Tuesday, 31 December 2013

सुधा राजे की नज़्म : दर्द को दीवार

दर्द को दीवार पे
लिख दूँ तो ये गिर
जायेगी
आँख खोलूँगी तो
आँसू से नदी डर जायेगी
क्या लिखें कहदें सुनायें
इक सदी सैलाब है
आसमां भी रो भी रो पङेगा
छत्त ये झर जायेगी
जो जली हो बर्फ़ में
बेघर बिला दर उम्र भर
आग में रखो उसे तो
बस धुआँ बिखरायेगी
नर्म तिनको से बुने थे
जो बया ने घोंसले
बावङी बेआब हो गयी
वो बया डर जायेगी
क़ारफ़रमा थे वही फ़रज़ंद
ताने हैं कमां
खेत से आँगन बँटा तो
अबके माँ मर जायेगी
जिस सेहन में गूँजते रहते हैं
अब तक गीत वो
बेचकर भाई चले
बेटी भी रोकर जायेगी
जिसके चप्पे चप्पे पे
उंगली घिसी थी माई ने
जब वही घर ना रहा तो
क्यों शहर वो आयेगी
वो हवेली खंडहर हो गयी
किसी अरमान सी
फिर भी गौरैया वहीं पर
इक चहक कर जायेगी
नीम के पत्ते झरे तो
घर का पर्दा भी गया
डाल के झूला वो लङकी
कैसे कजरी गायेगी
बेतवा की धार रेगिस्तान
वाले ले गये
विंध्य प्यासा रह गया चंबल किसे
बहलायेगी
अर्थियों का डोलियों से
एक ही रिश्ता रहा
एक जल्दी एक को
तिल तिल जला दी जला दी जायेगी
लाश अम्माँ की उठी या मायका
भी उठ गया
अब बिना बोले वो किसकी
गोद में रो पायेगी
दूर तक सब अज़नबी बोली
अजब तहज़ीब है
फिर तो वो दुलहन कभी
नैहर भुला ना पायेगी
जो भी आता है परखता है
कि जैसे जिंस हो
साँवली लङकी में दिल है
ये किसे सँभलायेगी
टूट के जो तार बेसुर हो
सितारों के गये
एक मौक़ा तो दे क़िस्मत
बज़्म लूटी जायेगी
पाँव के छालों ने टोका
अब तो रुक जा दर्द है
एक ही ज़िद्दी है वो
लब भींच चलती
जायेगी
और कितने खंज़रो का वार
सहना है उसे
क्या बहारों ने दिया जो
ये ख़िजा ले जायेगी
मार दो दीवार पर ये सिर
तो होगी रौशनी
दिल जो रख दो काट के तो
शायरी हो जायेगी
बात जो दिल में जलाती
दर्द का आतश वही
चुप्पियों ज़ाम भर भर कर
छिपा ली जायेगी
जिस शहर की धूल
माथे पर लगे चंदन तिलक
कोई पूछे कौन हो???
कैसे'' सुधा ''"समझायेगी
©®Sudha Raje
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

poem

Sudha Raje
Sudha Raje
I am very happy that I feel
my existence.In my 'I ' I can
feel the whole cosmos. From
the stage of a slithering
infant to the age of a self -
dependent adult I finally
came to the realization that
what I saw, heard, read or
understood ; there was no
need for all that. because the
insatiable thirst of knowledge
finally draws him to such a
stage that he is finally
envious of the stage where
he was unable because
though wisdom tells the
causes of pleasure or angst
but is unable to terminate
them. no one had seen god
but heard the tales about
him which were made by the
fellow creatures of his own
race and the insatiable thirst
for the knowledge of
supernatural brings the same
conditions where at the point
the vat ocean still remains
salty even after drinking the
whole length of rivers to the
point of aridness when the
cycle starts again. Wisdom
brings nothing but pain,
desperation, helplessness
and abduction to the point
that a person even sees
himself as alien. and this
endless misery abd curse is
bore by the one who put up
a WHY in tgw start©®sudha
raje™©®¶
oh oh oh this pain of knowladge
Jan 20

कविता:जानबूझकर मौन

Sudha Raje
जानबूझकर मौन रहा जो वही समय
का पापी है ।
और बताने वाला खंडित सच को केवल
हत्यारा ।

छुपा लिया है जिसने सच का दस्तावेज़
किताबों में ।
सुधा देखना घर से दर- दर धुँआ
बनेगा अंगारा ।
मौन जानकर मौन रहा जो नेत्रहीन
लोचनवाला
वही देखना वही नोंच लेगा अपने दृग
दोबारा ।
काल कर्म की कठिन कसौटी केवल
निर्मम सत्य सुधा ।
मृत्यु उन्हें भी तो आयेगी समर
अभी बाकी सारा
Copy right
सुधा राजे
©®

Monday, 30 December 2013

स्त्री और समाज '''''लिव इन बनाम विवाह

लिव इन रिलेशनशिप चरित्रहीनता या समय की ज़रूरत या परिवारवाद का ह्रास?
(लेख) सुधा राजे
*-*-*-*-*-*-*-
अभी एक सरकारी विज्ञापन देखा जो अप्रवासी NRI दूल्हा चुनने से पहले की
सावधानी के बारे में था । यह विज्ञापन पहले जब आता था तब लिखा होता था कि
""-सुनिश्चित कर लें कि लङका अविवाहित है ""

अब इसकी भाषा बदल गयी है ।
अब लिखा है कि ""ज्ञात करलें कि आदमी "अकेला है ""

सही ही तो है
क्योंकि अब विवाहित या अविवाहित केवल दो ही विकल्प नहीं हैं ।
एक अविवाहित व्यक्ति समलैंगिक है या गे है या किसी गंभीर मनोविकृत पद्धति
का शिकार है या किसी के साथ लिव इन रिलेशन शिप में रह रहा है यह भी पता
करने की ज़रूरत है ।

लङका तलाशने से पहले ये बातें पता कर लें ।
1-लङका एड्स या किसी यौन रोग या मानसिक शारीरिक गंभीर समस्या से ग्रस्त तो नहीं?
2-लङका नपुंसकता अर्धनपुंसकता समलैंगिकता अप्राकृतिक दैहिक संबंधों और
अन्य विकृतियों से ग्रस्त तो नहीं ।
3-नशा शराब सिगरेट ड्रग्स आदि का आदी तो नहीं । अगर लङकी को पसंद नहीं तो
ऐसा जोङा ना बनाये वरना नरक जिंदग़ी होनी ही है
4-कमाई पढ़ाई आयु जॉब संपत्ति परिवार और अन्य जो विवरण बताये हैं क्या वे सही हैं?
5-लङका किसी तरह के असामाजिक अवैध और आपराधिक कार्यों में लिप्त तो नहीं ।

यहाँ सवाल तब उठता है जब कि लङकी के लिये वर तलाशने पिता चाचा भाई निकलते
हैं और लङकी को केवल एक कठपुतली की तरह सजा सँवार कर पसंद होने के लिये
बिठा दिया जाता है । घंटे भर की मुलाकात और दस बीच मिनट की बात चीत से
कोई घरेलू सामान्य लङकी केवल शक्ल और सामान्य एटीकेट्स के अलावा कुछ भी
नहीं समझ सकती।

विवाह
एक बंधन मानने वाले लोगों की कमी नहीं है फिर भी चाहे स्त्री की कुरबानी
से चले या पुरुष की या तालमेल से विवाह का विकल्प आज भी यूरोप अमेरिका तक
के बहुत खुले समाजों तक में नहीं पनप सका और अंत में परिवार एक विवाह की
मुहर के बाद ही बनना संभव हो पाता है वहाँ जहाँ बिना विवाह के भी बच्चे
पाले जा रहे हैं ।
भारत
के संदर्भ में एक शब्द आता है बङा प्राचीन अशालीन किंतु कदाचित इसका मतलब
देशी भाषा में लगभग वही है जो आधुनिक लिव इन रिलेशन शिप का है "रखैल "।
ये रखैलें धनवान अय्याश पुरुषों की लगभग पत्नी हुआ करतीं थी । मकान कपङे
गहने रुपया खरचा और सारी सुविधायें तो देता था पुरुष किंतु समाज के सामने
कभी स्वीकार नहीं करता था कि वह स्त्री उसकी शय्याशायिनी या प्रेमिका या
रखैल है ।
जबकि विवाहिता पत्नी को और समाज के करीबी लोगों को पता होता है कि दोनों
के बीच नजदीकी संबंध हैं ।
ऐसे संबंध बेशक बहुत से अमीरों और गरीबों में तक बहुतायत रहते आये परंतु
सामाजिक मान्यता और सम्मान कभी नहीं मिला ।

स्थानीय टोटम और कबीलाई रीतियों में "वह उसको राखें है "कहके निंदित और
बहिष्कृत किया जाता रहा ।
जबकि "छोङ छुट्टी "को मान्यता रही । और छोङ छुट्टी देकर कराव करने को भी
जनजातियों मजदूर वर्गों में "दूसरी कर ली "दूसरा कर लिया " को मान्यता दी
जाती रही ।

यानि विवाह अगर एक बार टूट गया तो दूसरी बार कराव सही था किंतु राखना अवैध।
आज
लिव इन रिलेशनशिप को कोर्ट से मान्यता का अर्थ समझने की ज़रूरत है ।
कोर्ट यहाँ पर स्त्री और बच्चों पर रखैल कह कर छीन लिये गये हक के प्रति
न्याय के लिये खङा है और घोषित करता है कि अगर किसी आपसी समझ और मान
सहमति से एक स्त्री पुरुष के साथ दैहिक संबंध रखते हुये पत्नी की भाँति
रहती है और दूसरे किसी पुरुष से कोई ऐसा नाता नहीं है और सब उसी तरह
परिवार की भाँति दोनों के बीच चलता है तब जो बच्चे पैदा होंगे वे पिता
माता की संपत्ति के वारिस होगे और ऐसी स्त्री अगर स्वावलंबी नहीं है
आर्थिक रूप से तब पत्नी की ही भाँति भरण पोषण और गुजारा भत्ता पुरुष को
देते रहना पङेगा । जब तक कि वह रिश्ते में है या और जब तक कि वह कहीं
किसी दूसरे पुरुष से विवाह या संबंध नहीं रखती । तब भी बच्चे जैविक रूप
पिता के वारिस होगे ।

ये दरअसल उस शोषण के खिलाफ फैसला है जहाँ एक स्त्री विवाह करने की पक्की
आशा में प्रेम के पक्के विश्वास में पति ही मानकर एक पुरुष के साथ रहती
रही और रिश्ता छिपाने की वजह कोई परीक्षा कैरियर समय परिजनों की नाराजी
या अन्य हालात रहे । समय बदलते किसी वजह से पुरुष का मन बदल गया और वह
किसी तरह छुटकारा पा लेने के लिये ऐसे रिश्ते से मुकर गया । तब जो बच्चा
हो चुका या होने वाला है वह हरामी ना कहलाये उसको पिता का नाम मिले वह
अनाथ ना कहलाये उसको माँ बाप की संपत्ति पर वारिसाना हक़ मिले । औरत
बेसहारा होकर दर दर ना भटके यौवन और सम्मान गँवाकर भी वह जी सके रोटी
कपङा मकान दवाई और जरूरी चीजों के साथ वैसे ही जैसे कि तब रहती थी जबकि
वह पुरुष उसके साथ पति पत्नी की भावना के साथ रहता था ।
यह लाखों मामलों में सिद्ध हुआ कि प्रेम में विश्वास और समर्पण के बाद
पुरुष ने धोखा दे दिया और स्त्री अवैध संतान को लेकर बदनामी ना सह पाने
की वजह से मार दी गयी या मर गयी या बदनामी झेलती रही और फिर किसी दूसरे
ने भी विवाह नहीं किया जीवन तबाह हो गया गर्भपात की असामयिक यातना सहनी
पङी या गर्भपात में जान चली गयी या बच्चा समाज के डर से घरवालों ने मार
दिया फेंक दिया या अनाथालय छोङ आये ।

ये दारूण विडंबना पुरुष के हिस्से नहीं आती क्योंकि समाज की सोच और
स्त्री देह की संरचना दोनों ही स्त्री के खिलाफ ही रहती आयी है ।
कानून जहाँ पॉलिगेमी बहुविवाह और बायोगेमी को अपराध घोषित करता है वहीं
किसी दूसरे की विवाहिता से दैहिक संबंध और भगा ले जाने को भी अपराध घोषित
करता है ।

लिव इन रिलेशनशिप केवल दो अविवाहित या दो तलाकशुदा या विधुर या अकेले ही
रह रहे व्यक्ति के बीच मान्य हो सकती है ।

किंतु अगर स्त्री विवाहित है और किसी अन्य के साथ पत्नी बनकर रह रही है
तब यह वैसा ही अपराध है जैसा एक विवाहित पुरुष पत्नी होते हुये किसी अन्य
स्त्री के साथ पत्नी पति की तरह रिलेशन शिप में रहता है ।

तब भी बच्चों के पैतृक अधिकार खत्म नहीं हो जाते ।

कोर्ट का कतई ये संदेश नहीं है कि विवाह का विकल्प लिव इन रिलेशन शिप है ।

केवल यह संदेश है कि लोग ये भ्रम ना रखें कि कोर्ट में या मंदिर में या
परिवार के सामने शादी नहीं की है तो सारे आजाद रहेगे और जब तक मन करेगा
मौज़ जब मन करेगा आजाद परिन्दे और पीछे कुछ नहीं रहेगा हाथ पैर पकङने
को!!!
ये भ्रम तोङ दें ।
क्योंकि विवाह करो या मत करो ।
बंधन है कानून का भी और प्रकृति का भी । जब दो व्यक्ति पति पत्नी की तरह
संबंध बनाकर साथ रहते हैं तो जोङा है और जोङा है रेग्युलर नियम के
सामान्य रूप में यह पतिपत्नी का ही रिश्ता है और वे सारे हक़ उन बच्चों
को उस स्त्री को प्राप्त हैं जो अगर विवाह कर लेती तो प्राप्त होते ।
अब कहें कि कहाँ बची आजादी? इस तरह के जोङे के सारे दायित्व और अधिकार जब
विवाहित पति पत्नी के हैं तब यह विवाह का विकल्प कैसे?
क्योंकि प्रकृति प्राणी जब प्रेम करता जोङा बनाता है तब किसी रस्म रिवाज
की मोहताज़ नहीं होती और अगर वैज्ञानिक उत्पादों से ना रोका जाये तो
बच्चे जन्म लेते है यही विवाह है ।
बाद में रिश्ते से मुकरना संभव नहीं । प्रकृति सुबूत छोङती है । मुकरते
ही प्रेम और जोङा बनाना ग़ुनाह हो जाता है । तब छला गया व्यक्ति क्या
करे? तब जो संतान हुयी वह कहाँ जाये? क्योंकि संतान का कोई गुनाह नहीं
प्रेम कोई अपराध नहीं । अपराध है धोखा देना अपराध है किसी को बेबस करके
बीच मँझधार में विगतयौवन स्थिति में अकेला छोङ देना समाज में चरित्रहीन
साबित करके ।

एक समझ विकसित करने की जरूरत है कि विवाह और परिवार के सिवा जोङे बनाकर
रहना किसी भी सभ्यता के विकास का अंग नहीं है । मनपसंद व्यक्ति के साथ
मुक्ति तो खुद ब खुद हो सकती है । विवाह संस्था को खत्म करने की बजाय
उसमें सुधार की जरूरत है ताकि विवाह किसी पर जबरन ना थोपा जाये और
कुरीतियों से मुक्त हो साथ ही अगर गलत विवाह हो गया दुर्भाग्य से वापसी
का मार्ग रहे ताकि विवाह बनाये रखना यातना ना बन जाये । लङकियाँ भले ही
जागरूक हो रही है किंतु
जहाँ एक और अति धनाढ्य और स्वतंत्र रहने वाली कामांध महानगरीय युवा पीढ़ी
है जो "रेव पार्टीज" डिस्कोथेक और पब कल्चर स्ट्रिप डांस और कैबरेट में
उलझती जा रही है ।

तो दूसरी ओर कसबों गाँवों औऱ गरीब मजदूर किसान तथा आम मध्यमवर्गीय
नौकरीपेशा दुकानदार कारीगर परिवार है ।
जहाँ लङकियाँ ही नहीं लङकों पर भी समय का हिसाब देने औऱ घर के लिये
कामकाज करने पढ़ने कमाने की हाङतोङ जिम्मेदारी है ।
इसी समाज में निठल्ले निकम्मे लोग जो परजीवी है औऱ कुछ नहीं करते दूसरों
का कमाया छीनते चुराते माँगते औऱ चढ़ावों में लूटते रहते हैं ।
समाज का असली संतुलन तो मुश्किल से सम्मान बचाकर रोटी कपङा मकान की लङाई
में पिसता आम आदमी है । जो सङक पर भीख नहीं माँग सकता और घर की तंगहाली
में भी गरीब कहलाना पसंद नहीं करता । बिल अदा करते करते हर पहली ताऱीख को
पुनर्जन्म लेता है ।

परिवार औऱ विवाह की आदर्श गरिमा अगर बची है तब तो आज तक इसी निम्न
मध्यमवर्ग और गरीबी रेखा से जरा सा ऊपर बचे साधारण आम आदमी की वजह से ।
क्र्मशः जारी
©®सुधा राजे
SUDHA RAJE
bjnr-dta

