Friday, 30 June 2017

सुन मेरे देश, सुधा राजे का लेख:- भीङ हिंदू नहीं होती।

भीड़ हिंदू नहीं होती ,,,,,,,,,,,,,,,,,,
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एक सीधा सादा प्रश्न है कि यह "माॅबलिंचिंग "शब्द आया कहां से है ?भारतीय
भाषा में यदि अनुवाद करना पड़े तो पूरा एक वाक्य ही गढ़ना पड़ेगा ।पहले
से ही व्याख्यायित शब्द सदा मूल स्थान में ही होते हैं । अरबी फारसी
तुर्की उर्दू के शब्दों में "संग़सार"शब्द आता है ।भारत में किसी संहिता
में राजा को ऐसे दंड के आदेश देने का उल्लेख नहीं है ।रोम में ऐसा पाया
गया ।भारती वर्तमान में भी जितनी घटनायें हुयीं हैं वे भी ""भीड़ द्वारा
हत्या ""नहीं हैं ।एक गुट या व्यक्ति किसी पूरे समूह या समाज की धार्मिक
सांस्कृति भावना को आहत करता रहता है फिर भी कहीं ऐसा कोई कांड नहीं है
कि एक समुदाय विशेष के लोग चुपचाप शांत कहीं बैठे थे और भीड़ आयी और घेर
कर एक को मार डाला ।
यहां जो जो घटनायें हैं वे किसी क्रिया की तीव्र प्रतिक्रिया है विरोध
हैं और दो गुटों का झगड़ा है ।
जब दो गुट लड़ रहे हों तो प्रायः डरपोक लोग बीच बचाव नहीं करते । हिंसक
और आक्रामक झगड़ालू लोग प्रायः बीच में बोलने वाले को ही पकड़ लेते हैं
और वह दोनो तरफ से पिटता है ।
मेरठ में विगत वर्षों में एक अनजान लड़की को छेड़े जाने से रोकने पर एक
फौजी ऐसे ही हिंसकों द्वारा मार दिया गया था ।
भीड़ तमाशाई अवश्य होती है परंतु गुट लड़ते हैं दो गुट या तो लड़कर चले
जाते हैं हंगामा करके ।
या फिर कमजोर गुट वाला अधिक मार खा जाता है । हिंसक मारपीट के बीच बूढ़े
बच्चे बीमार अपाहिज स्त्रियां प्रायः बच के निकलने में ही खैर मनाते हैं

भीड़ देखती रहती है ,क्योंकि वह कोई नियोजित जुलूस नहीं किसी प्रकार का
गठित योजनाबद्ध दल नहीं ।
गवाही से भी लोग मुकर जाते हैं क्योंकि दोनों गुट हिंसक और लड़ाकू हैं तो
एक के पक्ष में बोलना मतलब दूसरे से पंगा लेना ।
यह डर व्यवस्था के पचहत्तर साल के गवाहों के प्रति हुये दुर्व्यवहार से भी आया है ।
कायरता नहीं यह है "कौन झमेलों में पड़े "
हिंदू भीड़ ने कहीं किसी को मार डाला ऐसा एक भी उदाहरण नहीं होगा ,
यहां तक कि दंगों तक में साधारण लोग घरों में दुबक जाते हैं या निवास
स्थान त्याग जाते हैं ।
जबकि जुमे की नमाज के बाद आज भी अरब में सरेआम सिर कलम करने जैसा दंड
जारी है और लोग भीड़ बनकर यह तमाशा हर जुमे को देखने इकट्ठा होते हैं
।सरेआम कोड़े मारना ।
तहर्रुश करना यानि गोलबंद भीड़ पुरुषों द्वारा स्त्री को यौन हिंसक तरीके
से छेड़ना ।
भारतीय संहिताओं में कुलटा स्त्री तक को बंदी करके पृथक रखने का दंड है
समाज से वंचित करने एकांत करने का परंतु ""सरेआम कोई क्रूरता करने का
नहीं ""
एक रेल का डिब्बा हो या एक गांव का घर ,वहां एक गुट हिंसक होकर झगड़ता है
या किसी की चोरी बलात्कार डकैती गाय बैल बछेरू काटकर खा जाने जैसी बात तक
पर यदि कुछ लोग इकट्ठे होकर मारपीट करते हैं तो वह भी उस व्यक्ति या
परिवार के समर्थक या संबंधी मित्र पड़ौसी कुटुंबी या शुभचिंतक होते हैं ।
इसे गुट कहा जा सकता है भीड़ नहीं ।क्योंकि शेष असंबद्ध लोग या तो दूर से
तमाशा देखते हैं या छिप जाते हैं ।तब भी हर बार हर मामले में यही सामने
आया कि कुछ लोगों ने रोकने की भी हिम्मत की ।
भारतीय हिंदू भीड़ बन कर माॅबलिंचिंग करने लगे हैं यह आरोप एक तरह का
षडयंत्र है जबकि कल परसों से सबसे अधिक विरोॆध हिंसाओं का हिंदुओं ने ही
किया है ।किंतु दूसरी ओर पूरे विश्व से सबसे खराब हिंसक खबरों पर भी कोई
उसी समुदाय का अभियान नजर नहीं आता कि लोग कहते ""नोट इन माई नेम""चाहे
वह दिल्ली बंगलौर हैदराबाद मुंबई संसद बम विस्फोट हो या कशमीरी पंडितों
को मारना जलाना उनको लूटकर प्रांत से ही निकाल देना और जबरन मजहब बदलवाना
या फिर सेना पर हमले हों या कि यत्र तत्र आतंकवादी घटनायें हों
,प्रतीक्षा है कब दूसरी तरफ के लोग अपने मजहब वालों के विरोध में तखतियां
लेकर खड़े होते हैं ""स्टाॅप संगसार कोड़ा मार बमहमला और माॅबलिंचिंग ,कब
कहेंगे घोषित तौर पर अपने ही मजहब के लोगों के खिलाफ ""नोट इन माय नेम ""

