Sunday, 31 July 2016

सुधियों के बिखरे पन्ने एक थी सुधा -: " माँ ' न जाने क्या था उस आवाज और अंदाज में "

एक 'आदत होती है स्वाभिमान की
और परिश्रम से अपनी कमाई पर जीने वाला उस को समझ सकता है शेष नहीं ।
ये शेष तो 'रीढ़विहीन परजीवी हैं जो कुछ भी कर लेते हैं बस परिश्रम नहीं
होता 'और कम पर गुजारा भी नहीं होता ।
माँ
ऐसी ही थीं
जीवन भर दातुन की मंजन नहीं ।
साबुन नहीं लगाया 'आटा बेसन से नहायीं ।
जीवन भर न बेटों की साङी पहनी न बहुओं के मायके की न पिता के जेवर गहने
रखे न मायके के सब बाँट देतीं ।
और अपनी कृषि से मिले पैसे भी बाँट देतीं थी ',
पूँजी जमा होती तो उधार दे देतीं 'बिना ब्याज के बिना लिखत पढ़त के ।
'
आहार शुद्ध शाकाहारी और रहती 'पक्की हवेली होने पर भी 'फार्महाऊस में
कुत्तों सेवकों और पोत्रों के साथ ।
भोजन अपना स्वयं बनाती 'एक ही समय भोजन करतीं और बिंदी चूङी के अलावा कोई
श्रंगार नहीं करतीं ।
पढ़ने की आदत थी सो एक पुस्तक समाप्त होती तो दूसरी प्रारंभ कर देतीं ।
रोज कुछ नया बुनती रहतीं पंखे टोकरी 'स्वेटर क्रोशिया या बच्चों के कपङों
पर कढ़ाई 'ठाकुरजी के वस्त्र ।
अतिथियों को भोजन कराना और लोगों को उपहार देने का ऐसा 'ऐब 'था कि अकसर
परिजन नाराज रहते और नाते रिश्तेदार प्रसन्न, '
मेहनत की आदत कभी नहीं छोङी सो 'कितने भी मजदूर लगे हों माँ, कुछ न कुछ
करने ही लग जातीं ।
गौ सेवा अंत तक जारी रही और कभी नहीं छूटा गाने गुनगुनाने के साथ काम करना, '
पाककला में 'शैफ को भी मात देतीं थी तो हर बार बङे भोज पर, स्वयं रसोईयों
के सामने डट कर काम करवातीं ',
कभी नापा नहीं परंतु हर बार सही संतुलित स्वाद का जादू था ।
माँ को कच्चे घर पसंद थे सो, एक भी परिचित कच्चे घर में रहता होता वहाँ
अवश्य भेंट करने जातीं और उनके रहने तक एक कमरा दोमंजिला ऐसा था जिसमें
बीच में छत न डालकर दूसरी मंजिल पर खपरैल डाली गयी थी और फर्श पर गौ गोबर
से लीपा जाता था ।
माँ को 'कढ़ी बरा और भाजी ज्वार की रोटी महेरी, गुलगुले और पूङी का हलवा
बेहद पसंद था ।कद्दू की भुजी और बैंगन का भरता चाव से जीमती '
परंतु एक बच्चों जैसी आदत थी '
अगर भोजन करने को न पूछो तो बुरा मान जाती, कभी स्वयं अपना भोजन परोसकर
हमारे होश तक तो नहीं जीमा, 'यहाँ तक कि अगर बाकी लोग भोजन कर गये और कोई
माँ को कहना भूल गया तो 'भोजन करती ही नहीं आँखें भर आतीं और मुँह फुला
लेतीं ',
यह उनको अपमान लगता ।
दूसरी आदत थी, माँ को 'कङाही चढ़ी तो स्वयं बैठती जाकर तलने पूङियाँ
।किसी को नहीं करने देती, '
आटा गूँथो बेलो परोसो सब परंतु पूरी तलने छानने की माँ की अजीब जिद रहती
जो बङी मुश्किल से छूटी ।
पूजापाठ उनसे अधिक नहीं होता था परंतु, पुजारी जी का सीधा कथा दान
दक्षिणा और बहुत सारे व्रत उपवास खूब करतीं थीं ।
माँ ने कभी, किसी को दरवाजे से मदद दिये बिना वापस नहीं लौटाया 'चाहे वह
भिक्षुक हो या पङौसी । किंतु कभी प्रवचन या सतसंग जाना उनको पसंद नहीं था

हजारों पक्के राग के गीत भजन गातीं रहती और हम दोनों कभी जम जाते तो माँ
की तान देखते बनती ।
माँ को बङा गर्व था कि उनकी जरा सी बिटिया उनके सब काम निपुणता से कर
लेती है सो उस प्रदर्शनकारी गर्व ने हमें बङा 'रगेदा '
कहीं भी सामूहिक आयोजन होता "बहू बेटियाँ कोई काम 'बेढंगा करतीं माँ
तत्काल हमें, करके दिखाने सिखाने को कह देतीं और नन्हीं सी आयु से इस तरह
अनेक, "शो "करने के चक्कर में हमारा बङा नुकसान हुआ । बीमार पङ जाते कभी,
पढ़ाई में विघ्न पङता । अच्छा भी लगता जब सब चकित हो जाते, 'परंतु उल्लू
भी बन ही रहे थे 'शाबासी के चक्कर में । महावर और नेल पॉलिश, जब जब हम
माँ को लगवा देते खवासिन भाभी से, माँ पैरों पर हलदी जरूर लगवातीं और
'धरतीं माँ को प्रणाम करतीं, हर त्यौहार पर एक कथा कहतीं और बिना मंत्र
की पूजा हो जाती पूरी रीति विधि से, सजावट "चौक पूरना, और गुड्डे गुङिया
बनाने में उन जैसा कोई विरला ही होगा, ये कला हमने भी सीखी और बङी सुंदर
सुदर गुङियाँ बनायीं भी ।
माँ को अपने कर्मचारी 'संतान से भी अधिक प्रिय थे,
तिज्जू मामा
हरी भैया
कन्हैया मामा
ढूमा फुआ
फूलाबाई
भूरी जिज्जी
पापम्मा काकी
कालिया दद्दा
उनके लिये प्राण तक दाँव पर लगाने वाले लोग सैकङों रहे ।
न जाने कौन सा चुंबक था उनमें कि जो भी एक बार कहीं मिल जाता 'जाति
बिरादरी मजहब सब भूलकर "उनका सगा कुटुंबी बन जाता ।
इसका अहसास तब होता जब, कभी माँ दुखी होती तो, वे लोग बापू और भाईयों तक
को, शालीन किंतु कठोर शब्दों में 'समझाते, 'या जब हम लोग कहीं घूमने जाते
तो होटल धर्मशाला की बजाय माँ किसी के घर मिलने ले जाती और वहाँ हम सबको
जबरन रुकना पङता, अतिथि सत्कार के, भव्य स्वागत होते ।
माँ गाँववालों के दिलों में बसती थी, परंतु नगर में बहुत कम लोग उनको रास आते, '।
माँ को मंदिर जाने की आदत नहीं थी रोज परंतु जब समूह यात्रा बनती तो दूर
दूर तक तीर्थ कर आतीं ।
जिद रहती सो रहती कि पैसा उनको किसी से कभी माँगना नहीं है ।
किसी भी दूर पास की बेटी के पाँव पूजकर गाँठ में पैसे बाँधना उनका नियम
रहा । सो सब पैसे उङ जाते उनका कोई बैंक एकाऊंट कभी चल ही नहीं पाया ।
माँ को साङियाँ देना ही बेकार जाता 'एक ही बार न पहने कहो तो और अपने
'परिचित किसी को भी पकङा दें ।
उनके पास इसलिये अधिक जमा कपङे नहीं रहते ।
कमर में पोटली खुंसी रहती और उसी में पैसे रहते ।
हम लोग जरूरत पङने पर ले लेते, माँ हँसती मना करतीं फिर पकङा देतीं बिना
गिने सारे, और हम लेकर बचे वापस खुटी पर खोंस देते, '
गहने एक एक करके कई किलो सोना चाँदी माँ ने दूर दूर तक की बेटियों के
पीँव पूजने और बहू की मुँह दिखाई में खतम कर दिये ।
हमें माँ की एक निशानी मिली बस उनकी पायलें '
सो भी एक दिन किसी स्कूली उत्सव में पहनी तो माँ बोलीं बस अब रख लो, '।
हर बार सोने के टॉप्स खरीदतीं और फिर किसी बहू बेटी को पकङा देतीं ।
पत्र लिखने की आदत थी परंतु बाद में माँ के हाथ में फ्रेक्चर होने से लेख
बिगङने लगा तो माँ के मुंशी हम बने ।
माँ की चिट्ठी लिखना आसान नहीं था 'कभी भी पूरा मैटर नहीं बोलतीं ',और
सार सार सुनकर अगर अपने मन से लिख देते तो 'कहीं कोई शब्द उनको खटक जाता
फिर काटो ।
माँ वैद्यगुण से बेहद संपन्न थी सब तरह के दर्द घरेलू रसोई के सामानों से
ठीक कर देती कई बार तो गंभीर समस्यायें भी ।
माँ को हरी चूङियाँ बहुत पसंद थी रेशमी काँच की और उनके हाथ इतने कोमल और
नरम थे कि कलाई में फँसी चूङी भी आराम से चढ़ जाती "आध पाव दो की नाप जब
हुयी तो माँ को अफसोस होता कि हाथ कङक हो गये ।
उनकी चूढ़ी जस की तस उतरती महीनों बाद भी । बहुत कम बार चूङी पहनती फिर
भी भरे भरे हाथ रहते ।
माँ को 'सूखे उबले बेर और बेरों का चूर्ण बहुत पसंद रहा । होटल का भोजन
कभी रास न आया परंतु कॉफी चाय टोस्ट के बिना नहीं लेतीं ।
सफाई करमी हो या फेरी करके चिमटे बेचने वाला ।माँ का भैया बन ही जाता और
बिना भोजन के न जाने देती, 'अगर द्वार पर कुछ खरीदा तो "जल और मीठा "तो
देना ही पङता फेरी वाले को भी ।और इस कारण माँ के कई, अनजाने अपने बन
जाते ।
अघोषित जज वकील और सरपंच रहीं माँ गाँव की मुहल्ले की और दूर पास के
नातेदारों की । कोई भी समस्या लेकर कभी भी आ जाता ',माँ का निर्णय सबको
"पसंद आ जाता ।
जाने कहाँ कहाँ से अनाथ बेसहारा लोग घर उठा लातीं!!
दऊन बाई,
विदेशी चाचा
तिज्जू मामा
लक्ष्मी जिज्जी
हरीभईया
सोचकर ही अचंभा होता है कि कैसे जान न पहचान और और जाति न बिरादरी '
कोई सिंधी तो कोई मुसलिम कोई शूद्र तो कोई 'मदरासी 'माँ कैसे 'अपना बना
लेती कि वह आकर घर का सदस्य बनकर जीवन भर रहकर मर तक गये 'पर धोखा नहीं
दिया!!
आज क्या ऐसा करना समझदारी है ।
माँ ने धन नहीं जोङा परंतु, माँ 'ने जो दिया है वही तो आज हमारी पूँजी
है, :माँ की तरह सुंदर तो नहीं परंतु उनकी किंचित छवि मुझमें है और उतने
से ही, लोग कहते थे आपका चेहरा बेहद फोटोजेनिक है । आज बस क्यों न जाने
याद आयीं आप!!
©सुधा राजे

सुधा का संस्मरण'-" सुधियों के बिखरे पन्ने एक थी सुधा!"- "बुद्धं शरणं"

सच कङवा है
""""""
बात है आज से आठ वर्ष पहले की ',एक रिश्तेदारी में 'खलीलाबाद 'के एक गाँव
जाना पङा 'तमेसर 'नाथ दर्शन से लौटते समय तबियत खराब हो गयी गर्मी और
पैदल यात्रा की जिद और वजन उठाने से,पेट चल गया । तो रिश्ते की भाभी
काकियों ने एक 'स्त्री 'को बुलवा दिया 'नाम जो भी हो लोग उसे
'हरिहरपुरवाली 'कहते थे ।
उसने कई दिन मालिश की 'रोज आती भोजन करती चाय पीती और घंटों बतियाती,
बातों बातों में बताया कि उसके घर 'लाल कपङों 'वाले साधु आते हैं 'तो अब
हम लोग 'आपकी तरह पूजा नहीं करते ओ लोग 'हमको 'ऐसे पूजा करना सिखाते हैं

उसने अशुद्ध उच्चारण से बताया भी कि कैसे "मंतर पढ़ते हैं '।तब समझ आयी
कि "बौद्ध हो गया है उसका परिवार 'और उस जैसे अनेक परिवार ':
कुछ साल पहले उसके देवर जेठों ने उसका आदमी मरने पर लठियाकर घर से फटे
कपङों में लगभग निर्वस्त्र छोटे बच्चों सहित घर से निकाल दिया था तब
'"गाँव से छिपते छिपाते वह 'दूसरे गाँव के 'बाबू 'के यहाँ पहुँची और,
गौशाला की चरनी की आङ से पुकार लगायी । बङे बाबा औसारे में ही सोते थे
उन्होने आकर, सारी बात सुनी और 'आङे खङे अपनी चादर और कंबल चरनी की तरफ
उछाल दिये ।
फिर घर खुलवाकर पत्नी बहू और पौत्रवधुओं से कपङे भोजन और बच्चों के लिये
दूध चाय बिसकिट निकलवाकर 'गौशाला में भिजवाये । सुबह गौशाला के लिये
दूसरा टपरा डाल दिया गया और हरिहरपुरवाली कुछ दिन वहीं रहती रही । बाद
में लङके भेजकर विधवा का घर और जमीन 'देवर जेठ के कब्जे से छुङवाये । कई
साल वह गाय भैंस और घर की सेवा करके बच्चे पढ़ाती रही लङके मुंबई कोलकाता
चले गये, बेटी का विवाह अपनी बिरादरी में कर दिया ।हमने पूछा बहुओं और
दामाद का धर्म क्या है? वह हँस पङी "वक्क,,ओ तो बौद्ध नहीं है न, ।
गाँव में अकेसी क्यों रहती हो ' उसने बताया कि गई थी लङकों के घर बारी
बारी से रहने 'मकान बेचकर, जमीन बेचकर 'सारा रुपया दे दिया बच्चों को,
मगर गवार अनपढ़ सास बहू को और बूढ़ी होती बङबङाती माई लङकों को पसंद
नहीं आयी । लङकी है सो जब जब दामाद अनुमति देता है मिल जाती है । गाँव
वापस आकर एक घेर बच गया था जिसमें साझा था 'कूङा डालने गोबर पाथने का
वहीं कुछ मेहनत मदद करके एक खपरैल डलवा ली है और सारा दिन तो वैसे भी,
किसी की मोच 'किसी की कलाई का गट्टा 'किसी की पेट की नाभि बिठाने में पता
ही नहीं चलता । बङका बाबू नहीं रहे, पर लङके बहुत मान रखते हैं वहीं जाकर
भोजन खाती है और बूढ़ी दुलहिन से खैनी सुरती रगङते बतियाती रहती है । कभी
कभार घर भी रह जाती है जब लङकी आती है । गाँव की फिजयोथेरेपिस्ट के रूप
में हरिहरपुरवाली का बहुत सम्मान है । फिर हाँक लगाकर बोली, आज घुघरी खाए
का मन है दुलहिन तनि मरचा का अचार औउर चाना बाँन्हि देती '। इतने में चाह
पिअत आँटी 'तनि भूजा लिअऊँती मउनी में ।
फिर हमने कुछ रुपये और कपङे दिये तो ढेरों आशीष देकर बोली 'समय माई
'रक्षा करें, तमेसरनाथ बाबा रक्षा करें, गोरखनाथ बाबा रक्षा करें,
कालीमाई रक्षा करें बजरंगबली रक्षा करें ।हमने पूछा और बुद्ध? बोली ओ भी
रक्षा करें 'हमने फिर पूछा ' जब आप बौद्ध हो गयी हो तब इन देवताओं से
मतलब?
वह बोली "बै,, ऊ त पूजा करने का नवा तरीका न है!! का ओ से हम भुला जईबे
'कालीमाई 'भोलेबाबा अऊर रामजी के!!
रऊरे त एन्ना पढ़ल बाटी बच्ची!!! कौनो आपन देई देऊता माई बाबा के भुला सकीला!!!??
उसकी फैली बङी बङी सम्मोहिनी आँखों के आगे हमारे पास कोई उत्तर नहीं था
',क्या आपके पास है??
©सुधा राजे


Friday, 22 July 2016

सुधा राजे का लेख:- "क्या स्त्री प्रतिशोध का सामान है??

दयाशंकर ने माया को वेश्या की तरह करोङों में बहुजनसमाजपार्टी का टिकिट
बेचने वाली कहा ''''''
दयाशंकर
को पार्टी से छह साल के लिए निकाला गया
दया शंकर पर सबने लानत्त भेजी दया शंकर का कैरियर बरबाद हो गया
मायावती
ने जमकर 'संसद में दयाशंकर के परिवार की सब महिलाओं को गालियाँ बकीं 'ये
उनके स्त्रीपन की महिमा है
बसपा के कार्यकर्ताओं ने जुलूस धरना बनाकर
दयाशंकर की बहिन को पेश करो पेश करो के नारे लगाए '
अगर दयाशंकर की बहिन वहीं आकर "पेश "हो जातीं तो क्या करते बहुजन
समाजपार्टी के कार्यकर्ता?????????!
क्यों पेश करो???
बलात्कार करते??
नंगा करते??
जलील करते??
अपमानित करते????


