Monday, 16 December 2013

स्त्री और समाज -8-

Sudha Raje
हम औरतें
जब अपने अपने हक़ की बात
करतीं हैं अपनी रक्षा की बात
करती है अपने दुखों से
मुक्ति की बात करती है तो कई
कई दिलों में भट्टी दहक उठती है
जमा जमाया सत्तावाद जब
डोलता नज़र आता है तो दम
निकलने लगता है अर्थात्?????
हम स्त्रियों के दुख पुरूषों के
सुखों को खत्म या कम करने
की कीमत पर पूरे होने वाले होते
हैं
और हमें खतरा दुख बंधन
अहंकारी पुरूषवाद ने दिया??
प्राचीन काल प्राचीन काल
चीखने वाले पोंगापंथी और उनसे
भयभीत उनकी नजर में खुद
को महान् सती सावित्री साबित
करने को लालायित ब्रेन वॉश्ड
स्त्रियाँ कभी शायद
ही सोचती हों कि वे
अपनी बेटियों के लिये
कैसी दुनियाँ छोङकर मरने वाले हैं
एक आम मजदूर वनवासी औरत तक
का सतीत्व डिगाने
को जहाँ भगवान कामबाण चलाकर
थक जायें वह प्रभावित ना हो और
पति की शैया पर
वेश्या की भाँति सुख दे ये
पैमाना है सती का और खुद
सती नाम की देवा का त्याग
आत्मदाह ये प्रमाणित कर चुका है
कि वह डिग गयीं उन नियमों से
जो बहुभोगी पुरूष ने उनके लिये
बनाये???
जिन नारियों का उदाहरण
दिया गया वे सवाल छोङकर दुख
भोगकर मरी और शाप
देती रहीं उन दुखों के लिये सवाल
उठाये विरोध किये और
विवशता की शिकायत की जब
कि वे राजकुमारियाँ थी और
कर्तव्य पर मिटी आज भी एक
मामूली स्त्री से
अनेक पुरूषों के
कामबाणों की कुंठा झेलते हुये तन
मन और हाँ धन से भी सिर्फ
पति की ही होने की उम्मीद
की जाती है ये अलग बात है कि वे
कुछ बगावत कर लें लेकिन फ्रेम में
काटकर लगाने की पूरी कोशिश
जी जान से लेकर आधा विश्व
करता तो रहता है इनकी कलम
औरतों पर मजाक औऱतो पर औऱ
षडयंत्र किसी भी तरह नकाब में
बाँघकर आधी दुनियाँ दीवारों में
औऱ अपने बिस्तर रसोई में बाँधने
को रहता है
बर्दाश्त करना पङता है मगर मन
तो नहीं हाँ फिर जो बाहर
भी मिलें तो वे सबके लिये उपलब्ध
हों
think
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Sudha Raje
Mar 7 ·

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