Friday, 1 July 2016

सुधा राजे का शब्दचित्र :- ""होकर भी न होना।""

कभी पाना चाहा ही नहीं '
बस होना ही चाहते रह गये कभी किसी का आकाश कभी किसी की धरती कभी किसी की
छाँव कभी किसी के पाँव ',
आकाश था नहीं 'धरती मेरी नहीं 'पाँव जब नहीं रह गये 'छाँव के सारे वृक्ष
बाढ़ में अपेक्षाओं की बह गये '
शेष रह गयीं टूटी हुयी बैशाखियाँ और वहीं कहीं बिखर गयीं किताबें 'रंग
तूली कैनवास कागज बाँसुरी के टुकङे और एक चाँदी की पायल '
जब उठना मुमकिन ही न रहा तो क्या करते!!!!!!
रेंग कर ज़मीन के नीचे छिपकर हर बाज चील गिद्ध और लकङबग्घों से बचाते रहे
अपनी गंध ताकि 'जब कभी किसी तरह अगर काश कि संभव हो पाया और मेरा कोई हाथ
पाँव पंख या शब्द पुनर्जीवित हो सका तो मैं वहाँ उस पर्वत के पार बने
अपने कल्पित स्वपनिल घर तक जा सकूँगी जहाँ मेरा अस्तित्व मेरी पूरी पहचान
के साथ आज भी है मेरे इंतज़ार में '
अजनबी लोगों के बीच बस यूँ ही कभी कभी जब थक कर घबराजाती हूँ '
मिट्टी की देह को जमीन के नीचे दबाकर मैं चुपचाप सो जाती हूँ एक बीज की
तरह कल्पवृक्ष के '
ये सच है मैं किसी को यहाँ नही जानती हूँ इसलिये '
किसी भी बात पर कोई जिद नहीं ठानती हूँ '
तुम्हें आना है तो तब आना जब पहाङों के उसपार मेरे कल्पित स्वनिल घर का
खोज लूँ मैं पता ठिकाना ',
रेंगकर ही सही चुपचाप और एकाकी '
अभी लगता है कुछ साँसें और जरा सी हिम्मत है तो बाकी
©®सुधा राजे


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