Friday, 21 March 2014

गीत:- ये पत्र तुम्हारे नाम।

स्वर्ण भोर हीरकी दोपहर
मदिर सुरमई शाम,
मणि मन चन्दन ,तन
घन कुंतल ,सब तेरे घनश्याम!!

मुक्ता अश्रु, हास नवरतनी
छीजे, पद्म-राग रस चुनरी,
मूंगे अधर, फटिक नख-शिख ये,
नयन दीप कंचन तव डगरी

किन्तु कहाँ तुम जहाँ
भेज दूं सारावली सन्देश,
तिर्यक चन्द्र चन्द्रिका सिसके,गीले तुहिन प्रदेश

पीर प्रतीक्षा, शीत वादियाँ,
श्वेत ठिठुरती प्रीत,
आश हिमालय, हिम-ही-हिम
गूंजे विरहा का गीत।

कस्तूरी मृग प्रणय ,न खोजे
प्रिय, परिमल का स्रोत
गह्वर गहन छिपा निर्जन वन
तनहा, मिलन कपोत

कहीं दूर बिछुड़ा पंखी,
पिऊ करता छाती चीर,
कुहू ,गूंजता सन्नाटे में
किसे पुकारे कीर ??

अनजाने अनगिन प्रवास पर
वय यायावर ,हाय,
साँवरी सुधि हुई निपट बावरी,
साँवरिया ना आए

नयन पलक जल पनघट सपने
कलश डुबोते रोज़
"अजपा" 'पी-पी' रटे स्वाँस हिय
स्वजन प्रणय की सोज।

थके उनींदे हार चले रंग
पाँव प्रतीक्षा छूट,
दो बाहें दो नयन रो दिए
आशाओं से रूठ।

घायल मोह , मान_सर हंसा
जरे पंख मृत गात
आये ना मानस श्याम ,चम्पई
रात सिसकती वात।

चटख जली इक चिता
सो गयी मंदाकिनी तट वाम
आये न घन, ना श्याम , न चैना
हुई साँस की शाम।

प्रणय नववधू ढोये थका
ये मन कहार वन-पंथ
कहाँ बसे सांवरिया साजन ?
कहाँ वीथि का अंत ?

पीर बसीठी अश्वारोही,
परिकल्पित अविराम,
पत्र-पत्र नित अरुण सुरमई
लिखे श्याम के नाम

सुधा-सुरा विष वारुणि पीती
शब्द चषक प्रति याम
गीले-भीगे गीत श्याम ये
सभी तुम्हारे नाम।
©सुधा राजे

Thursday, 13 March 2014

गीत :- एक जनीं सें बस्ती नात सुहानी ।

Sudha Raje
अम्माँ मर गयीँ जब सेँ
बापू रै गये निपट अकेले ।

डिङक हिलक के कै रये
बिन्नू!!!!को जौ जीबौ झेलै
बिन्नू को जौ जीबौ झेले!!!!


1-जौँ लौँ अम्माँ जियत रहीँ बाबूजी की चलती रयी ।

डाँट पङी अम्मईँ पै चाँयेँ
कोऊ करी गलती रयी ।

अब कै रये पछता कैँ
हमखौँ काय न भेजौ पैलै

बिन्नू को जौ जीबौ झेले ।

2-अम्माँ डाँठेँ रयीँ थुमियाँ सीँ
ठाट बङेरे घर के ।

इत्ती तनक कमाई , 'जोरी
मुलक गिरस्थी मरकें

बाबूजी तब पी पी दारू
खूबई रुतबा खेलेँ

बिन्नू को जौ जीबो झेले ।

3-लरका बऊ ने
कब्जा लओ अब मड़ा
""पौर में बैठेँ ।

अम्माँ खौँ गरिय़ाऊत्ते
बैई " बऊ की सुन सुन ऐंठे ।

नातिन कै रयी टोकत कित्तौ
डुकरा "कितै पहेलेँ ।


बिन्नू को जौ जीबन झेले

4-"सुधा "आयीँ बिटियाँ सो हिलके
जे-ई लगत तीँ खोटीँ ।

बेई सुना गयीं भज्जा खोँ
""कये दै रओ सूकी रोटी???