कविता --"रागिनी के वर किसी का नाम हो कैसा रहे।"- sudha raje

रागिनी के वर
किसी का नाम हो
कैसा रहे
??????????
सिर्फ़ बीबी से हर इक
पहचान हो
कैसा रहे
????????
गाँव वाले जब कहें शीला के
शौहर सुन जरा
बाप मुन्नी के पुकारें ग्राम
हो
कैसा रहे
????????
पालपुरिया कह बुलाये सब
उसे ससुराल में
या कि
मेरठिया कहे आवाम
हो कैसा रहे
?????
जो तुम्हारा नाम
हो मानो कि हो ,,बलभद्र
ही
''हम बदल "भल्लू" करें अंज़ाम
हो कैसा रहे
?????
जात से पहले लिखो तुम
हो कुँवारे या नहीँ
ब्याह के दिन से
नया उनवान हो कैसा रहे
हाथ में हो चार चूङी मैं
विवाहित हूँ बजे
नाक में हो कील छल्ले पांव
हो कैसा रहे
??????
एक
तो माला पहिननी ही पङे
मंगल करे
और इक
बिंदी सता पति चाम
हो कैसा रहे
???????
चार व्रत निरजल करो हर
वर्ष हो जोङी अमर
दोपहर भोजन रसोई
धाम हो
कैसा रहे
?????
चार गाली बाप
दादा भाई
मामा को सुनो
बस
कि पत्नी ही तेरा भगवान
हो कैसा रहे
???????
हर जगह हो वल्दियत अब
माँओं के ही नाम पर
पत्नि सेवा ही धरम ईमान
हो कैसा रहे
??????
जब उठे सोकर नहाकर चाय
पानी पेश हो
जाये जब सोने
तो पेशे -ज़ाम
हो कैसा रहे
डर गये क्या बाउजी
प्रस्ताव सच ग़र हो गया
घर में कुछ भी हो
बुरा इल्ज़ाम हो कैसा रहे
जब
कहीँ निकलो तो सीटी मार
छेङे लङकियाँ
बेवा बूढ़ी भी करे बदनाम
हो कैसा रहे
जब कोई चाहे करे इज़हार
जबरन इश्क का
फेंक दे तेज़ाब कत्लेआम
हो कैसा रहे
अब सुधा सोचो कमाई
की जगह भी हम बङे
घर रहो निकलो न राहे
आम हो
कैसा रहे
??????
©®¶©®¶
Sudha Raje
511/2 peetambara aasheesh
fatehnagar
sherkot - 246747
Bijnor (U.P.)
9358874117
sudha.raje7@gmail.com

Saturday, 28 December 2013

"आप की झाङू" -प्रजानामचा by Sudha Raje

सफाईवाला ---सर कमरे दफतर में झाङू
लगा दें?
सर-----व्हाट!!!!!
खबरदार!!!!!!! आईन्दा कभी झाङू लिये
नजर आये ।
और ये कोने कोने हर रूम में इतने सारे
ब्रूम्स!!!!!!
हटाओ अभी हटाओ!!!
सर फिर दफतर को साफ कैसे करेंगे हम
लोग?
कपङे से करो काग़ज से करो पॉलिथिन से
करो या गंदा ही रहने दो हम सब
अपना अपना कूङा खुद ही बाहर डाल के
आयेंगे
मगर खबर दार जो कहीं किसी कमरे में
झाङू नजर आयी और ये नाम भी लिया ।
जी सर जी ।
समझ गया!!
क्या समझ गया??
यही कि आईन्दा कपङे से झाङू लगानी है
ईईईईई
फिर झाङू?
तततततो साब क्या बोलूँ?
कुछ भी बोल मगर ये जो कहा वह नहीं ।
जी सर जी
कल से आप जो कहेंगे वही होगा ।
आआआआआपपपपप??? जो कहेंगे मतलब??
सर जी आप मतलब आप!!
ओ मेरे चाचा!! मेरे दादा
आप जो कहेगे वह नहीं जो मैं
कहूँगा वही करना और आप आप
का तो नाम ही नहीं ।
जी सर जी
तुम जो कहोगे वही करेगे और वह
जो सफाई करने के काम आती है घास और
खजूर और नारियल वाली गट्ठरी वह
कहीं नही रखेगे
शाबास
जी सर जी
तुम कहो तो कल अपने आपके काम के लिये
कपङों की झाङुयें बना डालूँ?
ययययययाईईईईईऊऊ
गेटटटटटटट् आआआऊऊऊटट
जैसी आपकी मरजी
फिर मत कहना झाङू नहीं मारी!!! साब
:(:(:(:(
©®सुधा राजे

कविता: ग्रामवासिनी हम गँवार

सुधा राजे ।
**********
ग्रामवासिनी
हम गँवार देहातिन बाबू !! गाली है
शहर
खा गये सब कुछ
मेरे गाँव
की झोली खाली है
1-दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते फल खाते
माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के
रमदसिया मरने
वाली है
2-
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये आम आँवले बेर
तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है
3-
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख पिसी तिल
धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है
4-
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
जोरू बिटिया काली है
भैया
जी कें गये थे इक दिन शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है
6-धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर काट काट
कें चिक्कर गये
"अव्वल की यो
डिगरी "ऊँची "बिन रिश्वत बेमाली है
7-
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी
मिक्सर
कहाँ कुदाली है
8-
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है
9-
ले जाते मजदूर बनाकर
बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे किसान
की फूटी लोटा थाली
10-
कहाँ कौन सा देश और
सरकार हमें तो थाना है इज्जत जाये
कतल
हो चाहे पंचों की दल्लाली है 11- पाँच
साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है
12-
पटबारी को पैसे नई गये पैमाईश में
फँसा दियौ गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है
13-
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोरो
अबके कान की बाली है
14-
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे शहर पढ़ाबें
जी काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है
15-
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर तबीजें करते
रये
तीन छोकरी हो गयीं
तिस पे अब आया बंगाली है
16-
रोज रात कूँ हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोबे
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे खोटी, किस्मत
वाली है
17-
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है
18-
सुधा भात पे 'चीज'
चढैगी
भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें चिंता नींद
उङाली है
19-
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी
मेट की भेंट चढ़ाली है
20-
हस्पताल
की दवा डागधर
शहर बेचते चोरी से
दाई जनाबै बच्चा मर गयी बिंदू
की घरवाली है
21-
मच्छर, बाढ़, बुखार
चोर ,नट
ओझा पंडिते दर्रोगा
बची खुची बिगङी औलादें नाबालिग
धौँचाली है
22-
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला में
जो केबें परधान वो होबे शासन देश
सवाली है
23-
मिल वालों ने अब तक लौं पेमेन्ट
दिया नईँ बोबें क्या । क्ऱॉप लोन
की किश्त बिके टिरक्टर ट्राली हैं।
24-
पुरखों की ऊसर ज़मीन पर
कितनों को रुज़ग़ार मिले। दादालाई
टुकङे टुकङे बँट गयी हर ख़ुशहाली है 25-
हमसे घृणा करें रिश्ते भी नही बताते
देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा "सुधा "गाँव
में
ठाली है
®©¶¶©®
Sudha Raje
तत्कालीन पता
सुधा राजे
एड
511/2-पीतांबराआशीष
फतेहनगर
शेरकोट
जिला बिजनौर
उप्र
246747

गीत ::स्त्री हूँ सो जीवन एक प्रयास लिखूँगी

Sudha Raje
Sudha Raje
हाँ मैं तुम पर प्रेमगीत भी
लिखे जाऊँगी
लेकिन पहले जीवन का
इतिहास लिखूँगी
तुम ने जो उपकार किये
वो शिरोधार्य हैं
खारे जल में सीपी की
मैं प्यास लिखूँगी
दानवस्तु थी मिली मुझे
अधिकार कहाँ थे
पोषण के शोषण अपने
उपवास लिखूँगी
शरण और ये वरण
प्रेम आवरण मरण भी
प्यासे सावन पतझङ के
मधुमास लिखूँगी
पारिश्रमिक मुझे क्या
मिलता
गृहचालन का
तन मन धन जो किया
उसे वनवास लिखूँगी
शब्द प्रेम के डूबे मधुर
गीत लिख्खूँगी
अक्षर अक्षर पीङा भय
दुःख त्रास लिखूँगी
कुछ पल के आलिंगन वे
उद्दाम अँधेरे
फिर वो रूका विरह
का सत्यप्रकाश लिखूँगी
लिख्खूँगी जो तुमने
मेरी देह पे लिख्खा
वो जो मेरे मन पर
लिखा प्रवास लिखूँगी
लिख्खूँगी वह स्वेद
बहाया बाहर तुमने
अपने बहते रक्त
हृदय का त्रास लिखूँगी
मुझ पर किये भरोसे
आशायें जो टूटीं
मैं अपना वो खण्ड
खण्ड विश्वास लिखूँगी
सुधा वारूणी गरल तरल
अहि छल लोचन जल
दुखते तन मन घाव
हर्ष निःश्वाँस लिखूँगी
वो निवास रक्षा जो दी
वो भी लिख्खूँगी
छीनी जो उङान
मेरा आकाश लिखूँगी
तुमने जो वरदान और
संतान दिये सब
मैंने जो दी है दुआये
सन्यास लिखूँगी
हाँ तुम मेरे हुये मुझे
चाहा अपनाया
मुझमें से जो जो काटा
वो ह्रास लिखूँगी
हाँ मैं थी मोहित
अनंत सपनों पर अपने
साहचर्य ये पथरोह
पटवास लिखँगी
©®¶©®¶SUDHA Raje
?
Jan 21

Friday, 27 December 2013

प्रजानामचा

हर नगर के प्रवेश द्वार पर एक
बङा सा गेट कई लाख का खङा करने
का फैशन चल पङा है ।
जिस पर काली ग्रेनाईट पर सुनहरे
अक्षरों में वहाँ के तत्कालिक सांसद
विधायक चेयरमेन का नाम
लिखा रहता है ।
ये पूछना है उन सिरफिरों से
कि जिस सामंतवाद और राजतंत्र
को दारू पी पी कर कोसते हो!!!!!!!
ये बङे बङे निरुपयोगी द्वार
उन्ही की निशानी है जो हर नगर में
इंडिया गेट बनने लगे ।
पहले नगरकोट बनता था बूँदी और
दतिया जैसे कई नगर आठ दिशाओं में आठ
महाफाटक वाले दरवाजों से घिरे
परकोटे के भीतर नगर बसाकर
जनता को राजतंत्र में युद्ध और
पशुहिंसा से राहत दी जाती थी
युद्ध नगर से दूर खुली रणभूमि में लङे जाते
थे
अब हवाई यान बन गये
और
नगर परकोटों के भीतर नहीं
तब बिना दरवाजों वाली
इन बङी बङी करोङों की लागत से बनने
वाली सामंती निशानियों का उपयोग
क्या है??
इनकी बजाय रिक्शे वालों के लिये शेल्टर
हर चौराहे पर जनसुविधा टॉयलेट
हर स्टैंड स्टेशन स्टॉपेज पर
यात्री प्रतीक्षालय
बेघरों को रैनबसेरा
और पानी रौशनी खेल के बच्चापार्क
ज्यादा जरूरी हैं ।
ये बङे गेट करोङों की लागत से केवल उस
मानसिकता से बनाये जाते हैं
जिसका नाम आत्मप्रचार है ।
जनता के कीमती राजस्व और धन
की बरबादी करके खुद का नाम अमर
करने के लालच में बने गेट
क्या किसी उपयोग के हैं?????
आपके नगर में भी बन रहे है न???
कौन??? दारू पीकर साङी मिठाई
रुपियै
लेकर वोट देते लोग??? ये कैसे नकारेंगे???
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot 246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है

लेख :समलैंगिक जोङे बनाम परिवार और समाज की जिम्मेदारियाँ? कैसे उठायेंगे ये लोग और क्यों नहीं कर्त्तव्य जब चाहिये अधिकार तब कीजिये त्याग भी

Sudha Raje
कोई स्त्री इतना मेकअप गहने और शरीर
उछाल उछाल कर हर समय केवल सेक्स
टॉक करती समाज के बीच
बच्चों परिवार जनों बङो के बीच
नहीं रहती ।
ना ही हर वक्त पति पत्नी बेडरूम में
लिपटे पङे रहते हैं ।
जीवन में समाज की मरयादा है और
संतान मूक बधिर हो तब
भी पिता माता की सेवा बुढ़ापे में करते
देखी जाती है तनहा सिंगल लोग
भी नौकरी मजदूरी करके पेट पालते और
परिवार का बोझ उठाते है ।
स्त्री पुरुष विवाह की तरह गै विवाह
को परिवार नहीं माना जा सकता वह
सिर्फ यौनसंबंध का स्थायी पार्टनर है
क्योंकि वह पुरुष या स्त्री जोङा अपने
अपने माँ बाप परिवार और समाज
की जिम्मेदारी नहीं उठा रहा है ।
वह पूरा कुनबा केवल इसलिये छोङ
देता है कि उसको लगता है कि वह आम
लोगो की तरह दैहिक संबंध
नहीं बना सकता!!!!!!!
क्या सब नॉर्मल लोग हर दिन हर समय
केवल दैहिक रिश्ते की दम पर
ही परिवार में रहते है!!!!!!
अंधा गूँगा बहरा लँगङा बीमार और
पागल बच्चा भी परिवार पालता ही है
फिर
ये यौनविकृत लोग क्यों नहीं रह सकते
परिवार में????
लाखों स्त्रीपुरुष है
जिनकी शादी नहीं हो पाती ।
या साथी की मौत के बाद
पूरी जिंदगी परिवार के लिये विवाह
ही नहीं करते ।
ये कमरे के भीतर की बात है
कि लाखो जोङे साल साल भर तक
कभी एक साथ नहीं हो पाते
किसी किसी का साथी पाँच साल दस
साल तीन साल पर परदेश से आता है।
कोई बीमार है या दुर्घटना में दैहिक
ताकत खो चुका है परंतु लोग रहते है जोङे
में परिवार में ।
हर वक्त यौनसंबंध ही नहीं जीवन
को संचालित करते हैं ।
लोग बेशक सेक्स से जुङकर ही परिवार
शुरू करते है किंतु केवल सेक्स ही परिवार
की हर समय की वजह नहीं ।
क्या करते है लोग नौकरी पर जाते है
बच्चे पालते है ।समाज
सेवा कला साहित्य और
राजनीति वित्त और बच्चे वास्तु और
पर्यटन सब पर जीवन जहाँ जैसी जरूरत
हो खरच करते है ।
किंतु बहुत बनावटी और बहुत
ही दिखावा परक हर समय केवल
स्त्री न होने या पुरुष न होने की वजह
से मात्र बेड बेड बेड बर्राना
कहीं भी मानवता नहीं । समाज में
सबको जीने का हक है ।
चाहे वह नर हो किन्नर
हो नारी हो और चाहे दैहिक
विकृति प्राप्त विकलांग मनुष्य हो ।
किंतु समाज के नियम है ।
सार्वजनिक अश्लीलता फैलाना गुनाह है
अनैतिक है । और किसी बच्चे
को किसी दैहिक कमी के कारण माँ बाप
परिवार से छीनकर अनाथ कर
देना महापाप है ।
कोई बच्चा केवल इसलिये किसी किन्नर
या गे कम्युनिटी को पैदा होते
ही नहीं कदापि नहीं सौंपा जाना चाह
कि वह पुरुष या स्त्री नहीं है ।
वह परिवार में ही रहे ।
परिवार में रहकर पढ़े और हुनर सीखे
रोटी कपङा मकान कमाकर खुद खाने और
पिता माता आश्रितों तक को भी अपने
साथ हमेशा रखकर खिलाने सेवा करने
का ।
दुकान खोले या कारीगर बने ।
पच्चीस तीस साल तक पहले हाथ पैर
दिमाग का इस्तेमाल करे ।
यौनांग ठीक है या नहीं इनका नंबर
जॉब रोजगार और पढ़ाई लिखाई के बाद
का सवाल है ।
बालिग होने तक और जॉब कैरियर
रोजगार पा लेने तक हर बच्चे
को पिता माता परिवार संरक्षक के
ही देखरेख निगरानी प्यार
ममता छाया में रहने देना चाहिये ।
रहने का हक़ है ।
कौन सा इंसाफ है कि जैसे
ही पता चला बच्चा यौनांग विहीन
या विकृत है उसको त्याग देना????
या छीन ले जाना??? या चुराकर बच्चे
जबरन विकृत बनाना????
अरे!!!!! उसके हाथ पाँव आँखे
उंगलियाँ नाक कान गला आवाज और
दिमाग तो सही सलामत है न!!!!!
वह क्यों नहीं कमा खा सकता????
जब बालिग हो जाये तो अगर वह महसूस
करता है कि वह किसी पुरुष पुरुष
या स्त्री स्त्री जोङे में ही सुखी रह
सकता है तो वह ऐसा करे या न करे ये
सवाल बहुत बाद का है ।
पहले सवाल है कि क्या मेडिकल साईंस में
कोई इलाज संभव है??
अगर है तो परिवार सरकार इलाज
मुहैया कराये ।
अगर लाईलाज विकृति विकलांगता है
तो भी लाखों मूक बधिर विकलांग
परिवारियों की तरह वह
व्यक्ति भी परिवार के साथ ही रहे ।
किंतु जैसा कि विवाह सबका होता है
माई बाप के सामने आँगन में खाट डालकर
कोई औलाद नहीं पङा रहता ।
इन सब लोगों को भी परिवार
की मर्यादा तो रखनी ही होगी ।
और समाज
की भी मर्यादा रखनी ही होगी ।
प्रेम अगर कोई शै है
तो किसी को भी किसी से हो सकता है

एक दोस्त पर बहिन भाई धर्म भाई
बहिन बेटे बेटी तक पर लोग जान
लुटा देते हैं ।
विकृतांगी भी प्रेम कर सकते है किंतु जैसे
कि विवाह का मूल कांसेप्ट परिवार
की नयी यूनिट का गठन है ।
ऐसे लोगों के जोङे बनाने
की प्रक्रिया में क्या मूल बात
होगी?????
परिवार बढ़ाना नही संभव है । और ऐसे
जोङे
का बच्चो बेटियों स्त्रियों की तरह
संयमित मर्यादित घर की बहू ससुराल
जाती हुयी विदाई कराके अपने
पति ""के घर ससुर सास जेठ देवर ननद के
रसोई और सेवा में पकाती खिलाती घर
सँभालती रहना संभव है????
अगर है पति के जो कि एक जोङा ऐसे
लोगो का अभिनय करता है एक पति एक
पत्नी बन जाता है ।
तब पति के कपङे धोने से बिस्तर सजाने
भर से तो परिवार नहीं बनेगा ।
पति के पिता माता की सेवा कौन
करेगा???
पति की बहिन
को बुलाना विदा करना कौन करेगा ।
पति के भाई
भाभी की हारी बीमारी ब्याह
बारात भात की रसोई कौन तपेगा???
पानी रोटी गोबर
सानी कूङा खेती कूचा बरतन
लीपना पोतना गहाना फटकना पीसना
करेगा ।
सब शहर शहर है क्या???
गाँव के किसी किसान का बेटा मजदूर
का बेटा अगर विकृत यौनांग
हो पैदा तो क्या करें???
सङक पर फेंक दें?? या सौंप दें किसी गै
किन्नर कम्युनिटी को??
जैसा कि कई केस सुनने में आये
कि बच्चा अगर नॉर्मल
नहीं तो किसी जमाने में लोग अनाथालय
में छोङ आते थे या किन्नर समूह बधाई के
समय ही लङ झगङ कर छीन ले जाते थे!!!
अब ऐसा कुछ तो सुनने में नहीं आता है
किंतु यदा कदा ही सही ।
कुछ अपराध इस तरह के सुनने को मिल
जाते हैं कि साथ साथ नाचने गाने बजाने
वाले किसी स्वस्थ युवक को जबरन
या धोखे से नपुंसक बनाकर किन्नर
बनाया गया ।
अगर ये एक भी अफवाह सच है तो ये
भयानक जुर्म है । जो केवल उन
लोगो द्वारा किया जाता है
जिनकी किसी विकृति के लिये आम
परिवार दोषी नहीं है।
हजारो स्त्रियाँ तथाकथित
अति आधुनिकता की दौङ में । विवाह
ना कर पाने
की मजबूरी या अपनी आजादी ना खत्म
हो जाये इस खयाल से अगर सही सलामत
होते हुये भी स्त्री स्त्री दैहिक संबंध
की तरफ मुङती है तो ये एक विकृति है
विचलन है ।
दो लङकियाँ पक्की सहेली है ।
और पढ़ने या जॉब करने को लेकर साथ
रहती है उनकी मित्रता को कल से इस
कदर लेस्बियन समझा जाने लगेगा ।
और तब माता पिता पर एक और तलवार
लटकती रहेगी कि लङकी लङकी कहीं आप
में इस तरह की कोई दैहिक विकृति से न
ग्रस्त होकर भटकने लगे ।
बिलकुल इसी तरह लङके
को लङकों की ही संगत से
बचाना नया संकट होगा ।
सारे के सारे समलैंगिक लोग यौनवुकृतांग
हीनांग या कमजोर नहीं होते । अनेक
लोग स्वस्थ होते हुये । केवल
संगति कुसंगति के कारण अपनी आदते
ऐसी कर लेते हैं ।
उत्सुकता भ्रांति और अनगढ़ कल्पनायें
विचार ये गलतियाँ करवाते चले जाते है

