Thursday, 17 December 2015

सुधा राजे की कहानी :- अम्मा की कूटी हुईं मिर्चें.



​​


अम्माँ की कूटी हुयी मिरचें।
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• अम्माँ!  बस आ गयी मुझसे और नहीं पिया जा रहा बस्स दूध।.इतना सारा दलिया औऱ परांठा भी खा लिया अब तो ख़ुश???

कहते हुये तेजस्वी ने माँ के गाल पर एक चुंबन जङ दिया औऱ बस्ता बोतल टिफिन सँभालती भागी ।

दीदी!!  जल्दी चल

यदु" को धकेला उसने ।

रूक!  तो अम्माँ की दवाई तो दे दूँ नहीं तो ये नहीं खाने वाली ।"
यदु ने गोली अम्माँ के हाथ पर रखी पानी का गिलास दिया और गले से झूल गयी ।

यदु और मैं यानि तेज दोनों बहिनें पंद्रह किलोमीटर दूर दूसरे बङे कस्बे में पढ़ने जाती हैं ।

स्कूल बस रोज़ एक फर्लांग दूर हाईवे पर आकर रूकती । पहले अम्माँ खुद उंगली पकङ कर दोनों को बस तक बिठाने आतीं थीं । अब मैं  चौथी कक्षा में यदु सातवीं कक्षा में पढ़तीं है ।

यदु चुप रहती है हमेशा माँ की तरह । मैं  बोलती रहती हूँ हर समय बापू  और बाबा की तरह ।

अम्माँ दिन भर काम करतीं रहतीं हैं । सुबह चार बजे से देर रात तक । अम्माँ कब सोतीं हैं?
कभी कभी हम दोनों बातें करतीं । घर में गाय है भैंस है बूढे बाबा जी हैं । हर महीने दो चार नाते रिश्ते दार आ धमकते हैं । अक्सर पास के शहर वाली बुआयें जो हर छुट्टी में पिकनिक मनाने आ जातीं हैं । बुआओं का आना हम दोनों बहिनों को ज़रा भी पसंद नहीं । क्योंकि वे हर वक्त शोर शराबा मचाये रहतीं हैं । माँ हर वक्त उन दिनों किचिन में घुसी रहतीं हैं । जब बुआयें पास के बाग बगीचे और लोगों से मिलने चलीं जातीं माँ उन सबके कपङे धोती घर साफ करतीं । बाबा रात दिन नयी नयी डिशेज फरमाईश करके बनवाते और माँ उनके जाते ही कई दिन बीमार पङ जातीं । हर दिन दर्द की गोली खाती माँ । बुआ तो मटर तक नहीं छिलवातीं । माँ तब मदद को गिङगिङातीं और यदु दीदी माँ का हर काम करवाती हैं । मुझे बुआओं की हर वक्त आलोचना पसंद नहीं जो वे माँ के हर काम पर बतियातीं हैं । माँ ज़वाब क्यों नहीं देतीं?  बुआयें तो हम दोनों को भी उन दिनों नौकर ही बनाके दौङातीं रहतीं हैं चाहे एक्जाम ही क्यों न हों । दीदी तो कर देतीं हैं हर काम ख़ामोश से। मग़र मैं टोक देतीं हूँ "बुआ जी दीदी को पढ़ने दो "।
बुआयें मुझे छोटी मिर्ची कहती औऱ खिसिया जातीं । उनके बच्चे दो दो ज़गह ट्यूशन करके भी जैसे तैसे पास होते हैं और वे शहर में रहतीं हैं जहाँ काम वाली बाईयाँ सारे काम करतीं हैं । मशीनों और बिजली से काम होता है । रेडीमेड चीजें खरीदतीं हैं । ब्रेड मैगी पिज्जा बर्गर टोस्ट बिस्किट का नाश्ता करते हैं उनके बच्चे । डेयरी से दूध पनीर दही आता है । बुआ ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं मगर हर हफ्ते ब्यूटी पारलर जातीं हैं । वीक एंड पर सिनेमा और होटल में डिनर करतीं हैं परिवार का खाना भी फूफाजी की मदद से बनता है । अक्सर बाहर से खाकर आते हैं । कपङे लॉण्ड्री में धुलते है या वाशिंग मशीन पर । सबमर्सिबल का पानी हर वक्त हर कमरे में टैप खोलते ही मिल जाता है ।

माँ तो बगीचे के हैंडपंप से पानी भरती हैं । डीजल इंजन से कुट्टी काटतीं हैं । बरतन झाङू पोंछा और चूल्हे पर खाना पकाना हाथ से कपङे धोना सिलबट्टे से मसाला पीसना । हाथ की चक्की से दालें दलना दलिया बनाना । हम दोनों बहिनों को सुबह शाम पढ़ाना । कोयले बचाकर बापू के कपङे लोहे की प्रेस से इस्तिरी करना । रोज लालटेनें साफ करना । माँ ने बगीचे में कई सारी सब्ज़ियाँ लगा रखीं हैं । आसपास की लङकियों को रोज शाम ट्यूशन भी पढ़ातीं हैं । सिलाई करके हमारे कपङे तैयार करतीं हैं ।

माँ फिर भी कभी नहीं रुकतीं । हर रोज नया नाश्ता हमारे टिफिन में होता है । माँ इतनी चुप चुप क्यों रहतीं हैं । सिस्टर जब भी कोई प्रोजेक्ट देतीं माँ तैयार करातीं हैं । क्लास में दीदी सबसे ज्यादा नंबर लाती है। माँ स्किट लिख कर देतीं तो सिस्टर दंग रह जाती पूछतीं "किसने लिखी?
मैं कहती माँ ने तो वे कुछ सोचने लग जातीं ।
कोई काम ऐसा भी है जो माँ को ना आता हो???
कभी जब मैं दीदी से पूछती तो वो झिङक देती है । कहती है पढ़ो । मुझे खेलना पसंद है और माँ शतरंज कैरम लूडो बेडमिंटन सब खेल लेतीं हैं ।
माँ कभी मेक अप नहीं करतीं बुआ की तरह । पर जब भी कहीं शादी या पार्टी में जातीं हैं सब माँ को घूर घूर कर देखते हैं । माँ कितनी सुंदर लगतीं हैं ।
माँ जाने क्या क्या लिखती रहतीं हैं । एक अलमारी में लिख लिख कर बंद कर देती हैं ।
मेरे सारे स्वेटर बुआ डिजायन उतारती रहतीं हैं जब समझ नहीं आता तो माँ से कहतीं हैं ये तो आउट ऑफ फैशन हो गया दुल्हन!!
बुआ को क्या पता । शहर में बापू के बङे बङे दोस्तों की पार्टी में जब हम दोनों बहिनें वही कपङे पहिन कर जाते हैं तो वो सब कहते है"" वाओ मास्टर आर्ट!!! माँ ने ताऊ जी की बेटी की शादी पर पहिनने के लिये हम दोनों का जो लँहगा कुरता बनाया था सबने पूरे शहर में तलाशा नहीं मिला ।

माँ के ज़िस्म पर अक्सर चोटें बहुत लगतीं हैं । काले नीले कत्थई दाग । कभी खरोंचें । एक दो बार तो टाँके और फ्रेक्चर भी । पूछने पर माँ कहतीं गिर गये । गाय भैंस ने मार दिया । चक्कर आ गया । खाना बनाते जल गये ।
माँ अपना खयाल क्यों नहीं रखतीं? पूछो तो कहते हुये फीकी सी मुसकरा देतीं । जैसे रुलायी छिपा रहीं हों ""तुम दोनों पल जाओ अपना अपना दफतर सँभालो तो माँ को घर सँभालने से मुक्ति मिलेगी और तब सारी चोटें अपने आप ठीक हो जायेंगी ।

मैं सोचती हूँ जल्दी बङी हो जाऊँ । किरण बेदी की जीवनी लिखी थी पिछले स्टेण्डर्ड में तभी सोच लिया था पुलिस ऑफिसर बनूँगी । माँ को बताया तो माँ देर तक हँसती रहीं । दीदी को तो बहुत सारा पैसा कमाने विदेश जा बसने का शौक़ है । ऑप्शनल क्लास वर्क में वो फ्रैंच सीख भी रही है ।

बापू तो सारा दिन पास के शहरों में दवाईयों का ऑर्डर लेते और सप्लाई करते रहते हैं । बाकी दिनों में खेत देखने बाबा के साथ चले जाते हैं । बटाईदार करते हैं सब काम तो । बाबा तो बस घूमने चले जाते हैं ।
माँ बापू सिर्फ़ बहुत जरूरी होने पर ही बात करते हैं । अक्सर हम बच्चों के बहाने से । कभी कभी मैं  दीदी से कहती हमारे बापू कितने अच्छे हैं । लेकिन बस हमारी बाकी क्लासमेट के पापा डैडी की तरह हुल्लङ भी मचाते तो कितना अच्छा होता ।

ये बात जब माँ से कही तो माँ तो लगा बस रो ही देंगी ।
फिर बोलीं पढ़ाई के अलावा क्या क्या ऊल जुलूल सोचती रहती है!!!
अबकी बार टॉप करना है समझी ।


उस दिन

स्कूल किसी नेता की डेथ हो जाने से प्रेयर के बाद कंडोलेन्स और छुट्टी

हम दोनों पैर दबाये चुपचाप माँ को चौंकाने के विचार से घर में घुसे । माँ कहीं नहीं थीं सारा घर खाली था ।बगीचे में भी माँ नहीं थीं । तभी दीदी को माँ की घुटी घुटी चीख सुनायी दी  ।हम दोनो अनाज भंडार वाली कोठरी की तरफ भागे । स्टोर का दरवाज़ा जरा सा खुला था । माँ औंधे मुँह फर्श पर पङीं थीं । पीठ पर बापू ने जूता रख रखा था । और दोनों हाथ एक हाथ से पीठ पर मोङ रखे थे । एक हाथ से माँ के बाल खींच रखे थे और दूसरे पैर से जूते की ठोकर माँ की पसलियों पर मारते जा रहे थे ।
माँ चीख रोकने की कोशिश में बुरी तरह तङप रहीं थीं । दीदी रोने लगीं । मुझे कुछ याद आया मैं किचिन में गयी । जहाँ सिर्फ हमारा नाश्ता जल्दी बनाने के लिये माँ ने दो साल पहले गैस स्टोव ' लगाया था वहीं परांत में किलो भर मिरचें रखीं थीं । मैं ने  दोनों मुट्ठियों में मिर्चें भरीं और स्टोर का दरवाजा खोल दिया। अँधेरे में बापू ने हम दोनों को देखा ही था कि मैंने होली के गुलाल की तरह सारा मिर्च पाउडर बापू की आँखों में उछाल दिया ।

बापू जोर से साँड की तरह अंधे होकर डकराये ।

और माँ की पीठ पर जूते की एङी से जोर से ठोकर मारी ।

माँ पलट गयी बापू के हटते ही । बापू माँ की छाती पर खङे थे । हाथ पैर छूटते ही माँ ने हमें देखा और चीखीं ।
छुटकी बङकी भाग । भाग के छिप जा कहीं ।
और बापू की कोली भर ली कमर से ।
बापू गालियाँ बक रहे थे । अंधाधुन्ध पीट रहे थे माँ को और चिघ्घाङ रहे थे ।

हम दोनों भाग कर गाय के कमरे के भुसोरे में छिप गयीं ।
वहाँ छेद में से देखा । माँ हैंडपंप चलाकर बापू की आँखें धुलातीं जा रहीं थीं और बापू गालियाँ बक रहे थे ।

""मेरे बच्चे ख़िलाफ़ भङकाती है""
कई घंटे बाद बापू आई ड्रॉप डालकर लेटे थे आँख पर मलाई की पट्टी रखे।
तब माँ हमारे पास आयीं । पेट से चिपका कर खूब रोयीं । माँ को इतना रोते तो कभी नहीं देखा । मामा के घर से भी माँ मुसकरा कर चली आतीं है जब कभी साल में एक बार जातीं ।

सुबह छुट्टी थी । माँ बापू के पास खङीं थी
बदले हुये रूप में । आज माँ ने बरसों  बाद  साङी नहीं  अपना बहुत पुराना सलवार सूट और कोट पहना था ।

बहुत हो गया  कुंदन!!
अब बात मेरी बेटियों तक जा पहुँची है ।
इसी दिन से हम डरते थे ।

हम शहर किराये का कमरा खोजने जा रहें हैं । सोचते हैं अपनी प्रैक्टिस फिर चालू कर दें । बेटियाँ अब काफी बङी हो गयीं ।

बापू चुप खङे हो गये । ये रूप तो कभी देखा न था माँ का ।

मुझे एक और मौका दो नंदिनी ।
बच्चे मेरे भी तो हैं प्लीज!!

बापू गिङगिङा रहे थे । ऐसा तो कभी नहीं हुआ!!!!

आप सारे मौके गँवा चुके हैं कुंदन!!

माँ ने इतनी कठोर लेकिन धीमी आवाज़ में कहा कि हमें झुरझुरी आ गयी ।


माँ ने हम दोनो को
बापू वाले स्कूटर पर बिठाया हैलमेट पहना और हमारी सहेली अवंती के घर कमरा देखने चल पङी शहर ।

माँ ने स्कूटर कब सीखा!!!!
दीदी से पूछा तो वह फिर होठों पर उंगली रखे चुप का इशारा कर रही थी ।

आज दीदी पहली बार मुसकरा रही थी ।
और उसे जोक्स भी याद आ गये ।
स्कूटर चल रहा है ।
मुझे लगता है एक दिन मैं  हैली कॉप्टर चला कर माँ को फ्रांस घुमाने ले जाऊँगी दीदी के दफ्तर ।
आमेन!!
दीदी ने सिस्टर की तरह सीने पर क्रॉस बनाया ।
®©®©©®©
Sudha Raje





Monday, 5 October 2015

फुफ्फू के टोंचने :- "वोट के लिए कुछ भी करेगा।"