गाली दया शंकर ने दी और माया ने अठहत्तर गुनी करके लौटा भी दीं '''तत्काल ।
फिर
बहिन पेश करो ""कहकर ''क्या मायावती खुश हो रही थीं????
हम सब यूपी की स्त्रियाँ यही जानना चाहते हैं कि
मायावती किस तरह के "जंमलराज "
में यकीन करतीं हैं,,,,,
वही जो यूपी की दलितों की जंगलवासियों की और विविध पंचायतों के वहशियों
की पंचायत में होता आया है?????
कि
एक लङका किसी की लङकी छेङता है तो उस लङकी की बिरादपी वाले उस लङके की
बहिन को ""उठवा ""लेते हैं!!!!!!!
मायावती वादी जो जो भी है सबको बङी अपमान लगा होगा माना
माना कि दयाशंकर ने गंदे शब्द बोले
परंतु
मायावती ने क्या "संसद में स्त्री को शोभा देती भाषा का प्रयोग किया """"
मालूम है भी उस भाषा को सुनने के बाद यूपी री स्त्रियों की क्या
प्रतिक्रिया है?????
इसी पर
बसपाई हुल्लङबाजों को शह दे दे कर "पूरी मीडिया के सामने "
:::दयाशंकर अपनी बहिन को पेश करो ::::
के नारे लगाये गये????
हम सब स्त्री का रोज ऐसा ""जंगली वहशी रुढ़िगत अपमान होता देखते हैं ।
बसपाई
बहुत खुश हो रबे होगे कि "मायावती को दी गयी गाली का बदला ले लिया!!!!!!
नहीं
गफलत में न रहिये
माया को दयाशंकर ने 'वेश्या से तुलना करके वेश्या बनी मजबूरन हर स्त्री
को ही अपमानित किया '
और
पुरुषवादी गालीछाप सोच की ही मानसिकता प्रकट की ।इसके बदले
दयाशंकर को जे ल होती
जुरमाना लगता
डंडे पङते
मुरगा बनाते
या राजनीति से बाहर करके 'दंडित करते सब जायज होता ।
किंतु
दयाशंकर की बहिन बेटी माँ बीबी
भी स्त्री हैं ।
और यही तो दया ने किया कि ""चिढ़ खुन्नस प्रतिशोध में स्त्री को गाली दी ।
परंतु
बसपा के उन सब कार्यकर्ताओं को """कौन दंड देगा???????
सवाल है हर स्त्री का
जिसको सदा से ""पति पिता भाई बेटे की गलती पर """प्रतिशोध के लिये ''"
बेचा
जलाया
छेङा
बलात्कार
यौन शोषण
गाली अपमान
चीरहरण
सम्मान हरण ।औऱ
बहिष्कार लज्जा आदि जैसे बर्बर घिनौने लांछित अपमानित
अपराध झेलने पङते हैं ।
कौन है जो
इस ""निर्दोष स्त्री दयाशंकर की बहिन बेटी माँ पत्नी ""
के
सार्वजिन आपराधिक ।साशय अपमान का बदला ले?????
क्या भारत की पुलिस
संसद
विधान सभा
कानून
संविधान
में दयाशंकर की बहिन को पेश करो '
के नारे लगाने
वाले ""अपमान करताओं पर काररवाही नहीं होगी????
है कोई जो रिपोर्ट दर्ज करे???
फोटो वीडियो
आप सबके सामने हैं
और अगर ""दयाशंकर ""को दंड मिला है
तो क्या
""बहिनजी मायावती दलित ""
जी में दम है कि
"""""नरेन्द्र मोदी अमितशाह की तरह ही
अपने उन सब """गुंडों को पार्टी से ""छह साल के लिये बाहर निकाल फेंके,,,,,
उनको मजबूर करें कि माफी माँगे???
मायावती खुद भी
सारे ""भाजपा नेताओं के नैतिक सरोकार की तरह माफी माँगे!!!!!
अगर नहीं करतीं माया तो सावधान!!!
यूपी की स्त्रियो
सावधान
बसपा
मायावती
उस दल का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जहाँ
ऐसे हुल्लङबाज 'कार्यकर्ता भरे हैं कि ।आईन्दा भी
भविष्य में कभी
तुम्हारे भी बाप भाई पति पुत्र ने किसी '''''बसपाई """
स्त्री को कुछ गलत
कह दिया अपनी "यूपियाई रुढ़ि गत मर्दवादी अभ्यास आदत के कारण
तो
!!!!
बदला बसपाई तुमसे लेगे!!!!!!
सब चीखेगे
नाच नाचकर ।
कि तुम्हारे
बाप की बेटी पेश करे
भाई की बहिन पेश करो
पति की पत्नी पेश करो
???????
पुत्र की माता पेश करो????
!!!!!!
सोचना और खूब सोचना
क्या
तुम चाहती हो कि ।बाहर दिन भर घूमता तुम्हारा पति पिता पुत्र भाई
जब किसी को कुछ जानबूझ कर
कहें
या छेङछाङ
बलात्कार
या गाली जैसा
लङकी भगाने जैसा कोई भी अपराध या "आरोपित अपराध करें
तो
बदला तुमसे
तुम्हारी माँ से
तुम्हारी बेटी से
तुम्हारी बहिन से
तुम्हारी भाभी भतीजी भाँजी से लिया जाये????????
??????
अब देखना है
कि
मायावती सचमुच ""स्त्री हैं और स्त्री का मान समझतीं है तो ""दयाशंकर की
गलती के लिए ''
उनकी बहिन बेटी माँ से माफी माँगती है या नहीं?????
और
बहिन बेटी पेश करो के नारे लगाने वाले अपने
बसपाई "गुंडों को पार्टी से बाहर निकालतीं हैं या नहीं??!!!!
!!????
अगर मायावती में ऐसा नैतिक साहस है तो साबित करें.
और
यूपी की स्त्रियाँ ""माया के साथ हों "
वरना
मायावती
वही जंगलराज कायम करना चाहती है जहाँ एक "बाहुबली माता अपने गुंडे लङकों
को आदेश देती है कि जाओ ',उसने "अमुक की बहिन को छेङा तुम उसकी बहिन उठा
लाओ '''''''''''''''
'"""''''
धिक्कार
सौ
बार धिक्कार
दयाशंकर को ।और
लाखों बार मायावती को
क्योंकि पुरुषो की गंदी जबान दिन भर हम स्त्रियाँ सुनते रहते हैं और लाख
विरोध भी जताया जाता है ।
परंतु
लानत्त जब
एक स्त्री ही स्त्री का अपमान न केवल स्वयं करती है अपितु
अपने गुंडों से भी कराती है
'''हाँ
हर वह व्यक्ति
जो स्त्री को गाली देता है गुंडा अपराधी है
और हर वह स्त्री जो किसी पुरुष के अपराध का प्रतिशोध
उसके परिवार जाति मजहब की "निरदोष स्त्रियों से लेने को अपने "गुंडों को
उकसाती है "
''अमानुषी है 'नास्त्री है ""
स्त्री
द लित स्त्री हो या मुसलिम ईसाई सिख पारसी बहाबी और हिंदू सवर्ण या पिछङी
या वनवासी ',स्त्री का अपमान सदियों से हर तरह से पुरुष करता आ रहा है
"परंतु यह भी सत्य है कि अधिक संख्या अब तक भी उन पुरुषों की है जो
'स्त्री के अपमान के बदले पुरुष की तो भले चाहे गर्दन भी काट डालें परंतु
उसकी बहिन बेटी माँ को नहीं अपमानित करना चाहते,,, दामिनी का रेप करने
वाले के लिए भी जब इक्का दुक्का किसी ने कहा कि ""ऐसा उसकी बहिन के साथ
हो """तब भी हमारी और लगभग हर सहृदय स्त्री पुरुष की यही प्रतिक्रिया थी
कि ""तब तो पुरुष को ही बर्बर होने की छूट मिली "स्त्री न्या "कहाँ ?????
तो हमारा सवाल सीधे सीधे """दलित स्त्री का चेहरा बनी बहिनजी मायावती से
है कि """दयाशंकर की ग्यारह साल की बेटी को पेश करो के नारे लगाने वाले
अधिक बर्बर हैं कि "साठ साल की राजनेता बाहुबली विरोधी मायावती के टिकिट
बेचने की तुलना "वेश्या "से करने वाला दयाशंकर अधिक बर्बर है????? और
मायावती अगर "मुख्यमंत्री भगवान न करे कि बन गयीं तो क्या '''' पुरुषों
के अपराधों का प्रतिशोध उनके घर की मासूम बहिन बेटी माँ से पत्नी भांजी
भतीजी पोती दोहित्री से लिया जायेगा????? मायावती दलित नेत्री बहिनजी
स्त्री होने के हक के साथ जवाब दें??
में तत्व होना ही चाहिये
कि शत्रु की भी बहिन बेटी की मान मर्यादा शील की रक्षा करे '
'
क्या """भाजपा ने समर्थन किया दयाशंकर का????? नहीं न!!!!!!! तो सब
स्त्रियाँ जानने का हक रखती हैं कि क्या """मायावती "बहिन "जी '''''अपने
बसपाई हुल्लङबाजों का """समर्थन करतीं हैं????? यूपी में तो हर तीसरा
पुरुष किसी न किसी की गाली बकता ही है """"दम है तो सबको डंडे मारो जेल
भेजो जुरमाना लो """""किंतु हम निरीह विवश माँ बहिन बहू पत्नी बेटी भतीजी
भांजी ""पोती दोहित्री को ""यही तो बताओ कि हर गली में फिर उस लङके के
विरोधी घात लगाकर बैठें??????? कि चल पेश कर अपनी बहिन बेटी माँ बीबी
भांजी भतीजी???!? क्या माया हुकूमत इसी बर्बर जंगलराज को """लाना चाहती
हैं """"दलित उत्थान के नाम पर?????? तब सब गैर दलित फिर दलित की गाली पर
"उनकी बहिन बेटी खीचने को तैयार रहे क्या????? बेटी बहिन के बलात्कारी को
दंड देने की बजाय उसकी बहिन बेटी का बलात्कार हो????? क्या मायाराज यही
न्याय करने में यकीन रखता है????
क्या """भाजपा ने समर्थन किया दयाशंकर का????? नहीं न!!!!!!! तो सब
स्त्रियाँ जानने का हक रखती हैं कि क्या """मायावती "बहिन "जी '''''अपने
बसपाई हुल्लङबाजों का """समर्थन करतीं हैं????? यूपी में तो हर तीसरा
पुरुष किसी न किसी की गाली बकता ही है """"दम है तो सबको डंडे मारो जेल
भेजो जुरमाना लो """""किंतु हम निरीह विवश माँ बहिन बहू पत्नी बेटी भतीजी
भांजी ""पोती दोहित्री को ""यही तो बताओ कि हर गली में फिर उस लङके के
विरोधी घात लगाकर बैठें??????? कि चल पेश कर अपनी बहिन बेटी माँ बीबी
भांजी भतीजी???!? क्या माया हुकूमत इसी बर्बर जंगलराज को """लाना चाहती
हैं """"दलित उत्थान के नाम पर?????? तब सब गैर दलित फिर दलित की गाली पर
"उनकी बहिन बेटी खीचने को तैयार रहे क्या????? बेटी बहिन के बलात्कारी को
दंड देने की बजाय उसकी बहिन बेटी का बलात्कार हो????? क्या मायाराज यही
न्याय करने में यकीन रखता है?????

दलित स्त्री हो या मुसलिम ईसाई सिख पारसी बहाबी और हिंदू सवर्ण या पिछङी
या वनवासी ',स्त्री का अपमान सदियों से हर तरह से पुरुष करता आ रहा है
"परंतु यह भी सत्य है कि अधिक संख्या अब तक भी उन पुरुषों की है जो
'स्त्री के अपमान के बदले पुरुष की तो भले चाहे गर्दन भी काट डालें परंतु
उसकी बहिन बेटी माँ को नहीं अपमानित करना चाहते,,, दामिनी का रेप करने
वाले के लिए भी जब इक्का दुक्का किसी ने कहा कि ""ऐसा उसकी बहिन के साथ
हो """तब भी हमारी और लगभग हर सहृदय स्त्री पुरुष की यही प्रतिक्रिया थी
कि ""तब तो पुरुष को ही बर्बर होने की छूट मिली "स्त्री न्याय "कहाँ
????? तो हमारा सवाल सीधे सीधे """दलित स्त्री का चेहरा बनी बहिनजी
मायावती से है कि """दयाशंकर की ग्यारह साल की बेटी को पेश करो के नारे
लगाने वाले अधिक बर्बर हैं कि "साठ साल की राजनेता बाहुबली विरोधी
मायावती के टिकिट बेचने की तुलना "वेश्या "से करने वाला दयाशंकर अधिक
बर्बर है????? और मायावती अगर "मुख्यमंत्री भगवान न करे कि बन गयीं तो
क्या '''' पुरुषों के अपराधों का प्रतिशोध उनके घर की मासूम बहिन बेटी
माँ से पत्नी भांजी भतीजी पोती दोहित्री से लिया जायेगा????? मायावती
दलित नेत्री बहिनजी स्त्री होने के हक के साथ जवाब दें??
©®सुधा राजे

Thursday, 21 July 2016

सुधा राजे का प्रजानामचा:- "जाति बनाम स्वास्थ्य और स्वच्छता।"

अथ प्रजानामचा
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हमारी एक सहपाठी थी "अर्चना "और उनकी बहिन प्रचला "
दोनों मध्यप्रदेश के शिक्षामंत्री की भतीजी थीं ।और घर विद्यालय हम लोग
साथ साथ आते जाते कलेवा एक साथ करते और, शाम को खेलमैदान साथ रहते 'और
प्रचला को नृत्य सिखाना भी जारी रहता ।
हमारे निजी कक्ष तक केवल विशेष लोगों की ही अनुमति थी जिनमें गिनी चुनी
सखियाँ भी थीं ।
प्रचला, उस जाति से थीं जिसके "लोग कभी चमङा उतारने और जूते मशक पर्स
बेल्ट बनाने का कार्य करते थे ।
हम भी प्रचला अर्चना के जन्मदिन आदि पर उनके भव्य घर जाते थे ।
किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, अर्चना कहती हँसकर हमें क्या हम तो चमार है
मजे ही मजे 'परेशानी तो तुम्हारी है पढ़ो और खूब पढ़ो वरना डिवीजन बिगङ
जायेगी '।
एक सखी थी "सुमन "जिसके पिता वकील थे और वह उस जाति से थी जिसके लोग
शौचालय साफ करते थे कभी । उसका स्वभाव भयंकर झगङालू था परंतु हमसे बङी
लंबी मित्रता रही और एक साथ खेलना लंच सब यहाँ कि उसके घर भी हम गये चाय
नाश्ता भी किया ।
शमीम जो मंसूरी सुन्नी यानि जुलाहा चुङेरे आदि पिछङी जाति से थी हमारी
परम सखी थी लॉ करने के दौरान और आज भी जब मिलते है एक साथ खाते पीते है
हम लोग तो कभी पढ़ाई भी करते तो साथ शमीम का घर बहुत भीङ भाङ का था और
हमारे पास निजी छत कमरा और स्टडी थी सो वह हमारे यहाँ रुक भी जाती ।जब हम
लोग बाहर घूमने जाते शमीम को ढोना पङता हमें क्योंकि न तो साईकिल चलानी
आती न बाईक ड्राईविंग, हालांकि संपन्न परिवार था ।शमीम हमारे लिये 'कमल
ककङी के कोफ्ते बनाती और हमारे बापू के हाथ की फिश फ्राई में उसका भी
हिस्सा रहता ।
वे सब खाते और हमें "घासफूस आहारी "कहकर चिढ़ाते ।
असमा "किदवई ''एक और परम सखी थी जिनकी तो सगाई तक की रस्मों में हम लोगों
ने सारे रंगढंग हिंदू रिवाज के किये थे । अकसर साथ जाना खाना चलता रहता ।
राबिया सूबिया बसरी भी हमारी प्रिय सखी थी जो पहली मुसलिम लङकियाँ थी तीन
दशक पहले हमारे साथ "बाईक चलाने वाली "तब तक सब ताँगे या साईकिल तक ही
सीमित थीं ।
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अब सवाल है 'दलित ' और सवर्ण के रूप में समाज को बाँटने का तो यथार्थ यह
है कि "विवाह "के मसले को छोङकर अन्य सब बातों में भारतीय जाति व्यवस्था
बढ़ते 'शिक्षा करण नगरी करण के साथ छूट ही रही है ।

''''''जाति को पूरी तरह खत्म करना कभी संभव ही नहीं हो सकता "
क्योंकि अब रवीश कुमार की तरह पढ़े लिखे संपन्न और ऊँचे ओहदों पर जा बैठे
दलित लोग 'स्वयं ही किसी "मलिन गंदे बीमार रोगी संक्रामक माहौल से ग्रस्त
परिवार के साथ उनके ही घर का पका उनकी ही थालियों में उनके ही नित्य का
भोजन और उनके रहन सहन के हिसाब से जूठा गंदा नहीं खा सकते ।
खायेगे तो ""बीमार पङ जायेगे "बिसलरी और फिल्टर्ड पीने वाले बाबूजी ।

