Monday, 28 September 2015

सुधा राजे का अकविता :- "हमारे घर जन्मी है सोन-चिरैया "

तुम न थीं तो भी मैं थी बेटी,
तुम हो तो भी मैं हूँ बेटी '
क्योंकि तब मैं माँ की बेटी थी,
अब बेटी ममता की पिटारी लेकर मुझे वैसे ही बचाती है जैसे माँ,
मैं माँ थी जब बेटी थी ",,माँ के कुंतल स्नेह से सींचती सँवारती पदनख
आलता महावर मेंहदी रखती, माँ की साङी पर गोटा टाँकती, ''मैं अब भी माँ ही
बस हूँ जैसे और कुछ भी नहीं जैसे विश्व की सब लङकियाँ मेरी बेटी लगने
लगतीं है प्रायः मुझे, और मैं झगङती रहती हूँ उनके लिये अनजानी छायाओं
से, टाँकती रहती हूँ उनकी कमीजों पर बारूदी विचारों से भरी कविताओं के
सितारे और रचाती हूँ उनके हाथों में मेंहदी के रूप में अपनी जिजीविषा की
सुर्ख अभिलाषायों सपने भरोसे स्वयं पर और अविश्वास करना सिखाती रहती हूँ
हर आलता महावर और रंग रूप की परिभाषा पर, '
मेरी बेटियाँ हर नगर में हैं हर गाँव में हैं और चाहती हूँ वे कलम उठायें
मंच पर चढ़े माईक और कीपेड पर अभिव्यक्त हो अक्षरों में उतरें और सृजन
करे नयी सृष्टि के नये वास्तु का जहाँ रसोई घर में माँ और बेटी बहू ही
होनी जरूरी नहीं होगीं नहीं होगा केवल उनके ही हिस्से परिवार की हर गंदगी
साफ करने का दायित्व न ही, केवल उनकी ही होगी अग्निपरीक्षा और न ही केवल
उनको ही होना पङेगा बाबुल माँ के घर से विदा न केवल वे ही होगीं हर
'संस्कार की बलिवेदी पर ज़िबह "
मैं जानती हूँ ये सब एक दिन होकर रहेगा और चाहे वह सुबह देखने से पहले
मुझे नींद आ जाये "परंतु तुम सब देखना मेरी बेटियों ',एक दिन सचमुच आधा
गगन आधी धरा आधी हवा सिर्फ तुम्हारी होगी और तब ',
थाली बजाती हुयी घर घर हर बेटी के जन्म पर एक 'आवाज गूँजेगी मेरे ही
गीतों की कंठ कंठ से ""हमारे घर जन्मी है सोन चिरैया,, छत पे नाचे बाबुल
अँगनवा में दादी, द्वारे पे नाचे हैं बेटी के भैया "
©®सुधा राजे
शब्दशः मौलिक रचना
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Sunday, 27 September 2015

सुधा राजे की कविता :-"मेरी बेटी"

तुम न थीं तो भी मैं थी बेटी,
तुम हो तो भी मैं हूँ बेटी '
क्योंकि तब मैं माँ की बेटी थी,
अब बेटी ममता की पिटारी लेकर मुझे वैसे ही बचाती है जैसे माँ,
मैं माँ थी जब बेटी थी ",,माँ के कुंतल स्नेह से सींचती सँवारती पदनख
आलता महावर मेंहदी रखती, माँ की साङी पर गोटा टाँकती, ''मैं अब भी माँ ही
बस हूँ जैसे और कुछ भी नहीं जैसे विश्व की सब लङकियाँ मेरी बेटी लगने
लगतीं है प्रायः मुझे, और मैं झगङती रहती हूँ उनके लिये अनजानी छायाओं
से, टाँकती रहती हूँ उनकी कमीजों पर बारूदी विचारों से भरी कविताओं के
सितारे और रचाती हूँ उनके हाथों में मेंहदी के रूप में अपनी जिजीविषा की
सुर्ख अभिलाषायों सपने भरोसे स्वयं पर और अविश्वास करना सिखाती रहती हूँ
हर आलता महावर और रंग रूप की परिभाषा पर, '
मेरी बेटियाँ हर नगर में हैं हर गाँव में हैं और चाहती हूँ वे कलम उठायें
मंच पर चढ़े माईक और कीपेड पर अभिव्यक्त हो अक्षरों में उतरें और सृजन
करे नयी सृष्टि के नये वास्तु का जहाँ रसोई घर में माँ और बेटी बहू ही
होनी जरूरी नहीं होगीं नहीं होगा केवल उनके ही हिस्से परिवार की हर गंदगी
साफ करने का दायित्व न ही, केवल उनकी ही होगी अग्निपरीक्षा और न ही केवल
उनको ही होना पङेगा बाबुल माँ के घर से विदा न केवल वे ही होगीं हर
'संस्कार की बलिवेदी पर ज़िबह "
मैं जानती हूँ ये सब एक दिन होकर रहेगा और चाहे वह सुबह देखने से पहले
मुझे नींद आ जाये "परंतु तुम सब देखना मेरी बेटियों ',एक दिन सचमुच आधा
गगन आधी धरा आधी हवा सिर्फ तुम्हारी होगी और तब ',
थाली बजाती हुयी घर घर हर बेटी के जन्म पर एक 'आवाज गूँजेगी मेरे ही
गीतों की कंठ कंठ से ""हमारे घर जन्मी है सोन चिरैया,, छत पे नाचे बाबुल
अँगनवा में दादी, द्वारे पे नाचे हैं बेटी के भैया "
©®सुधा राजे
शब्दशः मौलिक रचना


सुधा राजे का लेख :- ""ये कौन पत्थरकार हैं???"""

कई बार हम इस बात पर आपत्ति जताते आये हैं कि """"""मीडिया में क्रिमिनल
का चेगरा तो ब्लर कर दिया जाता है """""किंतु अनेक छोटे बङे पत्रकार
अखबार और चैनल अकसर कहीं भी आती जाती बैठी खङी और खाती पीती पूजा करती
नाचती या झगङती "स्त्री का फोटो "
★बिना उसे बताये बिना उससे पूछे और राजी लिये कहीं भी छाप देते अपलोड कर
देते हैं और दिखा देते हैं """"


बारिश में भीगती लङकियाँ!!!!!!

अजी पत्रकार साब !! लङके क्यों नहीं दिखते????????

धूप से चेहरा ढँकतीं लङकियाँ!!!!!!!ओ जी फोटूगिर्राफर!!साब !!!! बुजुर्ग
और लङके भी तो मुँह ढँकते हैं धूप से!!! वे सब क्यों नहीं टिपते????

कहीं न कहीं ""का तकिया कलाम हकलाते र्रीपोर्टर्र लोग भी कैमरा वहाँ के
हालात पर कम युवतियों और महिलाओं पर ही फोकस करते रहते हैं अकसर????


किसी "सगे की मौत पर विलाप करती महिला को होश नहीं सुधबुध नहीं और नितांत
निजी भावनात्मक पलों की तसवीर बिना उसके चाहे मरजी लिये ""दिखाना??????


कहीं पति पत्नी में झगङा हो रहा है (इन टपोरी पत्रकरुओं का भी होता ही है
अकसर बीबी माता बहिन बेटी से झगङा तो) उस झगङे को भी तत्काल चटपटी खबर
बनाकर डाल दिया??,??????


कल को सारा समाज जो जो नहीं भी जानता उस लङकी उस स्त्री का जीना हराम कर देता है ।

ऐसे हजारों मामले आते रहे हैं कि ""मीडिया में इतना फोकस कर दिया
फोटोग्राफरों ने किसी लङकी या स्त्री को कि उसकी 'अस्मिता ही खतरे में पङ
गयी "

अकसर उन लङकियों को पता ही नहीं!!!!!!!

क्या लङकियाँ कहीं निकले आयें जायें ही नहीं?????

पूछो पत्तरकार महोदय जी से उनके के परिवार की औरतों से कि अगर तुम्हारा
भी फोटो 'चाट खाते 'ब्यूटीपारलर जाते 'छत पर बाल सुखाते बारिश में मजबूर
बाईक या कार से उतरकर पेङ या टीनशेड के नीचे खङे होते या कॉलेज स्कूल
अस्पताल कहीं भी आतो जाते 'सिनेमाहॉल या कैंटीन ढाबे होटल में से,,,,,,,

क्लिक करके "अपलोड कर दें और हजारों लोग कमेंट्स करें तो पत्तरकार साहिब
को लगेगा अच्छा?????

क्यों?
केवल इसलिये कि स्त्री ""आई कैचिंग मटेरियल बना डाली है मीडिया ने,??????

तो हैं न हाजिर हजारों मॉडल्स!!!!!
दाम दो फोटो लो?????

कई लोगों के तो फोटो "महिला मजदूरनी का झोपङा और वर्कप्लेस पर दूध पिलाते
फोटो चोरी से???
गंगास्नान पर नहाती महिलाओं के फोटो,????

छिः छिः छिः
डूब मरो चुल्लू भर पानी में!!!!

देश में अपराध है अव्यवस्था है और सजनात्मक उपलब्धियाँ है उनके लिये न
दिमाग है न समय,,,

तो ऐसे लोगो को कहे क्या?? भँडवा या दलाल?
जो बिना इजाजत किसी स्त्री के निजी पल सार्वजनिक करके रोजी रोटू कमाता है????
लानत्त, धिक्कार


एक बात की गारंटी है कि अगर पता चल जाये उन सबको तो """पत्तरकार को ""सदा
को बेकार बेगार कर डालें वे सब """

किंतु नहीं
अकसर लङकियाँ जिनके फोटो बिना इजाजत खीचे जाते हैं उनको पता ही नहीं होता '

और होता भी है तो डरी सहमी या घबरायी या अनभिज्ञ और धोखे में होती है ।

कई स्त्रियों को पता ही नहीं कि उनका फोटो "नेट पर खबर में प्रिंट में
टीआरपी और कमेंट का मुद्दा है ।

ये एक अपराध है
और ऐसा हर फोटोपत्रकार और इसे छापने वाला अखबार मीडियाचैनल और सोशल
मीडिया एकाउंट धारक ""एक अपराधी है ""
जागरूक प्रत्येक नागरिक का कर्त्व्य है कि महिलाओं का जीवन उनकी
"प्रायवेसी उनका मौलिक हक है "और बिना उनकी मरजी के इस तरह के फोटो खीचना
चुराना छापना दिखाना शेयर करना गंभीर अपराध माना जाना चाहिये ।

ऐसे लोगों पर तत्काल काररवाही होनी चाहिये ताकि आप सबके परिवार की
महिलाओं की गरिमा और प्रायवेसी भी सतत सुरक्षित रहे ""
©®सुधा राजे


Saturday, 26 September 2015

सुधा राजे का लेख :- "जीवन जीने के लिए है"।imp

जो दुःख से घबरा जाये वह न तो पुरुष कहलाने लायक है न ही हिन्द की नारी """"""
क्योंकि दुःख केवल एक वैचारिक अवस्था है,,, और वह योगी जो दरिद्र है खूब
हँस सकता है ',परंतु एक भोगी जो हर तरह से साधनवान है जरा पत्नी या
प्रेमिका रूठने या नौकरी में सस्पेन्ड हो जाने या धन की हानि या परिजन की
मृत्यु से घबराकर आत्महत्या कर डालते हैं!!!!!!!!!
कायर हैं वे सब
क्लीवता पौरूषहीनता या स्त्रीत्वविहीनता नहीं वरन "साहसहीनता " का ही
दूसरा नाम 'है ।
आत्महत्या
मतलब ईश्वर की बनाई एक अद्वितीय रचना का अंत करने का महापाप!!!
जो तुम बना नहीं सकते उसे तोङने का हक तुम्हें नहीं है ।
जीवन चाहे आप स्वयं का समझते हो अपनी देह अपने जीवन का स्वामी परंतु आप
हैं नहीं ',,,,
क्योंकि जो चीज आपने खरीदी नहीं बनाई नहीं जिसका मूल्य भी नहीं चुकाया वह
आपकी कैसे??
आप उस मुफ्त की मशीन तक के मालिक नहीं हो सकते जो केवल साईकिल में हवा भरती है!!!!
तो उस जटिल महामशीन के स्वामी कैसे हो सकते हो बिना मूल्य चुकाये जिसका
आप एक नाखून , एक बाल तक बनाना नहीं सीख पाये आज तक??????
इसका स्वामी है आपका ईश्वर आपकी माता आपके पिता आपकी पत्नी आपके बच्चे आप
पर आश्रित आपके परिवार देश समाज के वे सब लोग ""जिन जिन को आपके न होने
पर '''बुरा दयनीय और दुखी जीवन जीने को विवश होना पङेगा """

