Saturday, 31 May 2014

सुधा राजे का लेख :- कितने हैवान कितने दरिन्दे,,,,, ★*लेख ★*

कितने हैवान कितने दरिन्दे,,,,,
★*लेख ★*


बलात्कार स्त्री शरीर का नहीं "सभ्यता और भारतीय संस्कृति का हो रहा है
।लगभग तीन दशकों से हम स्त्री विमर्श पर लिख भी रहे हैं और गाँव कसबे में
समाजसेवा सरोकारों से भी जुङे हैं ।
एक ही बात निचोङ में आती है बार बार कि "स्त्री "होना तो भारत ही नहीं
किसी भी ऐसे देश में मत होना जहाँ "कट्टरवादी "हावी हो ।
वैदिक युग को लोग साजिशन भुलाना चाहते हैं । और सनातन धर्म के बारे में
तमाम कथायें तोङ मरोङकर चाटुकार और षडयंत्रकारी इतिहास कारों ने रची और
गढ़ी है । भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के आने के पहले से ही भारतीय
कला और ज्ञान को चुराया गया तोङा फोङा बदला जलाया और नुकसान पहुँचाया गया
। फिर भी ।
जो कुछ शेष रहा वही आँखें खोल देने के लिये काफी है ।
लोग सती प्रथा को दोष देते हैं और बाल विवाह को परदा प्रथा और दहेज प्रथा को ।
क्या कहीं से भी यह प्रमाणित हुआ है कि किसी भी स्त्री को जबरन मार डाला
गया केवल विधवा होने पर?
यदि ऐसा होता तो कौशल्या सती हो गयीं होती कैकयी और सुमित्रा भी ।
कुंती को भी सती कर दिया गया होता और
अंबे अंबालिका को भी ।
वैदिक युग की स्त्रियों का चरित्र महान था तो पुरुषों को भी चरित्र पर
नियंत्रण रखना पङता था ।
परदा प्रथा भारत में नहीं थी भारतीय स्त्रियों को खेत बाजार मेले मंदिर
युद्ध दरबार और शास्त्रार्थ में भाग लेने की पूरी छूट थी । तब कार्य के
आधार पर वर्ण घोषित होते थे और योग्यता के आधार पर विवाह इसलिये स्वयंवर
और प्रेमविवाह स्त्रियों के अधिकार थे ।
भारत में जैसे जैसे विदेशी आक्रमण बढ़े विदेशियों ने संपत्ति के साथ
भारतीय स्त्रियों के अपहरण किये । सीता के लिये भयानक युद्ध ठानकर प्राण
के बदले स्त्री को वापस लाकर सम्मान पाना भारत की संस्कृति थी । स्त्री
का अपमान करने वाले का प्राणान्त बालि रावण कंस दुशासन दुर्योधन की तरह
कर दिया जाता था और छल करने पर देवता तक को ""पूजा से वंचित कर दिया जाता
था इंद्र और ब्रह्मा की भाँति बहिष्कृत ।
स्त्री को सजा सँवारकर रखा जाता था और मायके वाले ससुराल वाले दोनों ही
सदैव उसे गहने कपङे जेवर भोजन प्यार मनोरंजन आदि के साथ माता बहिन बेटी
भांजी और अर्द्धांगिनी का सम्मान देते थे । स्त्री की रक्षा के लिये लोग
प्राण तक लेने और देने से नहीं हिचकते थे । स्त्री गौ कन्या विद्वान और
बालक दंड से कर से और बंदीगृह से मुक्त थे इन पर प्रहार करना पाप समझा
जाता था ।
परस्त्री को चुपके से देखना और छूना प्राणदंड कारी अपराध था ।
स्त्री के बिना कोई यज्ञ हवन प्रार्थना मंगलकार्य पूरा नहीं समझा जाता था
। स्त्री को अशुभ और बुरे कार्यों से दूर रखा जाता था । कन्या अग्नि माता
गौ और विद्वान को पाँव से नहीं ठुकराया जाता था


संपत्ति में से हर फसल पर बेटी बहू माता भांजी भतीजी पत्नी को भेंट उपहार
चौथाई उपज तक का हक दिया जाता था । कहीं भी स्त्री के आने जाने पर रोक
टोक नहीं थी । हर प्रारंभ कन्या और सुहागिन स्त्री के दर्शन और आशीर्वाद
से प्रारंभ होता था ।
हर देवता के साथ उनकी पत्नी का भी पूजन पति से पहले किया जाता था ।
स्त्री को रुलाना अधर्म समझा जाता था । गर्भवती स्त्री कन्या और सुहागिन
की "फरमाईश "हर हाल में पूरी की जाती थी चाहे वह देवलोक का पारिजात ही
क्यों न माँग ले ।
स्त्रियों के प्रसन्न रहने के लिये घर और नगर गाँव में उत्सव और
सुविधायें की जाती थीं ।
जिन घाटों तालों नदियों कुँओं पर स्त्रियाँ स्नान करतीं थीं वहाँ पुरुषों
का जाना निषिद्ध था । पुरुष ही अपनी मर्यादा का पालन करते थे ।
याद रखें जब विदेशी शत्रुभाव से हमला करके स्त्रियों के अपहरण बलात्कार
और अनाचार करने लगे तब भारतीय स्त्रियों ने स्वयं ही "अग्नि जल और विष से
प्राणान्त करने प्रारंभ किये अपने स्त्रीत्व की रक्षा के लिये ।
तब भी भारतीय लङे और अपने प्राणों की बाजी लगाते रहे अपनी बहिन बेटी माँ
पत्नी और गाँव नदर की स्त्रियों की रक्षा के लिये ।
मध्यकाल तक आते आते भारत पर विदेशी अत्याचारी ऐयाश शासकों का अनाचार
बढ़ता गया और नगरों में परदा प्रथा सती प्रथा बाल विवाह स्त्री को घर में
बंद करने की कन्यावध की परंपरायें बनती चलीं गयीं इनके पीछे """एक ही
कारण था """विदेशी आक्रांताओं के अपहरण बलात्कार और स्त्री को वेश्या
दासी और खरीदने बेचने अत्याचार करने वालों से ""हर तरह हर हाल ""में
बचाना ।