पश्चिमी उत्तर प्रदेश :: सुधा राजे का लेख।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश ::::सुधा राजे का लेख ,
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प.उ.प्र. का हर हाईवे हर नगर हर कसबा एक भयंकर भू अतिक्रमण का शिकार है
,तालाब पर कूड़ा डालडालकर खुद नगरपालिका वाले मेंबर चेयरमेन ही कब्जा
अपने मजहब वालों को करवा देते हैं और जहां भी दिल्ली से गंगोत्री तक
सड़कें हैं तत्काल खोखे टप्पर टीनशेड ठेला और चलतूदुकान लग जाती है
,तीर्थों पर मीट बिकने लगा है ,कहीं अचानक एक चबूतरा कच्चा दिखने लगता है
महीने भर बाद ही वहां अगरबत्ती और कुछ महीनों में चादर फिर जियारत होने
लगती है ,एक मरम्मत की दुकान बनते ही आसपास मिट्टी डालकर चौड़ा खुला
मैदान कर लिया जाता है फिर कुछ दिन बाद वहां गैराज बन जाता है ,चौड़ा पथ
चबूतरा फिर बरामदा फिर उसपर बालकनी फिर नीचे शौचालय और दुकानें बनाकर
सँकरी गली बना दी जाती है ,हर बड़े प्राचीन मंदिर या पीपल बरगद के पास
कबरिस्तान या मजार या दरगाह नयी नयी बन ही जाती है या पुरानी होती है तो
चारदीवारी सरकती जाती है ,
प्रतिक्रिया में कहीं कहीं मंदिर भी दिखने लगे हैं नये बने जो कि अधिकतर
खेतों के सड़क तरफ के हिस्से पर बनते जा रहे हैं बड़ी बड़ी सीमेन्ट की
भौंडी और वार्निश पोती हुयी प्रतिमायें वहां खड़ी कर दी गयीं हैं जो तनिक
भी मन नहीं खींचती ,दूसरी ओर प्राचीन और राजतंत्र के भव्य मन्दिर किले
हवेलियां सब ध्वस्त उपेक्षित पड़े हैं ,बीच में एक प्रयास हुआ भी था
पुराने मंदिरों के जीर्णोद्धार का सो वह जाति मजहब की राजनीति में फँसकर
ठप्प हो गया है ,मन्दिरों के नाम पर बनी कमेटियाँ चंदा तो ले लेतीं हैं
परंतु जाता कहां है हिसाब नहीं ,दरगाहें मसजिदें और मजारें हर तरह की
आधुनिक सुविधा से लैस हैं और बहुतायत गैर मुसलिम भी हर गुरूवार को वहां
चादर अगरबत्ती करने झड़फूँक और ताबीज लेने धागे गंडे और किया धरा नजर
टोटका टोना उतारने जाते हैं । मौलवियों कारियों उलेमाओं के पास गैर
मुसलिम भी खूब जाते हैं और वे कागज की पुड़िया पर कुछ उर्दू अरबी में
लिखकर दे देते हैं जिसे जलाकर पीड़ित को धुँआ सुँघाने से ऊपरी बला खत्म
हो जाती है या फिर पुड़िया पानी में घोलनी होती है जिससे लिखावट घुलकर
पिलायी जा सके कागज सुखाकर जला दिया जाता है ,लोगों को विश्वास है कि लाभ
होगा तो होता भी है ,।हर तरफ दीवारों पर अखबारों पर विज्ञापन भरे पड़े
रहते हैं बंगाली बाबा तांत्रिक बाबा मौलाना साब वगैरह ,साफ साफ लिखा रहता
है सौतन से छुटकारा तलाक या मुहब्बत लड़की वश में करना शादी में खटपट
शौहर बीबी की अनबन औलाद किया धरा भूत प्रेत सबका इलाज तत्काल आराम गारंटी
से वरना पैसे वापस और फोन नंबर भी ,लगभग सब अखबार ऐसे वर्गीकृत
विज्ञापनों से भरे पड़े हैं और दूसरा लुगदी साहित्य जो दिल्ली मेरठ
कानपुर बरेली से छपता है । हर बस स्टैंड पर गंदी किताबे बुकस्टाॅल पर मिल
जायेंगी आप कहानियां समझकर रेल गाड़ी में टाईम पास के लिये लेंगे और पटरी
पर ही फेंकनी पड़ जायेगी । दीवारों अखबारों पर दूसरी बड़ी जानकारी होती
है नामर्दी शुक्राणु शीघ्रपतन निःसंतानता बाँझपन कमजोरी यौनरोग का
शर्तिया इलाज ,मेरठ दिल्ली कानपुर अमरोहा जालंधर बरेली रामपुर तक सब के
सब खाली खंडहर दीवार मिल चौराहे पुल और पुराने भवन इसी नामर्दी का इलाज
करने के दीवार लेखन से भरे पड़े मिलते हैं । सरकार ने यदि दीवार लेखन पर
रोक लगायी है तो ये नंबर पता सहित लेखन पर काररवाही क्यों नहीं होती । कई
बार साथ में नवसाक्षर बालक जोर से रेलगाड़ी की खिड़की से पढ़ने लगते हैं
और आपको मुँह भींचकर उनको रोकना पड़ता है । न ही काले इल्म के माहिर इन
बंगाली बाबाओं के ऊपर कोई रोक टोक होती है । तीसरी चीज है हर नगर बाहर
प्रवेश द्वार पर ही टेंट झुग्गी टप्पर में बड़े बड़े पोस्टर डाले डेरा
लगाये हकीम जी ,वैद्यजी । इनके टेंट में कमर झुकाकर घुसिये तो भीतर
सैकड़ों पहलवानों फिल्मस्टारों के साथ फोटो मिल जायेंगे और ये लोग दावा
करेंगे कि इनको इलाज इस जड़ी बूटी से हुआ है । यहां भी नामर्दी बांझपन
यौनरोग और कमजोरी का पहला इलाज होता है प्रसूति रोग हाड़दर्द और बाद में
न जाने क्या क्या । इन पर न रोक टोक है न पूछताछ । हर नगरपालिका ने नये
फैशन के हिसाब से विशालकाय नगरद्वार बनवाकर उसपर उस काल के
नगरपालिकाध्यक्ष विधायक का नाम डलवाना भी शुरू कर दिया है और बड़े बड़े
होर्डिंग्स तमाम छुटभैये स्थानीय नेताओं के आजकल फ्लैक्स सुविधा हर जगह
हो जाने से एक और नया फैशन है
बीच रोड पर मजारें हैं ,बीच रोड पर नमाजें हैं ,कांवड़ों के जुलूस हैं और
जाम हैं ,अचानक आपकी गाड़ी पर कोई पत्थर आकर लगे तो ब्रेक मत लगाना ,चलते
जाना तेज रफ्तार से ,ये कोई नाबालिग लुटेरों का गिरोह भी हो सकता है
विशेषकर छोटे गांवों कसबों और खेतों के पास मत रुकना। डिवाईडर की जगह
,रेलपटरी और नवनिर्माणाधीन कालोनी ,पर भिखारियों और शौच करने वालों के
कब्जे हैं सुबह शाम यह सिलसिला जारी है ,,,,,,...,,,,,,(क्रमशः)
#CMYOGYAAdityanathji
©®सुधा राजे