बिटियन के डर सेँ भौजैयाँ
पथरा मुडीँ ढकेलें

बिन्नू
को जौ जीबौ झेलेँ

5-अम्माँ हतीँ दबाउत गोङे
मूँङ पै चिकनई धरतीं

नग- नग दुख रये
गोली खा रये ।
नतबऊ ढूँक पबरतीँ।

सबखौँ भाबई लगे पैन्शन
मिल रय़ी जाये सकेलेँ

बिन्नू को जौ जीबौ झेले ।

6-अम्माँ हतीँ मिलत तीँ चुपरी ।
बई पै टाठी फेँकी ।

कौनऊ परी विपत् अम्मईँ ने
झखरा बन बन छेँकी।

जई सेँ ""सुधा"" जोर कर कै रयीँ ।
घरवारी सँग रै ले

बिन्नू को जो जीबौ झेले?

7-ज्वानी परैँ उरद गर्रानी
ज्वार मका मरदानी ।
परैँ बुढ़ापौ एक जनीं सें
बस्ती नात सुहानी ।

कर लो कदर घरैतिन की बौ
टेक टौरिया ठेले ।

बिन्नू को जौ जीबौ झेले
??? ©®¶©®¶
Sudha Raje

(बुंदेली बोली में एक सत्य चित्रगीत)

Wednesday, 12 March 2014

लेख :- नदियाँ तो सबकी हैं।।

क्या केवल हिंदू ही पीते नहाते बरतते हैं
नदियाँ???? क्या ये जिम्मेदारी केवल
हिंदू की है??? तो फिर सारे बूचङ खाने
और मिल कारखाने नगर निगम
जो अहिन्दू शासक मालिक नदियों में
पटक रहे हैं ""कैसे रुकें? ""बहुत से हिंदू अब
मुरदे बिजली से जलाते है नदी में साबुन
तेल नहीं लगाते निर्माल्य नदी की बजाय
बाग में गाढ़ते है और मुंडन के बाल भी खेत
में गाढ़ने लगे हैं """"किंतु नदी में
सीवरेज??? कसाईखाने नगर निगम और
ड्रेनेज कारखानों मिलों का कौन रोके???
कैसे??? हम आपको ही मुखिया बनाते हैं
चलिये कीजिये अगुआई??

टिहरी पर बाँध बना दिया!!!!!!!
कितना रोका हम सबने!!!!! अविरल गंग
प्रवाह
होता तो नदियाँ ""स्वतः बरसात और
बाढ़ से साफ होती!!!
जमुना को गंदा नाला बना दिया "दिल्ली सरकारों ने
""अविरल जमुना रहती तो स्वतः साफ
रहती!!! बाँध बनाकर
सुखा डाली नदियाँ कम से कम
गंगा यमुना सरयू नर्मदा गंडकी तो रहने
देते??? बिजली केवल हिंदू बरतते हैं????

सदियों से नदी किनारे ही आक्रमण किये
गये नदी किनारे ही नगर बसे और
साम्राज्यवादी आतताई सब नदी किनारे
ही संकुल होते गये ।।पूर्वोत्तर के
राज्यों की तुलना संभव नहीं है
यूपी बिहार राजस्थान महाराष्ट्र और
मध्यभारत पंजाब के ""इलाके आक्रान्ताओं
ने बार बार तबाह किये और आज़ादी के
बाद सरकारें केवल तुष्टिकरण वोट और
आरक्षण के भरोसे चलतीं आ रहीं है ये
""हिम्मत " किसमें है जो पंच दिव्य
सरितायें ""अविरल प्रवाहित कर दे
सीवरेज ड्रेनेज और रेल उल्लंघन से मुक्त!!!!!!

