Sunday, 31 August 2014

सुधा राजे का लेख :- "" प्रेम और पात्र""

माना कि, ' यूनिफॉर्म सिविलकोड और समान स्त्री अधिकार मौलिक अधिकार बिना
किसी धार्मिक जातीय पर्सनल लॉज के होने अति आवश्यक हैं "नेशनल इंटेग्रेशन
और स्वस्थ सभ्य संप्रभु लोकतंत्र के लिये,,,,,,,,,,,, माना कि अधिकतर
लङकियों को "प्रेमजाल में फँसते समय पता ही नहीं रहता कि पत्नी बनने के
और माता बनने के बाद उनके कानूनी सामाजिक और मौलिक अधिकार पर्सनल लॉ की
व्यवस्था के अधीन कितने सीमित संकुचित और बाध्यकारी होने वाले हैं और
विवाह की वैधता से अनिवार्य """धर्मान्तरण ""अकाट्य रूप से जुङा है न वे
जानती है न इतनी चेतना रहती है कि गंभीरता समझ सकें ",,

फिर भी
एक सवाल
बुरा लगे तो लगे
कि
जिन लङकियों के धर्मान्तरण पर इतना चीख पुकार और इतनी बेचैनी इस लवजेहाद
नामक बीमारी को रोकने की जाहिर की जा रही है ',

क्या
कभी
किसी
माई के लाल ने ""दहेज प्रथा रोकने "
स्त्री पर ससुराल में होने वाली घरेलू हिंसा रोकने में
लङकियों को बेख़ौफ सुरक्षित गली मुहल्ले बाज़ार बसें रेलगाङियाँ,कैंम्पस
उपलब्ध कराने में दिखाई????????????

क्यों
लङकी दूसरे मज़हब के लङकों पर मोहित हो जाती है?
शक्ल देखो जरा आईने में न हो तो गङही धुबईया के पानी में देख लो ',

पिचके गाल
नाटा कद
सींक सा शरीर
हाँफती काया
बदबू मारते कपङे
पीले मैले गुटखे से रँगे दाँत
बदन पर झलकतीं पसलियाँ
या फिर
लटकतीं बोटियाँ
जेब में पापा के दिये रुपये
पैरों में मम्मी की खरिदवाई सैंडिल
बात बात पर स्त्री सूचक गालियाँ
हर शाम कल्हारी या दारू का आबाद ठेका
नर्तकियों पर लुटाते सट्टे जुये के पैसे
बलहीन
बुद्धि हीन
आचरण विहीन
संस्कारविहीन
धनहीन
लालची
शराबी
गुटखाखोर
तंबाकूखोर
सिगरेट खोर
चरित्रहीन
छिछोरे
मैले
कमजोर
अश्लील विचारों से भरे
दहेज लोलुप
स्त्री पर ज़ुल्म करने वाले
लङकियों से नफरत करने वाले
बेटी संतान को मार डालने वाले
लङकियाँ छेङने सताने नोचने खसोटने को मँडराने वाले
पुत्र से कम खाना कम मँहगा कपङा कम हक और कम प्यार देने वाले
तुम
जो जो भी लोग हो
तुम्हारे घर लङकी बहू बनकर पछताये
पत्नी बनकर पछताये
बेटी बनकर पछताये
प्रेमिका बनकर पछताये
बहिन बनकर पछताये
तुम
देखो अपनी कद काठी काया शक्ल अक्ल हुनर और आजीविका कमाना शुरू करने का
समय आयु और कमाई का एमाउण्ट देखो
स्त्री की रक्षा करने की ताकत और जीवन भर उसका और उसके बच्चों का बिना
मायके वालों की मदद और दहेज के खरचा तवज्जो केयर सब नखरे उठाने की हैसियत
देखो!!!!!!!!!!!!
कोई
लङकी तुम पर कैसे फ़िदा हो सकती है??
तुम्हें केवल वही मजबूर लङकियाँ मिल सकतीं है जिनके माँ बाप को कोई बेहतर
विकल्प नहीं मिला और लङकियों में ""मना करने का साहस नहीं रहा "

वरना
हर लङकी चाहती है
उसका पति गोरा हो चाहे सांवला किंतु हमउम्र युवा ताकतवर और फिट चुस्त
दुरुस्त बलवान हो कि उसकी आबरू की रक्षा कर सके कहीं भी उसके साथ वह
महफूज महसूस करे और वह पुरुषत्व से परिपूर्ण केवल दैहिक अर्थों में ही
नहीं हो अपितु उसमें स्त्री को सुरक्षित कोमल सुंदर सुखी सजा सँवरा और
आराम से रखने की भावना और हैसियत भी हो!

भला कौन लङकी चाहेगी उसका पति शराबी हो?????
लाल पीले काले बदबूदार दाँतों वाला हो?????
बाप माँ भाई की कमाई के कपङे जूते मोबाईल खाना बाईक पर इतराता हो???
जिसकी औक़ात खुद का घर बनाना तो दूर रहा, 'अपने घोंसले का किराया भी देने
तक की नहीं हो???
जो
हर बात पर लङकी से कहे बाप का माल है???
और पलंग बिस्तर कुरसी सोफा पंखा कूलर एसी कार गैस हंडिया कङाही कलशा
भगौना तवा चीमटा मिक्सर जूसर वाशिंग मशीन इसतरी कपङे गहने टाई रूमाल
कच्छा बनियान कोट चावल गेहूँ तक लङकी के पिता से वसूल करके खुद को
"""मालिक और लङकी को दासी समझे????
पूरी जिंदगी दो नेकलेस खरीदने की औक़ात न हो परंतु लङकी के पिता से लाखों
रुपया शादी का पूरा खर्चा माँगे??
सोचो
कौन संवेदनशील लङकी हृदय से ऐसा लङका वर रूप में चाहेगी जो उसे कहीं
घुमाने ले जाये तो पूरे परिवार के कपङे गहने लङकी के पिता के दिये
हों????