लज्जा नहीं आती तो धिक्कार लानत्त
और निंदा,,,,,,
चारा घोटाले के आरोपी नेता से और
क्या आशा की जा सकती है!!!!!!
लालू यादव काटजू और शोभा डे ।
जैसे लोग केवल ""मुसलिम समुदाय में
अपनी वाहवाही समर्थन और धारा के
विपरीत चलकर खुद को महामॉडर्न
साबित करने के लिए ही,,,,,,,
स्वयं को "गौ भक्षक कहने तक से गुरेज
नहीं कर रहे है ।
!!!!!!! ये पब्लिक है सब जानती है!!!
अपराधी वे लोग है जे किसी के मौलिक
अधिकारों का हनन करते हैं और बजाय
शिकायत करके न्यायप्रक्रिया से इंसाफ
माँगने के कानून अपने हाथ में ले लेते है ।
ऐसों को संविधान और कानून के मुताबिक
दंड मिलना चाहिये ।
किंतु
वे लोग सिर्फ मौका परस्त हैं जो ''''दो
समुदायों को नफरत की आग भङकाकर
लङवाते हैं और फिर एक की पीठ पर हाथ
रखकर खुद को ''क्रांतिकारी साबित
करने की कोशिश करते हैं!!!!
जबकि
कोई मूढ़ महामूर्ख भी समझ सकता है कि
"""ऐसा बयान केवल "मुसलिम या कभी
हिन्दू या कभी दलित या कभी जनरल
कास्ट का समर्थन हासिल करने के लिये
दिया गया है,,,,
बिहार के विकास की बात करने वाले
पहले राज्य फिर केन्द्र मंत्री रह चुके
का होनहार बेटा नौंवी पास!!!!!!!!!!!
परिवार नियोजन के खिलाफ,,,,, नौ
संताने!!!!!!!
प्रजातंत्र के राज में जेल जाते समय
"अत्यल्प शिक्षित घरवाली को
मुख्यमंत्री बना देना!!!!!!
और स्वयं को कृष्ण के धर्मिपता नंदबाबा
का वंशज बताकर क्षत्रिय होने का
दावा करने वाले """यादव??????
जो भारत के सबसे बङे गौरक्षक रहे!!!!!!!
कृष्ण और गौपूजकों ने गौजयराष्ट्र
गौधरा
गौकुल
गौ नाम से अनेकानेक नगर बसाये और
'''दूध दही घी से भरा रहा भारत तो
""यादवों गूजरों जाटों ग्वालों और
गौपालकों की वजह से??!!!!!!
आज
बिहार चुनाव के लिये
मुसलिम वोट लेने के लिये!!!!!!!!!
स्वयं के """"गौ भक्षक घोषित कर
दिया?????
'''तो इसी मुँह से कभी गौ ग्रास न
निकालना? कभी गौदान न करना? कभी
गौ वत्स द्वादशी गौवर्धन पूजा न
करना??
लालू यादव की पत्नी जिऊतिया पूजती
है "
जो "आज है ""
लालू स्वयं घर में और नदी पर जाकर
""छठ पूजा करते दिखते हैं!!!!!
आने ही वाली है ।
लालू ने ही कॉग्रेस के ""मीसा ""कानून
के खिलाफ जाकर अपनी बेटी का नाम
"""ही मीसा भारती ""रख दिया
था!!!!!!!
चरवाहा विद्यालय की अवधारणा देकर
पशुपालक होने का दावा करने वाले लालू
क्या समझते हैं कि बिहार का मुसलिम
इतना बेवकूफ है कि ""ऐसे बयान देने से
वोट की बरसात लालू के लिये कर
देगा?????
ये कोई संतुलित कथन नहीं हो सकता!!!
बल्कि ये कहते कि "मुसलिम परिवार पर
हमला करने वालों को दंड मिले,,
कहते कि हत्यारों को हर जगह जहाँ भी
चाहे हिंदू की मुसलिम करे या मुसलिम
की हिंदू करे ""मजहबी नफरत के कारण
उसे ""फाँसी हो ।
कहते कि "गौ वध निषेध करने को
मुसलिम भाई बहिन मित्र आगे आयें
ताकि """"आस्था और विश्वास के कारण
गौ को पूजनीय मानने वाले उनके मित्र
कलीग भाई बंधु पङौसी और देशवासी
"""आहत न हों
ताकि देश में समरसता रह सके ।
और कोई बहुत बङी चीज तो है नहीं कि
"मजहब की शर्त हो? """मुसलिम तब तक
मुसलिम हो ही नहीं सकता जब तक
"""गाय नहीं खायेगा?????
हजारों मुसलिम खोजो तो ऐसे निकल ही
आयेगे कि """वे चाहते हैं कि अगर अमन
क़ायम होता है और आपसी विश्वास
बढ़ता है एक थाली में खाने पीने के पल
बढ़ते हैं तो ""
"गाय का मांस कोई बङी चीज नहीं जो
त्यागी जा सके!!!!!!!!
यह अपील शायद ज्यादा कामयाब
होती ।
उस गाँव में जो हुआ वह गलत है ।
और किसी भी हिंदू ने कदाचित ही
समर्थन किया हो!!!!!
सब चाहते हैं कि ऐसी कोई घटना कहीं
ना हो ।
शायद उस गाँव के उन बेवकूफ मुलजिमों मे
भी ""हत्या का इरादा न रहा हो और
मारपीट कर ही दंड देने का इरादा
रहा हो ',जबकि किसी को भी किसी
भी तरह से कानून अपने हाथ में लेने का
हक नहीं है 'अधिक मारपीट से कई बार
ऐसा हुआ कि गाँव का बटुआ चोर या कोई
लैगिंक अपराधी भी मारा गया ।
बजाय इस घटना पर दुख और आईन्दा
ऐसी कोई घटना कहीं न हो का प्रबंध
करने के ""
लेखक
बुद्धिजीवी
नेता
अगर इस तरह के बयान देते है तो यह
शर्मनाक स्थिति है ।
क्योंकि ""रातों रात ये चमत्कार नहीं
हो सकता कि """मुसलिम "सूअर खाने लग
पङे और हिंदू गाय का मांस!!!!!!!
जब तक """सब के सब नास्तिक न हो
जायें तब तक "
जब ये बातें ""1857की क्रांति की वजह
बन गयीं तो,
क्या था ब्रिटिश कारतूसों में? गाय और
सूअर की चरबी!!!
अब विवाद की वजह क्यों नहीं
बनेगी????
जब कि आज नेता ही बाँट रहे हैं??
शरारती तत्व दो
समुदायों को लङवाने के लिये मसजिद के
आसपास "सूअर "फेंक देते रहे हैं और मंदिर
में गौ मांस या माँस,,,,
दोनों ही हरकते लानत्त और धिक्कार के
ही कार्य है
न तो एक का समर्थन होना चाहिये न
ही किसी "दूसरे मजहब के विरोध में
नफरत बढ़ाई बयानबाजी ।
लानत उन सब लोगों पर जो कि यह
जानते हैं कि
हिंदू पहला कौर ""गौ ग्रास
""निकालते हैं और पितृपक्ष में पितरों के
लिये गौ भोज गौदान करते हैं ।
लोग मरते समय गौ की पूँछ पकङ कर
गौलोक जाने की बात करते है ''तीर्थ
पर जाते समय गौदान करते हैं ।
और """"गौ गंगा तुलसी वेद गायत्री
मंत्र ""हिंदू की आस्था के मूल हैं ।
गौ के शरीर में देवताओं का वास कहकर
अनपढ़ ग्रामीण शकुन मनाता अगर गाय
बछङा यात्रा के समय दिख जाये ।
गौ की सौगंध झूठी नहीं खाता ''''''''
ये बात भारतीय हिंदू मुसलिम पारसी
ईसाई जैन सब जानते है ।
भारतीय जैन सिख और हिंदू तीनों ही
नहीं खा सकते गौमांस ।
और
मुसलिम भी खूब जानते हैं कि गौ हिंदू के
लिये क्या मायने रखती है ।
तो सवाल उठता है कि सीधा सीधा एक
""फतवा खुद ही समझदार मुसलिम ही
जारी कर दें कि गौ मत काटो मत
खाओ,,,,
बाकी है तो तमाम माँसप्रद पशु!!!!!!!
और
वैसे तो जिद ही है वरना तो सदियों
पहले मुगलकाल तक में गौवध कई
बादशाहों तक ने निषेध कर रखे थे ।
हमें ""वे सब मुद्दे खोजने चाहिये जिनपर
हम सब एक साथ रहकर खुश रह सकते हैं ।
और कोशिश करनी चाहिये कि वे सब
"""मुद्दे जिन पर पटती ही नहीं बल्कि
बहुत अधिक विरोध है ""
थोङा हम झुके थोङा तुम झुको और
विवाद की जङ उखाङ फैंक दो """
पूरे भारत से, ही गौवध खत्म क्यों नहीं
हो सकता,,,
????????????
क्या एक बहुत बङी आबादी की आस्थाओं
के लिये मामूली सी चीज नहीं की जा
सकती????
नीतेश कुमार की रैली में ""उनका
हैलीकॉप्टर देखने आया अबोध बच्चा """
लाठी चार्ज का शिकार होकर मर
गया,,,,,,,
वह परिवार सदमे में है
और
""""""सवाल मन में इधर है कि ""मुआवजा
"कितना मिलेगा???
क्या मुआवजा मजहब जाति धर्म देखकर
होना चाहिये???
या परिवार की ""माली हालत और आगे
की जीवितो की जीवन यापन
प्रत्याशा से??
मौत का मुआवज़ा यानि एक मृतक व्यक्ति
के आश्रित परिवार के लिये फौरी राहत
"""""ये कोई ''''ख़ूं -बहा ""का रिवाज
नहीं।
किसी भी राशि की रकम ''''कभी किसी
परिवार के सदस्य की जगह नहीं ले
सकती """क्योंकि जो गया वह एक दिल
का टुकङा एक जीवन का जीने का मकसद
रहता है परिवार का जरूरी सदस्य चाहे
बङा हो या छोटा """"""किंतु
उत्तरभारत के अनेक राज्यों में
"""मुआवजा एक राजनीति बन चुका है।
सावधान रहने की आवश्यकता है फिर से
हर वतनपरस्त हिन्दू मुसलिम और अन्य
किसी भी धार्मिक या नास्तिक को ।
उप्र सपा के एक मंत्री
(#### # न )जैसे लोग उस बहू की तरह हैं
जो मायके में अपनी ऐबदारियों के कारण
पिताभाई से डाँट खाती है और सासरे में
इसलिये ससुर जेठ पति को धमकाती
रहती है ताकि कोई काम न कराये और
रोके टोके नहीं ।
:
:
ऐसा हर नेता अभिनेता लेखक और
छुटभइया नायक खलनायक
भर्त्सना का पात्र है जो '''बनी
बनायी समरसता को बौखलाहट में
बदलकर तोङ रहा है ।
:
ये वही लोग है जो '''मजहब के नाम पर
लोगों को झुंड बनाकर पृथक पृथक रहने
को उकसाते हैं ताकि न मेलजोल बढ़े न
कोई अमन शांति भाईचारा ।
:
:
जब तक अजनबी होते हैं आमने सामने सब
एक नैतिक आधार से जुङे रहकर मदद करने
को तत्पर रहते हैं ::
ऐसे ही 'खटाई डालने वाले नेताओं ने मीठे
जहरबुझे शब्दों से लोगों के दिमाग में एक
फीडिंग भरी है सदियों से कि दूसरा
मजहब मतलब "काफिर ''दूसरा मजहब
मतलब मलेच्छ और ऐसी बातें अचेतन में दब
कर पङी रहतीं है ।
लोग समरसता से जीने लगते है ।
पढ़ने खेलने रोजी रोजगार और तमाम आते
जाते लङके लङकियाँ धर्मभाई बहिन बन
जाते हैं चाचा मौसा बन जाते हैं और कई
तो विवाह भी कर ही लेते हैं ।
मांसाहारी तो एक परिवार भी होता
है उसी परिवार में एक बहू शाकाहारी
एक बुजुर्ग तो लहसुन प्याज तक नहीं
खाता, और बढ़िया निभ जाती ।
हमारी अनेक कजिन बहिन भाभियाँ
रॉयल और नॉनरॉयल घरानों में हैं जो
मांसाहारी है और उनके साथ होटल भी
आना जाना पङता ही रहा टेबल एक ही
रहती और पूरा कुनबा जब मजे से
हड्डियाँ चूस रहा होता तब :
हम आराम से पालक पनीर और मटर
पुलाव के साथ तंदूर की रोटी मख्खन
खाते होते ।
कई बार तो व्रत उपवास रहता और
हमारी कॉफी विद काजू के समक्ष
मांसहारी दावत रहती :
जब हम परिवार में इस तरह एडजस्ट
करते हैं ।
कई बार पति मांसाहारी और वाईन भी
पीते हैं किंतु पत्नी लहसुन प्याज तक
नहीं खाती ',तो क्या बच्चे नहीं होते?
सब "प्यार "का कर्त्तव्य का
एडजस्टमेन्ट है ।
:
:
ये कोई एक मजहब का देश नहीं ':
प्रागैतिहासिककाल से मानव
मांसाहारी और शाकाहारी दोनों रहा
है ।
शाकाहारी चाहते हैं कि लोग
जीवहत्या न करें,
किंतु जीवहत्या रोकने का समझाना और
कन्विंस करना "बस वोट माँगने जैसा ही
तो है ।
मानना न मानना तो सुनने समझने वाले
पर ही निर्भर है न!!!
:
हम सब जो जिस मजहब को मानते है जन्म
से ही संस्कार भर दिये जाते हैं और उन्हीं
के साथ हमारी आस्था जुङ जाती है ।
कोई मुसलिम सूअर नहीं खा सकता और
ना ही बिना "हलाल किया हुआ मांस "
लेकिन ऐसे तमाम हिंदू हैं जो मुसलिम
दोस्तों के घर बकरा मुर्गा मछली हिरन
खरगोश खा चुके होगे '
अनेक राजघरानों में तो मुसलिम
खानसामा तक रहे हैं ।
यानि हिंदू ""हलाल किया मांस मजे से
खा लेते हैं ।
ईद पर शीर सिवईयाँ भी खूब खाते है और
दीवाली पर मिठाईयाँ भी खिलाते हैं ।
फिर गङबङ कहाँ होती है??
ये होती है ""कट्टरवादी मजहब मनवाने
को विवश करने और आसमानी भय
दिखाकर डराने वाले धर्मोपदेशकों और
नेताओं की वजह से ।
ये नहीं चाहते कि लोग मजहब को भूल
जायें पल भर भी ये भूल जाये कि उनका
दोस्त पङौसी उनके मजहब का नहीं है ।
:
ऐसे लोगों को जवाब दूसरे मजहब के नहीं
खुद उन्हीं के मजहब से उठे वतनपरस्तों
देश के सपूतों से मिलना चाहिये ।
:
भारतीय कभी हिंसा पसंद नहीं करते
हिंसा और नफरत भारतीय चिंतन और
संस्कार नहीं है ।
किंतु तरह तरह के धरमोपदेशकों और
नेताओं ने अलग अलग तरह के भय दिखाकर
लोगों में सौतिया डाह पैदा कर दिया
है ।
:
लोग अंदर से भले हों तो भी ये लोग
उनको हाँकते है """झुंड बनाओ मेरी शरण
में आओ वरना """"
:
अपराध कहीं होता है तो दंड भी है ।
और अनैतिकता मानव में जब तक संस्कार
अच्छे हो आ ही नहीं सकती ।
बङी चालाकी से लोगों को ""मानव से
गिरकर हिंदू मुसलमान की पहचान देने
की कोशिश हर चुनाव के आसपास "मंत्री
से मुख्यमंत्री और कौमी लीडर बनकर
अपने गलत कारनामे छिपाने हेतु ऐसे
बयान आग में पेट्रोल डालने के लिये किये
जाते है ।
:
हम सबका एकजुट प्रयास होना चाहिये
कि "न तो किसी भी की व्यक्तिगत
आस्था को ठेस पहुँचाने वाला कुछ भी कहें
न लिखे और न आसपास घटित होने दें ।
:
क्योंकि आखिर हम सबका देश भारत है
जन्मभूमि भारत है और हम सबका
ब्लडग्रुप भी उतनी ही सीमित
प्रकारों का है ।
सब भारतीयमूल के लोग 'भारत को
स्वतंत्र संप्रभु लोकतंत्र बनाने के लिये
जूझे हैं और आज उत्तरदायी है ।
घर के झगङे कितने भी बङे हों ',कभी भी
दूसरे गाँव के राही को नहीं बताये जाते

और जो बहू बेटा बूढ़ा ऐसे करता है वह
घर तोङने का अपराधी उतना ही है
जितना बिगङैल पोता जो गलत हरकतें
करते पिटाई खाता है ।
बंधु हम इस संस्कार के भारतीय हैं जहाँ
बुजुर्गों के लहसुन प्याज रहित भोजन
बनवाने का ध्यान रखा जाता है और
युवक मटन चिकन खाते हैं तो बेटियाँ
बहुएँ शाकाहार 'और तब भी कायम
रहता है परिवार प्यार और
अधिकार!!!!!
सपा के एक नेता जो चीफमिनिस्टर बनने
का ख्वाब सजाये बैठे है
"# अखिलेशयादवजी '
आज जो कुछ बोल रहे हैं सुना आपने?
ये मरने के बाद जन्नत में हूरों का ख्वाब
दिखाकर, घर गिराने को उकसाने वाले
लोग है ताकि इनका खुद का महल उन
गिरे घरों की ईँटों से बन सके।
जिस देश का हिंदू """कन्यावध करता
हो "
उसको गौवध पर बिलबिलाहट
क्यों?????
बेशक हम हृदय से चाहते हैं कि जीवमात्र
की हत्या न हो,
विशेषकर भैंस गाय बकरी भेङ और ऊँटनी
याक की ताकि ""दूध सस्ता और
सर्वसुलभ हो ।
न कि इसलिये कि हमारा धर्म हिंदू है!!!
परंतु
जिस जिस घर में ""कन्या गर्भ जाँचकर
गिराये गये "
वे सब तो गौवध से भी बङे "पाप के
भागी है ''
न मानो तो देवीभागवत पढ़ लो "
या पढ़ लो कोई भी शास्त्र, '
???
कन्यावध पर मौन??
तो
गौवध पर मुखर तु हो कौन??
बरेली के जफर ने अपनी चार पाँच साल
की बेटी को पटक पटक कर मार डाला
क्योंकि उसका दुपट्टा सिर से सरक गया
था ''''कोई पूछे क्या उसकी जान की
कोई कीमत नहीं?????
ये जो हिंसा है यह "मजहब जीत और लिंग
भेद की कूट कूट कर भरी जहरीली बातों
की ही फल है ''''वरना इंद्राणी बेटी
की हत्या न करती ।
हरियाणा पंजाब यूपी राजस्थान ही
सबसे अधिक ''गर्भस्थ कन्यावधिक प्रांत
हैं और अधिकतर हिंदू।
काश गौवध रोकने की मुहुम के साथ
कन्या भी वध से बच सके ''''''''ये रोक
""कानून की देन है "और विश्व दबाब
की?? या पाप पुण्य की?? या
जनलिंगानुपात की सरकारी चिंता
की?? ये भी सोचने की बात है।
"""हम इसको गौहत्या से
कतई नहीं जोङ रहे है """""
गौ हम सबके लिये माँ की तरह पूजनीय है
''वैसे ही
हर लङकी कन्या और भावी माता होने
से भी "अवध्य है "
हमें चेतना ही होगा "।
सामाजिक चेतना """लाकर ही हिंसा
रोकी जा सकती है दादा ""देश की छवि
की भी हमको ही चिंता करनी पङेगी ।
अपने ही भीतर फैली बीमारियों दहेज
हत्या कन्यावध और स्त्री मात्र पर
लैंगिक हिंसा भी रोकनी होगी ।
भारतीय विदेश में एक स्वस्थ लोकतंत्र के
लोग हैं यह कहकर सिर उठा सकें यही
सपना पीएम महोदय का है और हर
प्रकार का अतिवाद उसमें बाधा है ।
चाहे वह जीवहत्या हो या वैचारिक
भेदभाव और मानसिक भय फैलाने का
षडयंत्र,,,
गौ कन्या और विद्यावान ब्राह्मण
जाति नहीं अपितु ज्ञान से पंडित
सनातन धर्म के सदा पूज्य हैं ।
तो अब ये पुनर्विचार का समय है कि हम
देश के वैश्विक मान के लिये क्या कर रहे
हैं!
हम हर ईद पर भी जीवहत्या
छोङने की अपील करते हैं और दुधारू पशुओं
का वध तो सदैव हमारे विरोध का
कारण है ही ""भैंस माता बचाओ से हमने
लेख भी लिखे हैं "
परंतु
यहाँ मन सवाल तो करता ही है कि क्या
केवल पङौसी के बच्चे की गलती गलती
है?? हमारी अपनी संतान को हम नहीं
रोकेगे??
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ हर
धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार पूजा
आराधना कर पाते हैं और उनके बीच अगर
उनका अपना सगा भी कोई "गलत
"निकले तो धिक्कारा और बहिष्कृत भी
किया जाता है दंडित भी होता है ।
किंतु अफसोस ये है कि छद्मसेकुलरिज्म के
नाम पर लोगों का भावनात्मक शिकार
करके उनको सुलगाने का काम लगभग हर
मजहब में छिपे देश के गद्दार करते है ।
परंतु सुकून इस बात का है कि ""भारत
हर बार फिर सारे घाव झाङकर उठ
खङा होने वाला अमर देश है "
आज फिर इसी तरह के लोग देश को शांति
और राष्ट्रीय हित के मार्ग पर रखेगे
ये साजिश है कि विश्व में भारत को
"कम्युनल वायोलेंस "वाला देश साबित
करके बदनाम किया जाये ताकि वैश्विक
संदेह के कारण भारत का आर्थिक विकास
और शक्तिशाली होना रोका जा सके ।
जो जो ऐसा साबित करेगे सब देश के
दीमक ही खुद को साबित करेगे इसलिये
रुको ठहरो और सोचो
सही क्या है और आवश्यक क्या है ।
हर बार दोनों एक हों जरूरी तो नहीं!!!
जय हिंद !!!
(नोट :::ये एक निजी विचार है जो
समुदायों में प्रेम बढ़ाने के लिये क्या करें
की सोच के तहत लिखा है ''
जिनको बुरा लगा हो क्षमा करे
©® सुधा राजे


Sunday, 4 October 2015

सुधा राजे का संस्मरण:- एक थी सुधा "यादें ऐसी भी" :- ससुराल में पहला कदम और एक - 2 पल जंग। imp

