन में
जिस दिन थे तुम हमारे ।
©¶©®¶©®¶
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SUDHA RAJE
BJNR''DTA

2→ तुम विरह का शोक मत
करना क्षमा करना मुझे ।
विश्व की है टेर आकुल गीत ये
गाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।।।
रूप रस लावण्य यौवन देह कुंतल मधु अधर

सुप्त श्लथ सुत संग श्यामल सौम्य लोचन
स्वप्न भर ।
कंचुकी पट मन सरकता क्षीण
ओढ़ाना पङेगा ।।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
हूँ व्यथित संकल्प कातर देह प्रण
अभ्यर्थना।
तव चरण नत माथ भावी वेदना तव
यातना ।
यातना ।
देवि!!!! हे हृदयेश्वरी ।
पिय मोह झुठलाना पङेगा
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
आह !!! जाता हूँ पलटता टूटता मन भग्न
खंडित ।
शोक वारिद् तप्त पय बिनु मीन भव हित
आत्मदंडित ।
वक्ष खण्डित ये व्यथा हृद् चीर सह
जाना पङेगा
सह जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा
©सुधा राजे
जा रहा हूँ चोर्यकर्मी प्रेमभीरू प्रिय
विदा
अब रहा अवशेष कंटकपथ चलूँ प्रण
संविदा ।
मात्र
अपराधी तुम्हारा ही नहीं पितु, पुत्र
का ।
बाल यौवन जीर्ण वय हे देवि
समझाना पङेगा ।
प्रिय मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!!
मुझे जाना पङेगा ।
©सुधा राजे
नाम से सिद्धार्थ मैं दिक्हीन सत पथ पर
चला ।
जन्म यौवन मृत्यु जीवन ईश
अंशी क्यों भला ।
खोज में चिर शांति तप की हूँ तो जल
जाना पङेगा
प्रिय!!
मुझे जाना पङेगा
प्रिय!!!
मुझे जाना पङेगा

©®सुधा राजे।

Wednesday, 29 May 2013

किशना पगली किशना

Sudha Raje
किशना पगली किशना
*******
तीन बेटियों में सबसे
बङी बिना भाई की किशना
नहीं सुनती माई की बात नहीं करती घर
के काम ।
दुत्कारी भी दुलारी भी
अंग अंग फूटी जवानी जिसे देख
बौरा गये तालाब बाग पेङ
नदी बाढ़ सी आयी गाँव में रिश्ते
के जीजा बह गये और रोती रह
गयी किशना
आम के पेङ के नीचे ।
वह
आयी क्यों माई ने
कितना रोका जीजा वीजा कुछ
नहीँ होता ।
लेकिन
चली आयी पक्के आम खाने घने बाग
में जंगल के बीच ।
चुपचाप घर आ पङी अकेली
किशना उदास है
दुखी है अँधेरी कोठरी में जी भर
रोती है पाठशाला भी नहीँ जाती ।
माई के जेहन में कीङे कुलबुला रहे हैं
कैसे पूछे क्या हुआ ।
काढ़े पीये
जा रही है किशना बिना कुछ पूछे
बुखार की दवा है माई ने कहा ।
पूछ पूछ हार गयी माई कुछ
नहीँ बोली किशना ।
अनुत्तीर्ण
हो गयी आठवीँ में । नहीं गाती ना आम
खाती है कभी । बस माई का हर काम
करती रहती चुपचाप ।
आम पर फिर
फल आये हैं सारी बहिनें जा रही हैं
माई बाऊजी भी जा रहे हैं
फुआ आई है ।नहीँ जा रही किशना ।
कोई
नही है घर में और आया है
वही रिश्ते का जीजा साल भर
बाद फिर बेशरमाई से
मुसकुरा रहा है । किशना बर्तन
माँज रही है और पाँच
किलो की लोहे ही कढ़ाही राख
रेत और निरमा से रगङते हाथ कब
उठे पता नहीँ कढ़ाही जीजा के
माथे पर जा लगी भीषण चिघ्घाङ के
साथ।
खून बह चला एक
सिर फटी लाश पङी है आँगन में
दौङती जा रही है बाल बिखेरे
राख के हाथ भरे चीखती बदहवास
आँधी की तरह आम के
बागों की तरफ किशना "माई हम
राक्षस के मार डरलीं "
कचहरी में घोषणा होती है
नाबालिग किशना पागल है ।
बाऊ रो रहे हैं माई चुप देख
रही है किशना लगातार आम
खा रही है
फूआ बुक्का फाङकर चीख रहीँ है "ऐ
वंश बुझौवनी अब तुहार बिआह कैसे
होई ।
किशना हँस रही है सारे कपङे मुँह
हाथ आम के रस से सराबोर ।
माई देख रही है एक साल बाद
काली माई की हँसी उसे
लगा किशना के चेहरे पर रक्त है
बुदबुदा उठी "ऐ माई नज़र न होखे
"पगली किशना अब जोर जोर से
गा रही है।
©®¶©®¶
Sudha Raje
Dta//Bjnr
सत्यकथा

पाँव खुद काट के दिये उसनेजैसे बैसाखियों के कहने पै ।।

पाँव खुद काट के दिये उसने
जैसे बैसाखियों के कहने पै ।।
चुन लिया दर्द का घना जंगल ।
जैसे आबादियों के कहने पै ।।
जो गिरा दें तो उठ नहीं पाते
साथ वो उनको ले चली आयी ।।
हर तरफ अज़नबी निग़ाहें थी ।
सख़्त बरबादियों के कहने पै ।
जल उठे जब जहेज़ के दोज़ख ।
सुर्ख जोङे बरीं के रोते थे ।
तख्ते शब आँसुओं की शहनाई
झूठ की शादियों के कहने पै
इक सहेली की याद यूँ आई
तू जो ज़िंदा है खुद उठा ख़ुद को ।
ग़ैर के दोश पर ज़नाजे सी ।।
क्यों सुधा हादियों के कहने पर ।
©सुधा राज

सुधा खून में ज़हर बो रहा लालसलामी सोच ।

चंबल जंगल सहरा बागी ।
हिमशेखर कश्मीर ।
पंचनदी सतभगिनी बागी सुधा विन्ध्य
की पीर।
©सुधा राजे
कच्छ कछार दुआबों चलती बारूदी बरसात

धधक रही सूखी अरावली ।
नीलगिरी रव रात ।
सुधा धुँधाता भद्रदेश है बहका मध्यप्रदेश

खादर बाँगर भाभर जूझे ।
किधर शांतिमय देश????
नेताओं के राजभवन में ऐयाशी के ठाठ ।
गाँव जहाँ पग धरे नही अब तक वो देखें
बाट
थप्पङ जूता गाली लाठी बम बारूद
विचार ।
मोटी चमङी अब तो चेतो शत्रु
रहा ललकार ।
मंदबुद्धि तो नहीं कि ना जानो क्या हैँ
व्यापार???
भूखों के घर कौन भेजता
आयातित हथियार ।
सुधा खून में ज़हर बो रहा लाल
सलामी सोच ।
नेता और प्रशासक डूबा लेने में उत्कोच
©®¶©©सुधा राज

मातृ धर्मा दूर्वा।

दूर्वा हूँ वृक्ष झंझावात् में गिरते रहेंगे ।
ओंस पीकर प्यास लेकर पग तले
बढ़ती रहूँगी
एक नन्हा बीज हूँ जैसे महामंत्रित परम ।
अल्पतम् भी आर्द्र होकर नित शिखर
चढ़ती रहूँगी ।
जब कहीं संधान को निकली तो केवल
आत्मबल ।
नित नये लघुतम सरल प्रतिमान मैं
गढ़ती रहूँगी ।
चेतना हूँ सूक्ष्मता अणुशक्ति ज्यों औंकार
हूँ ।
जगविशद् प्राकार पर झरती सतत्
मढ़ती रहूँगी ।
मात्र कविता मंद्रगीतों में सरल गांधार
सी
हूँ सुधा मन सिंधु पी पी कटु गरल
लङती रहूँगी।
कंटकों पर आच्छादित हूँ श्रमिक की नींद
को ।
पग चुभे प्रस्तर जटिल पर लोम
सी जङती रहूँगी ।
सूखने पर भी विहँगों के लिये प्रिय नीङ
सी ।
भूख मैं आहार तृणचर के लिये
झङती रहूँगी ।
एक पोरी तृण कहीं पङ जायोगा जीवित
पुनः ।
मैं पुनर्नव रूप से हर जन्म मैं
कढ़ती रहूँगी ।
स्वप्नदृष्टा हूँ अखिल ब्रह्माण्ड मेरा गेह
ज्यों ।
देवता के भाल कर मैं स्वस्ति रव
वपढ़ती रहूगीँ
चिर विरह का गीत हूँ मैं चिरमिलन के
गाँव में ।
उत्प्लवन भू भार मिट्टी बाढ़
को अङती रहूँगी ।
काय वाचन रूप रस सर्वस्व परहित कर्म
को ।हो हरी मरकर कहीं उर्वर
धरा सङती रहूँगी
मैं इला की कोख में वनसंपदा का सार हूँ
नारि हूँ मातृत्वधर्मा काल दृग
पङती रहूँगी ।
©®सुधा राजे ।

प्रेम झंझावात् सा आया उङा कर लेगया ।

प्रेम झंझावात् सा आया उङा कर ले
गया ।
इस जगत् की वाटिका में जो भी कुछ
निस्सार था ।
थे अपरिचित से कई नाते कई संबंध भी ।
तोङ डाले सूखते द्रुम व्यर्थ का
कुछ विस्तार था ।
थी त्रिपथगा नेह की मन आत्मा तन
जीव जग ।
उत्तप्लवन में बह गया सब मैल
जो अधिभार था ।
आँसुओं ने धो दिये सारे कलुष हर
कामना ।
प्रेम डूबी सुक्ति मुक्ता शुद्ध
शुचि संसार था ।
खोये बिन पाता नहीं कोई यहाँ कुछ
भी सुधा ।
पा लिया सर्वस्व खोकर जो वही भव
सार था ।
©सुधा राजे