अरे
चिङवा
भी घोंसला बनाता है
चिङिया को बल हुनर प्यार नाच बोल कर दिखाता है
चिङिया मोहित होती है तब जोङी बनाता है और बच्चों के उङने तक दाना पानी जुटाता है ।
तुम
अगर
अब भी नहीं समझे तो कभी नहीं समझोगे
जाओ गुटखा खाओ
दारू पिओ
धुआ उङाओ
खाँसकर अस्पतालों के चक्कर काटो और
मजबूर लङकियों को घर में बंद रखकर मारपीट कर गरियाकर खुद को
मर्द समझो
तुम्हें "प्रेम कैसे करे कोई भावुक लङकी?
कैसे कोई दिल ऐसे व्यक्ति पर फ़िदा हो?????
आईना न हो तो शाम को जूठी थाली में मुँह देखना "किसका दिया खाया,? औऱ
थाली ननिहाल की थी या बाप की कमाई की,? सोचना जरूर फिर माँ के चेहरे पर
मरी हुयी लङकी खोज सको तो खोजना, "
ये सबके लिये लिखा ताना नहीं है परंतु जिनके लिये है वे खूब समझते हैं कि ',
वे कहाँ खङे होते जब लङकियाँ स्कूल जाती और आती है
©®सुधा राजे


--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mobile- 9358874117

सुधा राजे की रेसिपी :- ""सुधा रसोई""

ये संतरे की फाँक की तरह
पतला पतला कटना चाहिये था
परवल पतले फांक काटे, '
हरी मिर्च लहसुन अदरक प्याज
बारीक कतर कर
सरसों मूँगफली या तिल के तेल में
छौंक दें सुनहरा होने दें फिर
आलू के कुछ कतरे हुये संतरे
नुमा टुकङे डालकर भूने फिर परवल
डालकर भूने और नमक मिर्च
हल्दी धनिया तथा बारीक मिक्स
गरम मसाला डालकर चलायें और गैस
बंद करके टाईट ढँक दे ।
पूरे दस मिनट बाद फिर गैस
जलायें और चलाना शुरू करें ।
जब तक हलके कत्थई रंग में
तब्दील हो न जाये ।
उतार कर
बारीक कतरी धनिया और
सूखी हुयी मैथी की पत्तियाँ गार्निश
करें ।
चावल दाल परवल और कपङछन
दही वाला सलाद
पूरी थाली है (सुधा राजे )
आप चाहें तो
परवल की बजाय पहले मसाला घोल
को भूनकर फिर परवल को थोङी देर
भुने मसाले में चलाते रहें और
दो कप पानी डालकर ।
कुछ रसेदार भी बना सकते है ।
इसमें आप ""तले हुये मखाने
या काजू और पंजीरी की तरह
भुना हुआ
मक्के का आटा ।या बेसन छिङक कर
स्वाद बढ़ा सकते ह

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Sudha Raje
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सुधा राजे का लेख - ""स्त्री और प्रेम विवाह""

"हमारा मकसद नफरत फैलाना नहीं वरन सच से सबको बावस्ता कराना है,
और सच जाने बिना बेकार की भावुक बातें किसी काम की नहीं ',
जैसे कोई मेहमान आता है और सब औपचारिकता वश कहते हैं कि इसे अपना ही
"घर समझें "
ये आपके ही बच्चे हैं
आप के लिये जान भी हाजिर है
आप हमारे गरीबखाने पर तशरीफ लाये, हम आपके दौलतखाने पर आयें जहेनसीब
जर्रानवाज़ी का शुक्रिया """"

किंतु
ऐसा है नहीं, '
न तो बिना रजिस्ट्री बैनामे के किसी का घर आपका हो सकता है, '
न बिना किसी गोदनामे या शरीर से जनम दिये किसी का बच्चा आपका बच्चा, '
ना ही बराबरी के लेन देन के किसी से आप कुछ ले सकते हैं ।


प्रेम
प्रेम
प्रेम
सब हर तरफ से बोल तो रहे हैं अफ़सोस ये है कि बङे बङे पुलिस ऑफिसर
पत्रकार राजनीतिक नेता और लेखक भी बोल रहे हैं ।