क्या आप मर जायें और संसार में एक का भी जीवन दुखी न हो ऐसा हो सकता है????
कदापि नहीं,,,
क्योंकि यदि आपका परिवार है तो परिवार की आशा और भविष्य वर्तमान के अनेक
छोटे बङे कार्य सुख दुख आपके हवाले हैं ।
और यदि आपका संसार में न कोई मित्र है न परिवार न शुभचिंतक तो भी,, चूकिं
आपको ईश्वर ने बनाकर भेजा है भारमुक्त करके तब तो आप और भी अधिक विशद
उत्तरदायित्व लेकर आये हैं उन सबके प्रति जो जो अनाथ हैं दयनीय हैं जिनका
कोई रक्तसंबंधी या परिवार मित्र या शुभचिंतक नहीं है, 'वे केवल आपकी ही
बाट जोह रहे हैं । उनके लिए ही ईश्वर ने आपको बनाकर भेजा है । जाकर
देखिये कुतना कार्य शेष है!!! आपको कई जन्म लेने पङेंगे तब पूरा होगा ये
महाकार्य, और इसके लिये ये देह रूपी यंत्र बीमार या कमजोर नहीं चल सकेगा
तो
आपका ही सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह मशीन पूर्ण स्वस्थ और सुचालित हो
उसके सब अंग सही सही कार्य कर रहे हों ।
आप इस देह रूपी यंत्र के केवल चालक मात्र है यह आपको केवल कर्त्तव्य पूरे
करने को सौ सवा सौ साल के पट्टे पर मिले 'संयंत्र की ही भाँति है ।आप रोज
व्यायाम नहीं करेंगे तो, रोज सही और संतुलित ढंग से चलना बैठना सोना खाना
नहीं रखेंगे तो, यह संयंत्र खराब हो जायेगा, 'आप इसको चलाना तक तो जानते
नहीं!!!! सीखने में ही सात से सत्तरह साल लग जाते है ।
देखो किसी नट को, एक्रोबेट को, किसी जिमनास्ट को, किसी धावक को, मल्ल को,
वह इसी पिलिपले रहने वाले शिशु असहाय शरीर को चलाना सीख कर ही कलाकार
खिलाङी नर्तक नट और जिमनास्ट या तैराक मल्ल या एक्रोबेट बना है ।
इस देह को जीतो, 'इसे अपने इशारों पर चलाना सीखो, यह खूब जानता है कि सही
स्वामी का कैसे आज्णापालन करना होता है ।
बढ़िया शरीर पैदाईशी नहीं मिलता निर्माण करना पङता है पाँच साल की आयु से
ही सीखने लगते हैं संगीत नबत्य युद्ध और खेल "'''तो क्यों नहीं इसे ढाल
लेते अपनी आवश्कताओं के अनुरूप ऐसे भी तो लोग है जिन्होने भूख नींद वासना
कामेच्छा और निर्बलता पर विजय पाकर "जितेन्द्रिय की उपाधि पाई, उनको न
किसी वस्त्र के आडंबर की आवश्यकता रही न लेप और आभूषणों की उनकी तो देह
ही दिगंबर सुंदर निर्विकार हो कर रही ',
प्राण इसका "रिचार्ज वाऊचर है चार्ज्ड बैटरी है 'और यह तब तक शिथिल नहीं
पङती जब तक कोई "यह न सोचे कि मैं तो इससे अच्छा कि मर जाऊँ,,,
क्यों सोचो फिर मरने की?
जिओ
जब अपने लिये जीने का बहाना न रहे तब ही जीवन का असली अर्थ समझ में आता
है, 'और यह भी समझ में आता है कि पीङा जब मुझे इस बात पर इतनी हुयी तो
मुझसे और भी जो वेग हैं वे ऐसी ही पीङा और इससे भी भयंकर दर्द दुख कैसे
झेलते होंगे ',
कुछ लोगों से मिलो तो सही जिन्होने जीवन का वरण किया, अरे मरना तो बङा
आसान है 'नब्ज काट लो फाँसी लगा लो पेङ के नीचे कूद पङो जहर खालो,
'""""""किंतु जीना कितना कठिन!!!!!! हर पल साँस लेनी पङती है, हर पल पेट
से हर कोशिका तक रक्त और ऊर्जा ऑक्सीजन और पोषण का प्रवाह जारी रखना पङता
है ।तीन मिनट को साँस न मिली और जीवन खत्म!!!!!!!!
जीकर दिखाओ, 'है हिम्मत तो जिओ 'मर तो बाद में भी सकते हो पहले ये सोचो
कि क्या क्या लाभ इस सवा सौ साल की आयु का संसार को तुम दे सकते थे और
दिया नहीं!!!!! क्या क्या ऐसा कर सकते थे कि कुछ लोग तो सुखी हो जाते!!!!
करोङ रुपया देकर भी अगर जीवन मिले तो करोङों लोग जीवन खरीदने को तैयार
बैठे है अपना और अपनो का ',कोई भला स्वस्थ देह के होते हुये गरीब कैले हो
सकता है????
ये मकान किसके लिये? शरीर के लिये? और ये कपङे गहने लेप चूर्ण और रंग??
यब के सब इसी तन इसी देह के लिये???
तो ये सब तो एक मशीन की एसेसरीज ही हुयी न??
सोचो जब कवर और रख रखाव जिस मशीन का ऐसा है तो वह मशीन कितनी कीमती होगी????
अरबों के हीरे मिलकर भी एक मनुष्य का सवा सौ साल का स्वस्थ जीवन नहीं बना सकते तो?
यह देह हो गयी अरबों की और आप अरबपति खरबपति नील शंख और पद्म पति!!!!!
इतने धनवान होकर भी आपको इस कीमती देह का क्या निकृष्ट प्रयोग समझ में आया??
अरे यह शरीर ही तो पूँजी है नट की खिलाङी की धावक मल्ल और योद्धा की
कलाकार की और नर्तक की गायक की और वादक की!!!!!!!

इस शरीर का जो ड्राईवर है सोचो फिर वह कितना गुणवान होगा 'मन 'ये मन जिसमें
हाथ पाँव कमर यौनांग और कंठ नहीं
बल्कि
विचार बुद्धि सोच चिंतन आविष्कार शोध विश्लेषण औऱ विद्या की शक्ति है!!!!!!!
वह तो शरीर रूपी महासंयंत्र के सबसे सुंदर कक्ष में बैठा उसका 'संचालक है "
अगर मन ही मालिक बन गया तो आप तो गये काम से '
मन मनमानी करते करते प्रबंधक से कब स्वामी बनकर देह को हङप जाये पता न
चले यदि ये "सही नियंत्रक यात्री ''आत्मा जो इस संसार की यात्रा पर आयी
है अपना दायित्व भूलकर रमने लगे यंत्र के क्रिया कलाप के सुख लेने में!!
आपने कार ली या मोटरसाईकिल या कंप्यूटर "क्या उसकी चेसिस और हार्डवेयर को
ही रोज कोलीन से चमकाकर बैटरी चार्ज करके ईधन भरकर रखते रहोगे????
या इससे कुछ काम भी लेना है??
मनोरंजन जिस जिस चीज से होता है वह तो "मैनेजर का आनंद है '"'
वह तो उस ड्राईवर का आनंद है जो आपकी कार आपकी बस रेलगाङी चलाते समय जोर
जोर से रेडियो ऑडियो वीडियो पर कुछ संगीत सुन रहा या मोबाईल पर देख रहा
है ',सावधानी हटी और दुर्घटना घटी मन रूपी एक मनोरंजनवादी चालक को मन की
करने दोगे तो होगा यही वह ""गाङी ही ठोक देगा कहीं बीमार कपेगा चटोरेपन
से कभी आलस में गाङी चलायेगा देर करेगा हर काम में कभी स्पीड ज्यादा रखकर
गाङी ही तोङ डालेगा ।
तो ""आत्मा रूपी यह पट्टेदार यात्री अपने माल यानि गाङी रूपी देह की सही
सुरक्षा चाहता है तो मन रूपी संचालक पर काबू रखे ',
ताकि ऐसा नियम बना रहे कि जो जो मन चाहे वह सब तभी करने दिया जाये जब वह
सब करना गाङी को नुकसान नहीं दे रहा हो और आत्मा रूपी पट्टेदार मालिक
यात्री को दिये सवा सौ साल के समय के भीतर उस पर सौंपे गये दायित्व भी
पूरे हो सकें ।
देखो, 'ये शरीर सिर्फ तीन दशक के लिये मिला शंकराचार्य को ',विवेकानंद
को, दयानंद को, और उन सबने कितने कम समय में कितने सारे कार्य कर
डाले!!!!!
यही शरीर आपके पास है ',क्यों इसका बेहतर उपयोग नहीं, 'ये स्त्रीपुरुष का
प्यार ये बङी हवेली जेवर कपङे वाहन की होङ,,,,,, अपनी जगह तक सीमित
अर्थों में ही तो, 'आपके मोबाईल कंप्यूटर या बाईक की ऐसेसरीज ही तो
हैं!!!! ये ध्येय नही!! ये साध्य नहीं!!! ये केवल संसाधन हैं ।
साध्य तो वही ""चुनौती है जो दाता परमात्मा ने एक विचित्र संयंत्र एक
चालक सहित देकर भेजा कि जाओ और कर दिखाओ इस संसार में ; जो जो कुछ वहाँ
देख समझकर समझ पाओ कि मानवदेही होने को नाते करना तुम्हारा सही उपयोग
है!!
तो क्या किया आपने परमात्मा को बताने के लिये!???
अपने पीछे रह गये लोगो में चर्चा को छोङ जाने के लिये,??
कौन कहता है 'मर गये कबीर? कौन कहता है मर गये नानक,, अरे मर तो वह रहा
है जो जीवन की आपाधापी में केवल मशीन ही धो पोंछकर रोज सजाये जा रहा है
बिना इसका सही उपयोग करे ।
ये दस उंगलियाँ 'दो नेत्र एक पूरी ज्ञान और कर्म की श्रंखला पर काबू पाने
को हर पल स्मृति रखता आविष्कारक मन और इसमें भी आपको अगर लगता है कि देह
का अंत ही सही राह है तो डरपोक कायर क्लीब और कृतघ्न शब्द भी काफी नहीं
आपके लिये ',दुख तो सब पर पङता है कोई बह जाता है कोई ',सह जाता है,
'किंतु मानव वही सच्चा है मानव जो न बहे न केवल सहे अपितु अपना दुख
बिताकर बिसरा दे और दूसरों के दुख का सहारा बनकर बाँह गहे!!!
आप युवा हैं या वृद्ध स्त्री हैं या पुरुष अगर इस सबको जानसमझ कर भी मरना
ही चाहते हैं तो मर जाईये ',पहले उन सबको मार डालिये जो आपके पीछे दर्द
दुख और यातना का अभिशप्त जीने वाले है । उस माता को मार डालिये जिसने नौ
माह कोख में रखा जमाने के सौ सौ ताने दुख कलह सहकर पाला पोसा इस आशा में
कि बेटा या बेटी एक दिन बङे होकर सहारा बनेंगे ',।
और इतने पर मरना है तो एक आखिरी निवेदन है कि मरिये चलो किंतु ये देह जब
आप खत्म करना ही चाहते हैं तो जैसे फालतू सामान दान कर दिया जाता है जब
गृहस्वामी के काम का नहीं रहता ।
दान कर दीजिये देश को समाज को दीन दुखी दरिद्र अनाथ और मरणासन्न जीवन
जीते उन लोगों को जो जीवित रहने की आशा में 'रोज मरते हैं ।
आप को कुछ तो ऐसा आता होगा ही जो किसी के सेवा कार्य में लग जाये? सोच लो
कि अब आप मर गये ।ये देह आपकी नहीं आपने देश को दान कर दी ।
माता पिता परिवार या समाज के दुखियों को दान कर दी ',अब आप इसके अधिकारी
नहीं इस देह को सैनिक की भाँति मजबूत रखकर शहीद की भाँति तत्पर रहना है
जीवित रहकर सेवा करने और देश हित मानवहित में आवश्यक हुआ तो देहोत्सर्ग
करने को ।
आप अकेले हैं? तो किसी और को जो आपसे अधिक दुखी और अकेला हो का साथ
दीजिये बिना अहसान जताये ।
दुख और अकेलापन दोनों ही बाँटने से आधा रह जाता है '
"सुधा "मनुज की देह में
रोम रोम हरिवास
अणु अणु में ब्रह्मांड शिव
शक्ति, अनत प्रति श्वाँस