कल ही एक स्त्री के पति ने
उसको पहली ही रात भीषण रेप के साथ
कुकर्म का शिकार भी बनाया और जब
पीङिता ने हनीमून छोङकर पुलिस
की शरण ली तो फरार हो गया!!!!!!!!
ये प्रेम नहीं है
ये विवाह भी नहीं है
ये परिवार का गठन का आदर्श रूप
भी नहीं है ।
ये पश्चिमी ब्रह्मचर्यवाद के खिलाफ
एक अभियान के रूप में
फैलायी गयी सामाजिक विकृति है।
जहाँ स्त्री उपलब्ध नहीं वहाँ नॉर्मल
लोग तक
बङी संख्या में नौकर जूनियर और
बच्चों पशुओं
तक का विपरीत कुकर्म करते हुये
अपराधी पाये जाते रहे है।
वे लोग जिनके बच्चे हैं पत्नी है और उनमें
कोई पौरूषीय कमी नहीं नहीं है ।
वे तक इस विकृति के प्रभाव में
दोस्तो और मातहतों का दैहिक पुरुष
पुरुष बलात्कार करते पकङे गये ।
अनेक स्त्रियों पर नॉर्मल होते हुये उनके
पतियों तक ने दैहिक कुकर्म किये और ऐसे
मामले परिवार की सीमा में कैद ही रह
जाते हैं।
व्यापक मूवमेंट के नाम पर जिस
समलैंगिकता की दलील दी जा रही है
वह ।
कितनी खतरनाक है सोचने के लिये केवल
चिकित्सक की ही सलाह आँखे खोल
सकती है ।
भोजन ग्रहण करने और अपशिष्ट पदार्थ
विषैले तत्व आदि जिस्म से बाहर फेंकने
वाले अंग किसी भी व्यक्ति के स्वयं के
लिये सुख दायी कतई नहीं हो सकते ।
ऐसे संबंध एक के लिये यातना और दूसरे
को बरबरता के ही रूप में परिभाषित
किये जा सकते हैं ।
इनका अप्राकृतिक कहना सही है ।
क्योंकि प्रकृति ने अगर नेत्रहीन बधिर
मूक किया है किसी को तो वह
चिकित्सा करवाकर देखने सुनने लायक
बनाया जाये यही उपाय है ।
किंतु समाज भर को वह प्रतिशोध में
अंधा बनाये ये कतई प्राकृतिक नहीं है ।
एक विकृतांग व्यक्ति
किसी ऐसे पुरुष के लिये सिवा कुसंगत के
कुछ भी नहीं जो नॉर्मल है बच्चे
पत्नी परिवार पाल सकने में सक्षम है ।
लोग अपने यौनांगो से नहीं कमाते
हाथ पैर दिमाग से आँख आवाज कान से
कमाते है ।
विकृतांग लोग भी सब कुछ बन सकते है जैसे
नेत्रहीन लोगो ने ब्रेल सीखकर महारत
के काम कर डाले!!!!!
महान संगीत कार हुये और
बेथोवेन जैसे बधिर व्यक्ति उदाहरण है ।
कला संगीत साहित्य लेखन अभिनय
व्यापार शिक्षा विज्ञान
राजनीति दर्शन की तमाम
महाविभूतियाँ है जो आजीवन
अविवाहित रहीं और समाज को राह
दिखाती रहीं ।
यह कहाँ की सोच है कि विकृतांग
व्यक्ति महान व्यापारी कलाकार
डॉक्टर इंजीनियर आदि नहीं बन
सकता???
बेशक सबको प्रायवेसी का हक है ।
सुना आपने प्रायवेसी का ।
समाज में हर तरह के लोग हैं । जीओ और
जीने दो ।
चाहे जोङा समलैंगिक हो या नॉर्मल
पारंपरिक विपरीत लिंगी
समाज की मर्यादा संस्कृति और समाज के
कानून कायम रहने ही चाहिये ।
नग्नता अश्लीलता औऱ
विद्रूपता को बच्चों स्त्रियों और आम
समाज से पृथक करना ही पङेगा ।
केवल वयस्कों के लिये ही जो बातें हैं वे
केवल बंद कमरों बंद संस्थानों में
ही होनी चाहिये । जहाँ बच्चे ना हो ।
जहाँ रिश्तों की सीमा का उल्लंघन
ना होना हो
पति पत्नी के बीच की बाते
पिता पुत्री माता पुत्र या भाई बहिन
के सामने नहीं आनी चाहिये ।
नियम तो बनाने ही होंगे
जब पुराने नियम टूटेगे
तो नये बनाने होगे
जो अपराधी है वे उत्पीङक है ।
जो निर्दोष हैं उनको भी सामाजिक
मर्यादा की सीमा पर ही कायम
रहना होगा ।
नाबालिग बच्चे परिवार से माँ बाप से
अलग नहीं होने चाहिये
किसी को जबरन किन्नर
नहीं बनाया जाना चाहिये भले ही वह
विकृतांग है परंतु वह डॉक्टर
क्यों नहीं बन सकता?
सवाल और भी हैं
सेहत और सामाजिक लाज शरम को कायम
रखना
व्यवस्था की बात है
तंबाकू जहर है
तो और भी सेहत को हानिकारक चीजें हैं

संसद नियम बनाये किंतु बच्चे और पुरुष
लङकों की दैहिक शोषण की अपराधिक
वेश्यावृत्तिक प्रवृत्ति पर भी सख्ती से
रोकथाम करे
सहमति से ड्रग्स लेना जायज
नहीं हो जाता
ना ही रिश्वत लेना
लोगों की रोजी रोजी तो चोरी भी है
और सुपारी लेकर हत्याये
करना भी जेबकतरी है आतंकवाद भी है
और बच्चे
चुराना बेचना भी©®सुधा राजे
Dec 12
से नहीं चलता ।।।।लोग
पसंद तो रेप और यौन शोषण भी करते है।
लोग पसंद तो शिशु हत्या भी करते है।।
लोग पसंद तो बालिका वेश्या भी करते
है।।।सैकङो राक्षस अपनी बेटी को रेप
करना भी पसंद करते हैं।।।।समाज पसंद
से नहीं कर्त्तव्य बलिदान त्याग कष्ट
सहकर मर्यादा निभाने वालों के दम पर
चलता है।।जो समाज को कुछ दे नहीं सकते
वे समाज पर बोझ है ।।।
उनको उनकी माननी पङेगी जो समाज
को कंधों पर उठाते है ।।समाज
यौनस्वछंदता वादियों की पसंद पर
नहीं छोङा जा सकता ।।।ये मानसिक
रोग है शरीर तो और भी विकलांगतायें
रखता है

कोई बीबी छोङकर भाभी पसंद करे और
पति छोङकर जेठ देवर तो पाप है ।।।।
वैसे ही ।।।नॉर्मल होकर भी ।।।
विकृतियाँ रखना गुनाह है।।।भले
ही लोग लाखों में अपराधी है परंतु
अपराध ।।मान्य नहीं हो सकता ।।।

सारे भिखारी चोर किन्नर चूहे और
शरणागत किसकी दम पर?????? कौन
उठाता है इनके खरचे???? गृहस्थ!!!!!
परिवार!!!!! तो फिर परिवार
को हानि पहुँचाने वाली सब चीजें नियम
से सीमित की जानी ही चाहिये ।।।।
जो लोग परजीवी है वे
कभी चयनकर्त्ता नहीं हो सकते ।।।।आगे
बढ़ो मजदूरी करो बहुत नाच लिया और
भीख माँग ली
Dec 12

Thursday, 26 December 2013

एक प्रतिज्ञा।

एक प्रतिज्ञा की थी एक दिन कि सत्य
के साथ ही चलना है और सत्य की ही जय
कहनी है । किंतु इतना आसान
नहीं था सत्य के साथ ज़ी पाना पहले
ही पङाव पर अनेक चेहरे बेनक़ाब हो गये
जो मेरे अपने थे जिनपर अथाह विश्वास
था और मन
थरथरा गया कि अपनों को त्यागूँ
या सत्य को ऐसा सत्य मेरे किस काम
का? अपने सौगंध उठाकर
अपनों की लोकप्रिय मिथ्या बोलने लगे
और मुझे अकेले ही तय करना पङा आगे
का मार्ग ।
सोचा अब सत्य का साथ छोङने से
क्या लाभ जब सब साथ छोङ गये ।
किंतु तब वे लोग साथ हो लिये जो उन
अपनों के पराभव पर प्रसन्न थे और मुझे
गर्व होने लगा सत्यपथ यात्री होने पर
सत्य की जय जय कार गूँजी कई बार और
शांत हो गयी । यह षडयंत्र भी उधङ
गया और ज्ञात हो गया कि लोग मेरे
पीछे इसीलिये खङे थे
कि अपनों को खोकर अपनी विरासत जङें
और अनुवांशिक पहचान खोकर मैंने
अर्जित की थी एक पहचान क्रूर सत्यपथ
की मूर्ख यात्री और उपहास के
व्यवहारिक उपनामों के बाद भी एक
अटूट सम्मान । कोई तत्काल मान
लेता अगर वही बात मेरे
द्वारा कही गयी ये जान लेता ।
हुज़ूम एकाएक ग़ायब हो गया जब
घोषणा की मैंने सत्य के लिये एक एक
की परीक्षा लिटमस पत्र पर लेने की ।
अम्ल ऐर क्षार घोषित होने से डर गये
लोग और ।
अगले कई पङाव मुझे फिर अकेले ही तय
करने पङे ।
लोग और अपने सब जानते थे मुझे बहुत
गहरेमन में मानते भी थे कि मृत्यु की तरह
सुंदर और जीवन की तरह वीभत्स सत्य
ही मेरे सृजन हैं किंतु कोई
कभी भी किसी मंच से कभी नहीं ले
सका मेरा नाम ।
लोग एकांत में आते अपनी जरूरत के
मुताबिक मेरे सृजन में से
प्रेरणा की टहनियाँ काटकर ले जाते और
लगा लेते अपने अपने ग़ुलदस्ते में । सत्य
की क़लम पर उगे मिथ्या के फूल भी सुंदर
होते कि सत्य की खुशबू आती ।
वह सत्य नहीं था बस सत्य के कलम पर
लगाया झूठ का कलेवर था ।
लोग उसे ही सत्य समझते रहे औऱ भीङ
झूमती रही कालबेलिया के नृत्य पर ।
लोग धन वर्षा कर सत्य की जय कहते रहे
किंतु जिसे वे सत्य कह रहे थे वह सत्य
नहीं था वह केवल कपट था ।
कपट छल और कतरनों से जोङकर
बनाया षडयंत्र था क्योंकि सुंदर और
लाभकारी मिथ्या होते हुये भी
संस्कारवश लोग कभी नहीं कहते रहे
कि ""झूठ की जय""
सत्य अकेला निर्मम क्रूर और अकिंचन
ही घोर विजन में बेतरतीब
बढ़ता फलता फूलता जहाँ थे विषदंतक के
मगन महारास जिनकी धुन पर नाचते रहे
कालबेलिये और लोग कभी नहीं जानपाये
कि सत्य फणिक का नृत्य होता कैसा है ।
सत्य को केवल मृत्यु और सृजन ने
पहचाना और दोनों को एकांतवास
मिला ।
सृजन और मृत्यु के बाद उत्सव मनाते लोग
सत्य की जय कहते झूठ की धुनों पर नाचते
रहे ।
मुझे पता चल गया था कि मेरे सृजन
कभी झूठ के मंच पर स्वीकार नहीं किये
जायेंगे और ना ही कभी स्वीकार करेगे
कलम काट कर ले जाने वाले कालबेलिये
कि उनके गुलदस्तों में सत्य के चुराये सृजन
की उर्वरा है ।
क्योंकि झूठ के पांव और जङ नींव और
आधार नहीं होते ।
झूठ जब भी नाचता सत्य की जमीन पर
जङों पर आधार पर ही नाचता ।
अब मेरे अपने ही चेहरे पर थीं खराशें ।
मेरे अपने ही पाँवों थे छाले और मुझे
कभी स्वीकार नहीं कर
पाना था अपनी ही हाथों मार
दिया गया अपने में उगता झूठ. औऱ य़े
हत्या बोध कभी गर्व नहीं करने दे
सका कि किंचिंत आकार ही सही झूठ
का एक मुकुलन मुझमें से भी हुआ ..मृत्यु
की तरह सुंदर और जीवन की तरह
वीभत्स वह आत्मस्वीकृति कभी नहीं बन
सकी सृजन और मेरी छह उंगलियों में से एक
उंगली काटनी पङी मुझे झूठ
की उंगली जिसे काटने पर सबसे अधिक
पीङा सहनी पङी ।
जितनी पीङा कभी पंख और पांव काटने
पर भी नहीं हुयी तब क्योंकि सत्य
मेरा सर्वांग था और जो काटा वह सत्य
ही था सत्य की वेदना ग्राह्य मोहक
और क्रूर सह्य रही सदा।
स्वयं पर मुकुलित स्व स्वरूप सुंदर
मिथ्या को काटने की यातना के बाद मैं
नितांत एकांत में हूँ अब कोई नहीं ।
और अब सत्य मुखर नहीं समाधिस्थ है
कोयले की खान से हीरे सदियों बाद
निकाले जाते है ज्वालामुखी के तापमान
पर पिघल कर वज्र होते रहने
की पीङा अब जिस सृजन की ओर है
उसकी कोई काट कलम और खुशबू
नहीं होती केवल कौंध होती है चाहे
कभी सामने आये या दबा रहे अतल के काले
संसार में सात रंग की धूप से मिलने
की चाहत में ।
©®सुधा राज

Wednesday, 25 December 2013

गीत

आधी दुनियाँ के रंगों की तसवीर
बदलनी ही होगी ।
औरत ज़िल्लत है ज़ुल्मो सितम तक़दीर
बदलनी ही होगी ।
उनवान बदलने ही होंगे जो जो कमतर
दिखलाते है
सामान बदलना ही होगा जंज़ीर
पिघलनी ही होगी ।
हर सहर खुली साँसें हर शब
मुट्ठी भर हँसी ख़ुशी हर घर ।
बाँहों भर अपना पन ज़ी भर ।तदबीर
बदलनी ही होगी ।
क्यों कहे सुधा बदक़िस्मत हूँ
औरत हूँ तो क्या ज़िंन्दा शै हूँ
क्यों हमें बनाया क़ुदरत ने
ये पीर बदलनी ही होगी
©®सुधा राजे

गीत

संसार है माया है भ्रम है लिख लिख के
बताया ना समझे ।
हम जान के भी अनजान बने
कितना समझाया ना समझे ।
जीवन है खिलौना साँसों का ।
साँसों की है डोरी और कहीं
चाभी से चलाता और कोई ।
यूँ नाच नचाया ना समझे ।
©® सुधा राज

कविता

आधी दुनियाँ के रंगों की तसवीर
बदलनी ही होगी ।
औरत ज़िल्लत है ज़ुल्मो सितम तक़दीर
बदलनी ही होगी ।
उनवान बदलने ही होंगे जो जो कमतर
दिखलाते है
सामान बदलना ही होगा जंज़ीर
पिघलनी ही होगी ।
हर सहर खुली साँसें हर शब
मुट्ठी भर हँसी ख़ुशी हर घर ।
बाँहों भर अपना पन ज़ी भर ।तदबीर
बदलनी ही होगी ।
क्यों कहे सुधा बदक़िस्मत हूँ
औरत हूँ तो क्या ज़िंन्दा शै हूँ
क्यों हमें बनाया क़ुदरत ने
ये पीर बदलनी ही होगी
©®सुधा राज