प्रेम
की सीमा नहीं जाति नहीं आयु नहीं मजहब नहीं भाषा नहीं,

वगैरह वगैरह वगैरह
किन्तु

ये सब मानने के बाद भी इस बात पर कोई बोलना समझना नहीं चाहता कि ',
पुरानी हिन्दी फिल्मों से अब तक ""नाचने गाने वाली बहिष्कृत मुसलिम औरतों
के सिवा ""जो इसलाम से बाकायदा ख़ारिज मानी जाती हैं क्योंकि
"नाचना गाना इसलाम में हराम माना जाता है "
और जो जो औरतें ऐसे व्यवसाय में आयीं पहले वे तवायफ़ परिवार से आयीं । ये
तवायफें वे बनायीं गयीं जो लूटी हुयीं औरतें थीं । कालान्तर में उनका एक
मुकाम बनता गया कला के नाम पर फिल्मों में ये तवायफें भी आने को तैयार
नहीं थी ।तब लङकों ने औरतों के रोल किये । बाद में फिल्म इंडस्ट्री की
अपनी ही दुनियाँ बन गयी किंतु यह एक अलग बात है कि लोग फिल्में देखते थे
।और यह दूसरी अलग बात है कि लोग फिल्मों में काम करने वाली लङकियों को
बदचलन आवारा वाहियात और कम्प्रोमाईज करने वाली औरतें समझते थे आज भी ग़ैर
फिल्मी परिवार के लङके बहुत कम मामलों में किसी फिल्मी लङकी से विवाह
करने को तैयार होते है, 'एक दो अपवाद के सिवा कदाचित ही कोई उदाहरण ऐसा
है जब दो फिल्मी हस्तियों की पहली ही शादी पहला ही अफेयर रहा और जीवन भर
निभ गया ।आज भी संपन्न और सक्षम होने पर भी फिल्मों में काम करने को
लङकियों को कोई माता पिता आसानी से तैयार नहीं होते ।
अतः उस पचास से सौ साल पुराने जमाने में तो फिल्मी औरत की शादी किसी गैर
फिल्मी परिवार में होना ही असंभव थी ।बल्कि ये भी कि खुद फिल्मी बेटे के
माँ बाप नहीं चाहते थे कि उनकी बहू अभिनेत्री हो
साथ साथ प्रेम अभिनय करते करते दो चार अफेयर होकर टूटने के बाद ही दो
फिल्मी व्यक्तियों की शादी हो पाती थी ।
वह शादी भी अकसर बहुत जल्दी तलाक और डिप्रेशन में बदल जाती ऱही ।

तो
ये रहा फिल्म अभिनेत्रियों का प्रेम विवाह, "
फिर ये सब कोई सामाजिक मुख्यधारा के लिये उदाहरणीय जोङे कैसे बन सकते हैं?

बात
उन प्रेम विवाहों की कीजिये जो व्यक्ति का पहला इफेयर रहे और उसी पहले
अफेयर को पहली शादी में बदल कर पूरी जिन्दगी जिस हस्ती ने निभा दिया हो
और वहाँ लङकी मुसलिम हो और उस से शादी करने वाले ग़ैर मुसलिम लङके ने
मजहब ना बदला हो, ' बहुविवाह न किया हो??????????



जो फिल्मी अभिनेता या बहुत बङे अरबपति राजनेता या इंडस्ट्रियलिस्ट करते हैं ',
वह सब कभी भी आम मिडिल क्लास आदमी के जीवन में होना संभव नहीं बिना बङी
पारिवारिक टूट फूट और बगावत बरबादी के ।

आम आदमी मजहब तो दूर जाति भी दूसरी हो जाने पर मुसीबत में पङ जाता है ।
माँ बाप का जीना बिरादरी और पास पङौस वाले पूछ पूछ कर हराम कर देते हैं ।
आईन्दा अपनी ही बिरादरी में दूसरे बच्चों की शादी के लाले पङ पङ जाते हैं
और, 'हर निगाह मजाक बनाने लगती है ।

दूसरा मजहब अगर है तब तो निश्चित ही वह लङकी लौट कर कभी माँ बाप के घर आ
ही नहीं सकती ।
या देर सवेर ""ऑनर किलिंग ""की शिकार हो जायेगी ।

लङकी मुसलिम और लङका हिन्दू तो रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामला है प्रेम विवाह का
।और इस पर भी लङके ने मजहब नहीं बदला हो यह तो और भी रेयरेस्ट ऑफ
रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामला है ।

इतने पर अगर दोनों की शादी हो गयी तो कम से कम दस बीस सालों तक कुटुंब के
साथ खङे होना लगभग नामुमकिन ही समझिये ।

आप तब तक ऐसे उदाहरण खोजिये जिनमें लङका हिंदू ईसाई या पारसी सिख जैन
बौद्ध था,, '' और लङकी मुसलिम थी,, ''शादी बिना किसी बवाल के हो गयी और
परिवार दोनों ने बिना हील हुज्जत को दोनो को अपना लिया न तो लङको को
मुसलिम बनना पङा न तो लङकी को हिंदू बनाया गया, "????
अगर आम मध्यम वर्ग में ऐसा कोई जोङा है तो उसको सम्मान जरूर मिलना चाहिये
सार्वजनिक तौर पर और हम सब जानना चाहेगे कि क्या वे दोनों अपने बच्चों के
धर्म पर कोई निर्णय ले पाये?? जैसा कि पूरी दुनियाँ का नियम है कि पिता
की ही जाति और मजहब संतान को मिलता है तो क्या उस जोङे के बच्चे ""हिंदू
हैं????
और क्या उन पर कोई दवाब मजहबी ठेकेदारों ने नहीं डाला????? बहुत सम्मान
करना चाहिये उस जोङे के माता पिता ",,मायके सासरे वालों दोनों का,, ''


अगली किस्म है ""लङकी हिंदू और लङका मुसलिम, ',
निश्चित है कि हंगामाखेज वारदात है ।
लङकी किसी हालत में माँ बाप को राजी वयनहीं कर सकती,, ''जब दूसरी जाति
में शादी करने को दूसरे वर्ण में करने को तब जब गोत्र और सात नात कुटुंब
छोङकर ही शादी होनी नियम है तब ग़ैर हिंदू लङके से शादी को भूखों मरता
परिवार भी राजी खुशी तैयार हो ही नहीं सकता बिना किसी बङी धमकी और मजबूरी
के सौ में से एक दो अभिभावक होंगे जो लङकी के आत्महत्या कर लेने की धमकी
पर भी गैरहिंदू लङके से विवाह करने को सहर्ष राजी हो जाये!!!!!!