बात उन्नीस साल पुरानी है और कुछ पत्रकार जो तब मेरठ बिजनौर मुरादाबाद
में रहते थे कदाचित उनको याद भी हो ',,
विवाह के बाद ससुर जी की गंभीर बीमारी के दौरान लगातार घर रहना पङा और,
कदाचित ऐसी कोई बहू हो जो तुरंत उतरी हो गाङी से और घर के काम काज में लग
गयी हो 'विवाह के बाद घर तत्काल ही खाली हो गया रह गये तीन जीव 'एक अजनबी
जोङा और एक वृद्ध बीमार ',।
पहली ही थाली के बाद भोजन की तैयारी में जुटना पङा और रिशेप्सन दो दिन
बाद था तो उसके लिये भी लगे कैटरर्स और हलवाईयों को सर सामान देना पङा
',। जब भी जिस भी कमरे में जाते तमाम आडंबर गैरजरूरी चीजें और खाली
डिब्बे पॉलिथिन बोतलें रैपर्स और अनुपयोगी उतरनें पङी मिलतीं ',अतिथि सब
विदा हो गये 'एक दूर के रिश्ते की लङकी आठ दिन रुकी 'उसी की सहायता से
स्थानीय बोली और परंपरायें समझने का प्रयास करते ।
भयंकर बारिश और दिन भर सन्नाटा शाम को ही दो घंटे की चहलपहल सी लगती ।
कहाँ पचास साठ आदमियों की रोज की भीङ और भरी बस्ती की चहलपहल कहाँ ये
एकदम सूना घर!!
अगली सुबह ही झाङू उठायी और लग गये काम पर, 'आठ दस गाय भैंस बैल और
गौशाला से लेकर नये बने मकान तक सारा तीन बीघे जितना मैदान साफ करते रोज
और 'थककर चूर हो जाते, 'बरसों से रीती हवेली में केवल जरूरत भर के काम की
जगह साफ करके सब सुबह निकल जाते रात को आते, '।
एक सप्ताह बाद एक ठीक ठाक लॉन और किचिनगार्डेन तैयार हो गया :फिर जब तक
कुछ न कुछ खरीदने के लिये बाजार जाना चूकिं एलाउ नहीं था सो दूसरे कसबे
जाकर बाईक से घरेलू सामान 'खरीदकर लाते लगातार शॉपिंग, और कई हजार रुपये
जो विभिन्न रस्मों में निजी बटुए में मिले थे व्यय हुये तब जाकर एक ठीक
ठाक गृहस्थी जुङी जिसमें न तवा था न चायदानी छन्नी न ही मसालदानी न मटका
स्टैण्ड न ही ट्रे और न छुरी काँटे चम्मच और कङछी बेलन चमचा सँड़सी, '।
क्योंकि एक लङकी पङौस की भोजन पकाती थी केवल रोटियाँ 'चावल और सब्जी होटल
से आती रहती थी या होटल में ही खाना खा लिया जाता था ।चाय पीता ही कौन था
यदा कदा आवश्यकता पङी तो करीब के कैंटीन से आ जाती थी '
गौशाला की देखभाल 'तसलीम' और उसका भाई हबीब करता था 'वही जैसी तैसी सानी
कुट्टी पानी करता और दूध निकाल कर रख जाता, 'जितना पिया जाता पितापुत्र
पी लेते बाकी 'शाम सुबह दूधवाला भर ले जाता '
एक पखवारा बीतते बीतते सर सामान की पूरी तरह छँटनी होकर जब ""कबाङ इकट्ठा
हुआ और फालतू कपङे बकसे मटके डिब्बे बोतलें रैपर्स तो लगभग दस फीट ऊँचा
अंबार लग गया मैदान में, और जब आग लगायी तो दो दिन तक धुआँ अंगार सुलगते
रहे ।
फिर बचा खुचा सामान कबाङी को बेचा तो, 'पूरे घर के लिये बढ़िया परदे और
डिनरसैट उसी पैसे से आ गया ।
दूसरे नगर आते जाते पीछे बाईक पर बैठे बैठे ही जो देखा उसे बदलने की ठानी
और एक सैकङा भर पोस्टकार्ड लिख मारे विभिन्न विभागों को, 'कुछ महीनों बाद
जब घर घर नोटिस आने लगे ""झङाऊँ पाखाने "बंद करो तो लोग परेशान हो गये ।
क्या मंदिर क्या मसजिद ',यूपी का ये इलाका ''सन दोहजार तक लगभग हर गली
में ""गली नाम से ही कही जाती कच्ची शौचालय व्यवस्था से ही चलता था ।
झाङने वाली सब औरतें आती और झाङकर सारी गंदगी उसी गली सङक पथ के किसी
खंडहर पङे मकान या कोने मैदान में ढेर लगाती रहती ',बच्चे खेलते रहते
औरतें आती जाती और गंदगी की दुर्गंध से सारा नगर भभकता रहता ',।
एक दिन नाम खुल ही गया ',क्योंकि काररवाही जल्दी न होने पर पत्र मीडिया
में भेजना पङा और लगभग हर स्थानीय पेज पर छप भी गया ',कलेक्टर तहसीलदार
और नगरपालिका, से लेकर राजधानी तक पत्र लिखे, कि ""सिरबोझ मैला परंपरा
बंद करायी जाये ""
किसी ने हमारा नाम बता दिया "सफाईकरने वाली महिलाओं को 'अगले ही दिन
"सोमो "जो सिरबोझ ढोती थी हमारी गलियों के उन औरतों की मुखिया थी ',आकर
डलिया दरवाजे पर धरकर कई दरजन महिलाओं के साथ झगङने लगी, '
,,,बहूजी पेट पे लात तो न मारो ""
कई घंटे की बहस समझाईश के बाद सोमो "समझने को तैयार हुयी तो बस्ती में दो
'दल बन गये ।
एक दल सिरबोझ मैला बंद करके सूअर पालन मुर्गीपालन ब्रुश कारीगरी
अस्पतालों और नगरपालिकाओं तथा स्कूलों में जॉब के लिये 'राजी हो गया तो '
दूसरा दल टस के मस नहीं हुआ अपनी "यजमानी और इलाका की उगाही छोङने को
"मजदूरी और खाद के साथ त्यौहारी भी बङी वजह थी ।
अंततः कुछ परिवार हमारे साथ कचहरी गये और लॉन मंजूर हुआ किसी का किसी ने
घर से ही धन संग्रह करके नया रोजगार शुरू किया ',
क्योंकि, 'नोटिस से परेशान उनके सदियों पुराने ''यजमान लोगों के घर धीरे
धीरे आधुनिक फ्लश शौचालय बन चुके थे और बाकी के घर बनते जा रहे थे "पचास
रुपया महीना और त्यौहारी विवाह के नेग आदि से उतना लाभ नहीं था जितना
"खाद "से होता था ।
आखिरकार, दूसरे दल के लोगों की भी संख्या घटने लगी जब 'उनके भी कस्टमर
नोटिस से परेशान होकर शौचालय बनवाने लगे '।
एक दिन उन लोगों को भी पता चल ही गया और अनेक पङौसी जिनसे सबसे अधिक
रिश्तेदार थे 'हमारी बैठक पर चढ़ आये और हमें तो कम परिवार के बुजुर्ग
हमारे ससुर जी को हमारे खिलाफ भङकाने में कामयाब हो गये ।
शाम को घर में पहली बार बहस हो गयी, '''और बहू लक्ष्मी से हम बङे शहर की
ज्यादा पढ़ी ज्यादा दिमाग खराब लङकी कहलाये ""
।अब परिवार से कैसे लङें???
नतीजा हमने कोट पहना और अदालत जा पहुँचे वहाँ अपना पूर्व का परिचय दिया
और आदेश पारित होने की सारी काररवाही करवाकर घर आये 'यह बिना आज्ञा पहला
कदम था घर से बाहर "।
हालांकि कह दिया था कि कोर्ट देखने जा रहे है यहाँ का और साथ में चूँकि
कोई नहीं था सो अकेले ही जाना पूछताछ करना और सारी कागजी प्रक्रियायें
पूरी की, '
अगले सप्ताह मासिक आखिरी मंगलदिवस होने से 'सोमो और कुछ अन्य सिरबोझ मैला
ढोने वाली स्त्रियों को साथ लेकर गये और 'वहाँ मौजूद तत्कालीन सांसद "कोई
''रवि "सरनेम धारी से बहस हो गयी '।
आखिर कार एक एक करके ''झङाऊ शौचालय ढहाये जाने लगे रास्तों पर से "मल के
ढेर हटाये जाने लगे और 'इसके लिये हम कलेक्टर
#लीना जौहरी कलेक्टर पाठक जी और कुछ तहसील अधिकारियों को आज भी धन्यवाद
करते है 'जहाँ भी हो ।
फिर घर में डाँट पङी "आपके हाथ का खाना नहीं खायेगें सबको छू लिया और
सबके साथ एक ही जीप में बैठकर घूमने गयी, जाओ गंगाजल से नहाओ, '
।नहाते तो रोज ही सुबह शाम हम पश्चिमी यूपी वाले गंगाजल से ही तो हैं
कहते ही फिर डाँट पङी और वैचारिक मतभेद में पीढ़ी अंतराल सामने आ खङा हुआ

एक ही साल भीतर लगभग हर स्कूल में हम गये और वहाँ ''लङकियों के लिये अलग
तो क्या किसी तरह का कोई टॉयलेट ही नहीं था!!!!! ',मीडिया का फिर सहारा
लिया और आवाज उठा दी, 'स्कूल की प्रबंधक रुपयों का दुखङा ले बैठीं, 'और
स्थानीय विधायक को विवश होकर बजट देना पङा जिससे बालिकाओं के लिये पृथक
टॉयलेट बना और बाउण्ड्री भी ऊँची हुयी ।
फिर भी जंग जारी थी "खास खास नागरिकों की श्रेणी में बुलावा आया जब
नगरपालिका से तो वहाँ भी पहला भाषण जो ससुराल में दिया था ""सङक न होने
और गली गली कूङा ढेर लगे होने पर था ।
मुसलिम बुजर्गों की बहुलता वाली नगरपालिका के भीङ भरे समारोह में य़े कौन
"बलकटी "किस तरह खटखट चढ़ कर मंच पर बोल रही है सुगबुगाहट शुरू हो गयी और
सवालों की बौछार सग पङी 'जहाँ आज भी औरतों सिर ढँके नकाब बाँधे बिना नहीं
निकलतीं वहाँ पूरे नगर को माईक से लाऊडस्पीकर पर गंदा और अव्यवस्थित एक,,
नयी उमर की बहू कह दे????
किंतु तमाम आलोचनाओं के बीच भी नगरपालिकाअध्यक्ष से पृथक मुलाकात में हम
समझा पाने में कामयाब रहे और लखनऊ दिल्ली तक पत्रों से बात उठायी वहाँ
कुछ दूर पास के नातेदारों से भी मदद मिले कागज आगे बढ़ाने में और ''लोग
एक दिन चकित थे आजादी के बाद पहली बार """नगर के भीतर ''खड़ंजा उखङने लगा
और हर चौराहे पर बङे बङे कूङेदान रखवाये गये ।
ये कूङेदान हमारी गलत सलाह ही साबित हुये, क्योंकि लोगों को आदत जब तक न
हो साफ सफाई की तब तक सफाई हो ही नहीं सकती ''।
मलिन बस्तयों और मजदूर किसान बस्तियों के जो लोग अँधेरे में नदी नाले के
किनारे जाते थे शौच को वे लोग बच्चे और बूढ़े उन कूङेदानों में पॉलिथीन
में मल भर कर फैंकने लगे और कूङा आसपास अगलबगल पङा रहने लगा 'कूङेदान
गजबजाने और बेहद दुर्गंध मारने लगे ',आखिर कार सब के सब हटवाये गये ।
और हमारे सामने सवाल आया ""गरीब मलिन बस्तियों और मजदूरों गरीब कृषकों
भिखारियों और खानाबदोश वनवासी जातियों की बस्ती में जब तक 'शौचालय सरकार
नहीं बनवायेगी वे लोग तो नहीं ही बनवायेगे,,,,, स्थानीय नेताओं से मिले
राजधानियों को लिखा और फिर मीडिया में, अंततः एक बस्ती में शौचालय बनवाया
गया ।फिर तो दूसरी और तीसरी करते करते लगभग हर मलिनबस्ती और गरीब बस्ती
में ""सार्वजनिक शौचालय बन गये ।
किंतु ये क्या लोग तो अब भी बाहर ही जाते है!!!!!
आखिरकार एक एनजीओ गठित हो गया और रजिस्टर्ड भी ।
उसकी मासिक बैठकें हम लगातार अलग अलग जगहों पर करते और वहाँ की महिलाओं
को साफ सफाई जचगी की सावधानियाँ और रोजगार के उपायों पर बताते ",,वहीं
फिर औरतें घरेलू हिंसा की शिकायतें लाने लगीं और एनजीओ ने सैकङों
परिवारों के घरेलू विवाद सफलतापूर्वक सुलझाये और महिलाओं को अस्पताल में
प्रसव कराने की जानकारी अस्पताल में मीटिंग करके दी "लङकियों को स्कूल
भेजने की जानकारी अशिक्षित महिलाओं को स्कूल में मीटिंग करके दी वहाँ
पुलिस तहसील और ब्लॉक के अधिकारी भी बुलाते और एक एक करके अनेक गाँवों
में लहर चल पड़ी ।
इसी बीच पता चला कि एक मलिनबस्ती में बीचों बीच देशी शराब की हट्टी है और
वहाँ दूर पास के गाँव तथा ड्राईवरों की भीङ देर रात तक लगी रहती है डैक
बजता रहता है और लङकियों को फिकरे औरतों को घरों में मारपीट सहनी पङती है
।पियक्कङ इस कदर अंधे हो गये कि दारू के लिये औरतों के गहने जब नहीं मिले
तो साङियाँ और बरतन गिरवी रखकर पीने लगे :एक रात ऐसी ही औरतें दरवाजे पर
रोने लगी,, मन करुणा और क्रोध से भर गया तब रात को लैंडलाईन से तीन चार
गाँवों की औरतों को इकट्ठा होने को संदेश भेजा और रात में ही औरतों ने
शराब की दुकान पर ताला डालकर अड्डा जमा दिया कुछ दिन जमे रहे 'शराबी दिन
में कुछ न कहते परंतु रात में जब बूढ़ी औरतें और समर्थक लङके रह जाते तब
धमकाते "अंततः डिप्टीकलेक्टर और स्थानीय लोगों की रोज बढ़ती समर्थन की
भीङ से एक दिन शराब ट्रकों में भरकर बस्ती से बाहर दूरn रखी गयी ।औरतें
नाचती गाती आयी और हमें घर पर जब हम रात का खाना बना रहे थे फूल मालाओं
से लाद दिया ।
तब तक हमारे पङौसियों को कुछ पता ही नहीं था ।और फिर एक डाँट पङी ""परायी
आग में जलना पढ़ाना लिखाना बेकार गया ""
तब पता चला कि शिक्षा की तो हालत ही सबसे खराब है!!!!!!! और क्या करते??
तब याद आया कि ग्रेजुएशन के बाद हमने पोस्टग्रेजुएशन के साथ साथ यू ही
समाज सेवार्थ एन एस एस लीडर होने केस दौरान गाँव गाँव कैंप लेकर साक्षरता
में पढ़ाया और ""कुशल प्रशिक्षक की ट्रैनिंग लेकर टीचर्स को पढ़ाकर
प्रमाणपत्र भी लिया है ।
और फिर घर पर ही चालू हुयी परदानशीन बुरकेवाली लङकियों की शिक्षा, 'जब
पहली खेप पढ़ गयी तब, एक प्रोग्राम आया है का पता चला औऱ साक्षरता केंद्र
खोल दिया, । सुबह से शाम तक कचहरी और घर की सेवा के बाद जब थक जाते तब,
दो पीरियड लेने पङते लैंप की रोशनी में पहला परदानशीन औरतो लङकियों का
जिनके पिता भाई पति अरब
और खाङी देशों में थे '"दूसरे वे मदरसों के लङके जो हिंदी इंगलिश सीखकर
मौलवी बनना या अरब जाकर कमाना चाहते थे ।
कुछ सालों तक 'यही दिनचर्या रही फिर एक भीषण हादसे ने हमें अस्पताल
पहुँचा दिया । पति की रीढ़ का ऑपरेशन और अपनी टूटी टाँग के साथ घर से ही
फिर कलम तो चली हम नहीं कई साल तक, 'फिर लगा कि काफी कुछ बदल चुरा है अब
कूङा रोज उठाने ट्रेक्टर आते है ',कच्चेशौचालय नहीं है । एक बार सफाई
करने वाली सहेलियाँ अपनी बस्ती में ले गयी एक सभा में तो देखा सब बदल गया
सबके मकान पक्के हैं घरों में टॉयलेट्स हैं और सङकें पक्की हर मोङ पर
सरकारी नल लगा है औऱ कहीं भी मल के ढेर नहीं अलबत्ता सूअऱ जरूर घूम रहे
हैं बाङों में ।
©सुधा राजे


सुधा राजे का संस्मरण:- एक थी सुधा "यादें ऐसी भी" :- ससुराल में पहला कदम और एक -2 पल जंग।

बात उन्नीस साल पुरानी है और कुछ पत्रकार जो तब मेरठ बिजनौर मुरादाबाद
में रहते थे कदाचित उनको याद भी हो ',,
विवाह के बाद ससुर जी की गंभीर बीमारी के दौरान लगातार घर रहना पङा और,
कदाचित ऐसी कोई बहू हो जो तुरंत उतरी हो गाङी से और घर के काम काज में लग
गयी हो 'विवाह के बाद घर तत्काल ही खाली हो गया रह गये तीन जीव 'एक अजनबी
जोङा और एक वृद्ध बीमार ',।
पहली ही थाली के बाद भोजन की तैयारी में जुटना पङा और रिशेप्सन दो दिन
बाद था तो उसके लिये भी लगे कैटरर्स और हलवाईयों को सर सामान देना पङा
',। जब भी जिस भी कमरे में जाते तमाम आडंबर गैरजरूरी चीजें और खाली
डिब्बे पॉलिथिन बोतलें रैपर्स और अनुपयोगी उतरनें पङी मिलतीं ',अतिथि सब
विदा हो गये 'एक दूर के रिश्ते की लङकी आठ दिन रुकी 'उसी की सहायता से
स्थानीय बोली और परंपरायें समझने का प्रयास करते ।
भयंकर बारिश और दिन भर सन्नाटा शाम को ही दो घंटे की चहलपहल सी लगती ।
कहाँ पचास साठ आदमियों की रोज की भीङ और भरी बस्ती की चहलपहल कहाँ ये
एकदम सूना घर!!
अगली सुबह ही झाङू उठायी और लग गये काम पर, 'आठ दस गाय भैंस बैल और
गौशाला से लेकर नये बने मकान तक सारा तीन बीघे जितना मैदान साफ करते रोज
और 'थककर चूर हो जाते, 'बरसों से रीती हवेली में केवल जरूरत भर के काम की
जगह साफ करके सब सुबह निकल जाते रात को आते, '।
एक सप्ताह बाद एक ठीक ठाक लॉन और किचिनगार्डेन तैयार हो गया :फिर जब तक
कुछ न कुछ खरीदने के लिये बाजार जाना चूकिं एलाउ नहीं था सो दूसरे कसबे
जाकर बाईक से घरेलू सामान 'खरीदकर लाते लगातार शॉपिंग, और कई हजार रुपये
जो विभिन्न रस्मों में निजी बटुए में मिले थे व्यय हुये तब जाकर एक ठीक
ठाक गृहस्थी जुङी जिसमें न तवा था न चायदानी छन्नी न ही मसालदानी न मटका
स्टैण्ड न ही ट्रे और न छुरी काँटे चम्मच और कङछी बेलन चमचा सँड़सी, '।
क्योंकि एक लङकी पङौस की भोजन पकाती थी केवल रोटियाँ 'चावल और सब्जी होटल
से आती रहती थी या होटल में ही खाना खा लिया जाता था ।चाय पीता ही कौन था
यदा कदा आवश्यकता पङी तो करीब के कैंटीन से आ जाती थी '
गौशाला की देखभाल 'तसलीम' और उसका भाई हबीब करता था 'वही जैसी तैसी सानी
कुट्टी पानी करता और दूध निकाल कर रख जाता, 'जितना पिया जाता पितापुत्र
पी लेते बाकी 'शाम सुबह दूधवाला भर ले जाता '
एक पखवारा बीतते बीतते सर सामान की पूरी तरह छँटनी होकर जब ""कबाङ इकट्ठा
हुआ और फालतू कपङे बकसे मटके डिब्बे बोतलें रैपर्स तो लगभग दस फीट ऊँचा
अंबार लग गया मैदान में, और जब आग लगायी तो दो दिन तक धुआँ अंगार सुलगते
रहे ।
फिर बचा खुचा सामान कबाङी को बेचा तो, 'पूरे घर के लिये बढ़िया परदे और
डिनरसैट उसी पैसे से आ गया ।
दूसरे नगर आते जाते पीछे बाईक पर बैठे बैठे ही जो देखा उसे बदलने की ठानी
और एक सैकङा भर पोस्टकार्ड लिख मारे विभिन्न विभागों को, 'कुछ महीनों बाद
जब घर घर नोटिस आने लगे ""झङाऊँ पाखाने "बंद करो तो लोग परेशान हो गये ।
क्या मंदिर क्या मसजिद ',यूपी का ये इलाका ''सन दोहजार तक लगभग हर गली
में ""गली नाम से ही कही जाती कच्ची शौचालय व्यवस्था से ही चलता था ।
झाङने वाली सब औरतें आती और झाङकर सारी गंदगी उसी गली सङक पथ के किसी
खंडहर पङे मकान या कोने मैदान में ढेर लगाती रहती ',बच्चे खेलते रहते
औरतें आती जाती और गंदगी की दुर्गंध से सारा नगर भभकता रहता ',।
एक दिन नाम खुल ही गया ',क्योंकि काररवाही जल्दी न होने पर पत्र मीडिया
में भेजना पङा और सगभग हर स्थानीय पेज पर छप भी गया ',कलेक्ट्र तहसीलदार
और नगरपालिका, से लेकर राजधानी तक पत्र लिखे, कि ""सिरबोझ मैला परंपरा
बंद करायी जाये ""
किसी ने हमारा नाम बता दिया "सफाईकरने वाली महिलाओं को 'अगले ही दिन
"सोमो "जो सिरबोझ ढोती थी हमारी गलियों के उन औरतों की मुखिया थी ',आकर
डलिया दरवाजे पर धरकर कई दरजन महिलाओं के साथ झगङने लगी, '
,,,बहूजी पेट पे लात तो न मारो ""
कई घंटे की बहस समझाईश के बाद सोमो "समझने को तैयार हुयी तो बस्ती में दो
'दल बन गये ।
एक दल सिरबोझ मैला बंद करके सूअर पालन मुर्गीपालन ब्रुश कारीगरी असपतालों
और नगरपालिकाओं तथा स्कूलों में जॉब के लिये 'राजी हो गया तो '
दूसरा दल टस के मस नहीं हुआ अपनी "यजमानी और इलाका की उगाही छोङने को
"मजदूरी और खाद के साथ त्यौहारी भी बङी वजह थी ।
अंततः कुछ परिवार हमारे साथ कचहरी गये और लॉन मंजूर हुआ किसी का किसी ने
घर से ही धन संग्रह करके नया रोजगार शुरू किया ',
क्योंकि, 'नोटिस से परेशान उनके सदियों पुराने ''यजमान लोगों के घर धीरे
धीरे आधुनिक फ्लश शौचालय बन चुके थे और बाकी के घर बनते जा रहे थे "पचास
रुपया महीना और त्यौहारी विवाह के नेग आदि से उतना लाभ नहीं था जितना
"खाद "से होता था ।
आखिरकार, दूसरे दल के लोगों की भी संख्या घटने लगी जब 'उनके भी कस्टमर
नोटिस से परेशान होकर शौचालय बनवाने लगे '।
एक दिन उन लोगों को भी पता चल ही गया और अनेक पङौसी जिनसे सबसे अधिक
रिश्तेदार थे 'हमारी बैठक पर चढ़ आये और हमें तो कम परिवार के बुजुर्ग
हमारे ससुर जी को हमारे खिलाफ भङकाने में कामयाब हो गये ।
शाम को घर में पहली बार बहस हो गयी, '''और बहू लक्ष्मी से हम बङे शहर की
ज्यादा पढ़ी ज्यादा दिमाग खराब लङकी कहलाये ""
।अब परिवार से कैसे लङें???
नतीजा हमने कोट पहना और अदालत जा पहुँचे वहाँ अपना पूर्व का परिचय दिया
और आदेश पारित होने की सारी काररवाही करवाकर घर आये 'यह बिना आज्ञा पहला
कदम था घर से बाहर "।
हालांकि कह दिया था कि कोर्ट देखने जा रहे है यहाँ का और साथ में चूँकि
कोई नहीं था सो अकेले ही जाना पूछताछ करना और सारी कागजी प्रक्रियायें
पूरी की, '
अगले सप्ताह मासिक आखिरी मंगलदिवस होने से 'सोमो और कुछ अन्य सिरबोझ मैला
ढोने वाली स्त्रियों को साथ लेकर गये और 'वहाँ मौजूद तत्कालीन सांसद "कोई
''रवि "सरनेम धारी से बहस हो गयी '।
आखिर कार एक एक करके ''झङाऊ शौचालय ढहाये जाने लगे रास्तों पर से "मल के
ढेर हटाये जाने लगे और 'इसके लिये हम कलेक्टर
#लीना जौहरी कलेक्टर पाठक जी और कुछ तहसील अधिकारियों को आज भी धन्यवाद
करते है 'जहाँ भी हो ।
फिर घर में डाँट पङी "आपके हाथ का खाना नहीं खायेगें सबको छू लिया और
सबके साथ एक ही जीप में बैठकर घूमने गयी, जाओ गंगाजल से नहाओ, '
।नहाते तो रोज ही सुबह शाम हम पश्चिमी यूपी वाले गंगाजल से ही तो हैं
कहते ही फिर डाँट पङी और वैचारिक मतभेद में पीढ़ी अंतराल सामने आ खङा हुआ

