Thursday, 19 December 2013

स्त्री और समाज

सदियाँ बीत गयीं ।
स्त्री को जलाते कभी हाथ नहीं कांपे???????

घर से निकालते कभी आत्मा ने नहीं धिक्कारा?????????

बात बात पर एक लङकी के बदले ""औरतें ""
""महिलाये""
कहके पूरी स्त्री कौम को प्रश्न चिह्न पर रखते!!!!!!!!

सदियाँ बीती

एक स्त्री के ग़लत साबित होने पर समूची स्त्री कौम को ""सकल ताङना के
अधिकारी का फतवा जारी करते?????

कभी
किसी ने सवाल उठाया सुहागरात पर शादी के पहले के पुरुष संबंध

मगर किसी पुरुष से कभी नहीं पूछ सकी स्त्री सुहागरात पर पहले के नारी संबंध!!!!!

छत खिङकी दरवाज़ों पर परदे लगाकर फिर सिर से पाँव तक थान में लपेटकर फिर
पहरे बिठाकर भी ।

हर स्त्री को हर देनी पङती रही चरित्र की परीक्षा ।

कैसा समाज!!!!!

कोई नहीं बिलबिलाता जब

नाली में पङी कन्या की लाश सङकर कीङे और आवारा पशु नोंच खाते हैं कहीं
बहस मुबाहिसे नहीं चलते जब कुलटा कहकर मायके बिठा दी जाती है स्त्री और
खरीदकर दूसरी गुलाम रख ली जाती है!!!!

माँ
को गुर्राकर कपङे धोने खाना बनाने और घर की सेवा को


बहिन को दुत्कारना बात बात पर दहेज और पराये घर के ताने मारना और सेवा के
घरेलू कामों पर लगाना

बीबी को??
आधा बिस्तर दो जून भोजन और साल में चार जोङी कपङे के बदले बंधुआ मजदूर
बिना छुट्टी के रखना???

जरा सी गलती की पीट दिया??
औऱ बात बात पर तलाक की धमकी?? घर से निकालने की धमकी??

कितनी औऱतें फाँसी लगाकर मरतीं रहीं
कितनी जलकर मरीं
कितनी जहर खाकर मरीं
कितनों ने कुँआ नदी रेलसे कटकर जान दे दी

वजह?
आबरूरेजी
मारपीट
घऱसे निकालना
लङकी पैदा होना
बाँझपन
चरित्रपर शक
दहेज के उत्पीङन
पति की रंगीनमिज़ाजी।
प्रेम की मनाही
प्रेम में कपट
मिथ्या लांछन

कितनी मार डालीं गयीं ।
मर रहीं हैं आज भी
एक महीने की बच्ची से लेकर सत्तर साल की वृद्धा तक पर हिंसक बलात्कार!!!

गैंग रेप!!!

कितनी स्त्रियाँ रेप करके मार डाली गयीं

कितनी
खुद रेप के बाद मर गयीं या पागल हो गयीं या गुमशुदा लाश हो गयीं

क्या

अब भी लङकी सुरक्षित है?

कहाँ??

किस उम्र की??


बङा कोहराम मचाया जा रहा है ।

कि अब तो महिलायें खुश होंगी

कठोर कानून जो आ गया

क्या

यही व्यंग्य करने वाले अपनी बहिन बेटी पोती
की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त हैं?
अगर नहीं
तो बजाय क़ानून को कोसने के

क्यों नहीं "

"औरतों को ज़ीने दो ""

की मुहिम चलायी जाती? मुँह चलाकर एक दो अपवाद महिलाओं को बहाना बनाकर
सारी मध्युगीन बर्बर कुप्रथा के समर्थक कानून को समझते और समझाते क्यों
नहीं?

क्यों नहीं समझाते लङको को मित्तों को पुरुषों को पुरुष कि अब भूल जायें
दारू शारू पीर्टी शार्टी लङकियाँ वङकियाँ मस्ती वस्ती हाँ?????