Monday, 27 May 2013

लाल क्रांतिवाद बनाम लोकतंत्र।

भारत को आजाद कराने और उसे प्रजातंत्र
बनाने में हम सबके पुऱखों ने
कुरबानी दी ।
देश की आजादी की ललक में ।
सपना लोकतंत्र था
लाल तानाशाही कभी नहीं ।
ये लोग तब भी लाल विश्व का सपना देख
रहे थे ।
लाल विश्व जिसमें किसी का कुछ
भी अपना नहीं होगा ।
एक समूह
तानाशाही से सबसे मेहवत करायेगा और
सारे संसाधन सबको ईमानदारी से बाँट
देगा???
ये ईमानदारी?? से बाँटना सबको बराबर
सुनने में अच्छा लगता है ।
क्योंकि निकम्मों को सपना दिखाता है
कि वारेन बफेट की सारी जायदाद में
उनका भी हिस्सा होगा
लेकिन
व्यवहारिक कतई नहीं ।
मानव स्वभाव है वह अपनी माँ के कंधे पर
बाप को हाथ नहीं रखने देता जब वह
शिशु होता है ।
सब के सब श्रमजीवी??
हो ही नहीं सकते ।
सबको एक सा मन दिमाग तन और इरादे
विचार शक्ति मिलती ही नहीं है ।
आठ घंटे फावङा चलाने वाला रात रात
भर जागकर पूरे देश के मुद्दों पर हल
निकालने वाले समाधान नहीं निकाल
सकता ।
हर कोई दिमाग से
इतना चौकन्ना नहीं हो सकता कि स्टीफ
हॉफकिन्स या लियोनार्दो द
विन्सी बन जाये ।
कोई भी बुद्ध की तरह धीरज और
शांतिवान् अहिंसक भी नहीं हो सकता
तब?????
बंदूक की नोंक पर हक़ की बात????
केवल प्रतिशोध की राजनीति????
माना भ्रष्टाचार है और सिपाहियों ने
भी अवेक मामलों में
ज्यादतियाँ की हो सकती हैं ।
लेकिन
बारूद की धमक पर कोई हक़ की माँग
नहीं हो सकती ।
सारे वनवासी निरीह प्राणी नहीं है ।
इनमें तस्कर माफिया देशद्रोही
बुरदाफरोश भी हैं ।
अपराध
लगातार परंपरा बनने लगे तो समाज
स्वीकृत हो जाये तो उस समूह के वही सब
ठीक लगने लगता है
अभी एक टिप्पणी पढ़ी कि कुछ भ्रष्ट
नेता मर गये तो हाय हाय क्यों!!!
ये
किसी नेता या सिपाही की भ्रष्टता या
का मसला नहीं है ।
समस्या है
भारत के प्रति निष्ठा की ।
जो देश को देश माने और
देशवासियों की कर्तव्य रेखा पर
खङा होकर बात करे सारे लोक
का समर्थन मिले ।
गरीबी
वन पर निर्भरता की देन है ।
शिक्षा तकनीक और व्यवसायिक समझ
अवसर और पूरे शेष भारत से मेलजोल ।
से
क्रमशः गरीबी दूर की जा सकती है ।
शराब या नशा ही जीवन की चरम
सभ्यता औऱ आजादी नहीं हैं ।
जो वनवासी सेवाओं में आ चुके हैं आई एएस
आई पी एस तक है ं
वे खुद महसूस करते है बम बारूद समाधान
नहीं ।
तब
आदमी जो जितना मेहनत करे ।
योग्य हो
पाये
आज अनेक वनवासी संसद और विधानसभा में
हैं
ये लोकतंत्र में संभव है
लालतंत्र में नहीं
समाधान निरस्त्री करण में है ।
लोकतंत्र स्वराज स्वदेश
जन्मभूमि मात्रभूमि ।
यही
ज़ज्बा था सबके दिल में जब
अतिवादी देशद्रोही ।
भारत पर चीन और रूस को बुला रहे थे तब
भारत के सपूत
मादरे वतन के की जंजीरों को तोङने के
लिये
तोप पर फाँसी पर हँस हँस कर चढ़ रहे थे

वो
भारत माता
कोई
मजदूरो की तानाशाही नहीं
लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का गणतंत्र
था
सबको रोजी सबको न्याय
चरमवाद में प्लेटो कहता है
स्त्रियाँ भी साझी होगीं बच्चे भी ।
जोङे बनाने तोङने की आजादी होगी ।
नक्सलवाद
दरअसल देश के खोखले
स्वप्नजीवी बुद्धिमान वर्ग की नाजायज
औलाद है । नक्सली भूख
गरीबी साधनहीनता की लङाई लङ रहे
है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जो भी यह कहता है वह सिरे से
ही अतिवादी है ।
आपको पता है दीवाली के
फुलझङी पटाखों की कीमत ।
??????
ये बम बारूद ये बारूदी सुरंगे ये बंदूकें ये
कारतूस ये तकनीक ये अत्याधुनिक मारक
हथियार??????
कहाँ से आये भूखे नंगे वनवासियों के
हाथों में???
जिनके पास चावल खरीदने को चालीस
रूपया रोज नहीं वो सौ रूपये से हजार
रूपये तक का कारतूस रोज कहाँ से खरीदते
है???????
एक बंदूक कई लाख की आती है???
और इतना पेट्रोल फूँकने को पैसा कहाँ से
आता है??
पिछली बार सात
सिपाहियों की हत्या करके पेट चीरकर
उनमें हैंड ग्रेनेड भर दिये गये थे
कि जो लोग लाशें उठाने आयें वो भी मारें
जायें ।
पिछले बीस सालों में गिनती कीजिये
कितने सिपाही मारे गये?????
कितने थाने लूटे गये कितनी संपत्ति आग के
हवाले कर दी गयी??????
ये लाल क्रांति का झूठा सपना देखने
वालों का बोया जहर है ।
जल जंगल जमीन
का
नारा व्यक्तिगत रूप से हमें भी पसंद है ।
लेकिन किसी भी तरह भारत
की तुलना रूस के जारशाही से
नहीं की जा सकती ।
यू पी बिहार से
ज्यादा बिजली पानी सङक और नागरिक
सुविधायें छत्तीस गढ़ को लगातार देने में
लगीं हुयी है केंद्र और राज्य सरकारें ।
भारत में लालक्रांति की चरमपंथी सोच
सिरे से ही गलत है । भारतीयों को अकाल
तक में वैसे
हालातों का सामना नहीं करना पङा जो
औऱ चीन में हुआ आम शासन के दौरान ।
लगातार सिपाहियों पर आऱोप है
कि वनवासियों पर अत्याचार होते है औऱ
उनको झूठा फँसाया जाता है ।
लेकिन
क्यों नहीं ये सवाल कि चंबल की तरह
सिख अलगाववादियों की तरह ।
नक्सली हथियार फेंक कर देश
की मुख्यधारा में शामिल हो जाते????
मानवाधिकार व्यवस्था औऱ
शांति की कीमत पर नहीं बचाये जा सकते
। जो हत्यारा है वो सजा पाये
यही कानून है ।
सिपाही निजी दुश्मनी से नहीं तैनात है