Thursday, 29 June 2017

​स्त्री पर बोलना अब फैशन में नहीं रहा : सुधा राजे का काव्य लेख


स्त्री पर बोलना अब फैशन में नहीं रहा  : सुधा राजे का काव्य लेख 

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लङकियों को धमकाने की कोशिश ये समाज गर्भ से ही शुरू कर देता है जब कामना करता है केवल पुत्र
की ही कामना करता है । बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिनमें पुत्री की कामना की जाती है । पुत्री पैदा होने पर अफसोस करता है । बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिनमें
पुत्री होने पर उल्लास उत्सव होता है । लङकी को हर धमकाया जाता है। जबसमाज उसे घरेलू कार्य सिखाता है और स्त्रियाँ समझाती है कि जरा भी ग़लती की तो कोई
हवसी हिंस्र पिशाच खा जायेगा । लङकी कितनी ही हँसती खेलती हो मगर हर लङकी हर पल एक रिस्क लिये सिर पर डरी हुयी सी रहती है सावधान
सावधान सी । लङकी को धमकाते रहते है बाहर से
भीतर तक हवसी हिंसक । और चाहे लाख पर एक हो मगर बचपन में ही क़ामयाब हो जाते हैं मासूम लङकी को डराधमका बहला फुसला टॉफी चॉकलेट चिज्जी पैसे और घुमाने के लालच में डर सच साबित हो जाता है और भयादोहन किया जाने लगता है । लङकी को धमकाता है ये समाज जब स्कूल कॉलेज अस्पताल बाजार मंदिर
मेला रैली जुलूस उत्सव और समारोह में जाती है अथवा जाना चाहती है और पूरी लङकियों में से बहुत कम
लङकियाँ जाने दी जातीं हैं । लङकी को धमकाता है ये समाज और पूरी लङकियों में से बहुत ही कम
लङकियाँ ज़ाहिर कर पातीं है अपना पहला प्यार और प्रेम करने वाले के साथ घर बसाने की इच्छा । और अकसर पूरी लङकियों में से बहुत कम लङकियों के
प्रेम की कहानी पता चल पाती है परिवार को और पूरी लङकियों में से बहुत कम लङकियों का प्रेम घर बसाने
तक की कथा बन पाता है । लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज और पूरी लङकियों में से अधिकांश
लङकियाँ ना नुकर या चुपचाप वहीं शादी कर लेने
को राज़ी या ग़ैरराज़ी मान कर शादियाँ पूरी जिंदग़ी निभाती चलीं जा । लङकियों को धमकाता है ये समाज और लङकियाँ बार बार माँ बनने पर यातनादायक जीवन सहती है पूरी में से अधिकांश लङकियाँ बार बार प्रताङना सहकर भी पङी रहती हैं दुखते बदन और सिसकते मन तन के साथ ससुराल पति और बच्चों के बीच
क्योंकि धमकाता है समाज कि ना मायका साथ देगा ना ससुराल में वापसी हो सकेगी और बिना घर की लङकी के हिंसक पशुमानव खा जायेंगे उंगलियाँ उठायेंगे ।
लङकी को धमकाता है ये समाज पुत्र ही पैदा करने के लिये और हो जाती है पुत्री पैदा तब जीवन भर
लङकी की माँ होने की धमकी सहती रहती है माँ ।
लङकी को धमकाता है ये समाज और लूट ली जाती है बहुतों में से बहुत सी लङकियाँ चाकू पिस्तौल तमंचे और
तेज़ाब का डर दिखाकर । और फिर सबकुछ समाज को दिखाकर बताकर बदनाम कर देने को धमकियाँ दे दे कर लूट का सिलसिला चलता भी रखा जाता है
कई लङकियों पर । लङकियों को धमकाता है ये समाज। और कई लङकियाँ जब तब छल से खाने पीने
में नशा देकर जहरीली दवा देकर कामुक तसवीरें चलचित्र और गीत कहानी शेर शायरी और शब्द स्पर्श से संप्रेषण करके भावुकता जगाकर भावनायें भङकाकर कपट से लूट ली जाती हैं और विश्वास घात कर दिया जाता है प्रेम के बहाने केवल दैहिक शोषण किया जाता और भरोसे में लेकर बङी बङी बातें की जातीं है फिर सब बङी बङी बातों का मकसद लङकियाँ फाँसना और लङकियों से दैहिक संबंध बनाना लङकियों से छलात्कार करना और फिर धमकाना होता है । धमकाता रहता है ये समाज
लुटी हुयी लङकियों को । कि अगर तुमने किसी को बताया कि तुम्हें बल से छल से कपट से धमकी से धोखे से और भयादोहन से लूटा गया है तो साबित कर दिया जायेगा —"कुलटा वेश्य़ा बिना अनु व्यापार में लिप्त डायन चुङैल बेवफ़ा और छिनाल जबकि कोई कभी नहीं पूछेगा कि अगर कुलटा छिनाल वेश्या खराब स्त्री है तब
तब तब??? ये कुलटा छिनाल वेश्या को पास जाने वाले सफेदपोश भलेमानुष सभ्य और भव्य इज़्जतदार लोग
अपनी औलादें वेश्या की कोख में छोङने क्यों जाते हैं??
वेश्या बुरी है अछूत है समाज से निष्कासित है तब क्यों नहीं अछूत बहिष्कृत और समाज से निष्कासित है
वेश्याग़ामी!!!!!!!!! लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज कि साबित कर देंगे कि तुम ही खुद उस पुरुष के करीब जानबूझकर लालच में गयी थी तुमने की है साज़िश और तुम ही वासना की भूखी डायन हो तुम ही फँसा रही थी उस  बेचारे को ।चाहे वह  बेचारा लङकी का मुँह खोलने से पहले तक  वीर बहादुर तेज तर्रार दमदार दबंग महान निडर बेखौफ़ की उपाधियों से विभूषित हो लेकिन लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज । और लङकियो!!!!!! सुनो लङकियो!!!धमकी से डरना नहीं
नहीं घबरा इलज़ामों से ना पलायन करना सत्य की लङाई से ना ही हिम्मत हारना आरोपों की बौछार से । तुम्हें कतई नहीं भयभीत होना है क्योंकि जब तुम नहीं डरोगी तो डरेगा शोषक डरेगा कपटी डरेगा छल कर्ता डरेगा हिंसक डरेगा भय देने वाला डरेगा हक़ मारने वाला
डरेगा बलात्कारी क्योंकि भय की काली सुरंग के ठीक बाहर ही विजयश्री है तुम्हारा अपना हक है और है तुम्हारा अपना जीवन अपना घर कैरियर अपनी शर्तो पर डरना नहीं जब कोई गाली दे क्योंकि गालियाँ देने वाला लङकियों को होता कौन है बीच में बोलनेवाला??
डरना नहीं जब कोई हादसा घट जाये और तुम्हारे साथी साथ छोङ दें कपट करके मिटा दें सारे सुबूततुम्हारी बरबादी के तब भी । क्योंकि तुम्हारी बात से सावधान होंगी करोङों लङकियाँ । करोङों हिंसक पशु डर डर जायेंगे कि अब तो लङकियाँ ना कलंक से डरतीं हैं
ना बदनामी से ना ही डरती है समाज की घिनौनी गालियों से । तब सच मानो अनजाने में तुम बचा रही होती हो पूरी लङकियों में से लाखों लङकियाँ बरबादी से शोषण से और सावधान करने वाले सैनिक की तरह होती है तुम्हारी जिंदग़ी की शहादत । तुम्हें डरना नहीं है क्योंकि बहुत सारे
नर नारी और लङकियाँ दिल से तुम्हारे साथ होते हैं और दुआ करते है कि तुम्हारा जीवन पुनः सुधरे घर बसे
और तुम उबर जाओ हादसे की काली यादों से ।
भले ही वे सब तुम्हें ना दिखाई दें । परंतु सच मानो
लङकियों सत्य की जीत की दुआ करने वालों की कमी नहीं है । अंतर ये है कि लङकियों को धमकाने वाले
चीखते बहुत हैं किंतु सत्य की जीत की प्रार्थनायें शांत होती हैं । लङकियों को बहुत धमकाता है ये समाज
और तुम्हें डरना नहीं है लङकियों ।
©®सुधा राजे

​मेरा देश - "सांप्रदायिक नहीं है भारत "- सुधा राजे का लेख

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सांप्रदायिक नहीं है भारत
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सुधा राजे का लेख