©®सुधा राजे


Friday, 25 September 2015

सुधा राजे का लेख :- ग्राम्यजीवन और शाकाहार ::-- पुनः करें विचार

ग्राम्यजीवन और शाकाहार,
पुनः करें विचार
(सुधा राजे ',का लेख)
::::::::::::
:::::::::::::::::::::
आप चाहे किसी भी धर्म से हों या किसी भी क्षेत्र से 'प्रकृति के प्रति
आपका दायित्व कम नहीं हो जाता केवल इसलिये कि आपका मजहब आपको माँसहार की
आज्ञा देता है, विज्ञान की तमाम शोधों के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका
है कि पृथ्वी पर पर्यावरण संतुलन बुरी तरह बिगङ रहा है ।और इसके बिगङने
के पीछे सबसे बङा कारण है मानव का लालची स्वभाव, 'पशुओं का जीवन
अन्योन्याश्रित होता है ।आप कभी डिस्कवरी चैनल देखते होगे तो यह साफ समझ
में आता है कि हिंस्र कहे जाने वाले पशु भी केवल बहुत भूख लगने पर ही
शिकार करते हैं और पेट भरा होने पर माँसाहारी और तृणपत्र जीवी सब एक ही
मैदान जलाशय में आमने सामने विचरते आराम करते रहते हैं ।किन्तु मनुष्य?
वह तो भूखा न होने पर भी हर रोज पूरे विश्व में बङे पैमाने पर हिंसक रहता
है पशुओं के प्रति भी और प्रकृति के प्रति भी!!! मनुष्य ने एक तो वैसे ही
अपनी देह और परिवार की आवश्यकता की तुलना में बहुत बहुत बङे मकान इमारतें
सङकें बनाकर जंगल के जंगल साफ कर डाले जिससे अनेक पशु तो पहले ही लुप्त
हो चुके हैं ।अब जो बचे खुचे हैं उनको वह चमङे माँस और हड्डी रोयाँ और
खून प्राप्त करने के लिये रोज मारता रहता है । समंदर के जलजीव इतने खाये
किवअब मोती वाली सीप का होना दुर्लभ हो गया, जंगली पशुओं का रोमांच के
लिये इतना आखेट किया कि शेर चीते और सिंह दुर्लभ हो गये, ।
समय के साथ हर चीज का संशोधन होता रहता है, मनुष्य ने खेती और बागवानी
जबसे सीखी है 'तब से जंगल ही मिटते गये, और पशुओं के रहने कि लिये बहुत
कम जगह रह गयी, ये भी तेजी से फर्नीचर और टिंबर की जरूरत के अलावा ईधन के
लिये बहुत तेजी से खत्म की जा रही है ।यही वजह है कि आज "वननर "यानि बंदर
नगरों में ही रहने लगे हैं और जंगल के करीब के गाँवों में हिंसक पशु
शिकार करने लगे हैं मनुष्य का । नदियाँ पहले ही नगरों का मलमूत्र गटर
सीवर मिलों का गंदा नाला और नगर भर का कचरा डालकर प्रदूषित की जा चुकी
हैं ।ऊपर से बाँध बनाकर नदी के प्रवाह रोक दिये गये हैं ।तो जंगली पशु
प्यास के कारण जब बेहाल होते हैं तो नगरों गाँवों की तरफ भागते हैं और
हमलावर समझकर मार डाले जाते हैं ।
मनुष्य मावव चोरों से रखवाली के लियेअनुपयोगी जानवर जो रोटी बिसकुट खाता
है दूध पीता है ऐसा कुत्ता पालता है!!!! और गाय भैंस बकरी भेङ ऊँट जो
गरम वस्त्र दूध और मावा पनीर दही घी माखन मट्ठा छाछ क्रीम मिल्कपाउडर '
और अनेक तरह की मिठाईयों के लिये 'खोआ देते है उनको खा जाता है???
कल जिस भारतदेश में दूध दही घी घर घर मामूली बात थी आज 'वहीं ईदुलफित्र
पर शीर और खीर बनाने को ""तीन सौ चार सौ रुपये वीटर पर भी दूध नहीं
मिलता!!!!!!
जिस भारत में घर घर मेहमानों को दूध का आधी लीटर वाला गिलास और गुङ देकर
स्वागत किया जाता था 'बच्चा भोर ही माखन रोटी माँगता था हर व्यक्ति की
थाली में घी चुपङी रोटी होती थी "अगर घी कदाचित नहीं लग पाया तो उसे
"रूखी सूखी "रोटी कहकर दुःख दिखाया जाता था ''आज लगभग अमीर गरीब सबकी
रोटी ही "रूखी सूखी हो चली है!!!!
आज चावलों में घी नहीं पङता तेल से छौंकना मुहाल है दाल घी को तरस गये
हैं बच्चे!!! अकसर आधुनिक परिवारों में तो 'घी कभी आता ही नहीं गरीब की
तो फिर कहनी ही क्या है!!
हलवाईयों के घर जाकर देखें तो अधिकांश मिठाईयाँ "नकली "मावा नकली बेसन
नकली घी नकली पनीर और नकली दही से बनने लगी है ।
लोग अब दीवाली दशहरे राखी होली गणेश पूजा, शिवरात्रि पर भी मिठाई खरीदने
से कतराने लगे है ',ये उस देश का हाल है जिसमें कोई राहगीर भी पानी पीने
घर के द्वार पर ठहर जाता तो हमारी दादी नानी काँसे पीतल की थाली में चार
लड्जू चार पेङे रखकर कँसकुट के लोटे और फूल के गिलासों में जल भिजवातीं
थी!!!!! बिना मिठाई मुँह में डाले कोई मेहमान पानी पीता ही नहीं था!!!
आज बच्चों के जन्मदिवस पर सौ दो सौ ग्राम का केक और नन्ही नन्हीं चॉकलेट
टॉफी ही मिठाई की जगह बङी नेमत बन गया है!!!
उसपर भी क्या भरोसा है कि केक में चॉकलेट में मिला क्या क्या है?
नवजात बच्चे जिनकी माता की छाती में दूध नहीं उतरा क्योंकि नौ माह तक
माता गर्भिणी को दूध दही पोषाहार मिला ही नहीं रक्ताल्पता की शिकार है तो
"नवजात शिशु क्या पीये??? पशु तो खा गये माँसभक्षी और बाजारवादियों ने
मिलावटी मिल्क पाऊडर बाजार में "दूध के नाम पर बेचना शुरू कर दिया!
आखिरकार मिल्क पाऊडर भी तो दुधारू पशुओं के दूध से ही बनेगा न? अगर एक
देश में हरा चारा और पत्ती है तो वहाँ बहुत से पशु लगभग हर घर में एक गाय
एक भैंस एक बकरी पाली जा सकती है तो ',जिन देशों में चारा नहीं वहाँ के
बच्तों बूढ़ों जवानों को डिब्बाबंद दूध और दूध से बने पदार्थ निर्यात
किये जा सकते हैं । माँसाहार जिन मानवों के लिये अंतिम आहार नहीं है मतलब
जब कि वे अन्न फल सब्जी दूध सब खाते ही हैं तब तो, उनका चटोरापन ही कहा
जायेगा न!!!! वनवासी भी जो कंदमूल और बाँस वृक्ष के तने और पत्ते खाते
हैं माँस को अंधाधुंध नहीं खाते, मजबूरी होने पर विकल्प न होने पर भी
क्या भूख से बेहाल पिता माता बङा भाई बहिन अपने ही बच्चों को नरम नरम
ताजा गोश्त और खून हड्डी के लिये खा सकते हैं? नहीं क्योंकि वे नरनारी के
अपने बच्चे है, तो लहू माँस खून की चटोरी के लिये हँसते किलकते किसी
मेमने बछङे कटङे पाङे या पशु की हत्या क्यों? क्या भूख से मरने की स्थिति
रह गयी थी?? अगर ऐसा ही था तो परिवार का एक सदस्य मार के खा लेते फिर
दूसरा, क्योंकि ये सब पशु भी हम मानवों के सहजीवी हैं हमारा परिवार, '
अगर स्वाभाविक मृत्यु से भी पशु मरता बै तो भी हड्डी चमङा और अनेक उपयोगी
चीजें तो देकर ही मरता है ।
वैसे भी पशुओं की आयु मानव की तुलना में कम है ।
इनसे आठ दस साल दूध लिया जाता है और आगे की संतति ।
आज पेट्रोल डीजल की गंदी हवा ने क्या हालत पर्यावरण की कर डाली है सब
जानते है "बैलगाङी घोङागाङी भैंसागाङी ऊँटगाङी और उनसे खेती ढुलाई आज याद
कीजिये 'न तब जमीन धँसती थी न खाद की कमी से रासायनिक खादें डालकर खेत
बंजर होते थे, न तब कभी सवारी के लिये प्रदूषण पहली चीज थी ।
हमें प्राकृतिक चक्र का अर्थ समझना होगा, ट्रैफिक जाम में घंटों धुआँ
पीने से अच्छा था बस जरा सा धीरे धीरे चलना ।
ग्रामीण जीवन भारत की रीढ़ रहा है और ग्राम्यजीवन शैली ही प्रकृति की
सर्वोत्तम मित्र संस्कृति रही है ।
भारत का कृषक ग्रामीण कभी किसी का दास नहीं रहा, क्योंकि उसके पास दूध था
और के लिये पशु थे 'उसके पास बैल थे और सामान ढोने खेल जोतने के बैलगाङी
हल और पटेला थे ।
उसके पास गोबर की खाद थी और पेङों की हर शरद में होने वाली काट छाँट से
उपलों कंडों से प्राप्त ईधन था, 'चार महीनों का गोबर खेत में और आठ का घर
लीपने और चूल्हा जलाने में, '
रोज धुआँ करने को पत्तियाँ और रोज खाने को बेर जामुन अमरूद जंगलजलेबी केला नारियल '
छप्पर के नीचे पशु चरते और छप्पर के ऊपर तोरई लौकी कद्दू परवल सेम पेठा
लोबिया ग्वाँर और खीरा फूट करेला कचरिया के फल सब्जी थे ',
बिना आर्सेनिक्स और फ्लोराईड वाले जल की साफ नदियाँ और कुयें थे औऱ पानी
रखने को कुम्हार के मटके पीतल के गगरे और सिंचाई को रहँट थे ।
गाँव का कृषक स्वावलंबी था ।
पीपल के नीचे मंदिर के आँगन में पंडित जी थे और पढ़ने को लकङी की पाटी
कलम और चूने की खङिया थी ।
लिखने को सियाही और सुनने को नौटंकी रामलीला तमाशा मेला बाजा माच और जात्रा थे ।
मिट्टी के घर मिट्टी की खपरैल और मिट्टी की ईटों के खडंजे से कभी जल कम
रहने देने वाला वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम था "
नहाने को "पङोह मिट्टी मुलतानी मिट्टी 'हिंगोटे के फल रीठा 'और पहनने को
हथकरघे का गाढ़े का लट्ठा खादी, ।खेलने को मलखंब कबड्डी झूले रस्सी दौङ
कुश्ती अखाङे और तीज त्यौहार के हाँडी दही के चुनौतियों के जोश थे । गाने
को लोकगीत बजाने को ढोलक मँजीरे बाँसुरी अलगोजे और सारंगी थे
आज वे सब चीजे छूट गयीं और रह गया हर तरफ माँसाहार, 'प्लास्टिक, कंक्रीट,
शोर और कमरे में बंद टीवी कम्यूटर मोबाईल तक सिमटी दुनियाँ ।
लोग घरों में गमले रखते हैं लॉन बनाते हैं किंतु "उगाते है कैक्टस फर्न
क्रोटन और तमाम सजावटी पौधे!!!
भारतीय जीवन शैली में रसोई के जल से सिचिंग गृहवाटिका में "टमाटर धनिया
मिर्ची खीऱा बैगन पालक के साथ आँगन में तुलसी करीपत्ता और अजवाईन का पौधा
रहता था आगे चबूतरे बरामदे के सामने केला नारियल आँवला आम अमरूद शरीफा
लीची लगाने की परंपरा थी '
द्वार के पास ही 'अकौआ लगता था जो कि सब जानते है जोङों के दर्द की
बढ़िया दवा है, 'घमरा नामक पौधा तत्काल रक्त बंद कर देता है लोग खप्पर
में लगाकर रखते थे "'
चिङियों के लिये पाँच पूली मक्का ज्वार बाजरा धान गेहूँ हर घर के बाहर
भीतर मुँडेर से बँधी रहती थी ।
प्रतिमायें कच्ची मिट्टी की होती थी या नदी का प्राकृतिक पत्थर ही शंकर
सालिगराम गोमती लक्ष्मी 'होता था ।मंदिर में सभा सम्मेलन के बहाने हर
पूर्णिमा प्रदोष एकादशी और तीज त्यौहार को लोग हर दबसरे व्यक्ति के
समाचार से सजग रहते थे । गाँव में हाट लगतीं थी और पास दूर के छोटे बङे
व्यापारी मिलजुलकर सर सामान बेच खरीद लेते थे ।
सूरज की रौशनी में सब काम निबटा कर हर चौराहे पर हर द्वार पर दिये जला
दिये जाते थे ',मंदिरों में ज्येतिस्तंभों पर सैकङों दीप रखकर लोग "कथा
कहानी सुनकर सोते थे ।
सोने को घासकास की रस्सी से बुनी खटिया थी और बिछाने ओढ़ने को हथचरखे
करघे के पुराने कपङों से बनी दरी कथरी और कंबल 'खेत के कपास से बनी रजाई
और 'क्या चाहिये था "स्वाबलंबी स्वाभिमानी ग्रामीण को?
नगरों का जीवन ग्रामों पर आश्रित था किंतु गाँव गाँव बनी बुजुर्गों की
पंचायतें गाँव के झगङे गाँव में ही सुलझा लेती थी ।
नारियों के स्नान घाट पर पुरुष नहीं जाते थे और गाँव की बेटी सबकी बहिन
बेटी होती थी ।
शराब माँस गाँव के लिये "पाप थे 'और भाँग के सिवा कोई नशा होली तक पर
नहीं करता था ।
रंग थे पलाश और सूखे फूलों के 'उबटन थे हलदी बेसन चंदन के और झुंड में
रहकर परस्पर श्रम में हाथ बँटाना सबका कर्त्तव्य था 'कोई बुजुर्ग कहीं
वृद्धाश्रम नहीं रहते थे न ही अनाथालय में कोई रहता था, दान सब देते रोज
ही गौ ग्रास काक ग्रास और मंदिर में जा ठहरे यात्रियों का ग्रास निकलता
था । बुद्धिजीवियों से श्रम नहीं करवाया जाता था और बच्चे बङों के पाँव
दबाकर ही सोने जाते थे ।
युवा दिन में शयन नहीं करते थे और दैहिक सौष्ठव बनाकर रखने की होङ रहती
थी पौरुष का अर्थ स्त्री रक्षा ग्रामसेवा खेती करना और व्यसन से दूर रहना
माना जाता था । कन्या गर्भिणी और विधवा को संरक्षण दिया जाता था ।
गाँव में ही सिलाई कढ़ाई बुनाई के प्रशिक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी दादी से पोती
तक चलते रहते थे महिलायें अपने कपङे स्वयं ही सीं लेती
©®सुधा राजे