चलो जरा गर्ल्स कॉलेज लेडीज हॉस्टल मार्केट मेला होटल लङकी देखेंगे
पटायेगे छेङेगे मौका लगा तो मौज करेगे???

ये अमूमन पाँचवे छटे की मानसिकता क्यों नहीं बदलनी चाहिये???

घर की बेटी को समय की ताक़ीद करते क्यों नहीं बेटे को भी क़ानून बताया
जाये कि बेटा भूल कर भी लङकी को मत छेङना वरना सारी जिंदगी जेल काटनी
पङेगी!!!

लोगो को बदलना होगा

लङकी कोई भी हो असिस्टेंट या सेक्रेटरी नौकरानी सहकर्मी या छात्रा
कामवाली बाई शिष्या फैन या मित्र

छूने और दैहिक संबंध बनाने की वस्तु नहीं ।
इसके लिये समाज ने विवाह नामक संस्था बनायी है ।
वहाँ पत्नी को हक दें और अपने रिश्ते वफादारी से निभायें ।

क्यों लोग चाहते है कि विवाह ना करना पङे उस स्त्री से भी लावच धमकी धोखा
या छल बल ताकत ब्लैक मेलिंग किसी प्रकार दैहिक रिश्ता बनाने भर को मौका
मिल जाये

हैरान करने वाले आँकङे है कि लङकियाँ जिन पर रेप होता आया है अकसर उस
पुरुष पर पूरा भरोसा करतीं थी और अथवा बहुत नादान नन्हीं बच्ची थी ।
ये लङकियाँ

क्या इसलिये संसार में पैदा करते पालते पोसते है माँ बाप कि किसी
हवस के भूखे तमपिशाच को दैहिक भूख शांत करने को जब जब वासना की भङक लगे
वह आस पास जो भी जिस भी उमर की लङकी मिले जैसे भी मिले दबोच ले????

सब पुरुष बलात्कारी नहीं होते

कतई नहीं होते सब पुरुष बलात्कारी

किंतु सब बलात्कारी पुरुष ही होते है

चाहे वे स्त्री का बलात्कार करने वाले हो
चाहे लङको का कुकर्म बलात्कार करने वाले हो

बङी संख्या में पुरुष वेश्यावृत्ति भी पुरुषों की देन है और भारत जैसे
80%ग्रामीण देश में स्त्रियाँ पुरुष की रखैल हो सकतीं है प्रेमिका भी और
खरीदी हुयी या विवाहिता बीबी भी बहुत नगण्य मामलो में लिव इन रिलेशनशिप
भी हो सकती है और आपसी सहमति से बने अवैध अनैतिक रिश्ते भी हो सकते हैं
कि गिने चुने दो चार महानगरों की महाधनवान स्त्रियों को छोङकर पुरुष
वेश्या स्त्री समाज में एक अकल्पनीय बात है । रेयरेस्ट ऑफ रेयर है ये हो
सकता है दबे छिपे रूप में यूरोप और पश्चिमी देशों की तमाम देन के साथ
भारत तक आ गयी हो ।

किंतु आज भी बारह घंटे किचिन बच्चे और पति ससुराल के बीच खटती औरत को पति
पर ही निर्भर रहना है चाहे मार डाले चाहे प्रेम करे ।

और बङी संख्या में वेश्यायें गाँव कसबों और वनों तक बनायीं बेची खरीदी जाती हैं

ये लङकियाँ कौन है??

ये वे लङकियाँ है जो दुनियाँ भर से बचपन में ही चुरा ली जाती है और यौन
अत्याचार दैहिक मारपीट मानसिक प्रताङना और ब्रेनवाश करके नाचने गाने और
शरीर बेचने को तैयार कर दीं जातीं हैं ।
वेश्या की बेटी वेश्या और फिर वेश्या का बेटा भी वेश्या

समाज कभी
इस प्रथा को खत्म करने के बारे में सोचना ही नहीं चाहता!!!