स्त्रियाँ छिपाकर रखने के पीछे भारतीयों का स्त्री के प्रति सर्वोच्च
सम्मान था । स्त्री सदैव दबाव से विवाह छल बलात्कार और अपमान
करने वाले लोग प्राणदंड के पात्र माने गये और राम कृष्ण भीम काली दुर्गा
हो या शिवाजी प्रताप ऐसे लोगों को दंड देते रहे ।
इसलिये जब देश में व्याप्त कुरीतियों पर चर्चा की जाये तो ""कालक्रम और
कारण ""को भी ध्यान में रखा जाये ।
क्रमशः जारी """""
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com

सुधा राजे का लेख :- कितने हैवान """""

आज जो वातावरण बना हुआ है उस
वातावरण में बलात्कारियों दंड
तो देना है ही अति आवश्यक और
तत्काल भी । साथ ही आवश्यक है
कि वे सब कारण दूर किये जायें जिनके
होने से "स्त्रियों पर आक्रमण होते हैं

1*"मानसिक "
भारत में जिस तेजी से सूचना संचार
का विस्तार हुआ है उसी तेजी से
अश्लीलता और ब्लू फिल्मों पोर्न
बेबसाईटों गंदी अश्लील
किताबों फिल्मों टीवी सीरियलोंअश्लील
पोस्टरों और चित्रों का आक्रमण
भी गाँव गाँव नगर नगर घर घर स्कूल
कॉलेज आश्रम अस्पताल सब जगह पहुंच
रहा है ।
ये सब देख सुनकर पढ़कर """दैहिक
वासना भङकती है ''''लोग बुरी तरह
इसी हवस और उत्तेजना से भरे जब
होते है तो सेक्स की प्रबल
इच्छा विवश करती है """ऐसे
मानसिक हालात में विवेक खत्म
हो जाता है और अश्लील किताब
पढ़कर फिल्म देखकर या विज्ञापन
टीवी सीरियल नाच गाना देखकर
""दैहिक वासना की आग में
जलता असंयमी पुरुष """आसपास कोई
भी स्त्री देखकर तत्काल उसे
ही पाकर भूख बुझा लेना चाहता है ।
ये भूख जब बुझाने
को स्त्री नहीं मिलती तो आसान
शिकार """छोटे और किशोर बच्चे
मिलते हैं या कमजोर लङके
""बलात्कार या कुकर्म ""जैसे अपराध
इसी मनोदशा में होते हैं
घरेलू स्त्रियों का घर के नाते
रिश्तेदारों द्वारा किये गये
बलात्कार कुकर्म और बहला फुसलाकर
दुष्कर्म के कारण """सबसे पहले
""मानसिक हालात """बेकाबू और
भङकी हुयी वासना की आग है ।
जिसकी वजह है """हर तरह हर समय
हर किसी के पास
बरसती """अश्लीलता सेक्स और पोर्न
सामग्री """

""पर विरोध प्रकट वे नहीं कर
सकतीं जो घर में शराबी पति पिता ससुर
जेठ भाई """"""से लात जूते खातीं हैं
""""""""महानगरों की चंद
अभिनेत्रियाँ पूरा समाज
नहीं हो सकतीं """"""""और गाव कसबे
शहर """की लङकियाँ """""कहीं भी आज
भी इतनी आजाद नहीं हैं
कि """""""माँ बाप भाई को पति ससुर
को पता न चले """"""और सिनेमा देखने
चलीं जायें """"""ना ही सलवार कमीज
या जींस शर्ट कोई अश्लील कपङे हैं
"""""साङी से अधिक परदा देते है
"""""टीवी शो में जो लङकियाँ है वे
"""सवा करोङ हिंदुस्तान की दस
प्रतिशत भी नहीं """""और
उनको खतरा भी नहीं

जो लङकियाँ अश्लील कपङे पहनती है वे
आम गली मुहल्लों गाँव नगर में
नहीं रहती """""""और
ऐसा तो क्या कि दो साल
की बच्ची भी अश्लील?????
अस्सी की दादी भी अश्लील?????
पापी तो पुरुष की आँखें हैं """"औरत
का बदन तो जैसा है सो है ही """""दिखे
या ढँका हो """"""रेप का हक किसे
है??????? यूरोप में समन्जर किनारे एक
फीट कपङे में ढँकी तमाम
लङकियाँ मिलती है """""""लेकिन
वहाँ """सबसे कम रेप होते है """"और सबसे
कम घरेलू हिंसा """""भारतीय पुरुष है
ही क्रूर अधिक मामलों में परंपरा बन
चुकी है """घरेलू हिंसा और
लङकों को पूरी आजादी।
किसी की बहू घर पर अकेली है
कि पति कहीं काम से गया और ससुर जेठ
या किसी पङौसी की हवस
का शिकार!!!!!!

किसी की दादी गंगास्नान पर जाती है
और """रेप कर दी जाती है ""

किसी लङकी को ट्यूशन जाना है आते जाते
"""पान की दुकान चाय के ढाबे पर
गिरोह बनाकर लङके कंकङ मारते है
गालियाँ देते है गंदे इशारे करते है कपङे
साईकिल किताबे खींच देते है
""""""बूढ़ा बाप या जवान भाई बचावे
को जाता तो """"""जान से मार
डाला जाता है?????? और जब लोग
विरोध करे तो दंगा????
औरत बीमार है अस्पताल में भरती है और
बार्ड बॉय डॉक्टर स्टाफ की शिकार
हो जाती है???