Thursday, 24 September 2015

सुधा राजे का लेख :- बिहारनामचा।

बिहारनामचा
":'
हिन्दू बौद्ध ईसाई और मुस्लिम
इन सबके इतिहास से बहुत पीछे बहुत गहराई से जुङा है बिहार ।
कभी भारत का गौरव रहा बिहार इतना पीछे धकेला गया कि आज बिहार के बाहर
"उँह बिहारी "कहकर बहुत हेयता से दूसरे अतिवादी क्षेत्रवादी देखते हैं ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिन लङकों की बङी आयु रंगरूप या कम कमाई या
पहली दूसरी पत्नी मर जाने या विवाह टूट जाने पर शादी नहीं होती ''वे
पहाङन 'बंगालन 'नेपालन या बिहारन जिन्हे वे अशिक्षित श्रमजीवी लोग
""पुरबिनी कहते हैं "।
को कुछ हजार रुपयों में वधूमुल्य चुकाकर ले आते है विवाह के नाम पर जीवन
भर बँधुआ मजदूर मुफ्त की वेश्या और मुफ्त की नौकरानी की तरह रखते हैं ।
न सम्मान होता है परिवार समाज और पति की नजर में न ही कोई दया माया मोह
प्रेम अधिकार ।
जो बच्चे भी अगर हुये तो पति की ही संपत्ति और आगे को अघोषित दास होते हैं ।
हर साल हजारों मजदूर खेतों और मिलों कारखानों फैक्ट्रियों में काम करने
मानसून के निकट होते ही बिहार से बाहर निकल पङते हैं मुंबई कलकत्ता
मद्रास पंजाब दिल्ली जयपुर अजमेर """""जहाँ कहीं भी सूचना मिलती है काम
की ।
एक दो आँखों देखी घटना है कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में ठसाठस बैठे बिहार
के लोग रोजगार की तलाश में जो चले जा रहे होते हैं अजनबी मंजिल की तरफ
उनको हाथ पकङ कर बिचौलिया ठेकेदार अलग अलग कार्य में लेबर सप्लाई के लिये
बीच में ही किसी भी स्टेशन पर उतार लेते हैं और कई गुटों में इन मजदूरों
को उतारने के पीछे झगङा भी हो जाता है कि ये मजदूर पहले मैंने छेके ',तो
मेरे हुये ।
मामूली मेहनताने पर ये मजदूर मिलों कारखानों निजी घरों और खेत खलिहानों
में काम करते है ।
हर नया मालिक इनको बेकार बचे कपङे पहनने को देता है और बस यूँ ही कहीं
पङे रहने भर को ठिकाना देकर नौकरी करता है ।
होली के ठीक पहले ये मजदूर अपने देश लौटने लगते हैं ।
तो भी मालिक को सौ सौ वादे करके कि वापस आकर फिर काम करेंगे ',कुछ तो
लौटते हैं और कुछ उम्दा रोजगार की तलाश में फिर नयी जगह चल पङते हैं ।
ये नई मंजिल कई बार घर मकान ढोर गिरवी रखकर अरब देश या थाईलैंड या खाङी
देश भी होते हैं ।
बिहारी हर देश हर प्रोफेशन हर जिले में मिलेगा ',
लेकिन सौ टके का सवाल है कि अपनी माटी अपनी भाषा अपने प्रदेश से जी जान
से प्रेम करने वाला पूरबिया आखिर क्यों विवश हो जाता है घर में माँ पत्नी
बच्चे बहिन भाई त्यागकर बाहर देश परदेश भागने को??
ये कारण है जातिवाद की अफीम पिलाकर मजहब की मदिरा में डुबोकर 'बिहार को
रोजगार न मिलने वाला प्रांत बना डालने वाले नेता और प्रशासक, 'आज भी
बिहार दक्षिण से अधिक हरा भरा और खनिज संपदा संपन्न है और संपन्न है माटी
नदी पहाङ मैदान की विविधता से ',न मरुस्थल की तपती धूल न ही पठार का
वीराना ',जहाँ तक नजर जाती है सब हरा भरा और ',सांस्कृतिक विरासत से भरा
पूरा बिहार ',चोखा लिट्टी भात भुजिया दाल चावल सत्तू पिट्ठी अचार छनौरी
दालपूङी बखीर और भेली राब का देश जहाँ कंठ कंठ में सुरीली ताने बसी हैं
और युवाओं के सीने में "मल्ल होने का सा जोश ',बेहद मेहनतकश मानव संपदा
पूरे भारत ही नहीं विश्व को देने वाला यह चंद्रगुप्त का देश ',बुद्ध की
चैत्यभूमि और शिवतीर्थ, क्रांति की पहली ज्वाला का प्रांत ',आज ऐसा
मुहावरा कैसे बन गया कि "सौ पर भारी एक बिहारी "वाला नारा दब कर रह गया
और ''बिहरिए "पुरबिए होना एक "गरीब हुनरविहीन अविश्वसनीय
""खानाबदोश का पर्यायवाची बन गया??
चुनाव जैसे ही आते है बिहार का बच्चा बच्चा किसी मँजे हुए राजनेता की
भाँति बातें करने लगता है ',और चुनाव के दौरान भीषण गुटबंदी हिंसा शराब
बाहुबल और धन रुपया आदि का सैलाब गंडक कोसी की बाढ़ से भी अधिक उफान पर
रहता है ।
जातियाँ जो पूरे पाँच साल अन्योन्याश्रित जीवन जीती हैं 'चुनाव आते ही
'पासी कुरमी कोईरी बाँभन ठाकुर नाई कहार मोची जमादार भील में चीखपुकार कर
फटी चादर से बिखरते चावलों की तरह यत्र तत्र हो जाने लगती हैं 'लोग एक
खास तरह की नफरत और दूरी बनाकर व्यंग्य से ही फिर राम सलाम करते है '। इस
जहरीले विचार को भङकाते हैं छुटभैये स्थानीय नेता जिनपर आश्रित हैं गाँव
टोला पुरवा के गरीब और मध्यमवर्गीय लोग 'जब तब उधार रुपया पैसा गहना जमीन
घर गिरवी रखकर इन्हीं नवधनिकों से लेना देना पङता है ।
परदेश पराये प्रांत में रोजगार की तलाश में गये पुरुषों के पीछे गाँवों
के झोपङों में कराहती बूढ़ी माँ युवा वियोगिनी पत्नी और सुनहरे कल की आशा
में डेंगू चिकनगुनिया जापानी इंसेफेलाईटिस स्वाईन फ्लू मलेरिया हाथी पाँव
घेंघा और कुपोषण एनीमिया से जूझते 'बच्चे 'और प्रौढ़ 'सब परिवार इन्ही
स्थानीय नेता भैया जी और साहबों के भरोसे ही तो छोङकर निकलता है बिहारी
'जनरल डिब्बे की सीट पर दस और रेलगाङी के डिब्बे के फर्श पर ही गमछा
बिछाकर 'विरहा कजरी विदेसिया 'गुनगुनाता ।
चुनाव आते ही दस की जगह दौ सौ रुपया रोज दिहाङी जैसे बरसने लगती है और
चोखा भात की जगह दाल-भात ,भुजिया ,पकौङी ,जुट्टी, सुठौरा, ताङी, और ठर्रा
भी घर की ओसारी तक पहुँचने लगता है ।
जाति मजहब और रुपयों का तमाशा भी जिन लोगों पर नहीं चलता उनपर 'भय 'चलता
है और ये भय तरह तरह के रूप शक्ल और कमिटमेंट लेकर आता है । ये
प्रतिबद्धता किसी को तब याद नहीं रहती जब उसे अपने परिवार के सदस्य खोने
पङते हैं बीमारी और दुर्घटना में ',न तब जब बाढ़ में हर साल ढह जाते है
कच्चे घर और सपने, 'न तब जब बङी उमर की लङकी को विवाह के नाम पर बेमेल
शादी करके घुट घुट कर बंधुआ मजदूर बनना पङता है, न तब जब गणित और विज्ञान
में बहुत होशियार होने पर भी उसकी संतान 'दिल्ली मुंबई चेन्नई 'जैसी
संस्थाओं से कोचिंग और पढ़ाई ना कर पाने के कारण 'फ्रस्ट्रेशन की गिरफ्त
में आकर बरबादी की राह पर चल निकलता है ।
वही वही गिने चुने चेहरे बार बार बिहार की शासन व्यवस्था और नीति के
कर्णधार आखिर क्यों बन जाते हैं?
क्या बिहार के पास बिहार में ही पला जन्मा बढ़ा कोई बेहतर विकल्प नहीं है????,
जो नेता पढ़ा लिखा हो!!!!
जो जाति बिरादरी टोला और कुनबे के नाम पर नहीं केवल बिहार को "अपराध और
बेरोजगारी से मुक्त करके अग्रणी राज्य बनाने की गारंटी लेता हो!!!
क्या कारण है कि केरल के लोग शतप्रतिशत साक्षर होते आये हैं और
पाटलिपुत्र 'तक्षशिला के प्रांत में निरक्षरता आज भी बङे पैमाने पर वजूद
में है? क्या कारण है कि साहित्य संगीत और धर्म की राजधानी होकर भी आज
बिहार रोजगार के मामले में दक्षिणभारत से पिछङा हुआ है??
गेंहूँ मक्का चावल अरहर दालें तिलहन कपास आम अमरूद से भरपूर रहने वाले
खेतिहर किसान आज पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के भी कृषकों तक
से पिछङ रहे हैं दशकों से? कृषक और मजदूर दोनों ही एक शोषित बिहारी की
शक्ल में नजर क्यों आने लगे हैं?
बिहार की सङके केवल महानगरों को छोङ दें तो साफ साफ बताती है कि ""खोया
कहाँ स्वराज्य?
बिजली आज भी बिहार के अनेक गाँवों के लिये एक विलासिता की वस्तु है ।
कितने ही गाँव है जहाँ पाँच पाँच किलोमीटर तक स्कूल ही नहीं है ।
सारा विकास बिहार के महानगरों और बङे शहरों तक ही सिमटा नजर आता है सो भी
"बेतरतीब और करोङों खर्च परंतु वास्तविक हालत बस जैसे मिरगी के मरीज को
सङा जूता सुँघाकर होश में बिठा दिया हो ',।
ये दिल्ली के लोग भी बिहार सा तो वोट माँगने जाते हैं या फिर उद्घाटन में
। घोटालों का राज्य कहा जाने लगा है बिहाल को ।
चंद नेता अपने ठेठ देशी अंदाज को स्टाईल की तरह यूज करके लोगों का दिल
लूटने के टोटके करके उनको मुसीका बँधे बैल की तरह वोट दो और कुछ मत सुनो
सोचो की पाह पर चलाते रहे ',वरना यदि बिहारी जागृत होता तो क्या जेल जाते
'लालूयादव 'राबङी जैसी आम घरेलू लगभग अनपढ़ महिला को बिहार का ताज पहना
कर जा सकते थे!!!!!!!!!!
क्या विधायकों के पूरे महामंडल में तब कोई ही न रहा था समुचित प्रभारी??
नीतीशकुमार ने भी नरेन्द्रमोदी की जीत पर 'शहीदाना अंदाज दिखाकर जीतनराम
माँझी को '''''त्यागी भरत "की तरह राजकाज खङाऊँ देकर चलवाना चाहा ।
पासवान हो चाहे कोई और बिहार के लोगों की प्रतिभा बिहार के काम नहीं आती
'और बिहार के संसाधन बिहार के काम नहीं आते 'कैसे बिहार को इस लायक बनाया
जाये कि 'बिहारी खानाबदोश न रहकर अपनी माटी अपने ही प्रांत में रहकर अपने
सपने साकार कर सके!!!!
कोई स्पष्ट योजना किसी के पास है ही नहीं केवल 'आरक्षण की अफीम और वजीफों
के लालच या कभी कोई और सामान या पैसा मुफ्त में देकर तत्काल एक 'समुदाय
या वर्ग या जाति के वोट ले लिये जायें ।
किंतु बिहार के 'हर बच्चे को 'दिल्ली स्कूलों जैसी शिक्षा मिले और हर
युवा को चेन्नई बैंगलोर कोटा की पढ़ाई की तरह रोजगार मिले और पंजाब
हरियाणा की तरह कृषक संपन्न और आधुनिक तकनीकों से लैस होकर सिर उठाकर शान
से कहें हाँ मैं किसान हूँ,,,,,,,, बिहार की बेटियों को कहीं बाहर "विवाह
के कपट के नाम पर दहेज के अभाव में बंधुआ दासी का जीवन न जीना पङे '।
बिहार में मुंबई और वाशिंगटन जैसा इलाज मिले ।
गंदगी और कुपोषण से न जूझना पङे बचपन को ',और हिंसा बलात्कार छेङछाङ
मानवदेह व्यापार और अपराध से मुक्त हो बिहार?????
सवाल हमारा, 'जवाब हर बिहारी को देना है ""क्यों भइया है कोई ऐसा मैदान
में??? जो जाति मजहब नहीं ''अपने बिहार में रहकर सबको रोजगार सुखी शांत
सुरक्षित जीवन और अपराध मुक्त मानवोचित रहन सहन की राह पर चला सके????
©®सुधा राजे

Wednesday, 23 September 2015

सुधा राजे का लेख :- "जीवन जीने के लिए है"।

जो दुःख से घबरा जाये वह न तो पुरुष कहलाने लायक है न ही हिन्द की नारी """"""
क्योंकि दुःख केवल एक वैचारिक अवस्था है,,, और वह योगी जो दरिद्र है खूब
हँस सकता है ',परंतु एक भोगी जो हर तरह से साधनवान है जरा पत्नी या
प्रेमिका रूठने या नौकरी में सस्पेन्ड हो जाने या धन की हानि या परिजन की
मृत्यु से घबराकर आत्महत्या कर डालते हैं!!!!!!!!!
कायर हैं वे सब
क्लीवता पौरूषहीनता या स्त्रीत्वविहीनता नहीं वरन "साहसहीनता का ही दूसरा नाम 'है ।
आत्महत्या
मतलब ईश्वर की बनाई एक अद्वितीय रचना का अंत करने का महापाप!!!
जो तुम बना नहीं सकते उसे तोङने का हक तुम्हें नहीं है ।
जीवन चाहे आप स्वयं का समझते हो अपनी देह अपने जीवन का स्वामी परंतु आप
हैं नहीं ',,,,
क्योंकि जो चीज आपने खरीदी नहीं बनाई नहीं जिसका मूल्य भी नहीं चुकाया वह
आपकी कैसे??
आप उस मुफ्त की मशीन तक के मालिक नहीं हो सकते जो केवल साईकिल में हवा भरती है!!!!
तो उस जटिल महामशीवयन के स्वामी कैसे हो सकते हो बिना मूल्य चुकाये जिसका
आप एक नाखून एक बाल तक बनाना नहीं सीख पाये आज तक??????
इसका स्वामी है आपका ईश्वर आपकी माता आपके पिता आपकी पत्नी आपके बच्चे आप
पर आश्रित आपके परिवार देश समाज के वे सब लोग ""जिन जिन को आपके न होने
पर '''बुरा दयनीय और दुखी जीवन जीने को विवश होना पङेगा """

क्या आप मर जायें और संयार में एक का भी जीवन दुखी न हो ऐसा हो सकता है????
कदापि नहीं,,,
क्योंकि यदि आपका परिवार है तो परिवार की आशा और भविष्य वर्तमान के अनेक
छोटे बङे कार्य सुख दुख आपके हवाले हैं ।
और यदि आपका संसार में न कोई मित्र है न परिवार न शुभचिंतक तो भी,, चूकिं
आपको ईश्वर ने बनाकर भेजा है भारमुक्त करके तब तो आप और भी अधिक विशद
उत्तरदायित्व लेकर आये हैं उन सबके प्रति जो जो अनाथ हैं दयनीय हैं जिनका
कोई रक्तसंबंधी या परिवार मित्र या शुभचिंतक नहीं है, 'वे केवल आपकी ही
बाट जोह रहे हैं । उनके लिए ही ईश्वर ने आपको बनाकर भेजा है । जाकर
देखिये कुतना कार्य शेष है!!! आपको कई जन्म लेने पङेंगे तब पूरा होगा ये
महाकार्य, और इसके लिये ये देह रूपी यंत्र बीमार या कमजोर नहीं चल सकेगा
तो
आपका ही सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह मशीन पूर्ण स्वस्थ और सुचालित हो
उसके सब अंग सही सही कार्य कर रहे हों ।
आप इस देह रूपी यंतिर के केवल चालक मात्र है यह आपको केवल कर्त्तव्य पूरे
करने को सौ सवा सौ साल के पट्टे पर मिले 'संयंत्र की ही भाँति है ।आप रोज
व्यायाम नहीं करेंगे तो, रोज सही और संतुलित ढंग से चलना बैठना सोना खाना
नहीं रखेंगे तो, यह संयंत्र खराब हो जायेगा, 'आप इसको चलाना तक तो जानते
नहीं!!!! सीखने में ही सात से सत्तरह साल लग जाते है ।
देखो किसी नट को, एक्रोबेट को, किसी जिमनास्ट को, किसी धावक को, मल्ल को,
वह इसी पिलिपले रहने वाले शिशु असहाय शरीर को चलाना सीख कर ही कलाकार
खिलाङी नर्तक नट और जिमनास्ट या तैराक मल्ल या एक्रोबेट बना है ।
इस देह को जीतो, 'इसे अपने इशारों पर चलाना सीखो, यह खूब जानता है कि सही
स्वामी का कैसे आज्णापालन करना होता है ।
बढ़िया शरीर पैदाईशी नहीं मिलता निर्माण करना पङता है पाँच साल की आयु से
ही सीखने लगते हैं संगीत नबत्य युद्ध और खेल "'''तो क्यों नहीं इसे ढाल
लेते अपनी आवश्कताओं के अनुरूप ऐसे भी तो लोग है जिन्होने भूख नींद वासना
कामेच्छा और निर्बलता पर विजय पाकर "जितेन्द्रिय की उपाधि पाई, उनको न
किसी वस्त्र के आडंबर की आवश्यकता रही न लेप और आभूषणों की उनकी तो देह
ही दिगंबर सुंदर निर्विकार हो कर रही ',
प्राण इसका "रिचार्ज वाऊचर है चार्ज्ड बैटरी है 'और यह तब तक शिथिल नहीं
पङती जब तक कोई "यह न सोचे कि मैं तो इससे अच्छा कि मर जाऊँ,,,
क्यों सोचो फिर मरने की?
जिओ
जब अपने लिये जीने का बहाना न रहे तब ही जीवन का असली अर्थ समझ में आता
है, 'और यह भी समझ में आता है कि पीङा जब मुझे इस बात पर इतनी हुयी तो
मुझसे और भी जो वेग हैं वे ऐसी ही पीङा और इससे भी भयंकर दर्द दुख कैसे
झेलते होंगे ',
कुछ लोगों से मिलो तो सही जिन्होने जीवन का वरण किया, अरे मरना तो बङा
आसान है 'नब्ज काट लो फाँसी लगा लो पेल के नीचे कूद पङो जहर खालो,
'""""""किंतु जीना कितना कठिन!!!!!! हर पल साँस लेनी पङती है, हर पल पेट
से हर कोशिका तक रक्त और ऊर्जा ऑक्सीजन और पोषण का प्रवाह जारी रखना पङता
है ।तीन मिनट को साँस न मिली और जीवन खत्म!!!!!!!!
जीकर दिखाओ, 'है हिम्मत तो जिओ 'मर तो बाद में भी सकते हो पहले ये सोचो
कि क्या क्या लाभ इस सवा सौ साल की आयु का संसार को तुम दे सकते थे और
दिया नहीं!!!!! क्या क्या ऐसा कर सकते थे कि कुछ लोग तो सुखी हो जाते!!!!
करोङ रुपया देकर भी अगर जीवन मिले तो करोङों लोग जीवन खरीदने को तैयार
बैठे है अपना और अपनो का ',कोई भला स्वस्थ देह के होते हुये गरीब कैले हो
सकता है????
ये मकान किसके लिये? शरीर के लिये? और ये कपङे गहने लेप चूर्ण और रंग??
यब के सब इसी तन इसी देह के लिये???
तो ये सब तो एक मशीन की एसेसरीज ही हुयी न??
सोचो जब कवर और रख रखाव जिस मशीन का ऐसा है तो वह मशीन कितनी कीमती होगी????
अरबों के हीरे मिलकर भी एक मनुष्य का सवा सौ साल का स्वस्थ जीवन नहीं बना सकते तो?
यह देह हो गयी अरबों की और आप अरबपति खरबपति नील शंख और पद्म पति!!!!!
इतने धनवान होकर भी आपको इस कीमती देह का क्या निकृष्ट प्रयोग समझ में आया??
अरे यह शरीर ही तो पूँजी है नट की खिलाङी की धावक मल्ल और योद्धा की
वेश्या की और नर्तक की गायक की और वादक की!!!!!!!