स्त्री और समाज

दामाद के पाँव छूने और देवर और
छोटी ननद के भी पाँव छूने
की परंपरा ग़लत है ।
मामा द्वारा भांजों के पैर छूने
की परंपरा भी ग़लत है
कई प्रांतों में ये परंपरा है ।
कारण???
क्या आप अपने पिता दादा नाना और
माता नानी दादी से अपने पाँव छुआकर
उनको
आशीर्वीद
देंगे कि
जाओ खुश रहो?????
संगिनी अगर शरीर का आधा हिस्सा है
और
ससुर सास को पिता माता कहती है
तब जामाता या जँवाई या दामाद
केवल पुत्र ही है
बहू पुत्री है
father in law
mother in law
जो धर्म से पिता धर्म से माता हैं ।
इसी दुष्ट कुप्रथा में दबे है स्त्री के
अपमान के बीज
यानि बेटी पैदा करने पर एक
दंपत्ति को ।
एक तिगुनी छोटी आयु तक के युवक के पाँव
हर मुलाकात पर छूने पङेंगे?
जवान युवक के जूतों की धूल माथे पर
रगङनी पङेगी???
क्या आशीर्वाद देगा जामाता????
जाओ
धर्मपिता माता
डरो मत
आपकी पुत्री को दुख नहीं दूँगा???
स्त्री के ससुराल के सब
सुखो की गारंटी है कि सब लङकी वाले
लङकी के वर के पैरो पर नाक रगङते
रहें???
पूरे विश्व की किसी संस्कृति में
ऐसी अपमान जनक कुप्रथा नहीं है ।
मुसलिम वर निकाह के बाद सब
बङों को सलामी देता है और दुआयें लेता है
ईसाई वर भी सब बङो को समान रूप से
प्रणाम करके आशीर्वीद लेता है ।
राजस्थान पश्चिमी पूर्वी उत्तरप्रदेश
और सारे भारत में यही परंपरा है कि
जो भी आयु और रिश्ते में बङा है
वही आशीर्वाद देने का अधिकारी है ।
विवाह के बाद
लङकी का संगी आधा अंग होने से
आधा पुत्र तो सास ससुर
का भी हो जाता है
यही शास्त्रोचित भी है ।
जो जो युवक पढ़े लिखे होकर
भी अपनी सासमाता ससुरपिता ।
संगिनी के बङे भाई बङी बहिन
बङी भाभी मामा मामी चाचा चाची फू
मौसा मौसी दादा दादी नाना नानी
ताऊ ।
और
बङे पङौसियों तक
से पाँव छुआकर खुश होते है
वे गुजरात
बिहार
राजस्थान
दक्षिण भारत
महाराष्ट्र
पंजाब
हरियीणा
पश्चिमी उत्तर प्रदेश
पूर्वी उत्तरप्रदेश
झारखंड
और बंगाल
तक आ जा कर देखें पता करें
कि
विवाह के बाद स्त्री पुरुष
को
एक व्यक्ति ही माना गया है
यह
लैंगिक हिंसा का एक क्रूर रिवाज़ है
जहाँ जँवाई पुत्र नहीं ""दशवाँ ग्रह""
मान कर सब जँवाई के पाँव पूजते रहते है
अशिक्षित तो खैर बेबस हैं कि शिक्षित
लोग????
गलत तो गलत है न??
साठ साल की बूढ़ी माँ पच्चीस साल के
नौजवान के पाँवों में झुकती है तब
क्या युवक को नहीं महसूस होनी चाहिये
कि ये मेरी माँ है मैं इसे
माँ कहता भी तो हूँ!!!!
तब
नब्बे साल के बाबा पैरों में झुकते है
जिनको बब्बा कहता भी है परंतु शरम
नहीं आती कि मेरा कर्त्तव्य तो इन
बुजुर्गों के चरण दबाना आशीष
लेना है???
यानि ससुराल में जामाता को आशीष
नहीं मिलता बल्कि सब पूजते हैं कि पाँव
पङे है जँवाई ग्रह कभी बिटिया को दुख
मत देना ।बंद कीजिये जरा भी ज़मीर है
तो तत्काल बंद कीजिय

Tuesday, 24 December 2013

स्त्री और समाज

क्यों नहीं दलित एक्ट की तरह ।
जैसे
जाति सूचक गाली और व्यंग्य करने पर
सब दलित तिलमिलाते हैं और
विधि के तहत अब ये अपराध है दंडनीय ।
उसी तरह
स्त्री सूचक गालियाँ
स्त्री पर चरित्रहीनता वेश्या होने
और कुलटा छिनाल और डायन चुङैल होने
और तमाम यौनांगो को संबोधित
अपशब्द गालियाँ
संगीन ज़ुर्म
घोषित कर दी जानी चाहिये???
आई पी सी के प्रावधान में
गाली देना दंडनीय अपराध तो है
किंतु आज तक
कोई ऐसा मामला
सामने नहीं आया
जब
किसी परिजन या लेखक पत्रकार
मीडिया मेकर और किसी पब्लिक
स्पीकर को सार्वजिन तौर पर
स्त्री सूचक गाली
स्त्री सूचक अश्लील मुहावरा कहने बकने
पर
दंड दिया गया हो
चाह् वह केवल
एक सप्ताह का ही दंड हो
किंतु
जो लङकी को बदचलन वेश्या डायन
छिनाल हरामजादी रंडी जैसे
माँ बहिन बेटी और धंधेबाज और जनानी
आदि
के लिये अपमान करने की दृष्टि से लुगाई
रांड और कुलटा
आदि
इत्यादि शब्दों का इस्तेमाल करता है
दंडित
किया जाकर सार्वजनिक
माफीनामा भी मँगवाया जाये लिखित
ताकि
समूची स्त्री कौम को अपने मात्र
स्त्री होने पर लांछित निंदित और
लज्जित शर्मिन्दा और अपमानित होकर
कमतरी का बोध ना हो ।
क्योंकि
जब दलित की जाति के लिये केवल कानून
बन सकता है तब स्त्री के सम्मान के लिये
क्यों नहीं?
और यकीन माने आधी आबादी पर ये
गालियाँ कीलों की तरह बरसतीं है ।
जब कोई कहता है "'जनाना है साला "
तब
पहले तो स्त्री होना निंदनीय घोषित
करता है ।
फिर घोषित करता है उस
व्यक्ति की बहन को अपनी भोग्या
ये वीभत्स है
और इसी तरह वीभत्स है
सुसरा कहना
तब
व्यक्ति की बेटी को अपनी भोग्या घोष
करता है ।
ये सभ्यता नहीं है कि
किसी का वश नहीं लिंग चयन करना
वरना
शायद ही कोई
स्त्री बनकर भारत और एशिया में जनम
लेना चाहता ।
जहाँ केवल स्त्री होना ही गाली है?
प्रचलन बदलता ही तब है ।।।गाँव में
हो या शहर में औरतें हों या पुरुष
गाली केवल और केवल
स्त्री को ही पङती है चाहे औरतें
गा गा कर ही क्यों ना दे रही हो चाहे
आदमी मज़ाक में ही क्यों ना दे
रहा हो ।।।किंतु ये सारा पाखंड
तो केवल स्त्री को ही अपमानित
करता है ।।स्त्री भी उसी सामाजिक
परंपरा का अंग बनकर वही सब
करती चली जाती है बहू बेटी और
विपक्षी को गाली देना किंतु
कहीं भी पुरुष को गाली देने के लिये उसके
पास भी पर्याप्त मैटर नही
पुरुष को सबसे बङी गाली है
""स्त्री "होना ।।हम यहाँ केवल उस
ऱूढ़ि बात कर रहे है ।।आई पी सी के तहत
जब मारपीट और शांति भंग के चालान
काटे जाते है तो सब वकील और मुहररिर
ये भी लिख देते है
कि गंदी गंदी गालियाँ दी और काग़ज पर
अकसर वह गाली बयान और एफ आई आर में
साफ साफ लिखी भी जाती है ।।।।।
सवाल है कि झगङा नहीं हुआ ।मारपीट
भी नहीं ।।और एक दोस्त दूसरे दोस्त
को एक पङौसी एक सफाई वाले और
फेरी वाले को गाली दे रहा है ये
उनका आपसी मामला है कह
दिया जाता नगर की उन ।
स्त्रियों का क्या???
जो सुनती हुयी निकल गयी???? वे तो कह
नहीं सकती कि मुझे बङी शर्म और अपमान
लगा?? क्योंकि गाली तो एक दोस्त दूसरे
दोस्त की माता बहिन बेटी को दे
रहा था और सुनने वाले
को बुरा नहीं लगा??
औरतें परमपरा में ब्रैनवॉश्ड होकर
वही सब कर रही है पुरुषवाद के
रक्तपायी सेकेन्डरी ऐजेन्ट की तरह
जो मर्दवादी व्यवस्था का ही दमन चक्र

जब स्त्रियाँ देवरानी जेठानी और
पङौसन को अथवा गाली गा गा कर
विवाह में समधी और लङकी वाले
लङका वाले और जीजा देवर ननदोई
आदि को देती है तब भी ।।
कटना तो तरबूज ही है ।।।चाहे चाकू
स्त्री की ज़ुबान से चले या पुरुष
की जुबान से ।।।।आज दलित एक्ट सब
स्त्रियों और पुरुषो पप लागू है ।।।।तब
एक स्त्री अगर किसी दूसरी स्त्री पर
आरोप लगाती है कि वह अमुक अमुक अमुक
है तो क्या उस
स्त्री को अच्छा लगता होगा??
अभी विगत सप्ताह से एक आत्महत्या के
मामले में बहुत सारी मीडिया और तमाम
लेखक पत्रकार और सोशल मीडिया पर
सक्रिय लोगों ने ।।उस पूर्वोत्तर
की जनजातीय लङकी को हर तरह से
कुलटा और चरित्रहीन वगैरह सब अपशब्द
कहे ।।।ये सब वह लङकी और उसके अपने
भी पढ़ सुन देख रहे होगे????? क्या उन सब
चरित्रवान स्त्री पुरुषों ने उस
लङकी का मेडिकल चैकअप करवा लिया???
क्या उन सब चरित्रवान फतवादाताओं ने
ज़ाँच करवा ली कि वह लङकी कितने और
पुरुषों से संबंध रख चुकी है????? होते कौन
है ये लोग??
किसी लङकी को चरित्रप्रमाण पत्र देने
वाले??? क्या लॉण्ड्री खोल रखी है उन
स्त्री पुरुषों ने जो सबकी चादर के दाग़
धो धोकर पता करते रहते है
कि किसका चाल चलन कैसा है?
स्त्री जब स्त्री को गाली देती है तब
वह कुछ बिगाङ नहीं सकती दरअसल वह
किसी ज्ञात अज्ञात पुरुष को ही उस
स्त्री को सौंप रही होती है ये घृणित
विचार धारा है विशेष कर पढ़े लिखों के
बीच
जब नागर पढ़े लिखे लोग गाली देने पर
दंडित होने ये याद रहे कि हम उसे
प्रतीकात्मक दंड कहते है जो सप्ताह भर
की जेल हो सकता है और आर्थिक
जुरमाना स्त्री निकेतन के लिये
चंदा वगैरह ।।।किंतु तब से एक जाम
स्पीड ब्रेकर तो लगेगा न???
जब नागर पढ़े लिखे लोग गाली देने पर
दंडित होने ये याद रहे कि हम उसे
प्रतीकात्मक दंड कहते है जो सप्ताह भर
की जेल हो सकता है और आर्थिक
जुरमाना स्त्री निकेतन के लिये
चंदा वगैरह ।।।किंतु तब से एक जाम
स्पीड ब्रेकर तो लगेगा न???
जब धङाधङ लोगो पर सोशल
मीडिया अखबार या टीवी बस ट्रेन
सिनेमा घर बाजार सङक कविमंच और
संचार सूचना के हर साधन पर
"""स्त्री सूचक ""अपशब्द व्यंग्य
मुहावरा गाली और दैहिक अश्लील आरोप
पर दंडित होने लगेंगे तब ।।।।
वही होगा जो आज ।।कोई मंच से
पब्लिकली कहीं किसी दलित
को जाति सूचक अपशब्द नहीं कह
सकता ।।।।।जब एक दलित दूसरे दलित
को कहता है तू रहेगा ## # का ## # ही
तब कोई बुरा महसूस नहीं करता ये भी है
किंतु ये तब अपमानित करता लगता जब
अन्य जाति का कोई कहता है
एक कार वाला युवक एक सँकरे पुल से गुजर
रहा था वहीं तीन मवाली टाईप लङके
गुटखा चबाते निकले बाईक पर
बिना हैलमेट के हूटर वाली सायरन के
साथ तेज रफतार से परंतु जगह कम
थी कार मँहगी युवक साईड नहीं दे
पाया क्योंकि पुल पर दोनों ओर रैलिंग
तक नहीं । बस आव देखा न ताव
तीनों मवाली कार वाले युवक को चीख
चीख कर धुआँधार गालियाँ बकने लगे । और
गालियाँ सुनकर सहम
गया पढ़ा लिखा युवक भाई जी भाई
कहता माफी माँगता गया ।
तीनो हिंसक तरीके से कार वाले युवक
की बहिन
माता भावी पुत्री दादी नानी तक
का वाचिक बलात्कार वहीं सङक पर सरे
आम करते रहे और कोई कुछ नहीं बोला और
वे तीनों जब जब स्त्रियाँ गुजरतीं देखते
गालियाँ और बढ़
जाती घिनौनी होती जाती ।
वहीं करीब पुलिस गुजर गयी और लङके चले
गये ।ऐसे कितने ही अपमान
पीती रहतीं है भारतीय और एशियाई
स्त्रियाँ ।इस अपमान करते रहने
की परंपरा का पुलिस वाले और
मवाली समान रूप से निर्वाह करते हैं ।
अपराधी है या नहीं बाद की बात है
किंतु एफ आई आर पर चालान करने वाले
रिपोर्ट में मुलजिम
की गालियाँ भी लिखते है और मुलजिम
की माता बहिन बेटी खानदान भर
की स्त्रियों की वाचिक शाबिदक
सांकेतिक चरित्रहरण बलात्कार भी करते
हैं ।क्या मुलजिम की माँ बेटी बहिन
स्त्रियाँ अपराधी थी,????और
क्या मुलजिम के लिये ये प्रबंध है
कि सजा विधि तो जो हो दे मुजरिम
होने पर परंतु जो गालियाँ बेटी बहिन
माता को दी गयीं उनका दंड मिले
गरियाने वाले को??कैसा कानून??ये
सामाजिक प्रैक्टिस है और
बदलनी ही चाहिये ।जैसे दलित एक्ट
बदला
बिलकुल अपराध तो अपराध है एक
स्त्री चोरी करेगी कतल करेगी किडनैप
करेगी तो सजा पायेगी कि नही???????
तो जब वह गालियाँ दे तो दंडित
क्यों ना हो????
©®sudha raje

स्त्री और समाज :- सीमाएँ हों उम्र की।

मान लो
और मानने लायक बात भी है ।
कम से कम हमारे निजी विचार से ।
कि एक और क़ानून बने कि ।
किसी पुरुष का किसी भी ऐसी स्त्री से
दैहिक संबंध दंडनीय घोषित कर
दिया जाये ।
जिस स्त्री की आयु पुरुष की आयु से
10बर्ष से भी कम है ।
यानि तब कोई विवाह बेमेल
नहीं हो सकेगा ।
कोई
लङकी को ""सहमति"" के दुष्ट बहाने से
नहीं चकमा दे सकेगा कानून को ।
अलबत्ता सज़ा भले ही तीन साल
हो या पाँच
मगर ऐसे हर पुरुष को सज़ा होनी जरूर
चाहिये
जो अपनी आयु से 10वर्ष से भी अधिक
छोटी स्त्री से विवाह करे या दैहिक
संबंध बनाये ।
दूसरे मामलों में स्त्री पर भी दंड
घोषित हो जिन मामलों में
स्त्री अपनी आय़ु से दस साल से
भी छोटी आयु के पुरुष से विवाह करती है
या दैहिक संबंध बनाती है ।
चाहे कम ही समय की सज़ा हो मगर अवैध
घोषित होना ही चाहिये ऐसे संबंध लागू
होने की ताऱीख के बाद
इसका लाभ उन विधवाओं
को भी मिलेगा जिनको संपत्ति बँटवारा
के लिये उस देवर से ब्याह दिया जाता है
जो उसके ब्याह के दिन आठ साल
का बच्चा था ।
और फिर उसको हमेशा कुंठा में
जीना पङता है ।
पता है बात गले नहीं उतरेगी कट्टर
मर्दवादियों के और
रूढ़वादी स्त्रियों के भी ।
किंतु एक इस कानून में
करोङों की जिंदग़ी के सुकून लिखे हैं ।
चोरी भी सिर्फ दरवाज़ों से
नहीं रुकती और ।।।।प्रेम?????? जब
पिता पुत्री की आयु
हो तो सिवा वासना के कुछ नहीं ।।।
लेकिन जब एक अवैध है शब्द जुङता है
तो कमी आती है एब लोग सिगरेट बसों में
नहीं पी पाते न
एक दस साल की बच्ची से इक्कीस साल के
युवक को प्रेम नहीं हो सकता
वही बात कि जब वह बच्ची बीस
की हुयी तो तीस साल के से फिर
सहमति का क्या??? और अगर आयु
सीमा नहीं रही तो ये बूढ़े
कभी नहीं मानेगे बीस की लङकी साठ
का बूढ़ा पटाने बरगलाने के बाद
सहमति का बहाना लेता है????
धिक्कार!!!!!!
आयु से ही कोई
काका चाचा दीदी काकी माँजी दादी बाबा दादा कहता था ।।।।
अब??? बाबा काका और बेटा तीनों एक
ही लङकी को सहमत करने लग पङे????
कोई तो मर्यादा हो???? पचास
का आदमी जवान लङकी से काका अंकल
सुनना नही चाहता??? दोस्त
सुनना चाहता!!! पापी नहीं?
स्त्री खूब समझती है कि नौजवान
तो दीदी कह देगा किंतु ये खूसट!!!!!! सौ में
से पचास कभी नहीं सुनना चाहते
चाचा बाबा दादा काका अंकल
सीमा होनी चाहिये । हर साल अरब
देशों के अरबपति गरीब मुसलिम
लङकियाँ चौदह साल तक की परसनल
लॉ के नाम पर निक़ाह करके ले जाते है
उमर अस्सी तक ।।हमने पोता और
बेटा एक साथ खिलाने वाले खूब देखे
व्यभिचार के लिये खेला खाया चालाक
प्रौढ़ और बूढ़ा ।।नादान लङकियाँ कैसे
बरगलाकर शोषण करता है ये
लङकी ही कह सकती है मगर कानून
तो सोलह साल पर सहमति मानने
को तुला है और आयु के अंतर पर अवैध
घोषित करना नहीं चाहता
अट्ठारह से तीस तक लङकी अविवाहित
और मन में साथी की चाहत
कहीं परिजनों से दुख और कहीं जॉब कॉलेज
के झंझट । बूढ़ा घाघ ही ।समझता है
कि लङकी को कैसे रुलाकर फिर
भरोसा जीतना है ।।भावनायें जगानी है
।।कोई बूढ़ा किसी युवती से प्रेम कर
ही नहीं सकता ।।केवल
वासना ही रहती है ।।।और व्यभिचार में
सहमति समाज का कैंसर है आयु
की सीमा काफी रोक करेगी हमने
याचिका भेजने का अभियान
चला दिया है।
क्यों नहीं । हम उम्र ही खुश रह सकते हैं
। और ये अंतर दस साल
छोटा या बङी पर्याप्त है।
दस साल की सीमा नहीं होने से
हजारों लङकियों की शादी बूढ़ों से कर
दी जाती है अब सब तो धनवान नहीं है न
जो वियाग्रा शिलाजीत और स्वर्ण भस्म
मेवे बादाम जिम कबाब करते रहे ।।
नतीज़ा हज़ारो लङकियों की निजी जिंदग़ी सुहागिन
विधवा की तरह ही रह जाती है और
गुलाम बस
स्त्री को भी हक है कि वह हम उम्र से
विवाह करे कभी नहीं देखा कि एक बूढ़े
को नवयुवती खत लिखती है और गीत
गा ती है विरह में और प्रसन्नता से
विवाह को राजी है ।। बूढ़ी आयु तक
कोई विधुर
या तलाक़शुदा ही अकेला होगा या अपराधी वरना स्त्री चाहिये????
और विवाह नहीं??
केस लगभग लाख के करीब ऐसे है जहाँ साठ
साल की प्रौढ़ स्त्री पाँच
जवानो की माँ सात
की दादी को काकी कहने वाले लङकों ने
रेप किया और गला घोंट कर मार डाला
आप कहें क्या वह प्रेम है????
जब प्रेम होता है तो केवल एक बार बस
एक बार ।।फिर तो समझौता लालच और
स्टेटस और जरूरत और वासना होती है
एक हम उम्र जोङा जिनकी आयु में पाँच
साल से कम अंतर हो वहाँ देखे ।।वे
दोस्तों की तरह रहते है परस्पर विकल
और लङते झगङते भी खुश ।।।वहीं एक
प्रौढ़ पुरुष के साथ नवयुवती??? गहने
कपङे पैसा मकान गाङी मगर???
उल्लास?? लजाना खिलखिलाना?? और एक
दूजे के लिये विकलता?? नहीं वहाँ एक
मालिक और तानाशाह और
बङा बङा सा दिल रखता हो तो शासक
संरक्षक
वहीं दूसरा बच्चा सा सहमा आतंकित
आज्ञाकारी और अनुशासित!!!!
यह समाज की रूढ़ि है उसका मुद्दा अलग
है वह भी स्त्री के ही हक मारकर
बैठता है कि लङकी किसी से प्रेम न करे
जहाँ कान पकङ कर दान कर दें
वही झुका कर सिर मर मिटे
प्रेम पर लेख लिखा है बहुत सारा और
सार यही कि भारतीय
लङकियों की ट्रेजडी यह है कि उनके पलंग
पर कौन सोयेगा यह वे नहीं बाप तय
करता है
मगर प्रेम होना रुकता नहीं ।।लोग
समझदार हुये तो जाति मजहब
की सीमा पर वापस लौट गये नासमझ हुये
तो जान दे दी भाग्यवान हुये
तो मना लिया परिवार
अलगाव के पीछे
मर्दवादी मानसिकता और अब
कम्प्रोमाईज नहीं करने को तैयार
नयी पीढ़ी है
वे औरते हमारी पीढ़ी के साथ खत्म
हो चुकी जो पति के हर आदेश को धर्म
समझकर विरोध रखने पर
भी निभाती थी और परिवार पर
कैरियर कुरबान सेहत कुरबान
मैका कुरबान
नयी पीढ़ी के लङकों को आदर्श
स्त्री तो बीबी चाहिये मगर कमाऊ
रूपसी और धनिक की बेटी मोटा दहेज
लङकियाँ अपनी बुआ माँ और
चाची की तरह आँसू बहा कर नर पर
मिटने को अब तैयार नहीं ।।।स्त्री अब
घर की कामवाली बाई और
पुरानी फिल्मों की नायिका नहीं
विवाह जब दूसरों की मरजी से किये जाते
है तब समाज में आदर्श परिवार बने कैसे?
कोई बंधन नहीं आज भी यही कुत्सित सच
है
कि विधवा की शादी नहीं हो पाती और
विधुर कुँवारी से ही शादी करते हैं