जींस से अधिक सुरक्षित कपङा क्या है???
मजबूत बेल्ट और दौङ भाग में सरल
"""""अकसर रेप """साङी और परदे वाले
कपङों दुपट्टों वालियों के भी हो जाते हैं
"""""बदन है तो क्या """"टीन
या टंकी पहन कर ढँका जायेगा????

लङके कच्छा दिखाते कपङे पहनते है वह
अश्लीलता नहीं है?????

लङके ""कहीं भी पेशाब करने खङे हो जाते
हैं यह अश्लीलता नहीं है????

लङके कहीं भी """"किसी भी आयु की औरत
लङकी बच्ची को """जबरन छूने नौंचने
घिसकर निकलने """"घूरने """बकने
"""की हरकते करते हैं """"यह सब अश्लील
नहीं है????

टिकिट देते समय कंडक्टर
लङकियों को जबरन छूता है """""चैकअप के
समय डॉक्टर पर शैतान सवार """"ऑटो में
ड्राईवर जानबूझ कर शीशे से
लङकियाँ घूरता है
"""""इनकी फैमिली हो तो न
हो तो """पराई स्त्री के प्रति ये हरकतें
क्या है??????? गंदी नाली के
कीङों की नसल????

लङकी दिखी """कि जानबूझकर
"""जाँघों के जोङ खुजाने लगना!!!!!!!!!
बदतमीजी की हद है!!!!!!! क्या हर
स्त्री ऐसे पागल कीङे
मकौङों जानवरो के लिये """"""बिछने
को तैयार होकर घर से
निकलती है????????

जानबूझकर ""औरतों के सामने गंदी अश्लीश
गालियाँ दोस्तों को देना?????? ऐसे सब
पुरुष """एक ही नसल के कीङे है
"""वासना में पागल नखदंत वाले वे
जानवर जिनको ""हाईड्रोफोबिया
हो जाये तो गोली मार
दी जाती है??????? ऐसे पागल
हवसी """"हर जगह है दफतर घर गली बस
ट्रेन बाजार मंदिर अस्पताल

कैसे ढँके औरत अपना बदन????????? लोहे के
गोल डिब्बे पर ताला लगाकर बाप को दे
दे?????? क्या लाख पर
दो ही सही """"बाप कजिन
चाचा मौसा फूफा ताऊ
बाबा नाना """तक रेपिस्ट नही??????
उस समय क्या अश्लीलता????

कॉलेज के लङके """हर क्लासमेट ""का कम
मजाक बनाते होगे
जितना """""उम्रदराज कवि लेखक
पत्रकार वकील पुलिस
नेता """अपनी कलीग महिलाओं के
"""""पहनने ओढ़ने पर टोंट """करते हैं

कविता में """""हास्य """"के नाम पर
सबसे अधिक मजाक औरत का ही उङाते है
"""""सङे दिमाग के कलमची

अगर औरत """अपनी मरजी से अपना बदन
किसी को सौंप दे और सुख महसूस करे
तो????????? बदचलन छिनाल
कुलटा?????? बाप भाई की नाक
कटती है???????

पुलिस तो रक्षा के लिये होती है न??????
किस स्त्री में हिम्मत है जो रात बिरात
"""""किसी दरिंदे से बचने के लिये
""""कोतवाली थाने की शरण ले ले??????
सबसे बङा शराबी महकमा ''''''

मंत्री जी?????? संविधान कानून धर्म से
तो """"शासक हर
स्त्री का सिवा अपनी बीबी के
"""""पिता पुत्र भाई रक्षक है???????
फिर ये होटलों में कौन पकङे जाते हैं???
कौन कौन परायी लङकियों को खरीदते
हैं??? मजबूर करते हैं """""वहाँ कौन
सी अश्लीलता करने जाती है
लङकियाँ????धर्मगुरू?????

ये कहाँ से आती है
लङकियाँ वेश्यालयों में???????? कम उमर
की नाबालिग वेश्या ही सब से पहले
माँगी जाती है!!!!!!!!!! किसकी औलादें हैं
वेश्याओं की गोदी में??????? कौन हैं
जो अपनी संताने होश आने से पहले बेचकर
चले आते हैं कोठों पर रेप होवे के लिये
""""????या वे चुराकर बेची जाती है
अत्याचार से तोङी जाती है???

क्यों """"पागल
हवसी वहशी कुत्तों की तरह """"""समाज
का अधिकांश पुरुष वर्ग
""""""लङकियों और बच्चों के देह
को भँभोङने के पीछे पङा है?????
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक और अप्रकाशित है।

Friday, 30 May 2014

सुधा राजे का लेख --""हिंसक कुप्रथाओं में छिपे स्त्री शोषण के बीज।""

सती प्रथा के अंत के बाद भी लोग
नहीं बदले हैं,
जीवन और मृत्यु दोनों पर
जीवात्मा का वश जब नहीं है तब
किसी हादसे या बीमारी या बुढ़ापे
से दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु
का उत्तरदायी किसी की स्त्री को कैसे
ठहराया जा सकता है ।
जिस उत्सव और तङक भङक से विवाह
किया जाता है
उतनी ही विद्रूपता से एक
विधवा का अपमान परंपरा के नाम
पर किया जाता है ।
एक तो वह स्त्री वैसे ही दुख से
निढाल और आगामी जीवन के लिये
तरह तरह की आशंकाओं से ग्रस्त
होती है ।
उसी पर क्रूरता पूर्वक
उसको जो जो ढकोसले बूढ़ी बुजुर्ग
औरतें करातीं हैं """चीत्कार
हाहाकार और आर्तनाद के बीच """"
किसी भी कोमल मन का विदीर्ण
हो जाना स्वाभाविक है ।
ऐसा घोर कुकृत्य परंपरा के नाम पर
कब तक ढोया जायेगा!!!!!!!
आया है सो जायेगा राजा रंक फकीर