कोट टाई पहन कर भाषण समानता का झाङना टी वी पर और बात है ',और सचमुच समान
होकर रहना और बात है ।
मायावती खुद कभी 'यूपी की दलित बस्ती के भीतर उन घरों में घुसकर उनकी
मटके का पानी नहीं पी सकतीं जिनमें उनके बच्चे रात दिन हाथ डुबोकर जूठे
गिलास डुबोते रहते है नाक पोंछते हुये ।
This is all about, way of living '
साक्षरता और स्वच्छता के अपने एन एस एस स्काऊट गाईड और फिर एनजीओ के
विविध अभियानों के अंतर्गत हम घर घर गये हजारों घरों में गये, 'और रहन
सहन बदलने की बातें की, 'कोई बकवास करे करता रहे हमारे पास प्रमाण हैं
हमारे संघर्ष के, 'और हर्ष है कि रंग लाये हमारे प्रयास, 'किंतु अभी सब
कुछ वैसा नहीं है जैसा होना चाहिये ।
लङके, 'जिनको पढ़ाने हम दस मील साईकिल चलाकर जाते थे अपने फार्म हाऊस तक
वहाँ उनको लाख सिखाते कि "रोज नहाओ 'रोज सुबह शाम ब्रश करो या दातुन करो
या कोयला पीसकर छानकर दाँत माँजो 'और कपङे रोज धोकर पहनो 'शौच करने के
बाद तीन बार हाथ साफ करो 'बालों को दिन में पाँच बार कंघी करो ',और नाक
साफ रखो जुकाम हो तो रूमाल या कागज से साफ करो कपङों से नहीं, 'नाक मुँह
कच्छे में हाथ मत डालो और हर बार छूने के बाद हाथ साफ करो साबुन से
',पानी जूठा गिलास माँज कर ही पिओ, और गिलास फिर जूठा मत करो 'पहले हाथ
धोओ फिर गिलास या पीने का डंका छुओ ',जूँए न होने दो 'बारीक ककही ककवा
"और जूँमार शैम्पू डालकर साफ करो, '।घर की चादरें हर रविवार धोकर सुखाकर
फिर प्रयोग करो, 'कमरे पक्के हैं तो पोंछा लगाओ कच्चे हैं तो गोबर से हर
सप्ताह लीप कर स्वच्छ रखो ',रसोई में बाहर पहन कर जाने वाले जूते चपेपल
मत ले जाओ, 'जूते मोजे कहीं से आने के बाद धूम में एक घंटे सूऱने रखो
।यूनिफॉर्म प्रतिदिन धोओ, 'कीचङ नाली गंदगी में गेंद या कंचे या गिल्ली
गिर जाने पर हाथ से मत निकालो, और हाथ धोओ खेलकर आने के बाद मुँह भी पाँव
भी ।और भोजन के बरतन मँजे साफ हों तब भी भोजन करो, 'हाथ से चावल सब्जी मत
परोसो ',भोजन जूठा करके वापस 'समूचे भोजन के बरतन में मत डालो 'जूठी
चम्मच मत प्रयोग करो उसे धोकर साफ करो, 'गंदे हाथ कपङों से मत पोछो
।""'''':
परंतु ढाक के तीनपात ',वे लङके लङकियाँ, 'एक प्रतिशत भी सुधरने को तैयार
नहीं मिलते ',उनकी माँए भी, मजाक बनाती, बच्चों के जुकाम अपनी साङी से
पोंछ देती ',पिता की जूठी थाली में खुद खाती फिर उसी में एक एक करते सात
आठ बच्चे खाना खा जाते, और फिर, बचा खाना 'हांडी में वापस डाल देतीं
'जूँए मारतीं रहती खत्म ही नहीं होते ',दरवाजे पर हैंडपंप हर गली में
हैंडपंप परंतु नहाने का गरमियों तक में जी किसी का नहीं करता ',स्कूल से
यूनिफॉर्म दो दो मिलतीं परंतु बिना धोये ही पहनते रहते, 'राशन सब्जी बिना
ठीक से छाने फटके धोये ही पिस जाता और सब्जियाँ भी 'घङे अकसर खुले पङे
रहते और जूठे बरतन सब एक ही गिलास से मुँह लगाकर पानी पीते रहते ।मंजन
दातुन कोयला राख कुछ भी दाँतों को न लगने देते, 'लाख रोको देशी सुअर का
मीट खाये बिना हफ्ता न बीतता और, 'पाठ याद करने में मन ही नहीं लगता
।हैंडपंप के पानी से नहाने की बजाय 'गङही धुबैया पोखर 'में जाकर कूदते
लङके और अश्लील हरकतें करने की ताक में रहते "बहुत डाँट पीटकर मुरगा
बनाकर कुछ को बदला 'किंतु बहुत घिसा तक जाकर चुटकी भर निशान पङा । लङके
छिपकर बीङी पीते गुटखा खाते, भाँग के पौधों को रगङकर रस निकालकर सुखाते
और बीङी में भरकर "सुलफा पीते "घरों के खूब भीतर "औरतें कच्ची शराब
उतारतीं जंगली फलों फूलों पत्तों को सङाकर और भभक फैलती रहतीं ',
लङके और उनके बाप भाई चाचा ताऊ दादा अकसर घर लौटते शराब पीकर लङखङाते
हुये और घर आते ही गली से ही 'तेरी माँ का """'''तेरी भैन का '''घोसङा
'""मादर "''और बेटी '''तक की घिनौनी गालियाँ बकते आते ',परस्पर लाठियाँ
चल जातीं अकसर और सिर फूटते रहते ',इसी बीच लङकियाँ भागतीं रहती और
पंचायत बिरादरी की फैसले सुनाती रहती ऊटपटाँग कभी जूते पर से थूक चटवाकर,
बलात्कार माफ हो जाता कभी "रकम पर ''छेङछाङ के फैसले हो जाते, 'थाने
कचहरी तो तब बात जाती जब बिरादरी से बाहर की बात होती ।धरमशाला सरकार बना
जाती लङके उसमें ताश खेलते जुआ खेलते और छिपकर अद्धे पऊए पीते ',लङकियों
के लिए अपनी प्रेनकथा के आयाम बढ़ाने को आड़ मिल जाती ।सरकारी शौचालय
बनते और दिन बीतते वहाँ भी नग्न चित्रकारी और गंदी गंदी इबारतें लिखकर
"साक्षर होने का ऐलान कर दिया जाता ',छतें बनजाती सरकारी मदद से और वहाँ
से लङकी छेङने के लठयाव और कंकरबाजी के कांडों पर बहसें चलतीं । गली की
सङकें पक्की सरकार कर जाती और दोनों तरफ पक्की नालियों को बच्चे "खुड्डी
बनाकर शौचालय की तरह इस्तेमाल करते बतियाते और बिना धोये ही 'साईकिल का
पहिया घुमाने नंग धङंग दौङ पङते । शराब के नशे नें धुत्त पुरुष औरतों की
जमकर पिटाई करते गालियाँ बकते और अकसर ""किसी की बीबी बेटी बहि पकङ ली
""के इलजाम में उनकी धुनाई उनकी ही बिरादरी के लोग करते । झाङ फूँक भूत
प्रेत और घोलना नावते, 'ओझा, भी रोज का ही किस्सा होता । बूढ़ी बेवा माँ
की दारूखोर बेटा पिटाई करता और वह थाने जा पहुँचती, 'स्कूल सरकार खोलती
बच्चे मिड डे मील खाने के समय हाजिर और इंटरवल के बाद "फरार 'हो जाते
',किताबें सरकार देती और रद्दी में बेचकर पढ़ाई बीच में ही छोङ दी जाती ।
कैरोसीन चीनी कतार लगाकर राशन डीलर से ली जाती और पास के किराने की दुकान
वाला बिरादर ही कुछ रुपये अधिक देकर खरीद लेता । जमीन पट्टे पर मिलती और
जुआ शराब गाँजा और एश में गिरवी हो जाती फिर बिक जाती ।
बेटी की साईकिल आती सरकारी और लङकी घर बिठाकर लङका चलाता फिर बेच दी जाती
। वजीफा बच्चों का बाप छीनने आता शराब के लिए और माँ मारखाती न देने को
और कभी माँ जीतकर गहने बनवा लेती कभी बाप छीनकर दारू में उङा देता ।
शातिर बूढ़े प्रौढ़ जवान जब कभी किसी बच्ची बच्चे का बहला फुसला कर यौन
शोषण करते पाये जाते तो जमकर कुटाई होती और बिरादरी की पंचायत में
जुरमाना दावत खिलाकर रकम का रखा जाता तो कभी जेल हो जाती "सिरफुटौवल में
बुद्धू बीस साल जेल रहा ',जब निकला घर ढह चुका था शादी हुयी नहीं, सो एक
और यौनशोषण केस में फिर दुबारा जेल चला गया । पन्ना का भरापूरा परिवार
है बच्चे नगर जा बसे हैं बेटियाँ ससुराल हैं । चुनाव आते नेता बन जाता
बिरादरी का ही सबसे खतरनाक समझा जाने वाला झगङाबाज आरक्षित सीट से मेंबर
चेयरमेन और पंच सरपंच बन जाते विधायक प्रधान और सांसद बन जाते ',फिर फिर
चुनाव जीत जीत कर धनवान बन जाते 'और मायावती, मीराबेन, बनकर फिर उस
बस्ती में पांव तक नहीं रखते ।वह सब जो अनहाईजिनिक है संक्रमणकारी है रोग
बीमारी फैलाने वाला है और जूठा गंदा और उबकाई लाने वाला है ""उन बिरादरी
के मसीहाओं फरिश्तों के लिए '''अनटचेबल ""हो जाती पानी खाना कपङा सामान
और इंसान भी ।
This is all about tha way of living .... वे धनिक बनकर नेता से 'भगवान
हो जाते बाबा साहब बहिनजी और माननीय हो जाते ',कलुआ घंसू डिगाङू फत्ते
उरमिया सब वहीं के वहीं रह जाते, :शराब, 'यौनशोषण 'पढ़ने से जी चुराना,
जातिय द्वेष नेता फैलाते और वे लोग वहीं के वहीं रह जाते 'गंदे बीमार और
लङाकू कलहकारी रोते सर फोङते गाली बकते शराब उतारते चमङा उधेङते और भागते
'सब सुधारों से पीछे की ओर ।
औरते रसोई में फटकर पकाने की बजाय राशन का अनाज बेचकर आटा खरीदलाती और
'पर्व त्यौहार पर नेग माँगने जा पहुँचतीं ' हक है कहकर :जबकि घर घर अब
शौचालय खुद साफ करते हैं लोग जूते अब खुद ही पॉलिश करने लगे हैं कपङे
इस्तरी खुद हः कपते हैं और वाशिंग मशीने आ गयीं है डिश वाशर आ गये है हल
रख दिये गये ट्रेक्टर आ गये हैं और 'स्कूल मुफ्त हो गये "हॉस्टल मुफ्त हो
गये राशन मकान मुफ्त हो गये शादी को धन मिलता है इलाज मुफ्त हो गये,
पेंशन और मुआवजा धङाधङ बात बात पर मिल रहा है , 'कोचिंग और नौकरी सब
बुलाकर बँट रहे हैं ',और हर बस्ती में बारातघर सार्वजनिक धर्मशाला और
अंबेडकर पार्क निजी मंदिर मठ चर्च और स्कूल हो गये हैं फिर भी चिढ़ है
"स्वयं को मेहनत से साफ रखतीं जातियों से!??!
©®सुधा राजे


Tuesday, 19 July 2016

सुधा राजे का लेख :-" मानवता का विश्व गाँव और राह में खङा आतंकवाद।"

सुधा राजे का लेख
""""""

आतंक बनाम इसलाम और सवाल "देता है धन कौन?
★लेख *
वक्त आ चुका है कि ',किताबे आसमानी कहकर उस पर शास्त्रार्थ से बच रहे
'इसलामिक विद्वान 'शब्दशः अर्थ और भावार्थ पर 'दूसरे सब लोगों के सामने
खुलकर बहस करें । यूँ कम जानने वाले कम पढ़े लिखे सीधा साधा मजूरी किसानी
प्रकृत जीवन जीने वालों को न बहलायें बहकायें ।
जब जब बात आती है ""आतंकी ""की उसको हर बार हर कोई कह देता है ये इसलाम
नहीं ये मुसलमान नहीं कर सकता ऐसी हिंसा की कुरान इजाजत नहीं देता, '।
किंतु कोई कहे तो कि हर आतंकी जब कत्ल करता है तो उसके "वहशी जुनून ""की
प्रेरक शक्ति क्या होती है? आखिर वह चाहता क्या है??
जवाब मिलेगी पूरी दुनियाँ के हर व्यक्ति को मुसलमान बनने पप मजबूर करके
इसलाम की सत्ता स्थापित करना ।
और मुसलमान बनने पर क्यों एक मुसलमान दूसरे मुसलमान को क्यों मारता है??
सवाल का जवाब मिलेगा """शरीयत ""की हुकूमत का शब्दशः पालन करवाना "
इसलामिक कानूनों का सख्ती से पालन करना ।
फिर जो जो लोग शरीयत का भी सख्ती से पालन करते हैं और फिर मुसलमान भी हैं
उनको कोई मुसलमान आतंकवादी क्यों मारता है!??

जवाब मिलेगा "
"ज़िहादी क्यों नहीं बनता ""
जिहादी मतलब??
मतलब जो लगातार इसलाम की जनसंख्या बढ़ाता रहे और इसलाम की सत्ता पूरी
दुनियाँ पर थोपकर सबको मुसलमान बनाकर ''''सारी आधुनिकता नष्ट करके सारी
दुनियाँ फिर से शरीयत के कानूनों से इसलामिक नियमों से चलाने के मुहिम का
हिस्सा हो ""।
जो फिर जो जो शरीयत से चल रहा है,,,,,
और मुसलमान है और कुरान को रटकर बैठा है और फिर भी उसे दूसरा मुसलमान
""मार डाल रहा हैक्यो??
''
जवाब मिलेगा """फिर्का ""अलग है ।
ये फिरका क्या है??
ये हैं ""इसलाम को मानने वालों के भी पंथ के भीतर "प्रकारांतर से बने
पृथक पृथक पंथ ""
जिनकी संख्या "72"कही जाती है और मूल रूप से "शिया,, सुन्नी,, बहाबी या
सलाफी ""कुर्द ""आदि गिने जाते है ।

इसमें ""सऊदी अरब ""के साथी मुसलिम देश और "ईरान के साथी मुसलिम देश का
भी एक अंतर है ।

मक्का मदीना सऊदी अरेबिया में होने से पूरे संसार की हज 'मजहबी
तीर्थयात्रा का केंन्द्र सऊदी अरेबिया है ।
और हर मुसलमान पर जीवन में एक बार ""मक्का मदीना जाना फर्ज है "और ये
फर्ज हर हाल में निभाये बिना "हाजी "कहलाने का गर्व हासिल नहीं हो सकता
सो "उमरा"" यानि बिना "रमज़ान महीने के जाना और "हज "यानि रमजान "में
जाना "ही है सबको, 'जो नहीं जा पाते उनको """"""''???
उनको दूसरा काम है कि मुसलमानों की संख्या में वृद्धिकरो ।
ऐसा मजहबी उपदेशक रास्ता निकालते हैं ।
पहले भारत में ""ईरानियों का प्रभाव था आवागमन था ।'
तो पारसी यानि फारसी, भारत आये और भारत में भी बङी संख्या में बस गये ।
उनके प्रभाव से भारत में फारसी भाषा लिपि और खान पान रहन सहन बोलना और
मेलजोल से नाते रिश्ते युद्धों से धर्मप्रभाव बढ़ा ।
बाद में सब घुलमिल गये ।
ईरानी "उनके ईश्वर को "खुदा "कहते हैं सो हर बात पर' खुदा शब्द चलता रहा
तीन दशक पहले तक ।
खुदा हाफिज खुदा ग़वाह 'खुदा जान,े खुदा की बरकत, खुदा की नेमत 'खुदाई,
ये शब्द शायरी और फिल्मों से लेकर जन जन तक छाये रहते थे ।
फिर बढ़ा सऊदी अरब से आवागमन और लेन देन लोग वहाँ की मुद्रा महँगी होने
से वहाँ मजदूरी पर जाते और वहाँ से अरबी संस्कार बोली भाषा पहनावा और
कठोर कानून लेकर आते ।
धीरे धीरे "उर्दू सीखकर मुसलमान कहलाते लोग और फारसी पढ़कर विद्वान
कहलाते आलिम फ़ाजिल,,,, अरबी सीखने सिखाने लगे ।
और हर कसबे गाँव तक मदरसों में अरबी हावी होने लगी क्योंकि ""सऊदी अरब
में मजदूरी जो मिलती है वह भारतीय मुद्रा में कई गुना अधिक बैठती है
""रियाल ""की तुलना में रुपया कमजोर है ।
सो मजदूरी और जॉब की तलाश को कम परेशानी हो तो जरूरी है कि ""अरबी इंगलिश
आती हो और "सऊदी अरेबिया "में कट्टर कठोर इसलामिक कानून लागू हैं इसलिये