इस शरीर का जो ड्राईवर है सोचो फिर वह कितना गुणवान होगा 'मन 'ये मन जिसमें
हाथ पाँव कमर यौनांग और कंठ नहीं
बल्कि
विचार बुद्धि सोच चिंतन आविष्कार शोध विश्लेषण औऱ विद्या की शक्ति है!!!!!!!
वह तो शरीर रूपी महासंयंत्र के सबसे सुंदर कक्ष में बैठा उसका 'संचालक है "
अगर मन ही मालिक बन गया तो आप तो गये काम से '
मन मनमानी करते करते प्रबंधक से कब स्वामी बनकर देह को हङप जाये पता न
चले यदि ये "सही नियंत्रक यात्री ''आत्मा जो इस संसार की यात्रा पर आयी
है अपना दायित्व भूलकर रमने लगे यंत्र के क्रिया कलाप के सुख लेने में!!
आपने कार ली या मोटरसाईकिल या कंप्यूटर "क्या उसकी चेसिस और हार्डवेयर को
ही रोज कोलीन से चमकाकर बैटरी चार्ज करके ईधन भरकर रखते रहोगे????
या इससे कुछ काम भी लेना है??
मनोरंजन जिस जिस चीज से होता है वह तो "मैनेजर का आनंद है '"'
वह तो उस ड्रीईवर का आनंद है जो आपकी कार आपकी बस रेलगाङी चलाते समय जोर
जोर से रेडियो ऑडियो वीडियो पर कुछ संगीत सुन रहा या मोबाईल पर देख रहा
है ',सावधानी हटी और दुरघटना घटी मन रूपी एक मनोरंजनवादी चालक को मन की
करने दोगे तो होगा यही वह ""गाङी ही ठोक देगा कहीं बीमार कपेगा चटोरेपन
से कभी आलस में गाङी चलायेगा देर करेगा हर काम में कभी स्पीड ज्यादा रखकर
गाङी ही तोङ डालेगा ।
तो ""आत्मा रूपी यह पट्टेदार यात्री अपने माल यानि गाङी रूपी देह की सही
सुरक्षा चाहता है तो मन रूपी संचालक पर काबू रखे ',
ताकि ऐसा नियम बना रहे कि जो जो मन चाहे वह सब तभी करने दिया जाये जब वह
सब करना गाङी को नुकसान नहीं दे रहा हो और आत्मा रूपी पट्टेदार मालिक
यात्री को दिये सवा सौ साल के समय के भीतर उस पर सौंपे गये दायित्व भी
पूरे हो सकें ।
देखो, 'ये शरीर सिर्फ तीन दशक के लिये मिला शंकराचार्य को ',विवेकानंद
को, दयानंद को, और उन सबने कितने कम समय में कितने सारे कार्य कर
डाले!!!!!
यही शरीर आपके पास है ',क्यों इसका बेहतर उपयोग नहीं, 'ये स्त्रीपुरुष का
प्यार ये बङी हवेली जेवर कपङे वाहन की होङ,,,,,, अपनी जगह तक सीमित
अर्थों में ही तो, 'आपके मोबाईल कंप्यूटर या बाईक की ऐसेसरीज ही तो
हैं!!!! ये ध्येय नही!! ये साध्य नहीं!!! ये केवल संसाधन हैं ।
साध्य तो वही ""चुनौती है जो दाता परमात्मा ने एक विचित्र संयंत्र एक
चालक सहित देकर भेदा कि जाओ और कर दिखाओ इस संसार में जो जो कुछ वहाँ देख
समझकर समझ पाओ कि मानवदेही होने को नाते करना तुम्हारा सही उपयोग है!!
तो क्या किया आपने परमात्मा को बताने के लिये!???
अपने पीछे रह गये लोगो में चर्चा को छोङ जाने के लिये,??
कौन कहता है 'मर गये कबीर? कौन कहता है मर गये नानक,, अरे मर तो वह रहा
है जो जीवन की आपाधापी में केवल मशीन ही धो पोंछकर रोज सजाये जा रहा है
बिना इसका सही उपयोग करे ।
ये दस उंगलियाँ 'दो नेत्र एक पूरी ज्ञान और कर्म की श्रंखला पर काबू पाने
को हर पल स्मृति रखता आविष्कारक मन और इसमें भी आपको अगर लहता है कि देह
का अंत ही सही राह है तो डरपोक कायर क्लीब और कृतघ्न शब्द भी काफी नहीं
आपके लिये ',दुख तो सब पर पङता है कोई बह जाता है कोई ',सह जाता है,
'किंतु मानव वही सच्चा है मानव जो न बहे न केवल सहे अपितु अपना दुख
बिताकर बिसरा दे और दूसरों के दुख का सहारा बनकर बाँह गहे!!!
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लेख :- बिहार नामचा

बिहारनामचा
":'
हिन्दू बौद्ध ईसाई और मुसलिम
इन सबके इतिहास से बहुत पीछे बहुत गहराई से जुङा है बिहार ।
कभी भारत का गौरव रहा बिहार इतना पीछे धकेला गया कि आज बिहार के बाहर
"उँह बिहारी "कहकर बहुत हेयता से दूसरे अतिवादी क्षेत्रवादी देखते हैं ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिन लङकों की बङी आयु रंगरूप या कम कमाई या
पहली दूसरी पत्नी मर जाने या विवाह टूट जाने पर शादी नहीं होती ''वे
पहाङन 'बंगालन 'नेपालन या बिहारन जिन्हे वे अशिक्षित श्रमजीवी लोग
""पुरबिनी कहते हैं "।
को कुछ हजार रुपयों में वधूमुल्य चुकाकर ले आते है विवाह के नाम पर जीवन
भर बँधुआ मजदूर मुफ्त की वेश्या और मुफ्त की नौकरानी की तरह रखते हैं ।
न सम्मान होता है परिवार समाज और पति की नजर में न ही कोई दया माया मोह
प्रेम अधिकार ।
जो बच्चे भी अगर हुये तो पति की ही संपत्ति और आगे को अघोषित दास होते हैं ।
हर साल हजारों मजदूर खेतों और मिलों कारखानों फैक्ट्रियों में काम करने
मानसून के निकट होते ही बिहार से बाहर निकल पङते हैं मुंबई कलकत्ता मदरास
पंजाब दिल्ली जयपुर अजमेर """""जहाँ कहीं भी सूचना मिलती है काम की ।
एक दो आँखों देखी घटना है कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में ठसाठस बैठे बिहार
के लोग रोजगार की तलाश में जो चले जा रहे होते हैं अजनबी मंजिल की तरफ
उनको हाथ पकङ कर बिचौलिया ठेकेदार अलग अलग कार्य में लेबर सप्लाई के लिये
बीच में ही किसी भी स्टेशन पर उतार लेते हैं और कई गुटों में इन मजदूरों
को उतारने के पीछे झगङा भी हो जाता है कि ये मजदूर पहले मैंने छेके ',तो
मेरे हुये ।
मामूली मेहनताने पर ये मजदूर मिलों कारखानों निजी घरों और खेत खलिहानों
में काम करते है ।
हर नया मालिक इनको बेकार बचे कपङे पहनमे को देता है और बस यूँ ही कहीं
पङे रहने भर को ठिकाना देकर नौकरी करता है ।
होली के ठीक पहले ये मजदूर अपने देश लौटने लगते हैं ।
तो भी मालिक को सौ सौ वादे करके कि वापस आकर फिर काम करेंगे ',कुछ तो
लौटते हैं और कुछ उम्दा रोजगार की तलाश में फिर नयी जगह चल पङते हैं ।
ये नई मंजिल कई बार घर मकान ढोर गिरवी रखकर अरब देश या थाईलैंड या खाङी
देश भी होते हैं ।
बिहारी हर देश हर प्रोफेशन हर जिले में मिलेगा ',
लेकिन सौ टके का सवाल है कि अपनी माटी अपनी भाषा अपने प्रदेश से जी जान
से प्रेम करने वाला पूरबिया आखिर क्यों विवश हो जाता है घर में माँ पत्नी
बच्चे बहिन भाई त्यागकर बाहर देश परदेश भागने को??
ये कारण है जातिवाद की अफीम पिलाकर मजहब की मदिरा में डुबोकर 'बिहार को
रोजगार न मिलने वाला प्रांत बना डालने वाले नेता और प्रशासक, 'आज भी
बिहार दक्षिण से अघिक हरा भरा और खनिज संपदा संपन्न है और संपन्न है माटी
नदी पहाङ मैदान की विविधता से ',न मरूस्थल की तपती धूल न ही पठार का
वीराना ',जहाँ तक नजर जाती है सब हरा भरा और ',सांस्कृतिक विरासत से भरा
पूरा बिहार ',चोखा लिट्टी भात भुजिया दाल चावल सत्तू पिट्ठी अचार छनौरी
दालपूङी बखीर और भेली राब का देश जहाँ कंठ कंठ में सुरीली ताने बसी हैं
और युवाओं के सीने में "मल्ल होने का सा जोश ',बेहद मेहनतकश मानव संपदा
पूरे भारत ही नहीं विश्व को देने वाला यह चंद्रगुप्त का देश ',बुद्ध की
चैत्यभूमि और शिवतीर्थ, क्रांति की पहली ज्वाला का प्रांत ',आज ऐसा
मुहावरा कैसे बन गया कि "सौ पर भारी एक बिहारी "वाला नारा दब कर रह गया
और ''बिहरिए "पुरबिए होना एक "गरीब हुनरविहीन अविश्वसनीय
""खानाबदोश का पर्यायवाची बन गया??
चुनाव जैसे ही आते है बिहार का बच्चा बच्चा किसी मँजे हुए राजनेता की
भाँति बातें करने लगता है ',और चुनाव के दौरान भीषण गुचबंदी हिंसा शराब
बाहुबल और धन रुपया आदि का सैलाब गंडक कोसी की बाढ़ से भी अधिक उफान पर
रहता है ।
जातियाँ जो पूरे पाँच साल अन्योन्याश्रित जीवन जीती हैं 'चुनाव आते ही
'पासी कुरमी कोईरी बाँभन ठाकुर नाई कहार मोची जमादार भील में चीखपुकार कर
फटी चादर से बिखरते चावलों की तरह यत्र तत्र हो जाने लगती हैं 'लोग एक
खास तरह की नफरत और दूरी बनाकर व्यंग्य से ही फिर राम सलाम करते है '। इस
जहरीले विचार को भङकाते हैं छुटभैये स्थानीय नेता जिनपर आश्रित हैं गाँव
टोला पुरवा के गरीब और मध्यमवर्गीय लोग 'जब तब उधार रुपया पैसा गहना जमीन
घर गिरवी रखकर इन्हीं नवधनिकों से लेना देना पङता है ।
परदेश पराये प्रांत में रोजगार की तलाश में गये पुरुषों के पीछे गाँवों
के झोपङों में कराहती बूढ़ी माँ युवा वियोगिनी पत्नी और सुनबरे कल की आशा
में डेंगू चिकुनगुनिया जापानी इंसेफेलाईटिस स्वाईन फ्लू मलेरिया हाथी
पाँव घेंघा और कुपोषण एनीमिया से जूझते 'बच्चे 'और प्रौढ़ 'सब परिवार
इन्ही स्थानीय नेता भैया जी और साहबों के भरोसे ही तो छोङकर निकलता है
बिहारी 'जनरल डिब्बे की सीट पर दस और रेलगाङी के डिब्बे के फर्श पर ही
गमछा बिछाकर 'विरहा कजरी विदेसिया 'गुनगुनाता ।
चुनाव आते ही दस की जगह दौ सौ रुपया रोज दिहाङी जैसे बरसने लगती है और
चोखा भात की जगह दाल-भात ,भुजिया ,पकौङी ,जुट्टी, सुठौरा, ताङी, और ठर्रा
भी घर की ओसारी तक पहुँचने लगता है ।
जाति मजहब और रुपयों का तमाशा भी जिन लोगों पर नहीं चलता उनपर 'भय 'चलता
है और ये भय तरह तरह के रूप शक्ल और कमिटमेंट लेकर आता है । ये
प्रतिबद्धता किसी को तब याद नहीं रहती जब उसे अपने परिवार के सदस्य खोने
पङते हैं बीमारी और दुर्घटना में ',न तब जब बाढ़ में हर साल ढह जाते है
कच्चे घर और सपने, 'न तब जब बङी उमर की लङकी को विवाह के नाम पर बेमेल
शादी करके घुट घुट कर बंधुआ मजदूर बनना पङता है, न तब जब गणित और विज्ञान
में बहुत होशियार होने पर भी उसकी संतान 'दिल्ली मुंबई चेन्नई 'जैसी
संस्थाओं से कोचिंग और पढ़ाई ना कर पाने के कारण 'फ्रस्ट्रेशन की गिरफ्त
में आकर बरबादी की राह पर चल निकलता है ।
वही वही गिने चुने चेहरे बार बार बिहार की शासन व्यवस्था और नीति के
कर्णधार आखिर क्यों बन जाते हैं?
क्या बिहार के पास बिहार में ही पला जन्मा बढ़ा कोई बेहतर विकल्प नहीं है????,
जो नेता पढ़ा लिखा हो!!!!
जो जाति बिरादरी टोला और कुनबे के नाम पर नहीं केवल बिहार को "अपराध और
बेरोजगारी से मुक्त करके अग्रणी राज्य बनाने की गारंटी लेता हो!!!
क्या कारण है कि केरल के लोग शतप्रतिशत साक्षर होते आये हैं और
पाटलिपुत्त 'तक्षशिला के प्रांत में निरक्षरता आज भी बङे पैमाने पर वजूद
में है? क्या कारण है कि साहित्य संगीत और धर्म की राजधानी होतर भी आज
बिहार रोजगार के मामले में दक्षिणभारत से पिछङा हुआ है??
गेंहूँ मक्का चावल अरहर दालें तिलहन कपास आम अमरूद से भरपूर रहने वाले
खेतिहर किसान आज पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के भी कृषकों तक
से पिछङ रहे हैं दशकों से? कृषक और मजदूर दोनों ही एक शोषित बिहारी की
शक्ल में नजर क्यों आने लगे हैं?
बिहार की सङके केवल महानगरों को छोङ दें तो साफ साफ बताती है कि ""खोया
कहाँ स्वराज्य?
बिजली आज भी बिहार के अनेक गाँवों के लिये एक विलासिता की वस्तु है ।
कितने ही गाँव है जहाँ पाँच पाँच किलोमीटर तक स्कूल ही नहीं है ।
सारा विकास बिहार के महानगरों और बङे शहरों तक ही सिमटा नजर आता है सो भी
"बेतरतीब और करोङों खर्च परंतु वास्तविक हालत बस जैसे मिरगी के मरीज को
सङा जूता सुँघाकर होश में बिठा दिया हो ',।
ये दिल्ली के लोग भी बिहार सा तो वोट माँगने जाते हैं या फिर उद्घाटन में
। घोटालों का राज्य कहा जाने लगा है बिहाल को ।
चंद नेता अपने ठेठ देशी अंदाज को स्टाईल की तरह यूज करके लोगों का दिल
लूटने के टोटके करके उनको मुसीका बँधे बैल की तरह वोट दो और कुछ मत सुनो
सोचो की पाह पर चलाते रहे ',वरना यदि बिहारी जागृत होता तो क्या जेल जाते
'लालूयादव 'राबङी जैसी आम घरेलू लगभग अनपढ़ महिला को बिहार का ताज पहना
कर जा सकते थे!!!!!!!!!!
क्या विधायकों के पूरे महामंडल में तब कोई ही न रहा था समुचित प्रभारी??
नीतेशकुमार ने भी नरेन्द्रमोदी की जीत पर 'शहीदाना अंदाज दिखाकर जीतनराम
माँझी को '''''त्यागी भरत "की तरह राजकाज खङाऊँ देकर चलवाना चाहा ।
पासवान हो चाहे कोई और बिहार के लोगों की प्रतिभा बिहार के काम नहीं आती
'और बिहार के संसाधन बिहार के काम नहीं आते 'कैसे बिहार को इस लायक बनाया
जाये कि 'बिहारी खानाबदोश न रहकर अपनी माटी अपने ही प्रांत में रहकर अपने
सपने साकार कर सके!!!!
कोई स्पष्ट योजना किसी के पास है ही नहीं केवल 'आरक्षण की अफीम और वजीफों
के लालच या कभी कोई और सामान या पैसा मुफ्त में देकर तत्काल एक 'समुदाय
या वर्ग या जाति के वोट ले लिये जायें ।
किंतु बिहार के 'हर बच्चे को 'दिल्ली स्कूलों जैसी शिक्षा मिले और हर
युवा को चेन्नई बैंगलोर कोटा की पढ़ाई की तरह रोजगार मिले और पंजाब
हरियाणा की तरह कृषक संपन्न और आधुनिक तकनीकों से लैस होकर सिर उठाकर शान
से कहें हाँ मैं किसान हूँ,,,,,,,, बिहार की बेटियों को कहीं बाहर "विवाह
के कपट के नाम पर दहेज के अभाव में बंधुआ दासी का जीवन न जीना पङे '।
बिहार में मुंबई और वाशिंगटन जैसा इलाज मिले ।
गंदगी और कुपोषण से न जूझना पङे बचपन को ',और हिंसा बलात्कार छेङछाङ
मानवदेह व्यापार और अपराध से मुक्त हो बिहार?????
सवाल हमारा, 'जवाब हर बिहारी को देना है ""क्यों भइया है कोई ऐसा मैदान
में??? जो जाति मजहब नहीं ''अपने बिहार में रहकर सबको रोजगार सुखी शांत
सुरक्षित जीवन और अपराध मुक्त मानवोचित रहन सहन की राह पर चला सके????
©®सुधा राजे