विधुर जब विधवा से ही शादी करने लगे
और तलाकशुदा से तलाकी तो बदले
समाज!!!! आयु सीमा तब भी जरूरी है ।।
पैंतालीस का प्रौढ़ एक तीस की लङकी से
विवाह करता है तब केवल दस साल
अधिकतम शादी शुदा जीवन रह सकता है
।।।क्योंकि 45तक अविवाहित कोई
योग्य लङका रह नहीं सकता ।।।
या तो खोट होगी या लालच या विधुर
तलाकशुदा ।।।और ।।।जो इस आयु तक
अकेला रहा हो वह स्त्री को कभी दिल
और घर में स्पेस नहीं दे पाता ।।।विवाह
की आदर्श आयु तो बीस से तीस तक ही है
।।।पैंतीस के बाद
तो माँ बनना भी जानलेवा है और
पैतालीस पार के पुरुष के बच्चे डाऊन
सिंड्रोंम यानि मंदबुद्धि और दैहिक
विकलांगता के शिकार होते है।
आज की नारी????? 80%गाँव है और केवल
30% साक्षर लङकियाँ और जॉब में तो दस
प्रतिशत भी नहीं ।।।सब की सब
कसबाई और ग्रामीण गरीब और मध्यम
आम वर्ग
की लङकियाँ वहीं शादी करती है
जहाँ पापा कहते है ।।।।और दहेज के
बिना शादी हो नहीं पाती सही मेल की
आज की नारी केवल दिल्ली कलकत्ता और
मुंबई चेन्नई नहीं रहती ।।।
झोपङपट्टी और ढाबों झुग्गियों रिक्शे
खोमचे ठेले वालो और किसान मजदूर
मैकेनिक और फेरी वालों की बेटी है ।।।
जो कभी स्कूल तक नही गयी और
जिनको रोज चार बार पिता भाई पीट
देते है जो सात साल की आयु से भोजन
पकाने लगती है ।
असली जीवन???? जब पचपन
की स्त्री होगी तो पुरुष पचहत्तर
का??? और बूढ़े को खाट पर या कांधे पर
ढोयेगी वह दस पंद्रह साल के बच्चों के
साथ!!!!! कहावतों और शायरियों से
हकीकत अलग है
नहीं है क्योंकि आप पुरुष है सो आम बात है
एक पुरुष को कम आयु की ही बीबी पसंद
आती है जबकि स्त्री हम उम्र
को ही पसंद करती है निभा तो भारत
की लङकी खेत में खङे बिजूके से भी लेती है
।।।छोटी लङकियों पर
घिनौनी निगाहें नोंचने का वक्त आ
चुका है और ये कानून अब
बनना ही चाहिये है
अव्वल तो ऐसे जोङे नजर नहीं आते
जिन्होने अपने से ग्यारह साल
बङी स्त्री से विवाह
किया हो कदाचित दस हजार में
दो भी नहीं!!!!!!!!!!! और अगर नर
नारी पक्ष की बात है तो भी दस साल से
अधिक बङी स्त्री से कोई दौलत के लालच
में ही विवाह करता है या मजबूरी मे
या व्यभिचार वहीं ।।।ऐसे बदलाव के
लिये ये भी रोक होना ही चाहिये ।।।
पहले आप समाज को यथार्थ में तौले और
आँके कि कितने पुरुष है जिन्होने पंद्रह
साल बङी स्त्री से
बाकायदा शादी की है?????? अरे ये
तो संविधान तक भेदभाव कर
गया जो 21का लङका 18की लङकी को जोङी बना गया!!!!!
पच्चीस साल भी छोटी हैं
लाखों पत्नियाँ ।।लेकिन क्या पच्चीस
बङी स्त्री से विवाह हुये हैं????? पहले
अपने पङौस दफतर कुनबा भारत की बात
करें????? यही भेद है ।।।पुरुष तो सत्तर
साल के भी दस पंद्रह साल
की लङकी खरीदते लाखों मिलते हैं भारत
और एशिया में
दोस्त नहीं तब स्वामी सेवक और
गार्जियन बच्चो जैसा ही नाता बनता है
जब आयु में पाँच साल से अधिक अंतर
होता है।।।।और याद रखें
कि हमारी इस पोस्ट का मकसद
बिना विवाह के सहमति के नाम पर
बलात्कार व्यभिचार यौन शोषण रोकने
की मुहिम के लिये है जिन मामलों में
प्रौढ़ बूढ़ा कह देता है कमसिन
लङकी सहमत थी जबकि वहाँ सरासर
धोखा कपट और छलात्कार
ही होता पाया जाता है
लङकियाँ डरना बंद कर देगीं तब
ये प्रचलन नहीं अपवाद ही है ।।।जब
ऐसा कहीं हुआ भी हो तब
भी स्त्री तो क्या पुरुष भी पब्लिक में
स्वीकार नहीं करते कि लङकी की आयु दस
साल से अधिक है वर से!!!! याद रहे ये केवल
विवाह के संदर्भ में नहीं है ।।और दस
साल का अंतर तो हम खुद ही कह रहे हैं
कि चलो कम या जादा ।।।
बाकी तो सिवा गलत को बढ़ावा देने के
कुतर्क के सिवा कुछ नही
ग़ज़ब है मर्दवादी सोच एक दो के अलावा हर पुरुष ने विरोध
किया कि स्त्री से विवाह या दैहिक
संबंध के मामले में किसी पुरुष से
स्त्री की आयु 10साल से अधिक कम
किसी भी हाल में नहीं होनी चाहिये यह
नियम विवाह लिव इन और सहमति के
फैक्ट पर लागू हो आगामी तारीख के सब
स्त्री पुरुष संबंधों पर ।।।ताकि कोई
प्रौढ़ किसी नादान की सहमति कपट से
न लेकर ज़ुर्म को दैहिक संबंध साबित कर
सके ।।।।किंतु किसी पुरुष को ये बात
पसंद नहीं आयी यानि?????? सब एकमत हैं
कि पुरुष कितनी ही बङी आयु
का हो सकता है और किसीभी आयु
की लङकी को ""उस ""नज़र से देखने
को आज़ाद है पट जाये तो जायज भी??
©®Sudha Raje

स्त्री और समाज

लङकियों को धमकाने की कोशिश
ये समाज गर्भ से ही शुरू कर देता है जब कामना करता है केवल पुत्र की ही
कामना करता है । बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिनमें पुत्री की कामना की
जाती है ।
पुत्री पैदा होने पर अफसोस करता है । बहुत कम मामले ऐसे होते हैं जिनमें
पुत्री होने पर उल्लास उत्सव होता है ।
लङकी को हर धमकाया जाता है। जब समाज उसे घरेलू कार्य सिखाता है और
स्त्रियाँ समझाती है कि जरा भी ग़लती की तो कोई हवसीहिंस्र पिशाच खा
जायेगा ।
लङकी कितनी ही हँसती खेलती हो मगर हर लङकी हर पल एक रिस्क लिये सिर पर
डरी हुयी सी रहती है सावधान सावधान सी ।
लङकी को धमकाते रहते है बाहर से भीतर तक हवसी हिंसक ।
और चाहे लाख पर एक हो मगर बचपन में ही क़ामयाब हो जाते हैं मासूम लङकी को
डराधमका बहला फुसला टॉफी चॉकलेट चिज्जी पैसे और घुमाने के लालच में डर सच
साबित हो जाता है और भयादोहन किया जाने लगता है ।
लङकी को धमकाता है ये समाज जब स्कूल कॉलेज अस्पताल बाजार मंदिर मेला रैली
जुलूस उत्सव और समारोह में जाती है अथवा जाना चाहती है और पूरी लङकियों
में से बहुत कम लङकियाँ जाने दी जातीं हैं ।

लङकी को धमकाता है ये समाज और पूरी लङकियों में से बहुत ही कम लङकियाँ
ज़ाहिर कर पातीं है अपना पहला प्यार और प्रेम करने वाले के साथ घर बसाने
की इच्छा । और अकसर पूरी लङकियों में से बहुत कम लङकियों के प्रेम की
कहानी पता चल पाती है परिवार को और पूरी लङकियों में से बहुत कम लङकियों
का प्रेम घर बसाने तक की कथा बन पाता है ।

लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज और पूरी लङकियों में से अधिकांश
लङकियाँ ना नुकर या चुपचाप वहीं शादी कर लेने को राज़ी या ग़ैरराज़ी मान
कर शादियाँ पूरी जिंदग़ी निभाती चलीं जाती है ।
लङकियों को धमकाता है ये समाज और लङकियाँ बार बार माँ बनने पर यातनादायक
जीवन सहती है पूरी में से अधिकांश लङकियाँ बार बार प्रताङना सहकर भी पङी
रहती हैं दुखते बदन और सिसकते मन तन के साथ ससुराल पति और बच्चों के बीच
क्योंकि धमकाता है समाज कि ना मायका साथ देगा ना ससुराल में वापसी हो
सकेगी और बिना घर की लङकी के हिंसक पशुमानव खा जायेंगे उंगलियाँ उठायेंगे

लङकी को धमकाता है ये समाज पुत्र ही पैदा करने के लिये और हो जाती है
पुत्री पैदा तब जीवन भर लङकी की माँ होने की धमकी सहती रहती है माँ ।
लङकी को धमकाता है ये समाज और लूट ली जाती है बहुतों में से बहुत सी
लङकियाँ चाकू पिस्तौल तमंचे और तेज़ाब का डर दिखाकर । और फिर सबकुछ समाज
को दिखाकर बताकर बदनाम कर देने को धमकियाँ दे दे कर लूट का सिलसिला चलता
भी रखा जाता है कई लङकियों पर ।

*‡-लङकियों को धमकाता है ये समाज ।और कई लङकियाँ जब तब छल से खाने पीने
में नशा देकर जहरीली दवा देकर कामुक तसवीरें चलचित्र और गीत कहानी शेर
शायरी और शब्द स्पर्श से संप्रेषण करके भावुकता जगाकर भावनायें भङकाकर
कपट से लूट ली जाती हैं और विश्वास घात कर दिया जाता है प्रेम के बहाने
केवल दैहिक शोषण किया जाता और भरोसे में लेकर बङी बङी बातें की जातीं है
फिर सब बङी बङी बातों का मकसद लङकियाँ फाँसना और लङकियों से दैहिक संबंध
बनाना लङकियों से छलात्कार करना और फिर धमकाना होता है ।
धमकाता रहता है ये समाज लुटी हुयी लङकियों को ।
कि अगर तुमने किसी को बताया कि तुम्हें बल से छल से कपट से धमकी से धोखे
से और भयादोहन से लूटा गया है तो
साबित कर दिया जायेगा —"कुलटा वेश्य़ा बिना अनुज्ञप्ति की देह व्यापार में
लिप्त डायन चुङैल बेवफ़ा और छिनाल

जबकि कोई कभी नहीं पूछेगा कि अगर कुलटा छिनाल वेश्या खराब स्त्री है तब
तब तब??? ये कुलटा छिनाल वेश्या को पास जाने वाले सफेदपोश भलेमानुष सभ्य
और भव्य इज़्जतदार लोग अपनी औलादें वेश्या की कोख में छोङने क्यों जाते
हैं??
वेश्या बुरी है अछूत है समाज से निष्कासित है तब क्यों नहीं अछूत
बहिष्कृत और समाज से निष्कासित है वेश्याग़ामी!!!!!!!!!

लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज कि साबित कर देंगे कि तुम ही खुद उस
पुरुष के करीब जानबूझकर लालच में गयी थी तुमने की है साज़िश और तुम ही
वासना की भूखी डायन हो तुम ही फँसा रही थी उस #बेचारे को ।चाहे वह
#बेचारा लङकी का मुँह खोलने से पहले तक #वीर बहादुर तेज तर्रार दमदार
दबंग महान निडर बेखौफ़ की उपाधियों से विभूषित हो
लेकिन लङकियों को धमकाता रहता है ये समाज ।
और लङकियो!!!!!!!!!!!!
सुनो लङकियो!!!!!!!!!!!
धमकी से डरना नहीं
नहीं घबरा इलज़ामों से
ना पलायन करना सत्य की लङाई से
ना ही हिम्मत हारना
आरोपों की बौछार से ।
तुम्हें कतई नहीं भयभीत होना है
क्योंकि
जब तुम नहीं डरोगी तो
डरेगा शोषक
डरेगा कपटी
डरेगा छल कर्ता
डरेगा हिंसक
डरेगा भय देने वाला
डरेगा हक़ मारने वाला
डरेगा बलात्कारी
क्योंकि
भय की काली सुरंग के ठीक बाहर ही विजयश्री है
तुम्हारा अपना हक है
और है तुम्हारा अपना जीवन अपना घर कैरियर अपनी शर्तोम पर
डरना नहीं
जब कोई गाली दे
क्योंकि गालियाँ देने वाला लङकियों को होता कौन है बीच में बोलने वाला???????
डरना नहीं जब कोई हादसा घट जाये और तुम्हारे साथी साथ छोङ दें कपट करके
मिटा दें सारे सुबूत तुम्हारी बरबादी के तब भी ।
क्योंकि
तुम्हारी बात से
सावधान होंगी करोङों लङकियाँ ।
करोङों हिंसक पशु डर डर जायेंगे कि अब तो
लङकियाँ ना कलंक से डरतीं हैं ना बदनामी से ना ही डरती है समाज की घिनौनी
गालियों से ।
तब
सच मानो अनजाने में तुम बचा रही होती हो पूरी लङकियों में से लाखों
लङकियाँ बरबादी से शोषण से और सावधान करने वाले सैनिक की तरह होती है
तुम्हारी जिंदग़ी की शहादत ।
तुम्हें डरना नहीं है क्योंकि बहुत सारे नर नारी और लङकियाँ दिल से
तुम्हारे साथ होते हैं और दुआ करते है कि तुम्हारा जीवन पुनः सुधरे घर
बसे और तुम उबर जाओ हादसे की काली यादों से ।
भले ही वे सब तुम्हें ना दिखाई दें ।
परंतु सच मानो
लङकियों सत्य की जीत की दुआ करने वालों की कमी नहीं है ।

अंतर ये है कि लङकियों को धमकाने वाले चीखते बहुत हैं किंतु सत्य की जीत
की प्रार्थनायें शांत होती हैं ।
लङकियों को बहुत धमकाता है ये समाज
और
तुम्हें डरना नहीं है लङकियों ।
©®सुधा राजे
Sudha Raje
Dta-Bjnr