अगली बार किसकी बेटी चुरायी जायेगी??

और क्या कभी एक वेश्या बन चुकी लङकी को दुबारा समाज स्वीकार कर पाया
मुख्य धारा में?

कितने लोग है जो कम उम्र में वेश्या बना दी गयी लङकी को घर की बहू बनाकर
रखने पर भी उसको मानवोचित प्यार पोषण मान सम्मान देने को राजी हैं?
शायद ही कोई हो??
लेकिन
धंधे वाली लङकियों का नाच देखने मुजरा सुनने और जेब में पैसा हो तो साथ
में रात बिताने वालो की संख्या लाखों में हैं!!!!!

बहाना?
शरीर की जरूरत!!!!!
जैसे नींद भूख प्यास कपङे वैसे स्त्री!!!!!

लेकिन इससे प्रकृति कहाँ सहमत है??

पशुओं के वेश्यालय कहाँ है?
जोङे ही होते हैं ।
और उनका समय भी निर्धीरित है ।
इंसान पशु से गया बीता है स्त्री के मामले में!!!!
स्त्रियों के लिये दीवारें परदे कैद नियम संहितायें और विधि विधान अगर
अपवित्र हुयी तो बहिष्कार!!!

और
पुरुष के लिये पब शराबखाने नाचघर जुआघर कोठे और नृत्यशालायें

वहाँ वे औरतें किस किस रास्ते से पहुँचती है एक एक कहानी अलग ही दास्तान ।
ना रहेगा बाज़ार
ना रहेगा खरीददार
तो नहीं चुरायी जायेगी किसी की पोती दुहिता बेटी और नहीं बनायी जायेगी वेश्या ।
नियम कुदरत का है ठीक बालिग होने तक संयम से रहो और मनुष्य होने की कुछ
सीमा है कि जोङा बनाओ विवाह करो स्त्री और बच्चे की जिम्मेदारी उठाओ ।
एक तलाक हो गया तो अपनी पसंद की दूसरी शादी कर लो ।
इतने पर भी अगर विवाह नहीं हो पाता है तो लिव इन रिलेशन की राजी सहमति की
जोङी का ऑप्शन भी है ।

किंतु
किसी भी हालत में किसी को भी विवाह करने का झाँसा देकर ।
बल छल या नशा देकर या किसी धोखा करके लिये गये फोटो वीडियो आदि या परिजन
की मौत आदि की बरबादी की धमकी देकर नौकरी रोजगार की धमकी देकर । जबरदस्ती
या धमकी और धोखे से हासिल की गयी सहमति पर
कोई भी
दैहिक संबंध बनाने का कृत्य करने का हक़ नहीं है ।
लङकी चरित्रवान थी या बदचलन एक ही की वफादार थी या कई बॉयफ्रैंड थे
ऐसे घटिया और सारहीन आरोप कोई मायने नहीं रखते ।
समाज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है ।
बङी संख्या उनकी है जो परंपरावादी रूढ़िगत स्त्री गुलामों के आदी है ।
और बची खुची संख्या में बङी संख्या उनकी है जो पुरूषवादी अहंकारिक
श्रेष्ठतावाद से ग्रस्त होकर यह सोचते हैं कि चाहे लाखों लङकियों का
मासूम बचपन और यौवन रेप होता रहे पूरी उमर सावधानी से बिता चुकी स्त्री
का रेप भले ही होता रहे बङी बात नहीं किंतु ।
किसी पुरुष को रेप और यौन शोषण कपट संबंध पर कोई बङी और घातक सजा नहीं
होनी चाहिये ।
पुरुष के हत्यारे को फाँसी? और स्त्री के अस्तित्व की हत्या धोखे या बल
कपट छल से करने वाले को केवल कुछ साल की मामूली कैद?
और अगर वह स्त्री का पङौसी परिजन या करीबी सहकर्मी और आसपास बार बार
दिखने मिलने वाला व्यक्ति है तब?
जेल से छूटकर निकला वह व्यक्ति किस कदर दहशत में रख सकता है स्त्री और
उसके परिवार को सोचकर ही थर्रा जाये स्त्री ।
हजारों औरतें हर साल सुसाईड कर लेती है आत्मग्लानि से जब अपनी आबरू खो देती हैं ।
यहाँ तक कि बहुत मॉडर्न कही समझी जाने वाली लङकियाँ तक पूरी जिंदग़ी तमाम
तरह की मानसिक शारीरिक जटिलताओं की शिकार हो जाती है तमाम रोगिणी
पागलखाने तक पहुँच जाती हैं ।