ऐसे लेखक और कवि समय के अपराधी ही बनने जा रहे हैं जो जो एक क्षणिक राजनीतिक अभियान में विरोध के लिये विरोध को चल रही लंबी दशकों पुरानी साजिश का हिस्सा बस केवल स्पर आॅफ मोमेन्ट के कारण बनते जा रहे हैं । एक एजेण्डा सैटिंग थ्योरी जो सदियों से चल रही है भारत में और भारतीयों की छवि सदा ही कलंकित करके विदेशों से कभी जेहाद कभी कम्युनिज्म कभी नक्सलिज्म कभी मिशनरी ईसाईकरण के नाम पर जमकर धन प्राप्त करती रही है वही विचारधारा सुबूत जुटाती रहती है और एक एक करके अनेक नाम जुड़ते हैं क्योंकि वे लोग सदियों से यही कार्य संगठित कर रहे हैं ,जब
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कि ये कठपुतली कलमबाज नहीं जानते कि वे खुद ब्रूटस की तरह प्रयोग किये जा रहे हैं ,,,,,,,,जो कभी दो सतर नहीं लिख सके देश पर स्त्रीदशा पर बालबदहाली पर स्वतंत्रता संग्राम पर और कृषक मजदूर पर ,,,,वे कलम भांजने चल पड़े हैं आज इसी बहाव में निशाना बनकर कि
""अमुक अमुक अमुक केवल इसलिये
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मार डाला गया क्योंकि वह मुसलमान था ,,,
वह मुसलमान था ,,,,,
और बुरी तरह से हिन्दू सहिष्णुता को आहत करने लगते हैं ।
नासमझी में लोग जो कि सचमुच केवल हिंदू ही हैं दयालु सहिष्णु और मित्रादी वे जबरन सोचने लगते हैं कि अपराधी है । कौन होते हो तुम सबके सब हिंदू समाज को जबरन अपराध बोध कराने वाले?जबकि ऐसे मुझ से लाखों करोड़ों हैं जिन्होने कभी नाहक मच्छर तक नहीं मारा चींटी तक को दाना देने वाले रहे !!
लोग भूल जाते हैं कि "झुंड बनाकर बाईक से घेरकर लड़कियां जमकर नोंची छेड़ी और मसली कुचली जाती हैं अभी वीडियो देखा होगा न ?तब कविता की ?पूछा कि ये दलित की बेटी है इसलिये मुसलमान नोंच रहे हैं ?
सरला बट ?चौंक गये याद आयी कभी कविता में ?पद्मिनी पर लिखा ?दुर्गावती याद रही ?अवंतीबाई याद आई ?डाॅक्टर नारंग ?कश्मीरी पंडितों की बहू बेटियां बहिनें ?जिनकी चीखें सुनकर मजबूरन सबके सब त्याग करखानाबदोश हो गये महलों से तंबुओं में आ गय?मुजफ्फरनगर की लड़कियों ने पढ़ना त्याग दिया याद रहा क्या कीमत चुकायी?इसी ट्रेन में कुछ एक ही दशक पहले अटल बिहारी जी का रिश्तेदार लड़का मार दिया गया था ऐसे ही ,तब याद आयी कविता ?कहीं चला कोई मूवमेन्ट कि ""मैं इस में शामिल नहीं "
कहीं मुसलिमों के खिलाफ मुसलिमों में चला कोईआंदोलन कि हम सब विरोध करते हैं भारतीय महाद्वीप हो रही गैर मुसलिमों की हत्या बलात्कार छेड़छाड़ का !!प.उ.प्र. बंगाल बिहार में लड़कियां डर डर कर रहतीं हैं और गाय पालक गौ हत्यारों की जीभ चटोरी से बिलखते भूखे शिशु लिये खामोश रह जाते हैं ,हमारे ही चार पांच ढोर चोरी होकर काट डाले गये आज तक पता नहीं कौन चोर रहा । बैल बिना किसान और गाय बिना ग्रामीण भूखों मरने लगा है परंतु गौमांस के समर्थनमें कौन कैम्पेन चला रहा है वे लोग जो जो कृषक से सहानुभूति जताते हैं जब जब वह आत्हत्या कर ले रहा है !!कभी सुना कैम्पेन कि आज अमुक नगर के मुसलमानों ने हिंदू गरीब कृषक परिवार को गाय बैल दान में दिये और बैठकें की कसाईयों ने कि अब से इस गांव नगर में गौ हत्या गौ मांस नहीं खाया जायेगा ??तब कविताई कहां चली गयी ???क्योंकि उसपर ये तेज असर लाईक नहीं आने थे न । कौन कौन मान रहा है कि हिंदू हत्यारे पापी मुसलिम वधिक होते जा रहे हैं ?कम से कम मैं तो नहीं । जो जो मांसाहारी हिंदू तक हैं वे एक जीव की झटके में मौत करते हैं ताकि दर्द न हो और यह भी कि उनमें खुद काटकर खाने की ताकत नहीं अकसर कोई मुसलमान या खटिक या कोॆई योद्धा परंपरा का व्यक्ति ही यह कार्य करके तैयार मांस दे दे तो भले खा पका ले । चूहेदानी से चूहा पकड़ने और जंगल में छोड़ने वाले हिंदू ही अधिक हैं । तब क्यों यह दुष्प्रचार मेरे महान राष्ट्र के खिलाफ ये देश द्रोही कर रहे हैं कि भारत में मुसलिम ईसाई और दलित सुरक्षित नहीं हैं ? तो क्या सीरिया बगदाद पाकिस्तान में अफगानिस्तान बांगलादेश में ईराक ईरान अरब इजरायल नें मुसलमान बहुत अधिक सुरक्षित हैं ? कहां किनको वहांअल्पसंख्यक आरक्षण मिला हुआ है ? कहां किनको वहां पर्सनल लाॅ का हक मिला हुआ है ?कहां वे शत्रुराष्ट्र का ध्वज फहराने का हक रखते हैं?कौन कौन देश फ्री में सब सुविधायें दे रहा है सबसिडी दे रहा है ?
भारत में यदि मुसलिमों को खतरा होता तो देश विभाजन के समय ही क्यों पाकिस्तान से अधिक बड़ी आबादी हिन्दुस्तान में ही हिन्दुओं के बीच टिकी रह गयी ?आंकड़े एकत्र करें कि पाकिस्तानअफगानिस्तान बांगलादेश में कितने मुसलिम मारे लूटे गये अब तक पचहत्तर सालों में बनिस्बत भारत के ?आप लोगों को कुछ पता भी है कि आज भी कुछ खास त्यौहारों पर मुसलिम ही वहां और यहां भारत तक में एक खास मुसलिम समुदाय के लोगों पर पत्थर बरसातेल हैं ??है कोई कविता अब तक इस कुप्रथा के विरोध में?शियाओं की लगातार हत्याओं का मुसलिमों से जवाब पूछ सकते हैं आप ?क्योंकि वे हारे हुये लोगों के वंशज हैं और इसलिये आज तक मुहर्रम मनाते हैं और सीनाजनी करके खुद का रक्त बहाते हैं !!!लेखक बनते हैं आप इस परंपरा पर कितना लिखा कि अब तो बंद करो मातम ?कभी हिम्मत की पूछने की कि भाई हिलाला क्यो ?क्यों चार शादी ?क्यों तीन शब्द का तलाक ? तब न कीपैड चला न ही तब स्याही बची न शब्द ??पता तो करते कि पूरे भारत मात्र में ही आज दिनांक तक जो जो हत्या बलात्कार और चोरी डकैती स्मगलिंग अपहरण बच्चाबाजी शिशु बेचना वेश्याबनाना और विदेशों को मानव विक्रय हुआवउसमें कितने हिंदू अपराधी है कितने मुसलिम अपराधी हैं ??नहीं तब आप कहेंगे कि अपराधी का मजहब या जाति नहीं होती वह केवल अपराधी होता है !!तब आप मानव बन जाते हैं जब मुसलिम ही मुसलिम को लूटता ठगता मार डालता है !!आपसे कहां लिखा जायेगा इस पर कि आज भी लड़कियां केवलइस लिये पढ़ना त्याग देती है गांव से नगर दूर है और रास्ते में उनको डराया जाता है !!आप कैसे समझेंगे कि अपराध बढ़ रहे हैं इसलिये क्योंकि जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है और जब जब बात दो बच्चों पर नसबंदी की आती है संजय गांधी से राहुल गांधी तक सबकी बोलती बंद करवा दी जाती है । कौन लिखेगा इस पर कि भूगोल नहीं बढ़ा सकता भारत तो चलो अब सब के सब केवल दो संतान पर बंद करेंपरिवार बढ़ाना ? जब लोग बुरका परदा और दहेज नें तीन तलाक मेंऔर हिलाला में दम घुटती औरतों को बच्चे दर बच्चे पैदा करने पर विवश करते रहते हैं तब आपकी भाषा कुन्द और शब्द कम पड़ जाते हैं !! है कोई कैम्पेन कहीं किसी मुसलिम का जनसंख्या नियंत्रण बुरका समापन परदा समापन और जबरन या ललचाकर किये जा रहे धर्मांतरण के बंद करने के लिये ?? आपने कभी सवाल उठाया कि आज जब सीमा पर संकट है तो सैनिक सीमा की रखवाली करने जाता तब कशमीर में मुसलमान पत्थर क्यों फेंकता है ?पढ़े खेले कमाये और चैन से रहे न !!क्यों वहां भारत का नागरिक ही पूर्वजों से हिंदू होकर भी आज विदेशी झंडा लेकर लड़कियों को पत्थर थमाकर स्कूल बंद करवा देता है ?यह सब मानवता है ?
नहीं .....
मैं यहां किसी की भी हत्या बलात्कार छेड़छाड़ को जायज नहीं ठहरा रही हूंमैं नाजायज ठहरा रही हूँ उस मूर्ख को जो देशद्रोहियों के सुर में सुर मिलाकर मेरे राष्ट्र को बहुसंख्यक उन्मादियों का राष्ट्र साबित करने पर तुला हुआ है जबकि वह भी खुद उसी गिनती में शामिल है ।
ये """मैं शामिल नहीं """आंदोलन है क्या मालूम है ?ईसा की बर्बर हत्या के समय प्रशासक ने महासभा में जब भीड़ के समक्ष षडयंत्रकारियों की मांग पर ईसा को मृत्युदंड दिया तब उसने अपने हाथ चिलमची में धोकर कहा मैं खुद इस हत्या मैं शामिल नहीं हूँ ""यह एक अघोषित आक्षेप है हर हिंदू पर कि यदि तुम अब इस घोषणा को टांगते नहीं तो तुम भी इन हत्याओं में शामिल हो जो जो मुसलमानों की हुयीं !!!!
तो क्या जिन जिन मुसलमानों ने यह घोषणा नहीं की कि अब तक एक हजार वर्षों में जितने मंदिर तोड़कर कब्रिस्तान मजार मकबरे कर दिये मूर्तियां तोड़कर सीढ़ियों मेंभर दीं और लड़कियां लूटकर वेश्यायें बना दी कत्ल पर कत्ल किये गये सिखों हिंदुओं बोद्धों जैनों ईसाईयों यहूदियों पारसियों के क्या वे सब शामिल है ??अगर आज का कोॆई भी भारतीय मुसलिम नागरिक जो देश कानून संविधान का पालन करता है अपराधी नहीं है बिना यह घोषणा किये कि वह हिंदू सिख जैन पारसी यहूदी ईसाईयों की हत्या लूट बलात्कार में शामिल नहीं "तो हम सब कैसे शामिल हैं ???????यह कितनी बड़ी साजिश है जिस दिन समझ आयेगी सिवा उफ के कुछ न बचेगा कहने को !
जनसंख्या के अनुपात में अपराध बढ़ रहे हैं जिसका पहला कारण ही अशिक्षा और कुशिक्षा है ,ये कुशिक्षा वही है जो ऐसे कलमचियों को भी मिल रही है कि सांप्रदायिक हो गया है भारत और फासिस्ट हो गये है हिंदू और अघोषित आपात काल चल रहा है । इनको यह पता तक नहीं कि एक विशेष किताब में कितना जहरीला व्यहार लिखा है ऐसों के लिये जो मुसलिम नहीं हैं और आज तक उन पंक्तियों सहित उस किताब को बदस्तूर हर बच्चे को पढ़ता बेहद अनिवार्य है चाहे वह स्कूल न जाये , कभी सवाल इसपर उठाईये कि मनुस्मृति की तरह इस किताब की उन सब पंक्तियों को भी अब वैश्विक मानवता समरसता के नाम पर निकाल देना चाहिये नवीन संस्करणों से जिन जिन में गैर मुसलिम पर दुर्व्यवहार नफरत और स्त्री पर हिंसा का समर्थन है !!नहीं कर सकते न कह सकते । विश्व एक गांव नहीं हो पा रहा आज सारी व्यवस्था आतंकी जेहाद से लड़ने में कम पड़ रही है हर जगह त्यौहार की खुशियां मातम में बदल जा रही हैं पेरिस लंदन रूस अमेरिका कनाडा भारत ....क्या कोई अभियान इस पर चला कि हर मुसलिम यह घोषणा करे कि मैं नहीं हूँ इस जेहाद का हिस्सा ?क्यों ऐसी मूर्खता ?
अपराध सिर्फ अपराध है और उस पर नियंत्र ही पहली आवश्यकता है और आवश्यकता है कठोर कर्त्तव्यनिष्ठ राष्ट्रीय नागरिकता की । मैंनऐसे किसी भी अभियान का समर्थन नहीं कर सकती जिससे मेरे राष्ट्र का अपमान होता हो छवि खराब हो मेरे देश की चुनी हुयी लोकतांत्रिक व्यवस्था की बदनामी हो और सरकार को कार्य चलाने में बाधा पहुँचे । आवश्यता है कि अपराध पर कठोरता से कारर्वाही हो और अपराधी को दंड मिले साथ ही दुष्रचारकों पर भी लगाम लगायी जाये विश्व में भारत को समर्थकों की जरूरत है और ऐसे लोग जो विश्व में भारत की छवि खराब कर रहे है वह देश की मानहानि के अपराधी हैं । कैसा परिणाम खतरनाक होगा यदि सन सैंतालीस से आज तक हर हत्याबलात्कार दंगे और छेड़छाड़ चोरी डकैती स्मगलिंग नकली नोट निर्माण और कालाबाजारी तक के सब के सब अपराधो का अपराधी और पीड़ित जातिवार मजहब वार घोषित करके सबका चिट्ठा खोल दिा जाये ??मैं हिंदू हूँ किंतु मैं सांप्रदायिक नहीं हूँ मैं किसी पर भी कैसी भी हिंसा का समर्थन नहीं करती सिवा तब के जबकि अपराधी को न्यायालय दंड दे या शत्रु पर सेना और अपराधी पर गृह पुलिस कार्यवाही करे । औऱ हां न मैं संघ से हूँ न विहिप से न भाजपा से न ही राजनीतिक दल या किसी एन जी ओ से ।
देश प्रथम।
जयहिंद जयभारत ।
(इस लेख का नकल या आंशिक तोड़ फोड़ काॅपी राईट एक्ट 1950~1957के तहत अपराध है )
©®सुधा राजे