एक ही साल भीतर लगभग हर स्कूल में हम गये और वहाँ ''लङकियों के लिये अलग
तो क्या किसी तरह का कोई टॉयलेट ही नहीं था!!!!! ',मीडिया का फिर सहारा
लिया और आवाज उठा दी, 'स्कूल की प्रबंधक रुपयों का दुखङा ले बैठीं, 'और
स्थानीय विधायक को विवश होकर बजट देना पङा जिससे बालिकाओं के लिये पृथक
टॉयलेट बना और बाउण्ड्री भी ऊँची हुयी ।
फिर भी जंग जारी थी "खास खास नागरिकों की श्रेणी में बुलावा आया जब
नगरपालिका से तो वहाँ भी पहला भाषण जो ससुराल में दिया था ""सङक न होने
और गली गली कूङा ढेर लगे होने पर था ।
मुसलिम बुजर्गों की बहुलता वाली नगरपालिका के भीङ भरे समारोह में य़े कौन
"बलकटी "किस तरह खटखट चढ़ कर मंच पर बोल रही है सुगबुगाहट शुरू हो गयी और
सवालों की बौछार सग पङी 'जहाँ आज भी औरतों सिर ढँके नकाब बाँधे बिना नहीं
निकलतीं वहाँ पूरे नगर को माईक से लाऊडस्पीकर पर गंदा और अव्यवस्थित एक,,
नयी उमर की बहू कहदे????
किंतु तमाम आलोचनाओं के बीच भी नगरपालिकाअध्यक्ष से पृथक मुलाकात में हम
समझा पाने में कामयाब रहे और लखनऊ दिल्ली तक पत्रों से बात उठायी वहाँ
कुछ दूर पास के नातेदारों से भी मदद मिलॅ कागज आगे बढ़ाने में और ''लोग
एक दिन चकित थे आजादी के बाद पहली बार """नगर के भीतर ''खड़ंजा उखङने लगा
और हर चौराहे पर बङे बङे कूङेदान रखवाये गये ।
ये कूङेदान हमारी गलत सलाह ही साबित हुये, क्योंकि लोगों को आदत जब तक न
हो साफ सफाई की तब तक सफाई हो ही नहीं सकती ''।
मलिन बस्तयों और मजदूर किसान बस्तियों के जो लोग अँधेरे में नदी नाले के
किनारे जाते थे शौच को वे लोग बच्चे और बूढ़े उन कूङेदानों में पॉलिथीन
में मल भर कर फैंकने लगे और कूङा आसपास अगलबगल पङा रहने लगा 'कूङेदान
गजबजाने और बेहद दुर्गंध मारने लगे ',आखिर कार सब के सब हटवाये गये ।
और हमारे सामने सवाल आया ""गरीब मलिन बस्तियों और मजदूरों गरीब कृषकों
भिखारियों और खानाबदोश वनवासी जातियों की बस्ती में जब तक 'शौचालय सरकार
नहीं बनवायेगी वे लोग तो नहीं ही बनवायेगे,,,,, स्थानीय नेताओं से मिले
राजधानियों को लिखा और फिर मीडिया में, अंततः एक बस्ती में शौचालय बनवाया
गया ।फिर तो दूसरी और तीसरी करते करते लगभग हर मलिनबस्ती और गरीब बस्ती
में ""सार्वजनिक शौचालय बन गये ।
किंतु ये क्या लोग तो अब भी बाहर ही जाते है!!!!!
आखिरकार एक एनजीओ गठित हो गया और रजिस्टर्ड भी ।
उसकी मासिक बैठकें हम लगातार अलग अलग जगहों पर करते और वहाँ की महिलाओं
को साफ सफाई जचगी की सावधानियाँ और रोजगार के उपायों पर बताते ",,वहीं
फिर औरतें घरेलू हिंसा की शिकायतें लाने लगीं और एनजीओ ने सैकङों
परिवारों के घरेलू विवाद सफलतापूर्वक सुलझाये और महिलाओं को अस्पताल में
प्रसव कराने की जानकारी अस्पताल में मीटिंग करके दी "लङकियों को स्कूल
भेजने की जानकारी अशिक्षित महिलाओं को स्कूल में मीटिंग करके दी वहाँ
पुलिस तहसील और ब्लॉक के अधिकारी भी बुलाते और एक एक करके अनेक गाँवों
में लहर चल पड़ी ।
इसी बीच पता चला कि एक मलिनबस्ती में बीचों बीच देशी शराब की हट्टी है और
वहाँ दूर पास के गाँव तथा ड्राईवरों की भीङ देर रात तक लगी रहती है डैक
बजता रहता है और लङकियों को फिकरे औरतों को घरों में मारपीट सहनी पङती है
।पियक्कङ इसकदर अंधे हो गये कि दारू के लिये औरतों के गहने जब नहीं मिले
तो साङियाँ और बरतन गिरवी रखकर पीने लगे :एक रात ऐसी ही औरतें दरवाजे पर
रोने लगी,, मन करुणा और क्रोध से भर गया तब रात को लैंडलाईन से तीन चार
गाँवों की औरतों को इकट्ठा होने को संदेश भेजा और रात में ही औरतों ने
शराब की दुकान पर ताला डालकर अड्डा जमा दिया कुछ दिन जमे रहे 'शराबी दिन
में कुछ न कहते परंतु रात में जब बूढ़ी औरतें और समर्थक लङके रह जाते तब
धमकाते "अंततः डिप्टीकलेक्टर और स्थानीय लोगों की रोज बढ़ती समर्थन की
भीङ से एक दिन शराब ट्रकों में भरकर बस्ती से बाहर दूर रखी गयी ।औरतें
नाचती गाती आयी और हमें घर पर जब हम रात का खाना बना रहे थे फूल मालाओं
से लाद दिया ।
तब तक हमारे पङौसियों को कुछ पता ही नहीं था ।और फिर एक डाँट पङी ""परायी
आग में जलना पढ़ाना लिखाना बेकार गया ""
तब पता चला कि शिक्षा की तो हालत ही सबसे खराब है!!!!!!! और क्या करते??
तब याद आया कि ग्रेजुएशन के बाद हमने पोस्टग्रेजुएशन के साथ साथ यू बी
समाज सेवार्थ एन एस एस लीडर होने के दौरान गाँव गाँव कैंप लेकर साक्षरता
में पढ़ाया और ""कुशल प्रशिक्षक की ट्रैनिंग लेकर टीचर्स को पढ़ाकर
प्रमाणपत्र भी लिया है ।
और फिर घर पर ही चालू हुयी परदानशीन बुरकेवाली लङकियों की शिक्षा, 'जब
पहली खेप पढ़ गयी तब, एक प्रोग्राम आया है का पता चला औऱ साक्षरता केंद्र
खोल दिया, । सुबह से शाम तक कचहरी और घर की सेवा के बाद जब थक जाते तब,
दो पीरियड लेने पङते लैंप की रोशनी में पहला परदानशीन औरतो लङकियों का
जिनके पिता भाई पति अरब और खाङी देशों में थे '"दूसरे वे मदरसों के लङके
जो हिंदी इंगलिश सीखकर मौलवी बनना या अरब जाकर कमाना चाहते थे ।
कुछ सालों तक 'यही दिनचर्या रही फिर एक भीषण हादसे ने हमें अस्पताल
पहुँचा दिया । पति की रीढ़ का ऑपरेशन और अपनी टूटी टाँग के साथ घर से ही
फिर कलम तो चली हम नहीं कई साल तक, 'फिर लगा कि काफी कुछ बदल चुरा है अब
कूङा रोज उठाने ट्रेक्टर आते है ',कच्चेशौचालय नहीं है । एक बार सफाई
करने वाली सहेलियाँ अपनी बस्ती में ले गयी एक सभा में तो देखा सब बदल गया
सबके मकान पक्के हैं घरों में टॉयलेट्स हैं और सङकें पक्की हर मोङ पर
सरकारी नल लगा है औऱ कहीं भी मल के ढेर नहीं अलबत्ता सूअऱ जरूर घूम रहे
हैं बाङों में ।
©सुधा राजे


Thursday, 1 October 2015

सुधा राजे का लेख :- ग्राम्य जीवन और गऊ

गौमांस खाना भारत में 'अब कोई बङी अनोखी बात नहीं है '
किसी जमाने में बल्कि आज भी जिन गाँवों नगरों में ग़ैर हिंदू जैन और गौ
मांस खानेवाले नहीं रहते या बहुत कम रहते हैं वहाँ गौएँ झुंड के झुंड
गौचारण के लिये घरों से निकल कर चरवाहों के आगे आगे चरती हुयीं जंगलों तक
जातीं हैं और देर साँझ को घंटियाँ टनटनाती हुयी आती है ।
अपने बचपन के अनेक सुमधुर दृश्यों में से एक दृश्य यह भी था टनटनटन की
ध्वनियों के साथ घर में गौशाला के नन्हे बछङे रँभाने लगते और गाएँ भी जोर
से ''अंबाह "की सी आवाज निकालतीं रँभाती तब हम बच्चे तालियाँ बजाकर छतों
पर से चढ़कर गगन तक उङती पीली धूल को देखते और देखते कि हमारी गैया
लक्षमी गौरा भूरी और यमुना के साथ बङे बछङे मंगल और बुध भी अपना दरवाजा
आते ही गौशाला की तरफ झपटते और फाटक पर गरदन रगङने लगते जब तक कि
'तुलसीकाका दरवाजा खोलते गायें और बङे बछङे अपने अपने खूँटे पर अपनी अपनी
नाँद पर जा खङे होते जहाँ पानी के बङे बङे "बाल्टे भरे रखे होते ''दूसरे
वाले बाङे में छोटे बछङे कुदक रहे होते जो "माँ के आने का पता चलते ही
खिलंदङी पर उतर आते और मुँडेर से चढ़ने की कोशिश करते ',
हम बच्चे उनको खोल देते और तुलसीकाका ''हल्ला मचाते भागते ''अरे चोंख लओ
चोंख लओ ''काये बिन्नू राजा हरौ जौ का करौ अपुन ने 'अबई नन्नासाब हमें
डाँटन लगहें '
और हम लोग भाग जाते तुलसीकक्का की 'बेशरम बेल की छङी देखकर '
हालांकि पता था कभी मार नहीं पङेगी फिर भी ।
बछिया बाँधते बाँधते ढेर सारा दूध पी जाती और कई बार अफारा हो जाता, तब
कोंसा बाई और वैद्यजी की 'दवाईयाँ 'हिमालयन बत्तीसा और न जाने क्या क्या
घोलकर नन्हीं बछिया बछङों को पिलाया जाता बाँस की नली में भरकर '।
नगर कसबे गाँव में कोई भी घर ऐसा न था जहाँ गाएँ खङी होकर ''हुंकार न
भरती हो, 'बहुयें निकल कर पहली रोटी गुङ और मुट्ठी भर दूब या पालक चना
आदि की पत्ती लाकर गौमुख में रखती और गौ माता की गरदन पीठ खुजलाती ',
अगर गोबर मिल जाता यदा कदा तो घर भीतर ले जाती ',
गोवर्धन पूजा 'गौवत्स द्वादशी गुरुवार पितृपक्ष और लगभग हर त्यौहार पर गौ
माता को तिलक लगता आरती होती और सींग खुर पर वार्निश रंग गेरू केल रँगे
जाते ',ग्वालों को कपङे और रुपये पैसे दिये जाते और गौमाता के लिये हर
साल जाङों में ''कपङों में कपङों की परतें बिछाकर ओढ़ने हेतु "झूल "नामक
पहरावन कपङा सिला जाता 'पाँव में गोल खोखले पीतल के पैजना और सीगों पर
रंगीन मोती गले में घुँघरू और घंटी ।
कोई कोई गाय बहुत तेज भागती तो बङी भी भारी लकङी गले में टाँग दी जाती
जिससे गाय धीरे चलती और फसलों में नहीं जा पाती ।
लोग जब कटाई करते तो ''बालिश्त भर खूँटिया छोङकर काटते कटे खेतों में
',गरीब परिवार "सिलौ "बीनते यानि गिरी हुयीं बालियाँ उठाते 'जो कई
क्विंटल तक हो जाती इकट्ठी होने पर और बरसात आने तक गौएँ सबके खेतों में
निर्बाध चरतीं ।
बरसात की पहली फुहार पङते ही 'हरे हो जाते चारागार और गोबर पाथना बंद
करके खाद के लिये पङने लगता ।
कोई धोखे से भी गौ को डंडे से नहीं पीटता, 'बस ऐसे ही आवाजें लगाकर हटा
देते या बुलाते ।
गाएँ सङक के एकदम किनारे चलतीं किसी दक्ष मानव की भाँति ',और चरवाहे की
आवाज पर रुक जाती मुङ जाती, 'तालाब में पानी पीती नहातीं और पीली सफेद
लाल कत्थई भूरी चितकबरी गौएँ, 'घर घर दूध दही घी माखन छाछ मट्ठा पनीर
मावा ''की मटकियाँ भरे रखती ।
स्मृतियों का दूसरा चित्र बहुत धुँधला नहीं है, 'कि हम सब बच्चे रात को
बङे बङे नक्काशीदार पीतल के गिलासों में दूध पीकर सोते थे और सुबह दही की
लस्सी या दूध रोटी खाते, अकसर परांठे देशी घी से ही बनते या नैनू (नवनीत)
रोटी का नाश्ता होता, खीर महेरी दलिया और मावों से बनी घर की मिठाईयाँ
सदा ही अदल बदल कर घर के किसी न किसी बुखारी आलमारी या लकङी के संदूकनुमा
जाली में रखी ही रहती 'नाम बदल जाते अतिथियों के किंतु पकवान सारे हम लोग
ही खाते विशेषकर ''मगद के लड्डू मालपुआ और लौकी की बरफी तथा कत्थई वाले
पेङे ""
एक दो घटनायें सुनी और समझी सुधि आतीं है कि किसी ने जंगल में ज्वार
बाजरा के खेत मे घुसी गौ को हटाने के लिये उलटी कुल्हाङी की बेंट मारी और
लोहे का फाल लग गया, या किसी से लाठी लग गयी गुस्से में 'गौहत्या का कोई
इरादा नहीं था फिर भी ""पाप ""हो ही गया तो, घर के भीतर नहीं गया बागर से
ही ''दो कपङे और "भीख माँगकर ''तीर्थ पर चला गया "प्रायश्चित्त का सप्ताह
बिताने '। वहीं रहकर अनेक घरों से भीख माँगकर ""पूँछ के बाल दिखाकर लाठी
पर ""दोषी है भाई,,,
लोग चुपचाप भीख दे देते और 'उससे गौदान करके हवन यज्ञ करके तब घर आते और
फिर गौ सेवा में लग जाते ।
चौथ के दिन ग्वाले दूध नहीं बेचते ',बच्चों को हर पंद्रहदिन पर मुफ्त दूध
मिलता, 'जी भरकर ।
ये तब की बातें है जब "इंटरनेट मोबाईल कलरटीवी नहीं थे और '
लोग शैम्पू से बाल नहीं धोते थे पेस्ट और ब्रुश नहीं करते थे और हर घर
में यूरोपियन कमोड भी नहीं थे तब, जन्मदिन पर केक नहीं कटते थे और लोग
दहेज में लैपटॉप बाईक कार नहीं माँगते थे ',तब बारातघरों में शादियाँ
नहीं होती थी और झूले बालकॉनी में नहीं बाग में होते थे ।
तब लङकियों को कोई इतना घूरता नहीं था और पानी फ्रिज से नहीं घङे और
डंडीवाले लोटे से निकालकर "गंगासागर से पिया जाता था 'तब थालियों में
कटोरियाँ होती थी और तब 'मील "को भोजन कहा जाता था ।
जनमानस के भीतर गौ 'धरती कृषिभू राष्ट्र जन्मभूमि माता पिता गुरु और अपने
परिवार के प्रति 'अपनत्व के संस्कार थे ।
तब गाय बिआने पर 'सात दिन तक 'तेलू (खीस) बाँटी जाती थी गुङ सोंठ मिलाकर
पकाकर ',तब घर में दूध पीने से पहले 'अनाज में पकाकर खीर बनाकर और घी
निकालकर दिये देवस्थल पर चढ़ाकर ही लोग घर में दूध पीते ।
ग्रामीण जीवन की रीढ़ रहा है पशुपालन "कृषक के जीवन की कल्पना भी बिना
पशुओं के की ही नहीं जा सकती ।
गाय कोई मांस या दूध मात्र का जानवर न होकर एक परिजन होती ''अम्मा के बाद
गौ माता का ही दूध दही घी मावा छाछ पीकर लङके पट्ठे हो जाते और अखाङों
में लंगोट के झंडे बनाकर मुकाबिले जीते जाते अखाङा "ब्रह्मचारी होने की
पहली सीख से प्रारंभ होता और विवाह होते ही बंद हो जाता ',किंतु नयी
पीढ़ी आकर जगह ले लेती ।
लङके केवल हुल्लङ नहीं करते थे तब,, दम साध कर घंटों कसरत करते खेतों को
सोना उगलने पर विवश कर डालते और देश की सेवा में सीमा पर जा भिङते ।
गाँव नगर कसबे के बङे बुजुर्ग सबके बङे होते थे और किसी का भी बच्चा गलती
कर ही नहीं पाता क्योंकि कोई न कोई बङा बुजुर्ग तो देख कर टोक ही देता था