लङकी अकसर लगभग सब मामलों में चुपके से भाग जाती है घर से ',
भागते समय थोङा सा गहना कपङा और कुछ कागजात कुछ रुपये बस यही ले जा पाती है ।
अगर किसी बङे पद पर है स्वावलंबी है लङकी तब तो वह सिर उठाकर कह पाती है
वरना ऐसी शादी बरसों तक समाज से छिपाई ही जाती है ।

हंगामा तो जो होता है वह सारे गाँव कसबे नगर में फैलता ही है पहली
रिपोर्ट पुलिस में जाती है ""बहला फुसला कर लङकी भगा ले जाने की ""

और
अब जोङा छिपते छिपाते भागता रहता है परिजन और पुलिस खोजते रहते हैं ।

अगर हत्थे नहीं चढ़े तब तो नसीब वाले निकले किंतु शहर बदर या अज्ञात वास
तो पक्का ही पक्का ।

लङकी बुर्के में और लङके पर धर्म के ठेके दारों का दवाब ।
न कोर्ट मैरिज मान्य
न आर्य समाजी शादी ।
लङकी "क़ाफिर है "तुम मुसलमान हो जब तक लङकी इसलाम क़ुबूल नहीं कर लेती
है ये शादी नाज़ायज है ।
न तो लङके की मुहब्बत का रंग मज़हब से गाढ़ा होता है न लङकी की कुरबानी
की कोई क़ीमत ',

ऐसी लङकी जिसने इसलाम कुबूल नहीं किया हो, 'वह पर्सनल ला के तहत किसी
मुसलिम लङके की जायज बीबी नहीं है, और न ही उसके बच्चे अपने पिता की
जायदाद नाम और व्यवसाय के जायज वारिस ।

पितृसत्तात्मक विश्व है तो हिंदू मान्यता के अनुसार लङकी जिस जाति जिस
वंश जिस धर्म के पुरुष से दैहुक संबंध बना लेती है वही उसका पति होता है
चाहे उसने विधिवत विवाह किया हो या न किया हो ',प्रेम विवाह को गंधर्व
विवाह के रूप में मान्यता मिली हुयी है और लङकी घर से भागकर गयी, 'लङके
के सहर्ष दैहिक संबंध बनाने दिया अब हिंदू मान्यता के अनुसार वह पितृजाति
की नहीं रही पति की जाति ही उसकी जाति है पति का धर्म ही उसका धर्म है और
उसके बच्चे पति की जाति से पति के धर्म से जाने जायेंगे ।

हिंदू लङकी की वापसी संभव नहीं ।शास्त्र के अनुसार, 'संविधान के अनुसार
वह तलाक ले सकती है और तलाक के बाद वह पिता के घर लौट कर पिता की संपत्ति
की वारिस है ।

किंतु मुसलिम पर्सनल लॉ के अनुसार '"ये विवाह विवाह हुआ ही नहीं माना
जायेगा, क्योंकि लङकी ने इसलाम कुबूल नहीं किया है । अतः न तो वह लङकी न
उसके बच्चे पति और पिता की संपत्ति नाम व्यवसाय मजहब के माने जायेंगे न
हक दार हिस्सेदार और न ही वारिस होगे, '

जब लङकी ने इसलाम नहीं अपनाया तो विवाह हुआ ही नहीं और जब विवाह हुआ ही
नहीं तब ""तलाक ""भी किस बाद का???

ये सब एक नाजायाज जिस्मानी ताल्लुकात से अधिक कोई मान्यता नहीं रखते ।

और जहाँ किसी भी पुरुष स्त्री के कैसे भी शारीरिक संबंध से सिवा कोख
किराये पर लेकर,, आई वी एफ "
के लिखत पढ़त के ",,

हर बच्चा पिता की संपत्ति का हिस्सेदार औऱ वारिस है ।

चाहे उस जोङे ने विवाह किया हो या नहीं ।

किंतु
पर्सनल लॉ और जम्मू कश्मीर राज्य पर ये कानून लागू नहीं होते ।
तब

इस तरह उस हिंदू लङके की संपत्ति में वह मुसलिम लङकी वारिस हो जाती है जो
हिंदू लङके से शादी करके अपना मज़हब नहीं बदलती जबकि भ्रम यही है कि
हिंदू की पत्नी हिंदू बच्चे हिंदू जाति पिता की पति की जाति ।

नहीं
होश खोलने वाली बात है कि, 'मुसलिम लङकी का विवाह नहीं हुआ माना जायेगा
और लङके से उसके संबंध नाजायज जिस्मानी ताल्लुकात माने जायेगे संतान लङके
की रहेगी लेकिन लङकी कुँवारी समान ऐसे विवाह से मुक्त है और जब चाहे अपने
मजहब में लौट सकती है "बिना तलाक लिये वह अविवाहित की तरह किसी मुसलिम
लङके से कभी भी निकाह कर सकती है यह पर्सनल ला की व्यवस्था है ।

इसे व्यापक तौर पर समझने समझाने की जरूरत है, क्योंकि 'अरबपति फिल्मस्टार
और बङे पद सत्ता वालों को वैश्विक दमखम सुरक्षा हासिल होने से फर्क नहीं
पङता ।

किंतु आम मिडिल क्लास परिवार को तबाही बरबादी और बदनामी परिवार की टूटन
कुनबे से बहिष्कार का फर्क पङता है ।

जो भावुकतावश कर ली गयी शादी को एक दशक तक भी टिकने नहीं देता और
आत्महत्या "ऑनरकिलिंग, दंगा बवाल और जोङे का तलाक ही परिणाम रह जाता बाद
में ऐसे लङके लङकी की दूसरी शादी के भी लाले पङ जाते हैं और उनके बच्चों
की शादी भी पिता माता की बिरादरी में होना बेहद मुश्किल हो जाता है जिसका
असर कई पीढ़ियें तक चलता रहता है ।

अब?
कहने का मतलब ये कि भावुक जोश न दिखाये न लफ्फाजी की शायरी पर मर मिटे ।

सबसे पहले ""मुसलिम पर्सनल ला के तहत मुसलिम विवाह "वारिस "जायदाद "जायज
नाजायज औलाद 'तलाक और तलाक के बाद के हक "