Sunday, 20 September 2015

सुधा राजे की "चिट्ठी"

हम जब एफ पर नये नये आये तो रोज दो चार को ब्लॉक करना पङता था 'कई बार
फ्रैंण्ड रिक्वेस्ट ब्लॉक हो जाती तो कई बार 'कोई न कोई मन दुखी करने
वाले संदेश भेज देता
कभी कभी "फेमिनिस्ट ''होने की टिप्पणी के साथ धमकियाँ मिलती
अकसर जैसे ही कोई फोटो अपलोड करते चोरी कॉपी पेस्ट और रचनायें तो अकसर ही
कभी कभी पूरी ग़जल गीत या लेख तक चोरी करके लोग ब्लॉग या प्रिंट तक में
अपने नाम से छाप ले गये """"""।
कई मंच पर बहुत सक्रिय कवियों ने व्यंग्य किये आजकल नई नई कवियत्रियाँ
पैदा होने लगी """
जबकि वास्तव में बाद में उनको पता चला कि सीनियर कौन है ।
फिर कुछ लोग हमें कविता सिखाने चल पङे कईयों ने तो सलाह दे डाली कि ""आप
लिखती ही क्यों है जब लिखना नहीं आता "

कई बार अश्लील मैसेज से भी दो चार होना पङा ।

सीखते गये
ठोकरें खा खा कर """
क्योंकि हमारे लिये एफ बी एक टाईम पास नहीं एक मंच रहा है '''जहाँ हर द्न
हम कई हजार लोगों को पढ़ते सुनते और "अपनी कहते हैं ''
अब तक अनेक बदलाव हमारी छोटी छोटी कोशिशों ने किये है ''
हमारी आवाज दूर दूर तक सुनी गयी और समझी भी गयी ।
अनेक शिकायतों पर अमल भी हुये

सोच भी कई लोगो की बदली
हमारे अनेक मित्र जिनकी वॉल पर किंचिंत "सीमाबाहर की बातें चित्र हुआ
करते थे ""आज वे सकारात्मक कह सुन रहे हैं ।
और एक बङा परिवार मेरे साथ है 'पाँच हजार मित्र बनाने में हमने कोई तेजी नहीं की '
आज एक एक कीमती मोती दमक रहा है ।
फिर भी हम कुछ दायरों से बाहर न लिखते हैं न पढ़ते है और न बर्दाश्त करते हैं ।
जिसकी वजह से 'किसी भी को भी अनफ्रैण्ड करने में 'पल नहीं लगाते अगर
'दायरा लांघने की कोशिश की ।
हमारी अनेक सहेलियों ने भी यही सब सहा होगा ।
चाहे वे पत्रकार हों या लेखिका या टीचर या गृहिणी ""'''
कितना संघर्ष करके टिकती हैं स्त्रियाँ 'यहाँ '
फिर परिजनों से भी सुनना पङ सकता है 'कठोर 'इसलिये सब कामकाज निबटाकर
'रात में ही अकसर महिलायें एफ बी या ट्विटर पर होती है 'या फिर सूर्योदय
से पहले ।
★इसपर भी हरीबत्ती देखी और चल पङे 'अलफतुए भैया मेसेज पर मेसेज '
क्यों कोई स्त्री आधी रात को सोशल मीडियापर ??
अब इन सङीगली सोच वालों ने कभी बौद्धिक श्रमजीवियों का जीवन देखा होता तो
समझते कि "लेखक रात को देर तक नहीं जागेगा तो क्या करेगा? लेकिन वह अभी
कुछ लिख रहा मूड बना रहा या समाचार फीड ले रहा होता है और केवल "स्त्री
होने के कारण "उसके देर रात ऑन लाईन दिखने पर अललटप्पुओं के दिमागी
चिपकुटपन की बत्तियाँ गुल्ल हो जातीं है!!!
ओये लङकी?
वो भी रात को,,
जो समाज घऱ से बाहर की बात पढ़ते कहते सुनते लिखते घऱ बैठी लङकी को नहीं झेल पाता
वह समूची लङकी को कैसे घर से बाहर रात को बरदाश्त कर सकता है
उस तरह के घोंचू सोचते कब हैं कि जिनके परिजन विदेश में रहते हैं वहाँ
सुबह की बात हो रही हो सकती है 'न्यूज व्यूज लेखन ईमेल प्रिंट चल रहा हो
सकता है ।
एफ बी चिलफट्टूशों की तरह महिला केवल फ्रैंड नहीं "परिवार भी जोङ कर रखती है ।
जिनके मायके दूर है पति परदेश में है उनसे कम खर्च में लंबी बात और फोटो
देखना शेयर करना सस्ता सरल कविसम्मेलन और अखबार भी तो यहीं है,,,
लगातार
टैगियों से परेशान
मैसेज से डिस्टर्ब
अभद्रजनों से ऊबी
और एंटीवुमैनिज्मवादियों से बहस बचाती
स्त्री की सोशल मीडिया पर दमदार उपस्थिति
क्या ये कम बङी जीत है
©®सुधा राजे
#fb thanks

--

Saturday, 19 September 2015

सुधा राजे की एक अकविता :- "आश्रय स्थल"

मैं
जब मैं के अंतिम आश्रय स्थल अपने ही आप के मनन और आस्था की गुफा में आकर
अपने ही आप पर अपने भरोसे की चट्टान पर खङी होती हूँ तो सब विकार पिघल
जाते हैं और गौमुखी अलकनंदा गंगा जान्हवी मंदाकिनी की भाँति मेरा सारा
रोष पिघल जाता है मैं तुम्हें तो कब की क्षमा कर चुकी होती हूँ हर बार
यहाँ आने से पहले बस मुझे अपने आप को क्षमा करना किंचिंत दुरूह लगता है
हर बार जब मेरा ही अपना अस्तित्व मुझसे प्रश्न करता है अब भी!!!!!
क्यों??? तब धृति और करुणा के द्वंद्व के मध्य से निकलकर मैं पंजों के बल
सरक कर चढ़ती हुयी यहाँ इसी अपने आप के ही अपने पर भरोसे की शिला रचित
अंतस गुहा में आकर विराम कर के मुक्त कर देती हूँ अपने आभऱण केश पाश में
बँधा संयम और तरल तरंगिणी की प्रवाहमयी कवितीवीथिका में छिप जाती हूँ तब
तक "जब तक मेरा मैं मुझे क्षमा नहीं कर देता हर बार '
मन पर लगाये तुम्हारे घाव के लिये तुम्हे क्षमा करते चले जाने को

कहो क्या कहना है
मैं प्रस्तुत तो हूँ न ',
वैसी ही प्रसन्न निर्भार और निर्विकार
सारी सुधियाँ गँठी रख कर
रीती रिक्त
अब तक इसीलिये तो हर बार भर लाती हूँ अँजुरी भर हँसी और दिन भर के लिये
मौन मुस्कान चाहे साँझ जैसी भी हो मैं 'दिन भर यहीं हूँ ऐसी ही स्मिता
सुधा 'विषपायिनी निरापद '
©®सुधा राजे


Thursday, 17 September 2015

सुधा की अकविता :- जुबानजोर लुगाई

पति पत्नी दोनों मजदूर लेकिन पति को महीने में कभी पंद्रह कभी बीस दिन ही
काम मिलता है 'सो सुबह आठ से शाम चार तक ' और अगर मनरेगा का है या नरेगा
का तो सुबह आठ से दोपहर एक या दो बजे तक बस फिर बीच बीच में "सुस्ताने के
इंटरवल और बीङी पानी रोटी कमर सीधी करने की लोट लगाई ।और घर आते ही रोटी
खाकर यार दोस्तों के साथ 'हट्टी पर या पान की दुकान या पीपल तले ताश चौपङ
की चौपाल पर ' देर रात घर आकर चार गाली चार सौ चालीस ताने और दस बीस
थप्पङ जूते लाठी फजीहत कभी पत्नी कभी बच्चे सहमे और डरे चीख पुकार में
ऊँची आवाज में रह जाती है रोती हुयी लङकियाँ और खुद को कोसती हुयी सास
बहू । दोनो ही मजदूर किंतु स्त्री उठती है भोर कभी चार कभी तीन बजे ही
नित्यकर्म के लिये मुँह अँधेरे जाना और फिर आकर झाङू गोबर ढोर बच्चे और
बरतन करना राख मिट्टी रोटी चटनी साग अचार कुछ बनाकर सबके लिये रखकर '
दरांती पल्ला बोरी लेकर निकलना घऱ से दूर चारा घास लेने गन्ना छीलने और
बेलें निराई रोपाई करने दोपहर में एक घंटे की विराम में ',बीन लेना
कंडिया लकङियाँ फलियाँ और बेर सरसों चौलाई के पत्ते बच्चों के लिये " फिर
लग जाना काम पर और मजदूरी बराबर कहाँ? बच्चों और स्त्रियों को पौना ही
मिलता है न!! साँझ घर आते सिर पर गट्ठर कमर में चार पैसे और छाती में
हुमकता दूध बङकी के पास छोङ गये छुटके के लिये और तीन खिलंदङों के लिये
बेर मकोर जामुन जंगल जलेबी सास के सरसों का साग और बूढ़े ससुर के लिये
दर्द सेंकने को आक अरंडी महुये के पत्ते । धुँधाता चूल्हा भरी आँखें रीते
घङे और सरकारी नल या कुँये से जल प्यासे ढोरों को पानी दूध दुहकर बेचना
और कुट्टी काटते पङी ठेठों की निशानी रोटियाँ कम है इसलिये वह लेगी दो और
माँड पियेगी जादा पेट की भूख से बङा है पेट के फलों की जरूरत का तक़ादा
'देर रात फिर वही बदबू और मजदूरी छीनने की बात ,कब तक डरती अब बोलने लगी
है चूङियों से छिली पङी काँटों में खेलती दराँत चलाने वाली कलाई मुहल्ले
वाले बुराई करें तो करें बालकों के साथ अब बेखौफ है, मजदूरनी जुबानज़ोर
लुगाई बेशक घर मरद का और रोज कुछ नहीं उसका बेवजह रोज जाती है मारी पीटी
गरियाई ....... भोर से देर रात तक हाङतोङ मेहनत करती है फिर भी लोग सच
कहते हैं दबती नहीं 'भूरे की लुगाई ©®सुधा राजे