तब लोग टीवी नही देखते थे कबड्डी और खोखो के मुकाबले जीतते और तैराकी की होङ लगती ।
गौ बचेगी तो भारत फिर से बचेगा
©®सुधा राजे


Monday, 28 September 2015

सुधा राजे का अकविता :- "हमारे घर जन्मी है सोन-चिरैया "

तुम न थीं तो भी मैं थी बेटी,
तुम हो तो भी मैं हूँ बेटी '
क्योंकि तब मैं माँ की बेटी थी,
अब बेटी ममता की पिटारी लेकर मुझे वैसे ही बचाती है जैसे माँ,
मैं माँ थी जब बेटी थी ",,माँ के कुंतल स्नेह से सींचती सँवारती पदनख
आलता महावर मेंहदी रखती, माँ की साङी पर गोटा टाँकती, ''मैं अब भी माँ ही
बस हूँ जैसे और कुछ भी नहीं जैसे विश्व की सब लङकियाँ मेरी बेटी लगने
लगतीं है प्रायः मुझे, और मैं झगङती रहती हूँ उनके लिये अनजानी छायाओं
से, टाँकती रहती हूँ उनकी कमीजों पर बारूदी विचारों से भरी कविताओं के
सितारे और रचाती हूँ उनके हाथों में मेंहदी के रूप में अपनी जिजीविषा की
सुर्ख अभिलाषायों सपने भरोसे स्वयं पर और अविश्वास करना सिखाती रहती हूँ
हर आलता महावर और रंग रूप की परिभाषा पर, '
मेरी बेटियाँ हर नगर में हैं हर गाँव में हैं और चाहती हूँ वे कलम उठायें
मंच पर चढ़े माईक और कीपेड पर अभिव्यक्त हो अक्षरों में उतरें और सृजन
करे नयी सृष्टि के नये वास्तु का जहाँ रसोई घर में माँ और बेटी बहू ही
होनी जरूरी नहीं होगीं नहीं होगा केवल उनके ही हिस्से परिवार की हर गंदगी
साफ करने का दायित्व न ही, केवल उनकी ही होगी अग्निपरीक्षा और न ही केवल
उनको ही होना पङेगा बाबुल माँ के घर से विदा न केवल वे ही होगीं हर
'संस्कार की बलिवेदी पर ज़िबह "
मैं जानती हूँ ये सब एक दिन होकर रहेगा और चाहे वह सुबह देखने से पहले
मुझे नींद आ जाये "परंतु तुम सब देखना मेरी बेटियों ',एक दिन सचमुच आधा
गगन आधी धरा आधी हवा सिर्फ तुम्हारी होगी और तब ',
थाली बजाती हुयी घर घर हर बेटी के जन्म पर एक 'आवाज गूँजेगी मेरे ही
गीतों की कंठ कंठ से ""हमारे घर जन्मी है सोन चिरैया,, छत पे नाचे बाबुल
अँगनवा में दादी, द्वारे पे नाचे हैं बेटी के भैया "
©®सुधा राजे
शब्दशः मौलिक रचना
--

Sunday, 27 September 2015

सुधा राजे की कविता :-"मेरी बेटी"

तुम न थीं तो भी मैं थी बेटी,
तुम हो तो भी मैं हूँ बेटी '
क्योंकि तब मैं माँ की बेटी थी,
अब बेटी ममता की पिटारी लेकर मुझे वैसे ही बचाती है जैसे माँ,
मैं माँ थी जब बेटी थी ",,माँ के कुंतल स्नेह से सींचती सँवारती पदनख
आलता महावर मेंहदी रखती, माँ की साङी पर गोटा टाँकती, ''मैं अब भी माँ ही
बस हूँ जैसे और कुछ भी नहीं जैसे विश्व की सब लङकियाँ मेरी बेटी लगने
लगतीं है प्रायः मुझे, और मैं झगङती रहती हूँ उनके लिये अनजानी छायाओं
से, टाँकती रहती हूँ उनकी कमीजों पर बारूदी विचारों से भरी कविताओं के
सितारे और रचाती हूँ उनके हाथों में मेंहदी के रूप में अपनी जिजीविषा की
सुर्ख अभिलाषायों सपने भरोसे स्वयं पर और अविश्वास करना सिखाती रहती हूँ
हर आलता महावर और रंग रूप की परिभाषा पर, '
मेरी बेटियाँ हर नगर में हैं हर गाँव में हैं और चाहती हूँ वे कलम उठायें
मंच पर चढ़े माईक और कीपेड पर अभिव्यक्त हो अक्षरों में उतरें और सृजन
करे नयी सृष्टि के नये वास्तु का जहाँ रसोई घर में माँ और बेटी बहू ही
होनी जरूरी नहीं होगीं नहीं होगा केवल उनके ही हिस्से परिवार की हर गंदगी
साफ करने का दायित्व न ही, केवल उनकी ही होगी अग्निपरीक्षा और न ही केवल
उनको ही होना पङेगा बाबुल माँ के घर से विदा न केवल वे ही होगीं हर
'संस्कार की बलिवेदी पर ज़िबह "
मैं जानती हूँ ये सब एक दिन होकर रहेगा और चाहे वह सुबह देखने से पहले
मुझे नींद आ जाये "परंतु तुम सब देखना मेरी बेटियों ',एक दिन सचमुच आधा
गगन आधी धरा आधी हवा सिर्फ तुम्हारी होगी और तब ',
थाली बजाती हुयी घर घर हर बेटी के जन्म पर एक 'आवाज गूँजेगी मेरे ही
गीतों की कंठ कंठ से ""हमारे घर जन्मी है सोन चिरैया,, छत पे नाचे बाबुल
अँगनवा में दादी, द्वारे पे नाचे हैं बेटी के भैया "
©®सुधा राजे
शब्दशः मौलिक रचना


सुधा राजे का लेख :- ""ये कौन पत्थरकार हैं???"""

कई बार हम इस बात पर आपत्ति जताते आये हैं कि """"""मीडिया में क्रिमिनल
का चेगरा तो ब्लर कर दिया जाता है """""किंतु अनेक छोटे बङे पत्रकार
अखबार और चैनल अकसर कहीं भी आती जाती बैठी खङी और खाती पीती पूजा करती
नाचती या झगङती "स्त्री का फोटो "
★बिना उसे बताये बिना उससे पूछे और राजी लिये कहीं भी छाप देते अपलोड कर
देते हैं और दिखा देते हैं """"


बारिश में भीगती लङकियाँ!!!!!!

अजी पत्रकार साब !! लङके क्यों नहीं दिखते????????

धूप से चेहरा ढँकतीं लङकियाँ!!!!!!!ओ जी फोटूगिर्राफर!!साब !!!! बुजुर्ग
और लङके भी तो मुँह ढँकते हैं धूप से!!! वे सब क्यों नहीं टिपते????

कहीं न कहीं ""का तकिया कलाम हकलाते र्रीपोर्टर्र लोग भी कैमरा वहाँ के
हालात पर कम युवतियों और महिलाओं पर ही फोकस करते रहते हैं अकसर????


किसी "सगे की मौत पर विलाप करती महिला को होश नहीं सुधबुध नहीं और नितांत
निजी भावनात्मक पलों की तसवीर बिना उसके चाहे मरजी लिये ""दिखाना??????


कहीं पति पत्नी में झगङा हो रहा है (इन टपोरी पत्रकरुओं का भी होता ही है
अकसर बीबी माता बहिन बेटी से झगङा तो) उस झगङे को भी तत्काल चटपटी खबर
बनाकर डाल दिया??,??????


कल को सारा समाज जो जो नहीं भी जानता उस लङकी उस स्त्री का जीना हराम कर देता है ।

ऐसे हजारों मामले आते रहे हैं कि ""मीडिया में इतना फोकस कर दिया
फोटोग्राफरों ने किसी लङकी या स्त्री को कि उसकी 'अस्मिता ही खतरे में पङ
गयी "

अकसर उन लङकियों को पता ही नहीं!!!!!!!

क्या लङकियाँ कहीं निकले आयें जायें ही नहीं?????

पूछो पत्तरकार महोदय जी से उनके के परिवार की औरतों से कि अगर तुम्हारा
भी फोटो 'चाट खाते 'ब्यूटीपारलर जाते 'छत पर बाल सुखाते बारिश में मजबूर
बाईक या कार से उतरकर पेङ या टीनशेड के नीचे खङे होते या कॉलेज स्कूल
अस्पताल कहीं भी आतो जाते 'सिनेमाहॉल या कैंटीन ढाबे होटल में से,,,,,,,

क्लिक करके "अपलोड कर दें और हजारों लोग कमेंट्स करें तो पत्तरकार साहिब
को लगेगा अच्छा?????

क्यों?
केवल इसलिये कि स्त्री ""आई कैचिंग मटेरियल बना डाली है मीडिया ने,??????

तो हैं न हाजिर हजारों मॉडल्स!!!!!
दाम दो फोटो लो?????

कई लोगों के तो फोटो "महिला मजदूरनी का झोपङा और वर्कप्लेस पर दूध पिलाते
फोटो चोरी से???
गंगास्नान पर नहाती महिलाओं के फोटो,????

छिः छिः छिः
डूब मरो चुल्लू भर पानी में!!!!

देश में अपराध है अव्यवस्था है और सजनात्मक उपलब्धियाँ है उनके लिये न
दिमाग है न समय,,,

तो ऐसे लोगो को कहे क्या?? भँडवा या दलाल?
जो बिना इजाजत किसी स्त्री के निजी पल सार्वजनिक करके रोजी रोटू कमाता है????
लानत्त, धिक्कार


एक बात की गारंटी है कि अगर पता चल जाये उन सबको तो """पत्तरकार को ""सदा
को बेकार बेगार कर डालें वे सब """

किंतु नहीं
अकसर लङकियाँ जिनके फोटो बिना इजाजत खीचे जाते हैं उनको पता ही नहीं होता '

और होता भी है तो डरी सहमी या घबरायी या अनभिज्ञ और धोखे में होती है ।

कई स्त्रियों को पता ही नहीं कि उनका फोटो "नेट पर खबर में प्रिंट में
टीआरपी और कमेंट का मुद्दा है ।

ये एक अपराध है
और ऐसा हर फोटोपत्रकार और इसे छापने वाला अखबार मीडियाचैनल और सोशल
मीडिया एकाउंट धारक ""एक अपराधी है ""
जागरूक प्रत्येक नागरिक का कर्त्व्य है कि महिलाओं का जीवन उनकी
"प्रायवेसी उनका मौलिक हक है "और बिना उनकी मरजी के इस तरह के फोटो खीचना
चुराना छापना दिखाना शेयर करना गंभीर अपराध माना जाना चाहिये ।

ऐसे लोगों पर तत्काल काररवाही होनी चाहिये ताकि आप सबके परिवार की
महिलाओं की गरिमा और प्रायवेसी भी सतत सुरक्षित रहे ""
©®सुधा राजे


Saturday, 26 September 2015

सुधा राजे का लेख :- "जीवन जीने के लिए है"।imp

जो दुःख से घबरा जाये वह न तो पुरुष कहलाने लायक है न ही हिन्द की नारी """"""
क्योंकि दुःख केवल एक वैचारिक अवस्था है,,, और वह योगी जो दरिद्र है खूब
हँस सकता है ',परंतु एक भोगी जो हर तरह से साधनवान है जरा पत्नी या
प्रेमिका रूठने या नौकरी में सस्पेन्ड हो जाने या धन की हानि या परिजन की
मृत्यु से घबराकर आत्महत्या कर डालते हैं!!!!!!!!!
कायर हैं वे सब
क्लीवता पौरूषहीनता या स्त्रीत्वविहीनता नहीं वरन "साहसहीनता " का ही
दूसरा नाम 'है ।
आत्महत्या
मतलब ईश्वर की बनाई एक अद्वितीय रचना का अंत करने का महापाप!!!
जो तुम बना नहीं सकते उसे तोङने का हक तुम्हें नहीं है ।
जीवन चाहे आप स्वयं का समझते हो अपनी देह अपने जीवन का स्वामी परंतु आप
हैं नहीं ',,,,
क्योंकि जो चीज आपने खरीदी नहीं बनाई नहीं जिसका मूल्य भी नहीं चुकाया वह
आपकी कैसे??
आप उस मुफ्त की मशीन तक के मालिक नहीं हो सकते जो केवल साईकिल में हवा भरती है!!!!
तो उस जटिल महामशीन के स्वामी कैसे हो सकते हो बिना मूल्य चुकाये जिसका
आप एक नाखून , एक बाल तक बनाना नहीं सीख पाये आज तक??????
इसका स्वामी है आपका ईश्वर आपकी माता आपके पिता आपकी पत्नी आपके बच्चे आप
पर आश्रित आपके परिवार देश समाज के वे सब लोग ""जिन जिन को आपके न होने
पर '''बुरा दयनीय और दुखी जीवन जीने को विवश होना पङेगा """

क्या आप मर जायें और संसार में एक का भी जीवन दुखी न हो ऐसा हो सकता है????
कदापि नहीं,,,
क्योंकि यदि आपका परिवार है तो परिवार की आशा और भविष्य वर्तमान के अनेक
छोटे बङे कार्य सुख दुख आपके हवाले हैं ।
और यदि आपका संसार में न कोई मित्र है न परिवार न शुभचिंतक तो भी,, चूकिं
आपको ईश्वर ने बनाकर भेजा है भारमुक्त करके तब तो आप और भी अधिक विशद
उत्तरदायित्व लेकर आये हैं उन सबके प्रति जो जो अनाथ हैं दयनीय हैं जिनका
कोई रक्तसंबंधी या परिवार मित्र या शुभचिंतक नहीं है, 'वे केवल आपकी ही
बाट जोह रहे हैं । उनके लिए ही ईश्वर ने आपको बनाकर भेजा है । जाकर
देखिये कुतना कार्य शेष है!!! आपको कई जन्म लेने पङेंगे तब पूरा होगा ये
महाकार्य, और इसके लिये ये देह रूपी यंत्र बीमार या कमजोर नहीं चल सकेगा
तो
आपका ही सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह मशीन पूर्ण स्वस्थ और सुचालित हो
उसके सब अंग सही सही कार्य कर रहे हों ।
आप इस देह रूपी यंत्र के केवल चालक मात्र है यह आपको केवल कर्त्तव्य पूरे
करने को सौ सवा सौ साल के पट्टे पर मिले 'संयंत्र की ही भाँति है ।आप रोज
व्यायाम नहीं करेंगे तो, रोज सही और संतुलित ढंग से चलना बैठना सोना खाना
नहीं रखेंगे तो, यह संयंत्र खराब हो जायेगा, 'आप इसको चलाना तक तो जानते
नहीं!!!! सीखने में ही सात से सत्तरह साल लग जाते है ।
देखो किसी नट को, एक्रोबेट को, किसी जिमनास्ट को, किसी धावक को, मल्ल को,
वह इसी पिलिपले रहने वाले शिशु असहाय शरीर को चलाना सीख कर ही कलाकार
खिलाङी नर्तक नट और जिमनास्ट या तैराक मल्ल या एक्रोबेट बना है ।
इस देह को जीतो, 'इसे अपने इशारों पर चलाना सीखो, यह खूब जानता है कि सही
स्वामी का कैसे आज्णापालन करना होता है ।
बढ़िया शरीर पैदाईशी नहीं मिलता निर्माण करना पङता है पाँच साल की आयु से
ही सीखने लगते हैं संगीत नबत्य युद्ध और खेल "'''तो क्यों नहीं इसे ढाल
लेते अपनी आवश्कताओं के अनुरूप ऐसे भी तो लोग है जिन्होने भूख नींद वासना
कामेच्छा और निर्बलता पर विजय पाकर "जितेन्द्रिय की उपाधि पाई, उनको न
किसी वस्त्र के आडंबर की आवश्यकता रही न लेप और आभूषणों की उनकी तो देह
ही दिगंबर सुंदर निर्विकार हो कर रही ',
प्राण इसका "रिचार्ज वाऊचर है चार्ज्ड बैटरी है 'और यह तब तक शिथिल नहीं
पङती जब तक कोई "यह न सोचे कि मैं तो इससे अच्छा कि मर जाऊँ,,,
क्यों सोचो फिर मरने की?
जिओ
जब अपने लिये जीने का बहाना न रहे तब ही जीवन का असली अर्थ समझ में आता
है, 'और यह भी समझ में आता है कि पीङा जब मुझे इस बात पर इतनी हुयी तो
मुझसे और भी जो वेग हैं वे ऐसी ही पीङा और इससे भी भयंकर दर्द दुख कैसे
झेलते होंगे ',
कुछ लोगों से मिलो तो सही जिन्होने जीवन का वरण किया, अरे मरना तो बङा
आसान है 'नब्ज काट लो फाँसी लगा लो पेङ के नीचे कूद पङो जहर खालो,
'""""""किंतु जीना कितना कठिन!!!!!! हर पल साँस लेनी पङती है, हर पल पेट
से हर कोशिका तक रक्त और ऊर्जा ऑक्सीजन और पोषण का प्रवाह जारी रखना पङता
है ।तीन मिनट को साँस न मिली और जीवन खत्म!!!!!!!!
जीकर दिखाओ, 'है हिम्मत तो जिओ 'मर तो बाद में भी सकते हो पहले ये सोचो
कि क्या क्या लाभ इस सवा सौ साल की आयु का संसार को तुम दे सकते थे और
दिया नहीं!!!!! क्या क्या ऐसा कर सकते थे कि कुछ लोग तो सुखी हो जाते!!!!
करोङ रुपया देकर भी अगर जीवन मिले तो करोङों लोग जीवन खरीदने को तैयार
बैठे है अपना और अपनो का ',कोई भला स्वस्थ देह के होते हुये गरीब कैले हो
सकता है????
ये मकान किसके लिये? शरीर के लिये? और ये कपङे गहने लेप चूर्ण और रंग??
यब के सब इसी तन इसी देह के लिये???
तो ये सब तो एक मशीन की एसेसरीज ही हुयी न??
सोचो जब कवर और रख रखाव जिस मशीन का ऐसा है तो वह मशीन कितनी कीमती होगी????
अरबों के हीरे मिलकर भी एक मनुष्य का सवा सौ साल का स्वस्थ जीवन नहीं बना सकते तो?
यह देह हो गयी अरबों की और आप अरबपति खरबपति नील शंख और पद्म पति!!!!!
इतने धनवान होकर भी आपको इस कीमती देह का क्या निकृष्ट प्रयोग समझ में आया??
अरे यह शरीर ही तो पूँजी है नट की खिलाङी की धावक मल्ल और योद्धा की
कलाकार की और नर्तक की गायक की और वादक की!!!!!!!