तब विवाह के बाद चाहे अस्सी बर।
साथ रहे हों दो में से एक को पहले
जाना है । कभी पुरुष कभी स्त्री ।
जब स्त्री पहले मृत्यु को प्राप्त
हो जाती है तब अधिक कुछ रस्म
रिवाज़ नहीं रहते । एक दाहसंस्कार
और दूसरे गंगभोज के ।
किंतु यदि ईश्वर की क्रूर दृष्टि से
पुरुष पहले काल कवलित हो जाता है
तब दुख चरम सीमा पार करने
लगता है ।
एक तो कमाने वाले
मुखिया की पतवार टूटने
की व्यथा दूसरे
साथी का बिछङना तो समान रूप से
है ही हृदय विदारक । फिर ये क्रूर
परंपरायें स्त्री को नदी तालाब पर
पकङ कर खींचते चीखते रोते चीत्कार
करते ले जाना और वहाँ सब सुहाग
धोकर विलाप
मचाना चूङियाँ तोङना बाल बिखेर
कर काटना और गीले वस्त्रों में छोङ
देना!!!!!!!!!
अब जब तक कोई भाई भतीजा आकर
कपङे ना ओढ़ाये वह पङी लोटती रहे
धूल रेत पर ""जीवित शव
""की बेशरमी ओढ़कर कि उसमें साहस
नहीं चिता पर कूदने का!!!!!!!
क्या निहितार्थ हैं ऐसी कुप्रथाओं के?
कि विवाह करते
ही जो लङकी ""कन्यादान ""करते
पराई हो गयी । पूरा जीवन जिस
पति सास ससुर जेठ देवर की सेवा में
बिताया बच्चे पाल पोसकर बङे किये
दुख सुख सब मायके को अलग समझकर
पराये घर को अपना कहकर सहे
""""बंधुआ की तरह काम काज में
खटती रही """वही स्त्री जिससे यह
अपेक्षा की जाती है
कि ""मायका ""भूल जाये!!!! वही
जब उसका पुरुष उससे पहले दिवंगत
हो जाये तो ', फिर अब उस पुरुष के
परिवार से उसका कोई नाता न
रहा????
वह एक अनाथ हो गयी???
वह फिर से मायके
की ही जिम्मेदारी बन गयी????
यदि मायके वाले किसी कारण साथ न
दें तो??
यदि मायके में कोई भाई भतीजा न
हो तो??
इस परंपरा के अनुसार वह एक
अभागी पापात्मा मनहूस स्त्री है
जिसको घर नें रहने का अधिकार
नहीं है ।
और
यदि भाई भतीजे शरम की चादर और
सूनी कलाईयों पर मायके के सहारे
की चांदी की चूङी न डालें तो वह
स्त्री कहीं भी जाये अब????
बेशक क़ानून विधि संविधान ने
विधवा को बहुत सारे अधिकार दे
दिये हैं और वह
पति की संपत्ति की स्वामिनी है ।
किंतु यह समाज कब ऐसी बेहूदा क्रूर
परंपराओं से मुक्त होगा??
एक तो वह स्त्री वैसे
ही दुखियारी ऊपर से उसको पकङ
पकङ कर घसीटती नोचती निराभृत
करती बूढ़ी बुजुर्ग औरतें धोबिनें और
क्रूर क्रियाकांड!!!!!!!
कितने व्रत उपवास सेवा पूजन पाठ
और मन ही मन याचनायें करतीं हैं
स्त्रियाँ ""सुहागिन ""मर जाने के
लिये ।फिर भी पति से पहले
यदि नहीं मरीं तो इस अपराध
की कितनी क्रूर तरीके से
दी गयीं ""यातनायें ""इनको कब बंद
किया जायेगा???
((आज एक रिश्ते की ननद
की दुर्दशा पर जिनकी आयु साठ वर्ष
है) )
©®सुधा राजे

511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौसिक और अप्रकाशित है।

Tuesday, 27 May 2014

सुधा राजे का लेख - सती प्रथा का विद्रूप चेहरा ।

कई दशकों से
""मथुरा ""वाराणसी ""और """कुछ
बरस पहले ''''हरिद्वार """
में""""प्रयाग """और देश के
गंगा यमुना सरयू गंडकी """के किनारे
बसे तीर्थों पर """""
गंगावास
और अंतमुक्ति के लिये """"घरों से फेंक
दी जातीं """"बूढ़ी औरतें """"
क्या कभी इनके लिये ""सेनेटोरियम
या ओल्ड एज होम या नर्सिंग होम
की तर्ज पर होस्टल
जैसी व्यवस्था """""नहीं की जा सकती??
ये औरतें ""खाते पीते
घरों की महिलायें होतीं है """
क्या उनकी प्रतिव्यक्ति जानकारी करके
उनकी संपत्ति के वीरिसों से """"उनके
सेहत इलाज और आवास """का व्यय
नहीं वसूला जा सकता """"?????
तीर्थों पर विधवाश्रम वृद्धाश्रम
और होस्टल जैसी सुविधा देकर
वहाँ इन ""बूढ़ी बेबस ""महिलाओं
को अंतिम समय के साल महीने सुकून से
काटने का इंतिज़ाम
नहीं किया जा सकता???
यूपी और उत्तराखंड के तीर्थ
""""""तमाचा है """"भारतीय
"""मातृदेवो भव की संस्कृति पर
""""""
अब तक शासन कर चुके दलों के विचार
और क्रियान्वयन पर ""

यह हरिद्वार की ही कलंक गाथा है
जहाँ ""सत्तर साल की वृद्धा से बत्तीस
साल के दरिंदे ने हर की पौङी के करीब
रेप किया ""