Sunday, 13 September 2015

सुधा राजे की एक अकविता :-"निर्वीरा"।

मिताक्षरा '
यूँ ही बैठ जाती है
कभी कभी टूटी हुयीं सीढ़ियों के पास छत पर जाने की आदतवश
और एक पल चुरा लेती है जीवन का
नभ को छूने की ललक तो
कब की बीत गयी
अब तो छत भी उसके पाँवों से
हर बार सतरह पग दूर ही रह जाती है ',
बह जाती सीपियों सी आँखों में बंद मोती की माला
और रह जाते हैं खारे सिंधु में सद्य़स्नात नेत्र
डूबते सूर्य को निहारते '

'कोई नहीं पूछता कैसी हो तुम!
कहाँ वह खुद भी पूछ पाती है थकी हुयी रीढ़ से
जिस पर ढोये हैं नौ नौ महीनों तक लगातार बँधे पत्थर
और काटदिये अपने रीढ़ के टुकङे हर बार
कंठ तक ठूँसी गयी ओढ़नी में बँधी चीखों के साथ,
'रह गये निर्निमेष पल
और ठहर गयी पुतलियों के पीछे पथराया मन,
बाँध बाँध कर कितनी रेत डाली
और कितना डाला मन मन माटी
मन मन भर हृदय का होता रहा पाषाण भंडार
फिर भी कगार को बहा ही ले गया जलप्लावन '
सूखे रह गये सावन और गीले कब हो सके फागुन
आशा और विश्वास की परवरिश में ही रीत गये सपने
और बीत गयी भोर '
रह गया सूनी दोपहर का 'धू धू जलता शोर ।
और कब की सब उद्गतियाँ
हटा कर खंड खंड मलबे में बदल चुकीं सीढ़ियाँ '
अब तो कौन चढ़े छत पर
चुनौती देती हैं नयी पुरानी पीढ़िया ।
पाँव से "निपक 'गयी कब गयी रुपहली पायल
और कंगन कब चढ़ा हाथ में बिना कलाई को किये किंचित घायल ",

करेगी भी तो क्या अब छत पर जाकर मिताक्षरा "
वहाँ कोई भी तो अपना सपना न रहा
कोई महकती मोगरे की बेल का आसरा
रह गये ठूँठ हुये कर पग और काया
काठ की पिटारी में बंद लोध्र रंग कबके सूख चुके हैं
सूखे रक्त की तरह
'कोई इतना अकेला होकर आकाश देखे भी तो किस तरह,
कई दशकों के बाद बनती है कहने को एक सदी '
"निर्वीरा "
हूँ मैं जैसे मरुस्थल में अंतःसलिला हो गयी एक विषपायनी नदी?
थी तो मैं भी कभी सदानीरा
©®सुधा राजे


Wednesday, 9 September 2015

एक पत्र संपादक जी के नाम 'प्रधानमंत्री जी के लिये ...

आदरणीय संपादक जी
आपके समाचार पत्र के माध्यम से, अपनी बात माननीय प्रधानमंत्री जी, एवं
मनोरंजन तथा फिल्म और विज्ञापन से संबंधित स्थानीय अधिकारियों तक अपनी
बात पहुँचाना चाहते हैं 'सादर ''''

माननीय
नरेंद्र भाई मोदी जी
प्रधानमंत्री भारत संघ
विषय --अश्लील बेबसाईटे,, चित्र,
चलचित्र, सीडी, डीवीडी, पत्रिकायें,
पोस्टर, टी वी सीरियल, और तमाम वे
सामग्रियाँ जो "स्त्री देह को नग्न
दिखाती हैं और स्त्री पुरुष या गे
लेस्बियन इत्यादि के दैहिक यौन संबंध
दिखाती छापती हैं और
शब्दों द्वारा अश्लील शब्द विवरण
करती हा जो कि ',देश की संस्कृति के
विरुद्ध है और जिनसे समाज में
अनेतिकता फैल रही है को बंद कराने और
तत्काल प्रभाव से ऐसे सारे प्रसारण
प्रकाशन जो केवल मनोरंजन और सूचना के
नाम पर स्त्री को शर्मिंदा करते हैं और
भोग विलास की वस्तु के रूप में प्रस्तुत
करते बंद कराने की प्रार्थना अपील और
निवेदन ।
आदरणीय
सविनय विनम्र निवेदन है कि देश
की स्त्रियाँ और छोटे बच्चे आज कई साल
से अचानक बढ़ती छेङछाङ
कोहनीबाजी पिंचिंग
फिकरेबाजी पीछा करना ताक झाँक
घूरना गंदे गीत गाना और जगह बे जगह
नोंच खसोंच बलात्कार हत्या तेज़ाब
कुकर्म
और सुबूत मिटाने के लिये की गयी वीभत्स
हत्याओं से हाहाकारी आर्तनाद में जल
रहा है ।
देश की आधी आबादी हर समय डर भय
दहशत आतंक में मर मर कर घुट घुट कर
बमुश्किल साँस ले पा रही है । आबरू
रेजी और अश्लील वीडियो बनाकर
बाजार में बेचना कट पेस्ट और टैक्नीक से
किसी भी स्त्री के गंदे चित्र बनाकर
ब्लैक मेल कर लेना ये सारे अपराध अब
गाँव गाँव पहुँच चुके हैं।
लङके बूढ़े जवान सब अकसर मोबाईल
लैपटॉप और सीडी डी वी डी प्लेयर पर
गंदी ब्लू फिल्में अश्लील गीत तसवीरे
नाच गाने और बात चीत करने
वाली साईट पर भटके रहने लगे है ।
मानवीय कमजोरी है कामवासना और
लालच इसी का लाभ ये
अश्लीलता परोसकर करोङो रुपया कमारे
वाले लोग करते हैं ।
अब तक यही पक्ष सामने आया है कि हर
दुर्दांत बलात्कारी अश्लील फिल्में
बेबसाईटें पोर्न पेज और अश्लील चैटिंग
चित्र पत्रिका आदि पर
बिजी रहता था ऐसी उत्तेजित मानसिक
अवस्था में शराब अफीम कोकीन
गाँजा या नशे की गोलियाँ खा लीं ।
मन मस्तिष्क में भङकी वासना में वह भूल
गया कि वह पापकरने जा रहा है ।
योजना बनाकर समूह
बनाया लङकी हासिल की और रेप करके
जान से मार डाली या फराकयर
हो गया ।
न वह अश्लील सामग्री देखता न मन
बेकाबू होता न नशा करता न होश
खोता और न ही लङकी अपहरण करके
बलात्कार करता न ही सजाके डर से
हत्या करता ।
आज लाखो लङकियाँ मार
डाली जा रही है """गर्भ में ""दहेज के डर
से और बलात्कार के डर से । अकसर
माँ बाप डरे हुये हैं लङकी जब तक घर
वापस नही आ जाती साँस अटकी रहती है

वासना ही वासना का क्रूर नग्न नर्तन
जारी है ।
तो फिर क्यों न कमजोर मनोबल के लोग
इस पाप की चपेटमें आयेगे ।
आज अनेक अखबार पत्रिकायें विज्ञापन के
नाम पर यौन शक्ति बढ़ाने के "वर्गीकृत
विज्ञापन छापती है तो अनेक टैंट वाले
हकीम नगर नगर बस अड्डे रेलवे और नगर
के ओर छोर पर तमाम नुस्खे लेकर
जनता को लूट रहे हैं ।
अश्लील फिल्मों के पोस्टर ठीक
वहीं लगाये जाते हैं जहाँ स्त्रियाँ बस
टेम्पू रेल के इंतिजार में खङी होती हैं ।
मनोरंजन के नाम पर नग्न प्रदर्शन
जारी है और अभिव्यक्ति की आजादी के
नाम पर तमाम समाचार बेबपेज तक खुले
आम स्त्री पुरुष वग्नता सेक्स और
गंदी जानकारियाँ परोस रहे है ।किशोर
और
ुवा सबसे ज्यादा बलात्कार कर रहे है
तो बङे बुजुर्ग भी लङकियों को बेटी बहू
की बजाय मादा जिस्म समझकर
ही बर्ताव करते हैं ।
बहुत कम लङकियाँ है जो परिवार से दूर
रहकर पढ़ने लिखने जॉब करने की हिम्मत
जुटा पाती हैं ।
पता नहीं कौन
योनरोगी मनोरोगी योनमनोविकृत
कहाँ किस लङकी की आबरू लूट ले और मार
डाले ।
जनहित
लोकहित
स्त्रियों के हित
समाज संस्कृति और देश
की छवि मर्यादा सम्मान के हित में ।
कृपया तत्काल आदेश जारी करके हर
प्रकाश के अश्लील चित्रण प्रसारण
फिल्मांकन को सदा के लिये बंद करके यह
भी देखे कि अलग भ्रामक नामों से बिक
रही ऐसी गंदगी सामग्री ""जलवाना प्रारंभ
करे ""सारी महिलायें और जिम्मेदार भद्र
पुरुष इस अभियान में गाँव नगर कसबे
महानगर आपके आदेश को पीलन करवाने में
हरतरह तैयार है ।
आशा है
देश की बहू बेटियों बहिनों माँओं के
'धर्मपुत्र भाई और धर्म पिता की तरह
पदेन संरक्षक होकर आप तत्काल
सारी अश्लील साईटें बंद करायेगे और
अश्लील पोस्टर पैकेजिंग जलवायें
प्रसारण सख्ती से रोकेंगे ।
विनम्र आभार आशा और त्वरित
काररवाही की अपेक्षा के साथ ।
वन्देमातरम
जयभारत
सादर आभार सहित
प्रार्थी
सब गृहिणियाँ
बेटियों की माँयें
छात्रायें
मजदूर किसान
और कामकाजी महिलायें ।
सभी बहिनो के भाई
बेटियों के पिता
माँओं के बेटे
जो अश्लीलता पसंद नहीं करते ।
जो चाहते हैं कि देश हित में पोर्न साईटें
पब्लिकेशन प्रसारण मुद्रण बंद हो ।
केबल टीवी "वे सब पत्रिकायें जिनमें खबर
के नाम पर पोर्न स्टार
विदेशी देशी लङकियों के नग्न चित्र
छपते हैं बंद करवायें ।
हम जानते है बहुत मुश्किल है
बिगङी को सँभालना । किंतु आप देश
की हर बेटी के संरक्षक धर्मपिता हैं और
उन सबकी गुहार है । रोम एक दिन में
नहीं बना था । इंडिया को भारत बनाने
में भी समय लगेगा परंतु कठोर और तत्काल
कदम तो उठाने ही होंगे जो युगों तक
याद रखे जायेगे ।
स्त्रियों पर अश्लील चुटकुले और
""वासना भङकाऊ विज्ञापन भी बंद
करवाईये ।
एन जी ओज का साथ लें और गैर
सरकारी संगठनों से मदद माँगे और
स्कूली एन सीसी स्काऊट गाईड
का सहारा ले ।
निजी तौर पर हमने जन्मभूमि और
कर्मभूमि में ऐसे तमाम प्रयास किये और
काफी सफल रहे परंतु हम हार रहे है
तो ""मोबाईल टीवी अखबार में जा घुसे
अश्लीलता के राक्षसों से ।
आगमन आपका भारत के उद्धार को है ।
यही भरोसा कमजोर स्त्रियाँ महसूस
करतीं हैं ।
विशेष कर बच्चे जो कामुक अश्लील
प्रसारण प्रकाशन सीरियल किताबें
देखते हैं अकेले दुकेले में ऐसी कुचेष्टायें खुद
कर डालते हैं और यही वजह है
कि नाबालिग बलात्कारी बढ़ रहे हैं और
जघन्य कांड कर रहे हैं । खतरा पैदा होने
से मरने तक की हर आयु की स्त्री पर ये
अश्लील प्रसारण देखने वाले बने हुये हैं ।
क्या भारत
की बेटी होना ही स्त्री का दुर्भाग्य
है??
जिस किसी विज्ञापन
को देखो मादा को पटाने रिझाने
या मर्द को वश में करने के लिये सारे
उत्पाद बेचता दिखता है!!!!!!
सबसे अधिक बच्चे दूषित हो रहे हैं
उनको लगता है ये सब तो एक नॉर्मल गेम
है और नैतिकता चरित्र
परपीङा परसेवा कानून तब तक समझ में
आता ही नहीं ।
गिरे तो गिरते चले गये "
क्या भारत "वेश्याओं और बलत्कृत
लाशों का देश बनकर रहने को छोङ
दिया जाना चाहिये?
कानून के रखवाले तक अश्लील सामग्री में
उलझे पङे यत्र तत्र मिल जाते हैं!!!
विधायक सांसद टीचर डॉक्टर वकील
पत्रकार तक यदा कदा ऐसी हरकतों में
लिप्त पाये जाते हैं ।आहार निद्रा भय
मैथुन तो पशु और मानव में समान हैं । किंतु
पशु हर समय हर आयु हर जगह यौन
गतिविधियों पर ही नहीं केन्द्रित
रहता । आज टीवी उद्घोषिका का जब
तक कपङा डीप गले का न
हो लोगों को समाचार
अच्छा नहीं लगेगा ऐसा लगता है
तो निसंदेह कचरा सब जगह है ।
घरों में पिता भाई चाचा और नाते दार
डराते है । मुहल्ले में पङौसी और स्कूल में
टीचर चौकीदार माली ड्राईवर ।
दफ्तर में कलीग और बॉस ।
कहाँ जायें स्त्रियाँ????
क्या हर वक्त तैयारी में
रहा जा सकता है कि मौत और बलात्कार
कहीं भी किसी का भी हो सकता है??
बच्चों को अब एक साथ खेलने
छोङना डरावना है । जब नादान लङके
तक साथी मासूम लङकी का बलात्कार
करने की हरकतें कर डालते हैं ।
समाचारों पर गौर करे ग्यारह बारह
साल के लङके तक रेपिस्ट बन रहे हैं । और
जो नहीं है वे बातें ताने फिकरे चुटकुले और
छेङछाङ तो करते ही है । लङके
ही लङकों को रेप कर डालते है रैगिंग के
नाम पर ।
हमारा निवेदन है कि एक तत्काल
सख्ती अश्लीलता के खिलाफ
की जानी जरूरी है । दूसरी है दंड जाँच
और तुरंत एक्शन । दिन रात पेट्रोलिंग ।
गाँव गाँव घर घर शौचालय और
महिला टॉयलेट हर पब्लिक प्लेस पर और
महिला पुलिस हर थाने पर और हर गाँव
नगर में महिला सुरक्षार्थ एन जी ओ
का गठन दूसरा कदम हो सकता है । हमने
ऐसे कार्य छोटे पैमाने पर किये और
काफी सुधार आया । एर
परखनली प्रयोग ही सही परंतु निराश
होकर बैठना नहीं सख्ती और तेजी से
कार्य होने चाहिये ।
अश्लीलता को जनता की माँग कहने वाले
दैत्य संस्कृति के दीमक हैं । इन्हें तत्काल
रोकें ।
नमन
वंदन
पत्र लेखिका (सुधा राजे )


