Monday, 28 September 2015

सुधा राजे का अकविता :- "हमारे घर जन्मी है सोन-चिरैया "

तुम न थीं तो भी मैं थी बेटी,
तुम हो तो भी मैं हूँ बेटी '
क्योंकि तब मैं माँ की बेटी थी,
अब बेटी ममता की पिटारी लेकर मुझे वैसे ही बचाती है जैसे माँ,
मैं माँ थी जब बेटी थी ",,माँ के कुंतल स्नेह से सींचती सँवारती पदनख
आलता महावर मेंहदी रखती, माँ की साङी पर गोटा टाँकती, ''मैं अब भी माँ ही
बस हूँ जैसे और कुछ भी नहीं जैसे विश्व की सब लङकियाँ मेरी बेटी लगने
लगतीं है प्रायः मुझे, और मैं झगङती रहती हूँ उनके लिये अनजानी छायाओं
से, टाँकती रहती हूँ उनकी कमीजों पर बारूदी विचारों से भरी कविताओं के
सितारे और रचाती हूँ उनके हाथों में मेंहदी के रूप में अपनी जिजीविषा की
सुर्ख अभिलाषायों सपने भरोसे स्वयं पर और अविश्वास करना सिखाती रहती हूँ
हर आलता महावर और रंग रूप की परिभाषा पर, '
मेरी बेटियाँ हर नगर में हैं हर गाँव में हैं और चाहती हूँ वे कलम उठायें
मंच पर चढ़े माईक और कीपेड पर अभिव्यक्त हो अक्षरों में उतरें और सृजन
करे नयी सृष्टि के नये वास्तु का जहाँ रसोई घर में माँ और बेटी बहू ही
होनी जरूरी नहीं होगीं नहीं होगा केवल उनके ही हिस्से परिवार की हर गंदगी
साफ करने का दायित्व न ही, केवल उनकी ही होगी अग्निपरीक्षा और न ही केवल
उनको ही होना पङेगा बाबुल माँ के घर से विदा न केवल वे ही होगीं हर
'संस्कार की बलिवेदी पर ज़िबह "
मैं जानती हूँ ये सब एक दिन होकर रहेगा और चाहे वह सुबह देखने से पहले
मुझे नींद आ जाये "परंतु तुम सब देखना मेरी बेटियों ',एक दिन सचमुच आधा
गगन आधी धरा आधी हवा सिर्फ तुम्हारी होगी और तब ',
थाली बजाती हुयी घर घर हर बेटी के जन्म पर एक 'आवाज गूँजेगी मेरे ही
गीतों की कंठ कंठ से ""हमारे घर जन्मी है सोन चिरैया,, छत पे नाचे बाबुल
अँगनवा में दादी, द्वारे पे नाचे हैं बेटी के भैया "
©®सुधा राजे
शब्दशः मौलिक रचना
--

No comments:

Post a Comment