उनकी जरूरत ही न पङे फेंक दो हथियार
औऱ चलो करो संरक्षण जल जंगल जमीन
का ।
हिंसा कभी पोषणीय नहीं ।
मजदूर या दलित सरकार ने
नहीं बनाया वहाँ जो हालात आजादी से
पहले थे आज संसाधन से भरे हैं ।
सरकारी नौकरियों में
आदिवासियों को आरक्षण है ।
औऱ अगर सारी ताकत हथियार खरीदने
में खऱच कर रहे हैं तो विकास
होगा ही कैसे ।
ये
ज़ंग प्रशासन के खिलाफ है क्योंकि लाल
शासन का सपना दिखाया जाकर
आतंकवाद की तरह पृष्ठ पोषण
किया जाता रहा ।
लंबे समय तक हम जंगलों के संपर्क में रहे है
। वहाँ पूरी गुप्त योजना मिशनरियों और
लालक्रांतिवादियों की काम करती है ।
ये लोग दिल्ली मुंबई कलकत्ता जैसे
महानगरों में वातानुकूलित कमरों में बैठे
हवाई यात्रायें कर रहे हैं औऱ साम्यवाद
के नाम पर विश्वगाँव की कल्पना करते हैं
। पूँजीवादी कहकर जिस धनसमग्र
की निंदा करते है वही धन तो ध्येय बन
जाता है । हम सब एक सपना देखते है
जाति धर्म पंथ विहीन समाज का । ये
हमारे सपने चुरा लेते हैं । लेनिन नाम
रखने से कोई लेनिन नहीं हो जाता ।
लेनिन ने गाँधी को जिया और
महाराणा को भी । इनमें से कोई
भी जमीन जंगल जल जङ का नेता नहीं ।
भारतीय जनमन
की सहानुभूति संवेदना हमेशा वनवासियों के
साथ हैं लेकिन सरकार चलाने के लिये
किसी भी पार्टी को लॉ एंड ऑर्डर
तो हर हाल में चाहिये । नागरिक
वही जो संविधान कानून सरकार
तिरंगा देश की अस्मिता औऱ
संप्रभुता का पालन करे बाकी सब देश से
गद्दारी है भारत को लोकतंत्र चाहिये
मजदूरों की तानाशाही कतई नहीं ।
क्योंकि तब हर मजदूर अवसर रखता है
संसद तक जाने का ।
नक्सलवाद???
घरेलू समस्या नहीं रही ।
घरेलू समस्यी है जंगलों से हथियार बंद
गिरोहों को खदेङना और जेल में डालना ।
घरेलू समस्या है वैकल्पिक रोजगार
मुहैया कराना । पूरा बिहारी ग्रामीण
इलाका गरीब है ।
सारा बुंदेलखंडी ग्रामीण इलाका बेहद
गरीब है ।
उङीसा कालाहांडी इलाका आज
भी गरीब है । तमिलनाडु के सुदूर गाँवों में
आज भी भयंकर गरीबी है । बंगाल यू
पी बिहार और तमिलनाडु के बाढ़ग्रस्त
इलाके आज भी गरीब हैं । राजस्थान के
बेघर बंजारे खानाबदोश गाङिया लोहार
कंजर कालबेलिया सहारिया आज भी बेहद
गरीब हैं ।
गरीबी बाढ़ सूखा राहत पुनर्वास और
प्राकृतिक आपदायें किसी एक राजनैतिक
दल पर नहीं टाली जा सकती ।
आज
किसी भी एक पार्टी की सत्ता पूरे
अट्ठाईस राज्यों में हो और केंद्र में
भी यह असंभव है ।
अक्सर मतदाता टूटा भग्न जनादेश दे रहे
हैं । निष्ठा पार्टी नही अब
प्रत्याशी की दम खम और छवि पर
ज्यादा निर्भर है ।
तो हर दल को इस मसले पर सोचकर बहुत
गंभीरता से बोलना चाहिये । आज रमण
सिंह हैं कल कोई और जीत सकता है ।
वनवासी जो आम तौर पर तंग आ चुके है
परेशानियों से । अगर प्रशासन
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके और पुलिस
सेना सिपाही स्थानीय लोग
ही हों बाहरियों के साथ साथ तब ये उन
जंगलवालों की अपनी भी समस्या है
कि सिपाही ज़िंदा रहें । स्थानीय
भाषा और रीति रिवाज सोच विचार
और जंगल की जानकारी भी होगी ।
पैसा बाँटना किसी को कपङे
खाना पहुँचाना हक़ नहीं भीख
हो सकती है । दुर्भाग्य से जीत प्राप्त
करने के लिये यू पी बिहार बंगाल
छत्तीसगढ़ के भीतर यही हो रहा है ।
वजीफा खाना रूपया कपङा मुआवजा जैसे
हक बनता जा रहा है । रोजगार
ही जबकि एकमात्र स्थायी समाधान है
। ये वैकल्पित रोजगार चाहे वनोपज के
विविध संवर्धन परिवर्धन से मिले
या खनिज संपदा के । मुख्यधारा में
लौटाने को जरूरी है
कि वनवासी शहरों में आय़ें और पूरे भारत
औऱ भारत के इतिहास भूगोल विरासत
संस्कृति सभ्यता को समझे । हमें बहुत मौके
मिले उनको बेतकल्लुफी से देखने को तो ये
समझ लीजिये कि परिवर्तन वे
जल्दी स्वीकार नहीं करते । बच्चों में
शिक्षा की बजाय वजीफा पाने
का ही मकसद है । और बाहरी लोगों से वे
मन नहीं मिलाते विश्वास नहीं करते ।
लेकिन जिस कदर संगठित सेना का शस्त्र
प्रशिक्षण चल रहा है
वहाँ वनवासी नक्सलवादियों के भीतर
वो अचंभे में डालता है । वैकल्पिक
रोजगार बन गया नक्सलवादी बनना ।
औऱ दिमागी जुनून भी । लोग आतंकित
रहते नक्सल सरगनाओं से । वे जिसे चाहे
उठवा लें और जंगल में नक्सल सेना में
भर्ती कर दें । अँधेरे का डर दिखा कर
टॉर्च बेची जा रही है । लिट्टे की तरह
नासूर बन गया नक्सलवाद केवल योजनायें
बनाने से ठीक नहीं होगा जंगल की जल
थलनभ से सफाई करनी होगी ।
और गाँव पुरवे के लोगों को इस में
साथी बनाना होगा पका घाव है मवाद
चीरकर निकाली नहीं तो गैन्ग्रीन
हो जायेगा ।
सेना ऐसा कर सकती है मात्र कुछ सप्ताह
में । बस दृढ़ संकल्प से निर्दोष को बचाते
हुये ऑपरेशन संपूर्ण कॉम्बिंग
छेङना होगा ।
लोकतंत्र ही सही है ।
और लोकतंत्र में हर तरह का सुधार संभव
है ।
व्यवस्था जरूरी है । और हिंसा से
कभी हक़ नहीं मिल सकते । खूनी तरीके
खून में डूब जाते है । समय आ चुका है
कि भारत के संदर्भ में लोकतात्रिक तरीके
से गरीबी और बेरोजगारी हल हो ।
हक़??? कर्तव्य से ही शुरू होते है ।
समाधान दीजिये आप शीर्ष विचारक है
हम सब ताक रहे है
सारी पीङा वनवासियों साथ है और
सत्ता के कपट भ्रष्टता का भी अहसास है
परंतु आदरणीय
हमला जब हुआ तो वे एनकाउंटर नहीं कर
रहे थे ।
चुनाव प्रचार ।
यानि
डेमोक्रेसी में कहने सुनने का मौका तो दो
मानो या नहीं ।
वोट दो या नहीं
मगर
देश का हिस्सा नहीं बनना चाहते??
ये तो बगावत है???
राजद्रोह!!!
गरीबी तो और भी राज्यों में है???
कल हम जायें बात करने तो हमें भी मार
देगें।
ज़वानों की मौत पर मुआवज़ा??
नक्सलियों की मौत पर
लालविचारकों का हाय हाय ।
नेताओं की मौत पर विरोधी खेमों में
जश्न???
निहत्थे प्रचारकों को मारकर
उनकी लाश पर बर्बरता से नृत्य???
छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेश ही था और
हमारा दूसरा घर भी जहाँ आज भी आधे से
ज्यादा परिजव रहते हैं ।और ये जो बचपन
के ज़ज्बाती लोग होते है वो तो जैसे
जुगाली ही करते है बेध्यानी में या ध्यान
में रखी हर बात का ।
ये जो हाय तौबा है न
दरअसल
इसी नीति की देन है ""फूट डालो राज्य
करो""
वनवासी सिर्फ जरूरत
की भाषा जानता है । वह जहाँ भूख
लगी खा लिया । जो मिला पी लिया ।
जहाँ नींद लगी सो गये । जो भाया उसके
हो गये । वन के विविध
देवी देवता अंधविश्वास भूत प्रेत आत्माये
भी उतनी ही सजीव सदस्य है उनके जीवन
की जितना कोई पालतू पशु ।
ये तो कोई कम पढ़ा लिखा किसान मजदूर
भी कह देगा कि अधिकांश नेता -"भ्रष्ट हैं
और महाभ्रष्ट होते जा रहे है"
पूँजीपति
को चाहिये कच्चा माल । वो है बिहार
छत्तीस गढ़ और मध्यप्रदेश में ।
सही कहें तो बँटवारा ही ग़लत हुआ
झारखंड और छत्तीसगढ़ का ।
इसको नागरिक हित के लिये
नहीं बाँटा गया । ये तीन
राज्यों की हुकूमत में फँसै कीमती खनिज
क्षेत्र को एक यूनिट बनाकर एक
ही प्रशासन के लिये बाँटा गया ।जिंदल
वेदान्ता और तमाम देशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियाँ । पूरे वन खनिज और
संपदा का दोहन करती हैं । वहाँ जैसे
खोदकर सारा जंगल उलट पलट कर रख
दिया ।
वनविभाग
के सरकारी बंगलों में तेंदू पत्ता गोंद
वनफल वनघास और सूखे पेङ जब डिपो पर
जमा होते तो ये ""पास सिस्टम
""का शिकार होते । कि वन में
पत्ती लकङी और घास के
निजी अव्यवसायिक उपयोग को जा सकें ।
वन रक्षकों से दोस्ती भी रहती और
दुश्मनी । लेकिन उग्र कभी नहीं रहे ।
हाँलांकि निजी तौर पर कुछ रिश्वतखोर
वन अधिकारी वनवासी को ज्यादा पसंद
रहे । क्योंकि वे वनअपराध और वन
विधि संहिता से मुक्त रखते थे ।
कुल्हाङी छीनी औऱ साईकिल
जो किसी किसी पर थी बाद में छोङ
दिया ।
लेकिन जब उद्योग पतियों का मायाजाल
फैला तो हर तरफ बाहरी लोग फैल गये ।
ये साहब लोग अंग्रेजी बोलते औऱ
वनवासी को हिकारत से देखते । कुछ
कामपशु भी थे । देखते देखते सारा जंगल
वनवासी के लिये वर्जित
इलाका हो गया ।
वह नहीं समझता था देश सरकार
संविधान और कानून ।
और वन में अपना राज समझता था ।
शातिर तस्करों ने पैसे का लालच
दिया और जानवर पेङ
जङीबूटियाँ काटी जाने लगीं । पकङे जाते
वनवासी जेल जाते वनवासी औऱते
मर्दों की तरह दिन रात काम करती है
सो वे भी अपराध में शरीक़ हो गयीं ।
साहबों के घर लङकियाँ साफ सफाई के
काम पर जातीं और रहन सहन के सपने
आँखों में भर लातीं । जब तक
साहबों को नहीं देखा खपरैल
का कच्चा घर ताज महल से कम नहीं था ।
लेकिन मानव स्वभाव की हवस बढ़
गयी रेडियो मोबाईल टी वी और छोटे
मोटे यंत्र सपने की मंज़िल हो गये ।
पैसा?? दिहाङी मजदूर को रोज का रोज
खतम । जंगल में अघोषित अवैध रिश्ते
भी पनपे और वनवासी रस्में घायल होने
का आक्रोश भी । जहाँ तक हमें याद है
हमारे बेहद करीबी रिश्तेदार
को मरणासन्न एक ऐसे ही प्रेम प्रकरण में
करके छोङ गये थे वनवासी । पूँजीपति -
साहब लोग-वनविभाग-के लालच रिश्वत
खोरी चरित्रहीनता ने असंतोष से
जख्मी कर दिया जंगली सीधे
भौतिकवादी जीवन को ।
राजनीति का लाल विचारक तंत्र इस
जख्म पर नमक मलने लगा और
विदेशी माओइस्ट ताकतों ने
देशी लालविचारकों को हुकूमत
का सपना दिखाया । लाल विचारक
नेता मजदूर वनवासी मुखियों के बीच
रूपया और झूठा मान सम्मान पूँजीवाद के
खात्मे का सपना लेकर पहुँच गये ।
वनवासी का दर्द मोङकर बंदूक
बना दी । जिनके दमन के लिये
पूँजीपति के उद्योग की सुरक्षा के नाम
पर सरकारी गोली चली । कानून
संविधान देश के प्रति लालविचारको के
जहरीले बाग़ी अविश्वास से
भरा जंगली खाकी और वरदी को लाल
करने लगा । ये वरदी की दुश्मनी संगठित
धरपकङ में बदली एनकाउंटर हुये और
दोनो तरफ से लाशें गिरने लगी ।
लालविचारक महानगरों के एसी कमरों से
मानवाधिकार पर लिखने लगे वरदी पर
सुबूत का दबाब बढ़ गया । रिमांड
पूछताछ में चीखें उठीं तो लालविचारक
नमक पर मिरची लेकर पहुँचे और बंदूके
बारूद विदेशी विश्व लाल वादियों के
सहयोग से जंगल में उगने लगीं ।
नक्सलवादी एक थर्राता नाम
हो गया जिस रूतबे को पाने
की इच्छा हर दबे दिमाग में भरने
को लाल कलम तबाही मचाने के तरीके
सैनिक प्रशिक्षण देने लगी । अब
वनवासी का एक और शोषक
हो गया नक्सलवादी समूह ये हफ्ता वसूलते
मुफत का राशन खाते और ऐश के लिये औरतें
भी जोङा बनाकर ले जाते । ये औरते बंदूक
चलाती और बच्चो के साथ सूचनायें
लाती कुनबा बनाकर रहने लगे
नक्सलवादी परंपरा हो गयी बारूद ।
गाँव का गाँव बीबी बच्चों सहित
खूनी हो गया शातिर निशानोबाज़
हत्यारे बच्चौ औरतों को मारक ट्रैनिंग
मिलती और वरदी का लहू
शिकारी की तरह बहाते । जब प्रतिशोध
में
पकङा धकङी गिरफ्तारी होती लालकलम
जहर उगलती ।
ये घाव राजनीति पूँजी के लालच ने दिय़ा
नासूर बनाया मौकापरस्त लाल
विचारकों ने तार विदेशों में।
©®©®¶©®©सुधा राजे।

लाल क्रांतिवाद बनाम लोकतंत्र।

भारत को आजाद कराने और उसे प्रजातंत्र
बनाने में हम सबके पुऱखों ने
कुरबानी दी ।
देश की आजादी की ललक में ।
सपना लोकतंत्र था
लाल तानाशाही कभी नहीं ।
ये लोग तब भी लाल विश्व का सपना देख
रहे थे ।
लाल विश्व जिसमें किसी का कुछ
भी अपना नहीं होगा ।
एक समूह
तानाशाही से सबसे मेहवत करायेगा और
सारे संसाधन सबको ईमानदारी से बाँट
देगा???
ये ईमानदारी?? से बाँटना सबको बराबर
सुनने में अच्छा लगता है ।
क्योंकि निकम्मों को सपना दिखाता है
कि वारेन बफेट की सारी जायदाद में
उनका भी हिस्सा होगा
लेकिन
व्यवहारिक कतई नहीं ।
मानव स्वभाव है वह अपनी माँ के कंधे पर
बाप को हाथ नहीं रखने देता जब वह
शिशु होता है ।
सब के सब श्रमजीवी??
हो ही नहीं सकते ।
सबको एक सा मन दिमाग तन और इरादे
विचार शक्ति मिलती ही नहीं है ।
आठ घंटे फावङा चलाने वाला रात रात
भर जागकर पूरे देश के मुद्दों पर हल
निकालने वाले समाधान नहीं निकाल
सकता ।
हर कोई दिमाग से
इतना चौकन्ना नहीं हो सकता कि स्टीफ
हॉफकिन्स या लियोनार्दो द
विन्सी बन जाये ।
कोई भी बुद्ध की तरह धीरज और
शांतिवान् अहिंसक भी नहीं हो सकता
तब?????
बंदूक की नोंक पर हक़ की बात????
केवल प्रतिशोध की राजनीति????
माना भ्रष्टाचार है और सिपाहियों ने
भी अवेक मामलों में
ज्यादतियाँ की हो सकती हैं ।
लेकिन
बारूद की धमक पर कोई हक़ की माँग
नहीं हो सकती ।
सारे वनवासी निरीह प्राणी नहीं है ।
इनमें तस्कर माफिया देशद्रोही
बुरदाफरोश भी हैं ।
अपराध
लगातार परंपरा बनने लगे तो समाज
स्वीकृत हो जाये तो उस समूह के वही सब
ठीक लगने लगता है
अभी एक टिप्पणी पढ़ी कि कुछ भ्रष्ट
नेता मर गये तो हाय हाय क्यों!!!
ये
किसी नेता या सिपाही की भ्रष्टता या
का मसला नहीं है ।
समस्या है
भारत के प्रति निष्ठा की ।
जो देश को देश माने और
देशवासियों की कर्तव्य रेखा पर
खङा होकर बात करे सारे लोक
का समर्थन मिले ।
गरीबी
वन पर निर्भरता की देन है ।
शिक्षा तकनीक और व्यवसायिक समझ
अवसर और पूरे शेष भारत से मेलजोल ।
से
क्रमशः गरीबी दूर की जा सकती है ।
शराब या नशा ही जीवन की चरम
सभ्यता औऱ आजादी नहीं हैं ।
जो वनवासी सेवाओं में आ चुके हैं आई एएस
आई पी एस तक है ं
वे खुद महसूस करते है बम बारूद समाधान
नहीं ।
तब
आदमी जो जितना मेहनत करे ।
योग्य हो
पाये
आज अनेक वनवासी संसद और विधानसभा में
हैं
ये लोकतंत्र में संभव है
लालतंत्र में नहीं
समाधान निरस्त्री करण में है ।
लोकतंत्र स्वराज स्वदेश
जन्मभूमि मात्रभूमि ।
यही
ज़ज्बा था सबके दिल में जब
अतिवादी देशद्रोही ।
भारत पर चीन और रूस को बुला रहे थे तब
भारत के सपूत
मादरे वतन के की जंजीरों को तोङने के
लिये
तोप पर फाँसी पर हँस हँस कर चढ़ रहे थे