​​

मेरा देश - गर्व क्यों नहीं करते अपनी मातृभूमि की परंपरा पर

भारत 'के योग और ज्योतिष गणित और आयुर्वेद का 'सम्मान पूरा विश्व करता है
',जब संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने "विश्वयोग दिवस 'घोषित करके पूरे विश्व
के सुंदर जीवन स्वस्थ जीवन निरोग जीवन के लिए लोगों को प्रेरित करने के
लिए अपील की हो योग अपनाने की ',तब जो भी सरकार हो या विपक्ष उसे गर्व ही
होना चाहिये था ',एक तरफ कॉंग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत "उत्तराखंड में
योग करते नजर आये तो दूसरी तरफ """"""चारा घोटाला रोपी लालू परिवार और
सुशासनबाबू 'नीतीश कुमार ""

जानबूझकर गायब ही नहीं रहे बल्कि """कङवे शब्दों में योग को """"बाबा
रामदेव का योग कहकर """"योगदिवस तक मनाने का विरोध करते नजर आये!!!कुतर्क
ये रहा कि योग जियादे जरूरी है कि शराबबंदी?

''''ये बिहारी नेता,, कभी जाति मजहब और दलगत घृणा से ऊपर उठकर '''राष्ट्र
और मानव "को समझेंगे????

,,,,कौन सी शराबबंदी की बात करते हो नितीश जी?? गुजरात में बहुत पहले से
शराब बंद है!!!
दम है तो लालू समधियाने में यानि यूपी में ""शराब बंदी करा के दिखायें
'''''शराबबंदी ""भाजपाविरोधी पूरा जो महामोर्चा संगठित हुआ था उन सबके
विधान सभा संसदीय क्षेत्र में करके दिखायें ",

कहाँ बिहारियों ने शराब पीनी छोङ दी??? पङौसी राज्यों भर की बात नहीं है
कि जाकर पी आते है ',ताङी भाँग गाँजा मेडिकल स्टोर की नशीली दवायें और
गुटखा सबसे अधिक यूपी बिहार में ही "भक्षण किया जाता है ।
योग न भाजपा की बपौती है न बाबा रामदेव की ',,हम जैसे लाखों लोग बचपन से
योग करते हैं ',खुशी होती है जब उसको विश्वस्तरीय मान्यता मिलती है
',क्योंकि जब हम जैसे साधारण लोग किसी परिचित से कहते हैं कि योग से हमें
लाभ है आराम है तो कोई गंभीरता से नहीं लेता ',किंतु जब पूरी दुनियाँ साथ
में चालीस मुसलिम देश भी योग करते नजर आते हैं तब ''''''लाखों लोग घरों
में भी योग करने लगते हैं """जिन जिन ने छोङ दिया था वे भी दोबारा करने
लगते हैं!!

यूपी की अल्पसंख्यक हितैषी सरकार का भी यही "राष्ट्र सम्मान विरोधी रवैया रहा है "
बाबा रामदेव एक व्यक्ति है 'योग एक विधा है ''इस बात का श्रेय तो बाबा
रामदेव और माननीय नरेंद्र मोदी जी को देना ही पङेगा कि ""योग का वैश्विक
सम्मान हुआ """"
किंतु क्योंकि भूलते हो ""जाति गत घृणा बढ़ाओ राज करो वाले बिहारी नेता
जी,,,,,,, कि योग तो सदियों से भारत से विदेश जा रहा है ''लाखों पर्यटक
भारत हर वर्ष योग सीखने आते है जब रामदेव और मोदी जी का नाम तक ना सुना
था लोगों ने "यूरोपियन चाईनीज और अमेरिकन तब भी केरल ऋषिकेश योगा सीखकर
विदेश जाकर सिखाते थे!!!!!!
लानत्त है ऐसी,,, जमालोछाप ईर्ष्या पर,,,जहाँ बात देश की आये वहाँ मजहब
पार्टी जात की बात करनेवाला ग़द्दार """लानत्त
©®सुधा राजे