इस शरीर का जो ड्राईवर है सोचो फिर वह कितना गुणवान होगा 'मन 'ये मन जिसमें
हाथ पाँव कमर यौनांग और कंठ नहीं
बल्कि
विचार बुद्धि सोच चिंतन आविष्कार शोध विश्लेषण औऱ विद्या की शक्ति है!!!!!!!
वह तो शरीर रूपी महासंयंत्र के सबसे सुंदर कक्ष में बैठा उसका 'संचालक है "
अगर मन ही मालिक बन गया तो आप तो गये काम से '
मन मनमानी करते करते प्रबंधक से कब स्वामी बनकर देह को हङप जाये पता न
चले यदि ये "सही नियंत्रक यात्री ''आत्मा जो इस संसार की यात्रा पर आयी
है अपना दायित्व भूलकर रमने लगे यंत्र के क्रिया कलाप के सुख लेने में!!
आपने कार ली या मोटरसाईकिल या कंप्यूटर "क्या उसकी चेसिस और हार्डवेयर को
ही रोज कोलीन से चमकाकर बैटरी चार्ज करके ईधन भरकर रखते रहोगे????
या इससे कुछ काम भी लेना है??
मनोरंजन जिस जिस चीज से होता है वह तो "मैनेजर का आनंद है '"'
वह तो उस ड्राईवर का आनंद है जो आपकी कार आपकी बस रेलगाङी चलाते समय जोर
जोर से रेडियो ऑडियो वीडियो पर कुछ संगीत सुन रहा या मोबाईल पर देख रहा
है ',सावधानी हटी और दुर्घटना घटी मन रूपी एक मनोरंजनवादी चालक को मन की
करने दोगे तो होगा यही वह ""गाङी ही ठोक देगा कहीं बीमार कपेगा चटोरेपन
से कभी आलस में गाङी चलायेगा देर करेगा हर काम में कभी स्पीड ज्यादा रखकर
गाङी ही तोङ डालेगा ।
तो ""आत्मा रूपी यह पट्टेदार यात्री अपने माल यानि गाङी रूपी देह की सही
सुरक्षा चाहता है तो मन रूपी संचालक पर काबू रखे ',
ताकि ऐसा नियम बना रहे कि जो जो मन चाहे वह सब तभी करने दिया जाये जब वह
सब करना गाङी को नुकसान नहीं दे रहा हो और आत्मा रूपी पट्टेदार मालिक
यात्री को दिये सवा सौ साल के समय के भीतर उस पर सौंपे गये दायित्व भी
पूरे हो सकें ।
देखो, 'ये शरीर सिर्फ तीन दशक के लिये मिला शंकराचार्य को ',विवेकानंद
को, दयानंद को, और उन सबने कितने कम समय में कितने सारे कार्य कर
डाले!!!!!
यही शरीर आपके पास है ',क्यों इसका बेहतर उपयोग नहीं, 'ये स्त्रीपुरुष का
प्यार ये बङी हवेली जेवर कपङे वाहन की होङ,,,,,, अपनी जगह तक सीमित
अर्थों में ही तो, 'आपके मोबाईल कंप्यूटर या बाईक की ऐसेसरीज ही तो
हैं!!!! ये ध्येय नही!! ये साध्य नहीं!!! ये केवल संसाधन हैं ।
साध्य तो वही ""चुनौती है जो दाता परमात्मा ने एक विचित्र संयंत्र एक
चालक सहित देकर भेजा कि जाओ और कर दिखाओ इस संसार में ; जो जो कुछ वहाँ
देख समझकर समझ पाओ कि मानवदेही होने को नाते करना तुम्हारा सही उपयोग
है!!
तो क्या किया आपने परमात्मा को बताने के लिये!???
अपने पीछे रह गये लोगो में चर्चा को छोङ जाने के लिये,??
कौन कहता है 'मर गये कबीर? कौन कहता है मर गये नानक,, अरे मर तो वह रहा
है जो जीवन की आपाधापी में केवल मशीन ही धो पोंछकर रोज सजाये जा रहा है
बिना इसका सही उपयोग करे ।
ये दस उंगलियाँ 'दो नेत्र एक पूरी ज्ञान और कर्म की श्रंखला पर काबू पाने
को हर पल स्मृति रखता आविष्कारक मन और इसमें भी आपको अगर लगता है कि देह
का अंत ही सही राह है तो डरपोक कायर क्लीब और कृतघ्न शब्द भी काफी नहीं
आपके लिये ',दुख तो सब पर पङता है कोई बह जाता है कोई ',सह जाता है,
'किंतु मानव वही सच्चा है मानव जो न बहे न केवल सहे अपितु अपना दुख
बिताकर बिसरा दे और दूसरों के दुख का सहारा बनकर बाँह गहे!!!
आप युवा हैं या वृद्ध स्त्री हैं या पुरुष अगर इस सबको जानसमझ कर भी मरना
ही चाहते हैं तो मर जाईये ',पहले उन सबको मार डालिये जो आपके पीछे दर्द
दुख और यातना का अभिशप्त जीने वाले है । उस माता को मार डालिये जिसने नौ
माह कोख में रखा जमाने के सौ सौ ताने दुख कलह सहकर पाला पोसा इस आशा में
कि बेटा या बेटी एक दिन बङे होकर सहारा बनेंगे ',।
और इतने पर मरना है तो एक आखिरी निवेदन है कि मरिये चलो किंतु ये देह जब
आप खत्म करना ही चाहते हैं तो जैसे फालतू सामान दान कर दिया जाता है जब
गृहस्वामी के काम का नहीं रहता ।
दान कर दीजिये देश को समाज को दीन दुखी दरिद्र अनाथ और मरणासन्न जीवन
जीते उन लोगों को जो जीवित रहने की आशा में 'रोज मरते हैं ।
आप को कुछ तो ऐसा आता होगा ही जो किसी के सेवा कार्य में लग जाये? सोच लो
कि अब आप मर गये ।ये देह आपकी नहीं आपने देश को दान कर दी ।
माता पिता परिवार या समाज के दुखियों को दान कर दी ',अब आप इसके अधिकारी
नहीं इस देह को सैनिक की भाँति मजबूत रखकर शहीद की भाँति तत्पर रहना है
जीवित रहकर सेवा करने और देश हित मानवहित में आवश्यक हुआ तो देहोत्सर्ग
करने को ।
आप अकेले हैं? तो किसी और को जो आपसे अधिक दुखी और अकेला हो का साथ
दीजिये बिना अहसान जताये ।
दुख और अकेलापन दोनों ही बाँटने से आधा रह जाता है '
"सुधा "मनुज की देह में
रोम रोम हरिवास
अणु अणु में ब्रह्मांड शिव
शक्ति, अनत प्रति श्वाँस

©®सुधा राजे


Friday, 25 September 2015

सुधा राजे का लेख :- ग्राम्यजीवन और शाकाहार ::-- पुनः करें विचार

ग्राम्यजीवन और शाकाहार,
पुनः करें विचार
(सुधा राजे ',का लेख)
::::::::::::
:::::::::::::::::::::
आप चाहे किसी भी धर्म से हों या किसी भी क्षेत्र से 'प्रकृति के प्रति
आपका दायित्व कम नहीं हो जाता केवल इसलिये कि आपका मजहब आपको माँसहार की
आज्ञा देता है, विज्ञान की तमाम शोधों के बाद यह पूरी तरह स्पष्ट हो चुका
है कि पृथ्वी पर पर्यावरण संतुलन बुरी तरह बिगङ रहा है ।और इसके बिगङने
के पीछे सबसे बङा कारण है मानव का लालची स्वभाव, 'पशुओं का जीवन
अन्योन्याश्रित होता है ।आप कभी डिस्कवरी चैनल देखते होगे तो यह साफ समझ
में आता है कि हिंस्र कहे जाने वाले पशु भी केवल बहुत भूख लगने पर ही
शिकार करते हैं और पेट भरा होने पर माँसाहारी और तृणपत्र जीवी सब एक ही
मैदान जलाशय में आमने सामने विचरते आराम करते रहते हैं ।किन्तु मनुष्य?
वह तो भूखा न होने पर भी हर रोज पूरे विश्व में बङे पैमाने पर हिंसक रहता
है पशुओं के प्रति भी और प्रकृति के प्रति भी!!! मनुष्य ने एक तो वैसे ही
अपनी देह और परिवार की आवश्यकता की तुलना में बहुत बहुत बङे मकान इमारतें
सङकें बनाकर जंगल के जंगल साफ कर डाले जिससे अनेक पशु तो पहले ही लुप्त
हो चुके हैं ।अब जो बचे खुचे हैं उनको वह चमङे माँस और हड्डी रोयाँ और
खून प्राप्त करने के लिये रोज मारता रहता है । समंदर के जलजीव इतने खाये
किवअब मोती वाली सीप का होना दुर्लभ हो गया, जंगली पशुओं का रोमांच के
लिये इतना आखेट किया कि शेर चीते और सिंह दुर्लभ हो गये, ।
समय के साथ हर चीज का संशोधन होता रहता है, मनुष्य ने खेती और बागवानी
जबसे सीखी है 'तब से जंगल ही मिटते गये, और पशुओं के रहने कि लिये बहुत
कम जगह रह गयी, ये भी तेजी से फर्नीचर और टिंबर की जरूरत के अलावा ईधन के
लिये बहुत तेजी से खत्म की जा रही है ।यही वजह है कि आज "वननर "यानि बंदर
नगरों में ही रहने लगे हैं और जंगल के करीब के गाँवों में हिंसक पशु
शिकार करने लगे हैं मनुष्य का । नदियाँ पहले ही नगरों का मलमूत्र गटर
सीवर मिलों का गंदा नाला और नगर भर का कचरा डालकर प्रदूषित की जा चुकी
हैं ।ऊपर से बाँध बनाकर नदी के प्रवाह रोक दिये गये हैं ।तो जंगली पशु
प्यास के कारण जब बेहाल होते हैं तो नगरों गाँवों की तरफ भागते हैं और
हमलावर समझकर मार डाले जाते हैं ।
मनुष्य मावव चोरों से रखवाली के लियेअनुपयोगी जानवर जो रोटी बिसकुट खाता
है दूध पीता है ऐसा कुत्ता पालता है!!!! और गाय भैंस बकरी भेङ ऊँट जो
गरम वस्त्र दूध और मावा पनीर दही घी माखन मट्ठा छाछ क्रीम मिल्कपाउडर '
और अनेक तरह की मिठाईयों के लिये 'खोआ देते है उनको खा जाता है???
कल जिस भारतदेश में दूध दही घी घर घर मामूली बात थी आज 'वहीं ईदुलफित्र
पर शीर और खीर बनाने को ""तीन सौ चार सौ रुपये वीटर पर भी दूध नहीं
मिलता!!!!!!
जिस भारत में घर घर मेहमानों को दूध का आधी लीटर वाला गिलास और गुङ देकर
स्वागत किया जाता था 'बच्चा भोर ही माखन रोटी माँगता था हर व्यक्ति की
थाली में घी चुपङी रोटी होती थी "अगर घी कदाचित नहीं लग पाया तो उसे
"रूखी सूखी "रोटी कहकर दुःख दिखाया जाता था ''आज लगभग अमीर गरीब सबकी
रोटी ही "रूखी सूखी हो चली है!!!!
आज चावलों में घी नहीं पङता तेल से छौंकना मुहाल है दाल घी को तरस गये
हैं बच्चे!!! अकसर आधुनिक परिवारों में तो 'घी कभी आता ही नहीं गरीब की
तो फिर कहनी ही क्या है!!
हलवाईयों के घर जाकर देखें तो अधिकांश मिठाईयाँ "नकली "मावा नकली बेसन
नकली घी नकली पनीर और नकली दही से बनने लगी है ।
लोग अब दीवाली दशहरे राखी होली गणेश पूजा, शिवरात्रि पर भी मिठाई खरीदने
से कतराने लगे है ',ये उस देश का हाल है जिसमें कोई राहगीर भी पानी पीने
घर के द्वार पर ठहर जाता तो हमारी दादी नानी काँसे पीतल की थाली में चार
लड्जू चार पेङे रखकर कँसकुट के लोटे और फूल के गिलासों में जल भिजवातीं
थी!!!!! बिना मिठाई मुँह में डाले कोई मेहमान पानी पीता ही नहीं था!!!
आज बच्चों के जन्मदिवस पर सौ दो सौ ग्राम का केक और नन्ही नन्हीं चॉकलेट
टॉफी ही मिठाई की जगह बङी नेमत बन गया है!!!
उसपर भी क्या भरोसा है कि केक में चॉकलेट में मिला क्या क्या है?
नवजात बच्चे जिनकी माता की छाती में दूध नहीं उतरा क्योंकि नौ माह तक
माता गर्भिणी को दूध दही पोषाहार मिला ही नहीं रक्ताल्पता की शिकार है तो
"नवजात शिशु क्या पीये??? पशु तो खा गये माँसभक्षी और बाजारवादियों ने
मिलावटी मिल्क पाऊडर बाजार में "दूध के नाम पर बेचना शुरू कर दिया!
आखिरकार मिल्क पाऊडर भी तो दुधारू पशुओं के दूध से ही बनेगा न? अगर एक
देश में हरा चारा और पत्ती है तो वहाँ बहुत से पशु लगभग हर घर में एक गाय
एक भैंस एक बकरी पाली जा सकती है तो ',जिन देशों में चारा नहीं वहाँ के
बच्तों बूढ़ों जवानों को डिब्बाबंद दूध और दूध से बने पदार्थ निर्यात
किये जा सकते हैं । माँसाहार जिन मानवों के लिये अंतिम आहार नहीं है मतलब
जब कि वे अन्न फल सब्जी दूध सब खाते ही हैं तब तो, उनका चटोरापन ही कहा
जायेगा न!!!! वनवासी भी जो कंदमूल और बाँस वृक्ष के तने और पत्ते खाते
हैं माँस को अंधाधुंध नहीं खाते, मजबूरी होने पर विकल्प न होने पर भी
क्या भूख से बेहाल पिता माता बङा भाई बहिन अपने ही बच्चों को नरम नरम
ताजा गोश्त और खून हड्डी के लिये खा सकते हैं? नहीं क्योंकि वे नरनारी के
अपने बच्चे है, तो लहू माँस खून की चटोरी के लिये हँसते किलकते किसी
मेमने बछङे कटङे पाङे या पशु की हत्या क्यों? क्या भूख से मरने की स्थिति
रह गयी थी?? अगर ऐसा ही था तो परिवार का एक सदस्य मार के खा लेते फिर
दूसरा, क्योंकि ये सब पशु भी हम मानवों के सहजीवी हैं हमारा परिवार, '
अगर स्वाभाविक मृत्यु से भी पशु मरता बै तो भी हड्डी चमङा और अनेक उपयोगी
चीजें तो देकर ही मरता है ।
वैसे भी पशुओं की आयु मानव की तुलना में कम है ।
इनसे आठ दस साल दूध लिया जाता है और आगे की संतति ।
आज पेट्रोल डीजल की गंदी हवा ने क्या हालत पर्यावरण की कर डाली है सब
जानते है "बैलगाङी घोङागाङी भैंसागाङी ऊँटगाङी और उनसे खेती ढुलाई आज याद
कीजिये 'न तब जमीन धँसती थी न खाद की कमी से रासायनिक खादें डालकर खेत
बंजर होते थे, न तब कभी सवारी के लिये प्रदूषण पहली चीज थी ।
हमें प्राकृतिक चक्र का अर्थ समझना होगा, ट्रैफिक जाम में घंटों धुआँ
पीने से अच्छा था बस जरा सा धीरे धीरे चलना ।
ग्रामीण जीवन भारत की रीढ़ रहा है और ग्राम्यजीवन शैली ही प्रकृति की
सर्वोत्तम मित्र संस्कृति रही है ।
भारत का कृषक ग्रामीण कभी किसी का दास नहीं रहा, क्योंकि उसके पास दूध था
और के लिये पशु थे 'उसके पास बैल थे और सामान ढोने खेल जोतने के बैलगाङी
हल और पटेला थे ।
उसके पास गोबर की खाद थी और पेङों की हर शरद में होने वाली काट छाँट से
उपलों कंडों से प्राप्त ईधन था, 'चार महीनों का गोबर खेत में और आठ का घर
लीपने और चूल्हा जलाने में, '
रोज धुआँ करने को पत्तियाँ और रोज खाने को बेर जामुन अमरूद जंगलजलेबी केला नारियल '
छप्पर के नीचे पशु चरते और छप्पर के ऊपर तोरई लौकी कद्दू परवल सेम पेठा
लोबिया ग्वाँर और खीरा फूट करेला कचरिया के फल सब्जी थे ',
बिना आर्सेनिक्स और फ्लोराईड वाले जल की साफ नदियाँ और कुयें थे औऱ पानी
रखने को कुम्हार के मटके पीतल के गगरे और सिंचाई को रहँट थे ।
गाँव का कृषक स्वावलंबी था ।
पीपल के नीचे मंदिर के आँगन में पंडित जी थे और पढ़ने को लकङी की पाटी
कलम और चूने की खङिया थी ।
लिखने को सियाही और सुनने को नौटंकी रामलीला तमाशा मेला बाजा माच और जात्रा थे ।
मिट्टी के घर मिट्टी की खपरैल और मिट्टी की ईटों के खडंजे से कभी जल कम
रहने देने वाला वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम था "
नहाने को "पङोह मिट्टी मुलतानी मिट्टी 'हिंगोटे के फल रीठा 'और पहनने को
हथकरघे का गाढ़े का लट्ठा खादी, ।खेलने को मलखंब कबड्डी झूले रस्सी दौङ
कुश्ती अखाङे और तीज त्यौहार के हाँडी दही के चुनौतियों के जोश थे । गाने
को लोकगीत बजाने को ढोलक मँजीरे बाँसुरी अलगोजे और सारंगी थे
आज वे सब चीजे छूट गयीं और रह गया हर तरफ माँसाहार, 'प्लास्टिक, कंक्रीट,
शोर और कमरे में बंद टीवी कम्यूटर मोबाईल तक सिमटी दुनियाँ ।
लोग घरों में गमले रखते हैं लॉन बनाते हैं किंतु "उगाते है कैक्टस फर्न
क्रोटन और तमाम सजावटी पौधे!!!
भारतीय जीवन शैली में रसोई के जल से सिचिंग गृहवाटिका में "टमाटर धनिया
मिर्ची खीऱा बैगन पालक के साथ आँगन में तुलसी करीपत्ता और अजवाईन का पौधा
रहता था आगे चबूतरे बरामदे के सामने केला नारियल आँवला आम अमरूद शरीफा
लीची लगाने की परंपरा थी '
द्वार के पास ही 'अकौआ लगता था जो कि सब जानते है जोङों के दर्द की
बढ़िया दवा है, 'घमरा नामक पौधा तत्काल रक्त बंद कर देता है लोग खप्पर
में लगाकर रखते थे "'
चिङियों के लिये पाँच पूली मक्का ज्वार बाजरा धान गेहूँ हर घर के बाहर
भीतर मुँडेर से बँधी रहती थी ।
प्रतिमायें कच्ची मिट्टी की होती थी या नदी का प्राकृतिक पत्थर ही शंकर
सालिगराम गोमती लक्ष्मी 'होता था ।मंदिर में सभा सम्मेलन के बहाने हर
पूर्णिमा प्रदोष एकादशी और तीज त्यौहार को लोग हर दबसरे व्यक्ति के
समाचार से सजग रहते थे । गाँव में हाट लगतीं थी और पास दूर के छोटे बङे
व्यापारी मिलजुलकर सर सामान बेच खरीद लेते थे ।
सूरज की रौशनी में सब काम निबटा कर हर चौराहे पर हर द्वार पर दिये जला
दिये जाते थे ',मंदिरों में ज्येतिस्तंभों पर सैकङों दीप रखकर लोग "कथा
कहानी सुनकर सोते थे ।
सोने को घासकास की रस्सी से बुनी खटिया थी और बिछाने ओढ़ने को हथचरखे
करघे के पुराने कपङों से बनी दरी कथरी और कंबल 'खेत के कपास से बनी रजाई
और 'क्या चाहिये था "स्वाबलंबी स्वाभिमानी ग्रामीण को?
नगरों का जीवन ग्रामों पर आश्रित था किंतु गाँव गाँव बनी बुजुर्गों की
पंचायतें गाँव के झगङे गाँव में ही सुलझा लेती थी ।
नारियों के स्नान घाट पर पुरुष नहीं जाते थे और गाँव की बेटी सबकी बहिन
बेटी होती थी ।
शराब माँस गाँव के लिये "पाप थे 'और भाँग के सिवा कोई नशा होली तक पर
नहीं करता था ।
रंग थे पलाश और सूखे फूलों के 'उबटन थे हलदी बेसन चंदन के और झुंड में
रहकर परस्पर श्रम में हाथ बँटाना सबका कर्त्तव्य था 'कोई बुजुर्ग कहीं
वृद्धाश्रम नहीं रहते थे न ही अनाथालय में कोई रहता था, दान सब देते रोज
ही गौ ग्रास काक ग्रास और मंदिर में जा ठहरे यात्रियों का ग्रास निकलता
था । बुद्धिजीवियों से श्रम नहीं करवाया जाता था और बच्चे बङों के पाँव
दबाकर ही सोने जाते थे ।
युवा दिन में शयन नहीं करते थे और दैहिक सौष्ठव बनाकर रखने की होङ रहती
थी पौरुष का अर्थ स्त्री रक्षा ग्रामसेवा खेती करना और व्यसन से दूर रहना
माना जाता था । कन्या गर्भिणी और विधवा को संरक्षण दिया जाता था ।
गाँव में ही सिलाई कढ़ाई बुनाई के प्रशिक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी दादी से पोती
तक चलते रहते थे महिलायें अपने कपङे स्वयं ही सीं लेती
©®सुधा राजे


