Monday, 16 December 2013

दामिनी को एक ख़त।

दामिनी!!!!!
ठीक मर गयीं तुम
अच्छा हुआ जो मर गयीं ।
क्योंकि
तुम्हारे लिये जीने की दुआयें करने वालों की तमाम दलीलों के बावज़ूद
तुम्हारे जिंदा
बच जाने पर सवाल उठाने वाले कम नहीं थे ।
कैसे जीतीं तुम?
बिना पवित्रता के प्रमाणपत्र के?

जो देता ये समाज!!!!
तब जबकि तुम्हारे पास बची थी नोंची भभोङी क्षत विक्षत विकृत देह ।
और नहीं बचा था कौमार्य?
कौन करता तुमसे विवाह
सबने सबसे पहले यही सवाल उठाया था।
क्यों नहीं ये सवाल उठाया जाता है
बलात्कार से पहले कि ये लङकी तो पवित्र नहीं हो सकती तो कौन करे ऐसी
अपवित्र लङकी का बलात्कार!!!
सवाली है सिंदूर बिंदी चूङियाँ और निक़ाह के बाद भी रौंदी गयीं हज़ारों दामिनियाँ।

दामिनी!!!!
ठीक मर गयीं तुम
क्योंकि तुम खुद ही गुनहग़ार थी घर से बाहर शाम को निकलने की ।
ये
सभ्य नहीं बर्बर समाज है
यहाँ
घर से बाहर निकलने का हक़ केवल पुरुषों को है और शाम के बाद केवल
बलात्कार का ही शिकार बनने के दाँव पर ज़ान लगाकर निकलती है लङकियाँ ।
सवाली है
सब बेटियाँ जिनका कोई भाई नहीं और बूढ़ा पिता बीमार है माँ नहीं है इस
दुनियाँ में और जरूरी है तत्काल दवाई पिता के लिये ।
लेकिन कोई नहीं पूछता लङकी पर टूट पङने से पहले क्यों निकली वह बस वह
गुनहग़ार होती है शाम के बाद घर से निकलने की ।

दामिनी!!!!!
ठीक ही मर गयीं तुम
क्योंकि तुम प्रेम करतीं थी
प्रेम सबसे बङा गुनाह है । औरत वह भी भारतीय औरत को तो प्रेम करने का जरा
भी हक़ नहीं है ।
तुम्हें भी नहीं था ।
क्योंकि
समाज के पहरेदार नैतिक दंडाधिकारी है तमपिशाच बलात्कारी जो हर तरफ घूमते
रहते हैं और उनको कोई तैनात नहीं करता किंतु वे खुद ही तैनात हो जाते हैं
हर गली मुहल्ले में ।और जो जो जहाँ जहाँ लङकी
मिलती है हँसती बतियाती पुरुष मित्र के साथ वह सार्वजिक शिकार मान ली
जाती है तमपिशाचों की ।
और उसके साथ ऐसा ही होना चाहिये ये मानने वाले लाखों लोग है क्योंकि अगर
ऐसा नहीं होगा तो लङकियाँ डर डर कर घर घर कैद कैसे रहेगी और कैसे बिना
पुरुष के घर से कदम रखने तक से आतंक दहशत खौफ में रहेगीं ।
सवाली है वे पुरुष जो जो दावा करते है स्त्री से प्रेम करने का!!!!
क्योंकि किसी पुरुष के लिये आज तक कभी सवाल नहीं उठा कि वह प्रेम ना करे
और उसको किसी लङकी से विवाह के पहले न प्रेम करने का हक़ है ना ही हक़ है
लङकी को घर से बाहर कहीं ले जाने का और किसी पुरुष के सामने हँसने
बतियाने का तो बिलकुल ही नहीं क्योंकि यहाँ से समाज ने मान्यता
प्रेम को नहीं
तमपिशाचों को ही दे रखी है ।