क्यों नहीं रुकना चाहिये तब समाज में स्त्री पर यौन शोषण औऱ बलात्कार और
कपट छल भय ब्लैकमेल से बनाये गये दैहिक संबंध!!!!!

क्यों नहीं डरना चाहिये
औऱत
पर बलात्कार की सोचने तक से किसी अपराधमनःस्थिति वाले व्यक्ति को?

क्यों नहीं डरना चाहिये छेङछाङ फिकरेबाज़ी तेज़ाबी हमले कन्या हत्या औऱ
स्त्री के अश्लील चित्र खीचने वाले को स्त्री का पीछा करने वाले को
स्त्री को नशा देकर दैहिक संबंध बनाने वाले को??
क्यों नहीं डरना चाहिये

हर उस अपराध मनःस्थिति में आये वासना के भूखे पिशाच को जो अपने क्षणिक
आवेग और दैहिक भूख को शांत करने भर के केवल एक खुराक को किसी की बेटी
बीबी बहिन पोती भाभी बुआ मौसी का जीवन चरित्र शरीर आबरू नाम कैरियर पहचान
अरमान और परिवार भस्म करने पर तुल जाते है ।

जैसे वह एक थाली भोजन से सिवा कुछ नहीं कोई भी वहशी जानवर फाङकर खा ले??
कोई भी नशा देकर या झूठा प्रेम प्यार विवाह का झाँसा देकर बहका कर भोग ले ।
कोई भी अबोध मन की अज्ञानता उत्सुकता में शारीरिक भावना जगाकर शोषण कर ले

और
पीछे छोङ दे गंदे निशान
मौत के पंजे
बदनाम बरबाद परिवार
उजङा सुहाग
लुटी जिंदगी
चूर चूर सपने अरमान
मर चुकी जीने की इच्छा ।

कोई आदमी किसी पर आरोप लगे तो पहले बङे चाव से बताता था दोस्तों में
ढिठाई से कि उसके संबंध कितनी कितनी लङकियों से रहे ।
और कितनी कितनी उसकी लिस्ट में हैं ।
आज इस चलन को रोकने की जरूरत है ।
अब एक इंसान एक वक्त में एक ही इंसान का जोङी दार रह सकता है यही सभ्यता
का तकाजा है ।

और इतने पर भी कन्या हत्या नहीं रूकी तो वह दिन दूर नहीं जब केवल
पूँजीपतियों की शादी हो सकेगी बाकी लोग केवल वेश्यालय ही जाकर बारी बारी
से अपने अरमान पूरे करेगे वह भी केवल कमाने खाने वाले लोग जो ऊँची कीमतें
अदा कर सकेंगे ।

लोग जब लङकियाँ मारते रहेगे औऱ लङकियाँ तब भी हर जगह असुरक्षित रहेगी और
अगर सुरक्षा के लिये कानून लागू होंगे तो लोग पुरुषवादी सोच के बरबरयुगीन
दासी प्रथा को कायम रखना चाहेगे तब तो

लङकियाँ प्रकृति भी ग़ायब कर देगी
और चीते टाईगर की तरह लङकी संरक्षित प्राणी घोषित हो जायेगी
©सुधा राजे

No comments:

Post a Comment