वो
भारत माता
कोई
मजदूरो की तानाशाही नहीं
लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का गणतंत्र
था
सबको रोजी सबको न्याय
चरमवाद में प्लेटो कहता है
स्त्रियाँ भी साझी होगीं बच्चे भी ।
जोङे बनाने तोङने की आजादी होगी ।
नक्सलवाद
दरअसल देश के खोखले
स्वप्नजीवी बुद्धिमान वर्ग की नाजायज
औलाद है । नक्सली भूख
गरीबी साधनहीनता की लङाई लङ रहे
है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जो भी यह कहता है वह सिरे से
ही अतिवादी है ।
आपको पता है दीवाली के
फुलझङी पटाखों की कीमत ।
??????
ये बम बारूद ये बारूदी सुरंगे ये बंदूकें ये
कारतूस ये तकनीक ये अत्याधुनिक मारक
हथियार??????
कहाँ से आये भूखे नंगे वनवासियों के
हाथों में???
जिनके पास चावल खरीदने को चालीस
रूपया रोज नहीं वो सौ रूपये से हजार
रूपये तक का कारतूस रोज कहाँ से खरीदते
है???????
एक बंदूक कई लाख की आती है???
और इतना पेट्रोल फूँकने को पैसा कहाँ से
आता है??
पिछली बार सात
सिपाहियों की हत्या करके पेट चीरकर
उनमें हैंड ग्रेनेड भर दिये गये थे
कि जो लोग लाशें उठाने आयें वो भी मारें
जायें ।
पिछले बीस सालों में गिनती कीजिये
कितने सिपाही मारे गये?????
कितने थाने लूटे गये कितनी संपत्ति आग के
हवाले कर दी गयी??????
ये लाल क्रांति का झूठा सपना देखने
वालों का बोया जहर है ।
जल जंगल जमीन
का
नारा व्यक्तिगत रूप से हमें भी पसंद है ।
लेकिन किसी भी तरह भारत
की तुलना रूस के जारशाही से
नहीं की जा सकती ।
यू पी बिहार से
ज्यादा बिजली पानी सङक और नागरिक
सुविधायें छत्तीस गढ़ को लगातार देने में
लगीं हुयी है केंद्र और राज्य सरकारें ।
भारत में लालक्रांति की चरमपंथी सोच
सिरे से ही गलत है । भारतीयों को अकाल
तक में वैसे
हालातों का सामना नहीं करना पङा जो
औऱ चीन में हुआ आम शासन के दौरान ।
लगातार सिपाहियों पर आऱोप है
कि वनवासियों पर अत्याचार होते है औऱ
उनको झूठा फँसाया जाता है ।
लेकिन
क्यों नहीं ये सवाल कि चंबल की तरह
सिख अलगाववादियों की तरह ।
नक्सली हथियार फेंक कर देश
की मुख्यधारा में शामिल हो जाते????
मानवाधिकार व्यवस्था औऱ
शांति की कीमत पर नहीं बचाये जा सकते
। जो हत्यारा है वो सजा पाये
यही कानून है ।
सिपाही निजी दुश्मनी से नहीं तैनात है