Saturday, 8 March 2014

अस्पृश्य मन ।

एक स्त्री को समझने के लिये एक पुरुष
ही चाहिये

एक पुरुष को समझने के लिये एक
स्त्री ही चाहिये ।
एक स्त्री स्त्री का मन समझ ले
ममता स्नेह भी रखे किंतु उसके अधूरेपन
का समाधान नहीं हो सकती ।
एक पुरुष के कितने ही गहन सघन
मित्र हों किंतु स्त्री के
बिना उसकी अधीरता नहीं जाती ।
यह निरा यौनाकर्षण नहीं है ।
यह निरा दैहिक संबंध नहीं है ।
ये बिडंबना ही है सामाजिक ताने
बाने की जहाँ स्त्री को एक
जोङी दार
स्थायी शैयाशायिनी पाकशाला प्रबंधक
के प्रतीक रूप में मढ़ दिया गया ।
किंतु अकसर स्त्री मन को वे पुरुष
ही अधिक समझ पाये जिनको उस
स्त्री के तन से कोई लोभ
नहीं था जिनका भोजन वह
स्त्री नहीं पकाती थी ।
मित्र शब्द के लिये कोई स्थान
छोङा नहीं गया कि आचरण का पतन
होते देर नहीं लगती और ये रिश्ते
मोहताज़ ही रहे नातों के शीर्षक में
आने के लिये,,
जब जब किसी ने
अपनी स्त्री को बिना देहालाप
की इच्छा के छुआ स्त्री मन की एक
गाँठ खुली पायी ।
स्त्री का अपना पुरुष कदाचित
ही कभी देहालाप से ऊपर भी स्पर्श
बिना स्त्री और
""मेरी ""स्त्री समझे बिना कर
सका ।
हर दिन एक पुरूष तो चाहिये
खिलखिलाने को
जी भर कर कंधे पर रो लॆने को ।
किंतु हर दिन देहालाप केवल
नहीं चाहिये ।
कुछ स्त्रियाँ देह से परे केवल मन
ही मन और कुछ स्त्रियाँ मन से
बिना केवल देह ही देह बनकर जब रह
जांयें तो कहना पङेगा कि कोई
समझा नहीं ।ये समझने वाला कोई
पुरुष ही होता किंतु ये "स्त्री देह
स्त्री मन की शत्रु बन गयी जो हर
समय स्त्री को देह समझा गया और
उसके मन को छुये अपनाये बिना देह से
रिश्ते बनाये गये कभी रिश्ते के नाम
पर कभी विवश करके ।
"""""""
जब स्त्री को देह
नहीं समझा जायेगा तब
महिला दिवस
मनाने की जरूरत भी नहीं रहेगी ।
अन्य़था
स्त्री सदैव अधूरी ही रहेगी कितने
ही आभरणों के तले उसका मन
बाग़ी ही रहेगा
और कोई भी पुरुष केवल छू
सकेगा कभी रोती कभी अभिनय में
इठलाती मुसकाती देह।
स्त्री को समझने के लिये पुरुष मन
चाहिये
देहबोध से परे """"
©®सुधा राजे

Tuesday, 4 March 2014

दोहे :तिलक छाप

Sudha Raje
तिलक छाप घंटी बजा
करमाला धर ध्यान ।
सुधा न गयी मन वासना ।
धिक् भगती धिक् ज्ञान ।
दाङी बाढ़ी नाभि लौं
माथे कारिख पोत ।
सुधा न ऊरी सामता
विरथ खुदाई जोत ।
पहिर सफेदी पाँव लौं
धर सलीब कर माल
हृदय विचारत द्वैधता
सुधा कहाँ प्रभु बाल?
गुनत सुनत घोकत सुधा
साँचे सुफल विचार
खोजत रह ग्यौ गुरु हृदय
लखियत पंथ प्रचार ।
सुधा बावरी जौन की
बाकौँ जानत कौन?
ना जंता बोलै सघन
जंता ठानैं मौन
©®सुधा राज

Sunday, 2 March 2014

कविता:- भरा फिर खेत में पानी

भरा फिर खेत में पानी
है पगडंडी पे अब दलदल

हुयी कमबख़्त बारिश
भी किसी नेता की रैली है ।
खङी है ईख की फसलें मिलों के छल कपट
चलते ।
डरी बाली है गेहूँ की
फ़सल आमों की मैली है ।
©®सुधा राजे
Dta-Bjnr

Saturday, 1 March 2014

अकविता :तुम सिर्फ इसलिये महान हो

7 minutes ago ·
तुम सिर्फ इसलिये महान हो क्योंकि बहुत
सारे लोग जो तुमसे श्रेष्ठ थे जानबूझ कर
गुमनाम रखे गये ।
तुम सिर्फ इसलिये पुरस्कृत हो क्योंकि कुछ
लोग जो तुमसे अधिक हुनरमंद थे हाथ कुचल
कर विकलांग कर दिये गये ।
तुम सिर्फ इसलिये विजेता हो
क्योंकि कुछ लोग जो तुम से
ज्यादा पराक्रमी थे साज़िश करके
प्रतियोगिता से बाहर रखे गये ।
तुम सिर्फ इसलिये सम्मानित हो क्योंकि
कुछ लोग जो पूजे जाते कभी फूल मालाओं
की राह में किसी के लिये नहीं रुके ।
बहुत
सी जीवनियाँ कभी समाधि या मज़ार के
बिना हङप्पा मोहन जोदङो हो जाती हैं
और कुछ सायास लिखाये गये "नामे "
©®सुधा राज