Monday, 23 December 2013

स्त्री और समाज।

लोग चिढ़कर कुछ कहें किंतु हमारे हर लेख का संबंध किसी एक व्यक्ति एक
स्थान या घटना से नहीं
बल्कि सदियों पुरानी सङी गली सोच से है ।
और सोच तो बदलनी ही पङेगी ।
अब तक अगर सोच नहीं बदली तो वजह वे उदासीन लोग भी हैं जो सोचते हैं उँह
मुझे क्या!!!
लेकिन जब उनके ऊपर गुजरती है तो बिलबिला पङते हैं ।
मुजफ्फर नगर दंगा हिंदू मुसलिम नहीं था ।
एक ग्रुप के आवारा लङकों का लङकियों से बदत्तमीजी करना था जिसे कोई हक
नहीं था पढ़ने जाती लङकी को छेङने का ।
दामिनी का और मुंबई की पत्रकार बैंगलोर की कानून की छात्रा का रेप कोई एक
अचानक घटा अपराध नहीं था ।
ऐसे कामपिपासु बहुत से हैं छिपे जगह ब जगह जो नजर के सामने हैं तो पहचाने
नहीं जाते ।
किंतु
ये क्यों ऐसा करते हैं??
वजह है मर्दवादी सोच
ये सदियों से चला आ रहा रिवाज कि हर जगह औरत को खुद को बचाना है और कोई
भी कहीं भी उसको मौका लगा तो छू देगा भँभोङ देगा छेङ देगा ।
बलात्कार अचानक नहीं होते ।
एक
विचारधारा से ग्रस्त रहता है मनुष्य जो समाज में रह रही है सदियों से कि
पुरुष को किसी की लङकी को सीटी बजाने आँख मिचकाने और इशारे करने गाने
पवाङे गाने और छू देने और पीछा करने का हक है ।
यही
विचार जो भरा रहता है समाज के हर अपराध के लिये ज़िम्मेदार है ।
आदमी रात को सङक पर ड्राईव कर सकता है औरत नहीं
आदमी एडल्ट मूवी देखने जा सकता है बालिग लङकी नहीं । आदमी घर से बाहर तक
किसी भी लङकी को अपने इरादे जता सकता है लङकी नहीं ।
आदमी शराब पी सकता है हुल्लङ पार्टी नाच गाना कुछ भी कर सकता है औरत नहीं ।
अब
जबकि औरतें बाहर आ जा रही है और रात दिन हर जगह मौजूद है तो
इसी
मर्दवादी मानसिकता से ग्रस्त लोग केवल औरतों को रोकने की बात करते हैं ।
जाने दो न????
चलने दो पार्क सिनेमा थियेटर ऑफिस दफतर रेलवे स्टेशन बस स्टॉप ।
कुछ साल पहले आनंद विहार बस स्टॉप पर एक परिवार के साथ रूकी स्त्री का
रेप हुआ था क्योंकि लोंग रूट की बस चूक जाने से बीच यात्रा में रुकने की
नौबत आ गयी ।ट्रेन में हजारो केस हो चुके ।
ये सब क्राईम नहीं हैं
एक
सोच है एक विचार है
एक मानसिकता है जो
समाज की ठेठ कट्टरवादी मर्दवाद से ग्रस्त है जिसमें औरत मतलब
एक समय का भोजन
बस
और उसके साथ नाता रिश्ता कुछ नहीं ।
मुसीबत हैं अच्छे पुरुष
वे
जो स्त्री के रक्षक और पहरेदार और समर्थक हैं ।
ये अच्छे पुरुष भी इसी समाज का अंग हैं और इनकी वजह से ही कन्फ्यूजन फैलता है ।
अगर सब के सब खराब हों औरते खत्म हो जायें ।
और दुनियाँ का झंझट ही निबट जाये ।
और
गजब ये कि इन अच्छों को अच्छी पवित्र औरते चाहियें और वे जूझ रहे हैं
खराब पुरुषों से कि बचाना है समाज परिवार और जोङे ।प्रेम की अवधारणा और
प्रकृति ।
किंतु
बहुतायत पुरुष के दिमाग का भारतीयकरण हो चुका ।
उदाहरण कि मध्य प्रदेश के एक प्लांटेशन पार्क में स्वीडन का साईक्लिस्ट
जोङा आकर टेंट लगाकर प्रकृति के मनोरम जगह पर रहने की सोचता है ।
और प्रौढ़ स्त्री का गैंग रेप हो जाता है । सब वनवासी अनपढ़ कंजर शराब
उतारने वाले लोग!!!!!
जरा सोचो
कि क्या भारतीय दंपत्ति पर्यटन पर जाते समय बांगलादेश के किसी जंगल पार्क
में टेंट लगाकर रूकते????????
नहीं रुकते!!!!
कभी नहीं!!!!
वजह?
क्योंकि भारतीय स्त्री को पता है कि किसी अकेली जगह एक पुरुष के सहारे
नहीं रुका जा सकता । और जान माल से अधिक स्त्री के शरीर पर आक्रमण की ही
आशंका संभावना डर ज्यादा है ।

लेकिन
स्वीडन में ऐसा डर नहीं था
लोग
नदी पहाङ जंगल कहीं भी पिकनिक मनाने रूक जाते हैं ।
ये सबकी सोच नहीं ।
लेकिन सब चीखने लगे दंपत्ति की गलती है कि सुनसान जगह जंगल में क्यों टेंट लगाया???
वे लोग जंगल ही तो देखने आये थे????
जब एक
पर्यटक से ऐसा बरताव होता है तो क्या उम्मीद है कि किसी वनवासी या गरीब
मामूली लङकी के साथ किसी भी अकेली जगह क्या बरताव होता है ।
राजधानी हो या कश्मीर
भारतीय स्त्री कहीं भी अकेली सुरक्षित नहीं और एक दो पुरुष के साथ भी
सुरक्षित नहीं परिचित देखकर ढाढस बँधता है किंतु डर बराबर रहता है ।
क्या किसी सज्जन पुरुष को यह अच्छा लगता है कि एक परिचित लङकी पूछे कि
""कहीं आप अकेला पाकर रेप तो नहीं करोगे ""
नहीं लगेगा अच्छा लेकिन एक अघोषित शक हर स्त्री लगभग सब पुरुषो पर करने
को विवश है ।
आज माता अपनी बेटी को परिजनों के बीच अकेली नहीं छोङती जब कि बुआ दादी
ताई चाची घर पर ना हो ।
और यही हाल पिता का है वह सगे भाई जीजा साढू किसी के घर मेहमानी तक को
लङकियाँ भेजने से हिचकता है ।
बहुत
परीक्षा मन ही मन लङकी माँ बाप और अभिभावक करते है कि वहाँ कौन कौन है ।
और कितनी लङकियाँ है ।
लोग कैसे है लङकी को खतरा तो नहीं तब लङकी को होस्टल मेहमानी वगैरह भेज पाते है ।
ये
औक़ात है बहुतायत पुरुष समाज की ।
वजह वही विचारधारा ।
विदेशों में लङकियाँ बीच पर लेटी है तैर रही है और क्लबों में नाच रही है
और कार ड्राईव करके रात को यात्रा कर रही है ।
चूम कर गले भी लग जाती है परिचितोॆ के
लेकिन
बलात्कार का डर नहीं लगता
घुटनो तक की स्कर्ट और बिना बाँह की मिडी पहन रखी है मगर बलात्कार का डर
नहीं लगता ।
शराब पीकर गाती नाचती है लेकिन बलात्कार का डर नहीं लगता ।

और
अगर वहाँ कोई किसी स्त्री को कुछ प्रपोज करना चाहता है तो ये स्त्री की
चॉयस है कि वह स्वीकारे या अस्वीकार कर दे ।

भारतीय सहन ही नही करते!!!! अस्वीकृति का प्रतिशोध तेजाब और रेप से लेते हैं!!!!
और तमाम इलज़ाम अंततः औरत के सिर पर कि नैतिकता का ठेका तो औरत का है?
मर्दवादी लोग
समझे न समझे मगर सामंजस्य वादी समझने लगे है और अब ये मिटाना चाहते हैं ।
किंतु अफसोस कि आज भी बहुत सारी स्त्रियाँ मर्दवादी सोच बदलने की बजाय
खुद को ""नारी वादी "नही हूँ ये ।

साबित
करने के चक्कर में अंधाधुन्ध ऐसी विचारधारा हटाने की बजाय कुरेदकर
पहाङ काटना चाहती है औरतों पर ही प्रतिबंध की पक्षधर है ।
जबकि कटु सत्य है ये कि वे खुद कभी न कभी दहशत में रही है ।
स्त्री की समस्याओं का अंत है हर जगह हर समय ढेर सारी स्त्रियाँ जैसे
रेलवे स्टेशन बस स्ट़ॉप होटल स्कूल कॉलेज अस्पताल सङके दुकाने गलियाँ
दफतर संसद राजभवन और घर ।।।।
विचार पर प्रहार करो घटना पर हमारा कोई प्रहार बदलाव नहीं ला सकता ।
सोच बदलो रिवाज़ बदलो ।और जीने दो स्त्री को जीने दो ।
कि सोचो एक तरफ हिंस्रऔर दूसरी तरफ एक अजनबी पुरुष स्त्री किससे ज्यादा डरे?
©®सुधा राजे

स्त्री और समाज

पुरुष वर्ग का बहुसंख्यक
जो चाहता था वही हो रहा है ।
बङी संख्या में क्लोन मरदानी औरतें
पैदा हो रही हैं आधुनिकता के नाम पर ।
और बिना ये महसूस किये कि शातिर
मर्द उसके सिर पर जब हाथ फेर रहा है
तो यकीन जीतने के लिये ताकि कानून से
बच सके!!!!!!
स्त्री और पुरुष
दोनों में भूख प्यास है
यौनसंबंधों की सेक्स डिजायर बहुतायत
पुरुष में जहाँ नितांत दैहिक मामला है
स्त्री में
वहीं प्रेम और
सिक्योरिटी स्थायी पार्टनर
की चाहत है ।
स्त्री जहाँ हम उम्र और मैच्योर्ड पुरुष
पर रीझती है वहीं
पुरुष अकसर अपनी आयु से अधिक से अधिक
छोटी लङकी को ही भोगना चाहता है
स्त्री
को बहुतायत पुरुष केवल एक शरीर
ही समझता है ।
जिसमें उभार और गहराई है ।
जिन पर अकसर नजर बहत्तर गज
कपङों के बाद भी अटक अटक जाती है ।
स्त्री जब
पुरुष से बात करती है तो नजर पुरुष के
शरीर पर कम ही होती है सबसे
ज्यादा रीझती है उसकी बातों और
विचारों पर ।
वे विचार जो उसको एहसास कराते हैं
कि वह किसी पुरुष के लिये महत्तवपूर्ण
है नारीदेही होने से वह हीन
नही बल्कि कोई समझता है कि वह मन में
दुख रखती है और वह केवल शरीर
नहीं बल्कि उसके सपने है और नींद भूख
प्यास सम्मान है ।
प्रेम
वहीं क्रियेट होता है जहाँ अक्सर
स्त्री सुंदर और
पुरुष करूणा ममता दया और सुरक्षा के
भरोसे से स्त्री को जीत लेता है और
शरीर की बजाय मन से संबंध बनाता है ।
उपलब्ध स्त्री को भी भोगने की तेजी के
बजाय मन को राहत देकर साबित
करता है कि उसका पुरुषत्व
स्त्री को केवल मांस पिंड
नहीं व्यक्ति मानता है और वह उसके
करीब एकांत में
भी अपनी ही इच्छा की स्वामिनी है
उसको पहल का भी हक़ है औऱ वह
उसकी सहमति पाने के लिये कपट
नहीं रच रहा बल्कि संयम से
ही उसकी भी मर्यादा की रक्षा करते
हुये आजीवन उसका है ।
स्त्री देह भी है मन भी
औऱ
ये तब तक नहीं पिघलती जब तक कि वह
साथ वाले पुरुष पर
पूरा भऱोसा नहीं करती ।
यहाँ स्वार्थ और लालच के लिये
बिना मानसिक समर्पर्ण के जो दैहिक
संबंध बनाये जाते हैं वहाँ स्त्री केवल
अपने स्त्री शरीर को एक चैक की तरह
भुना रही होती है या रिश्वत की तरह
इस्तेमाल कर रही होती है ।
नारद मोह
की कथा के अनुसार जब स्त्रियों के सबसे
सुंदर समूह अपसराओं ने भी नारद में
विकार नहीं पैदा कर पाया तब विष्णु
ने कहा अभी तुम सावधान थे
कि विचलित नहीं होना नहीं होना है
सो,,,,,,वे कामिनियाँ थीं
अब तुमको अपने दैहिक बल पर घमंड है अब
देखना """"ये गृहवासिनी है
और विश्वमोहिनी के सामने
सारा धीरज विकलता में बदल गया!!!!!!!
बहुतायत पुरुष
वेश्या के कामबाण से नहीं रीझते ।
परंतु
अनजाने ही आम
गृहवासिनी की अनायास क्रियाओं पर
अकुला विकला जाते हैं ।
किंतु ये कोई कुदरती नहीं ।
सामाजिक अभ्यास है कि
बहुतायत पुरुष
हर आती जाती स्त्री को घूरते हैं विशेष
कर वक्ष और कटि स्थल ।
अकसर बहुतायत पुरुष स्त्रियों पर
छेङछाङ फिकरेबाज़ी और कोहनी हाथ
कमर से छूने की चेष्टायें कर चुके होते है
कभी ना कभी तब जबकि उस लङकी से
ना तो विवाह करना है ना प्रेम
ना ही आगे कभी कोई नाता बनने
की संभावना है ।
अजीब सोच है!!!!
मतलब कि एक स्त्री पर हर तरफ से
कामबाणों
सेक्स डिजायर भङकाने वाले स्पर्शों ।
दैहिक लिप्सा से भरे आमंत्रणों
और
नापतौल कर फिदा होती नजरों ।
यौन संकेतों की बरसात होती रहती है
वह स्त्री है यह बचपन से समझ जाती है
। और समझा रहा है बहुतायत हर आयु
का पुरुष कि उसे कभी भी कहीं भी दैहिक
हमले और यौन शोषण का शिकार
बनाया जा सकतावहै ।
वह अगर कपङे उतारने को तैयार है
तो बहुतायत पुरुष वर्ग उसको दैहिक
संबंध बनाने के लिये कतार से तैयार
है!!!!!!!!! फिर भी
फिर भी
??????
वह अखंड समाधि लगाये हुये
अपने सतीत्व की रक्षा करती रहे
यौन विचार ना लाये
और
विवाह के
अलावा कभी किसी को ना देखे
"""उस"""नज़र से!!!!!
ना ही कभी भावी पति के
अलावा किसी को छुये ना सपना देखे
ना खयाल करे!!!!
मन
कर्म
वचन
से कुमारी रहे तब तक जब तक
कि उसको पिता और भाई काका खोजकर
एक पुरुष के हवाले परमानेंट
शय्याशायिनी के रूप में सौंप नहीं देते???
स्त्री
महामानवी!!!!
स्त्री हर दैहिक उत्तेजना भङकाने
बहलाने फुसलाने और ललचाने रिझाने
आकर्षण और विचार से पूरी तरह मुक्त
रहकर
साबित करे
कि वह कुलटा नहीं!!!!
क्योंकि हर पल बहुतायत पुरुष
परीक्षक हैं
कि उसके भीतर सेक्स डिजायर है
कि नहीं?
वह भङकने बहकने को तैयार है कि नहीं?
वह लालच में आती है कि नहीं?
वह सेक्स की इच्छा को दबा पाती है
कि नहीं??
सब जगह
हर लङकी हर आयु
की स्त्री की परीक्षा ली जा रही है
हर पल!!!!!!
महामानवी
देवी
महासंयमी
वही स्त्री है जो विवाह पर
पति की सेज पर पहुँचने के बाद भी उस
पुरुष की पहल करने तक भी ।
जरा भी न बहके न कोई विचार खयाल
पहल बात व्यवहार दैहिक
इच्छा का लाये???
जबकि
कुदरत ने स्त्री में पुरुष के समान ही भूख
प्यास नींद संवेदना भरी है!!!
और
स्त्री का तो ऋतु चक्र भी है जब हर
महीने कुछ खास दिनों के बाद लगभग हर
स्त्री के भीतर डिजायर बढ़ती है और
खत्म होती है!!!!!
ये सब सोशल प्रैक्टिस है कुदरत नहीं ।
कि बहुतायत पुरुष वर्ग ये
तमन्ना करता है कि स्त्री हर पल
लजाती शरमाती रहे और हर तरफ
कामी लोलुप मँडराते रहें!!!!
हर तरफ से स्त्री पर ""वचन देह
दृष्टि और विचार से कामबाण बरसाये
जाते रहें तब भी ""समाज
की नैतिकता शुचिता और
मर्यादा बनाये रखने
की जिम्मेदारी स्त्री की है ।
बखूबी
निभातीं भी हैं बहुतायत स्त्रियाँ इस
मानसिक वाचिक देहिक और वैचारिक
हमलों लालचों के बीच से भी अपने
आपको सिकोङ कर बाँधकर
कभी डरती डरती कभी लङती झगङती जू
कभी रो धोकर । बचा लेती हैं खुद को ।
बनी रहती है
अतिप्राणी
महामानवी
देवी और संयम की शिला ।
किंतु
यह सवाल आज समाज के हर चेतन
व्यक्ति के सामने हम रखना चाहते हैं
कि ।
"""क्या यह मानवाधिकार की दृष्टि से
न्याय है? क्या यह व्यक्ति और जीव
प्राणी रूप में स्त्री के साथ इंसाफ
है?????????????
कि हर पल हर जगह हर उम्र में
स्त्री पर हर आयु का बहुतायत पुरुष ये
चेष्टा करता रहे कि वह """सहमत है वह
तैयार है """
और
अगर वह संयम ना रख सके तैयार और
सहमत हो जाये तब उसको कुलटा और
पापिनी कहा जाये????
महानुभावो!!!!
ये तो कहो कि अगर समाज को पवित्र
पत्नियाँ और मातायें चाहिये तो
बंद
करे ये
हर
तरफ से
कामबाणों की बर्षा!!!!!
बहकाने फुसलाने बहलाने ललचाने भङकाने
की चेष्टा हमले और प्रचार!!!!!!!
क्या सामाजिक
नैतिकता
केवल स्त्री की ठेकेदारी है!!!
और जब जब कहीं कोई स्त्री पुरुष के
बहकावे में आकर डिग गयी तब तब
कुलटा????
क्या पचास वर्ष
की स्त्री को विवाहिता को सत्रह
साल के युवक को पटाने बहकाने फुसलाने
का हक़ है??
क्या दो जवान
बच्चों की माता या दादी को किसी पुत्
पौत्र की आयु के लङके को दोस्त और
बॉयफ्रैंड और प्रेमी और
शय्या भागीदार बनाने का हक
है???????
अगर ऐसा कोई बङी उम्र
की विधवा तलाकशुदा स्त्री भी करती है
कि पुत्र की आयु के युवक को पटाने
रिझाने बहकाने और सहमत करने के बाद
छोङ देती है तो क्या कहता है समाज
उसको?????
कुलटा!!!
हवसी!!!
और
यही बात उलट दीजिये
एक सत्तर अस्सी साठ पचीस चालीस के
किसी भी पुरुष का ।
किसी भी आयु की पुत्री पौत्री तक
की समवयस्क स्त्री पर डोरे
डालना रिझाना ललचाना उसकी भावन
जगाने की चेष्टा सहमति लेने
की सारी साज़िश!!!!!
तब जबकि आईन्दा जीवन उसके साथ
नहीं बिताना जोङी में??????
बस पटाया सहमत
किया बहकाया भोगा और चलते बने ।
बाद में अगर लङकी प्रेगनेंट
हो गयी या बात खुल गयी तो
केवल
लङकी बदचलन?????
ये बदचलन बनाने वाले बरिष्ठ विद्वान
बुजुर्ग और अनुभवी विवाहित विधुर
या तलाकशुदा की कोई
गलती नहीं बनाने में????
कौन
तैयार कर रहा है बदचलन लङकियाँ???
कौन तैयार कर रहा है कुलटायें???
जब हर तरफ इतनी अश्लीलता यौन
विचार यौन नजरिया यौन व्यवहार
और चेष्टायें फैली पङी है तब
???
तब कैसे रहेगी समाज में चरित्रवान
स्त्रियाँ???
कहा जाता है
कि अगर आप नहीं चाहते
कि आपका बेटा सिगरेट पिये तो घर में
और उसके संपर्क में कोई सिगरेट स्मोकर
नहीं होना चाहिये ।
हम
इसे यूँ कहते हैं कि चेत जाओ!!!!!!!
अगर
समाज को अब चरित्रवान पत्नी और
पवित्र कन्यायें और
ममतामयी चरित्रवान मातायें चाहिये
तब
हर तरफ से ये कामबाणों की बरसात
रोको!!!!
रोको ये यौन विचारों का प्रहार और
चेष्टायें छूने की घूरना बंद
करो स्त्रियों को बेलना बंद
करो स्त्री की यौनिकता पर मत सुनाओं
यौनेच्छायें भङकाने वाले शब्द!!!!!
वरना वह दिन दूर नही
जब हर तरफ सिर्फ कुलटायें ही बचेंगी ।
सदियों की साज़िश कामयाब
हो जायेगी ।
और खत्म
हो जायेगी नैतिकता की सारी कहानिय
सतूतिव पवित्रता के सारे चित्र खत्म
हो जायेगी लज्जा और झिझक ।
पहल करेगी औरतें और हर तरफ पुरुष पर
काम बाण बरसाती मिलेगी कुलटायें और
कोई गाली नहीं रह जायेगी स्त्री के
लिये बाकी ।
समाज की लङकियाँ सब
की जिम्मेदारी है कि उन पर यौन
वाचिक दैहिक वैचारिक हमले रोकें ।
केवल
लङकियाँ कैसे इस
जिम्मेदारी को उठायेगी???????
एक बच्ची स्कूल जा रही है अभी कोई
कपोल खींच देता है??
क्यों?
एक लङकी मंदिर जा रही कोई गले के
भीतर हाथ डाल देता है!!
क्यों?
एक स्त्री खेत खलिहान दफतर
जा रही है ।
कोई पेन्ट पाजामा खोल कर अपना बदन
दिखाने की घिनौनी हरकत करने
लगता है???
क्यों ।
कोई स्त्री दफतर स्कूल कॉलेज अस्पताल
कहीं भी जा रही है ।
बस
ट्रेन
मेट्रो ऑटो टैक्सी कहीं भी
कोई भी किसी भी आयु का
सीने को कमर को पीठ
को जांघों को जानबूझकर नोंचने छूने
घिसटकर निकलने की कोशिश करने
लगता है ।
काम काज करते जरा सा गला पीठ पेट
पिंडली
दिख
गयी कि लगा टकटकी लगा घूरने???
क्यों??
मानव है औऱ मानव तो नग्न ही पैदा हुआ
भी है और चमङी ही कुदरत
का दिया आवरण है!!!!!
जब जोङी नहीं बनानी उस स्त्री के
साथ
परिवार नहीं बनाना उस स्त्री के साथ
तब
जो जो भी जानबूझकर ऐसी हरकतें
करता है
वही वही पुरुष कुलटा पापी दुष्ट और
सामाजिक राक्षस है ।
जब
वह लङकियों पर लङकी होने की वजह से
हेयता वाले चुटकुले
गढ़ता सुनता सुनाता है वह सामाजिक
पापी है ।
जब वह लङकियों पर लङकी होने मात्र
की वजह से सामान्यीकृत व्यंग्य
या फिकरे कसता है
कि ""लङकियाँ तो ऐसी होती हैं ""जब
वह विवाहित होते हुये
भी किसी भी आयु
की स्त्री को """सहमत """करने
की चेष्टायें करता है ।
जब वह केवल पुरुष होने मात्र से
स्त्री पर नियम बनाने लगता है
जबकि ये कार्य उसका प्रोफेशन नहीं ।
वह एक सामाजिक राक्षस है।