Tuesday, 27 June 2017

सुधा राजे का लेख- विचारधारा के बहाने अपराध का महिमामंडन।

अपराध को महिमामंडित करने की एक साजिश चल रही है चाहे वह आतंकवादके बहाने
हो या कम्युनिज्म या या फासिज्म या नक्सलिज्म या अथीस्टिज्म ,
यही
विचारधारा नामकरण उसको जस्टीफाई कर देता है कि चिढ़वश नफरत वश लालच वश
स्वार्थवश मनोविकार पागलपन वश या भड़काने पर उठे उन्मादवश जो जो कर रहा
है वह वह सब इस धारणा के अंतर्गत उचित है ,
इसलामिक आतंकवाद
एक सदी पहले के कम्युनिस्ट रक्तक्रांति की ही तरह
बिचौलिये
उपदेशकों द्वारा
जायज करार देकर जिहाद नाम से चलाया जाकर अपराध का महिमामंडन ही है ,
जिससे क्रूरता के बाद की ग्लानि और पहले की हिचक खत्म हो जाती है
अपराधी सोचता है वह एक महान कार्य कर रहा है
जियेगा तो बलवान
मरा तो ग्रेट कहलायेगा ,
इस तरह का जस्टिफिकेशन पढ़े लिखे लोग एक षडयंत्र के तहत करते रहते हैं ,
जबकि
है सबकुछ धन का बहाव एक तरफ करने की सहस्त्राब्दि पुरानी सुनियोजित
विचारधारा का अनुमानित सटीक प्रोग्राम ,
और परिणाम देखने हैं तो डेढ़ हजार साल पहले के अरब देशों की वास्तु कला
आर्थिक स्थिति की वास्तविकता रहन सहन और तब के भारत का रहन सहन वास्तुकला
आर्थिक स्थिति तौल लीजिये
फिर आज
को तौलिये
और ज्ञात कीजिये ऐसा क्यों .......??जो उत्तर मिले उस पर निर्मम निरपेक्ष
विचार कीजिये ,,,,,
विचारधारा
धन के लालच से ही पैदा होकर सत्ता पर पकड़ और समर्थकों की संख्या बढ़ाने
के लिये एक उन्मादकारी नारे विचार और महान कार्य के सिद्धांत पर ही
टिकाकर जारी की जाती है~
सारे हिंसक आन्दोलन विचार के नाम पर जस्टीफाई किये ग,ये
अब आतंकवाद की कमर तोड़नी है तो उसकी जड़ उसके मर्म ""द ग्रेट काॅज आॅफ
अल्ला ""और सत्तर हूरें की जन्नत का इनाम को समझना व्याख्यायित करना होगा
(क्रमश:)©®सुधा राजे

Wednesday, 21 June 2017

लोक जीवन में बसे भारतीय नियम और अधिनियम।

आपस्तम्ब गृहसूत्र और मनु ने भी चौथ पर बहिन का हक बताया है ,
और परंपरा है कि विवाह के चौथे दिन जाकर भाई बहिन के हाथ पर पेराखें
यानि बहुत बड़ी साईज की गुजिया लड्डू रुपया आदि रखकर यह वचन याद है की तसदीक करता है कि जीवन भर उसकी कमाई का चतुर्थांश वह बहिन को देता रहेगा .....
...
राखी
दूज
दिवाली
तीज
नौरते भुंजरियां छटी भात और घर में हर पर्व पर मंडल और बहिन की पहली आगमन की शर्त से यह अकथित अलिखित संविधान निभाया जाता है ,
पति निकाल दे तो भाई का घर उसके लिये सदैव खुला ही रहना है ,
पति मर जाये तो जब चूड़ी तोड़ने की दर्दनाक कुप्रथा हो रही होती है उस समय भी भाई चांदी की लाख की चूड़ी लेकर पहनवाता है कि ये वस्त्र और चूड़ी अब पुनः मेरी जिम्मेदारी

हमारी बुआसास
और ननद के लिये हमारे घर से ये रस्म निभायी गयी ,
जिनके भाई नहीं तो भतीजे करते हैं ,,
,,अब तक तो इसी लिये सच है

सच है कि
स्त्री पति के जाने से नहीं ,

भाई
के जाने से ही रांड
यानि
अनाथ
होती है।
बहुत बुरी तरह मुगलिया रिवाज हावी हो गये परंतु हम लोगों ने एक समृद्ध बचपन जिया है ,वहां हर दिन पहला कौर घर की कन्या ही जीमती है .और बहिन छोटी हो या बड़ी भाई ही सदैव पांव पूजता है ,बुन्देलखंड में दो बार भाई दूज होती है होली के तीसरे दिन और दीवाली के तीसरे दिन तब सब बसें तक बंद रहती हैं दोपहर बाद ही तिलक करवाकर बसें चलतीं हैं ,
दो तीज होती हैं एक पति के घर मधुश्रवा और एक भाई के घर अक्षय तृतीया ,
दशहरे पर भाई को वीरन कहकर तिलक करतीं हैं बहिनें ,और
भाई के घर कोई भी पर्व हो "डलिया "आती बहिन के घर से मतलब सूखे मेवे मिठाईयां मठरी शकरपारे खुरमें पूआ भरकर बहिन लाती है सात घरों से सात जात तक बायना जाता है ,
तब सब अतिथि आने प्रारंभ होते हैं ,
ऐसा कहते हैं कि बहिन का चतुर्थांश मारने वाले भाई का धन ब्याज समेत चूहे और चोर ले जाते हैं ,
चाहे पिता ने कुछ भी न छोड़ा हो यदि भाई है तो उसकी देह के श्रमोपार्जित धन पर चतुर्थांश बहिन का है ,
यह मानने वाले कम नहीं हैं
और सहर्ष राखी दूज गौना चौथ तीज दशहरा भागवत कथा कांवड़ सब पर से पहला दाय बहिन को ही जाता है ,
यहां तक कि भाई के समधी तक बहिन मानकर "फूफा साड़ा "भेजते हैं वहू की बुआ को ,
और
यहां याद रखें कि जब ससुराल में हाय तौबा मची होती है लड़का जाने की मनहूस बहू होने की तब स्त्री को विलाप पर से उठाने भाई को ही जाना पड़ता है ,
मैं तो हूं
कहकर।
 बहिन की संतान के विवाह पर ,,,भात ,,,की चौकी पर खड़े होना एक उऋण होने की ही परंपरा है ,
वहां भाई कहलाने वाले सब के सब ममेरे चचेरे फुफेरे तयेरे ही नहीं भाई जिन जिनको अपना समझे उनको लेकर जाता है और ""भतेउर ""नाम से तय किये कक्ष में देहली पर बहिन आरती करके नारियल तिलक से भाई के पूरे भातीदल का एक एक करके स्वागत करती गले भेंटती है सब अपना अपना ऋण अदा करते हैं ,
संतान के विवाह की सब रस्में बहिन भाई का दिया ही सबकुछ पहन कर अदा करती है ,

यह बहिन की परीक्षा है ससुराल में बुढ़ापे पर कि मैं अभी अनाथ नहीं मेरे इतना कुनबा रीढ़ है।
 यह रस्म सब जगह है ,
छलौरी का पानी डाले बिना पश्चिमी यूपी में

चीकट नहाये बिना बुंदेलखंड

मायरा दिये बिना राजस्थान

और
मामा भांजा कलेवा बिना पूर्वी यूपी में ऋण माना जाता है ,

बहिन तब तक सजती सँवरती नहीं संतान के विवाह में जब तक भाई का पिटारा नहीं आ जाता ,

लगन के दिन से हर शाम "भात गीत गाये जाते हैं ,,

अरे भईया करूं विनती समय पर भात ले आना ,,,,
,,,,,
छोटी सी भईया गाड़ी ले आना उसी में मेरी चुनरी उसी में मेरी साड़ी उसी में भईया आप आ जाना ,,,
भाई के घर अशौच हो जाये ,यानि किसी की मृत्यु हो जाये तो बहिन के दिये ""चीर से वह शुद्ध होता है ""