इसलामिक कठोर कानूनों और शरिआ का पूरा ज्ञान भी होना जरूरी है ',और जरूरी
है किताबे आसमानी कही जाने वाली "कुरान "का पूरा पढ़ना और रोजे रखना नमाज
पढ़ना और इसलामिक ही तरीके से खाना पहनना और आयतों का रट्टा करना ।
सो अधिकाधिक लोग ज्यों ज्यों अरब देशों में मजदूरी के लिये झटपट धनवान
होने की "लालसा "में जाने लगे और वहाँ जाकर उसी तरह रहना विवशता भी है सो
उसी सब को अपनाने लगे । वहाँ रहते रहते वह सब सीखने लगे जो जो सिखाया
जाता है ।
यानि सब लोग, ""पूरी दुनियाँ को मुसलमान बनाओ और हर मुसलमान पर शरीयत का
कानून लागू करो '।
अब जब हर मुसलमान चाहे जिंम्बाब्बे का हो या साईबेरिया का या फिर चीन और
भारत का ।इसलाम की शर्त के अनुसार उसे "कमाई और बचत जमा का "बीस प्रतिशत
कर इसलामिक दुनियाँ बनाने के लिये देना है जकात यानि दान और वक़्फ ''करना
है यानि वह सब दान केवल मुसलिमों पर इसलाम की भलाई बरकत संपन्नता के
लिये इसलाम को मानमे वालों के लिये मुसलमान की गरीबी मिटाने और मसजिदें
बनवाने हज उमरा कराने पर ही खर्च करनी है ।
सो भला किसका?? अरबों खरबों रुपया """लाभ """पूरी दुनियाँ के दूर दराज के
आये मुसलमानों की हज ''यात्रा और "उमरा "यात्रा के लगातार चलते रहने के
कारण ही """सऊदी अरेबिया और मार्ग में पङने वाले सब देश """धनवान और
धनवान होते चले गये ।
इसलाम को फिर भला क्यों नहीं बढ़ावा देगा वह देश जिसके खजाने भरे छलकते
रहते है केवल इसलिये कि """जितने अधिक मुसलमान होगे उतने अधिक उमरा "और
हज ''यात्री बनकर पर्यटक आयेगे ।!!!!
और जितने पर्यटक मजहबी यात्रा पर आयेगे उतनी अधिक विदेशी मुद्रा और धन
जमा कराते रहेगे!!!!
कुछ हिसाब है कि ""हज "और उमरा,,,,
के मुख्य और परोक्ष प्रबंधन में कितने "लोगों को सऊदी अरेबिया में रोजगार
मिला हुआ है!!!!!!
पेट्रोलियम पदार्थों की आय और हज उमरा की आय को जोङकर और तुलना करके देखे ।
देखे कि कितने लोग प्रतिदिन प्रति शुक्रवार और प्रतिरमजान ''मक्का मदीना
और मुहम्मद हजरत साब की कब्र पर जाते हैं ।
वहाँ जाकर सबको "बाल मुँड़ाने पङते हैं पूरे के पूरे । और सफेद बिना सिले
कपङों में ही यात्रा करनी पङती है ।
ये बाल ही बाल अरबों रुपये की आय का स्रोत बने हुये है । सब हज यात्रियों
के बाल प्रतिवर्ष बेचकर अरबों रुपया खजाने में भर जाता है सरकार के ।
इसके अलावा लोग वहाँ धार्मिक खरीददारी करते हैं और ठहरने खाने पीने रहने
और किराया भाङा के अतिरिक्त भी "अरबों करोङों रुपये ""दान ""करते हैं ।
तो कहना न होगा कि ''हज कराओ ''अधिक से अधिक लोगों को और धन जमा करो ।
तब ये देश हर देश में इसलाम के बढ़ावे के लिये ""दौलत क्यों नहीं भेजेगे?????
विदेशों से यानि इसलामिक देशों से मदरसों इसलामिक रिसर्च केन्द्रों और
मौलवियों उलेमाओं की तकरीरें छापने प्रचारित करने इसलाम को बढ़ावा देने
वाले भवन निर्माण दरगाह मसजिद और कब्रिस्तान बनाने के लिये मदद के नाम पर
""इन्वेस्टमेन्ट ""आता है ।
सिनेमा में "पंडित धूर्त और ठाकुर जल्लाद, दलित को अपराधी किंतु मौलवी को
महान बताने के ट्रैंड चल पङते हैं ।
फारसी में शेर शायरी गजल हम्द कव्वाली करने वाले साहित्यकार लोग फटाफट
दाङी बढ़ाकर मजहबी प्रवचन करने लग जाते हैं ।
क्योंकि कलम घिसकर जो धन मुशायरों से नहीं मिला वह गद्दी पर बैठकर प्रवचन
करने से फटाफट मिलने लगता है ।
और तो और, मदरसा खोलकर पहले कभी रोजी रोटी न चल पाती थी अब कार बंगला
बैंक बैलेंस सब हासिल हो जाता है ।
लगातार अरब देशों से जमात के नाम पर मजहबी प्रचार प्रसार करने वालों के
दल आते रहते हैं ।भले ही उनका "वीसा "पर्यटन या छात्र या किसी और काम का
लिखा हो ।परंतु मसजिदों में ठहरते हैं और गाँव कसबों में स्थानीय लोगों
के घर भोजन करते है रुकते है और बङी बङी शाबासी देने वाली बातें करते हैं
जिससे लोग मुसलमान बने बनाये कुरान सीखें और इसलाम की सत्ता पूरी दुनियाँ
पर कायम करते शरीयत के कानून लागू करवायें ।
ऐसी जमातों के आने के बाद से फटाफट पहनावे बदल जाते हैं लङके कमीज सलवार
टोपी में आने लगते हैं दाङी बढ़ने लगती है 'माथे पर काले दाग बढ़ जाते
हैं औरतें सख्ती से घरों में बंद रखी दाने लगतीं हैं और लङकियों को
कॉन्वेंट और इंगलिश पब्लिक स्कूलों से निकाल कर मदरसे बैठा दिया जाता है,
'सयानी लङकी पर बुरका कस दिया जाता है ।
डीजे बैंड बाजे नाच गाना हलदी घोङी ढोलक बंद कर दीं जाती हैं ।
रुपया बैंक में रखना बंद करके ""इसलामिक फंड ""में रखा जाने लगता है ।
औरतों के जेवरों सोने चाँदी जमा पर टैक्स अदा होते हैं और बढ़ जाती है
सख्ती "अरेबियन रहन सहन माहौल भाषा सीखने अपनाने की ।
पश्चिमी उत्तरप्रदेश के अनेक कसबे लगभग इसलामिक कानून से चल रहे हैं और
वहाँ दूसरे मजहब के लोगों पर भी असर आता जा रहा है ।
दक्षिणभारत और कश्मीर भी बुरी तरह प्रभावित है ।
कारण वही ""जॉब की ऊँची तनखा मजदूरी पाने की तलाश में "रियाल "कमाने की
होङ और फिर उसके "साईड इफेक्ट में ""कट्टरपन की सीख आदतें और ब्रेनवॉश्ड
स्वीकृति ।
हमने बहुत सारे किशोर किशोरियों से बात की तो यही पता चला कि 'घर घर
""हाफिज जी पढ़ाने आते हैं "सिपारा "यानि कुरान "।
और जब तक हर बच्चे को कुरान "हिफ्ज "न हो जाये यानि रट्टा न हो जाये तब
तक पढ़ना पढ़ता है ।
इसे लिखने से अधिक बोल बोल कर पढ़वाया जाता है ।
लङके प्रायः पब्लिक स्कूल में और लङकियाँ प्रायः मुसलिम फंड के स्कूल में
पढ़ाते हैं ।
वे मुसलमान जो भारत में रोजगार पा चुके हैं और बढ़िया कमा रहे हैं उनके
घर पर कम कट्टरपन मिलता है और उनके बच्चे पब्लिक स्कूलों में पढ़ते हैं
।किंतु "जमातों "यानि इसलामिक मजहबी प्रचार समूहों का दवाब इतना अधिक
रहता है कि हर हाल में चाहे "ट्यूशन न जाएँ बच्चों को यातो ""मदरसा जाकर
कुरान सिपारा सीखना पङता है या तो ""हाफिज जी ""को वेतन देकर घर पर ही
कुरान का सिपारा पढ़ाने के लिये रोज बिना नागा बुलाना पङता है ।
अनेक बच्चों ने बताया कि ""हाफिज जी रोज चाय नाश्ता करते हैं और उनका
बहुत सम्मान किया जाता है और वे मारते पीटते बेहद्द हैं कि रो रोकर बुरा
हाल हो जाता है फिर भी अधिकांश माता पिता हाफिज जी को नहीं रोकते टोकते
क्योंकि "सिपारा रटना हर हाल में जरूरी है वरना जमात वाले फिर टोकते हैं
। ये जमात वाले ही घर घर जा जा कर कुरान के नियमों का पालन हो रहा है या
नहीं यह भी देखते हैं ।
ये जमात वाले नगर नगर कसबा गाँव घूमते ही रहते हैं ।और लगभग हर दूसरे
तीसरे परिवार के लङकों का साल में एक दो बार ''जमात 'में यात्रा पर भेजा
जाना जरूरी है
ये मसजिदों में रहते और लोगों के घर अतिथि बनकर खाते पीते और उपदेश करते
हैं । ये जमातें का ही डर है कि आम लोग "रोजा रखते है तब भी जब मन न हो,
और जकात देते हैं तब भी जब देने की इच्छा न हो ',जमात के सामने "मुसलमान
होकर इसलामिक नियम न पालता होने की बात पर जलील होने से बुरा लगता है ।
इन जमातों का खरचा विदेश से भी आता है और जकात के धन से भी उठाया जाता है ।
अब सवाल आतंकी को रकम कहाँ से तो खुद कहो जेहाद को देता कौन
©®सुधा राजे


Monday, 18 July 2016

फुफ्फू को टोंचने :-

बिनकेँ परी गुलेलगन
रोबन लागे आप????
पाकिस्तानी सासरौ?
कै आतंकी बाप?
कै आतंकी बाप '!!
सुधाजी ' देश लूट रए!!
नमकहरामी लत में '
जइसेँ मूँड़ कूट रए??
ऐन कूट लो मूँड़ चाँयेँ
धर धर केँ फोरो '
,',ना दे हैं कशमीर
" सुधा" पुरखन कौ जोर
©®सुधा राजे

Sunday, 17 July 2016

सुधा राजे का लेख :- " मंदिर केवल बुतखाने नहीं थे..."

Sudha Raje
कल कहीं सुना कि एक महाशय कह रहे हैं कि भारतीयों ने किया ही क्या?
बनवाये तो मंदिर और स्त्रियों को सती किया कराये तो यज्ञ ।
क्या ऐसे लोगों को पता है कि ।
मंदिर केवल बुतखाने नहीं होते थे भारत में ।मंदिर के साथ
'यात्रीविश्रामगृह और अतिथिशाला होती थी क्योंकि तब होटल नहीं थे ।मंदिर
का अखाङा होता था क्योंकि तब "जिम "नहीं थे ।मंदिर की पाठशाला होती थी
क्योंकि तब सरकारी और कॉन्वेंट स्कूल नहीं थे ।मंदिर के साथ 'मंच मनोरंजन
स्थल होता था क्योंकि तब सिनेमाहॉल और थियेटर नहीं थे ।मंदिर के साथ
स्थानीय विवादों का समाधान करने की दैनिक साप्ताहिक मासिक और वार्षिक
सभायें थी क्योंकि तब कचहरियाँ और थाने नहीं थे ।मंदिर के साथ रोज सुबह
शाम आरती के बाद बँटता प्रसाद था 'और निराश्रितों विकलांगों को भोजन दो
बार तो हर रोज मिल ही जाता था, क्योंकि तब राशन की दुकाने बीपीएल कार्ड
नहीं थे ।मंदिर से लगा कुँआ और गौशाला और बालकें के लिये क्रीङा मैदान भी
थे ।मंदिर को जाना दिन प्रतिदिन का अभ्यास था क्योंकि तब स्टेडियम और
जॉगर्स पार्क नहीं थे ।मंदिर से जुङे खेत पुजारी के होते थे और मंदिर में
आपदा शरणस्थल होते थे ',आकस्मिक सूचना सभा करने घोषणा मुनादी करने के
स्थान थे ।मंदिर आरोग्यधाम औषधालय और समाज की हर तरह की गतिविधियों का
केन्द्र थे ।मंदिर से सब जुङे थे हर घर से अनिवार्य दान मंदिर जाता और
उससे समाज के लेखक, शिक्षक और विचारक वर्ग की आजीविका बखूबी चलती ।
मॆदिर ""मनरेगा "नरेगा का बाप था ''।इससे आजीविका मिलती कलाकारों नर्तकों
अभिनेताओं और नटों को, अभियंताओं और शिल्पियों को ।मंदिर समाज का
पुस्तकालय थे ।मंदिर में कन्याभोज बालभोज सौभाग्वती भोज, विधवाभोज
''पूर्वजों हेतु ब्रह्मभोज और दान सब चलता रहता था कब आँगनबाङी और
अनाथालय नारी निकेतन और लंगर सब मंदिर थे ।
मंदिर थे तो गाँव गाँव के बीच प्रतियोगितायें थी ""स्वयंवर के आयोजन थे
"मेले उत्सव झूले हिंडोले नुमाईश और हाट बाजार मंदिर से ही तो थे ।
स्टेडियम भी मंदिर थे ।',मंदिर से ही नायक जनता को संबोधिक करते और
विचारक नायक को नीतियाँ समझाते । मंदिर, आचरण पर लगी नियंत्रित सभा थे ।
आज चार लाख मंदिर सरकार के कब्जे में है और मसजिदें चर्च कितने हैं?? ये
धर्मनिर्पेक्षता है??
गैलीलियों की घङी से पहले "चौबीस शलाकाओं का कोणार्क आ चुका था और
"""नक्षत्र गणना तो अब पूरी दुनियाँ मानती ही है कि मंदिरों से उपजा
ज्ञान सारी सभ्यताओं से पहले की व्यवस्था है । प्राचीन यूनान के निर्माण
भी भारतीय 'प्रस्तर कला के समक्ष फीके पङ जाते हैं ',
संगीत का सम्राट रहा भारत और सुर लय ताल के कलाकारों को मंदिर से अधिक
उपयुक्त स्थल कहाँ था अपनी कला के अभ्यास लोक प्रशिक्षण और प्रदर्शन के
साथ प्रतियोगिता का!!!! मंदिर के भीतर संगीत की धुनों के साथ पूजा और
ध्यान योग व्यायाम और पीपल बरगद कदली अशोक आँवला आम महुआ कदंब हरसिंगार
मौलश्री और बेल के वृक्षों का पूजन "आज के वन विभाग तक नहीं कर पा रहे
ऐसी व्यवस्था ।
इसीलिये 'विदेशी आक्रमणकारियों ने सबसे पहले मंदिर ढहाये 'ग्रंथ जलाये
और मंदिरों की गौशायें तथा भंडार लूटे 'लाखों ग्रंथ जलादिये और
पांडुलिपियाँ चुरायीं और नष्ट कर दीं!!!
शेष फिर
"©®सुधा राजे


Thursday, 14 July 2016

सुधा राजे का लेख :- " बिंदी वालियाँ" संस्कृति के इन प्रतीकों का किसी के निजी आचरण के कारण उपहास करना उचित है???"

बिन्दी वालियाँ
"""""""""""""सुधा राजे का लेख ।

तिलक का बिन्दी लगाने का मजाक उङाना कहाँ तक उचित है?क्या तिलक या बिंदी
लगाना अपराध या पिछङेपन की निशानी है ?

कुछ समय से दिल्ली की छद्म सेकुलरवादी सोच से ग्रस्त तथाकथित आधुनिक
फेमिनिस्ट व्यक्तियों ने जिनमें स्त्री पुरुष दोनों ही हैं ',एक
उपहासात्मक नारा सा गढ़ दिया है,,,,

अब कहाँ गईँ वे बिन्दी वाली महिलाएँ? अब कहाँ गयीं वे कलफ लगी साङियों
वाली महिलाएँ?

हमें और आपको सोचना पङेगा एक पल रुक कर कि 'जिस तरह नन सफेद सलेटी "हैबिट
"पहनतीं हैं और पादरी "चोगा पहनते हैं ',मुसलिम गोल टोपी काफिया और
'जुज्बा "पहनते हैं और मुसलिम स्त्रियाँ 'बुरका 'चादर, और गरारा जंफर
पहनतीं हैं । सिख महिलाएँ सलवार कुरता पहनतीं है सिख पुरुष पगङी केश कटार
और कड़ा पहनते हैं और बौद्ध चीवर पहनते हैं ",,ईसाई स्त्री विवाह के समय
"वेडिंग गाऊन और वील पहनती है, 'पुरुष कोट टाई हैट पैन्ट पहनते हैं, ठीक
वैसे ही 'हिन्दू स्त्री को भी स्वतंत्रता है अलग अलग प्रांत की परंपरा
रीति और अपनी पसंद से अपनी पोशाक पहनने और अपने अपने धार्मिक सामाजिक
दस्तूर निभाने का । बिन्दी और तिलक अनंतकाल से भारतीय पोशाक का हिस्सा
रहे हैं 'आसाम बिहार बंगाल और गुजरात राजस्थान महाराष्ट्र की स्त्रियों
में तो बिन्दी उनके जैसे शरीर और पहचान का ही एक हिस्सा बन चुकी है । इसे
न तो थोपा जाता है मार डाँटकर न धमकाकर विवश किया जाता है । दिल्ली मेरठ
अलीगढ़ लखनऊ और सहारन पुर के आसपास का माहौल, अच्छा खासा अल्पसंख्यक
इसलाम से प्रभावित होने के बावजूद 'स्त्रियाँ बिंदी लगातीं है । केवल
सुहागिनें नहीं अपितु शौक और फैशन का हिस्सा बनाकर लङकियाँ कुमारियाँ और
यदा कदा काली सफेद और अन्य रंगों की बिंदी तो विधवायें भी लगाती है ।
मंदिर और पूजा पाठ कथा आदि का आयोजन लगभग हर हिंदू के घर कभी न कभी तो
होता ही है ',सो तिलक पुरुष भी लगाते हैं । शनिवार मंगलवार हनुमान जी को
चोला चढ़ाया जाता है मंदिर जाने वाले युवा लङके प्रौढ़ भी हनुमद् चरण से
सिंदूर लेकर लगाते हैं तिलक ',हरिद्वार और ऋषिकेश प्रयाग काशी मथुरा
अयोध्या जाने पर वहाँ आरती के बाद पुजारी और बटुक ब्राह्मण सभी उपस्थित
लोगों को तिलक लगाते हैं ।
ओरछा नरेश 'मधुकर शाह जब अकबर के सामने राजपूती लंबा तिलक लगाकर गये तो
मौलवियों को बुरा लगा ',उन पर कर थोपने की योजना बनायी गयी ',परंतु दूसरे
हिंदू सामंतों की तरह उन्होंने तिलक मिटाया नहीं बल्कि अपने तिलक को
औचित्य के साथ वर्णित करके, सही ठहराया और "टीकमसिंह "की उपाधि पायी
'उन्ही के नाम पर "टीकमगढ़ "बनाया गया ।सिंधिया आज भी अपने पारिवारिक
समारोह में चंद्रतिलक लगाते हैं और, भाईयों को ""नौरते जवारे कान पर धरकर
तिलक करतीं हैं सारी हिंदू लङकियाँ ''दशहरा पर । भाईदूज "भाऊबीज 'का
त्यौहार जब आता है दीवाली के तीसरे दिन तो सारे हिंदू पुरुष अपनी बहिनों
से 'रक्षा तिलक 'करवाते हैं । विवाह तय होने की 'रस्म 'को ही 'तिलकोत्सव
'कहा जाता है ' और तिलक आया 'बोलकर वधू के भाई लङके का तिलक करते हैं ।
मंडप के दिन 'भाई अपनी बहिनों के घर 'भात 'की रस्म में जाते हैं और बहिन
सारे भाई भतीजों उनके मित्रों यानि "भातियों "का पटरे चौकी पर आरती करके
तिलक करतीं और नारियल देतीं हैं ।दूल्हा बनकर जब हिंदू विवाह करने जाता
है तो ''द्वार पर वर का तिलक कन्या के पिता करते हैं जिसे "टीकाचार
''द्वार चार ''बाघद्वारी "आदि कहते हैं ।
बारात रवाना होने से पहले वर के घर की स्त्रियाँ लङके को आँगन में बिठाकर
टीका करती है और नजर उतारती हैं '। बिन्नायकी ',यानि गणेश पूजा हेतु जब
वर गाँव की परिक्रमा करके बारात के आगे चलकर मंदिर जाता है तब गाँव की
औरतें भी ''मौरचढ़े 'की रस्म का टीका करती हैं । विवाह संपन्न हो जाने के
बाद भी विदाई से पहले 'वर वधू का "टीका "सब महिलाएँ करतीं हैं । देवी
देवताओं की आराधना का हिस्सा है टीका लगाना । कन्याभोज कराकर, उनको भी
तिलक लगातर नमन किया जाता है ।
अनेक पुरुष हैं जो प्रातः बिना ग्रहण करे स्नान पूजा करके 'इष्ट देव का
तिलक लगाकर ही दफ्तर या कार्य स्थल पर जाते हैं ।
दुकान हो या दफ्तर या घर लोग एक छोटे या बङे आले या कमरे में "अपने अपने
ईश्वर को पधार कर उनका तिलक आरती धूप दीप प्रसाद पूजा करके ही काम काज
शुरू करते हैं ।