हमारा सोचना """दूसरा है """हम
हिजङों नपुंसकों महिलाओं
"""किसी की प्राकृतिक
कमी बेशी को """गाली ""नहीं बनने
देना चाहते ""रजिया बहिन हम साथ है
''हर भले कार्य के लिये
""हमारा नज़रिया प्रतिशोध
नहीं रचनात्मक सकारात्मक चिंतन
को बदल कर रख देना है """हर दिल तक
हर जरूररत मंद का दर्द जगाना है

गाली का उत्तर """गाली देने वाले
की आत्मा को झिंझोङने से
ही पूरा वरना माँ बहिन
बेटी जनानी और नपुंसक
होना तो """"मर्दवादियों ने
गाली बना ही डाली है ''

ये प्रथा """कैसे बंद हो कि लोग
बूढ़ी विधवा औरतों को ""गंगावास
तीरथ मुक्ति भेजना ही बंद कर दें?? एक
निदान विधवाश्रम है
तो दूसरा """समाज ""में
विधवा को सम्मानित जीवन
दिलाना भी


ऐसे """परिजनों को जेल में डाल
दिया जाकर मुआवज़ा और जुरमाना वसूल
करके विधवाश्रम बनाने को पहल
करनी चाहिये जो ""बेबस विधवाओं
को """घर से निकालने को धरम की आङ
लेते हैं """"जो उनकी संपत्ति तो हङपते हैं
""रोटी कपङा मकान नहीं देते """"कङाई
से गाँव कसबे थाने से सूचना निकालकर
"""""हर घर जमीन संतान परिवार
वाली "विधवा ""को इंसाफ
दिलाया जा सकता है और जब हजार लोग
दंडित होगे तो ""एक लाख लोग
गलती सुधारेगें
ये विधवायें """मालिकिन से
भिखारिणी """बना कर छुटकारा पाने
वाले सामाजिक भलेमानुष
का मुखौटा लगाये लोगों को पकङ कर
सार्वजिक नाम अखबार मीडिया नगर
पालिका ग्राम पंचायत थाने से ज़लील
किया जाना चाहिये ऐसे ""भेङ की खाल
में भेङियों को ""राज्य और केन्द्र सरकारें
ऐसी प्रथा को सती प्रथा से जोङकर देखें
और ""कठोरता से बंद करायें """बंगाल
बिहार उत्तरी और पूर्वी भारत '''में
अभी तक कई परिवार ऐसी भीषण
मनोरुग्णतावादी कुप्रथा पाले बैठे है
कि सती नहीं कर सकते तो ""तीरथ पर
फेंक दो अभागी को """

क्राईम का जहाँ तक सवाल है """""सबसे
ज्यादा अपराध ''''दैहिक सांपत्तिक
मानसिक आध्यात्मिक परंपरात्मक
"""""लैंगिक """"महिलाओं पर होते हैं
""""चाहे घर हो स्कूल हो बस ट्रेन
ऑटो गाँव नगर महानगर और
या वेश्यालय पब बार डिस्कोथेक
नाईटक्लब कैसीनो होटेल मॉटेल
कोठा कोठी महल झोपङी मंदिर सराय
दरगाह कुछ भी """"""""किसी भी आयु
की स्त्री गर्भ से लेकर अंतिम साँस तक
""""""""अपराध की शिकार


वह तो है ही """""किंतु इस ""स्टेटस
का मकसद """तीरथ स्थानों पर व्याप्त
"""घोर ""पाप पर सरकार जनता और
बुद्धिजीवियों का ध्यान खींचना है
"""""
तलाकशुदा औरतें """"भिखारिणी नहीं है
तीर्थों पर """उनकी समस्या घरेलू है ।
सामाजिक है ।
विधवाओं का तो यौन शोषण तक होने के
खुलासे हो चुके हैं ।
दो जून के भोजन के लिये ये विधवायें चार
बजे हर दिन हर मौसम में नहाकर मंदिर
मंदिर गाती हैं ।
तब लंगर की खिचङी और प्रसाद
मिलता है । वह तो है ही """""किंतु इस ""स्टेटस
का मकसद """तीरथ स्थानों पर व्याप्त
"""घोर ""पाप पर सरकार जनता और
बुद्धिजीवियों का ध्यान खींचना है
"""""
तलाकशुदा औरतें """"भिखारिणी नहीं है
तीर्थों पर """उनकी समस्या घरेलू है ।
सामाजिक है ।
विधवाओं का तो यौन शोषण तक होने के
खुलासे हो चुके हैं ।
दो जून के भोजन के लिये ये विधवायें चार
बजे हर दिन हर मौसम में नहाकर मंदिर
मंदिर गाती हैं ।
तब लंगर की खिचङी और प्रसाद
मिलता है ।

Monday, 26 May 2014

कविता - बीहङ मन """"""

मुझे देखना था विराट आकाश '''
अनंत तारे और असीम ब्रह्माण्ड """"
मुझे छूने थे क्षितिज के ओर छोर और
धरती की कोर '''हवाओं का आदि और
महासागरों का अंत """"
मुझे सूँघने थे चंदन के वन
फूलों की घाटियाँ मानसरोवर के
ब्रह्मकमल और कस्तूरी के
हिमाद्रि हरिण, तृण तृण कण कण
पराग राग और आग ',
मुझे चखने थे अमृत के सब भंडार सारे
विस्तार ',
और पहनना था अनंत सुर घ्वनि शब्द
को सुनते हुये
बुना गया सारा गांभीर्य
सारा चापल्य सारा आल्हाद """"
ये यात्रा अब आगे अनवरत
रहेगी पान्थ ',तुम्हारा मार्ग जनपद
को जाता है मेरा विजन को ""
कभी लौटे तो कुछ पवन गंध मधु राग
अमृत और स्परश के मृसण आभास
तुम्हारी भेंट करेगे।
तुम्हारे मिथ्या आश्वासन टूटे वचन
पर टिका मेरा प्रासाद ढह रहा है
और मुझे जाना होगा पांथ आभार
तुम्हारा इस मुक्ति और विश्रांति के
लिये ।
जीव की श्वसन क्रिया के लिये पवन
का भ्रमण रत रहना आवश्यक है और
मेरे लिये 'स्वप्नों को चित्रकथागीत
में विचरते रहना ',
जब मेरी बात समझ न आ ये तो मेरे
विगत मौन को बाँचना कुछ अनलिखे
महाकाव्य वहीं रह गये हैं ',
©®सुधा राजे