Thursday, 24 September 2015

सुधा राजे का लेख :- बिहारनामचा।

बिहारनामचा
":'
हिन्दू बौद्ध ईसाई और मुस्लिम
इन सबके इतिहास से बहुत पीछे बहुत गहराई से जुङा है बिहार ।
कभी भारत का गौरव रहा बिहार इतना पीछे धकेला गया कि आज बिहार के बाहर
"उँह बिहारी "कहकर बहुत हेयता से दूसरे अतिवादी क्षेत्रवादी देखते हैं ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिन लङकों की बङी आयु रंगरूप या कम कमाई या
पहली दूसरी पत्नी मर जाने या विवाह टूट जाने पर शादी नहीं होती ''वे
पहाङन 'बंगालन 'नेपालन या बिहारन जिन्हे वे अशिक्षित श्रमजीवी लोग
""पुरबिनी कहते हैं "।
को कुछ हजार रुपयों में वधूमुल्य चुकाकर ले आते है विवाह के नाम पर जीवन
भर बँधुआ मजदूर मुफ्त की वेश्या और मुफ्त की नौकरानी की तरह रखते हैं ।
न सम्मान होता है परिवार समाज और पति की नजर में न ही कोई दया माया मोह
प्रेम अधिकार ।
जो बच्चे भी अगर हुये तो पति की ही संपत्ति और आगे को अघोषित दास होते हैं ।
हर साल हजारों मजदूर खेतों और मिलों कारखानों फैक्ट्रियों में काम करने
मानसून के निकट होते ही बिहार से बाहर निकल पङते हैं मुंबई कलकत्ता
मद्रास पंजाब दिल्ली जयपुर अजमेर """""जहाँ कहीं भी सूचना मिलती है काम
की ।
एक दो आँखों देखी घटना है कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में ठसाठस बैठे बिहार
के लोग रोजगार की तलाश में जो चले जा रहे होते हैं अजनबी मंजिल की तरफ
उनको हाथ पकङ कर बिचौलिया ठेकेदार अलग अलग कार्य में लेबर सप्लाई के लिये
बीच में ही किसी भी स्टेशन पर उतार लेते हैं और कई गुटों में इन मजदूरों
को उतारने के पीछे झगङा भी हो जाता है कि ये मजदूर पहले मैंने छेके ',तो
मेरे हुये ।
मामूली मेहनताने पर ये मजदूर मिलों कारखानों निजी घरों और खेत खलिहानों
में काम करते है ।
हर नया मालिक इनको बेकार बचे कपङे पहनने को देता है और बस यूँ ही कहीं
पङे रहने भर को ठिकाना देकर नौकरी करता है ।
होली के ठीक पहले ये मजदूर अपने देश लौटने लगते हैं ।
तो भी मालिक को सौ सौ वादे करके कि वापस आकर फिर काम करेंगे ',कुछ तो
लौटते हैं और कुछ उम्दा रोजगार की तलाश में फिर नयी जगह चल पङते हैं ।
ये नई मंजिल कई बार घर मकान ढोर गिरवी रखकर अरब देश या थाईलैंड या खाङी
देश भी होते हैं ।
बिहारी हर देश हर प्रोफेशन हर जिले में मिलेगा ',
लेकिन सौ टके का सवाल है कि अपनी माटी अपनी भाषा अपने प्रदेश से जी जान
से प्रेम करने वाला पूरबिया आखिर क्यों विवश हो जाता है घर में माँ पत्नी
बच्चे बहिन भाई त्यागकर बाहर देश परदेश भागने को??
ये कारण है जातिवाद की अफीम पिलाकर मजहब की मदिरा में डुबोकर 'बिहार को
रोजगार न मिलने वाला प्रांत बना डालने वाले नेता और प्रशासक, 'आज भी
बिहार दक्षिण से अधिक हरा भरा और खनिज संपदा संपन्न है और संपन्न है माटी
नदी पहाङ मैदान की विविधता से ',न मरुस्थल की तपती धूल न ही पठार का
वीराना ',जहाँ तक नजर जाती है सब हरा भरा और ',सांस्कृतिक विरासत से भरा
पूरा बिहार ',चोखा लिट्टी भात भुजिया दाल चावल सत्तू पिट्ठी अचार छनौरी
दालपूङी बखीर और भेली राब का देश जहाँ कंठ कंठ में सुरीली ताने बसी हैं
और युवाओं के सीने में "मल्ल होने का सा जोश ',बेहद मेहनतकश मानव संपदा
पूरे भारत ही नहीं विश्व को देने वाला यह चंद्रगुप्त का देश ',बुद्ध की
चैत्यभूमि और शिवतीर्थ, क्रांति की पहली ज्वाला का प्रांत ',आज ऐसा
मुहावरा कैसे बन गया कि "सौ पर भारी एक बिहारी "वाला नारा दब कर रह गया
और ''बिहरिए "पुरबिए होना एक "गरीब हुनरविहीन अविश्वसनीय
""खानाबदोश का पर्यायवाची बन गया??
चुनाव जैसे ही आते है बिहार का बच्चा बच्चा किसी मँजे हुए राजनेता की
भाँति बातें करने लगता है ',और चुनाव के दौरान भीषण गुटबंदी हिंसा शराब
बाहुबल और धन रुपया आदि का सैलाब गंडक कोसी की बाढ़ से भी अधिक उफान पर
रहता है ।
जातियाँ जो पूरे पाँच साल अन्योन्याश्रित जीवन जीती हैं 'चुनाव आते ही
'पासी कुरमी कोईरी बाँभन ठाकुर नाई कहार मोची जमादार भील में चीखपुकार कर
फटी चादर से बिखरते चावलों की तरह यत्र तत्र हो जाने लगती हैं 'लोग एक
खास तरह की नफरत और दूरी बनाकर व्यंग्य से ही फिर राम सलाम करते है '। इस
जहरीले विचार को भङकाते हैं छुटभैये स्थानीय नेता जिनपर आश्रित हैं गाँव
टोला पुरवा के गरीब और मध्यमवर्गीय लोग 'जब तब उधार रुपया पैसा गहना जमीन
घर गिरवी रखकर इन्हीं नवधनिकों से लेना देना पङता है ।
परदेश पराये प्रांत में रोजगार की तलाश में गये पुरुषों के पीछे गाँवों
के झोपङों में कराहती बूढ़ी माँ युवा वियोगिनी पत्नी और सुनहरे कल की आशा
में डेंगू चिकनगुनिया जापानी इंसेफेलाईटिस स्वाईन फ्लू मलेरिया हाथी पाँव
घेंघा और कुपोषण एनीमिया से जूझते 'बच्चे 'और प्रौढ़ 'सब परिवार इन्ही
स्थानीय नेता भैया जी और साहबों के भरोसे ही तो छोङकर निकलता है बिहारी
'जनरल डिब्बे की सीट पर दस और रेलगाङी के डिब्बे के फर्श पर ही गमछा
बिछाकर 'विरहा कजरी विदेसिया 'गुनगुनाता ।
चुनाव आते ही दस की जगह दौ सौ रुपया रोज दिहाङी जैसे बरसने लगती है और
चोखा भात की जगह दाल-भात ,भुजिया ,पकौङी ,जुट्टी, सुठौरा, ताङी, और ठर्रा
भी घर की ओसारी तक पहुँचने लगता है ।
जाति मजहब और रुपयों का तमाशा भी जिन लोगों पर नहीं चलता उनपर 'भय 'चलता
है और ये भय तरह तरह के रूप शक्ल और कमिटमेंट लेकर आता है । ये
प्रतिबद्धता किसी को तब याद नहीं रहती जब उसे अपने परिवार के सदस्य खोने
पङते हैं बीमारी और दुर्घटना में ',न तब जब बाढ़ में हर साल ढह जाते है
कच्चे घर और सपने, 'न तब जब बङी उमर की लङकी को विवाह के नाम पर बेमेल
शादी करके घुट घुट कर बंधुआ मजदूर बनना पङता है, न तब जब गणित और विज्ञान
में बहुत होशियार होने पर भी उसकी संतान 'दिल्ली मुंबई चेन्नई 'जैसी
संस्थाओं से कोचिंग और पढ़ाई ना कर पाने के कारण 'फ्रस्ट्रेशन की गिरफ्त
में आकर बरबादी की राह पर चल निकलता है ।
वही वही गिने चुने चेहरे बार बार बिहार की शासन व्यवस्था और नीति के
कर्णधार आखिर क्यों बन जाते हैं?
क्या बिहार के पास बिहार में ही पला जन्मा बढ़ा कोई बेहतर विकल्प नहीं है????,
जो नेता पढ़ा लिखा हो!!!!
जो जाति बिरादरी टोला और कुनबे के नाम पर नहीं केवल बिहार को "अपराध और
बेरोजगारी से मुक्त करके अग्रणी राज्य बनाने की गारंटी लेता हो!!!
क्या कारण है कि केरल के लोग शतप्रतिशत साक्षर होते आये हैं और
पाटलिपुत्र 'तक्षशिला के प्रांत में निरक्षरता आज भी बङे पैमाने पर वजूद
में है? क्या कारण है कि साहित्य संगीत और धर्म की राजधानी होकर भी आज
बिहार रोजगार के मामले में दक्षिणभारत से पिछङा हुआ है??
गेंहूँ मक्का चावल अरहर दालें तिलहन कपास आम अमरूद से भरपूर रहने वाले
खेतिहर किसान आज पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के भी कृषकों तक
से पिछङ रहे हैं दशकों से? कृषक और मजदूर दोनों ही एक शोषित बिहारी की
शक्ल में नजर क्यों आने लगे हैं?
बिहार की सङके केवल महानगरों को छोङ दें तो साफ साफ बताती है कि ""खोया
कहाँ स्वराज्य?
बिजली आज भी बिहार के अनेक गाँवों के लिये एक विलासिता की वस्तु है ।
कितने ही गाँव है जहाँ पाँच पाँच किलोमीटर तक स्कूल ही नहीं है ।
सारा विकास बिहार के महानगरों और बङे शहरों तक ही सिमटा नजर आता है सो भी
"बेतरतीब और करोङों खर्च परंतु वास्तविक हालत बस जैसे मिरगी के मरीज को
सङा जूता सुँघाकर होश में बिठा दिया हो ',।
ये दिल्ली के लोग भी बिहार सा तो वोट माँगने जाते हैं या फिर उद्घाटन में
। घोटालों का राज्य कहा जाने लगा है बिहाल को ।
चंद नेता अपने ठेठ देशी अंदाज को स्टाईल की तरह यूज करके लोगों का दिल
लूटने के टोटके करके उनको मुसीका बँधे बैल की तरह वोट दो और कुछ मत सुनो
सोचो की पाह पर चलाते रहे ',वरना यदि बिहारी जागृत होता तो क्या जेल जाते
'लालूयादव 'राबङी जैसी आम घरेलू लगभग अनपढ़ महिला को बिहार का ताज पहना
कर जा सकते थे!!!!!!!!!!
क्या विधायकों के पूरे महामंडल में तब कोई ही न रहा था समुचित प्रभारी??
नीतीशकुमार ने भी नरेन्द्रमोदी की जीत पर 'शहीदाना अंदाज दिखाकर जीतनराम
माँझी को '''''त्यागी भरत "की तरह राजकाज खङाऊँ देकर चलवाना चाहा ।
पासवान हो चाहे कोई और बिहार के लोगों की प्रतिभा बिहार के काम नहीं आती
'और बिहार के संसाधन बिहार के काम नहीं आते 'कैसे बिहार को इस लायक बनाया
जाये कि 'बिहारी खानाबदोश न रहकर अपनी माटी अपने ही प्रांत में रहकर अपने
सपने साकार कर सके!!!!
कोई स्पष्ट योजना किसी के पास है ही नहीं केवल 'आरक्षण की अफीम और वजीफों
के लालच या कभी कोई और सामान या पैसा मुफ्त में देकर तत्काल एक 'समुदाय
या वर्ग या जाति के वोट ले लिये जायें ।
किंतु बिहार के 'हर बच्चे को 'दिल्ली स्कूलों जैसी शिक्षा मिले और हर
युवा को चेन्नई बैंगलोर कोटा की पढ़ाई की तरह रोजगार मिले और पंजाब
हरियाणा की तरह कृषक संपन्न और आधुनिक तकनीकों से लैस होकर सिर उठाकर शान
से कहें हाँ मैं किसान हूँ,,,,,,,, बिहार की बेटियों को कहीं बाहर "विवाह
के कपट के नाम पर दहेज के अभाव में बंधुआ दासी का जीवन न जीना पङे '।
बिहार में मुंबई और वाशिंगटन जैसा इलाज मिले ।
गंदगी और कुपोषण से न जूझना पङे बचपन को ',और हिंसा बलात्कार छेङछाङ
मानवदेह व्यापार और अपराध से मुक्त हो बिहार?????
सवाल हमारा, 'जवाब हर बिहारी को देना है ""क्यों भइया है कोई ऐसा मैदान
में??? जो जाति मजहब नहीं ''अपने बिहार में रहकर सबको रोजगार सुखी शांत
सुरक्षित जीवन और अपराध मुक्त मानवोचित रहन सहन की राह पर चला सके????
©®सुधा राजे

Wednesday, 23 September 2015

सुधा राजे का लेख :- "जीवन जीने के लिए है"।

जो दुःख से घबरा जाये वह न तो पुरुष कहलाने लायक है न ही हिन्द की नारी """"""
क्योंकि दुःख केवल एक वैचारिक अवस्था है,,, और वह योगी जो दरिद्र है खूब
हँस सकता है ',परंतु एक भोगी जो हर तरह से साधनवान है जरा पत्नी या
प्रेमिका रूठने या नौकरी में सस्पेन्ड हो जाने या धन की हानि या परिजन की
मृत्यु से घबराकर आत्महत्या कर डालते हैं!!!!!!!!!
कायर हैं वे सब
क्लीवता पौरूषहीनता या स्त्रीत्वविहीनता नहीं वरन "साहसहीनता का ही दूसरा नाम 'है ।
आत्महत्या
मतलब ईश्वर की बनाई एक अद्वितीय रचना का अंत करने का महापाप!!!
जो तुम बना नहीं सकते उसे तोङने का हक तुम्हें नहीं है ।
जीवन चाहे आप स्वयं का समझते हो अपनी देह अपने जीवन का स्वामी परंतु आप
हैं नहीं ',,,,
क्योंकि जो चीज आपने खरीदी नहीं बनाई नहीं जिसका मूल्य भी नहीं चुकाया वह
आपकी कैसे??
आप उस मुफ्त की मशीन तक के मालिक नहीं हो सकते जो केवल साईकिल में हवा भरती है!!!!
तो उस जटिल महामशीवयन के स्वामी कैसे हो सकते हो बिना मूल्य चुकाये जिसका
आप एक नाखून एक बाल तक बनाना नहीं सीख पाये आज तक??????
इसका स्वामी है आपका ईश्वर आपकी माता आपके पिता आपकी पत्नी आपके बच्चे आप
पर आश्रित आपके परिवार देश समाज के वे सब लोग ""जिन जिन को आपके न होने
पर '''बुरा दयनीय और दुखी जीवन जीने को विवश होना पङेगा """

क्या आप मर जायें और संयार में एक का भी जीवन दुखी न हो ऐसा हो सकता है????
कदापि नहीं,,,
क्योंकि यदि आपका परिवार है तो परिवार की आशा और भविष्य वर्तमान के अनेक
छोटे बङे कार्य सुख दुख आपके हवाले हैं ।
और यदि आपका संसार में न कोई मित्र है न परिवार न शुभचिंतक तो भी,, चूकिं
आपको ईश्वर ने बनाकर भेजा है भारमुक्त करके तब तो आप और भी अधिक विशद
उत्तरदायित्व लेकर आये हैं उन सबके प्रति जो जो अनाथ हैं दयनीय हैं जिनका
कोई रक्तसंबंधी या परिवार मित्र या शुभचिंतक नहीं है, 'वे केवल आपकी ही
बाट जोह रहे हैं । उनके लिए ही ईश्वर ने आपको बनाकर भेजा है । जाकर
देखिये कुतना कार्य शेष है!!! आपको कई जन्म लेने पङेंगे तब पूरा होगा ये
महाकार्य, और इसके लिये ये देह रूपी यंत्र बीमार या कमजोर नहीं चल सकेगा
तो
आपका ही सबसे पहला कर्त्तव्य है कि वह मशीन पूर्ण स्वस्थ और सुचालित हो
उसके सब अंग सही सही कार्य कर रहे हों ।
आप इस देह रूपी यंतिर के केवल चालक मात्र है यह आपको केवल कर्त्तव्य पूरे
करने को सौ सवा सौ साल के पट्टे पर मिले 'संयंत्र की ही भाँति है ।आप रोज
व्यायाम नहीं करेंगे तो, रोज सही और संतुलित ढंग से चलना बैठना सोना खाना
नहीं रखेंगे तो, यह संयंत्र खराब हो जायेगा, 'आप इसको चलाना तक तो जानते
नहीं!!!! सीखने में ही सात से सत्तरह साल लग जाते है ।
देखो किसी नट को, एक्रोबेट को, किसी जिमनास्ट को, किसी धावक को, मल्ल को,
वह इसी पिलिपले रहने वाले शिशु असहाय शरीर को चलाना सीख कर ही कलाकार
खिलाङी नर्तक नट और जिमनास्ट या तैराक मल्ल या एक्रोबेट बना है ।
इस देह को जीतो, 'इसे अपने इशारों पर चलाना सीखो, यह खूब जानता है कि सही
स्वामी का कैसे आज्णापालन करना होता है ।
बढ़िया शरीर पैदाईशी नहीं मिलता निर्माण करना पङता है पाँच साल की आयु से
ही सीखने लगते हैं संगीत नबत्य युद्ध और खेल "'''तो क्यों नहीं इसे ढाल
लेते अपनी आवश्कताओं के अनुरूप ऐसे भी तो लोग है जिन्होने भूख नींद वासना
कामेच्छा और निर्बलता पर विजय पाकर "जितेन्द्रिय की उपाधि पाई, उनको न
किसी वस्त्र के आडंबर की आवश्यकता रही न लेप और आभूषणों की उनकी तो देह
ही दिगंबर सुंदर निर्विकार हो कर रही ',
प्राण इसका "रिचार्ज वाऊचर है चार्ज्ड बैटरी है 'और यह तब तक शिथिल नहीं
पङती जब तक कोई "यह न सोचे कि मैं तो इससे अच्छा कि मर जाऊँ,,,
क्यों सोचो फिर मरने की?
जिओ
जब अपने लिये जीने का बहाना न रहे तब ही जीवन का असली अर्थ समझ में आता
है, 'और यह भी समझ में आता है कि पीङा जब मुझे इस बात पर इतनी हुयी तो
मुझसे और भी जो वेग हैं वे ऐसी ही पीङा और इससे भी भयंकर दर्द दुख कैसे
झेलते होंगे ',
कुछ लोगों से मिलो तो सही जिन्होने जीवन का वरण किया, अरे मरना तो बङा
आसान है 'नब्ज काट लो फाँसी लगा लो पेल के नीचे कूद पङो जहर खालो,
'""""""किंतु जीना कितना कठिन!!!!!! हर पल साँस लेनी पङती है, हर पल पेट
से हर कोशिका तक रक्त और ऊर्जा ऑक्सीजन और पोषण का प्रवाह जारी रखना पङता
है ।तीन मिनट को साँस न मिली और जीवन खत्म!!!!!!!!
जीकर दिखाओ, 'है हिम्मत तो जिओ 'मर तो बाद में भी सकते हो पहले ये सोचो
कि क्या क्या लाभ इस सवा सौ साल की आयु का संसार को तुम दे सकते थे और
दिया नहीं!!!!! क्या क्या ऐसा कर सकते थे कि कुछ लोग तो सुखी हो जाते!!!!
करोङ रुपया देकर भी अगर जीवन मिले तो करोङों लोग जीवन खरीदने को तैयार
बैठे है अपना और अपनो का ',कोई भला स्वस्थ देह के होते हुये गरीब कैले हो
सकता है????
ये मकान किसके लिये? शरीर के लिये? और ये कपङे गहने लेप चूर्ण और रंग??
यब के सब इसी तन इसी देह के लिये???
तो ये सब तो एक मशीन की एसेसरीज ही हुयी न??
सोचो जब कवर और रख रखाव जिस मशीन का ऐसा है तो वह मशीन कितनी कीमती होगी????
अरबों के हीरे मिलकर भी एक मनुष्य का सवा सौ साल का स्वस्थ जीवन नहीं बना सकते तो?
यह देह हो गयी अरबों की और आप अरबपति खरबपति नील शंख और पद्म पति!!!!!
इतने धनवान होकर भी आपको इस कीमती देह का क्या निकृष्ट प्रयोग समझ में आया??
अरे यह शरीर ही तो पूँजी है नट की खिलाङी की धावक मल्ल और योद्धा की
वेश्या की और नर्तक की गायक की और वादक की!!!!!!!