Sunday, 22 December 2013

लेख::-""स्त्री और समाज।""

एक महा विद्वान की पोस्ट पर एक
""शराब पीने वाली स्त्री को एक
तथाकथित विदवान ""बिना लायसेंस
वाली वेश्यायें ""
कह रहे हैं ।
अगर आप सबने हमारे विगत
दो महीनो के लेख पढ़े होंगे तो हमने
""नशा और शराब को सख्त मना किया है
स्त्री के लिये और नशा करने वाले पुरुष
पर किसी भी हालत में कतई तक
भी विश्वास ना करने को कहा है ।
किंतु
सवाल ये है कि भारत
की बङी आबादी जो जंगलों में रहती है
पहाङो और रेतीलों में रहती है
वहाँ वनवासी और खानाबदोश
मजे से बिना किसी भेदभाव के
शराब पीते और नाचते गाते हैं ।
और उनमें उतनी सभ्यता नहीं कि वे जाम
बनाये
मगर वहाँ औरतों पर शोषण अत्याचार
नगण्य हैं ।
वे मजे से रहती है और
नाचती गाती जोङियाँ सुख से मेहनतकश
जीवन जीती हैं ।
गाँवों में प्रौढ़ महिलायें
हुक्का बीङी और भाँग खूब पीती है और
कतई उनको कोई बदचलन
या वेश्या नहीं कहता है ।
पुरुषों के साथ नाचना गाना मेला उत्सव
जाना ये सब बाते भारत के
वनवासी जीवन का अनिवार्य अंग है ।
तो सोचने वाली बात है
कि
आधपनिकता के नाम पर जो महिलायें
शराब नशा करतीं हैं और पुरुषों के बीच
हँसती गाती दोस्ती यारी की बातें
बराबरी की बातें करतीं है ।
वे पीठ पीछे
उन्ही मंडली वालों द्वारा ""क्या समझ
जाती हैं???
ग़ौर करें सोच को जब तक आपके सामने
व्यक्त ना किया जाये आप सामने वाले
को भला मानुष और खुले मन का साफ
इंसान समझतीं रहेगी वह यार यार कहके
बात करता रहेगा कंधे पर सिर पर पीठ
पर हाथ रखकर गले लगाकर
अनुमति का दायरा बढ़ाता रहेगा ।
आप
मॉडर्निटी के चक्कर में सब अवॉईड
करती रहोगी
और शराब पीने के बाद उसी मंडली में से
कुछ तथाकथित लोग उस हँसने बतियाने
शऱाब पीने
वाली लङकी को ""बिना लायसेंस
वाली वेश्या ""भी समझ लेंगे ।
यही अंतर है
भारतीय और बल्कि एशियाई समाज में
""जितना नगरीकरण और
तकनीकी जीवन होता जाता है
मर्दवादी सोच
उतनी ही गिरती चली जाती है।
एक
समय जींस पहननेवाली लङकी को चालू
समझा जाता था ।
आप समझें या न समझें भारतीय
मर्दवादी समाज
जितना नौकरीपेशा पुरुष वर्ग लेखक
शिक्षक धार्मिक नेतृत्व समुदाय
घटिया सोचता है उतना कोई नहीं ।
आज भी गाँवों की मेहनतकश दलित और
वनवासी महिलायें बङी संख्या में शराब
बनाती बेचती पीती पिलाती है
उनकी आजीविका का साधन
तेंदूपत्ता बीङी महुआ शराब गाँजा भाँग
अफीम है।
इसी से सोच का पता चलता है ।
बङी संख्या में पारंपरिक परिवारों में
महिलायें पान खातीं है
किंतु
आजके महानहरों में जहाँ हर दूसरे तीसरे
की जेब में गुटखा सिगरेट बीङी होता है
।पान की दुकान पर जमघट
लगा रहता है ।
पान खाने वाली स्त्री बस ऑटो दफतर
कहीं दिख जाये तो सबकी भवों पर बल
पङ पङ जाते हैं चालू लगने लगती है वह।
ये है पढ़ा लिखा नगरीय मर्दवादी मुख्य
समाज
जो मानता है कि अपनी मरजी से ज़ीने
का हक़ सिर्फ उसको है ।
स्त्रियाँ सिर्फ पुरुषों के बनाये
नियमों पर ही चल सकतीं हैं।
गज़ब!
ये कि ये ही लोग दफतर घर बाहर
महिला को
शराब सिगरेट पान नशा ऑफर करके
खुलकर जीने पीने नाचने गाने को हक
बताते हैं।
सोचो लङकियो!!
जब कहीं पार्टी में आईन्दा ऐसा ऑफर
मिले तब ग़ौर देना कि वहाँ लोग समझ
क्या रहे
अब ये बात है तो ।।।।नैतिक अनैतिक
पुरूषो का भी वर्गीकरण होना चाहिये
न????
सब शराब पीने नशा करने वाले पुरुष
गैरलायसेंस वाले ------क्या समझे जाने
चाहिये????? अपने व्यवहार और आचरण से
एक पुरुष भी नैतिक और अनैतिक चालचलन
वाला घोषित होना चाह्यिये न
यही है
तथाकथित आधुनिक मॉडर्न समाज।।।
जिसे नियम पसंद नहीं ।।।हम लोग
तो इनको दकियानूसी लगते है
रस्म पगङी पर हमारे ससुर जी के देहांत
के बाद हमारे सामने गृह स्वामिनी होने
के रिवाज़ में तख्त पर बिठाकर हुक्का और
पान बीङी सिगरेट परोसा गया ।।।
यानि सास ससुर के बाद अब परंपरा से
बङी मुखिया होकर सबके सामने
हमको हुक्का बीङी सिगरेट पान
का अधिकार मिल गया है।।।वह अलग
मैटर है कि आपको पीना या नहीं किंतु
रस्म के लिये एक एक फूँक तो हम दोनों ने
ही सबके सामने उलटी मारी ही
23 गुण सूत्र पुरुष और 23ही गुणसूत्र
स्त्री के निर्माण में लगते हैं ।।।।
प्रकृति ने सृजन का बीज गोदाम पुरुष
को और धरती स्त्री को बनाया ।।।
सृजन केवल दर्द ही दर्द हैं इसीलिये
स्त्री दर्द सहकर सृजन करती है पुरुष के
स्त्री बीज से स्त्री और पुरुष बीज से
पुरुष जन्मती है ।।ये सब एकदम नीरस और
लंबी दर्दकारी प्रक्रिया मात्र न रहे
इसलिये प्रेम और संसर्ग सुख को क्षणिक
आनंद कारी बनाया गया ।।वरना पुरुष
की स्त्री में रूचि नहीं रहती ।।पुरुष के
सब सृजन स्त्री पर हैं ।।।स्त्री पूर्ण
व्यक्ति है ।।और अगर कोई अधूरा है
तो पुरुष है ।।।।परिवार तब तक
सुरक्षित है जब तक पुरुष
को स्त्री सहती है और प्रेम कर्त्तव्य से
सींचती है ।।।दुष्ट पुरुष
को स्त्री निभा लेती है परंतु कम
ही पुरुष होंगे जो दुष्ट
स्त्री को निभा लें।
वेस्टर्न महिला भी वेश्या नहीं है वह
भी माता बहिन बीबी बेटी है ।।मुक्त है
तो समाज की रवायतें खुली हैं और हक़ है
।।।नकल करने से भारतीयों ने सामान
तो अपना लिये मुक्ति के हक़ नहीं विचार
की निर्बाध धारा नहीं
बेशक जरूरी है कि महिलायें शराब और नशे
से दूर रहें विशेष कर । ।किंतु
किसी को भी व्यक्ति रूप में उसको केवल
पुरुषो के साथ बैठने उठने मैत्री और शराब
सिगरेट के आधार पर चरित्रहीन कहने
का हक़ नहीं ।।।विशेषकर
उनको तो कत्तई नहीं जो खुद शराब
सिगरेट और महिलाओं के बीच बैठने
को लालायित रहते है।
सवाल बस इतना ही है बंधु कि जब मासूम
से होशियार तक कोई
भी स्त्री हमला आक्रमण और छेङछाङ
तेज़ाब अश्लील स्पर्श से बची होने
की गारंटी के साथ जी सकेगी ।।।।
तभी हर व्यक्ति कह सकेगा हम सभ्य
समाज में हैं ।।
क्यों जुलूस में मेले में बस ट्रेन में
स्त्री को डर लगता है????? किनसे??????
जवाब खुद मिल जायेगा ।।।।हाँ डर के
बाद भी स्त्री को जीना है
तो निकलना तो पङेगा।
नशा सर्वनाश की जङ है ।।।
वही व्यक्ति दोपहर तक इंसान
सा जो शाम बाद हिंसक अमानुष
हो सकता है दिमाग
ही नहीं तो गलतियाँ सब तरह की नशे के
साथ किसकी सही बात??
बिलकुल जब जब समाज सुधार की बात
होती है पुरुष को छोङ कर केवल
औरतों लङकियों के ही हर एक्शन पर
बवाल खङा किया जाता है चाहे कपङे
हो चाहे नशा चाहे घर की जिम्मेदारी
पाश्चात्य संस्कृति को कोसने वाले
कभी जब भी बात उठाते है केवल
स्त्री की ही हदें तय करते हैं और
स्त्री को ही मुगल काल तक पीछे खीचने
पर तुल जाते है ।।।तिलक लगाये
रूद्राक्ष डाले या दाङी बढ़ाये जाम
लङाते शैंपेन उङाते लोग जब पश्चिमीकरण
पर तर्क करते हैं तो स्त्री ही निशाने
पर रहती है उसकी शिक्षा कपङे
बोली खाना और हक
©®sudha raje
एक महा विद्वान की पोस्ट पर एक
""शराब पीने वाली स्त्री को एक
तथाकथित विदवान ""बिना लायसेंस
वाली वेश्यायें ""
कह रहे हैं ।
अगर आप सबने हमारे विगत
दो महीनो के लेख पढ़े होंगे तो हमने
""नशा और शराब को सख्त मना किया है
स्त्री के लिये और नशा करने वाले पुरुष
पर किसी भी हालत में कतई तक
भी विश्वास ना करने को कहा है ।
किंतु
सवाल ये है कि भारत
की बङी आबादी जो जंगलों में रहती है
पहाङो और रेतीलों में रहती है
वहाँ वनवासी और खानाबदोश
मजे से बिना किसी भेदभाव के
शराब पीते और नाचते गाते हैं ।
और उनमें उतनी सभ्यता नहीं कि वे जाम
बनाये
मगर वहाँ औरतों पर शोषण अत्याचार
नगण्य हैं ।
वे मजे से रहती है और
नाचती गाती जोङियाँ सुख से मेहनतकश
जीवन जीती हैं ।
गाँवों में प्रौढ़ महिलायें
हुक्का बीङी और भाँग खूब पीती है और
कतई उनको कोई बदचलन
या वेश्या नहीं कहता है ।
पुरुषों के साथ नाचना गाना मेला उत्सव
जाना ये सब बाते भारत के
वनवासी जीवन का अनिवार्य अंग है ।
तो सोचने वाली बात है
कि
आधपनिकता के नाम पर जो महिलायें
शराब नशा करतीं हैं और पुरुषों के बीच
हँसती गाती दोस्ती यारी की बातें
बराबरी की बातें करतीं है ।
वे पीठ पीछे
उन्ही मंडली वालों द्वारा ""क्या समझ
जाती हैं???
ग़ौर करें सोच को जब तक आपके सामने
व्यक्त ना किया जाये आप सामने वाले
को भला मानुष और खुले मन का साफ
इंसान समझतीं रहेगी वह यार यार कहके
बात करता रहेगा कंधे पर सिर पर पीठ
पर हाथ रखकर गले लगाकर
अनुमति का दायरा बढ़ाता रहेगा ।
आप
मॉडर्निटी के चक्कर में सब अवॉईड
करती रहोगी
और शराब पीने के बाद उसी मंडली में से
कुछ तथाकथित लोग उस हँसने बतियाने
शऱाब पीने
वाली लङकी को ""बिना लायसेंस
वाली वेश्या ""भी समझ लेंगे ।
यही अंतर है
भारतीय और बल्कि एशियाई समाज में
""जितना नगरीकरण और
तकनीकी जीवन होता जाता है
मर्दवादी सोच
उतनी ही गिरती चली जाती है।
एक
समय जींस पहननेवाली लङकी को चालू
समझा जाता था ।
आप समझें या न समझें भारतीय
मर्दवादी समाज
जितना नौकरीपेशा पुरुष वर्ग लेखक
शिक्षक धार्मिक नेतृत्व समुदाय
घटिया सोचता है उतना कोई नहीं ।
आज भी गाँवों की मेहनतकश दलित और
वनवासी महिलायें बङी संख्या में शराब
बनाती बेचती पीती पिलाती है
उनकी आजीविका का साधन
तेंदूपत्ता बीङी महुआ शराब गाँजा भाँग
अफीम है।
इसी से सोच का पता चलता है ।
बङी संख्या में पारंपरिक परिवारों में
महिलायें पान खातीं है
किंतु
आजके महानहरों में जहाँ हर दूसरे तीसरे
की जेब में गुटखा सिगरेट बीङी होता है
।पान की दुकान पर जमघट
लगा रहता है ।
पान खाने वाली स्त्री बस ऑटो दफतर
कहीं दिख जाये तो सबकी भवों पर बल
पङ पङ जाते हैं चालू लगने लगती है वह।
ये है पढ़ा लिखा नगरीय मर्दवादी मुख्य
समाज
जो मानता है कि अपनी मरजी से ज़ीने
का हक़ सिर्फ उसको है ।
स्त्रियाँ सिर्फ पुरुषों के बनाये
नियमों पर ही चल सकतीं हैं।
गज़ब!
ये कि ये ही लोग दफतर घर बाहर
महिला को
शराब सिगरेट पान नशा ऑफर करके
खुलकर जीने पीने नाचने गाने को हक
बताते हैं।
सोचो लङकियो!!
जब कहीं पार्टी में आईन्दा ऐसा ऑफर
मिले तब ग़ौर देना कि वहाँ लोग समझ
क्या रहे
अब ये बात है तो ।।।।नैतिक अनैतिक
पुरूषो का भी वर्गीकरण होना चाहिये
न????
सब शराब पीने नशा करने वाले पुरुष
गैरलायसेंस वाले ------क्या समझे जाने
चाहिये????? अपने व्यवहार और आचरण से
एक पुरुष भी नैतिक और अनैतिक चालचलन
वाला घोषित होना चाह्यिये न
यही है
तथाकथित आधुनिक मॉडर्न समाज।।।
जिसे नियम पसंद नहीं ।।।हम लोग
तो इनको दकियानूसी लगते है
रस्म पगङी पर हमारे ससुर जी के देहांत
के बाद हमारे सामने गृह स्वामिनी होने
के रिवाज़ में तख्त पर बिठाकर हुक्का और
पान बीङी सिगरेट परोसा गया ।।।
यानि सास ससुर के बाद अब परंपरा से
बङी मुखिया होकर सबके सामने
हमको हुक्का बीङी सिगरेट पान
का अधिकार मिल गया है।।।वह अलग
मैटर है कि आपको पीना या नहीं किंतु
रस्म के लिये एक एक फूँक तो हम दोनों ने
ही सबके सामने उलटी मारी ही
23 गुण सूत्र पुरुष और 23ही गुणसूत्र
स्त्री के निर्माण में लगते हैं ।।।।
प्रकृति ने सृजन का बीज गोदाम पुरुष
को और धरती स्त्री को बनाया ।।।
सृजन केवल दर्द ही दर्द हैं इसीलिये
स्त्री दर्द सहकर सृजन करती है पुरुष के
स्त्री बीज से स्त्री और पुरुष बीज से
पुरुष जन्मती है ।।ये सब एकदम नीरस और
लंबी दर्दकारी प्रक्रिया मात्र न रहे
इसलिये प्रेम और संसर्ग सुख को क्षणिक
आनंद कारी बनाया गया ।।वरना पुरुष
की स्त्री में रूचि नहीं रहती ।।पुरुष के
सब सृजन स्त्री पर हैं ।।।स्त्री पूर्ण
व्यक्ति है ।।और अगर कोई अधूरा है
तो पुरुष है ।।।।परिवार तब तक
सुरक्षित है जब तक पुरुष
को स्त्री सहती है और प्रेम कर्त्तव्य से
सींचती है ।।।दुष्ट पुरुष
को स्त्री निभा लेती है परंतु कम
ही पुरुष होंगे जो दुष्ट
स्त्री को निभा लें।
वेस्टर्न महिला भी वेश्या नहीं है वह
भी माता बहिन बीबी बेटी है ।।मुक्त है
तो समाज की रवायतें खुली हैं और हक़ है
।।।नकल करने से भारतीयों ने सामान
तो अपना लिये मुक्ति के हक़ नहीं विचार
की निर्बाध धारा नहीं
बेशक जरूरी है कि महिलायें शराब और नशे
से दूर रहें विशेष कर । ।किंतु
किसी को भी व्यक्ति रूप में उसको केवल
पुरुषो के साथ बैठने उठने मैत्री और शराब
सिगरेट के आधार पर चरित्रहीन कहने
का हक़ नहीं ।।।विशेषकर
उनको तो कत्तई नहीं जो खुद शराब
सिगरेट और महिलाओं के बीच बैठने
को लालायित रहते है।
सवाल बस इतना ही है बंधु कि जब मासूम
से होशियार तक कोई
भी स्त्री हमला आक्रमण और छेङछाङ
तेज़ाब अश्लील स्पर्श से बची होने
की गारंटी के साथ जी सकेगी ।।।।
तभी हर व्यक्ति कह सकेगा हम सभ्य
समाज में हैं ।।
क्यों जुलूस में मेले में बस ट्रेन में
स्त्री को डर लगता है????? किनसे??????
जवाब खुद मिल जायेगा ।।।।हाँ डर के
बाद भी स्त्री को जीना है
तो निकलना तो पङेगा।
नशा सर्वनाश की जङ है ।।।
वही व्यक्ति दोपहर तक इंसान
सा जो शाम बाद हिंसक अमानुष
हो सकता है दिमाग
ही नहीं तो गलतियाँ सब तरह की नशे के
साथ किसकी सही बात??
बिलकुल जब जब समाज सुधार की बात
होती है पुरुष को छोङ कर केवल
औरतों लङकियों के ही हर एक्शन पर
बवाल खङा किया जाता है चाहे कपङे
हो चाहे नशा चाहे घर की जिम्मेदारी
पाश्चात्य संस्कृति को कोसने वाले
कभी जब भी बात उठाते है केवल
स्त्री की ही हदें तय करते हैं और
स्त्री को ही मुगल काल तक पीछे खीचने
पर तुल जाते है ।।।तिलक लगाये
रूद्राक्ष डाले या दाङी बढ़ाये जाम
लङाते शैंपेन उङाते लोग जब पश्चिमीकरण
पर तर्क करते हैं तो स्त्री ही निशाने
पर रहती है उसकी शिक्षा कपङे
बोली खाना और हक
©®sudha raje