और

नयी बहू लाने पर बहिन प्रवेश द्वार पर खड़ी होती है द्वार छेंकने को ,
क्योंकि भाभी लाया है अब तो भूल न जाना बहिना को ,,,,
,,,
भतीजी जो खीलें बिखेरती है पिता के घर समृद्धि बनी रहे इस प्रार्थना के साथ विदाई में
वह रात में बहिन ही कच्चे चूल्हे पर चटकाकर तैयार करती है ,
और यह माना जाता है कि अब बुआ समझौता कर रही है कि भतीजी के लिये एक अंश बुआ की तरफ से दाय है।
सबसे प्रथम कार्य ही है देवपूजन ,उसी दिन ""सीधा छुआई होती है "विवाह की एंकर ही बुआ होती है ,पितृन्यौती परंपरा देवता लिवाने जाने के साथ ही जुड़ी है कोरे मिट्टी के बरतन गंगाजली लाकर रखना और पुरखों वाले मंदिर से प्रतीकात्मक रूप से देवता लिवाने जाना ,वहीं से आकर सात अन्न तैयार करने का प्रारंभ सुहागिने और कुमारियां करती हैं ,गाते भी है ,,,,,,बयार के हनुमत हैं रखवाले ,बादल के हनुमत हैं रखवाले ,हमरे गणपति बप्पा ऐसेँ गरजत हैं जैसेँ इंद्र नगाड़े ,,,,,,,,,,,यहां याद रखने वाली बात है कि चिट्ठी निमंत्र पर हलदी लगाकर देवताओं के लिये न्यौता रखकर पहला निमंत्रण भी बहिन भांजी को ही दिया जाता है तब अपनी पुत्री जामाता के घर नेवता भेजा जाता है ,ये नेवता हल्दी छींटे देखकर ही बहिन समझ लेती है शुभ सूचना है ,,लिफाफे में पहले एक रुपया भी रखा जाता था जिसे "तमोर "कहते हैं उसे लौटाने तो आना ही पड़ेगा ,,,वही रुपया हर नेग में एक रुपया ऊपर चलता है चाहे पांच सौ एक हों या दस हजार एक ,,,,,यानि गिनती पुनः प्रारंभ है व्यवहार की बंद नहीं ,,,बहिन की तरफ से आया व्यवहार "खोटा "कहकर लौटाने की हँसी मजाक की भी परंपरा है ,वह भतीजी को तो देती है उपहार परंतु भाई के व्यवहारियों की सूची में उसका व्यवहार सवाया करके लौटा दिया जाता है । उधर बहिन के घर की पाँत भोज का जो जो भोजन पकता है उस सबमें भाई का लाया "अन्न नमक घी सब जरा जरा ही सही परंतु डाला जाता है तभी पूरा"" पाँतभोज""होना माना जाता है ,,बहिन के पड़ौसियों तक को बहिन के भाती का ""टूप ""जाता है जो प्रायः कुछ पैसे फल मिठाई और रूमाल या एक छोटा बरतन होते हैं ........इसमें एक कर्त्तव्य बंधन है पारस्परिकता है ....विवाह से पहले बहिन भात न्यौतने जिस तरह जाती है विवाह पूरा होने पर बहिन भात का दशांश लौटाकर बरकत का आशीष देने भी जाती है जिसमें भतीजों भतीजियों और भाभियों के लिये उपहार रहते हैं ......कामना यह रहती है कि भाई की बरकत रहे वह पूरी तरह नहीं आर्थिक रिक्त हो ......ये परंपरायें बड़ी दृढ़ थीं ,आज भी कसबों और गाँवों में हर्ष उल्लास से मनती है .........भात में आये भाई के कुनबे की आवभगत बारात से भी अधिक होती है ,,,मामा फूफा मिलकर ही विवाह कार्य का श्रीगणेश करते हैं ,,,भाभियाँ ननद के घर आकर गारीं गातीं है और संगीत का मुकाबिला देखने लायक होता है । ...........छटंकी ओला पड़ ग्या री नौटंकी (ननद)माँगे भात ""मैंने कई ती चांदी ले ले वो तो माँगे सोना मेरा हार नजर पै चढ़ ग्या री नौटंकी माँगे भात ::::::::::::
बुन्देलखंड का कुँवर हरदौल का मरकर भी बहिन कुञ्जावती को भात देना पीड़ाभरा स्नेहभरा और गर्वभरा सत्य चरित् है ,,,,,जिनके भाई नहीं वे हरदौल के चौंतरे पर भात मांगने जातीं है सो हरदौल सब बहिनों के भाती वीर हो गये।
कानून का इधर कार्य ही नहीं ,,,,ऐसी बहिनें हैं जिन्होंने कभी मुड़कर मायके से पानी भी न मांगा और ऐसे भाई है जिन्होंने स्वयं की एड़ी घिस डाली बहिनों की जिन्दगी पर आँच नहीं आने दी ,,,,न कोई अधिनियम न संविधान यह सब परंपरा की दृढ़ सत्ता का कमाल है।

क्यों है भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ ***********************

क्यों है भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ ***********************

आप यदि चालीस से ऊपर के हैं तो याद करें आपने अपनी मां दीदी दादी बुआ
काकी माँसी नानी मामी ताई पुरोहितानी पड़ौस वाली जीजी काकी और दादी के
पाँव प्रायः हर तीज त्यौहार जन्मदिवस और दशहरा दीवाली परदेश जाते और आते
समय परीक्षा देने जाते और उत्तीर्ण होने पर भी छुए होंगे ही ,
सब का आशीर्वाद याद करें ,
और उन पलों की भावना याद करें ,
भारत में पुरुष हर जगह "नर "नहीं है । वह मानव है ।
प्रणाम
की नमस्कार की भारतीय परंपरा में दोनों हाथ हृदय के पास लाकर सिर झुकाकर
जोड़ दिये जाते हैं और एक हो या एक करोड़ सबको प्रणाम हो जाता है ,और न
कोई संक्रमण न ही किसी के प्रति कामुक अश्लील स्पर्श की तनिक भी गुंजाईश
,
जबकि
गाल चूमने ,हाथ चूमने ,गले मिलकर चिपकने ,हाथ मिलाने ,घुटने चूमने ,या
आगे पूरा कमर झुकाकर झुकने इन सब तरीकों में ,
एक दोष है शरीर को स्पर्श करना या बुरी तरह बार बार झुकने से कोई प्रहार
धोखा सिर टकराने जैसी भूल कर बैठने की गुंजाईश छोड़ना ,
भारतीय कन्याओं से स्त्रियों से स्पर्श नहीं करने की नीति पर पले बड़े
हैं ,याद करें कि पंसारी ,कोरी ,काछी ,बजाज, मनिहार किसी से भी सामान
लेते समय हाथ न छूए स्त्रियों का इस मर्यादा का स्मरण रखा जाता था
।डाकिया हो या तार वाला ,पैसा रुपया लेना हो या देना स्पर्श से सदैव
स्त्रियाँ बचकर ही रहतीं थीं ।
यहाँ दो कारण है ,प्रथम स्त्रियों को स्वस्थ और स्वच्छ रहना है और यह
अपने शिशु ,गर्भ, रसोई ,और गृहस्थी सबके लिये निरोग रहने की पहली
अनिवार्य स्थिति रही ..........आज जीका वायरस ,वायरल फीवर ,ई बोला ,एड्स
,टीबी ,पीलिया, और तमाम त्वचा रोग सांस रोग ,
इस बात का प्रमाण है कि सनातन भारतीय ,,,,अस्पृश्ता ,,,,घृणा हेतु नहीं
अपितु आरोग्य ,,,नीरोगता ,,,और निःसंक्रमण की नीति हेतु था ।
.....दूसरा कारण है कामोत्तेजना पर नियंत्रण ,माने या न माने परंतु
यूरोपियन चूमा चाटी हगने और लिपटने मुआह और हाईफाई की संस्कृति ने ,बहुत
जगह छोड़ रखी है ,कुत्सित मन विचार भाव के लोगों के लिये कि वे स्त्रियों
को अश्लील कामुक और दुर्वासना से छू सकें ,,,न भी हो मन अशान्त तो भी हो
सके ,और एक स्त्री को छुआ चूमा हग किया ,हाथ मिलाया यह एक मनोविकार की
स्थिति में कल्पना की गंदगी भी हो सकता है । यहीं इसी आननपोथी पर कुछ
लोगों ने यदा कदा स्वीकारा कि वे अनेक ग़ैर स्त्रियों के प्रति काल्पनिक
कामवासना से सोच जाते रहे हैं । काम वासना हर व्यक्ति के लिये पृथक पृथक
स्तर पर है ,कईयों को स्वयं पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त है इसमें प्रायः
स्त्रियों की संख्या ही अधिक है ,और कई मानव हर पल कामविचार से ही भरे
होते हैं जब देखो तब हाथ इधर उधर विशेष कर अमर्यादित वातावरण में रह रहे
पुरुष ।
सनातन अभिवादन पद्धति इस तरह के मानसिक रोगियों तक के लिये गुंजाईश नहीं छोड़ती ।
गुरूमाता
माता
माँसी
माँ मी
ताँ ई
दादी
नानी
जीजी
बहिन
भाभी
बुआ
और पड़ौस की सब स्त्रियाँ ,
सगोत्र स्त्रियां
कुटुम्ब की स्त्रियाँ
अनुज वधू
पुत्र वधू
पौत्र वधू
कुमारी कन्या
सहपाठी गुरूभगिनी
इन सबको सनातन संस्कृति में विचार तक में कामभावना रखने से वर्जित कर दिया ,
और
मन बाँधने को चरण स्पर्श की परंपरा चलायी ,
स्वाभाविक है जब चरण वंदन के लिये सिर सहित पूरा झुकना पड़ता है ,
सारा अहंकार कुछ पलों के लिये तिरोहित होकर आशीर्वाद का याचक हो जाता है ,
उस याचना में अपेक्षा है ,
तो शुभ वचन सुनने की ,
सब कह देतीं हैं ,
आयुष्मान हो सदा सुखी रहो विजयी भव प्रसन्न रहो ,
क्या
मन की अनंत गहराईयों से निकले इन आशीर्वचनों का लाभ न मिलता होगा !!!
सर बेन्डीवर ने किंग आर्थर के लिये विदाई वेला में लिखा कि प्रार्थना
चमत्कार कर सकती है इतना कि मानव सोच नहीं सकता !!
कुरान में दूसरे के लिये दुआ मांगना फर्ज कहा गया ,
बाईबिल कहती है प्रार्थना से असंभव भी संभव हो जाता है !!वही परंपरा में
हमारे सतत आत्मसात है तो ,हम पिछड़े हैं ??चेतना के स्तर पर विचार कीजिये
आपको अपनी संस्कृति से प्रेम और स्वयं पर गर्व हो उठेगा
तो क्यों न अपनी ही संस्कृति पुनर्जीवित करें ?
©®सुधा राजे