पढ़ लें ।

तब ये मन जब बना लें कि मुसलिम बनना है, ""तभी किसी मुसलिम लङके या लङकी
से शादी करें ।

वरना जजबातों पर काबू रखें संयम से रहे और समाज के समरस शांत जीवन
हिंसामुक्त वातावरण के लिये चुपचाप ऐसे प्रेम को भूल कर दिल ही दिल में
शहीद की तरह कुरबान कर दें अपने प्यार को, '

ताकि सब जगह अमन हो दंगे न हो सङके जाम न हो आप के भावुक बेवकूफ प्यार का
प्रतिशोध दूसरे निर्दोषों को न चुकाना पङे ।

समझे? /समझीं?
या तो मुसलिम बन जाओ राजी खुशी और निकाह कर के चैन से जिओ जीने दो!!!
या
भूल जाओ प्रेम और शादी और शहर को जलने से बचा लेने की कुरबानी शहादत देकर
चुप रहो ',।
जब तक
कि
यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होकर कोर्ट मैरिज को सब धर्मों के प्रेम विवाह
में मान्यता अबाध नहीं मिल जाती, मौलिक अधिकार नहीं बन जाता प्रेम विवाह
तब तक ",
परसनल ला पढ़े समझे बिना शादी जैसी हिमाकत न करें
©®सुधा राजे

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Sudha Raje
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सुधा रसोई।

पँजीरी /कषार
"""""""
भारतीय पूजा पाठ का अभिन्न अंग है "पँजीरी "जिसे कषार भी कहते है ।
इसकी मूल बात है "पाँच "

पाँच अन्न
पाँच मेवे
पंचामृत
पंच फल
पंच पत्र
पंच मिष्ठ

,,,""

गेंहू का दरदरा आटा
चावल का दरदरा आटा
चने का दरदरा बेसन
जौ का दरदरा आटा
सिंघाङे या मक्के का दरदरा आटा
बराबर मात्रा में लें

लगभग तीन सौ ग्राम प्रति अनाज का आटा ।

बूरा
चीनी
गुङ
मिश्री
खांड
प्रत्येक सौ सौ ग्राम ।

बादाम
काजू
खसखस
पिश्ते
मखाने
प्रत्येक पचास पचास ग्राम
सबको तवे पर हलका कुरकुरा होने तक घी से भून लें ।



गौ घृत सौ ग्राम
गौ दुग्ध सौ ग्राम
गौ दुग्ध का खोवा या मावा दो सौ ग्राम
गौ माखन नवनीत सौ ग्राम
गौ दुग्ध या ताजा दही सौ ग्राम



दो केले
दो सेब
दो अमरूद
दस सूखे अंजीर
दस सूखे छुहारे
सब अंदाज से मोटे या बारीक काट लें

काली मिर्च
हरी इलायची
चिरौंजी दाना
पीपरामूल
बबूल की गोंद पचास ग्राम
बाकी सब पाँच पाँच ग्राम

अब,, बङी भारी तले की कङाही में पचास ग्राम घी डालकर सब पाँचों आटे डालकर
धीमी आँच पर गहरा सुनहरा भूरा होकर सुगंध देने तक भून कर उतार लें ।

सारे पंच मेवा बारीक कतर लें चाहैं तो सरौता या कद्दूकस से कतर लें

भुने हुये पंचान्न चूर्ण में सब मेवे मिला दें ।
फिर घी गुङ(फोङकर)
चीनी खाँड बूरा मिश्री मिलादें

फिर माखन 'मावा (खोवा), दही दूध मसलकर मिला दें और अंत में काली मिर्च
हरी इलायची पीसकर और चिरौजी भूनकर मिला दें
पीपरामूल भी मिला दें दरदरा पीसकर

गोंद को घी में भूनकर मिलायें कूटकर ।

तुलसी के कतरे पत्ते डालें
और
अंत में सब पर कटे हुये फल रख कर प्रसाद लगाकर बाँटें ।

बहुत ही पौष्टिक नाश्ता है ।
बहुत दिन रखना हो तो कटे फल केले सेब अमरूद बस तीन चीजें न मिलायें ।

रोज एक कटोरी "पँजीरी के साथ गुनगुने दूध में किशमिश उबालकर पियें यह
बेहद बलवर्द्धक अनुभूत आहार है ।

हर आयु के लिये उत्तम नुस्खा ।
तो क्यों न लगे मेरे कान्हा को पँजीरी प्यारी!!!!
जय श्रीकृष्ण ।
©®सुधा राजे


और पंचान्न चूर्ण में यदि सोंठ घी गरम गुङ मिला दें ।तो लड्डू भी बना सकते हैं आप ।
याद रखें बहुत धीमी आँच पर धीरे धीरे धैर्य से निरंतर चलाकर भूने बनायें हर चीज
कम वजन वाले और कमजोर लोगों के लिये बल पुष्टिकारक अचूक उपाय है यह
"पौष्टिक पँजीरी "
©®सुधा राजे