Friday, 16 May 2014

सुधा राजे का लेख :- "उफ! ये मम्मियाँ "

माँ
प्रकृति में ईश्वर का साक्षात रूप
है ।
माँ महान है । माँ के पैरों के नीचे
स्वर्ग है ।
माँ देवी है पीर है फरिश्ता है ।
"""
"""
जरा ठहरो!!!!!!!!!!!!!!!!!
किंतु
अगर वह बेटी की माँ है तब
भी????????????
ये भारत है । बल्कि कहें तो पूरे
एशिया में विशेष कर भारतीय
प्रायद्वीप के सातों देशों में ।
बेटी की माँ जरा सी अलग है ।
बेटी की कभी कामना नहीं करती कि मुझे
पहली संतान बेटी हो । अब
आधुनिक तकनीक से पता चल
जाता है
सोनोग्राफी अल्ट्रासाउण्ड
तो गर्भ में ही अधिकांश माताएँ
दूसरी संतान भी बेटी होने पर
बिना एक आँसू टपकाये
बेटी की हत्या करवा देती है ।
रोतीं है तो उस बच्ची की मौत पर
नहीं शरीर के दर्द और ""हाय हाय
फिर लङकी ही मुई आई गर्भ में इस
बात पर ।
ये माँएँ बेटी को ज्यादा से
ज्यादा छह महीने तक ही दूध
पिलाती हैं जबकि "बेटा स्कूल जाने
तक माँ का दूध पीता है ।
ये माँएँ बेटे के लिये हर रोज रसोई
तप तप कर नये नये पकवान "पति से
ज्यादा रुचि से पकाती हैं और
बेटी बस यूँ ही जो रोज बनता है
वही खा ले । न बादाम छुहारे न
घी दूध फल हरी सब्जियाँ और खीर
मिठाई ।
ये मातायें लङके के जन्मदिन पर
कथा करातीं है पार्टी दावत जश्न
करती है किंतु बेटी के पैदा होने पर
दाई तक का मुँह
मीठा नहीं करवाती ।
लङके की छठी छूछक दशटोन और
पालना बाहरनिकलना कुँआ
पूजना सब जश्न से करती है ।
बेटी के मचलने ठुनकने पर चाँटे डाँट
और "मर जा " की गाली ।
बेटे के मचलते ही फरमाईश
वाली चीजें हाजिर!!!!!
ये माँयें बेटे को बढ़िया स्कूल में
पढ़वाती ट्यूशन लगवाती है ।
बेटी को पास के बाल भारती में और
घर की साफ सफाई पिता भाई के
जूठन उतरन साफ करने में
लगा देतीं हैं ।
ये माँये बेटे की हर गलती माफ
करतीं है और बेटी की हर गलती पर
जमकर ससुराल के ताने मरने
की बददुआ और पिटाई भी करती है

बेटे की लंबी आयु के लिये तमाम व्रत
उपवास मन्नतें धागे नजर
उतारना ताबीज गंडे!!!
निर्जला अहोई.
ललही छठ
संतानसप्तमी
जीवितपुत्रका
पयोव्रत
ललिताषष्ठी
रोजे
नमाज
जकात
सदका
चादर
"""बेटी को विवश करके
रखवाती हैं व्रत "जिससे जल्दी वर
मिले "
पढ़ा लिखा कर स्वावलंबी बनाने
की बजाय बेटी को छुई मुई डरपोक
और पराश्रित बनातीं हैं ।
बेटी की शादी के बाद एक एक चीज
पर अहसान जतातीं हैं ।
ये माँयें बहू घर आती है
तो पूरी वैम्पायर डायन बन
जातीं हैं ।
पिता माता भाई बहिन
सखी सहेली छोङकर आयी बेबस
लङकी को
बात बात पर ""तेरे बाप ने
क्या दिया? के तीर
कोंचतीं रहतीं हैं।
बहू को पोता ही जनने को मजबूर
करतीं है ।बेटे के दिल में बहू के लिये
नफरत भरती रहती है।
पोते पोती में भीषण भेदभाव
करती है।
बहू के मायके वालों की जमकर
बेईज्जती करती है।
बहू पर सब काम छोङकर रातदिन
बहू के कामकाज में नुक्स
निकालती रहती है।
बहू को न पास पङौस से मिलने
देती है न मायके जाने देती है।
इतने पर भी बेटे बहू में प्रेम बच
जाये तो हाय तौबा मचाकर बेटे
"को जोरू का गुलाम
""माँ का गद्दार ""घोषित करके
बेटे से अपनी सेवाओं
का सिला माँगती है ।
जब बूढ़ी हो जाती है तो 'देखरेख में
कमी के ताने मारती रहती है और
अगर संपत्ति की मालकिन है
तो बात बात पर घर से निकालने
बेदखल करने की धमकी देती है ।
जब अशक्त हो कर खाट पर पङ
जाती है तो जो भी मिलने आता है
दुखङे रो रो कर बेटे बहू को बदनाम
करती है ।
और
जब हुकूमत हाथ से निकल कर बहू
को मिल जाती है तो रूठकर
वृद्धाश्रम और मायके जा बैठती है

वहाँ भी बजाय आध्यात्म और समाज
सेवा के नई
पीढ़ी को कोसती रहती है ।
सब न सही
परंतु बहुत सी माँएँ ऐसी ही हैं ।
देखो
कदाचित आपके आसपास कोई महान
माता ऐसी हो!!!!!
क्या बुढ़ापा उसके बोये
बबूलों का फल है?????????
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor U.p.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mob- 7669489600
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