Friday, 2 June 2017

सुधा राजे का लेख :- गंदगीऔर क्रूरता कभीअधिकार नहीं हो सकते।

मांस की दुकानों का हाल उ.प्र.में नर्क की कल्पना से भी बुरा है ,कैंसर टीबी.जीका.स्वाईनफ्लू,एड्स के बीच क्या ऐसी गंदगी सही है?विरोध सोच समझ कर करें ।ये केल मांसाहार का विरोध नहीं है ।हाईजिनिक वातावरण की भी आवश्यकता हैकि बस्तियों बाजारों सिनेमा बस स्टाॅप रेलवेज पाठशालाओं छात्रावासों अस्पतालों मन्दिरों गुरुद्वारों और सब्जी तथा अनाज फल मंडी बैंक डाकघर और पुलिस थानों से दूर ही हो बूचड़खाने ।
मख्खियां भिनकता मांस कटे फटे वीभत्स बड़े भयानक हड्डे पसले रानें टागें और बिखरा खून ही खून हर तरफ खट् खट् खट् काटता कसाई सबके सामने और लिपटती चिपटती मिट्टी धूल बगल के गटर मल मूत्र पर से बैठी मख्खियां कीड़े मकोड़े बैक्टीरिया सूक्षम जीव ...........
सब देखना किसी यातना से कम नहीं ,हमारी एक मित्र मांसाहारी थी उनको एक दिन दुकान दिखा दी बस सदा को त्याग दिया ,,,
ये कौन नहीं जानता कि पशु भी रोगी होते हैं और रक्त मांस से चाहे कितना भी पका लो कुछ वायरस कभी नष्टनहीं होते उसी पर हाथ से ही 8घर लेकर जो जो लोग धोते मलते और पुनः काटते छांटते फिर पकाते हैं वे भी उस पशु के रक्त और द्रवजीवाश्म पदार्थ के संपर्क में आते हैं ,वे मांस पर रक्त पर हड्डियों पर बैठी मख्खियां मंदिर जाती थाली के प्रसाद पर और बगल के हलवाई की बरफी पेड़े जलेबी पर और अस्पताल के मरीज के भोजन की थाली और सर्जरी के जख्मों पर भी बैठकर संक्रमण फैलातीं हैं । पश्चिमी यूपी में मांस काटने की दुकाने नाई की दुकान की तरह हर जगह हैं दवाई की दुकाने किराने की चूड़ी की और तो और ठीक घर गली मुहल्लों तक में कसाई बैठकर खट पट करते रहते हैं । जो जो मांस खाते हैं यह उनका मसला पहले है । क्या ऐसा घिनौना बीमार पशु का घटिया प्रदूषित गंदा मांस आप खाना चाहोगे ?ब्लड कैंसर आंतों का कैंसर टीबी एड्स और स्वाईन फ्लू खसरा और त्वचा रोग सबसे अधिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मांसाहारियों में हैं । हर बस स्टाॅप के पास मांस की दुकान है ,हर पाठशाला के पास हर रेलवे स्टेशन के पास हर बैंक के पास और हर अस्पताल थाने अदालत और सब्जी मंडी के पास भी मांस की दुकान है । #योगीसरकार तो कभी इन तक पहुंच ही नहीं पायेगी ये एक गांव मेंदरजन और कसबे में हजार के हिसाब से खुली हैं । हर मुहल्ले में दो चार घरों की बैठक में खट् पट् मांस कट रहा है । 
बड़े स्लाटर हाऊस लायसेंस वाले गिने चुने हैं पूरे प्रदेश में भी तीन के आंकड़े में सैकड़ा भर ,किंतु ये घर गली बाजार में दिन भर चाय की दुकान के बगल में बने खटपट् कसाई खाने सबसे अधिक प्रदूषण फैलाते हैं । पशु जो मारे जाते हैं या मुरगे बकरे वे भी क्रूरता से बांधे जाते है ,जगह जगह खुले इमामबाड़े बगियानुमा मैदान या खंडहर हैं उनमें बड़ी दावत आदि के लिये क्रूरतापूर्वक पशु काटकर रक्त आंतें छीछड़े वहीं करीब नाली किनारे सड़क पर फेंक दिये जाते हैं ,ये सड़े गले अंग कुत्ते बिल्लियां और रात को बस्ती में घुसे गीदड़ सांप बिलाव आदि लेकर इधर उधर खाते हैं चील कौए उल्लू गीध मँडराते खाते हैं और कहीं भी गिरा देते हैं ।
 ऐसा भी होता है कि आप मंदिर जा रहे है पूजा का थाल सजाकर और आपके गंगाजल के लोटे में बड़ी सी हड्डी या टांग या कटी पूँछ या खुर का मांस लगा टुकडा़ चील या कौआ पटक दे ,या घर की छत पर भोजन करते समय आपकी दाल की कड़ाही में बड़ा सा मुंड पटक दे चील ,या सुबह जब तुलसी को जल देने जाओ और वहां कुत्ता आपका पालतू हो या आवारा किसी तरह बाहर से आंतों का गुच्छा खींचकर लाया और बैठकर चींथ रहा हो ,रक्त सने कटे पर पंख उड़कर आपके बिस्तर या बरामदे तक में उड़कर हवा के साथ आ जाये । हम सब यही झेलते हैं । आये दिन तनाव फैल जाता है कहीं बड़ा मांस या कहीं सूअर का मांस किसी हिंदू या मुसलिम पूजा या इबादत घर के प्रांगण में पड़ा मिलता है और लोग तलवारों तक जा पहुँचते हैं । 
#कम्युनिटी पुलिस मैं हम अपना नाम सबसे पहले केवल इस लिये देना चाहते हैं कि ये दंगे न भड़कें कम से कम मांस के टुकड़ों पर तो नहीं । हमारा पिछला कुत्ता लपक गया था ऐसा कि बड़े बड़े मांस के टुकड़े सहित बड़ी टांगें और सिर ,कहीं से कहीं तक जाकर उठा लाने लगा था ,हम उसे पहले बांधते नहीं थे बाद में बांधा तो रोने लगा मजबूरन किसी को दे देना पड़ा ।
बड़े बड़े सेकूलरिज्म वाली मानसिकता के लोग इसको मुसलिम विरोध के तौर पर प्रदर्शित करते हैं ये कहां तक की दब्बू मानसिकता है !!!!!!!मतलब तुम गंदे रहो बीमारी फैलाओ वीभत्सता से लोगों की पूजा पाठ भोजन शैली पर हमला करो क्योंकि तुम एक सेकूलर देश में हो और यहां बहुसंख्यक होकर भी हिंदू को चैन से जीने का हक नहीं कि कहीं दूसरे को नियम कानून साफ सफाई से परदे में न काटना पड़े मांस और अवशेष कहीं निपटाने न पड़ें !!!महोदय रोजी रोटी तो नशीले पदार्थ बेचकर ,चोरी डकैती जेबकतरई राहजनी ,सुपारी किलिंग ठेके ,सट्टा जुआ ,कच्ची अवैध शराब ,मानव अंग तसकरी ,बच्चों लड़कियों को बेचने ,कन्याभ्रूण हत्या से भी ,,,,हजारों लाखों लोगों की चल रही है !!!
तो क्या ये सब भी चलने दें ??वरना बेरोजगारी बढ़ जायेगी उन सब वित्तीय अपराधियों को भी करने देना चाहिये अपराध जो नकली मुद्रा बनाते या स्मगलिंग करते हैं !!!!
अजीब तर्क है !!गरीब आदमी अगर बेटी बेचकर वेश्यावृत्ति कराने लगे  तो करने दें ?या लाशों को उखाड़कर बेचने वालों को ऐसा करने दें .......
©®सुधा राजे