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सुधा रसोई।

Sudha Raje
उपवास और सेहत के लिये मेवे
वाली गजक पपङी ""
"""""""""""""""""""""""""''""""""""
सामग्री एक पानीदार नारियल
पचास ग्राम पिश्ते
पचास ग्राम अखरोट
पचासग्राम बादाम
पचास ग्राम खसखस दाने
पचास ग्राम चिरौंजी
पचास ग्राम काजू
सौ ग्राम मूँगफली या चिलगोजा ।
सौ ग्राम तिल
पचास ग्राम घी
एक किलो चीनी साफ
एक नीबू या आधा कप दूध
दो तोले इलायची हरी छोटी वाली
सावन भादों में व्रत ही व्रत और एक
रेसिपी उनके लिये जिनको उपवास से
सिरदर्द हो जाता है ।
बारीक बारीक चिप्स की तरह कटे
पानी वाले नारियल के टुकङे कर लें ।
मूँगफली तवे पर खूब बर्ऊन होने तक
भून लें ।
चाहें तो थोङे काजू बादाम पिश्ते
खसखस अखरोट चिलगोजे चिरोंजी
सब बारी बारी से हल्का घी डालकर
भून लें।
और कुरकुरे होने पर उतारकर
स्लाईसर से कतर लें चिप्स की तरह ।
अब चाशनी बनायें । चीनी में दो कप
पानी डालकर पकने दें धीमी आँच पर
।(थोङी केसर भी डाल सकतीं है
पानी में भिगोकर )
आधा नींबू छानकर निचोङें या दूध
डालें आधा कप इससे चाशनी की मैल
बाहर आ जायेगी जो कलछी से निकाल
लें अलग और फेंक दें ।
चाशनी गाढ़ी होने दें
चार तार की चाशनी होने पर सारे
मेवे चाशनी में डाल दें ।
और आधा चम्मच
पिसी इलायची डालकर चलायें ।
घी लगी चिकनी थाली पर
पतला पतला फैला दें और ठंडा होने
रख दें,
कट के निशान लगा दें
टॉफी या बरफी के शेप में ।
ऊपर से क्रश किया नारियल और
मेवा बुरक दें
फ्रिज में रखें ।
व्रत वाले दिन हल्के गुनगुने दूध से
चार पाँच पीस खाकर व्रत शुरू करें
पूरे दिन कमज़ोरी नहीं लगेगी ।
बच्चों के लिये सेहत और स्वाद
वाली ""गजक ""
ये डिब्बे में बंद करके दो चार महीने
तक भी ताजी रहती है।
©®सुधा राजे

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mobile- 9358874117

सुधा रसोई।

बच्चे के लिये पौष्टिक आहार '

सौ ग्राम गेंहू
पचास ग्राम चना
पचास ग्राम सोयाबीन
पच्चीस ग्राम मक्का
पच्चीस ग्राम ज्वार
पच्चीस ग्राम बाजरा
दस बादाम
दस छुहारे
दस साबुत काजू
सबको साफ करके जरा सा गरम तवे पर भूने, 'बिलकुल जरा सा ही रंग बदलते उतार लें, '
सबको मिक्सी में दरदरा पीस कर
कङाही में एक चम्मच घी डालकर सुनहरा होने तक भूने और ठंडा करके डिब्बे
में कस कर बंद करके रखें ।

जब भी बच्चे को भूख लगे ',
दो चम्मच दलिया '
ले, एक गिलास दूध में आधा गिलास पानी डालकर खौलायें ',
उबलते पानी में दलिया डालकर पकायें ढक कर चलाकर ',
जब गाढ़ा हो जाये तब चीनी डाले एक चम्मच और ठंडा करके खिलायें ',

इस दलिये को नमकीन बनाने के लिये बारीक कतरी हुयी सब्जियाँ घी से कङाही
में छौंक दे नमक चुटकी भर डाले और दो गिलास पानी डाल दें उबलते पानी में
दो चम्मच पौष्टिक दलिया डालकर चलाते रहे पक जाने पर ठंडा करके चटायें ।

इसे अधिक मात्रा में बनाकर रख लें
गेंहू सौ ग्राम की जगह पाँच किलो ग्राम और मक्का ज्वार बाजरा चना सोयाबीन
आधा आधा किलो मिलाये बादाम काजू छुहारे अखरोट दो सौ ग्राम प्रति एक मेवा
ले लें ',
सबको भूनकर दरदरा पीस लें पत्थर की चक्की (जतला) से टाईट ढक्कन के डिब्बे
में भरकर रखें
जब खाना है तब एक कप दलिया एक वयस्क के लिये हिसाब से लें और एक चम्मच घी
एक कप दलिये के हिसाब से डालकर भून लें "रंग बदल कर सुनहरा बादामी हो
जाये तब दूध डाले एक लीटर आधा लीटर पानी और चार चम्मच चीनी डालकर
पकायें, गाढ़ा होने पर उतार दें ",,दुबले पतले कमजोर लोगों और दूध पिलाने
वाली माँ के लिये बेहद लाभकारी पहलवानों और खिलाङियों के लिये भी,"जच्चा
के लिये बनाते समय पतला और खूब पका हुआ रखें बस आधा चम्मच अजवाईन और एक
चुटकी सौंठ मिला दें ।
चीनी की जगह पुराना गुङ डालें बस


नमकीन बनाते समय बारीक कतरी सब्जियाँ जीरा लौंग काली मिरची और लाल खङी
मिर्च से घी में छौंककर पानी से पकने दें और हरी धनियाँ करीपत्ता कसूरी
मैथी वगैरह जो उपलब्ध हो उससे सजा कर परोसे
©®सुधा राजे

Saturday, 30 August 2014

सुधा राजे का लेख - ""स्त्री """