इस शरीर का जो ड्राईवर है सोचो फिर वह कितना गुणवान होगा 'मन 'ये मन जिसमें
हाथ पाँव कमर यौनांग और कंठ नहीं
बल्कि
विचार बुद्धि सोच चिंतन आविष्कार शोध विश्लेषण औऱ विद्या की शक्ति है!!!!!!!
वह तो शरीर रूपी महासंयंत्र के सबसे सुंदर कक्ष में बैठा उसका 'संचालक है "
अगर मन ही मालिक बन गया तो आप तो गये काम से '
मन मनमानी करते करते प्रबंधक से कब स्वामी बनकर देह को हङप जाये पता न
चले यदि ये "सही नियंत्रक यात्री ''आत्मा जो इस संसार की यात्रा पर आयी
है अपना दायित्व भूलकर रमने लगे यंत्र के क्रिया कलाप के सुख लेने में!!
आपने कार ली या मोटरसाईकिल या कंप्यूटर "क्या उसकी चेसिस और हार्डवेयर को
ही रोज कोलीन से चमकाकर बैटरी चार्ज करके ईधन भरकर रखते रहोगे????
या इससे कुछ काम भी लेना है??
मनोरंजन जिस जिस चीज से होता है वह तो "मैनेजर का आनंद है '"'
वह तो उस ड्रीईवर का आनंद है जो आपकी कार आपकी बस रेलगाङी चलाते समय जोर
जोर से रेडियो ऑडियो वीडियो पर कुछ संगीत सुन रहा या मोबाईल पर देख रहा
है ',सावधानी हटी और दुरघटना घटी मन रूपी एक मनोरंजनवादी चालक को मन की
करने दोगे तो होगा यही वह ""गाङी ही ठोक देगा कहीं बीमार कपेगा चटोरेपन
से कभी आलस में गाङी चलायेगा देर करेगा हर काम में कभी स्पीड ज्यादा रखकर
गाङी ही तोङ डालेगा ।
तो ""आत्मा रूपी यह पट्टेदार यात्री अपने माल यानि गाङी रूपी देह की सही
सुरक्षा चाहता है तो मन रूपी संचालक पर काबू रखे ',
ताकि ऐसा नियम बना रहे कि जो जो मन चाहे वह सब तभी करने दिया जाये जब वह
सब करना गाङी को नुकसान नहीं दे रहा हो और आत्मा रूपी पट्टेदार मालिक
यात्री को दिये सवा सौ साल के समय के भीतर उस पर सौंपे गये दायित्व भी
पूरे हो सकें ।
देखो, 'ये शरीर सिर्फ तीन दशक के लिये मिला शंकराचार्य को ',विवेकानंद
को, दयानंद को, और उन सबने कितने कम समय में कितने सारे कार्य कर
डाले!!!!!
यही शरीर आपके पास है ',क्यों इसका बेहतर उपयोग नहीं, 'ये स्त्रीपुरुष का
प्यार ये बङी हवेली जेवर कपङे वाहन की होङ,,,,,, अपनी जगह तक सीमित
अर्थों में ही तो, 'आपके मोबाईल कंप्यूटर या बाईक की ऐसेसरीज ही तो
हैं!!!! ये ध्येय नही!! ये साध्य नहीं!!! ये केवल संसाधन हैं ।
साध्य तो वही ""चुनौती है जो दाता परमात्मा ने एक विचित्र संयंत्र एक
चालक सहित देकर भेदा कि जाओ और कर दिखाओ इस संसार में जो जो कुछ वहाँ देख
समझकर समझ पाओ कि मानवदेही होने को नाते करना तुम्हारा सही उपयोग है!!
तो क्या किया आपने परमात्मा को बताने के लिये!???
अपने पीछे रह गये लोगो में चर्चा को छोङ जाने के लिये,??
कौन कहता है 'मर गये कबीर? कौन कहता है मर गये नानक,, अरे मर तो वह रहा
है जो जीवन की आपाधापी में केवल मशीन ही धो पोंछकर रोज सजाये जा रहा है
बिना इसका सही उपयोग करे ।
ये दस उंगलियाँ 'दो नेत्र एक पूरी ज्ञान और कर्म की श्रंखला पर काबू पाने
को हर पल स्मृति रखता आविष्कारक मन और इसमें भी आपको अगर लहता है कि देह
का अंत ही सही राह है तो डरपोक कायर क्लीब और कृतघ्न शब्द भी काफी नहीं
आपके लिये ',दुख तो सब पर पङता है कोई बह जाता है कोई ',सह जाता है,
'किंतु मानव वही सच्चा है मानव जो न बहे न केवल सहे अपितु अपना दुख
बिताकर बिसरा दे और दूसरों के दुख का सहारा बनकर बाँह गहे!!!
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लेख :- बिहार नामचा

बिहारनामचा
":'
हिन्दू बौद्ध ईसाई और मुसलिम
इन सबके इतिहास से बहुत पीछे बहुत गहराई से जुङा है बिहार ।
कभी भारत का गौरव रहा बिहार इतना पीछे धकेला गया कि आज बिहार के बाहर
"उँह बिहारी "कहकर बहुत हेयता से दूसरे अतिवादी क्षेत्रवादी देखते हैं ।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिन लङकों की बङी आयु रंगरूप या कम कमाई या
पहली दूसरी पत्नी मर जाने या विवाह टूट जाने पर शादी नहीं होती ''वे
पहाङन 'बंगालन 'नेपालन या बिहारन जिन्हे वे अशिक्षित श्रमजीवी लोग
""पुरबिनी कहते हैं "।
को कुछ हजार रुपयों में वधूमुल्य चुकाकर ले आते है विवाह के नाम पर जीवन
भर बँधुआ मजदूर मुफ्त की वेश्या और मुफ्त की नौकरानी की तरह रखते हैं ।
न सम्मान होता है परिवार समाज और पति की नजर में न ही कोई दया माया मोह
प्रेम अधिकार ।
जो बच्चे भी अगर हुये तो पति की ही संपत्ति और आगे को अघोषित दास होते हैं ।
हर साल हजारों मजदूर खेतों और मिलों कारखानों फैक्ट्रियों में काम करने
मानसून के निकट होते ही बिहार से बाहर निकल पङते हैं मुंबई कलकत्ता मदरास
पंजाब दिल्ली जयपुर अजमेर """""जहाँ कहीं भी सूचना मिलती है काम की ।
एक दो आँखों देखी घटना है कि ट्रेन के जनरल डिब्बे में ठसाठस बैठे बिहार
के लोग रोजगार की तलाश में जो चले जा रहे होते हैं अजनबी मंजिल की तरफ
उनको हाथ पकङ कर बिचौलिया ठेकेदार अलग अलग कार्य में लेबर सप्लाई के लिये
बीच में ही किसी भी स्टेशन पर उतार लेते हैं और कई गुटों में इन मजदूरों
को उतारने के पीछे झगङा भी हो जाता है कि ये मजदूर पहले मैंने छेके ',तो
मेरे हुये ।
मामूली मेहनताने पर ये मजदूर मिलों कारखानों निजी घरों और खेत खलिहानों
में काम करते है ।
हर नया मालिक इनको बेकार बचे कपङे पहनमे को देता है और बस यूँ ही कहीं
पङे रहने भर को ठिकाना देकर नौकरी करता है ।
होली के ठीक पहले ये मजदूर अपने देश लौटने लगते हैं ।
तो भी मालिक को सौ सौ वादे करके कि वापस आकर फिर काम करेंगे ',कुछ तो
लौटते हैं और कुछ उम्दा रोजगार की तलाश में फिर नयी जगह चल पङते हैं ।
ये नई मंजिल कई बार घर मकान ढोर गिरवी रखकर अरब देश या थाईलैंड या खाङी
देश भी होते हैं ।
बिहारी हर देश हर प्रोफेशन हर जिले में मिलेगा ',
लेकिन सौ टके का सवाल है कि अपनी माटी अपनी भाषा अपने प्रदेश से जी जान
से प्रेम करने वाला पूरबिया आखिर क्यों विवश हो जाता है घर में माँ पत्नी
बच्चे बहिन भाई त्यागकर बाहर देश परदेश भागने को??
ये कारण है जातिवाद की अफीम पिलाकर मजहब की मदिरा में डुबोकर 'बिहार को
रोजगार न मिलने वाला प्रांत बना डालने वाले नेता और प्रशासक, 'आज भी
बिहार दक्षिण से अघिक हरा भरा और खनिज संपदा संपन्न है और संपन्न है माटी
नदी पहाङ मैदान की विविधता से ',न मरूस्थल की तपती धूल न ही पठार का
वीराना ',जहाँ तक नजर जाती है सब हरा भरा और ',सांस्कृतिक विरासत से भरा
पूरा बिहार ',चोखा लिट्टी भात भुजिया दाल चावल सत्तू पिट्ठी अचार छनौरी
दालपूङी बखीर और भेली राब का देश जहाँ कंठ कंठ में सुरीली ताने बसी हैं
और युवाओं के सीने में "मल्ल होने का सा जोश ',बेहद मेहनतकश मानव संपदा
पूरे भारत ही नहीं विश्व को देने वाला यह चंद्रगुप्त का देश ',बुद्ध की
चैत्यभूमि और शिवतीर्थ, क्रांति की पहली ज्वाला का प्रांत ',आज ऐसा
मुहावरा कैसे बन गया कि "सौ पर भारी एक बिहारी "वाला नारा दब कर रह गया
और ''बिहरिए "पुरबिए होना एक "गरीब हुनरविहीन अविश्वसनीय
""खानाबदोश का पर्यायवाची बन गया??
चुनाव जैसे ही आते है बिहार का बच्चा बच्चा किसी मँजे हुए राजनेता की
भाँति बातें करने लगता है ',और चुनाव के दौरान भीषण गुचबंदी हिंसा शराब
बाहुबल और धन रुपया आदि का सैलाब गंडक कोसी की बाढ़ से भी अधिक उफान पर
रहता है ।
जातियाँ जो पूरे पाँच साल अन्योन्याश्रित जीवन जीती हैं 'चुनाव आते ही
'पासी कुरमी कोईरी बाँभन ठाकुर नाई कहार मोची जमादार भील में चीखपुकार कर
फटी चादर से बिखरते चावलों की तरह यत्र तत्र हो जाने लगती हैं 'लोग एक
खास तरह की नफरत और दूरी बनाकर व्यंग्य से ही फिर राम सलाम करते है '। इस
जहरीले विचार को भङकाते हैं छुटभैये स्थानीय नेता जिनपर आश्रित हैं गाँव
टोला पुरवा के गरीब और मध्यमवर्गीय लोग 'जब तब उधार रुपया पैसा गहना जमीन
घर गिरवी रखकर इन्हीं नवधनिकों से लेना देना पङता है ।
परदेश पराये प्रांत में रोजगार की तलाश में गये पुरुषों के पीछे गाँवों
के झोपङों में कराहती बूढ़ी माँ युवा वियोगिनी पत्नी और सुनबरे कल की आशा
में डेंगू चिकुनगुनिया जापानी इंसेफेलाईटिस स्वाईन फ्लू मलेरिया हाथी
पाँव घेंघा और कुपोषण एनीमिया से जूझते 'बच्चे 'और प्रौढ़ 'सब परिवार
इन्ही स्थानीय नेता भैया जी और साहबों के भरोसे ही तो छोङकर निकलता है
बिहारी 'जनरल डिब्बे की सीट पर दस और रेलगाङी के डिब्बे के फर्श पर ही
गमछा बिछाकर 'विरहा कजरी विदेसिया 'गुनगुनाता ।
चुनाव आते ही दस की जगह दौ सौ रुपया रोज दिहाङी जैसे बरसने लगती है और
चोखा भात की जगह दाल-भात ,भुजिया ,पकौङी ,जुट्टी, सुठौरा, ताङी, और ठर्रा
भी घर की ओसारी तक पहुँचने लगता है ।
जाति मजहब और रुपयों का तमाशा भी जिन लोगों पर नहीं चलता उनपर 'भय 'चलता
है और ये भय तरह तरह के रूप शक्ल और कमिटमेंट लेकर आता है । ये
प्रतिबद्धता किसी को तब याद नहीं रहती जब उसे अपने परिवार के सदस्य खोने
पङते हैं बीमारी और दुर्घटना में ',न तब जब बाढ़ में हर साल ढह जाते है
कच्चे घर और सपने, 'न तब जब बङी उमर की लङकी को विवाह के नाम पर बेमेल
शादी करके घुट घुट कर बंधुआ मजदूर बनना पङता है, न तब जब गणित और विज्ञान
में बहुत होशियार होने पर भी उसकी संतान 'दिल्ली मुंबई चेन्नई 'जैसी
संस्थाओं से कोचिंग और पढ़ाई ना कर पाने के कारण 'फ्रस्ट्रेशन की गिरफ्त
में आकर बरबादी की राह पर चल निकलता है ।
वही वही गिने चुने चेहरे बार बार बिहार की शासन व्यवस्था और नीति के
कर्णधार आखिर क्यों बन जाते हैं?
क्या बिहार के पास बिहार में ही पला जन्मा बढ़ा कोई बेहतर विकल्प नहीं है????,
जो नेता पढ़ा लिखा हो!!!!
जो जाति बिरादरी टोला और कुनबे के नाम पर नहीं केवल बिहार को "अपराध और
बेरोजगारी से मुक्त करके अग्रणी राज्य बनाने की गारंटी लेता हो!!!
क्या कारण है कि केरल के लोग शतप्रतिशत साक्षर होते आये हैं और
पाटलिपुत्त 'तक्षशिला के प्रांत में निरक्षरता आज भी बङे पैमाने पर वजूद
में है? क्या कारण है कि साहित्य संगीत और धर्म की राजधानी होतर भी आज
बिहार रोजगार के मामले में दक्षिणभारत से पिछङा हुआ है??
गेंहूँ मक्का चावल अरहर दालें तिलहन कपास आम अमरूद से भरपूर रहने वाले
खेतिहर किसान आज पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के भी कृषकों तक
से पिछङ रहे हैं दशकों से? कृषक और मजदूर दोनों ही एक शोषित बिहारी की
शक्ल में नजर क्यों आने लगे हैं?
बिहार की सङके केवल महानगरों को छोङ दें तो साफ साफ बताती है कि ""खोया
कहाँ स्वराज्य?
बिजली आज भी बिहार के अनेक गाँवों के लिये एक विलासिता की वस्तु है ।
कितने ही गाँव है जहाँ पाँच पाँच किलोमीटर तक स्कूल ही नहीं है ।
सारा विकास बिहार के महानगरों और बङे शहरों तक ही सिमटा नजर आता है सो भी
"बेतरतीब और करोङों खर्च परंतु वास्तविक हालत बस जैसे मिरगी के मरीज को
सङा जूता सुँघाकर होश में बिठा दिया हो ',।
ये दिल्ली के लोग भी बिहार सा तो वोट माँगने जाते हैं या फिर उद्घाटन में
। घोटालों का राज्य कहा जाने लगा है बिहाल को ।
चंद नेता अपने ठेठ देशी अंदाज को स्टाईल की तरह यूज करके लोगों का दिल
लूटने के टोटके करके उनको मुसीका बँधे बैल की तरह वोट दो और कुछ मत सुनो
सोचो की पाह पर चलाते रहे ',वरना यदि बिहारी जागृत होता तो क्या जेल जाते
'लालूयादव 'राबङी जैसी आम घरेलू लगभग अनपढ़ महिला को बिहार का ताज पहना
कर जा सकते थे!!!!!!!!!!
क्या विधायकों के पूरे महामंडल में तब कोई ही न रहा था समुचित प्रभारी??
नीतेशकुमार ने भी नरेन्द्रमोदी की जीत पर 'शहीदाना अंदाज दिखाकर जीतनराम
माँझी को '''''त्यागी भरत "की तरह राजकाज खङाऊँ देकर चलवाना चाहा ।
पासवान हो चाहे कोई और बिहार के लोगों की प्रतिभा बिहार के काम नहीं आती
'और बिहार के संसाधन बिहार के काम नहीं आते 'कैसे बिहार को इस लायक बनाया
जाये कि 'बिहारी खानाबदोश न रहकर अपनी माटी अपने ही प्रांत में रहकर अपने
सपने साकार कर सके!!!!
कोई स्पष्ट योजना किसी के पास है ही नहीं केवल 'आरक्षण की अफीम और वजीफों
के लालच या कभी कोई और सामान या पैसा मुफ्त में देकर तत्काल एक 'समुदाय
या वर्ग या जाति के वोट ले लिये जायें ।
किंतु बिहार के 'हर बच्चे को 'दिल्ली स्कूलों जैसी शिक्षा मिले और हर
युवा को चेन्नई बैंगलोर कोटा की पढ़ाई की तरह रोजगार मिले और पंजाब
हरियाणा की तरह कृषक संपन्न और आधुनिक तकनीकों से लैस होकर सिर उठाकर शान
से कहें हाँ मैं किसान हूँ,,,,,,,, बिहार की बेटियों को कहीं बाहर "विवाह
के कपट के नाम पर दहेज के अभाव में बंधुआ दासी का जीवन न जीना पङे '।
बिहार में मुंबई और वाशिंगटन जैसा इलाज मिले ।
गंदगी और कुपोषण से न जूझना पङे बचपन को ',और हिंसा बलात्कार छेङछाङ
मानवदेह व्यापार और अपराध से मुक्त हो बिहार?????
सवाल हमारा, 'जवाब हर बिहारी को देना है ""क्यों भइया है कोई ऐसा मैदान
में??? जो जाति मजहब नहीं ''अपने बिहार में रहकर सबको रोजगार सुखी शांत
सुरक्षित जीवन और अपराध मुक्त मानवोचित रहन सहन की राह पर चला सके????
©®सुधा राजे