तिलक पहले चंदन फिर हलदी फिर कुंकुम और फिर सिंदूर 'भस्म केशर 'और
गोरोचन आदि का लगाया जाता था ।
जिसके अपने अपने "आयुर्वेदिक उपचारात्मक काय चिकित्सा में लाभ भी कहे गये है ।
आज लोग "बॉडी स्पा "कराने मँहगे होटल रिसॉर्ट केरल के औषध पर्यटन केंद्र
में आते है दूर दूर देशों से । चंदन मिट्टी हल्दी फूलों का चूर्ण केशर और
अन्य "अरोमा 'पदार्थ का लेप इसका अंग है ।
हिंदू भी प्राचीनकाल में "उबटन करके रोज नहाते थे 'और मालिश करके चंदन
तिलक लगाकर कुंकुम टीका लगाते थे ।आपको विश्वास न हो तो एक दिन सप्ताह
में उबटन करके स्नान कीजिये, फूलों को गरम पानी में डालकर रखिये, ठंडा
होने पर उससे 'मिट्टी पोतकर मल मल कर छुटाकर नहाईये और असली चंदन को
पत्थर पर घिसकर तिलक लगाईये '।पूरा दिन आप सिरदर्द और तनाव से बहुत सीमा
तक बचे रहेगे ।और महकता तो रहेगा ही भीनी सुगंधि से आपका मुखमंडल ।इसे
पोंगापंथी बतानेवाले जाकर देखे कि 'उच्चशिक्षित धनाढ्य 'यूरोपियन अमेरिकन
और विदेशी गैर हिंदू तक आ आ कर किस तरह 'समझ और सीख रहे हैं प्रतिदन के
भारतीयों के 'स्वस्थ निरोग रहने के प्राचीन उपाय 'ध्यान, योग, और
जीवनचर्या 'आहार विहार के नियम ।
नहीं लगाना तो मत लगाओ न, 'कौन जबरन लगवा रहा है आपको!! परंतु दूसरों के
डर से न पोंछो ।

समय बदल रहा है लोग पहनावा वैश्विक फैशन से पहन रहे हैं और धार्मिक
प्रतीक घर मंदिर तक सिमट रहे हैं, माथे पर तिलक लगाने वाले भी अब, बाहर
निकलने से पहले तिलक पोंछ लेते हैं । क्योंकि मजाक उङाया जाने लगा है, उन
जगहों पर जहाँ, दूसरे धर्मों के लोग अधिक संख्या में रहते हैं ',परंतु
क्या हम केवल लोगों के डर से अपने मन के अनुसार जीने के मौलिक अधिकार
निरापद 'मौलिकताएँ भी खोते जायेंगे?
आप देखें कि बङे बङे इंजीनियर डॉक्टर प्रोफेसर तक जो मुसलिम है "माथे पर
बङा सा काला निशान बनाये रखना चाहते है, मसजिद की दहलीज पर माथा पटक पटक
कर नमाज की निशानी बतौर वहाँ की अगरबत्तियों की राख भी मलते हैं और चौखट
की धूल भी 'जो जितना काला निशान वाला उतना बङा नमाजी हर बात पर या खुदा
या अल्लाह इंशा अल्ला माशा अल्ला । क्रिश्चियन, गले में क्रॉस लटकाये
मिलेगे और बात बात सीने पर क्रॉस बनाकर पर ओ गॉड ओ गॉश कहते मिलेगे ।
उनके विवाह भी चर्च की रीति के ही अनुसार होते हैं और पारंपरिक परिधान के
साथ सारी रसमें भी निभायी जातीं है । जो लोग दक्षिण भारत गये होगें या
रहते हैं या बंगाल में उनको गहराई से पता होगा कि वहाँ "ईसाई बन चुके
आदिवासी परिवारों की स्त्रियाँ अब भी साङी पहनतीं और बिंदी लगाती हैं ।
बंगाल की मुसलिम स्त्रियाँ भी बिंदी लगा लेती है काँच प्लास्टिक या लाल
के अलावा अन्य रंग की । नहीं तो माथे पर माँगटीका 'बेंदी, झूमर और बोरला,
राँकङ, शीशफूल आदि भी विवाह या उत्सव पर स्त्रियाँ पहन लेतीं हैं ।
लता मंगेशकर, आशाभोंसले, मार्गरेट अल्वा, सुभाषिनी अली, शुभा मुद्गल,
श्रीमती ओमथानवी, कविता कृष्णामूर्ति, सुषमा स्वराज, स्मृति ईरानी, ऊषा
उत्थुप, सोनल मानसिंह, एम एस सुब्बुलक्ष्मी, तीजनबाई, मालिनी अवस्थी,
विजयलक्ष्मी पंडित, वसुंधरा राजे, रेखा भूमनवजैमिनी गणेषन, हेमामालिनी
'सुधा चंद्रन, वैजयंती माला, सुधा नवल, आदि हमारे देश की पहचान हैं और सब
की सब साङी पहनतीं हैं बिंदी भी लगाती है ।
क्या इस वजह से इन सबका उपहास होना चाहिये कि ये ''भारत के हस्तकला
कारीगरी की चंदेरी बनारसी हैंडलूम, बंगालताँत, कांथा,वाणीजयराम,
सुभद्राकुमारी चौहान, कोटाडोरिया, साऊथसिल्क, कोसा, सूती कलफ वाली आदि
साङियाँ पहनतीं हैं!!!
क्या इस सबसे उनकी बौद्धिकता उपलब्धि हुनर और देश के लिये उनकी उपयोगिता
कम हो जाती है??
माना कि 'आज का युग बदलता समय कार्य की तेजी और जॉब नौकरी रोजगार की
शर्तों के साथ स्त्री पुरुष सबका जीवन बदल गया है । लङकियाँ लङके सब
भागदौङ करते रहते हैं परंपरायें पीछे रह गयीं हैं और जरूरतें हावी है ।
तो भागो और दौङो और अपने अपने लक्ष्य पाने के लिये जुटे रहो,, परंतु ये
अधिकार किसी को भी नहीं कि वह दूसरों की मान्यताओं पहनावे और परंपराओं या
पसंद नापसंद का मजाक बनाये उसे पिछङा या 'प्रतीक रूप में
"बिंदी साङी " वालियाँ कहकर व्यंग्य कसे!!!!
कोई गाँव की स्त्री जब 'हमें बलकटी "कह देती है तो समझ में आता है कि
उसने अभी नगर नहीं देखा, बाईक या कार चलातीं स्त्री नहीं देखी और नहीं
देखा ऐसा वातावरण जहाँ बेटियाँ बेटों की तरह रहती है और पति पत्नी सास
ससुर एक टेबल पर भोजन करते हैं । वह अपराधी नहीं 'अंजान है 'और इसीलिए
उसकी हर बात तब तक क्षम्य है जब तक कि वह कोई हानि या अपमान करने के लिए
कुछ नहीं कर कह या जता रही 'या रहा हो । परंतु भारतीय वातावरण में रहकर
पले बढ़े पढ़े और कामकाज कर रहा व्यक्ति चाहे हिंदू हो या अन्य धर्म से,
चाहे स्त्री हो या पुरुष या अन्य लिंग , किसी की भावनाओं या कार्यव्यवहार
पर चोट पहुँचाने मखौल उङाने उनको धर्मविशेष का होने या पहनावा पिछङा होने
का 'या उनके कार्य की आलोचना के लिये भी ''बिंदी साङी वालियाँ "कहकर मजाक
बनाये या व्यंग्य करे यह एक "वाचिक हिंसा है "अपराध है वैचारिक दबाब है
कि वे 'बिंदी लगाना त्याग दें और साङी पहनना छोङकर अन्य वस्त्र पहने ।
हम अपनी मरजी चाहे जो पहने खायें करें यह अधिकार जिस तरह हमारे समाज और
संविधान ने दिया है उसी तरह हर तिलक लगाने वाले को ',कलावा बाँधने वाले
को 'टीका बिंदी त्रिपुंड, आदि लगाने वाले को, सिंदूर साङी चूङी चोटी
जनेऊ आदि अपनाने वाले को पूरा अधिकार है कि वह जैसे चाहे रहे । सिखों ने
कनाडा अमेरिका फ्रांस तक में पगङी पहनने के हक की लङाई लङी और जीत भी ली
। क्या उनकी पगङी उनके विकास में बाधक है? अनेक मुसलिम डॉक्टर इंजीनियर
वकील पत्रकार और प्रोफेशनल नमाज का काला निशान बनाये रखते हैं माथे पर
गोल टोपी पहनकर मसजिद जाते हैं दाङी भी रख लेते हैं तो क्या यह उनको
कार्य जॉब या प्रोफेसयशन के कमी बेशी त्रुटि के लिये "निंदा "मजाक या
व्यंग्य का मुद्दा है?? क्यों केवल खासकर "हिंदू पहनावे रीति रिवाज
मान्यताओं और प्रतीकों को जानबूझकर खुद हिंदू ही प्रगतिशीलता के नाम पर
व्यंग्य मजाक और उपहास निंदा का मुद्दा बनाते हैं किसी अन्य गलती है भी
या नहीं की चर्चा के लिये??
क्या इससे करोङों लोगों की जो पूरी पृथ्वी पर फैले हैं "भावनायें "आहत
नहीं होतीं? यह हिंदू ही है जो अपने प्रतीकों संस्कारों का इतना 'उपहास
निंदा व्यंग्य सहन भी कर लेता है और कर भी लेता है । परंतु कुछ बात है कि
हस्ती "मिटती नहीं हमारी ।
©®सुधा राजे
पढ़े हमारा ब्लॉग '
''गूँगे रुदन जंगली गीत "

Tuesday, 12 July 2016

सुधा राजे का देशराग:- " भारत के पुत्रों जागो!!!"

जागो जागो जागो
हे आर्यवर्तियो जागो ',
माँगो छीनो माँगो '
अधिकार देश के माँगो ',
हे विप्रदेव हे क्षात्रवीर हे लक्षमीपुत्रो जागो '
हलधर जलधर गोपालो
हे कृषक श्रमिक उठ भागो ।
जागो जागो जागो,
'बढ़ गये कीट क्रूर कुविचारी अब तो निद्रा त्यागो ',
हे ब्रह्मसंतती जागो ।।
भारत के वीरो जागो
हे आर्यपुत्र हे ब्रह्मअंश हे महावीर सुत जागो
काशमीर से निकल शारदा जम्मू विकल पङी है!!!!!!!!!
कीट पतंगो खलों श्रृगालों की यूँ भीङ बढ़ी है ।
रोद्ररूप धारण चिनाब ने किया,
गंग बिगङी है ',
चलो उठी हुंकार कालिका
अब तो निद्रा त्यागो!!!!!!!!!!
हे शिवा संतती जागो
राणा के पुत्रो जागो
हे परशु वंशजो जागो '
वीर धीर बढ़ चलो
लङ रहे लाल
उठो घर त्यागो
हे भरतवंशियो जागो 'भारत के लालो जागो '
उठो उठालो शस्त्र देश है संकट मे
ं मत भागो """
©®सुधा राजे

Saturday, 9 July 2016

सुधा राजे का ""यात्रा वृतांत"" :- "" कल- कल गंग विकल....""

तीर्थवास पर थे, हरिद्वार में जबरदस्त सुरक्षा के बीच भी "रोङीघाट पर
मेहरबाबाआश्रम के चारों तरफ गंदगी ही नहीं बल्कि अव्यवस्था भी थी वहाँ
कोई पुलिसवाला तक राउंड पर नहीं था 'एक छिछोरा वहीं कपङे बदलती लङकियों
को घूरने लगा और फिकरे भी, सहन नहीं हुआ तो खदेङ दिया ',क्या तीर्थ पर
गंगा नहाते भी ये 'नरपशु 'पशुता नहीं छोङ सकते!!!!!! तो क्यों जाते हैं
गंगा????
जब ऋषिकेश की तरफ चले मार्ग में शराबी ऑटोरिक्शा चालक की बदतमीजी भी देखी
जो मौका देखकर नित्य यात्री लङकियों से भी तिगुना किराया ले रहा था जबकि
हरिद्वार से किराया मात्र बीस रुपये है सामान्य दिनों का ',मार्ग में
"जहीर चिकन मटन शॉप!!!!! और गंगा में गिरता गंदा नाला देखकर मन आहत हो
गया ',क्या गंगा को हरिद्वार ऋषिकेश में माँस मलमूल गंदगी से मुक्क रखना
उत्तराखंड सरकार के लिए असंभव है!!!!! क्यों नहीं तीर्थ यात्रा मार्ग से
ये चीजें दूर रखी जा सकती?????
रास्ते में ही ऑटोचालक शराबखाने पर रुका और पौवा खरीद कर चालक सीट के
नीचे रखकर अंधाधुंध गाङी दौङा दी ।
ऋषिकेश में भी ठीक गंगा के ही आसपास बने भवनों की छतों पर पीछे और
खंडहरों में कूङे का ढेर लगा हुआ था ।
वहाँ भी छिछोरे!!!!!!
क्या भारत में कोई जगह है जहाँ लङकियाँ शांति से निडर रह लें दो पल!!!!!!!!
जयभारत
,,,,,,,
©सुधा राजे

लेखिका अधिवक्ता एवं स्वतंत्र पत्रकार हैं

Tuesday, 5 July 2016

सुधा राजे का लेख :- "" विश्व गाँव की संकल्पना बनाम इस्लामिक आतंकवाद""

चेतावनी भी है और हम कुछ बरस पहले इसे विस्तार से समझा भी चुके हैं । अरब
इजरायल का पूरा इतिहास और बाईबिल कुरान दोनों ही जिन जिन लोगों ने पढ़
लिये होंगे वे भी हमारी बात से इनकार नहीं कर सकते कि

