Wednesday, 18 December 2013

स्त्री और समाज लेखमाला

स्त्री और समाज 16
लेख श्रंखला
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जब स्त्री और पुरुष की दैहिक मानसिक संरचना एक सी नहीं है तब हम प्रारंभ
से ही स्त्री विशेषाधिकार पक्षधर है जहाँ मातृत्व की बात है ।
किंतु जहाँ लङकी के स्वतंत्र और आधुनिक होने की बात है वहाँ स्वतंत्रता
सापेक्ष ही हो सकती है एकदम निरपेक्ष स्वतंत्रता का अर्थ तो उच्श्रंखलता
ही है जो स्वेच्छाचार ही कहकर निंदित होता आया है ।
सवाल है किस से आज़ादी??
दमन से शोषण से मारपीट से और छेङछाङ बलात्कार यौन शोषण से और बेटी होने
पर पालन पोषण में भेदभाव से तानों घरेलू हिंसा से खाने पहनने पर अनावश्यक
रोक टोक से । पढ़ने लिखने पर प्रतिबंध लगाने से ।

ये सब बाते गलत है और इनके सापेक्ष चयन की स्वाधीनता स्त्री हो या पुरुष
सबको होनी चाहिये ।

किंतु समाज लङकी से ऊँचे चरित्र की उम्मीद करता है तो ग़लती नहीं करता ।
क्योंकि उम्मीद तो उत्तम चरित्र की पुरुष से भी की जाती है ।
और कतई भी प्रचलित होने पर भी शास्त्रीय रूप से ऐसी हरकतें ना पुरुषों की
प्रसंशनीय हैं ना स्त्रियों की ।

कथाकथित आधुनिकता का जिसे नाम दिया जाकर मनमानी करने की जो होङ लगी हुयी
है वह समान रूप से स्त्री पुरुष दोनों के लिये घातक है।

स्त्री निभा सकती है कठोर से कठोर आत्मानुशासन बशर्ते सही संसकार हो ।
पुरुष के लिये छोटे छोटे नियम संयम भी भारी पङते हैं ।
वजह है सदियों की परिपाटी ।

आज बात नशे की

नशा कभी किसी के लिये ठीक नहीं ।
नशे में लोगों की जेबें कट जाती है तमाम भयानक एक्सीडेंट नशे की वजह से
होते हैं । अच्छा खासा व्यक्ति नशे में हत्यारा बनकर जेल पहुँच जाता है ।

किंतु यहाँ भेद है
स्त्री के नशा करने पर
स्त्री की शारीरिक संरचना नशा झेलने के लिये तनिक भी मुफीद माफिक नहीं ।
माँ बनने के दौरान दूध पिलाने के दौरान या अकेली व्यक्ति होने पर भी।

फिर भी मान लो कि अनिवार्य इच्छा है तो भी सामाजिक ताना बाना ही स्त्री
के नशे के माफिक नहीं ।

आप क्राईम रिकॉर्ड उठाईये
अमूमन हर तीसरा चौथा यौन अपराध जिस स्त्री पर हुआ पुरुष वहाँ नशे में रहा था ।
शराब पीने के बाद कई अच्छे भले दिमाग़ बेक़ाबू हो गये और मारपीट हत्या
बलात्कार कर बैठे ।

होता क्या है कि हर इंसान की दमित इच्छायें नशे में बाहर उबलने लगती है ।
मसलन दबा कुचला दिनभर मार डाँट गाली खाता इंसान घर आकर दारू पीकर गाली
गलोच मारपीट कमजोर बीबी बच्चों पर ज़ुल्म ढाकर खुद की भङास निकालता है कि
वह भी किसी पर भारी है ।

लोग जो शराब पीकर रोते है नाचते है गाते वे अकसर हर वक्त नपा तुला बोलने
वाले अनुशासित लोग होते हैं ।

इनमें ही सबसे खतरनाक प्राणी है यौनइच्छायें दबाये रखने वाला व्यक्ति जो
नशा तारी होने पर स्त्री की तरफ लपकता नजर आयेगा चाहे वह किसी उमर की हो
जबरदस्त मिठास और अपनेपन के साथ खुलेपन आधुनिकता उदारता की वकालत करता
हुआ ।

सावधान स्त्री को ही पहना पङता है और रहना ही चाहिये ।
अनुभवी लोग यूँ ही नहीं कहते कि जहाँ पिता या पुत्र भी शराब पी रहे हो
वहाँ तक नहीं जाना चाहिये स्त्री को एकांत में तो कतई नहीं ।