लेख::-""स्त्री और समाज।""

।।।।।मेरे पिता मेरे भाई मेरे
काका मेरे चाचा की सीमा से ऊपर
सोचो ।।।।।हर स्त्री के भीतर सेक्स
डिजायर होती है ।।।।हर पुरुष में
भी।।।।।कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं
जिनको देखकर माँ बेटे ।।भाई बहिन ।।
पिता पुत्री ।।।बुआ भतीजे।।।
मामा भांजी ।।।दादा पोती और
नाना दोहिती वाला प्यार
सद्भावना उमङती है ।।।।वह वात्सल्य
एक पुरुष में अनेक रिश्तों के लिये होता है
।।।।किंतु सब स्त्रियों के लिये
नहीं ।।।।याद रहे यहाँ हम बात
किसी एक नाम की नहीं कर रहे ।।।मगर
जैसे हर स्त्री किसी खास पुरुष के स्पर्श
से बहकने लगती है वैसे ही ।।।सब
पुरुष ....किसी स्त्री के साथ ममता स्नेह
पितृत्व भ्रातृत्व महसूस करते है तो ।।।
किसी लङकी को देख छू सुन कर
कामभावना से भर उठते हैं ।।।।।
भारती आमतौर पर बच्चे को माँ बाप
डबल बेड पर बीच में सुलाते है ।।।
स्त्री पुरुष आधी नींद में भी एक दूसरे के
स्पर्श से बहकने लगते है और अगर
इन्ही पलों में बच्चा जाग जाये तो ।।।
पापा हो मम्मी दोनों की सब
उत्तेजना एकदम खत्म ।।।और दोनों सब
भूलकर बच्चा सँभालने में लग जाते
हैं।।।।।ये हर घर हर
दंपत्ति की कहानी है।।।एक कमरे में
जवान बेटियाँ सोयी है दूसरे में माँ बाप
।।।।दोनो अपने भावना में लीन है ।।।
तभी बगल के कमरे से बेटी पुकारती है
।।।औऱ सब भूलकर ।।
पापा मम्मी तत्काल सपने में डर
गयी बच्ची को थपकने लगते हैं ।।।।हम
सबका बचपन ऐसा ही रहा ।।।
आधी रात में उठकर
भैया भाभी का दरवाज़ा पीट डालते थे
हम ।।।डरावना सपना आने पर और
दोनो अपने बीच में सुला लेते ते
कभी भाभी से चिपक कर सो जाते
कभी भैया के कंधे पर चिपक जाते
बङी उम्र तक ।।।।परंतु हर पुरुष सब
औरतों को एक ही बहिन
बेटी माता की भावना से समझे ये
जरूरी नहीं ।।।। याद रहे ये बात
घटना के संदर्भ में नहीं है
आदमी का आभामंडल किये गये कृत्य जब बङे
होते हैं तो लङकी के भीतर उठी शक
की लहर अपने में एक लहर की तरह
समझाईश बनकर रह जाती है ।मसलन कल
तक नारायण साई आसाराम तेजपाल
पादरी जैकब जज गांगुली और
मौलाना कशमीरी पर कोई शक तक
नहीं कर सकता थी ।हर
स्त्री कहीं लगा जरूर
होगा कि कहीं गङबङ तो नहीं मगर
दबा दिया अंतरात्मा की आवाज़ को ।दस
हजार में एक सगा पिता और
नजदीकी नातेदार चाचा मामा फूफै
मौसा देवर जीजा ससुर ननदोई जेठ ऐसे
ही अवसर का दुरुपयोग करते है ।जैसे खुद
उस स्त्री अपना दिल
नहीं करता कि पाँच सौ में एक
प्रेमी दोस्तो को बेच देगा? पति एक
दिन पार्टी में सौंप देगा
एक नयी बहू घर में आती है सौ में एक
ही सही परंतु किसी के देवर किसी के
ससुर किसी के जेठ किसी के ननदोई
की नीयत खराब है कहीं बॉस
तो कहीं कलीग डोरे डाल रहा है!!!!!!!!
स्त्री सब महसूस करती है किंतु अगर वह
पति से कहती है तो भाई भाई खून
खराबा!!!! पिता पुत्र खून खराबा!!!
या नौकरी गयी और हालात के संघर्ष
या फिर तमाम बदनामी और आरोप
कि ""तू शक्की है तेरी सोच गंदी है ""अब
वह सावधान रहकर ही धर में दफतर में
और सफर में रहती है । उसी पर अविश्वास
भी और रिश्ता जारी रखने
की मजबूरी भी । आधी से ज्यादा औरतें
केवल उन लोगों की ही शिकार है
जिनकी सामाजिक इमेज बढ़िया थी उनसे
करीबी मित्रता या नाता था और शक
होकर भी साथ रहना हालात
का तक़ाजा कि """अरे भले ही नीयत
खराब है मगर ऐसे कोई थोङे ही भरे
समाज में अपनी प्रतिष्ठा दांव पर
लगाकर शोषण करेगा!!!!!!!!!और ये
-""सहमति ""शब्द ही बङा क़ातिल है ।
एक दोगुनी आयु का पुरुष बेटी की उमर
की लङकी से संबंध बनाकर कह देता है
सहमति से हुआ ।।।
मान लो लङकी निहायत गिरी हुयी है
तब भी ये बाबा पापा की उमर के
लोगों की कोई
जिम्मेदारी ही नहीं??????
क्या जिम्मा है??? लङकी सहमत तो गिर
पङो??? अगर
नानी दादी की माँ की उमर की औरत
किसी लङके को ऐसे ही सहमत करे तो???
"""""""""""क्या कहेगा समाज?? नैतिक
दैत्य जवाब दैंगे??
©®sudha raje

नज्म

यूँ महफ़िल से छिपकर जाना ।अच्छी बात नहीं ।

इक हंगामा रोज उठाना अच्छी बात नहीं ।

केवल बातों से हमदर्दी लोग जताते हैं ।

लोगों की बातों में आना ।
अच्छी बात नहीं ।

कहना कुछ करना कुछ लिखना और जताना कुछ ।

कुछ थी कुछ की बात बनाना अच्छी बात नहीं ।

झूठ वहीं से प्रेत पाँव वाला सिरहाने था ।

सच को पैताने धमकाना ।
अच्छी बात नहीं ।

सुधा शरम से पानी पानी होकर लौट गये ।
गद्दारों को दोस्त बताना अच्छी बात नहीं ।
©®सुधा राजे

Saturday, 21 December 2013

स्त्री और समाज

Sudha Raje
Sudha Raje wrote a new note:
आधी आबादी का भारत .
Sudha Raje
हाँ हम डंके की चोट पर
भारत को असभ्य कहते हैं हम
आधा भारत
जिसको न घर न अपने आप
की इच्छा से जीने का हक
न सुरक्षा कैसा देश!!!!!!
पराया धन कह कर
पाला पराये घर आकर
कहा जाता है
क्या तेरे बाप का घर है???
वंश तुझसे नहीँ चलेगा । और
जिस घर का वंश चलाती है
वहाँ सुनती है
क्या तेरे खानदान में
ऐसा ही होता है
दो साल से सत्तर तक
की स्त्री को किसी भी आयु
का पुरूष माँस की तरह
भँभोङता है
और जब सजा की बात
आती है तो लेखक वकील
पत्रकार spur of moment
crime कह देते हैं
नाबालिग रेप हत्या कर
सकता है सजा नहीँ होगी
तेजाब फेक देते है
लङकी अगर
पटी नहीँ तो रेप
नहीँ रेप
का मौका लगा तो तेजाब
औरत का हर जगह
गालियों में
साले
ससुरे
हरामजादे
से
होकर शुरू हर तरह जलील
प्रयोग हँसी मजाक
पतिव्रता पत्नी सीता भाभी चाहिये
लेकिन
राम की तरह
जरा सा सामाजिक
अपवाद सहने
की क्षमता नहीँ
औरतों का कोई मुल्क
नहीँ है
वे पिता के घर पति के घर
पुत्र के घर रहती हैं
अकेले रहने वाली औरत
को नोचने वाले हर तरफ
बचाने वाले कंकणों में
बिखरी मुट्ठी भर दाल
अभी पुलिस हटा दो
सजा का डर ना हो
लङकी अकेली मिले
जो क्राईम रेट है
कितने गुना हो जाये
!!!!
धर्म के डर से
मार खाने के डर से
पकङे जाने के डर से
बेईज्जत होने नकाब उतर
जाने के डर से
कितने ही जानवर हैं जो हैँ
भेङिये
खाल भेङ की
Sudha Raje
औरतों का देश नहीँ है
भारत
औरतें अपनी मरजी से वोट
नहीँ डाल सकतीँ
अपनी तथाकथित
मातृभूमि पर पर्यटन
बिना सुरक्षा के नहीँ कर
सकतीँ
सुनसान रास्ते से
अकेली ड्राईव नहीँ कर
सकती
गाँव में शौच को खेत में
लङकियाँ झुंड बनाकर
जाती हैँ
स्कूल कॉलेज लङकियाँ
झुंड बनाकर जाती हैं
जरा चूक हुयी
कि
छेङछाङ फब्ती अश्लील
इशारे गंदे गाने
मौका लगा तो मेले बस
भीङ में नोंचा खसोटी
कहीँ स्त्री रेल से
अकेली सफर रात को कर
सकती है
मंहलसूत्र बालियाँ चेन
नोंचकर भाग जायेँगे
बेटी बंद हैं दीवार में
नहीँ तो चुरा के वेश्यालय
को बेच देगेँ
रिश्तेदार भी हाथ सेंकने
आँखेँ सेंकने
का मौका नहीँ छोङते
सभ्यता हुँह
डर से बनाया गया एक वहम
है बची खुची शांति
क्या सभ्य है
दवा लेने जाती लङकी दोपहर
को भी साथ के बिना जान हथेली पर
लेकर जाती है
पार्क में फूल है चोरी से तोङे जा रहै है
सरकारी लोग बिना रिश्वत काम
नहीँ करते
सुंदर चीज कहीँ भी हो गबन
घोटाला रेप शादी की झूठी छलना पर
ताकत वर चालाक उठा ले जाता है
Mar 25

स्त्री और समाज

Sudha Raje wrote a new note:
स्त्री बेची जाती है जब तो सभ्य कौन .
Sudha Raje
जनवाणी मेरठ में दो साल पहले
हमारा लेख छपा था जो सम्पादित करके
छोटा कर दिया गया था ।
आज भी हम विरोध करते हैं ।।।
वेश्यावृत्ति को लायसेंस देकर
कानूनी ज़ामा देने का ।।
क्योंकि
कहाँ से आती हैं वेश्यायें????
कोई भी इंसान प्रेम और दैहिक संबंध
को रोजगार राजी खुशी नहीं बनाता।
ना ही ।।
कोई
माँ बाप ये सपना देखते सकते हैं कि ।।
बेटी पैदा होगी ।।
और एक दिन दुनियाँ की सबसे बिकाऊ
वेश्या बनेगी ।।
और
ना ही समाज की मुख्य धारा में
ऐसी कोई स्त्री जुङ सकेगी ।।
जो
रोजगार बताया न जा सके वह चोरी है
ठगई है ।
ये लङकियाँ चुराने वाले गिरोह ।
हर साल लाखों बच्चियाँ चुराकर
वेश्यालयों में बेच देते है ।।
ये खो गये बच्चे जब मिलते है
सोनागाछी रेडलाईट नीलीबस्ती ।
तो
परिवार अपनाता नहीं समाज ताने
कसतै
है ।
बाद में वापस वहीं लोट जाती है नरक में
।।।
दैहिक पीङा रोग छूत
की बीमारियाँ गले
लगाकर तङप कर बे सेवा मरती है।।
ये
लायसेंस बनवाने में दफ्तर वाले
क्या क्या करेगे ।।।
तब हर ट्रैफिक वाला नोट माँगेगा
जो आज चोरी से जी रही दुनिया है ।।
वो प्रचलन में आ जायेगी ।।
बजाये संस्कार शालायें लगाने के ।।।
वेश्यावृत्ति को रोजगार
बनाया जाना ।।
घोर असामाजिक है ।।
स्त्री भोग्या का मिथक तोङो ।।
प्रेम चाहिये तो प्रेम निभाना
स्त्री चाहिये तो परिवार
बसाना सीखो ।
May 3
·
e
मेरा मानना है कि स्त्री शरीर नहीं है
पहले वह मानव है फिर स्त्री शरीर
तो बाद में आता है
अगर मजबूर होकर या मजबूर करके
भी किसी भी हालत में देह बेचनी पङे
तो ये अप्राकृतिक है ।
प्रकृति है प्रेम जोङा बनाना और
परिवार बसाना ।
इसके सिवा जो है वह
मानवता ही नहीं प्राकृत
सच का भी पतन है
धन हेतु स्त्री बेचना जब तक बंद
नहीं होता किसी देश को सभ्य कहलाने
का अधिकार नहीं
कहते हैं कुतर्की कि
यदि कोई अपना रोजगार चुनना चाहे
स्वेच्छा से गलत क्या है
नहीं है दैहिक व्यापार रोज़गार ।।।।
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Sudha Raje
कत्ल चोरी डकैती अपहरण स्मगलिंग लूट
राहजनी और देशद्रोह भी रोजगार है ।
नकली करेंसी बनाऩ भी रोजगार है ।
May 4