किसी
"मुसलमान का समर्थक नहीं है कोई भी आतंकवादी "
तब किसी जमाने संघर्ष हुआ था संसाधनों पर कब्जा करने के लिये । और आज भी
सारा आतंकवाद है संसाधनों पर कब्जा करने के लिये ।
क्योंकि आतंकवादी जब किसी को मारते हैं 'अरब देशों से बाहर तो पूछकर
मारते हैं 'धर्म क्या है '।सुबूत माँगते हैं कुरान की आयतें सुनाओ या
पढ़कर दिखाओ '। खतना देखते है पुरुषों का । स्त्रियों से नमाज कलमा और
आयतें सुनते हैं । पता चलते ही कि मुसलमान नहीं है बेरहमी से कत्ल कर
देते हैं ।
और ऐसे खून खराबे कत्लेआम पर चुप रहता है अकसर बहुतायत लगभग सारा ही
मुसलिम तबका यह सोचकर कि वे सब आतंकवादी मुसलमानों के सरपरस्त या रक्षक
हैं और वे मुसलमानों को नहीं मारेगें । क्योंकि उनका निशाना तो 'केवल
'ग़ैर मुसलिम लोग है ।
यहीं तो सारी चाल खेली जाती है ।
पहले इसलाम के प्रचार प्रसार के नाम पर ज़मातें बनायीं जाती है ।इन
जमातों में लगभग हर घर के बच्चे लङके प्रचार प्रसार तकरीर और उपदेश के
लिये दूर दूर तक जाते हैं । जिनके खाने रहने सोने का इंतजाम अतिथि की
भाँति घर घर मसजिद मसजिद होता है । इन जमातों का खर्चा चंदे की रकम से
जुटाया जाता है ।
धर्म प्रचार की शक्ल में इन लङकों का संपर्क एक से दूसरे देश के आये
लोगों से होता है ।
आप पता करिये आज कल इंडोनेशिया बांगलादेश भारत पाकिस्तान सऊदी अरब तक के
अनेक प्रचारक विविध प्रकार का वीसा लेकर भारत और पङौसी देशों में आ जा
रहे हैं । इनके लिये घरों से भोजन शैया और अनिवार्य दान जाता है ।
इन्ही के बीच में "आतंकवादी "संगठन जिनकी संख्या हजारों में है ।
अलग अलग देशों में अलग अलग संगठन काम कर रहे हैं ।
इन संगठनों का कोई सदस्य कहीं कोई काम मेहनत मजदूरी नहीं करता!!!!!!!!
तो जलता हुआ सवाल है इनका खाना कपङा अय्याशी का सामान मोबाईल लैपटॉप,
हथियार यात्रा पासपोर्ट वीसा और रहने घूमने का खर्चा कौन उठाता है?
कहाँ से आता है हर देश के अनेक आतंकवादी संगठनों के पास पैसा?
ये पैसा आता है "आपराधिक रँगदारी से ।ये पैसा आता है धनवान मुसलमानों का
भयादोहन करके । ये पैसा आता है जक़ात और इसलाम के प्रचार प्रसार
मुसलमानों के लिये यतीमखाने मदरसे दरगाह कबरिस्तान मसजिदें और इजतमा
मजलिसें यात्रायें कराने के नाम पर धोखे में रखकर उन मुसलमानों से जो
मेहनत करते हैं नौकरी करते हैं कलाकार है और जाहिर तौर पर धन कमाते हैं ।
गरीब है या अमीर सबको "हज "और उमरा "का बंधन इसलाम ने कर रखा है सो, इस
बहाने ये आतंकी संगठन जमातों की भीङ में अपने उपदेशक लगाकर "ब्रेनवॉश
"करने वाले 'धार्मिक कर्ज फर्ज और जेहाद के नाम पर बरगला लेते है लङकों
को । लङके घर से धरम के लिये गायब हो जाते हैं । परिजनों को अकसर पता
नहीं होता कि लङके कहाँ है परंतु अंदेशा पूरा होता है कि लङका मजहब के
प्रचार प्रसार में दीनवाला हो गया ।
ये दीन के नाम पर जुटे धन से भी धनसंकलन कर लेते हैं और दान देने वाले को
पता तक नहीं चलता कि उसका धन जो उसने इसलाम के प्रचार प्रसार के लिये दान
दिया है ।यतीमों बेवाओं के लिये दरगाह मदरसे और मसजिदें बनवाने को दिया
है दान में वह कहाँ कहाँ जा रहा है ।
अनेक आपराधिक घटनायें बैंक डकैती ब्लैकमेलिंग और लूटपाट से भी धन जुटाया जाता है ।
मुसलमान सोचता है कि आतंकवादी उसको नहीं मारेगा ।
ऐसा वह करता भी है "नारा ए तकबीर ''लगाकर हत्यायें करता है ।
नाजियों की तरह । एक कौम को ऊँचा घोषित करके उनका "हीरो "बन जाता है ।
फिर जहाँ जहाँ "इसलाम क़ायम हो जाता है ।वहाँ शरीयत के नियम लागू करने के
नाम पर मुसलमानों को मारता है ।पाकिस्तान बांगलादेश मलेशिया ईरान ईराक
अरब इज़रायल कुवैत सीरिया लेबनान ""''''सब जगह जहाँ जहाँ देश का मजहब
इसलाम है वहाँ वहाँ, भी हत्यायें करते हैं आतंकवादी ।
लेकिन जब देश इसलाम का है वहाँ सब मुसलमान हैं तब क्यों??? हत्याये???
तब तो उन सबको अरबी फारसी आती है!!!! सब नमाज जकात रोजा हज और कुरान की
तराबिया करते है!!!!
तब क्यों हत्यायें की??
क्यों मारा मुसलमान को 'नारा ए तकबीर 'लगा कर???
सवाल टेढ़ा है परंतु दिमाग है तो समझो कि ये "अजगर लोग आतंकवादी इनको
क्या बहाना है इसलामिक देश में सत्ता पर रौबदाब और डर बनाये रखने का तब??
तब फिर खरचा कहाँ से चलेगा? कहाँ से विश्व भर को दाब डराकर भयभीत रखने का
सारा तंत्र चलेगा!!!
तब मुसलमान ही मुसलमान को ""शिया ""कहकर मार डालता है ।
कुरेद बहाबी सुन्नी शिया के अलग अलग गुट संगठन बनाने के नाम पर डराता
मारता है और मुफ्त की दौलत लूटता है ।
कामकाज करके कमाना फिर कैसे संभव है!!!!
एक बार आतंकवादी बन गया तो बन गया फिर 'घर वापसी "संभव ही नहीं ।तो फिर
खर्चा रुतबा तो कायम रखना ही पङेगा ।
तब जब एक ही गुट और समूह का कुनबा रह जाता है तब भी आतंकवादी हत्यायें करता है ।
और तब क्यों?? तब हत्याओं का कारोबार होता है """स्कूल न जाओ मदरसे पढ़ो,
'तब विज्ञान मत पढ़ो, गाना मत गाओ, नाचो मत, तब सिर पर परदा टोपी बुरका
नकाब क्यों नहीं रखा,, क्यों नहीं दाङी रखी,, टेलीविजन सिनेमा रेडियों
क्यों रखा???
जब 'जिस देश में शरीयत का कठोर सख्त और बर्बर कानून लागू हो जाता है तब
भी आतंकवादी वहाँ पर हत्यायें करता है " । तब? क्यो?
क्योंकि तब उसको 'दूसरे मुसलमान मुल्क पर कब्जा करना है अपने इसलाम के
भीतर भी दूसरे गुट कौम और फिरके के लिये '।
अरब इजरायल फिलिस्तीन सीरिया अफगानिस्तान पाकिस्तान और सारे मुसलिम देश
"आज से नहीं इस पूरी सदी से ही आतंकवाद के शिकार हैं ।
बल्कि आप तुलना करेगे तो पायेगे कि वहाँ फिर "एक आतंकवादी गुट दूसरे
आतंकवादी गुट से अपना दबदबा सत्ता भय और गुंडई कायम करने के लिये लङ रहा
है ।
एक संगठन दूसरे के लङकों को मार डालता है ।
और ये सब फिर संसाधनों पर कबजा जमीन पर देश पर हुकूमत पर कबजा करने के
लिये ही होता है ।
बगदादी की सेना से लङने वाले सैनिक भी मुसलमान है और बेरहमी से मारे जा
रहे हैं और उसकी तरफ से लङने वाले भी मुसलमान है ।

ये सब जब तक होता ही रहेगा जब तक कि खुद आम और खास हर "ग़ैर आतंकवादी
मुसलमान खुद ही यह नहीं तौल लेता कि उसको किसी भी "गैर मजहब वाले
बुतपरस्त आतशपरस्त या कितबिया 'काफिर क्रिस्तान किसी से भी कोई खतरा
नहीं है ।
क्योंकि दुनियाँ के सारे मजहब अमन दोस्ती और "शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की
भाषा और जरूरत बरसों पहले ही समझ चुके हैं ।
अब तो जितना भी खतरा है वह है हर आम और खास गैर आतंकवादी मुसलमान को
''आतंकवादी बनकर इसलाम के नाम पर उनकी ही गाढ़ी कमाई के धन से 'बम बारूद
असलहा खरीद कर पहले इसलाम का प्रचारक बनने के नाम पर धोखा ठगई करके । बाद
में इसलाम का रक्षक बनकर गैर मुसलमान की हत्या करके 'इसलाम के प्रति नफरत
और मुसलमान के प्रति सारी दुनियाँ में अविश्वास पैदा करके, बाद में शरीयत
लागू करने के नाम पर मुसलिम बच्चों औरतों लङकियों जवानों को बेदर्दी से
खत्म करके 'पेशावर 'सीरिया 'ईराक 'उदाहरण है । और फिर शिया सुन्नी कुर्द
बहाबी इजरायली अरबी फारसी के नाम पर कत्ल करके ।
चाहे सारी दुनियाँ में घूम ले मुसलमान किंतु जब रहेगा इसलामिक देश में तो
दम घुटता रहेगा खुद उसका ही । भारतीय को भारत की कदर बाहर जाने के बाद
समझ आती है ।तब तक देर हो चुकी होती है ।असलहा बम बारूद पेट्रोल और नशे
का लंबा काला कारोबार करते आतंकवादी ''केवल धोखा ही दे रहे हैं मुसलिमों
को । न तो उनकी हत्याबाजी से इसलाम के प्रति लोगो के दिल में प्यार बढ़
रहा है न ही मुसलमान पर भरोसा बढ़ रहा है ।
जगह जगह लङकों को गुमराह करके हत्यारा बनाकर "फिदायीन बनाकर खुद ही मर
जाने और मार डालने के लिये "मजहब का फर्ज के नाम से तैयार करने वाले ये
हजारों आतंकवादी संगठन 'दूर दूर तक फैले हैं परंतु न एक नीति है न नीयत ।
आज बार बार आई एस का साथी होने का दावा करना ऐसे आतंकवादी गुटों की चाल
है ताकि 'सीरिया की भयानकता "के कारण डरे हुये लोग उनको "आई एस का अंग
मानकर डर जायें । पहले ये सब खुद को 'अल कायदा 'का साथी बताते थे ।
हालत उस उन गुंडों जैसी है जिनको न डॉन जानता बै न उन्होने ही डॉन देखा
है, परंतु बस कंडक्टर को टिकिट माँगने पर धमकाते हैं "जानते नहीं मैं डॉन
का आदमी हूँ ।
भारत हो या कोई भी देश यह सबको समझना समझाना पङेगा कि "मुसलमान को अलग
थलग करके उनको डरा कर दूसरे मजहबों से ',और असुरक्षा का भय पैदा करके
भेङों की तरह झुंड बनो का हाँका लगाकर फिर खुद को ''मुसलमानों का रखवाला
''बताकर ये आतंकवादी भेङियों की तरह ही मुसलमानों को खाते रहना चाहते है

यह समझना होगा कि 'चाहे कुछ भी करलें ये आतंकवादी न तो धऱती पर कभी किसी
एक मजहब की सत्ता हो पायी है न कभी हो सकेगी ।
अलबत्ता अगर आम और खास शांतिप्रिय मुसलमानों ने खुद को "आतंकवाद से अलग
घोषित और साबित नहीं किया तो ''सारा विश्व नाजीवाद की तरह उन पर शक करता
रहेगा ।
और यह शक उनको खुद ही दूर करने की आज जिम्मेदारी है ।
आतंकवाद की कमर तोङनी है तो उनको दुतकारना पङेगा कि वे मुसलमानों के बॉस नहीं है ।
यह बात समझने और समझाने की है कि "दीन दीन दीन "और दीनी तालीम की दिन रात
वकालत करने वाले मौलवियों और उलेमाओं में से भी अनेक आतंकवादियों के
सरगना पाये गये ।

मजहब के नाम पर लोगों को 'अल्लाह 'खुदा 'रब 'का रास्ता दिखाने वाले लोग
भी अगर खून खराबा और हत्याओं का कारोबार करते पाये जाते हैं तो, आम
मुसलमान को चेतना होगा जागना होगा । एक समय चर्च के नाम पर ईसाईयों ने
खूब बेवकूफ बनाया जनता को ।एक समय ईश्वर के नाम पर खूब बेवकूफ बनाया
हिंदू साधुओं ने लोगो को ।लेकिन जनता ने उनको उनकी असलिसत जानने के बाद
चर्च तक सीमित कर दिया ।मंदिर तक सीमित कर दिया ।बौद्ध भी मठों कक सीमित
हैं ।
उनके उपदेश वे सबको सुनाते हैं परंतु हर विवेकशील प्राणी उसको अपने जीवन
की शर्तों समस्याओं परिवार की जरूरतों के मुताबिक ग्रहण करता है ।
|__________________________
|
सोचना मुसलिमों को है कि उनको | कहाँ खङा होना है ',खून हत्या अपराध की
पहचान के साथ गरीबी भुखमरी में ।या मानवता की पहचान के साथ साफ सुथरी
आतंकमुक्त सहअस्तित्व की संकल्पना वाली धरती पर
|___________________________
किसी पादरी, लामा, साधु के कहने से कोई भी घर छोङकर हत्यायें करने नहीं
निकल पङता अब । समय बदल चुका है, सेटेलाईट युग है प्रजातंत्र का जमाना है
लोग दूसरे ग्रहों पर जा जा कर जीवन तलाश रहे हैं और धरती एक गाँव जैसी हो
चुकी है हर घर पर नजर है हर आदमी की पहचान तत्काल उपलबध है हर जगह की
फोटो उपग्रह से ली जा रही है ।सब लोग हर समय पूरी दुनियाँ के संपर्क में
हैं । अपराध और अपराधी किसी भी कारण अपने कुकृत्य को जायज नहीं ठहरा सकते
। चाहे बहाना मजहब के प्रचार का लें या कौम की रक्षा का या बदला लेने का
या फिर यह कि उनपर जुल्म हुआ ।अदालतें है इंसाफ की पुकार के लिये सरकारें
है संयुक्त राष्ट्र संघ है और प्रजातंत्र है विश्व न्यायालय है । दुनियाँ
सुंदर स्वस्थ हरी भरी और साफ सुथरी है तभी हर मुसलमान सुखी ।
©®™सुधा राजे


Monday, 4 July 2016

सुधा राजे का लघु लेख :- समरसता की खातिर!!!

खामखा खान कहता है
कि "गौ मांस खाना हम क्यों बंद करें, """"""
अगर बंद करना है तो पहले सारे फाईव स्टार होटलों में बंद कराओ बीफ ',
और ठीक प्रधानमंत्री निवास के सामने ही होटल में पहले जिंदा गौ लाकर
काटकर पकायी जाती है ''


इस बयान को क्या माना जाये "?


कोई भी ""संरसता चाहने वाला नेता होता तो कहता ""
"

क्या भाईयो पच्चीसों तरह के जानवर खाते हो ',चलो एक गाय और बैल को छोङ ही तो दो ""
"
समाज की शांति समरसता के नाम पर एक चीज खाने से छोङकर कोई भूखे तो ""मर
""नहीं जाओगे?
?
ये ऐलान कर तो डालो कि अमुक नगर के मुसलमानों ने हिंदू जैन सिख सब
पङौसियों बंधुओं की भावनाओं की कद्र करते हुये ""आज से गौ हत्या ""गौमांस
खाना त्यागने का एलान किया ।
!!!!!!!
!!!!!!!
ये एक अनोखा और अनुकरणीय उदाहरण होता ।
क्योंकि
इतनी हैसियत तो पचास से सत्तर फीसदी मुसलमानों की है नहीं कि रोज रोज
माँस खाते रहे तीनो समय, '

और फिर हर बार गाय गाय गाय ',का ही माँस उपलब्ध हो पाना भी लगभग नामुमकिन है ।

पुलिस जेल हवालात कानून का अलग झमेला है ।


और फिर पङौसी से बैर और खानपान में एका न होने की वजह अगर सबसे बङी है तो
""गौ मांस "खाने का शक ही न!!!!!