उनकी जरूरत ही न पङे फेंक दो हथियार
औऱ चलो करो संरक्षण जल जंगल जमीन
का ।
हिंसा कभी पोषणीय नहीं ।
मजदूर या दलित सरकार ने
नहीं बनाया वहाँ जो हालात आजादी से
पहले थे आज संसाधन से भरे हैं ।
सरकारी नौकरियों में
आदिवासियों को आरक्षण है ।
औऱ अगर सारी ताकत हथियार खरीदने
में खऱच कर रहे हैं तो विकास
होगा ही कैसे ।
ये
ज़ंग प्रशासन के खिलाफ है क्योंकि लाल
शासन का सपना दिखाया जाकर
आतंकवाद की तरह पृष्ठ पोषण
किया जाता रहा ।
लंबे समय तक हम जंगलों के संपर्क में रहे है
। वहाँ पूरी गुप्त योजना मिशनरियों और
लालक्रांतिवादियों की काम करती है ।
ये लोग दिल्ली मुंबई कलकत्ता जैसे
महानगरों में वातानुकूलित कमरों में बैठे
हवाई यात्रायें कर रहे हैं औऱ साम्यवाद
के नाम पर विश्वगाँव की कल्पना करते हैं
। पूँजीवादी कहकर जिस धनसमग्र
की निंदा करते है वही धन तो ध्येय बन
जाता है । हम सब एक सपना देखते है
जाति धर्म पंथ विहीन समाज का । ये
हमारे सपने चुरा लेते हैं । लेनिन नाम
रखने से कोई लेनिन नहीं हो जाता ।
लेनिन ने गाँधी को जिया और
महाराणा को भी । इनमें से कोई
भी जमीन जंगल जल जङ का नेता नहीं ।
भारतीय जनमन
की सहानुभूति संवेदना हमेशा वनवासियों के
साथ हैं लेकिन सरकार चलाने के लिये
किसी भी पार्टी को लॉ एंड ऑर्डर
तो हर हाल में चाहिये । नागरिक
वही जो संविधान कानून सरकार
तिरंगा देश की अस्मिता औऱ
संप्रभुता का पालन करे बाकी सब देश से
गद्दारी है भारत को लोकतंत्र चाहिये
मजदूरों की तानाशाही कतई नहीं ।
क्योंकि तब हर मजदूर अवसर रखता है
संसद तक जाने का ।
नक्सलवाद???
घरेलू समस्या नहीं रही ।
घरेलू समस्यी है जंगलों से हथियार बंद
गिरोहों को खदेङना और जेल में डालना ।
घरेलू समस्या है वैकल्पिक रोजगार
मुहैया कराना । पूरा बिहारी ग्रामीण
इलाका गरीब है ।
सारा बुंदेलखंडी ग्रामीण इलाका बेहद
गरीब है ।
उङीसा कालाहांडी इलाका आज
भी गरीब है । तमिलनाडु के सुदूर गाँवों में
आज भी भयंकर गरीबी है । बंगाल यू
पी बिहार और तमिलनाडु के बाढ़ग्रस्त
इलाके आज भी गरीब हैं । राजस्थान के
बेघर बंजारे खानाबदोश गाङिया लोहार
कंजर कालबेलिया सहारिया आज भी बेहद
गरीब हैं ।
गरीबी बाढ़ सूखा राहत पुनर्वास और
प्राकृतिक आपदायें किसी एक राजनैतिक
दल पर नहीं टाली जा सकती ।
आज
किसी भी एक पार्टी की सत्ता पूरे
अट्ठाईस राज्यों में हो और केंद्र में
भी यह असंभव है ।
अक्सर मतदाता टूटा भग्न जनादेश दे रहे
हैं । निष्ठा पार्टी नही अब
प्रत्याशी की दम खम और छवि पर
ज्यादा निर्भर है ।
तो हर दल को इस मसले पर सोचकर बहुत
गंभीरता से बोलना चाहिये । आज रमण
सिंह हैं कल कोई और जीत सकता है ।
वनवासी जो आम तौर पर तंग आ चुके है
परेशानियों से । अगर प्रशासन
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके और पुलिस
सेना सिपाही स्थानीय लोग
ही हों बाहरियों के साथ साथ तब ये उन
जंगलवालों की अपनी भी समस्या है
कि सिपाही ज़िंदा रहें । स्थानीय
भाषा और रीति रिवाज सोच विचार
और जंगल की जानकारी भी होगी ।
पैसा बाँटना किसी को कपङे
खाना पहुँचाना हक़ नहीं भीख
हो सकती है । दुर्भाग्य से जीत प्राप्त
करने के लिये यू पी बिहार बंगाल
छत्तीसगढ़ के भीतर यही हो रहा है ।
वजीफा खाना रूपया कपङा मुआवजा जैसे
हक बनता जा रहा है । रोजगार
ही जबकि एकमात्र स्थायी समाधान है
। ये वैकल्पित रोजगार चाहे वनोपज के
विविध संवर्धन परिवर्धन से मिले
या खनिज संपदा के । मुख्यधारा में
लौटाने को जरूरी है
कि वनवासी शहरों में आय़ें और पूरे भारत
औऱ भारत के इतिहास भूगोल विरासत
संस्कृति सभ्यता को समझे । हमें बहुत मौके
मिले उनको बेतकल्लुफी से देखने को तो ये
समझ लीजिये कि परिवर्तन वे
जल्दी स्वीकार नहीं करते । बच्चों में
शिक्षा की बजाय वजीफा पाने
का ही मकसद है । और बाहरी लोगों से वे
मन नहीं मिलाते विश्वास नहीं करते ।
लेकिन जिस कदर संगठित सेना का शस्त्र
प्रशिक्षण चल रहा है
वहाँ वनवासी नक्सलवादियों के भीतर
वो अचंभे में डालता है । वैकल्पिक
रोजगार बन गया नक्सलवादी बनना ।
औऱ दिमागी जुनून भी । लोग आतंकित
रहते नक्सल सरगनाओं से । वे जिसे चाहे
उठवा लें और जंगल में नक्सल सेना में
भर्ती कर दें । अँधेरे का डर दिखा कर
टॉर्च बेची जा रही है । लिट्टे की तरह
नासूर बन गया नक्सलवाद केवल योजनायें
बनाने से ठीक नहीं होगा जंगल की जल
थलनभ से सफाई करनी होगी ।
और गाँव पुरवे के लोगों को इस में
साथी बनाना होगा पका घाव है मवाद
चीरकर निकाली नहीं तो गैन्ग्रीन
हो जायेगा ।
सेना ऐसा कर सकती है मात्र कुछ सप्ताह
में । बस दृढ़ संकल्प से निर्दोष को बचाते
हुये ऑपरेशन संपूर्ण कॉम्बिंग
छेङना होगा ।
लोकतंत्र ही सही है ।
और लोकतंत्र में हर तरह का सुधार संभव
है ।
व्यवस्था जरूरी है । और हिंसा से
कभी हक़ नहीं मिल सकते । खूनी तरीके
खून में डूब जाते है । समय आ चुका है
कि भारत के संदर्भ में लोकतात्रिक तरीके
से गरीबी और बेरोजगारी हल हो ।
हक़??? कर्तव्य से ही शुरू होते है ।
समाधान दीजिये आप शीर्ष विचारक है
हम सब ताक रहे है
सारी पीङा वनवासियों साथ है और
सत्ता के कपट भ्रष्टता का भी अहसास है
परंतु आदरणीय
हमला जब हुआ तो वे एनकाउंटर नहीं कर
रहे थे ।
चुनाव प्रचार ।
यानि
डेमोक्रेसी में कहने सुनने का मौका तो दो
मानो या नहीं ।
वोट दो या नहीं
मगर
देश का हिस्सा नहीं बनना चाहते??
ये तो बगावत है???
राजद्रोह!!!
गरीबी तो और भी राज्यों में है???
कल हम जायें बात करने तो हमें भी मार
देगें।
ज़वानों की मौत पर मुआवज़ा??
नक्सलियों की मौत पर
लालविचारकों का हाय हाय ।
नेताओं की मौत पर विरोधी खेमों में
जश्न???
निहत्थे प्रचारकों को मारकर
उनकी लाश पर बर्बरता से नृत्य???
हत्या
हत्या
हत्या ।
किस की???
क्या सिर्फ कुछ शरीर मरे???
ये क्या मर गया आदमी की आँख में??
ये क्या ज़श्न है आदमी के ज़ेहन् में???
ये क्या ख़ौफ है आदमी की के दिल में???
ये क्या साज़िश है आदमी के ज़ेहन में??
क्या जल रहा दफन हो रहा लाशों के
ऊपर भीतर आदमी की रूह में
ये लहू सिंदूर गुङहल सुहागी कहीं ।
कहते है अब और लाल सलाम नहीं ।ये
मेरी मिट्टी इसपर मुझे उगानी है
कचनार रक्तचंदन सुर्ख़ गुलाब और
पकेगी लालधान की रेटी काठिया लाल
गैँहू लाल ज्वार लाल बाजरा । जब
हरी औढ़नी में साँवले चेहरे पर
लाली मुसकरायेगी तब बाजूओं में
फङकता लाल लहू गुलमुहर के
पेङों को झकझोर डालेगा ।
धरती की कोख से उगेगे लाल कोमल गुदगुदे
शकरकंद से बच्चे ।
अलविदा बारूद । आज से सफेद कबूतरों ने
हरे पेङो पर बैठकर लाल ज्वार चुगनी शुरू
कर दी । चाँदी का सिक्का मुठ्ठी में
दबाये लालू हँसता है बंन्नूकिया बेच
दिहली ।
छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेश ही था और
हमारा दूसरा घर भी जहाँ आज भी आधे से
ज्यादा परिजव रहते हैं ।और ये जो बचपन
के ज़ज्बाती लोग होते है वो तो जैसे
जुगाली ही करते है बेध्यानी में या ध्यान
में रखी हर बात का ।
ये जो हाय तौबा है न
दरअसल
इसी नीति की देन है ""फूट डालो राज्य
करो""
वनवासी सिर्फ जरूरत
की भाषा जानता है । वह जहाँ भूख
लगी खा लिया । जो मिला पी लिया ।
जहाँ नींद लगी सो गये । जो भाया उसके
हो गये । वन के विविध
देवी देवता अंधविश्वास भूत प्रेत आत्माये
भी उतनी ही सजीव सदस्य है उनके जीवन
की जितना कोई पालतू पशु ।
ये तो कोई कम पढ़ा लिखा किसान मजदूर
भी कह देगा कि अधिकांश नेता -"भ्रष्ट हैं
और महाभ्रष्ट होते जा रहे है"
पूँजीपति
को चाहिये कच्चा माल । वो है बिहार
छत्तीस गढ़ और मध्यप्रदेश में ।
सही कहें तो बँटवारा ही ग़लत हुआ
झारखंड और छत्तीसगढ़ का ।
इसको नागरिक हित के लिये
नहीं बाँटा गया । ये तीन
राज्यों की हुकूमत में फँसै कीमती खनिज
क्षेत्र को एक यूनिट बनाकर एक
ही प्रशासन के लिये बाँटा गया ।जिंदल
वेदान्ता और तमाम देशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियाँ । पूरे वन खनिज और
संपदा का दोहन करती हैं । वहाँ जैसे
खोदकर सारा जंगल उलट पलट कर रख
दिया ।
वनविभाग
के सरकारी बंगलों में तेंदू पत्ता गोंद
वनफल वनघास और सूखे पेङ जब डिपो पर
जमा होते तो ये ""पास सिस्टम
""का शिकार होते । कि वन में
पत्ती लकङी और घास के
निजी अव्यवसायिक उपयोग को जा सकें ।
वन रक्षकों से दोस्ती भी रहती और
दुश्मनी । लेकिन उग्र कभी नहीं रहे ।
हाँलांकि निजी तौर पर कुछ रिश्वतखोर
वन अधिकारी वनवासी को ज्यादा पसंद
रहे । क्योंकि वे वनअपराध और वन
विधि संहिता से मुक्त रखते थे ।
कुल्हाङी छीनी औऱ साईकिल
जो किसी किसी पर थी बाद में छोङ
दिया ।
लेकिन जब उद्योग पतियों का मायाजाल
फैला तो हर तरफ बाहरी लोग फैल गये ।
ये साहब लोग अंग्रेजी बोलते औऱ
वनवासी को हिकारत से देखते । कुछ
कामपशु भी थे । देखते देखते सारा जंगल
वनवासी के लिये वर्जित
इलाका हो गया ।
वह नहीं समझता था देश सरकार
संविधान और कानून ।
और वन में अपना राज समझता था ।
शातिर तस्करों ने पैसे का लालच
दिया और जानवर पेङ
जङीबूटियाँ काटी जाने लगीं । पकङे जाते
वनवासी जेल जाते वनवासी औऱते
मर्दों की तरह दिन रात काम करती है
सो वे भी अपराध में शरीक़ हो गयीं ।
साहबों के घर लङकियाँ साफ सफाई के
काम पर जातीं और रहन सहन के सपने
आँखों में भर लातीं । जब तक
साहबों को नहीं देखा खपरैल
का कच्चा घर ताज महल से कम नहीं था ।
लेकिन मानव स्वभाव की हवस बढ़
गयी रेडियो मोबाईल टी वी और छोटे
मोटे यंत्र सपने की मंज़िल हो गये ।
पैसा?? दिहाङी मजदूर को रोज का रोज
खतम । जंगल में अघोषित अवैध रिश्ते
भी पनपे और वनवासी रस्में घायल होने
का आक्रोश भी । जहाँ तक हमें याद है
हमारे बेहद करीबी रिश्तेदार
को मरणासन्न एक ऐसे ही प्रेम प्रकरण में
करके छोङ गये थे वनवासी । पूँजीपति -
साहब लोग-वनविभाग-के लालच रिश्वत
खोरी चरित्रहीनता ने असंतोष से
जख्मी कर दिया जंगली सीधे
भौतिकवादी जीवन को ।
राजनीति का लाल विचारक तंत्र इस
जख्म पर नमक मलने लगा और
विदेशी माओइस्ट ताकतों ने
देशी लालविचारकों को हुकूमत
का सपना दिखाया । लाल विचारक
नेता मजदूर वनवासी मुखियों के बीच
रूपया और झूठा मान सम्मान पूँजीवाद के
खात्मे का सपना लेकर पहुँच गये ।
वनवासी का दर्द मोङकर बंदूक
बना दी । जिनके दमन के लिये
पूँजीपति के उद्योग की सुरक्षा के नाम
पर सरकारी गोली चली । कानून
संविधान देश के प्रति लालविचारको के
जहरीले बाग़ी अविश्वास से
भरा जंगली खाकी और वरदी को लाल
करने लगा । ये वरदी की दुश्मनी संगठित
धरपकङ में बदली एनकाउंटर हुये और
दोनो तरफ से लाशें गिरने लगी ।
लालविचारक महानगरों के एसी कमरों से
मानवाधिकार पर लिखने लगे वरदी पर
सुबूत का दबाब बढ़ गया । रिमांड
पूछताछ में चीखें उठीं तो लालविचारक
नमक पर मिरची लेकर पहुँचे और बंदूके
बारूद विदेशी विश्व लाल वादियों के
सहयोग से जंगल में उगने लगीं ।
नक्सलवादी एक थर्राता नाम
हो गया जिस रूतबे को पाने
की इच्छा हर दबे दिमाग में भरने
को लाल कलम तबाही मचाने के तरीके
सैनिक प्रशिक्षण देने लगी । अब
वनवासी का एक और शोषक
हो गया नक्सलवादी समूह ये हफ्ता वसूलते
मुफत का राशन खाते और ऐश के लिये औरतें
भी जोङा बनाकर ले जाते । ये औरते बंदूक
चलाती और बच्चो के साथ सूचनायें
लाती कुनबा बनाकर रहने लगे
नक्सलवादी परंपरा हो गयी बारूद ।
गाँव का गाँव बीबी बच्चों सहित
खूनी हो गया शातिर निशानोबाज़
हत्यारे बच्चौ औरतों को मारक ट्रैनिंग
मिलती और वरदी का लहू
शिकारी की तरह बहाते । जब प्रतिशोध
में
पकङा धकङी गिरफ्तारी होती लालकलम
जहर उगलती ।
ये घाव राजनीति पूँजी के लालच ने दिय़ा
नासूर बनाया मौकापरस्त लाल
विचारकों ने तार विदेशों में।
©®©®¶©®©सुधा राजे।

लाल क्रांतिवाद बनाम लोकतंत्र।

भारत को आजाद कराने और उसे प्रजातंत्र
बनाने में हम सबके पुऱखों ने
कुरबानी दी ।
देश की आजादी की ललक में ।
सपना लोकतंत्र था
लाल तानाशाही कभी नहीं ।
ये लोग तब भी लाल विश्व का सपना देख
रहे थे ।
लाल विश्व जिसमें किसी का कुछ
भी अपना नहीं होगा ।
एक समूह
तानाशाही से सबसे मेहवत करायेगा और
सारे संसाधन सबको ईमानदारी से बाँट
देगा???
ये ईमानदारी?? से बाँटना सबको बराबर
सुनने में अच्छा लगता है ।
क्योंकि निकम्मों को सपना दिखाता है
कि वारेन बफेट की सारी जायदाद में
उनका भी हिस्सा होगा
लेकिन
व्यवहारिक कतई नहीं ।
मानव स्वभाव है वह अपनी माँ के कंधे पर
बाप को हाथ नहीं रखने देता जब वह
शिशु होता है ।
सब के सब श्रमजीवी??
हो ही नहीं सकते ।
सबको एक सा मन दिमाग तन और इरादे
विचार शक्ति मिलती ही नहीं है ।
आठ घंटे फावङा चलाने वाला रात रात
भर जागकर पूरे देश के मुद्दों पर हल
निकालने वाले समाधान नहीं निकाल
सकता ।
हर कोई दिमाग से
इतना चौकन्ना नहीं हो सकता कि स्टीफ
हॉफकिन्स या लियोनार्दो द
विन्सी बन जाये ।
कोई भी बुद्ध की तरह धीरज और
शांतिवान् अहिंसक भी नहीं हो सकता
तब?????
बंदूक की नोंक पर हक़ की बात????
केवल प्रतिशोध की राजनीति????
माना भ्रष्टाचार है और सिपाहियों ने
भी अवेक मामलों में
ज्यादतियाँ की हो सकती हैं ।
लेकिन
बारूद की धमक पर कोई हक़ की माँग
नहीं हो सकती ।
सारे वनवासी निरीह प्राणी नहीं है ।
इनमें तस्कर माफिया देशद्रोही
बुरदाफरोश भी हैं ।
अपराध
लगातार परंपरा बनने लगे तो समाज
स्वीकृत हो जाये तो उस समूह के वही सब
ठीक लगने लगता है
अभी एक टिप्पणी पढ़ी कि कुछ भ्रष्ट
नेता मर गये तो हाय हाय क्यों!!!
ये
किसी नेता या सिपाही की भ्रष्टता या
का मसला नहीं है ।
समस्या है
भारत के प्रति निष्ठा की ।
जो देश को देश माने और
देशवासियों की कर्तव्य रेखा पर
खङा होकर बात करे सारे लोक
का समर्थन मिले ।
गरीबी
वन पर निर्भरता की देन है ।
शिक्षा तकनीक और व्यवसायिक समझ
अवसर और पूरे शेष भारत से मेलजोल ।
से
क्रमशः गरीबी दूर की जा सकती है ।
शराब या नशा ही जीवन की चरम
सभ्यता औऱ आजादी नहीं हैं ।
जो वनवासी सेवाओं में आ चुके हैं आई एएस
आई पी एस तक है ं
वे खुद महसूस करते है बम बारूद समाधान
नहीं ।
तब
आदमी जो जितना मेहनत करे ।
योग्य हो
पाये
आज अनेक वनवासी संसद और विधानसभा में
हैं
ये लोकतंत्र में संभव है
लालतंत्र में नहीं
समाधान निरस्त्री करण में है ।
लोकतंत्र स्वराज स्वदेश
जन्मभूमि मात्रभूमि ।
यही
ज़ज्बा था सबके दिल में जब
अतिवादी देशद्रोही ।
भारत पर चीन और रूस को बुला रहे थे तब
भारत के सपूत
मादरे वतन के की जंजीरों को तोङने के
लिये
तोप पर फाँसी पर हँस हँस कर चढ़ रहे थे