कैसे कोई
चाहेगा कि उसके घर
बेटी पैदा हो??????????
स्त्रियों का व्यापार आज
भी जारी है और लाख उपाय करने
कानून बनाने के बाद भी प्रतिवर्ष
लगभग एक लाख बच्चे घरों से
'विद्यालयों से, अस्पतालों से,
बाजारों, मेलों, हाटों, मन्दिरों,
दरगाहों, जुलूसों, बसों, रेलगाङियों,
आदि से चोरी या अपहृत हो जाते हैं
या खो जाते हैं, 'जिनमें से बावन
प्रतिशत से भी अधिक केवल
लङकियाँ ही होतीं हैं और कुल
बच्चों में से बयालीस प्रतिशत
बच्चों का कभी कोई सुराग
नहीं लगता! एक सनसनीखेज खबर के
मुताबिक कुछ गाँव जहाँ हाईवे है और
टूरिस्ट्स आते जाते हैं वहाँ नगर
महानगर की बजाय छोटे
कसबों गाँवों में, कुटीर उद्योग
की तरह वेश्यावृत्ति की जाती पाई
गयी जो नाबालिग लङकियाँ अपहृत
करने वाले अपराधियों से
लङकियाँ खरीद कर
दवाईयाँ हार्मोन्स दे देकर
उनको जल्दी जवान बनाते हैं और, आस
पास पब होटल डाकबंगलों ढाबों पर
ठहरने वाले यात्रियों को सूचना और
बुलावा देकर ग्राहक फँसाकर लाने
वाले दलालों के माध्यम से चलाये जाते
हैं, कुछ कुटीर वेश्यालय तो सामाजिक
संस्था, या दिन में कोई भला कार्य
करने वाली कार्यकारिणी जैसे दिखते
हैं । लङकियाँ विदेश भी भेजी और
बेची जाती हैं जिसका माध्यम
समुद्रयात्रा हवाई यात्रा और
नेपाल बांगलादेश पाकिस्तान जैसे
पङौसी देशों के माध्यम से
भी होता है। सवाल उठता है संभव
कैसे है?? क्या पुलिस कस्टम
कोस्टगार्ड ट्रैफिक कंट्रोल और
जासूसी संस्थाओं को भनक
भी नहीं लगती होगी??
यहाँ बिना सुबूत के कुछ कहना मुश्किल
है किंतु अनेक मामलों में, विधायक,
सांसद, पुलिस ऑफिसर व्यापारी,
पत्रकार, वकील, जज, बङे
अधिकारी तक, कालगर्ल के साथ
किसी होटल या बंगले पब या बार में
रँगे हाथ पकङे गये । चाहे ऐसे
लोगों की संख्या बेहद कम हो किंतु
इतना घोषित करने के लिये काफी है
कि कहीं न कहीं हर विभाग में कुछ
काली भेङें बनकर बैठे भेङिये हैं और
सूचनाये सुविधायें ऐसे भेङ
रूपी भेङियों से
ही अपराधियों को मिलती है । जब
तक कोई बङा खुलासा जनता,
मीडिया, या कोई विदेशी संचार
माध्यम या ईमानदार
कर्मचारी नहीं कर देता तब तक ये सब
जघन्य अपराध चर्चा तक में नहीं आने
दिये जाते, 'एन जी चलाने के दौरान
एक बच्ची डेढ़ साल
की रोती हुयी मिली कदाचित कोई
बुरी नीयत से लाया और उसी जगह से
महिला संगठन की टोली गुजरती देख
छोङ भागा, तमाम विज्ञापन और
तलाश के बाद असली माँ बाप
नहीं मिले, बच्ची किसी संपन्न
परिवार की थी, जो कार स्कूटर
की आवाज पर चौंकर
कहती ""पापा ""और कुछ
बोलना नहीं जानती थी । अब वह
बच्ची एक परोपकारी निम्न मध्यम
वर्गीय परिवार में इंटरमीडियेट में
पढ़ रही है । ऐसे कई केस सामने आये
"निठारी कांड लोग भूले
नहीं जहाँ चालीस से अधिक बच्चों के
कंकाल नाले में मिले, और अमीना कांड
जब एक एयर होस्टेस ने
बिकी हुयी लङकी को बूढ़े शेख के चंगुल
से छुङाया जिसे माँ बाप ने निकाह के
नाम पर बेच दिया था ।
बंगाल बिहार नेपाल और
पहाङी क्षेत्रों की अनेक
युवतियाँ विवाह के नाम पर वधू मूल्य
चुकाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश
हरियाणा और राजस्थान के रेतीले
इलाकों के उन
युवको बूढ़ों प्रोढ़ों को बेच
दी जाती है पत्नी के रूप में बंधुआ
मजदूर बनाकर रखने
को जिनकी शादी परिवार
की खराब छवि, लङके
की कुरूपता या विकलांगता, परिवार
में हुये अंतर्जातीय अंतर्धार्मिक
विवाह या लङके की शराब हिंसा और
आपराधिक आदतों या परिवार
की मोटी दहेजी रकम की आशा में
बढ़ती गयी आयु या पत्नी मरने पर
बच्चों की वजह से
हो ही नहीं पाती ।
ये
बिकी हुयी स्त्रियाँ पत्नी कहलातीं
तो हैं किंतु इनका सामाजिक सम्मान
कुछ भी नहीं रहता और मोल की बहू
का खिताब मुँह दबा दबाकर चाहे जब
सुना दिया जाता है । मायका बहुत
दूर और किराया बहुत अधिक होने
की वजह से न बाप भाई आ पाते हैं न
मोल की बहू कभी मायके
भेजी जाती है, यदा कदा दशक
दो दशक में कभी मुलाकात हो जाये
तो हो जाये,, किंतु इन मोल की बहुओं
की हालत बंधुआ मजदूर से भी बदतर
रहती है जिनको रात में बिस्तर पर
रौंदा जाता है दिन भर पशुओं
की कुट्टी चारा सानी पानी गोबर
उपले और घर की साफ सफाई के बाद
