Saturday, 21 December 2013

हम और समाज

भारत में विगत एक दशक से जो खाईयाँ खोदी जा रहीं थीं उनका विकराल रूप अब
सामने दिख रहा है ।

एक स्त्री राजनयिक की एक आरोप के बाद विदेश में गहन तलाशी होती है और
सरकार विऱोध दर्ज कराती है ।
लेकिन
इसी बीच यू पी की एक नेता का बयान आ जाता है कि """क्योंकि वह अमुक जाति
वर्ग से है ""इसलिये सरकार मदद नहीं कर रही!!!!!!!!

जिस सरकार की लोकसभा स्पीकर से विभिन्न विभागो के मुखिया तमाम बङे पदों पर है!!!!!!

एक पत्रिका के संपादक हमारे एक स्टेट्स पर लगभग बौखलायी टिप्पणी करने
लगते है क्योंकि आप की जाति अमुक है तो आपको अहंकार है और सरनेम क्यों
लगाती है अगर जाति नहीं मानतीं

जबकि उनके खुद के नाम के आगे किसी समय दूसरी जाति के लिये लगा सरनेम ठाठ
से लगा मिलता है

अभी एक महिला का बयान पङा कि धमकाना और गरियाना जाति और वर्ग के अहंकार
की देन है जो किसी दबे कुचले वर्ग का व्यक्ति नहीं कर सकता ।

उनके बयान पर एक महोदय ने लिख मारा कि इस स्टेटस के कितने दाम मिले?
और अब उस को महिला अपमान दाम वगैरह सवालो की झङी से सजा दिया गया ।

जबकि
अनुभवी जन जानते है कि कहावत है ""गरीबी का भी एक घमंड होता है ।

बहुत विज्ञ कवि लिख गये
हम अनिकेतन हम तो रमते राम हमारा क्या घर क्या दर कैसा वेतन
!!!!!
कभी पाला पङा हो तो राजस्थान की सांटिनों से जो बाई पास पर गाङी के भीतर
हाथ ठूँसकर सामने अङी रहती है आप न शीशा बंद कर सकते है न चल सकते है ।
कभी
किन्नरो का हठ याद करे कि अगर पच्चीस सौ माँगे है तो दो हजार पर बात नही
बनेगी धमकी देने को सबके सामने धोती खोलके नग्न बैठ जायेगे बद्दुआ देते
विवश व्यक्ति मुँहमाँगा देकर ही जान छुङायेगा ।
कभी
सङक पर मामूली सा रगङ खा गया हो कोई झुग्गी वासी आपकी बाईक या कार से

रोड जाम और हंगामा अकेले पङ गये तो पिटाई भी और मुआवजा मरहम पट्टी मोटी रकम ।

कभी विवाद हो गया हो किसी से किसी मसले पर

और
धमकी तत्काल एफ आई आर कि अमुक शब्द कहे जाति सूचक

जबकि नहीं कहे!!!

किसी बङे खिलाङी अभिनेता पर जाँच आयी कोई पब्लिक विरोध ओहुई
लगा दिया नारा कि अमुक खास मजहब का होने के नाते ये भेदभाव किया जा रहा है ।
तब वह भुला देता है कि धूल से उठाकर सिर पर इसी पब्लिक ने बिठाया ।

एक जाति दूसरी जाति को नफऱत का निशाना बनाकर लगातार प्रतिशोध की भावना से
बाते कर रही है ।

एक मजहब दूसरे मजहब के लोगो की लगातार घृणा की चरम सीमा तक बयान बाजी
पूज्य नायको को गाली गलोज परस्पर माता बहिनों बेटियों को गाली गलौज परौस
रहा है

एक कुरीति रूढ़ि और दुष्ट परंपरा रोकने समाज सुधारने की बात जब एक
व्यक्ति उठाता है तत्काल या तो जाति या तो मजहब या तो स्त्री वादू
पुरुषवादी होने का आक्रोशित घृणास्पद बयान कमेंट टीका टिप्पणी और तमाम
मध्ययुगीन बरबर परंपराओं को कायम रखने की बहुलवादी वकालत शुरू हो जाती है

एक दल का व्यक्ति होते ही वह विपक्षी दल के पुत्र माता और देवरानी जेठानी
बहिन भाई तक के लिये घोर निंदा वैमनस्य का पात्र बना दिया जाता है ।

एक लिंगभेद
एक जाति भेद
एक भाषावाद
एक इलाकावाद
एकवर्ण भेद
एक भाषा भेद
एक रंगभेद
एक आर्थिक स्थिति भेद
एक नगर गाँव का भेद
एक व्यवसाय भेद
पद दल सत्ता और विपक्ष का भेद

सब
लङ रहे है
!!!!!!!!!!!!!
एक दूसरे को काट खाने मार डालने विवश करके मरने पर मजबूर करने घर परिवार
देश रोजी छोङकर जाने को आक्रामक है!!!!!

एक ऊँचे पर एक बैठा व्यक्ति केवल अपनी जाति अपने मजहब को लाभ देने के
लिये बाकी सब जायज निवेदन ठुकराता रहता है ।

एक अजीब सा जहर

स्त्री पुरुष के बीच जीने और गुलाम बनाये रखने की लङाई ।

अमीर गरीब के बीच प्रतिशोध की दाह ।

सामान्य और आरक्षित जातियों के बीच समानता लागू करने और विशेष सुविधा
पाने की मुहिम


कहीं कोई स्त्री का पुरुष मित्र नहीं न
कही दो मजहबों में प्यार विश्वास नहीं ।
कही दो प्रांतो के लोगों की एकीकरण की गुंज़ाईश नहीं । पहाङी मैदानी
तेलगू तमिल कश्मीरी लद्दाखी

क्या बस अब यही रूप बचा है समाज का????

एक सुर से सब चीखे दूसरे को मारो मारो मारो!!!!!!!

जब तक समाज सुविधा दे रहा मान दे रहा ठीक!!!!
जैसे ही कोई कष्ट हुआ जाति मजहब पार्टी और लिंग भाषा की पहचान का हो हल्ला!!!!
कोई है जो कहे कि एक संतुलन बनाओ रे!!!!!!!!!!
जीने दो और जी लो रे!!!
अब कल अगर हमारे लेख ना छपे तो???
खोजूँ कि कहीं संपादक मंडल हमारी बिरादरी से नफरत करने वाली बिरादरी या
मजहब या पुरुषवाद का या हमारे प्रांत से नफरत करने वाला तो नहीं ।
हम सब घर के भीतर लङ रहे हे बाहर बस ट्रेन में लङ रहे है
नेट पर और दफतर में लङ रहे है
सीमा पर और हर जगह जहाँ मौका है नफरत फैला रहे है ।
कितनी और नफरत चाहिये कि ये सारा हिरोशिमा बन जाये भावनाओं का
कब्रिस्तान!!!!! संवेदना सहानुभूति का श्मशान नागासाकी हो जाये???
©®सुधा राजे

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