वो
भारत माता
कोई
मजदूरो की तानाशाही नहीं
लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण का गणतंत्र
था
सबको रोजी सबको न्याय
चरमवाद में प्लेटो कहता है
स्त्रियाँ भी साझी होगीं बच्चे भी ।
जोङे बनाने तोङने की आजादी होगी ।
नक्सलवाद
दरअसल देश के खोखले
स्वप्नजीवी बुद्धिमान वर्ग की नाजायज
औलाद है । नक्सली भूख
गरीबी साधनहीनता की लङाई लङ रहे
है!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जो भी यह कहता है वह सिरे से
ही अतिवादी है ।
आपको पता है दीवाली के
फुलझङी पटाखों की कीमत ।
??????
ये बम बारूद ये बारूदी सुरंगे ये बंदूकें ये
कारतूस ये तकनीक ये अत्याधुनिक मारक
हथियार??????
कहाँ से आये भूखे नंगे वनवासियों के
हाथों में???
जिनके पास चावल खरीदने को चालीस
रूपया रोज नहीं वो सौ रूपये से हजार
रूपये तक का कारतूस रोज कहाँ से खरीदते
है???????
एक बंदूक कई लाख की आती है???
और इतना पेट्रोल फूँकने को पैसा कहाँ से
आता है??
पिछली बार सात
सिपाहियों की हत्या करके पेट चीरकर
उनमें हैंड ग्रेनेड भर दिये गये थे
कि जो लोग लाशें उठाने आयें वो भी मारें
जायें ।
पिछले बीस सालों में गिनती कीजिये
कितने सिपाही मारे गये?????
कितने थाने लूटे गये कितनी संपत्ति आग के
हवाले कर दी गयी??????
ये लाल क्रांति का झूठा सपना देखने
वालों का बोया जहर है ।
जल जंगल जमीन
का
नारा व्यक्तिगत रूप से हमें भी पसंद है ।
लेकिन किसी भी तरह भारत
की तुलना रूस के जारशाही से
नहीं की जा सकती ।
यू पी बिहार से
ज्यादा बिजली पानी सङक और नागरिक
सुविधायें छत्तीस गढ़ को लगातार देने में
लगीं हुयी है केंद्र और राज्य सरकारें ।
भारत में लालक्रांति की चरमपंथी सोच
सिरे से ही गलत है । भारतीयों को अकाल
तक में वैसे
हालातों का सामना नहीं करना पङा जो
औऱ चीन में हुआ आम शासन के दौरान ।
लगातार सिपाहियों पर आऱोप है
कि वनवासियों पर अत्याचार होते है औऱ
उनको झूठा फँसाया जाता है ।
लेकिन
क्यों नहीं ये सवाल कि चंबल की तरह
सिख अलगाववादियों की तरह ।
नक्सली हथियार फेंक कर देश
की मुख्यधारा में शामिल हो जाते????
मानवाधिकार व्यवस्था औऱ
शांति की कीमत पर नहीं बचाये जा सकते
। जो हत्यारा है वो सजा पाये
यही कानून है ।
सिपाही निजी दुश्मनी से नहीं तैनात है