सही पूछो तो कई कई मुसलिम परिवारों को तो महीनों हो हो जाते मांस उपलब्ध
हुये पशु तक का ।

अधिकतर मच्छी और मुर्गा तक ही सिमटे हुये हैं ।
गोश्त में भी बहुतायत बकरा और भैंस के पाये ही मिल जायें तो बङी नेमत है ।



गौ वध की वकालत करके "आजमखान "
जैसे मौकापरस्त लोग भावनायें भङकाकर लोगों में फूट भले ही डाल दें ।
परंतु जब पङौसी घायल हो बीमार हो रोग दुख तकलीफ हो तो ',आगे न आकर मदद न
करने की वजह जो जो बनती वह है खानपान में हिचक '।

क्योंकि कितना ही मॉडर्न हिंदू हो जाये ।

गैया और मैया से दूर नहीं रह सकता ।
तो कानून क्या हमें नाक पकङकर हर जगह रोकता बचाता है???
??
दंगे करवा तो नेता देते हैं
लेकिन
उन्हीं दंगाईयों में कोई
।अली अहमद
कोई
रामदास, '
कोई 'जसविन्दर '
निकल कर आता है और
जले घरों से दूसरे मजहब के लोगों को निकाल कर अपने अपने ही मजहब धर्म पंथ
के लोगों से लङकर उनको
आटा कपङा छत देकर जान माल आबरू हर तरह से खुद जोखिम लेकर भी बचाता है ।
तो ये ''आजम खान कैसे जान पायेगा महलों में रहकर कि कच्चे घरों की छतें
आबचक के सहारे एक दूसरे से जुङी हैं और जब मुसलिम के घर गैया कटती है यदा
कदा गौमांस पकता है तो ''हरप्यारी दाई का जी नहीं करता 'फातिमा की जचगी
कराने का और ये समरसता जरूरी है कि हर गाँव में लोग एक दावत एक चौपाल पर
एक बाजार एक हाट एक मेले में मिलते जुलते रहे ।
भलाई गाँव की देश की और किसान मजदूर की ।
गौ वध रुकेगा तो दूध सस्ता होगा और ',तब कुपोषण के शिकार नहीं होंगे बच्चे ।
इस दर्द को वे लोग नहीं समझ सकते जो
सहरी में नाक से पेंदी तक ठुँसी आँत रखकर "इफ्तार में मेवा माला पकौङी
समोसे बिरयानी पुलाव जलेबी कबाब भकोसते है '"
प्रधानजी विधायक जी दरोगा जी और एसपी साब के आवास पर ।
ये भूख तो वह गरीब ""नसीमन ही जानती है जो बासी रोटी चाय पर सहरी करके ',
,
सारा दिन सिलाई करती है और शाम को मट्ठे पकौङी की जिद पर लगे बच्चों को
डाँटकर रूखी रोटी से रोजा खोलती है '
रात को दुधमुँहा नवजात बच्चा छाती से दूध नहीं पाकर बिलखता है ।
तब 'मिलावटी पनीला दूध डेयरी से बीस रूपये का एक बोलत मँगवाकर चुप कराती है ।
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लघु लेख ""रमजान मुबारक"" ---- "" ईद के बहाने""

सबको रमज़ान और आने वाला ईद का दिन मुबारक 'कहने से पहले यह कहना भी
आवश्यक है कि 'आज का युग विज्ञान का युग है ।अब हम सब एक मजहब एक नगर
गाँव की सीमा में बँधे नहीं रह सकते ।सेटेलाईट्स न हों तो आज न अखबार
छपेगे न मोबाईल टीवी रेडियो मौसम वायरलैस इंटरनेट चलेगे और धरती की सारी
जरूरतों के लिये इन सबका होना जरूरी है । अगर सब लोग जब जब शुक्रवार की
नमाज और ईदगाह पर एकत्र होते हैं तब तब ''विश्व बंधुत्व ''के इस मूल
स्वरूप को समझें समझायें तो हम सब इंसान हैं और हमें सबको मिलकर यह धरती
सुंदर हरी भरी सुरक्षित और शांत बनानी है
जहाँ किसी को किसी से न डर लगे न नफरत हो । सब परस्पर भरोसा यकीन
विश्वास करें और एक दूसरे का सम्मान करें ।जिसके पास अधिक साधन धन जमीन
है वह बिना किसी भेदभाव के अनाथ अपाहिज बेसहारा लोगों को, इस तरह दें कि
आगे को कोई मोहताज न रहे । प्रदूषण की समस्या गंदगी की समस्या चोरी डकैती
बलात्कार छेङछाङ और नदी नहरों तालाबों की साफ सफाई की समस्या पर हम सबको
मिलकर एकजुट होकर साथ रहकर ताकत लगानी होगी "हम भारतीय हैं ''यही पहचान
है हमारी । विश्व के किसी भी देश में जब तक हमारे पास वीजा और पासपोर्ट
पर हमारे देश की मुहर न लगी हो हमारा परिचय दर्ज न हो देश का नागरिक होने
के रूप में तो ',हम कहीं भी न रह सकते हैं न कोई हक प्राप्त कर सकते हैं
। इसलिये विश्व में हमारा देश सम्मान पाये यह बहुत जरूरी फर्ज है कर्तव्य
है हमारा । भारत से कुपोषण, गरीबी, विकलांगता, टीबी, पोलियो, एड्स, कोढ़,
मधुमेह, मोटापा, हार्टअटैक, सूखा रोग, चमङी के रोग, बच्चों में अंधापन
आदि बीमारियाँ खत्म हो जायें । हमारे देश के सब लोग ग्रेजुएट हों । सब
लङकियाँ पढ़ी लिखी हों । सब औरतें स्वस्थ हो । हमारी आने वाली पीढ़ी को
पीने का साफ पानी मिले और, किसी भी लङकी को पढ़ने जाते समय बाजार जाते
समय और नौकरी रोजगार जॉब पर दफ्तर जाते समय, जरा भी डर न लगे ।यही माहौल
एक स्वस्थ गाँव स्वस्थ नगर की पहली कसौटी है । दहेज प्रथा' शराब' नशा
'लङकियों को घूरना छेङना गर्भ जाँच करके मार देना, पढ़ने से रोकना और
उनको डॉक्चर इंजीनियर वकील टीचर कलाकार बनने से रोकना सब आज के युग में
अपनी ही पीढ़ी के हाथ पाँव काटने जैसा काम है । जिनका भी किसी भी ईश्वर
में तनिक भी भरोसा है उनको यह भी समय पर समझना होगा कि ईश्वर खुदा गॉड
हमारी मदद करने स्वयं नहीं आता उसने हमें "दिमाग दिया है अक्ल दी है ।और
अपना पास पङौस साफ रखकर हम अपने आप का ही भला करते हैं । पङौस में साफ
सफाई होगी तो हमारे घर में बीमारी मख्खियाँ प्रदूषण वायरस और बैक्टीरिया
नहीं आयेगे ।जो पैसा इलाज और तीमारदारी में जाता है वह बच्चों की परवरिश
पर लगेगा ।
बच्चों को सिखाना समझाना जरूरी है कि आने वाली दुनियाँ में डर नफरत और
गंदगी नहीं वरन हरियाली अमन और परस्पर भरोसा ही जरूरी है । आज सबसे बङी
और भयानक समस्या है आतंकवाद '। जिसने इसलाम को बदनाम करके रख दिया है ।
इस देश से अधिक आजादी कहीं किसी मुल्क में मुसलमान को नहीं है । लोग बिना
भेदभाव के अब तक संगीतकार अभिनेता वैज्ञानिक राष्ट्रपति राज्यपाल शिक्षक
और दोस्त बनते हैं बिना किसी मजहब का नाम दिल में लिये याद करें कि हम
भारतीय है अगर भारत साफ शांत और विकसित है तो हमारी औलादें सुखी है
।बच्चे क्या पढ़ते हैं क्या खाते हैं कहाँ जाते हैं और क्या उनकी सोच है
यह जानना समझना बहुत जरूरी है । बहुत से दूसरे देशों से नौजवान पढ़े लिखे
लङकों को गुमराह करने के लिये जाल बिछाते हैं पैसा औरत नशा और मजहबी फर्ज
के नाम पर धोखा खाने वाले नौजवान बाद में या तो जेल जाते हैं या मार दिये
जाते है या खुद ही मर जाते है ।
उनके परिवार फिर कभी पङौस समाज और खुद अपनी ही बिरादरी कुनबे कुटुंब गाँव
नगर वालों का विश्वास नहीं हासिल र पाते हैं । एक दिन भी अगर बेटा बेटी
नजरों से ओझल है तो हम सब घबरा जाते हैं ',सब को सोचना होगा कि 'हमारे
सामने रहती हमारी औलाद हमारे नियंत्रण हमारे सिखाये हुये रास्ते से बहक
कैसे जाती है ।
दुनियाँ आज एक मुहल्ले की शक्ल ले चुकी है । और बुरी चीजें आसान होती है
अच्छाई सच्चाई ईमानदारी का रास्ता कठिन होता है ।नफरत से केवल तबाही आती
है और प्यार से सुकून, हम हमारा परिवार हमारा गाँव तब तक ही सुरक्षित है
जब तक हमारा देश सुंदर संपन्न सुरक्षित है और यह धरती सुंदर सुरक्षित है
। खूब पेङ लगायें कचरा सङक पर न फेंके, गुटखा शराब बीङी नशा न करें न
करने दें और पढ़ा लिखाकर बेटा बेटी दोनों को स्वावलंबी बनाये । नौकरी
जरूरी नहीं कि सबको मिले परंतु "हुनर "कभी बेकार नहीं जाता । वोट लेने के
लिये सभी दल भेदभाव की खाई खोदकर लोगों को दूसरे मजहब से डराते हैं ',अब
हम या तो भेङ बनकर हाँके जाते रहे और खड्डे में गिरने दें अपने मुस्तकबिल
को, 'या फिर जब जब मिलें सबसे पढ़ने लिखने जॉब करने पेङ लगाने साफ रहने
देश के प्रति फर्ज निभाने और दूसरे झर्म के लोगों से भी मिलजुलकर दोस्ती
भरोसा अपनापन पङौसवाद और देशवासी होने इंसान होने का नाता निभाने की
प्रेरणा दें!!!!!
सबका त्यौहार है ईद दीवाली राखी गणतंत्र 'चलों मिलकर कहें हम सब
भारतवासी इंसान 'रमजान मुबारक चाँद मुबारक ईद मुबारक मेरे भाई बहिनों, '
सादर
_/\_
©सुधा राजे
शेरकोट
बिजनौर
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार, अधिवक्ता, सोशल एक्टिविस्ट (नशा और घरेलू हिंसा
के खिलाफ) तथा ब्लॉगर है ।
email --
sudha.raje7@gmail.com
follow on twitter @SudhaRaje



Sunday, 3 July 2016

सुधा राजे के दो गीत।

सुधा राजे के गीत
::::::::::::::::::::::::
"""मैया मोरी पठौनी धर दै """"""
::::::::


रोरी हरदी धर टीका भर माटी अँचरा छाँव
की।।

अम्माँ मोरी पठौनी धर जौ माटी मोरे
गाँव की।।
बाबुल मोरी पठौनी धर जौ । माटी मोरे गाँव की ।।
****
थोङौ नीर नदी कौ । थोङी धोवन तोरे
पाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर जौ माटी मेरे गाँव
की।।
*1-****
पईयाँ पईंयाँ जब लरकैयाँ चली पकङ
बाबुल की बईंयाँ
उतर घुटरूअन चाटी माटी मार सपाटे लै
गई कईंयाँ
।।
तनक सियानी भएँ बाबुल नेँ
परदेशी खौँ सौंपी बईयाँ।।।।
माटी बालेपन की गुईंयाँ---'यादें छूटे ठाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मोरे
गाँव की।।
2***********
बेर मकोर करौंदे टेंटी कैंथा इमली झरबेरी।।
डाँग जलेबी ,होरे भुन्टा महुक कसेरू और
कैरी।।
तरस तरस गई मामुलिया खौँ । भई ससुरार महा बैरी ।।।।
ज्वार की रोटी दूध महेरी '' काँय"विरन
के नाँव की"।।

अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की।।
*3-*****
माटी के शंकर गनगौरें हाथी घोङे
माटी के।।।
गप्पी गल गुच्ची घरघूले चौक चितेउर
माटी के।।
माटी खेलत बङ गये सपनिन काया जोङे माटी के ।।मट्टी के वे चूल्हे बाशन•
बौ हाँडी गुङियाओं की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की।।
°°°°4-^°°°°°°°°°°°
मिचकी पींग हिलौंरे होरी। कीच रंग
भँग हुङदँग की।।
टेऔँनी घुटने छिले
मली बौ माटी बूटी अँग अँग की।।
कनकौए कंचे बौ अक्ती संकरात सुध सतरँग
की ।।
केश
धो रही भब्भी खा गयी••
सौंधी महक कथाओं की।।
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की
★5★
माटी मोरे देश की माटी ।।
हा •••••बिछुङे
परिवेश की माटी....
पूरे संस्कार संस्कृति की गुरूअन के उपदेश
की माटी।।।
सत्ती माई के चौरे की।
भसम शहीद चिताओं
की।।
अम्मा मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की
©®¶©®¶
सुधा राजे
(जन्मभूमि दतिया) करमभूमि बिजनौर


★★★★गीत ""2★★बापू रै गये निपट अकेले ★★★

अम्माँ मर गयीँ जब सेँ बापू रै गये निपट
अकेले ।
डिङक हिलक केँ कै रये बिन्नू!!!!
को जौ जीबौ झेलै
तज गईँ को जौ जीबौ झेले
1-जौ लौँ अम्माँ जियत
रहीँ /बाबूजी की चलती रयी ।
डाँट पङी अम्मईँ पै चाँये कोऊ
करी गलती रयी ।
अब कै रये पछता कैँ हमखौँ काय न भेजौ पैलै
बिन्नू को जौ जीबौ झेले ।
2-अम्माँ डाँठेँ
रयीँ थुमियाँ सीँ ठाट बङेरे घर के ।
इत्ती तनक कमाई में जोरी मुलक
गिरस्थी मरकें
बाबूजी तब दारू पीकैं खूबई रुतबा ठेलेँ
बिन्नू को जौ जीबन झेले ।
3-
लरका बऊ ने
कब्जा लओ अब
मड़ा ""पौर में बैठेँ ।
अम्माँ खौँ गरिय़ाऊते
बैई "अब बऊ की सुन सुन ऐंठे ।
नातिन कै रयी टोकत
कित्तो डुकरा "कितै पहेलेँ । बिन्नू
को जौ जीबन झेले
4-
सुधा आयीँ बिटियाँ सो हिलके जे ई लगत
तीँ खोटीँ ।
बेई सुना गयीं भज्जा खोँ कये दै रओ
सूकी रोटी ।
बिटियन के डर सेँ भब्भी
जौ पथरा मुडीँ ढकेलेँ ।
बिन्नू
को जौ जीबन झेलेँ
5-अम्माँ हतीँ दबाउत गोङे मूँङ पै चिकनई
धरतीं
नग नग दुख रये गोली खा रये । नत बऊ
ढूँक पबरतीँ।
सबखौँ भाबई लगे पैन्शन मिल रय़ी जाये
सकेलेँ
बिन्नू को जौ जीबौ झेले
6
अम्माँ हतीँ मिलत तीँ चुपरी । बई पै
टाठी फेँकी ।
कौनऊ परी विपत् अम्मईँ ने झखरा बन बन
छेँकी
जई सेँ ""सुधा"" जोर कर कै रयीँ ।
घरवारी सँग रै ले
बिन्नू को जो जीबौ झेले????
©®सुधा राजे
+ जनमभूम दतिया
+ करमभूम बिजनौर

''एड जर्न, 'सुधा राजे "


सुधा राजे के दो गीत।

सुधा राजे के गीत
::::::::::::::::::::::::
"""मैया मोरी पठौनी धर दै """"""
::::::::


रोरी हरदी धर टीका भर माटी अँचरा छाँव
की।।

अम्माँ मोरी पठौनी धर जौ माटी मोरे
गाँव की।।
बाबुल मोरी पठौनी धर जौ । माटी मोरे गाँव की ।।
****
थोङौ नीर नदी कौ । थोङी धोवन तोरे
पाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर जौ माटी मेरे गाँव
की।।
*1-****
पईयाँ पईंयाँ जब लरकैयाँ चली पकङ
बाबुल की बईंयाँ
उतर घुटरूअन चाटी माटी मार सपाटे लै
गई कईंयाँ
।।
तनक सियानी भएँ बाबुल नेँ
परदेशी खौँ सौंपी बईयाँ।।।।
माटी बालेपन की गुईंयाँ---'यादें छूटे ठाँव की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मोरे
गाँव की।।
2***********
बेर मकोर करौंदे टेंटी कैंथा इमली झरबेरी।।
डाँग जलेबी ,होरे भुन्टा महुक कसेरू और
कैरी।।
तरस तरस गई मामुलिया खौँ । भई ससुरार महा बैरी ।।।।
ज्वार की रोटी दूध महेरी '' काँय"विरन
के नाँव की"।।

अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की।।
*3-*****
माटी के शंकर गनगौरें हाथी घोङे
माटी के।।।
गप्पी गल गुच्ची घरघूले चौक चितेउर
माटी के।।
माटी खेलत बङ गये सपनिन काया जोङे माटी के ।।मट्टी के वे चूल्हे बाशन•
बौ हाँडी गुङियाओं की।।
अम्माँ मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की।।
°°°°4-^°°°°°°°°°°°
मिचकी पींग हिलौंरे होरी। कीच रंग
भँग हुङदँग की।।
टेऔँनी घुटने छिले
मली बौ माटी बूटी अँग अँग की।।
कनकौए कंचे बौ अक्ती संकरात सुध सतरँग
की ।।
केश
धो रही भब्भी खा गयी••
सौंधी महक कथाओं की।।
अम्माँ मेरी पठौनी धर दे माटी मेरे गाँव
की
★5★
माटी मोरे देश की माटी ।।
हा •••••बिछुङे
परिवेश की माटी....
पूरे संस्कार संस्कृति की गुरूअन के उपदेश
की माटी।।।
सत्ती माई के चौरे की।
भसम शहीद चिताओं
की।।
अम्मा मोरी पठौनी धर दे माटी मेरे
गाँव की
©®¶©®¶
सुधा राजे
(जन्मभूमि दतिया) करमभूमि बिजनौर


★★★★गीत ""2★★बापू रै गये निपट अकेले ★★★

अम्माँ मर गयीँ जब सेँ बापू रै गये निपट
अकेले ।
डिङक हिलक केँ कै रये बिन्नू!!!!
को जौ जीबौ झेलै
तज गईँ को जौ जीबौ झेले
1-जौ लौँ अम्माँ जियत
रहीँ /बाबूजी की चलती रयी ।
डाँट पङी अम्मईँ पै चाँये कोऊ
करी गलती रयी ।
अब कै रये पछता कैँ हमखौँ काय न भेजौ पैलै
बिन्नू को जौ जीबौ झेले ।
2-अम्माँ डाँठेँ
रयीँ थुमियाँ सीँ ठाट बङेरे घर के ।
इत्ती तनक कमाई में जोरी मुलक
गिरस्थी मरकें
बाबूजी तब दारू पीकैं खूबई रुतबा ठेलेँ
बिन्नू को जौ जीबन झेले ।
3-
लरका बऊ ने
कब्जा लओ अब
मड़ा ""पौर में बैठेँ ।
अम्माँ खौँ गरिय़ाऊते
बैई "अब बऊ की सुन सुन ऐंठे ।
नातिन कै रयी टोकत
कित्तो डुकरा "कितै पहेलेँ । बिन्नू
को जौ जीबन झेले
4-
सुधा आयीँ बिटियाँ सो हिलके जे ई लगत
तीँ खोटीँ ।
बेई सुना गयीं भज्जा खोँ कये दै रओ
सूकी रोटी ।
बिटियन के डर सेँ भब्भी
जौ पथरा मुडीँ ढकेलेँ ।
बिन्नू
को जौ जीबन झेलेँ
5-अम्माँ हतीँ दबाउत गोङे मूँङ पै चिकनई
धरतीं
नग नग दुख रये गोली खा रये । नत बऊ
ढूँक पबरतीँ।
सबखौँ भाबई लगे पैन्शन मिल रय़ी जाये
सकेलेँ
बिन्नू को जौ जीबौ झेले
6
अम्माँ हतीँ मिलत तीँ चुपरी । बई पै
टाठी फेँकी ।
कौनऊ परी विपत् अम्मईँ ने झखरा बन बन
छेँकी
जई सेँ ""सुधा"" जोर कर कै रयीँ ।
घरवारी सँग रै ले
बिन्नू को जो जीबौ झेले????
©®सुधा राजे
+ जनमभूम दतिया
+ करमभूम बिजनौर
""पता
''एड जर्न, 'सुधा राजे "

Saturday, 2 July 2016

सुधा राजे की टिप्पणी :- मेलबॉक्स -- वाचिक हिंसा क्यों???