दामिनी!!!!!
ठीक ही मर गयीं तुम
क्योंकि नहीं था तुम्हारे पास अपना गर्भाशय और कोख
जो है स्त्री होने की अनुज्ञप्ति और बिना कोख वाली स्त्री को जानबूझकर
कोई नहीं अपनाता । क्योंकि ऐसी स्त्री को केवल रोटी कपङा मकान पर स्थायी
सेजशायिनी के सिवा सिर्फ दासी ही समझा जाता है ।
सवाल सब लङकियाँ दहशत से पूछती हैं कि
जिसने तुम्हें कोख विहीन किया कोंच कोंच कर वह पुरुष किस स्त्री ने जना था?
वह बिना कोख के धरती पर आया तो कैसे?
और वह बच्चा था तो कैसे बना पिशाच और कैसे नोंच लिया तुम्हारा स्त्रीत्व?
सवाली हैं सब की सब स्त्रियाँ कि तुम्हें जो दंड मिला वह बलात्कार वासना
भर की भूख थी??
या था ईश्वर नामक अबोध कल्पना को चुनौती जिसने बनायी स्त्री और लगा दी
कोख और दिया जननी होने का अभिशाप कि कोई भी भयानक यातना स्त्री होने भर
की वजह से देकर विधि विधान की डोरी पर झूलकर बालक और बालिग होकर उपहास
करे उस दुर्दांत यातना का कि वह अवयस्क है ।
दामिनी!!!!!!
तुम ठीक ही मर गयीं कि
तुम ही जब नहीं चाहती थी कि किसी को पता चले कि क्या हुआ तुम्हारे साथ!!!!!
आखिर तुम जानतीं थीं कि जब सबको पता चलेगा कि तुम्हारा बलात्कार हुआ है
तो सबकुछ बदल जाना था सबकी नजरें और व्यवहार!!!!!!
कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता ।
लोग जीना मुश्किल कर देते हर नजर पीछा करती हर आँख मुँह कान पर चर्चा और
सवाल होते तब तुम शायद आत्मघात या अज्ञातवास पर चली जाने की सोचती

सवाली है वे सब लङकियाँ
जिन पर बलात्कार बचपन में हुये जब वे नहीं जानती थी कि लङकी है या बच्चा ।
सवाली है वे सब लङकियाँ जो घरों में ही नाते रिश्तेदारों ने नोंच डाली जो
कभी घर से बाहर जाना तो दूर अपने आप पर हुये अत्याचार को खुल जाने पर भी
शब्द तक नहीं दे सकीं ।

दामिनी!!!!
ठीक ही मर गयीं तुम
क्योंकि बलात्कार को बङा अपराध नहीं मानता ये समाज चाहे लाखों लङकियाँ हर
साल मर जाती औऱ मार दीं जाती है संसार में केवल बलात्कार से ।
तब अगर तुम जिंदा रहतीं तो तुम्हारे हत्यारों को फाँसी की सज़ा घोषित
नहीं करता न्यायालय ।
सवाली हैं वे प्रथाय़ें जहाँ लङकी स्वेच्छा से प्रेम में विवाह पूर्व
दैहिक संबंध बना ले तो आज भी बिटौङे में धर कर जलायी तंदूर में भूनी और
माँ बाप भाईयों या पति के हाथों मौत के घाट उतारे जाने पर उनको समाज में
महान समझा जाता है ।
दामिनी!!!!!!
तुम्हें मुक्ति मिली या नहीं किंतु तुम्हारे मरने से
लाखों लङकियों को आवाज मिली है
और
वे सब सीमायें सवाली है जो पवित्र दैवीय जीवन जीने के नाम पर औरत के इर्द
गिर्द खींच तो दीं किंतु
कोई भी ठेकेदार नहीं बचा औरत की मान मर्यादा को बचाये रखने का ।
दामिनी!!!!
ठीक मर गयीं तुम ।
क्योंकि यहाँ
ऊँची जात वाले नीची जात का जूठा भात नहीं खाते । विवाह नहीं करते ।
और मजहब दूसरा हो तो बरतन तक अलग हो जाते ।
लेकिन जो समाज स्त्री की जाति और मजहब विवाह में बर्दाश्त नहीं करता अलग।
उसी ने अलग मजहब अलग जात के सब पिशाच तुम्हारा रक्त पीने को एक ही वक्त
में सहमत होकर पैदा किये ।
दामिनी
ठीक ही मर गयीं तुम
अब अगर तुम कहीं पढ़ सकती हो ये ख़त
तो कहना भगवान से खुदा और गॉड से कि अब लङकियाँ बनाना बंद कर दे
बंद कर दे कोख लगाना
बंद कर दे स्त्री में से पुरुष का जन्म ।
अगर ये धरती स्त्रियों के रहने लायक ही नहीं बची
तो
नष्ट कर दे
और अगली दुनियाँ में कोई स्त्री मत बनाये ।

दामिनी
कहना सब लङकियों की तरफ से कि अब लङकियाँ मत भेज
और भेजना ही है तो कमजोर तन भावुक मन मत दे ।


©®सुधा राजे
सुधा राजे
Dta-Bjnr

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