उनकी जरूरत ही न पङे फेंक दो हथियार
औऱ चलो करो संरक्षण जल जंगल जमीन
का ।
हिंसा कभी पोषणीय नहीं ।
मजदूर या दलित सरकार ने
नहीं बनाया वहाँ जो हालात आजादी से
पहले थे आज संसाधन से भरे हैं ।
सरकारी नौकरियों में
आदिवासियों को आरक्षण है ।
औऱ अगर सारी ताकत हथियार खरीदने
में खऱच कर रहे हैं तो विकास
होगा ही कैसे ।
ये
ज़ंग प्रशासन के खिलाफ है क्योंकि लाल
शासन का सपना दिखाया जाकर
आतंकवाद की तरह पृष्ठ पोषण
किया जाता रहा ।
लंबे समय तक हम जंगलों के संपर्क में रहे है
। वहाँ पूरी गुप्त योजना मिशनरियों और
लालक्रांतिवादियों की काम करती है ।
ये लोग दिल्ली मुंबई कलकत्ता जैसे
महानगरों में वातानुकूलित कमरों में बैठे
हवाई यात्रायें कर रहे हैं औऱ साम्यवाद
के नाम पर विश्वगाँव की कल्पना करते हैं
। पूँजीवादी कहकर जिस धनसमग्र
की निंदा करते है वही धन तो ध्येय बन
जाता है । हम सब एक सपना देखते है
जाति धर्म पंथ विहीन समाज का । ये
हमारे सपने चुरा लेते हैं । लेनिन नाम
रखने से कोई लेनिन नहीं हो जाता ।
लेनिन ने गाँधी को जिया और
महाराणा को भी । इनमें से कोई
भी जमीन जंगल जल जङ का नेता नहीं ।
भारतीय जनमन
की सहानुभूति संवेदना हमेशा वनवासियों के
साथ हैं लेकिन सरकार चलाने के लिये
किसी भी पार्टी को लॉ एंड ऑर्डर
तो हर हाल में चाहिये । नागरिक
वही जो संविधान कानून सरकार
तिरंगा देश की अस्मिता औऱ
संप्रभुता का पालन करे बाकी सब देश से
गद्दारी है भारत को लोकतंत्र चाहिये
मजदूरों की तानाशाही कतई नहीं ।
क्योंकि तब हर मजदूर अवसर रखता है
संसद तक जाने का ।
नक्सलवाद???
घरेलू समस्या नहीं रही ।
घरेलू समस्यी है जंगलों से हथियार बंद
गिरोहों को खदेङना और जेल में डालना ।
घरेलू समस्या है वैकल्पिक रोजगार
मुहैया कराना । पूरा बिहारी ग्रामीण
इलाका गरीब है ।
सारा बुंदेलखंडी ग्रामीण इलाका बेहद
गरीब है ।
उङीसा कालाहांडी इलाका आज
भी गरीब है । तमिलनाडु के सुदूर गाँवों में
आज भी भयंकर गरीबी है । बंगाल यू
पी बिहार और तमिलनाडु के बाढ़ग्रस्त
इलाके आज भी गरीब हैं । राजस्थान के
बेघर बंजारे खानाबदोश गाङिया लोहार
कंजर कालबेलिया सहारिया आज भी बेहद
गरीब हैं ।
गरीबी बाढ़ सूखा राहत पुनर्वास और
प्राकृतिक आपदायें किसी एक राजनैतिक
दल पर नहीं टाली जा सकती ।
आज
किसी भी एक पार्टी की सत्ता पूरे
अट्ठाईस राज्यों में हो और केंद्र में
भी यह असंभव है ।
अक्सर मतदाता टूटा भग्न जनादेश दे रहे
हैं । निष्ठा पार्टी नही अब
प्रत्याशी की दम खम और छवि पर
ज्यादा निर्भर है ।
तो हर दल को इस मसले पर सोचकर बहुत
गंभीरता से बोलना चाहिये । आज रमण
सिंह हैं कल कोई और जीत सकता है ।
वनवासी जो आम तौर पर तंग आ चुके है
परेशानियों से । अगर प्रशासन
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सके और पुलिस
सेना सिपाही स्थानीय लोग
ही हों बाहरियों के साथ साथ तब ये उन
जंगलवालों की अपनी भी समस्या है
कि सिपाही ज़िंदा रहें । स्थानीय
भाषा और रीति रिवाज सोच विचार
और जंगल की जानकारी भी होगी ।
पैसा बाँटना किसी को कपङे
खाना पहुँचाना हक़ नहीं भीख
हो सकती है । दुर्भाग्य से जीत प्राप्त
करने के लिये यू पी बिहार बंगाल
छत्तीसगढ़ के भीतर यही हो रहा है ।
वजीफा खाना रूपया कपङा मुआवजा जैसे
हक बनता जा रहा है । रोजगार
ही जबकि एकमात्र स्थायी समाधान है
। ये वैकल्पित रोजगार चाहे वनोपज के
विविध संवर्धन परिवर्धन से मिले
या खनिज संपदा के । मुख्यधारा में
लौटाने को जरूरी है
कि वनवासी शहरों में आय़ें और पूरे भारत
औऱ भारत के इतिहास भूगोल विरासत
संस्कृति सभ्यता को समझे । हमें बहुत मौके
मिले उनको बेतकल्लुफी से देखने को तो ये
समझ लीजिये कि परिवर्तन वे
जल्दी स्वीकार नहीं करते । बच्चों में
शिक्षा की बजाय वजीफा पाने
का ही मकसद है । और बाहरी लोगों से वे
मन नहीं मिलाते विश्वास नहीं करते ।
लेकिन जिस कदर संगठित सेना का शस्त्र
प्रशिक्षण चल रहा है
वहाँ वनवासी नक्सलवादियों के भीतर
वो अचंभे में डालता है । वैकल्पिक
रोजगार बन गया नक्सलवादी बनना ।
औऱ दिमागी जुनून भी । लोग आतंकित
रहते नक्सल सरगनाओं से । वे जिसे चाहे
उठवा लें और जंगल में नक्सल सेना में
भर्ती कर दें । अँधेरे का डर दिखा कर
टॉर्च बेची जा रही है । लिट्टे की तरह
नासूर बन गया नक्सलवाद केवल योजनायें
बनाने से ठीक नहीं होगा जंगल की जल
थलनभ से सफाई करनी होगी ।
और गाँव पुरवे के लोगों को इस में
साथी बनाना होगा पका घाव है मवाद
चीरकर निकाली नहीं तो गैन्ग्रीन
हो जायेगा ।
सेना ऐसा कर सकती है मात्र कुछ सप्ताह
में । बस दृढ़ संकल्प से निर्दोष को बचाते
हुये ऑपरेशन संपूर्ण कॉम्बिंग
छेङना होगा ।
लोकतंत्र ही सही है ।
और लोकतंत्र में हर तरह का सुधार संभव
है ।
व्यवस्था जरूरी है । और हिंसा से
कभी हक़ नहीं मिल सकते । खूनी तरीके
खून में डूब जाते है । समय आ चुका है
कि भारत के संदर्भ में लोकतात्रिक तरीके
से गरीबी और बेरोजगारी हल हो ।
हक़??? कर्तव्य से ही शुरू होते है ।
समाधान दीजिये आप शीर्ष विचारक है
हम सब ताक रहे है
सारी पीङा वनवासियों साथ है और
सत्ता के कपट भ्रष्टता का भी अहसास है
परंतु आदरणीय
हमला जब हुआ तो वे एनकाउंटर नहीं कर
रहे थे ।
चुनाव प्रचार ।
यानि
डेमोक्रेसी में कहने सुनने का मौका तो दो
मानो या नहीं ।
वोट दो या नहीं
मगर
देश का हिस्सा नहीं बनना चाहते??
ये तो बगावत है???
राजद्रोह!!!
गरीबी तो और भी राज्यों में है???
कल हम जायें बात करने तो हमें भी मार
देगें।
ज़वानों की मौत पर मुआवज़ा??
नक्सलियों की मौत पर
लालविचारकों का हाय हाय ।
नेताओं की मौत पर विरोधी खेमों में
जश्न???
निहत्थे प्रचारकों को मारकर
उनकी लाश पर बर्बरता से नृत्य???
हत्या
हत्या
हत्या ।
किस की???
क्या सिर्फ कुछ शरीर मरे???
ये क्या मर गया आदमी की आँख में??
ये क्या ज़श्न है आदमी के ज़ेहन् में???
ये क्या ख़ौफ है आदमी की के दिल में???
ये क्या साज़िश है आदमी के ज़ेहन में??
क्या जल रहा दफन हो रहा लाशों के
ऊपर भीतर आदमी की रूह में
ये लहू सिंदूर गुङहल सुहागी कहीं ।
कहते है अब और लाल सलाम नहीं ।ये
मेरी मिट्टी इसपर मुझे उगानी है
कचनार रक्तचंदन सुर्ख़ गुलाब और
पकेगी लालधान की रेटी काठिया लाल
गैँहू लाल ज्वार लाल बाजरा । जब
हरी औढ़नी में साँवले चेहरे पर
लाली मुसकरायेगी तब बाजूओं में
फङकता लाल लहू गुलमुहर के
पेङों को झकझोर डालेगा ।
धरती की कोख से उगेगे लाल कोमल गुदगुदे
शकरकंद से बच्चे ।
अलविदा बारूद । आज से सफेद कबूतरों ने
हरे पेङो पर बैठकर लाल ज्वार चुगनी शुरू
कर दी । चाँदी का सिक्का मुठ्ठी में
दबाये लालू हँसता है बंन्नूकिया बेच
दिहली ।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के
आंकड़ों के अनुसार 2001 और 2010 के बीच
एक लाख चालीस हज़ार से
भी ज्यादा दर्ज किए इस तरह के
मामलों में से कम से कम एक लाख ऐसे
अभियुक्त थे, जिन्हें प्रमाण के अभाव में
क्लिक करें निर्दोष करार दिया गया.
गौर करने वाली बात ये भी है कि इस एक
लाख में 14,500 से भी ज्यादा मामले ऐसे
थे, जिनमे अभियुक्तों के खिलाफ नाबालिग
लड़कियों का बलात्कार करने का आरोप
था.
साथ ही इस एक लाख से भी ज्यादा के
आंकड़े में करीब 9,000 ऐसे भी मामले थे,
जिन्हें पुलिस की प्रारंभिक जांच के बाद
बंद करना पड़ा.
अपराध
सभी अपराधों के बारे में आंकडे जुटाने और
जारी करने वाली संस्था नेशनल क्राइम
रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार बलात्कार के
मामलों में आंकड़े साल 1971 के बाद से
ही उपलब्ध हैं.
जहाँ 1971 में इस तरह के 2,487 मामले
दर्ज किए गए थे वहीं 2011 में दर्ज किए
गए मामलों की संख्या 24,206
थी यानी 873% से
भी ज्यादा की बढ़ोत्तरी!
शायद यही वजह है कि ट्रस्ट लॉ नामक
थॉमसन रायटर्स की संस्था ने जी-20
देशों के समूह में भारत को महिलाओं के
रहने के लिए सबसे बदतर जगह बताया है.
क्या
अपहरण स्त्रीविक्रय
बंधुआ पत्नी
जबरन विवाह
प्रेम प्रकरण पर ऑनर किलिंग
को शामिल करें
अप्रेल में माननीय ने संसद में बयान
दिया था कि दिल्ली जैसे हादसे पूरे देश
में होते हैं ।।
।।
छत्तीसगढ़ पहले मध्यप्रदेश ही था और
हमारा दूसरा घर भी जहाँ आज भी आधे से
ज्यादा परिजव रहते हैं ।और ये जो बचपन
के ज़ज्बाती लोग होते है वो तो जैसे
जुगाली ही करते है बेध्यानी में या ध्यान
में रखी हर बात का ।
ये जो हाय तौबा है न
दरअसल
इसी नीति की देन है ""फूट डालो राज्य
करो""
वनवासी सिर्फ जरूरत
की भाषा जानता है । वह जहाँ भूख
लगी खा लिया । जो मिला पी लिया ।
जहाँ नींद लगी सो गये । जो भाया उसके
हो गये । वन के विविध
देवी देवता अंधविश्वास भूत प्रेत आत्माये
भी उतनी ही सजीव सदस्य है उनके जीवन
की जितना कोई पालतू पशु ।
ये तो कोई कम पढ़ा लिखा किसान मजदूर
भी कह देगा कि अधिकांश नेता -"भ्रष्ट हैं
और महाभ्रष्ट होते जा रहे है"
पूँजीपति
को चाहिये कच्चा माल । वो है बिहार
छत्तीस गढ़ और मध्यप्रदेश में ।
सही कहें तो बँटवारा ही ग़लत हुआ
झारखंड और छत्तीसगढ़ का ।
इसको नागरिक हित के लिये
नहीं बाँटा गया । ये तीन
राज्यों की हुकूमत में फँसै कीमती खनिज
क्षेत्र को एक यूनिट बनाकर एक
ही प्रशासन के लिये बाँटा गया ।जिंदल
वेदान्ता और तमाम देशी बहुराष्ट्रीय
कंपनियाँ । पूरे वन खनिज और
संपदा का दोहन करती हैं । वहाँ जैसे
खोदकर सारा जंगल उलट पलट कर रख
दिया ।
वनविभाग
के सरकारी बंगलों में तेंदू पत्ता गोंद
वनफल वनघास और सूखे पेङ जब डिपो पर
जमा होते तो ये ""पास सिस्टम
""का शिकार होते । कि वन में
पत्ती लकङी और घास के
निजी अव्यवसायिक उपयोग को जा सकें ।
वन रक्षकों से दोस्ती भी रहती और
दुश्मनी । लेकिन उग्र कभी नहीं रहे ।
हाँलांकि निजी तौर पर कुछ रिश्वतखोर
वन अधिकारी वनवासी को ज्यादा पसंद
रहे । क्योंकि वे वनअपराध और वन
विधि संहिता से मुक्त रखते थे ।
कुल्हाङी छीनी औऱ साईकिल
जो किसी किसी पर थी बाद में छोङ
दिया ।
लेकिन जब उद्योग पतियों का मायाजाल
फैला तो हर तरफ बाहरी लोग फैल गये ।
ये साहब लोग अंग्रेजी बोलते औऱ
वनवासी को हिकारत से देखते । कुछ
कामपशु भी थे । देखते देखते सारा जंगल
वनवासी के लिये वर्जित
इलाका हो गया ।
वह नहीं समझता था देश सरकार
संविधान और कानून ।
और वन में अपना राज समझता था ।
शातिर तस्करों ने पैसे का लालच
दिया और जानवर पेङ
जङीबूटियाँ काटी जाने लगीं । पकङे जाते
वनवासी जेल जाते वनवासी औऱते
मर्दों की तरह दिन रात काम करती है
सो वे भी अपराध में शरीक़ हो गयीं ।
साहबों के घर लङकियाँ साफ सफाई के
काम पर जातीं और रहन सहन के सपने
आँखों में भर लातीं । जब तक
साहबों को नहीं देखा खपरैल
का कच्चा घर ताज महल से कम नहीं था ।
लेकिन मानव स्वभाव की हवस बढ़
गयी रेडियो मोबाईल टी वी और छोटे
मोटे यंत्र सपने की मंज़िल हो गये ।
पैसा?? दिहाङी मजदूर को रोज का रोज
खतम । जंगल में अघोषित अवैध रिश्ते
भी पनपे और वनवासी रस्में घायल होने
का आक्रोश भी । जहाँ तक हमें याद है
हमारे बेहद करीबी रिश्तेदार
को मरणासन्न एक ऐसे ही प्रेम प्रकरण में
करके छोङ गये थे वनवासी । पूँजीपति -
साहब लोग-वनविभाग-के लालच रिश्वत
खोरी चरित्रहीनता ने असंतोष से
जख्मी कर दिया जंगली सीधे
भौतिकवादी जीवन को ।
राजनीति का लाल विचारक तंत्र इस
जख्म पर नमक मलने लगा और
विदेशी माओइस्ट ताकतों ने
देशी लालविचारकों को हुकूमत
का सपना दिखाया । लाल विचारक
नेता मजदूर वनवासी मुखियों के बीच
रूपया और झूठा मान सम्मान पूँजीवाद के
खात्मे का सपना लेकर पहुँच गये ।
वनवासी का दर्द मोङकर बंदूक
बना दी । जिनके दमन के लिये
पूँजीपति के उद्योग की सुरक्षा के नाम
पर सरकारी गोली चली । कानून
संविधान देश के प्रति लालविचारको के
जहरीले बाग़ी अविश्वास से
भरा जंगली खाकी और वरदी को लाल
करने लगा । ये वरदी की दुश्मनी संगठित
धरपकङ में बदली एनकाउंटर हुये और
दोनो तरफ से लाशें गिरने लगी ।
लालविचारक महानगरों के एसी कमरों से
मानवाधिकार पर लिखने लगे वरदी पर
सुबूत का दबाब बढ़ गया । रिमांड
पूछताछ में चीखें उठीं तो लालविचारक
नमक पर मिरची लेकर पहुँचे और बंदूके
बारूद विदेशी विश्व लाल वादियों के
सहयोग से जंगल में उगने लगीं ।
नक्सलवादी एक थर्राता नाम
हो गया जिस रूतबे को पाने
की इच्छा हर दबे दिमाग में भरने
को लाल कलम तबाही मचाने के तरीके
सैनिक प्रशिक्षण देने लगी । अब
वनवासी का एक और शोषक
हो गया नक्सलवादी समूह ये हफ्ता वसूलते
मुफत का राशन खाते और ऐश के लिये औरतें
भी जोङा बनाकर ले जाते । ये औरते बंदूक
चलाती और बच्चो के साथ सूचनायें
लाती कुनबा बनाकर रहने लगे
नक्सलवादी परंपरा हो गयी बारूद ।
गाँव का गाँव बीबी बच्चों सहित
खूनी हो गया शातिर निशानोबाज़
हत्यारे बच्चौ औरतों को मारक ट्रैनिंग
मिलती और वरदी का लहू
शिकारी की तरह बहाते । जब प्रतिशोध
में
पकङा धकङी गिरफ्तारी होती लालकलम
जहर उगलती ।
ये घाव राजनीति पूँजी के लालच ने दिय़ा
नासूर बनाया मौकापरस्त लाल
विचारकों ने तार विदेशों में।
©®©®¶©®©सुधा राजे

Tuesday, 7 May 2013

चुपकॆ

ये किसने हाथ रख्खा है
उन्हीं दुखती रग़ों पर फिर,
छिपाये ज़ख़्म पहलू में चले आये थे हम
चुपके।


सँभाला किस तरह उस रेत को आँसू
से नम करके
सजावट कर सज़ा रख्खे गये सारे
सितम चुपके

मुझे रोका नहीं तूफ़ां ने सैलाबों ने
पर
रूक गये।
कोई पैरों में आ लिपटा था देखे
था सहम चुपके।।

कोई मरता तो मर जाये ये कह गये
धूप में साये ।
सुधा हमने
पुकारा था कभी जिनको सनम
चुपके ।

कोई लिख्खे तो क्या लिख्खे ।।
सुनाये तो सुनाये क्या।।
तबस्सुम जिसके होठों पे वो ग़म
रह गये वहम चुपकॆ
©® sudha raje