अब भाईयो और बहिनों भतीजियो और भतीजो भांजो और भांजियों मित्रो और मित्राणियों ।
हम तो अब 'पक्का 'सलमान खान की कोई भी फिल्म कोई भी शो तब तक नहीं देखेगे
जब तक कि वह ""महिला आयोग "से लिखित रूप से और देश की हर स्त्री से
",सार्वजनिक रूप से """माफी """नहीं माँग लेता ।
ये इसलिये कि, जिस आदमी के लाखों फैन उसकी बङबोलियों की नकल भी लाखों करते हैं ।

ताकि लोगों को यह अहसास हो कि चाहे तो "अरबपति ''अदाकार हो या मंत्री
नेता पुलिस वकील पत्रकार "
स्त्री के प्रति लैंगिक वाचिक शाब्दिक वैचारिक और लिंगभेदी उपहास आदि से
हिंसा कोई भी नहीं कर सकता ।

अगर सलमान ने माफी नहीं माँगी तो ',लाखों लोगों का जो वाकई में स्त्री के
प्रति हिंसक है ""ग़ुरुर संतुष्ट होगा ""
और उन सबको प्रेरणा मिलेगी कि "बको लैंगिक हिंसात्मक बको ""

""""""
गुटखा कैंसर कम करता होगा ',,
परंतु "शाब्दिक हिंसक बयान जब सेलीब्रिटीज की तरफ से आते हैं तब ""अनेक
शैतानों को मौका मिल जाता है खुद को ''जस्टीफाई करने का ।
"""""
पचास की आयु प्रौढ़ की होती है

विवाह किया होता समय पर तो एक दो "युवा बेटी के बाप होते सलमान खान "
""""""
अदाकारी से पैसा कमाना और बात है ।
दिल में इंसानियत का ज़ज्बा होना और बात है ।

चाहे "सलमान का इंटेंशन नहीं था कुछ भी ""
परंतु मुहावरा क्यों बनाया ""बलात्कार पीङित जैसा दर्द चलने में!!!!!!!
मतलब अचेतन में एक तरह की बातें ठुँसी पङी है!!!!
यही तो निकालनी है उखाङ फेंकनी है ।
क्योंकि वहाँ उपहास ठट्ठा किया गया "उस दर्द का "

शर्म अगर नहीं न सही '
किंतु ये माफी माँगने में जाता क्या है??????
गुरुर टूटता है??
कि मैं स्टार हूँ मेरा क्या कर लोगे??

हम जैसे दस पचास लोग ""ही सही "

तब तक सलमान की कोई फिल्म कोई गीत कोई शो न देखेगे
न अपने किसी परिचित को देखने देगे ।

या तो सीधे सीधे "माफी माँगो कि हाँ जुबान फिसली गलती हुयी ऐसा नहीं कहना
चाहिये था कहीं भी किसी को भी विशेषकर पब्लिक फिगर को तो कतई नहीं """""

"""
या फिर मिस्टर सलमान तुम वाकई इस लायक हो कि तुम्हारा बहिष्कार किया जाये ",,


चाहे जितने हिट हो रहो ',
परंतु देश की "लाखों बेटियाँ इस बयान से "नाराज है "और पीङितायें तो हर्ट
हैं बुरी तरह ।
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लेख "स्त्री"-- :मानवता और एक देश एक संविधान एक कानून

Sudha Raje
एक देश एक नागरिकता एक संविधान एक ध्वज एक ही पहचान 'भारत 'भारतीय और भारतवंशी '
आज तक नेहरूजिन्नाअंबेडकर की गलतियों की सजा देश का हर नागरिक भुगत रहा है ।
राष्ट्रवाद मखौल होकर रह गया । लोग दुशमन देश के नारे लगाते है और हमारे
देश की खाते और सर्वश्रेष्ठ सुविधायें पाते है ।
ये क्या किताब किताब किताब लगा रखा है!!!!!!!!
किताब कोई भी हो ''मानव समाज परिवर्तनशील है और उसीके हिसाब से हर युग
में नये नियम गढ़े जाते हैं समय समय पर ।
क्या """"सती प्रथा, बालविवाह, विधवाविवाहनिषेध, बाँझ स्त्री होने या
पुत्र न पैदा करने पर बारबार विवाह """"""सनातन धर्मी नहीं करते थे,,,,
आखिर उन्होने स्वयं को बदला ।
वेद पुराण और मनुस्मृतियों के सारे नियम तोङ दिये गये ।

तो कौन सी किताब की रट लगाना है अब ।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है मतलब सब धर्मों के लोग अपना धर्म घर तक
सीमित रखें "संविधान और कानून को समय समय पर मानवहित और राष्ट्रहित में
विचार बुद्धि और मानवता के अनुकूल ही संशोधित किया जायेगा ।
रेतीले ढूहों में टैंट में रहने वाले ऊँट भेङ बकरा खाने वाले लबादा पहनने
वाले और ऊँट गाङियों से रेत के गुबारों में कारवां बनाकर चलते रहने
वाले,मसर का पानी पीने वाले ' 'खानाबदोश लोग
':जब चावल बासमती, गेहूँ मालवा का, चीनी धामपुर की, गुङ मेरठ का,मावा
मथुरा का पेठा आम मुंबई बिजनौर गोरखुर का आगरा का खाने लगे!!!!!!!!! जींस
टीशर्ट कोट पैन्ट पहनने लगे!!!!!!!
जूते टाई कैप सिगरेट व्हिस्की रम बोदका स्कॉच बीयर पीने लगे!!!!!!!
क्लीनशेव्ड रहने लगे!!!!!
टीवी मोबाईल इंटरनेट चलाने लगे!!!!!
यहूदियों ईसाईयों आतशपरस्तों बुतपरस्तों की होङ में "ऊँची इमारते बनाने
लगे!!!!! रोज रोज नहाने लगे!! गाना गाने नाचने फोटो खिंचाने फिल्म देखने
अभिनय करने लगे!!!
तो, '
किताब ने नहीं रोका!!!!!!!
अब जब बारी आयी """नक़ाब में चलती फिरती ""काल कोठरी में बंद कर दी गयी
औरत जात पर सदियों से हो रहे ज़ुल्म को रोककर उनको भी ""मानवीय स्तर से
जीवन जीने सम्मान देने और हक देने की तो हो हो हो हो करके उनकी आवाज दबा
दी जा रही है बार बार हार????? पर्सनल लॉ के नाम पर """""
क्या किसी मानव पर जुल्म का हक है????????
,???
अगर हिंदू कहने लगें कि ""हमारा पर्सनल लॉ है सब "शूद्रों को गाँव से
बाहर भगाओ, मंदिरों से बाहर भगाओ, सब विधवाओं को पति की लाश के साथ जला
दो ',सब पुरुषों को बहिन बेटी को संपत्ति में हक नहां देने का 'रजस्वला
होने से पहले कन्यादान करने का '''गौ वध करने वाले को मार गिराने का और
''''निपुत्र व्यक्ति की विधवा या सुहागिन को ""नियोग के लिये विवश करके
"पुत्र पैदा कराने का!!!!!!!!
तलाक नहीं देकर चरित्रहीन होने या शक होने पर स्त्री को दासी बनाकर घर के
बाहर कैद करके काम कराते हुये पत्नी पुत्री दोनों हक से छोङ देने का
!!!!!!
स्त्री का बलात्कार या अनुलोम संसर्ग पर खौलते तेल के कङाह में भून तल कर
कौओं को अपराधी खिलाने का????
तो ये परसनल लॉ के नाम पर चलेगा??????
????
क्यों सारी ""धर्मनिरपेक्षत
ा 'सनातन धर्म के ऊपर थोप दी जाये??????
??????
****
अगर स्त्री हर भारतीय स्त्री को ये हक मिले कि
1-उसे पिता के घर में 'वारिस 'माना जाये
2-उसे विवाह स्वेच्छा से करने वर चुनने और परिजनों के चुने हुये वर को
स्वीकारने या नकारने का हक हो ।
3-वह चाहे तो आजीवन अविवाहित भी रह सके और चाहे तो "प्रेम विवाह भी अपने
पसंद के लङके से बिना जाति मजहब और क्षेत्र के कर सके ।ऐसा करने पर
उत्पीङन से उसकी रक्षा भी हो क्योंकि प्रेम प्राकृत गुण हैं ।
4- विवाह के बाद पति और ससुर की संपत्ति में उसे वारिस का हक मिले ।चाहे
पति उसके साथ रहे या ''प्रेम समरसता सुमति सामंजस्य टूट भी जाये तो भी
""तलाक ""होने पर भी उसको ""घर ""जरूर मिले चाहे मायके में चाहे सासरे
में, वह जहाँ पर सुरक्षित रहना महसूस करे 'जब तक कि वह दूसरा विवाह नहीं
कर लेती उसको पति ससुर की संपत्ति में से गुजारा भत्ता बच्चों की परवरिश
यथावत और रहने को घर मिले ।
5-तलाक केवल कहने और चालीस दिन की "इद्दत ""यानि रजस्वला होने या गर्भ तो
नहीं कि बच्चा हमल किसका है यह तय करने भर से तलाक नहीं हो जाये ",,बल्कि
तलाक लेना है तो "अदालत जाया जाये बाकायादा लिखित में अरजी दी जाये कि
वजह क्या क्या है क्यों छोङना चाहता है शौहर अपनी बीबी को सारे कारण लिखे
''
जो संविधान और कानून के अंतर्गत विवाह विच्छेद की पर्याप्त जायज वजह बनते
हों तभी ""तलाक पर सुनवाई की जाये """
और चूँकि सब के सब वकील 'पर्सनल लॉ पढ़कर ही लॉयर बनते हैं सो कोई काबिल
वकील बहस करे तब स्त्री का भी पक्ष सुना तौला समझा जाये उसके भी परिजनों
को हाजिर कराकर मामले की सुनवाई हो और कम से कम तीन से छह माह का समय
पुनरनिरीक्षण में लगें तब ""अदालत ""में जज वकील मायके वाले और सासरे
वाले पाँच पाँच लोगों के सामने हो तलाक,,,, ""
6-तलाक के बाद बच्चों पर से स्त्री का हक नहीं छूटे उसने हर बच्चा नौ नौ
माह पेट में जो रखा दर्द सहा और दूध पिलाया 'मल मूत्र धोया, पकाकर खिलाया
दुख सहे उसको भी बुढ़ापे में आसरा चाहिये बेटी बेटों का ।तो बीबी का
बच्चों पर से हक नहीं हटेगा । सब लङकियाँ माता के साथ ही रहेगीं अगर बाप
के घर कोई केयर टेकर स्त्री दादी बुआ वगैरह नहीं तो । सब बच्चे सात साल
तक माता के दुलार प्यार में रहेगे । जब तक कि माँ असाध्य छूत रोगिणी
""हिंसक पागल ""या स्वयं ही रखना नहीं चाहती बच्चे । बच्चों का सारा खर्च
शौहर को यथावत उठाते रहना पङेगा जैसा कि तलाक के पहले उठाता रहा है ।
बच्चे सब के माता पिता दोनों की संपत्ति में समान वारिस होगे ।
8-एक स्त्री के जीवित और पत्नी अवस्था में रहते कोई भी "भारतीय "दूसरा
विवाह नहीं कर सकता ।
दूसरा विवाह अवैध घोषित होगा ।परंतु यदि अवैधता में संतान हो जाती है तो
वह "पिता की संपत्ति में वारिस होगी ।
!!
कोई भी तलाक "स्त्री के भरण पोषण के हक को खत्म तब तक नहीं करेगा जब तक
कि वह स्वयं न लेना चाहे या, दूसरा विवाह न करले ।
!!
!!
दहेज न माँगने का हक है न ताने देने का विवाह के पहले "पसंद नापसंद घोषित
करें परंतु विवाह के बाद "रूप रंग कद काठी पितृकुल या दहेज कम मिलने का
ताना ""हिंसा माना जायेगा "


स्त्री के साथ मारपीट का गालियाँ देने या घर से निकाल देने या "यौनरोगी
एड्स रोगी छूतकीबीमारियाँ होकर भी जबरन संसर्ग पर विवश करने या अनिच्छा
पर जबरन हिंसाकरके सहवास करने का मतलब ""बलात्कार का अपराध होगा ""

7-किसी भी तरह से स्त्री के रहन सहन पहनावे और खानपान में ससुर सास देवर
जेठ पति और परिजनों की तुलना में हेयता नहीं की जा सकेगी!!
न मायके वालों से बातचीत करने पर रोक हो सकेगी ।
बहु विवाह हर भारतीय के लिये "अपराध होगा "
यदि पति के रहते पत्नी 'छिपकर परपुरुष से वैवाहिक संबंध बनाती है तो
'दोनों ही अवैध संबंधकारी अपराधी होगें ।
!!!!
बुरका पहनना या न पहनना स्त्री की इच्छा है परदा करे घूँघट करे या न करे,
जब तक सामाजिक अश्लीलता नहीं समझी जाती वह प्रचलित वस्त्र पहन सकती है ।
चाहे करवा चौथ तीज वटसावित्री हों या रोजे 'या फास्ट 'जबरन किसी स्त्री
पर नहीं थोपे जायें वह अपनी इच्छा से उचित समझे तो करे ।
अगर पढ़ना चाहती है तो हर भारतीय स्त्री को ""शिक्षा का हक हो ""
वोट डालने का हक हो ""
अपनी रचनायें छपवाने का अभिव्यक्ति का हक हो ।
अपने लिये पेंशन पाने को बचत करने अपने नाम घर बनवाने जेवर और गृहस्थी
रखने का हक हो ।
अदालतों में जाकर न्याय पाने का हक हो ।
स्त्री यदि जॉब करके स्वावलंबी होना चाहती है तो उसको हक हो ।
अपने पैरों पर खङी होने का अपनी संतान को अपने साथ रखने का और अपना
"सरनेम न चाहे तो न बदलने का "
हिंसा उत्पीङन और शोषण कैद और जबदस्ती से इंसाफ पाकर मुक्त होने का हर
स्त्री को हक हो ।
"""एक वकील और एनजीओ संस्थापक के तौर पर सबसे अधिक विवश ""हम तब ही हुये
जब जब पीङिता मुसलिम थी और ""पर्सनल लॉ की वजह से मामला ""काजियों
हाजियों के बीच रखकर बहस करनी पङी """आज तक उनमें से किसी को इंसाफ नहीं
मिला किसी को बेबस बच्चे खोने पङे कोई भाई की देहली की भिखारन हो गयी तो
कोई मेहर दहेज बच्चे खोकर बहुपत्नी बनी रह गयी किसी को पढ़ने से किसी को
जॉब से हिंसक तरीकों से रोक दिया गया """"
©®सुधा राजे


Friday, 1 July 2016

सुधा राजे का शब्दचित्र :- ""होकर भी न होना।""

कभी पाना चाहा ही नहीं '
बस होना ही चाहते रह गये कभी किसी का आकाश कभी किसी की धरती कभी किसी की
छाँव कभी किसी के पाँव ',
आकाश था नहीं 'धरती मेरी नहीं 'पाँव जब नहीं रह गये 'छाँव के सारे वृक्ष
बाढ़ में अपेक्षाओं की बह गये '
शेष रह गयीं टूटी हुयी बैशाखियाँ और वहीं कहीं बिखर गयीं किताबें 'रंग
तूली कैनवास कागज बाँसुरी के टुकङे और एक चाँदी की पायल '
जब उठना मुमकिन ही न रहा तो क्या करते!!!!!!
रेंग कर ज़मीन के नीचे छिपकर हर बाज चील गिद्ध और लकङबग्घों से बचाते रहे
अपनी गंध ताकि 'जब कभी किसी तरह अगर काश कि संभव हो पाया और मेरा कोई हाथ
पाँव पंख या शब्द पुनर्जीवित हो सका तो मैं वहाँ उस पर्वत के पार बने
अपने कल्पित स्वपनिल घर तक जा सकूँगी जहाँ मेरा अस्तित्व मेरी पूरी पहचान
के साथ आज भी है मेरे इंतज़ार में '
अजनबी लोगों के बीच बस यूँ ही कभी कभी जब थक कर घबराजाती हूँ '
मिट्टी की देह को जमीन के नीचे दबाकर मैं चुपचाप सो जाती हूँ एक बीज की
तरह कल्पवृक्ष के '
ये सच है मैं किसी को यहाँ नही जानती हूँ इसलिये '
किसी भी बात पर कोई जिद नहीं ठानती हूँ '
तुम्हें आना है तो तब आना जब पहाङों के उसपार मेरे कल्पित स्वनिल घर का
खोज लूँ मैं पता ठिकाना ',
रेंगकर ही सही चुपचाप और एकाकी '
अभी लगता है कुछ साँसें और जरा सी हिम्मत है तो बाकी
©®सुधा राजे