Wednesday, 14 May 2014

लेख:- आधी दुनिया बनाम तन मनकेअधिकार।

महिला संगठन और महिला आयोग
कहाँ मर गये???????
दिल्ली कोर्ट कहता है
कि """बलात्कार कोई ज़ुर्म नहीं है
और एक पुरुष को बलात्कार करने
का पूरा पूरा हक़ है अगर वह
स्त्री उस पुरुष
की विवाहिता पत्नी है """""
इसका मतलब क्या है???
कि संसर्ग सहवास में
स्त्री की """सहमति """होने
की अब कोई जरूरत नहीं रही ।
वह बीमार हो
दुखी हो
उदास हो
पीरियड्स हों
माँ बाप भाई बहिन
की किसी बुरी खबर से दुखी हो ।
उपवास व्रत आराधना में हो
बच्चे छोटे होने
या गर्भावस्था की क्रिटिकल हालत
हो
या मासिक चक्र की ऋतुकालीन
पीङा और अवसाद
उदासी अनिच्छा में हो ।
अधिक परिश्रम यात्रा आदि से
थकी हो ।
मेनोपॉज से गुजरते मूड की शिकार
हो ।
या किसी भी कारण मन मूड
इच्छा नहीं हो ।
बच्चों के एक्जाम हो मौसम विपरीत
हो ।
सेहत खराब हो ।
पति को ""एड्स या यौन रोग हो।
पति "वेश्यागामी बेवफा हो और वह
विवाह केवल ""नाममात्र लोकलाज
हो
या किसी भी घरेलू हिंसा ताने
मारपीट गाली गलोज और उपेक्षा से
पति से नाराज हो तब भी ।
वह पति को ""ना """नहीं कह
सकती क्योंकि घर की चारदीवारी में
रहती उस स्त्री को बचाने
वाला कोई नहीं उस पर
उसकी इच्छा के विपरीत
""बर्बरता ""की जाना पति का कानूनी हक
है ।
क्यों की शादी????
या तो तलाक ले ले या तो हर वक्त
"""बिछने ""को तैयार रहे!!!!!!!!!
स्त्री को अपने शरीर पर कोई हक
नहीं???????
विवाह होते ही वह केवल एक मादा है
और ये मादा कभी उस मकान
मालिक को """इनकार ""करे
तो अपना ""हक ""हासिल
करना ""उस ""का अधिकार है वह
ताकत जोर
जबरदस्ती बर्बरता जुल्म
ज्यादती से """बलात्कार ""कर
सकता है!!!!!!!!
क्या ""माननीय?? कोर्ट ये
बतायेगा कि ""समता ""
के कानून में
जब पुरुष का ""मूड ""नहीं ''दम
नहीं ""थका है ""नींद है ""चुका हुआ
और फिनिश है ""तब???
जबकि स्त्री में इच्छा है ऋतु है
प्रकृति है "तब
????????
वह कैसे पुरुष को विवश करे???
यानि ""अदालतें """
पुरुष वादी हो चुकीं है!!!!!!
औरत को तकलीफें दी जा रहीं है
तो अब अदालतों में जाना बेकार
है!!!! उसे ""बर्बर पति को जहर
देकर जेल चले
जाना या आत्महत्या कर
लेनी ही एक मात्र मार्ग है!!!!
ऐसा उस देश में कहा जा रहा है
जहाँ ""सत्तर से अस्सी प्रतिशत
घरों में ""स्त्रियों पर घरेलू हिंसा हर
तरह की होती है!!!!!!!!
दामिनी के बलात्कारियों को अब
तक सज़ा वा दे पाने
वाली अदालतों से देश
की किसी ""स्त्री ""को आशा भी क्या शेष
रही है """जब क्रूर हत्यारे सरियों से
कोंचने वाले दो बार बलात्कार
कुकर्म और गर्भाशय निकाल कर
सङक पर फेंकने वाले को "नाबालिग
कहकर दूध घी माँस खिलाकर
पढ़ाया जा रहा है "
हम इस काले कानून की निन्दा करते
हैं भर्त्स्ना करते है धिक्कार करते
हैं और इसे रद्द कराने के लिये
समस्त महिलाओं से एक जुट होकर
विरोध करने की अपील करते है ""
ये "कानून "पहले सब
कानूनों का उल्लंघन है "जबकि IPC
कहती है ""असहमति जबरन सेक्स
""पत्नी का बलात्कार अपराध है ।
महिलायें एक जुट होकर ऐसे ""बर्बर
"फैसलों का जमकर विरोध करें
""आधा देश आधी दुनियाँ हमारी है।
ये "बर्बर "है ।पुराने कानून
में''सहमति ''के
बिना पत्नी सेजबरदस्ती बलात्कार है
।।।स्त्री अपनी देह की स्वामिनी है
''''इसेकम करने छीनने वाली हर
लाईनकाला कानून है धिक्कार है
ऐसी हरव्यवस्था को '''क्या लोगबेटियों की शादी ""बलात्कारी के
साथकरें???
एक पिता "कन्यादान "के समय
कल्पना करे कि उसकी कोमल
बेटी को बंद चारदीवारी में "इच्छा मौसम
सेहत समय हालात के विपरीत ""बर्बर
बलात्कार ""भी झेलने के लिये वह
"""राजी खुशी सौंप रहा है???????
तो क्यों न कन्या भ्रूण हत्यायें हों????
देश का तालिबानीकरण जारी है!!!!!
बलत्कृत ""स्त्री ""से विवाह
को जो समाज तैयार नहीं!!!! उसी समाज
में ""विवाह करके बलात्कार का हक
देकर पुरुष को ""स्त्री की एकमात्र
संपत्ति उसके तन और मन
को भी जलील बर्बर बलात्कार
का हिंसक शिकार बनाने की हामी देने
वाला """न्यायधीश या कानून
या व्यवस्था!!!!!!!!!!!!!!!!
तालिबानी मानसिकता के सब पुरुष यह
पढ़कर ज़श्न मना सकते है
"""बिना प्रेम का हर सेक्स व्यभिचार है।
संविधान कानून न्यायपालिक ""निर्बल
""पर अत्याचार रोकने के लिये हैं
"""""""वरना जिसकी लाठी उसकी भैंस
तो पाषाणकालीन मत्स्य विधान है
"""सभ्य ""संसार में ऐसा निर्णय केवल
पाशविकता है बल्कि पशु
पक्षी भी रिझाते मनाते हैं ।
इस फैसले के खिलाफ जनहित
याचिका दायर की जानी जरूरी है ।
ये जज जिस सोच
का प्रतिनिधित्व करता है वह
""अत्याचार को हक़ मानती है
""लानत्त है।