सुधा राजे का लेख :-(खरी - खरी) ---"""नेपथ्य में""

अच्छा?!!!!!!!!!!
तो ये लेखकों की बुराई है???
कैसे भला?
जो भी थोङा या घना लिखता और
पढ़ता सुनता रहा हो ',जिसे भी कवि
सम्मेलन लेखक सम्मेलन और मंच के देखने
सुनने का जरा सा भी अनुभव है वे सब
जानते हैं कि """"
ऐन मंच पर ही ठीक परदे के पीछे ही
क्या क्या चल रहा होता है ।
सब तो नहीं भले ही दो पाँच दस
प्रतिशत हों लेकिन अनेक ',
लेखक पत्रकार और ""अक्षरजीवी ""
ऐबी है
शराब कबाब और सुगरेट नशा साथ साथ
हो सका तो झरोखा दर्शन भी ।
इस माहौल को बहुत करीब से देखा है
',एक तो पद्मश्री महोदय को देखा जो
स्टेज पर ही धुत्त लुढ़क पङ रहे थे और
सिगरेट!!!!! तौबा लगातार इतवा धुँआ
कि आखिर कार हम और कुछ उस समय की
नवोदित कलमजीवी महिलाएँ दूसरे दौर
के काव्यपाठ तक रुकने से ही झिझक गयीं
और वापस लौट गयीं ।
कौन नहीं जानता कि ''''बंद लिफाफे अब
नहीं चलते अब पारिश्रमिक तय रहते हैं
और कई ''कवि लेखक तो ''अपनी दो चार
गिनी गिनीयी रचनायें ही बार बार
बार बार मंच पर शहर दर शहर सुनाते
रहते हैं ।
नया लेखन 'अनेक बार दबकर रहजाता है

वरिष्ठता के घमंड में 'अवसर ही नहीं देते
अनेक साजिशें उस नवीन लेखक की रचना
पैरोडी चोरी या आईडिया तक चनराने
की चलती रहतीं हैं ।
कई बार तो रचना "किसी दूसरे गुमनाम
लेखक की 'लाईन पर डेवलप्ड होती है ।
लेखक या पत्रकार शराब नहीं पी सकते
ऐसा कोई कानून नहीं
किंतु
परउपदेश कुशल बहुतेरे """""
वाली हालत भी तो ठीक नहीं!!!!
इस शराब सिगरेट का इतना उबकाऊ
माहौल कई बार देखना को मिला कि
परिजन बङे साथ न होते तो 'कभी हम
मंच पर जा ही नहीं पाते!!!
आज अगर मंच छोङकर अज्ञातवास पर हैं
तो वजह यही मंच का नेपथ्य है जहाँ
बिना महिलाओं की उपस्थिति की
परवाह किये, 'धुआँ और दुर्गंध फैलाने वाले
समाज को दिशा और संवेदना देने चल
पङते हैं ।
कहने वाले कह सकते हैं कि मंच से रचना
पढ़ने के बाद
कौन क्या खाता पीता है कहाँ जाता
क्या करता है किसी को कोई मतलब
नहीं!!
परंतु क्या वाकई??
नियम तो यही होना चाहिये कि "
कविसम्मेलन और साहित्य सभायें
सेमिनार
जब तक चलें और जितने समय एक "अतिथि
रूप में लेखक वहाँ मौजूद रहे उतनी देर
नशा शराब गुटखा तंबाकू चिलम भाँग
सिगार सिगरेट बंद रहनी चाहिये ।
आयोजक के पैसे से हो निजी खीसे से 'नशा
बंद रहना चाहिये ।
सिनेमा कलाकारों की तरह ही
साहित्यकार भी पब्लिक फिगर होते हैं
और फैन पाठक श्रोता उनको मानते हैं
पूजते हैं ।
जैसा आचरण उनका प्रिय लेखक या कवि
करता है "वैसा ही आचरण जाने अनजाने
उनका पाठक करने की कोशिश करता है

बचपन में हम स्वयं 'चुरुट या सिगार देखते
तो पीने का मन करने लगता 'घर पङौस
के बङों के डर से ऐसा किया नहीं परंतु '
एक महान कहानी पत्रिका के
नामधारी संपादक उपन्यासकार को जब
पाईप पीते देखा तो अधकच्चे मन में आया
तो था कि """बढ़िया लेखन का मतलब
''जाम सिगार पाईप धुँआ भरी जिंदगी
होता है "
ये
सब लिखते समय किसका मूड किस बात से
बन रहा है वही जाने कोई चाय कॉफी
तक नहीं लेता तो कोई लहातार चेन
स्मोकर है ।
किंतु सवाल वहाँ खङा होता है जब कोई
ये कबे कि "मंच या सम्मेलन के आयोजन
गोष्ठी के पीछे पीने पिलाने की
"व्यवस्था करो!!!!!!
कम से कम हम निजी तौर पर ऐसे
पियक्कङपन के सख्त खिलाफ है यह
कदाचार की श्रेणी में होना चाहिये ।
हिंदी विकास की बात करते है हिंदी
की "आत्मा सत्य मौलिकता और
अनुशासित आचार ही तो है ।
कबीर रैदास सूरदास तुलसी भूषण केशव
कौन सा ठर्रा पीते थे??????
नशा
व्यक्ति की निजी कमजोरी है
धूम्रपान एक गंदी ऐब है
और घर के बाहर कहीं भी ऐसा
करनेवाला गलती ही कर रहा है चाहे
बहाना कुछ भी ले ।
तिस पर यदि वह समाज का दिग्दर्शक
वर्ग यानि लेखक पत्रकार होकर अपने
घर से बाहर शराब सिगरेट पीता है तो
""वह दोमुँहा सर्प है जो कहता बङी
बङी आदर्श की बाते है "करता गलत है "
ऐसे लोग मंच पर बुलाये ही नहीं जाने
चाहिये जो "नशा करें "धूम्रपान करें और
स्त्रियों की उपस्थिति में अश्लील
हरकतें करें गंदे कविता चुटकुले संवाद पढ़े
और संस्कृति के खिलाफ आचरण करें ।
भले ही उनको करोङों रुपया किताबें
छपने से मिल रहा हो ।
सच
कङवा होता है और कङवा हर किसी के
बस की बात नहीं '।
जिन लेगों का असर पब्लिक पर पङता है
उनकी हर छोटी बङी बात मायने रखती
है
उनका हर बात व्यवहार ऐसा होना
चाहिये कि लोग आचरण में ढालें को
समाज सुधार हो
©®सुधा राजे


Monday, 7 September 2015

सुधारसोई :- करेला एक ; स्वाद अनेक।

करेला
केवल मधुमेह के रोगी के लिये ही नहीं अपितु सभी स्वस्थ लोगों के लिये भी
एक वरदान है ।
यह रेचक प्रकृति का होता जिससे कब्ज दूर होता है ।कई दिन बुखार आने के
बाद मरी मरी भूख यानि मंदाग्नि होने पर भी करेला भूख बढ़ाता है
और स्वाद मुँह का अधिक खराब हो तो करेला स्वाद ग्रंथियों को सक्रिय करता है ।
"""करेले बनाने की कुछ विधियाँ""
कङवे नहीं लगेंगे आजमा कर देखें
करेला पोषक तो है ही पेट साफ ऱखता है
रक्त शोधक है और भूख बढ़ाता है पेट के
साधारण कृमि अकसर करेले खाने से खत्म
हो जाते हैं ।

मधुमेह के रोगियों के लिये करेला एक
औषधि है और चना गेंहूँ मिश्रित आटे
की रोटी के साथ खाने पर रक्त
शर्करा को नियंत्रित रखता है । अकसर
पुरुषो बच्चों को करेले पसंद नहीं आते
क्योंकि कङवे बनते हैं । तो रेसिपी बदल
कर देखें ।
1-करेले ताजे हरे और छोटे आकार के लें ।
उनको हल्का सा छीले खुरच कर धोकर
पानी सुखा लें और गोल
या अर्द्धचंद्राकार चिप्स की तरह
बारीक काट लें ।
अब कटे हुयें करेलों पर नमक छिङक कर
मिला दें और प्लेट को भारी ढक्कन से
दबाकर तिरछा करके रख दें ।
आधा घंटे बाद कङवा पानी निकल कर बह
चुका होगा और दबा दबा कर निचोङ लें ।
अब जितने करेले लिये हैं उतने ही वजन में
प्याज लें जैसे य़दि आधा किलो करेले लिये है
तो आधा किलो मोटे परत वाली प्याज लें

प्याज के बारीक लच्छे कर ले स्लाईसर
या छुरी से काटकर ।
फिर एक कच्चा आम ले और छीलकर कद्दूकस
कर लें ।
आम जब न मिले तो अमचूर पिसा हुआ ले लें
एक बङा चम्मच ।
सामग्री
एक चम्मच खङा साबुत धनिया
चार पाँच लाल साबुत मिर्चें
एक छोटा चम्मच मैथी दाना
चुटकी भर राई दाने
लेकर जरा सा तेल तवे पर रखकर भून ले
कि हल्के कुरकुरे हो जायें ।
और फिर पीस लें सब चीजें एक साथ ।
अब
लहसुन कतरा हुआ बारीक
और सौंफ दाना एक बङा चम्मच लेकर
कड़ाही में तेल गरम करें ।
एक पत्ती रतन जोत डालकर सौंफ लहसुन
छोङकर आधा मिनट चलायें और करेले प्याज
एक साथ छोङ दें ।
चलाकर नमक डालें याद रहे अंदाज से
आधा ही नमक डालें ।
और अब पिसी हुयी सादी धनिया पाउडर
हल्दी मिर्च पाऊडर और गरम
मसाला मिक्स पाऊडर डालकर चलाकर
ढँक दें ।
दस मिनट बाद जो मैथी राई
मिरची धनिया भूनकर पीसे थे उनको बुरक
कर चलायें ।
एक मिनट बाद कतरा हुआ आम या अमचूर
डालकर फिर ढँक दें और आँच बंद कर दें ।
दो मिनट बाद फिर चलाकर आँच
धीमी करके चलायें और उतार कर ।
चाहे
तो कसूरी मैथी 'सूखा पोदीना पत्ती पाउडर
और हरी धनिया कतर कर डाल सकते हैं ।
स्वादिष्ट करेले तैयार है ।
आप अरहर की छोकी गयी दाल चावल
बेसन की रोटी के साथ करेले खाकर देखें ।
दूसरी विधि अगली किश्त में

2-जो लोग मिर्च मसाला पसंद नहीं करते उनके लिये,
करेले हरे छोटे आकार के लें छिलको को केवल खुरच ले पूरी तरह छीलें नहीं,
नमक हल्दी और दो चुटकी अमचूर पाउडर या आधा नीबू निचोङ दें औऱ एक प्लेट को
तिरछा करके भारी ढक्कन से ढँक दें ।दो घंटे बाद हलके हाथ से दबाकर निचोङे
और सरसों के तेल में कुरकुरा होने तक तल लें ऊपर से दरदरी काली मिर्च
छिङककर परोसें ।
3--भरवाँ करेले बनाने के लिये करेले बीच से एक तरफ काटकर दूसरी तरफ से
बटुए की तरह जुङा रहने दें बीच निकाल कर रख लें ।
एक चम्मच सूखे धनिया बीज थोङे से दाने मैथी और एक चम्मच सौंफ आधा चम्मच
राई आधा चम्मच जीरा एक चुटकी हींग एक चुटकी भर दरदरी कुटी काली मिर्च
लेकर सपसों के तेल में हलकी आँच पर रंग बदलने तक भूने और उतार कर पीस कर
अलग रख लें ।
फिर चार पाँच लाल साबुत मिर्चें तेल में हलकी भूनकर उतार लें,
अब सब को पीस कर इसमें "नमक स्वाद अनुसार, पिसा धनिया पाऊडर पिसी हलदी एक
चम्मच आमचूर और चुटकी भर मिक्स गरम मसाला मिलायें और
इस तरह आधे तले आधे बिना तले मसालों का खुशबूदार पेस्ट बनाकर करेलें के
भीतर भर दें ।
फिर बारीक कतरी एक प्याला भर प्याज यानि सौ ग्राम प्याज लच्छे और पाँच से
कली लहसुन कतरी हुयी लें
गरम सरसों के तेल में सौंफ के चम्मच भर दाने डालकर प्याज लहसुन अदरक की
कतरन डालें और बचा हुआ मसाला पेस्ट डालकर भूने जब पर्याप्त भुन जाये तो
करेले रखें और बहुत सावधी से चलाकर ढँक दें गैस बंद कर दें ।
लगभग दस मिनट बाद गैस ऑन करे और दुबारा हलके हाथ से उलट पलट कर करेले
चलायें और एक कोने में फोर्क या चम्मच लगाकर देखें कि मुलायम हो गये हैं
तो उतार लें और
,,,
बेसन गेंहू का मिश्रित आटा वाली चपातियों तथा अरहर की दाल और बिना क्रीम
वाले दूध के दही के साथ परोसें ।
हर हफ्ते कम से कम एक दिन करेला अवश्य खायें ।
और हाँ यात्रा में ले जाने हेतु करेला सबसे सुरक्षित सब्जी है जो तीसरे
दिन तक भी खराब नहीं होती ।
,,,
अगर मधुमेह नहीं है
इस सब्जी में हल्का सा पिघला हुआ गुङ या चीनी भी मिलाकर स्वाद बदला जा सकता है ।
अमचूर की जगह इमली भी डाली जा सकती है, और खट्टा गाढ़ा दही भी कपङे से
छानकर मसाले में मिलाकर खट्टा किया जा सकता है ।

करेले का अचार
भी आम के अचार में मिक्स करके रखा जा सकता है ।।
जिसकी विधि अगले अंक में
©®सुधा राजे।