शराब स्त्री खुद पी ले यह तो सरासर भयानक वजह है शैतान को जगाने की ।
स्त्री का संरक्षक कोई साथ जब नहीं तब तो उसको बाहर कुछ खाना पीना तक
नहीं चाहिये शराब पीना तो दूर की बात है ।
आज तक हजारो गुनाह ऐसे सामने आ चुके हैं जब लङकी को शरबत कोल्ड ड्रिंक या
खाने में नशे की दवा या जहरीला पदार्थ देकर यौन शोषण किया गया ।
ये सरासर स्त्री की ही ग़लती है । एक कहावत है आ बैल मुझे मार । स्त्री
किसी भी घनिष्ठ से घनिष्ठ संबंधी मित्र परिचित या बॉस सहकर्मी के साथ ही
क्यों न हो ।

पति से अलावा किसी भी प्राणी के साथ । अपने खुद के घर के अलावा किसी भी जगह पर ।

कुछ भी नशा करती है या शाम के बाद रूकती है वह खुद ही न्यौता देती है मुसीबत को ।

हो सकता है हालात के कारण पति से अलावा अन्य व्यक्तियों के साथ घर से दूर
और शाम के बाद रुकना भी पङे ।

तब एक ही बात है कि होश में रहो ।
चाक चौबन्द और चौकन्नी रहो । जिस्म पर मजबूत कपङे हों जेबों में चाकू
हथियार और आत्मरक्षा की तकनीकी चीजें मोबाईल ऑन और कमरा भीङ वाली जगह पर
हो ।

रात को घोङे बेचकर बिलकुल नहीं सोना ।

बङी पुरानी औरतों की सीख है कि ज़नानी की नींद तो ऐसी होनी चाहिये कि
बिल्ली भी सिरहाने रखा दूध ना पी जाये ।

इससे कई मुद्दे जुङे हैं हमारी एक कजिन भाभी की महीने भर की बेटी रो रो
कर ठंड से मर गयी क्योंकि माँ रजाई खींचकर नींद में घोङे बेचकर सो गयी।
और एक दादी फुआ ने चोर पटककर मारे बाँध लिये क्योंकि दीवार पर आहट होते
ही चौकन्नी होकर टूट पङीं ।

हम सबके पास ऐसे हजारों अनुभव होगे । श्वान निद्रा वाली लङकी ही सबसे
अधिक ठीक है ।

इसी पर नशा करके पराये परिसर में ठहरना तो साक्षात महाभूल है ।
नशा कभी स्त्री के पक्ष में नहीं चाहे वह खुद स्त्री ने किया हो । या
पुरुष ने किया हो।
नशा की एक मात्रा बदलते ही वह नाश हो जाता है।
औरत के साथ नशा जुङते ही सर्वनाश हो जाता है ।
सरासर वह स्त्री बराबर की दोषी होती है जो दूसरों के उकसाने पर या
स्वेच्छा से नशा करती है और बाद में कोई छेङछाङ या शोषण हो जाने पर शिकवे
करती है ।
इसका ये कतई मतलब ना निकाला जाये कि नशा करने वाली स्त्री का शोषण करना
जायज बात है । बल्कि हम सब आधुनिक लङकियों को समझाना चाहते है कि दिमाग
चौकन्ना रखो। क्योंकि चौकन्ना दिमाग होने पर भी हर तरफ खतरा है जैसे
जंगल जाते समय जरूरी नही हर पगडंडी पर साँप हो ।
किंतु घुटनो तक के गमबूट पहनना सावधानी है और टॉर्च लाठी हथियार साथी
लेतर चलना विवेकशीलता ।

रात में जंगल ना जाना जीनियस नेस
तो स्त्रियों के लिये ये समाज घर के बाहर किसी घने जंगल से कम नहीं
सावधान तो रहना ही चाहिये ।
घर के भीतर भी नाली दरवाजे खिङकी चौकस ठीक होने पर भी चौकन्ना रहना ही ठीक है ।
दिमाग पर से नियंत्रण एक पल के लिये भी खोना किसी भी वजह से हर किसी के
लिये खतरनाक है ।
नशा स्त्री के लिये हजारगुना विनाशक है ये कोई आधुनिकता नही बङी प्राचीन
भयानक बर्बर रूढ़ि है दैत्यकाल की निशानी जिसकी मनीषियों ने सदैव निंदा
की है ।
©®सुधा राजे

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