Saturday, 4 May 2013

हरी पत्ती लजाई सी।

Sudha Raje
वो सूखी डाल पे
नन्ही हरी पत्ती लजायी
सी

जो देखा आपने हँसकर,
लगी फिर
मुँह दिखायी सी।
लगा फिर
आईना मुझको बुलाने अपने
साये में,।
सुनी जब आपके होठों ग़ज़ल
मेरी बनायी सी ।
लगी वो फिर शक़ीला इक़
गुलाबी फूल को तकने ।
शहाना शोख़ चश्मी से
झरा जैसे बधाई सी।
न भूला दिल सरो-अंदाम
ज़लवा आपका पहला ।
ख़ुमारी फिर वही चेहरे पै
सेहरे के सगाई सी ।
असीरी उम्र भर की है
सुधा किश्वर क़फस नफ़सी।
क़यामत हो कि ज़न्नत आपके पहलू
समाई सी ।
©Sudha Raje
©®©SUDHA Raje
Dta'Bjnr

Wednesday, 1 May 2013

वातानुकूलित कक्षों नें धूप की कल्पना करते नारी चिंतक।

आजकल महिलाओं में एक फैशन
जोरों पर है ।।।।
वे किसी महिला मामले
का विश्वलेषण केवल अपने घर के
आधार पर करती हैं ।।दबा के नोट
देने वाला पिता मिल गया ।।
कॉलेज लाने छोङने वाला भाई और
हर जगह हर कठिन काम करने
को कोई चाचा मामा ।
पति खरीद कर डॉक्टर इंजीनियर
मिल गया या लेक्चरर।।
बेटा पैदा हो गया तो घर मुहल्ले
में धाक हो गयी।।और
नौकरी मिल गयी पति देव
की स्पान्सर शिप से
या पिताजी की गड्डियों से ।।।
मायके में मौज है ।।ससुराल में
राज है।।भविष्य सुरक्षित है।।
पैसा पर्स में है ।पति के नाम से
इज्जत है ।कार बंगला और जेवर हैं।
तब??????
बाकी बचे भारत
की जो कराहती औरतें हैं
पिटती कुटती मार खाती है।पढ़ने
से वंचित कर दी जाती है जिनपर
रिश्तेदारों ने बलात्कार किये हैं
।विधवायें है ।वेश्यायें है।अपहरण
करके बनायी भिखारिने है ।तेजाब
से जली कुरूप अंधी उपेक्षित बेबस
लङकियाँ है ।
खरीदी बेची जाती बीबी हैं ।।
बूढ़े से ब्याह दी गयी जवानियाँ हैं
।नौकरी काम कैरियर के नाम पर
धोखे से इज्जत गंवा बैठी विवश
अनकहा सच है ।।दहेज के लिये
रोज अत्याचार ताने और बंधुआ
बेगारी करती अभागिने हैं
।शादी के नाम पर नामर्दों से
ब्याह कर चुपचाप जहर सी उमंगे
पीती प्रेम को तरसी सुहागिन
बेवायें हैं ।पति के
शराबी जुआरी वेश्यागामी होने से
जीवन के अंधेरो में डूब
गयी प्रतिभायें हैं । प्रेम के छल
पर ठुकरा दी गयी कलंकिनियाँ है
। बचपन में यौन
यातना की शिकार रहीं पति के
साथ नर्क
भोगती जली कहानियाँ है ।।
क्या ये सब

रोका जाये?????
अगर रोका जायेगा तो ।।
तथाकथित पति परमेश्वर औऱ
पिता के द्वारा कन्या दान करने
की वस्तु
रूपी कुरीतियाँ तोङनी होंगी ।।
वंश पुत्र ही चलाता है ये
अंधाविश्वास तोङना होगा ।।
किताबें किसी भी युग में
लिखीं गयी वे उनके समय की जरूरत
थी आज
नयी किताबों का लिखना जरूरी है
।।जाति विहीन समाज ।।प्रेम
विवाह का समर्थक समाज ।।
स्त्री को मातृत्व की सुरक्षा और
अधिक अधिकार देने वाला समाज

पति नही जीवनसाथी की अवधार

मर्दवादी नहीं ।
मानवतावादी समाज
तो पुरूषों के बनाये पुरूषों के लिये
पुरूषों द्वारा ।समाज का आमूल
चूल बदलाव करना ही पङेगा ।।।
हमारी सोच स्त्री को अन्याय से
मुक्ति दिलाने की है ।।
तो अन्याय करने वाला निश्चित
ही दोषी ठहराया जायेगा ।
तब??
ये सुविधा सुख में रहने
वाली मर्दों की दया कृपा पर
आश्रित ब्रेन वाश्ड भद्र महिलायें

सब पुरूष नहीं
सब पुरूष नहीं का नारा लगाके ।
चंद पुरूषों की प्रसंशा तो जीत
सकती है ।लेकिन समाज में पिस
रही बलत्कृत औरत को कोई राह
नहीं दे सकती ।।
ये हम सब जानते हैं कि सब
नहीं ।।
पर ये खुद वे भले पुरूष कहें साबित
करें कि मैं नहीं मैं नहीं मैं नहीं ।।
वरना पूछे कि क्या अपने भतीजे के
साले के फूफा के जीजा के दामाद के
बहिनोई के साथ
अपनी बेटी को भेजते डर लगता है
या नहीं ।क्या वे बीबी के साथ
बरतन माँजने कपङे धोने झाङू
लगाने पोंछा लगाने रोटी बनाने
और बीबी के पैर दाबने को तैयार
है।
सोच बदलो जमाना बदलने
का मतलब आपके अकेले
प्रेमी पति पापा या भैया का मैट
नहीं है । ये आखिरी पागल
गूँगी औऱत को रेप मारपीट औऱ
गंदी निगाहों से बचाने की जंग़ है।
सदियों का ब्रेनवाश अनुकूलन ।।।
पुरूष को डोर सौंपकर चलते रहने
की ट्रैनिंग अनुकूलीकरण
हो गया हमारी जाति का ।।।
और ठोकर खाये बिना सब सँभल
जायें ये जरूरी तो नहीं
सैकङो सालों का षडयंत्र ।।
तोङने में 100%सफलता लाने में कुछ
दशक तो लगेगे ।
संविधान बनने से क्या सब पुरूष
आजाद हो गये ।या लोकतंत्र आ
गया ये लंबी लङाई है ।बेंथम
की बेटी से आज तक जारी।
सही है ।पर सच से आँखें
फेरना बिना धूप में जले छाँव में
रहकर भट्टे पर ईँट
पाथती गर्भवती जो पाँच साल
की बेटी पर नजर रखे और मालिक
मेट मजदूर सबकी निगाहों में जल
रही का ।।सच तो मत कुचलिये
दिल से एक हाथ दुआ और समर्थन
तो उठे ही ।।
ये समर्थन बहुत बङे रक्तदान
जैसा है ।कितने सच केवल इस के
अभाव में टूट जाते हैं ।
काम वाली बाईयों के नखरों पर
व्यंग्य परोसते ।।और दुखङा रोते
लंबे नाखूनों वाले हाथ कभी ।।
कल्पना करे कि शराबी मर्द पाँच
बच्चे ।।दस घरो का बरतन
दो बार माँजने दस किलीमीटर
रोज चलना!!!!!!
लेकिन विद्यासागर
जी की कोशिशे बेकार
तो नहीं गयीँ????
जो
भी दिख रहा है वह उन बारह
प्राणियों की वजह से ही दिखा है
वरना 8साल की लङकी बीस साल
के प्रौढ़ से ब्याह दी जाती थी ।
बंगाली तब ये मानते थे
कि जो लङकी स्कूल
जायेगी विधवा हो जायेगी ।।
और वैधव्य से बङा गुनाह कुछ
नहीं था जिंदा जलाकर नारियल
मार मार कर फोङ देते थे।
हम ज़मीन पर पेट के बल रेंगते
लोगों को जब तक नहीं पहचानते
तब तक ।।।बदलाव
नहीं आयेगा ।।
आये दिन ताश पीटते जुआ खेलते
मजदूर जब औरत की मजदूरी छीन
कर कूल्हा तोङ देते हैं तो भी वे
बच्चों के लिये उठ कर फिर काम
पर लग जाती है ।
ये एक भीङ है नेता के लिये जिसे
महज़ वोट गिनने हैं ।और
प्रति वोट सौ से पाँच सौ रूपये
पाँच बोतल से दस तक देशी शराब
भेजनी है और रैली जुलूस धरना में
एक दिन की दिहाङी यानि एक
सौ बीस रूपये प्लस भोजन के पैकेट
पर हैड दो ।बाँटने हैं ।।
बाकी जो भी योजनायें इनके नाम
पर आती हैं उनमें ।
मास्टरनी जी से प्रधानिन तक के
गहने कपङे और
मशीनरी की पौ बारह होती है ।
ये मंत्री जी की सलाहकार
समिति से ।ग्राम पंचायत तक
नहर है जिसका पानी टेल तक आते
आते सूख जाता है ।।
ये औरतें पीङा की चरम सीमा तक
पाँच लङके पैदा होने तक बच्चे जनने
को मज़बूर हैं ।
ये औरतें कच्चे फर्श पर दाईयों के
हवाले होकर बच्चे जनती हैं ।
बच्चा पैदा होने के तुरंत बाद
ही काम पर जाना होता है ।
ये इमारतों ईँट भठ्टों ।
मिलों कोयला खदानों । ब्रुश
फैक्टरियों ।खेतों । सङकों ।
पुलों । औऱ घरों में हर जगह हैं ।
दस घऱों का पोंछा झाङू बरतन
माँजना करती ।
सब्जी चूङी घास बेचती ये औरतें ।
क्यों नजर में नहीँ हैं ।।
ट्रैफिक जाम पर भीख माँगती ये
औरतें ।।बारह साल से
वेश्या बना दी गयीँ ये औरतें ।
गर्भाशय खिसकने की वज़ह से
बुढ़ापे में दुरदशा भोगती है।
प्रदूषण के बीच रहते
टी बी हो जाती है ।
जवानी में पति पिता भाई
की लाठियाँ जो खायी होती हैं वे
चोटें बुढापे में दुखती हैं ।
कुपोषण और श्वेतप्रदर
जैसी हजारों बीमारियाँ हो जात

परदेशी मजदूर पति एड्स तक दे
जाता है ।
और शामली मर गयी ऊपरी हवा से

गंडे ताबीज बेटा पैदा करने और
पति की मार पीट से बचकर रहने
को ।
ये जब बङे घरों में लॉन की घास
काटने जाती है तब सुख के पल ।
जब मेमसाब के किचन में सिंक पर
बरतन धोती हैं तब सुख के पल
समझती है ।
जो उतारन है वो आने जाने में
पहनती है ।
ये 70%भारत ह

वैदेही हूँ मैं

geet
Sudha Raje
ये वृक्ष हैं अशोक के सशोक मन
की शांति को ।
पुहुप ये चम्पका के है
न विश्व की विभ्रांति को
तू व्यर्थ कूकती अहे ।
अनल अगम निहारते
तू जारी जारी कोकिले!!! रसाल
द्रुम पुकारते।
©®¶
Sudha Raje
ये वाटिका है
योगिनी की साधना का कुंज है ।
तू आम्रपुञ्ज पालिते भ्रमर
सुमन
गुँजारते ।
तू जा री जा री कोकिले?!!!
रसाल द्रुम पुकारते ।
©®¶
Sudha Raje
न हेतुमान प्रेम हृष्टि प्रावृषा न
वेदना ।
निकष विपुल सनेह
युक्ति कामना न प्रार्थना ।
तू मारशर के गीत आ
गयी कहाँ उचारते!!!!
तू जा री जा री कोकिला
रसाल द्रुम पुकारते ।
©®
SUDHA RAJE
सदा हरित् ये वन ये मन न ऋतु न
राग त्याग है ।
तू अनंग रंग ये विहाग अग्नि राग
है ।
अपर्ण व्रत सुधा कनक फणिक वलय
विहारते
तू जा री जा री कोकिले
रसाल द्रुम पुकारते ।
©®¶©®
Sudha Raje
Dta/Bjnr
Apr
10 ·