when the NCW officials are
appointed not due to their ability
or qualification, but due to the
favoritism and discrimination of
the government officials, how can
we even expect them to hear
about
the crimes against women????
NCW does not need the women
with big bindis and stiffened saris
with long and impressive speeches
on the stage but the women who
had at least served 10 years as
police officials ,lawyers or a social
worker who had really fought
tooth
and nail for women rights.
©®सुधा राजे
Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com

लेख:- आधी दुनिया बनाम तन मन के अधिकार।

महिला संगठन और महिला आयोग
कहाँ मर गये???????
दिल्ली कोर्ट कहता है
कि """बलात्कार कोई ज़ुर्म नहीं है
और एक पुरुष को बलात्कार करने
का पूरा पूरा हक़ है अगर वह
स्त्री उस पुरुष
की विवाहिता पत्नी है """""
इसका मतलब क्या है???
कि संसर्ग सहवास में
स्त्री की """सहमति """होने
की अब कोई जरूरत नहीं रही ।
वह बीमार हो
दुखी हो
उदास हो
पीरियड्स हों
माँ बाप भाई बहिन
की किसी बुरी खबर से दुखी हो ।
उपवास व्रत आराधना में हो
बच्चे छोटे होने
या गर्भावस्था की क्रिटिकल हालत
हो
या मासिक चक्र की ऋतुकालीन
पीङा और अवसाद
उदासी अनिच्छा में हो ।
अधिक परिश्रम यात्रा आदि से
थकी हो ।
मेनोपॉज से गुजरते मूड की शिकार
हो ।
या किसी भी कारण मन मूड
इच्छा नहीं हो ।
बच्चों के एक्जाम हो मौसम विपरीत
हो ।
सेहत खराब हो ।
पति को ""एड्स या यौन रोग हो।
पति "वेश्यागामी बेवफा हो और वह
विवाह केवल ""नाममात्र लोकलाज
हो
या किसी भी घरेलू हिंसा ताने
मारपीट गाली गलोज और उपेक्षा से
पति से नाराज हो तब भी ।
वह पति को ""ना """नहीं कह
सकती क्योंकि घर की चारदीवारी में
रहती उस स्त्री को बचाने
वाला कोई नहीं उस पर
उसकी इच्छा के विपरीत
""बर्बरता ""की जाना पति का कानूनी हक
है ।
क्यों की शादी????
या तो तलाक ले ले या तो हर वक्त
"""बिछने ""को तैयार रहे!!!!!!!!!
स्त्री को अपने शरीर पर कोई हक
नहीं???????
विवाह होते ही वह केवल एक मादा है
और ये मादा कभी उस मकान
मालिक को """इनकार ""करे
तो अपना ""हक ""हासिल
करना ""उस ""का अधिकार है वह
ताकत जोर
जबरदस्ती बर्बरता जुल्म
ज्यादती से """बलात्कार ""कर
सकता है!!!!!!!!
क्या ""माननीय?? कोर्ट ये
बतायेगा कि ""समता ""
के कानून में
जब पुरुष का ""मूड ""नहीं ''दम
नहीं ""थका है ""नींद है ""चुका हुआ
और फिनिश है ""तब???
जबकि स्त्री में इच्छा है ऋतु है
प्रकृति है "तब
????????
वह कैसे पुरुष को विवश करे???
यानि ""अदालतें """
पुरुष वादी हो चुकीं है!!!!!!
औरत को तकलीफें दी जा रहीं है
तो अब अदालतों में जाना बेकार
है!!!! उसे ""बर्बर पति को जहर
देकर जेल चले
जाना या आत्महत्या कर
लेनी ही एक मात्र मार्ग है!!!!
ऐसा उस देश में कहा जा रहा है
जहाँ ""सत्तर से अस्सी प्रतिशत
घरों में ""स्त्रियों पर घरेलू हिंसा हर
तरह की होती है!!!!!!!!
दामिनी के बलात्कारियों को अब
तक सज़ा वा दे पाने
वाली अदालतों से देश
की किसी ""स्त्री ""को आशा भी क्या शेष
रही है """जब क्रूर हत्यारे सरियों से
कोंचने वाले दो बार बलात्कार
कुकर्म और गर्भाशय निकाल कर
सङक पर फेंकने वाले को "नाबालिग
कहकर दूध घी माँस खिलाकर
पढ़ाया जा रहा है "
हम इस काले कानून की निन्दा करते
हैं भर्त्स्ना करते है धिक्कार करते
हैं और इसे रद्द कराने के लिये
समस्त महिलाओं से एक जुट होकर
विरोध करने की अपील करते है ""


when the NCW officials are
appointed not due to their ability
or qualification, but due to the
favoritism and discrimination of
the government officials, how can
we even expect them to hear about
the crimes against women????
NCW does not need the women
with big bindis and stiffened saris
with long and impressive speeches
on the stage but the women who
had at least served 10 years as
police officials ,lawyers or a social
worker who had really fought tooth
and nail for women rights.
©®सुधा राजे
Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com