रसोई और बचा समय खेत पर
लगा दिया जाता है उस पर
बङा क्या छोटा क्या सब रौब झाङते
हैं । बोली और खानपान अलग होने से
सामाजिक उत्सवों पर ऐसी मोल
की बहुयें पृथक छोङ दी जाती है
उनको न
रसमों की जानकारी होती है न
गाना बजाना मेल का कि कोई
गा गवा सके,, ।
यातना दायी अकेलापन झेलने
को अभिशप्त ये मोल की बहुयें भयंकर
शारीरिक मारपीट और मानसिक
तानों टोंचनों का शिकार रहतीं हैं ।
न कोई घर की संपत्ति के मामले पर
विश्वास करता है न ही इनकी कोई
कीमत समझी जाती है एक काम काज
करने वाली कठपुतली से अधिक ।एक
लँगङ नामक पङौसी की पत्नी को बुआ
से सीखी रेसिपी पर पूरन
पोली "बखीर "और दही बङे भेज दिये
तो रो पङी, बोली काकी जी, कई
साल बाद खाई, यहाँ कोई
अपनी पसंद का खाना बनाने
ही नहीं देता ।ये मोल की बहुये
बहुतायत कैदी की ही तरह तरह
रहतीं है जिनके बाजार मेला मंदिर
समारोह में नहीं ले जाया जाता कई
साल तक, 'बाद में इनके बच्चे
भी दोयम दर्जे के ही समझे जाते है ।
बेचने खरीदने का काम 'दलाल पब
होटल और सरकस के लिये भी करते हैं
कई बार तो बच्चियाँ ही सब कुछ भूल
चुकी होतीं है और अपने खरीददार
या अपहर्ता को ही माता पिता
समझने लगती हैं पीढ़ी दर
पीढ़ी धँसी तो धँसी, फिर
दुबारा समाज की मुख्यधारा में
वापसी नहीं ।पता लग जाने पर
भी कदाचित ही कोई परिवार
हो जिसने स्वीकार कर
लिया हो कि "अमुक बदनाम पेशेवर
वेश्या उसकी बीस साल पहले अपहृत
हो गयी बहिन या बेटी है ",,और यह
सच सब बिक चुकीं लङकियाँ जान समझ
लेतीं हैं इसलिये जब एक बार फँस
जातीं हैं तब कीचङ से बाहर आने
की कोशिश करना ही बंद कर देतीं हैं
।सामने कोई परिजन पङ जाये
तो पहचानने से बचकर निकल जातीं हैं
।ये अपराध एक समाज स्वीकृत
अपराध है और तमाम कोशिशों के बाद
भी वेश्यावृत्ति और
स्त्रियों को तवायफ बनाकर
नचवाना बंद नहीं हो पा रहा है,
'अभी हाल में ही एक पुलिस ऑफिसर
जेल के भीतर मातहतों सहित
नर्तकियों के साथ नाचते नजर आये पूरे
हरियाणा और पश्चिमी उप्र में
वैरायटी शो कला के नाम पर राम
लीला रास लीला और तमाम जुलूसों में
नर्तकियाँ बुलवा कर
नचवायीं जातीं है, एक नेता तक के
प्रचार में कई बार
नर्तकियाँ दर्शकों को बाँधे रखने
को नचवायीं गयीं जैसा बागपत में एक
कथित किसान नेता के मंच पर हुआ
पाया गया,, था।
मांस की तरह बेची जा रही है "यजीदी "लङकियाँ इराक सीरिया मे ISISके क्रूर
नरपिशाचों द्वारा कीमत बोली लगाने के लिये उनको सफेद चादर में लपेटकर
सीखचों वाले चौकोर पिंजरे में इस तरह भरकर खङा कर दिया जाता है वे केवल
खङी रहें बैठने लायक जगह नहीं रहती, कीमत केवल "बारह सौ से पंद्रह सौ
रुपये, औऱ जो नहीं बिकीं नहीं किया कुबूल इसलाम तो सामूहिक बलात्कार के
लिये दर्जन भर आतंकी उनको सरेआम घसीट ले जा रहे हैं 'जिनमें नाबालिग
बच्चियाँ भी है अधेङ औरतें भी ।
एक जानकारी के अनुसार विदेशों से भारत देह व्यापार के लिये लायीं और भारत
से बाहर ले जायीं जाती है और इसे रोकने के लिये जब जब कदम उठाये जाते है
पूरे एशिया में मौजूद ''सेक्स रैकेट चलाने वाली ताकतें सक्रिय होकर सारी
प्रक्रिया में अडंगे डालती है, 'कुछ यायावर समूहों के रिवाज हैं कि लङकी
वाले परिवार को लङकी गिरवी रख कर पैसा कर्ज मिल जाता है, 'और जब ये कर्ज
न चुकाया जाये तब "लङकी छीन ली जाती है, लङकी का विवाह किसी भी आयु यहाँ
तक कि दस साल के लङके से अट्ठारह की लङकी की शादी तक कर दी जाती है और वर
को वधू मूल्य चुकाना पङता है ।
एक और जानकारी के मुताबिक अंग्रेज सैनिक कर्मचारी जितने किसी लङाई में
नहीं मरे उतने लखनऊ कसकत्ता मुंबई दिल्ली की देहव्यापार की मंडियों में
जा जा कर हुये गुप्त रोगों से मरे ।आज भी इन बस्तियों में खतरनाक
बीमारियाँ फैलती है इस सबको समझने के बावजूद भयंकर देहव्यापार जारी है ।
जेहादियों के नाम पर इसलामिक आतंकियों के लिये भी पाकिस्तान सहित अनेक
मुल्कों से लङकी खरीदकर भेजने और अस्थायी निकाह करके लौट आने का नया
घिनौना अपराध सामने आया है ।
किस पर करें भरोसा???? पुलिस पब्लिक प्रेस और प्रशासन में अगर बचाने वाले
हैं तो इन्हीं में ग्राहक और खरीददार और उनके मोटे गिफ्ट पा कर फिसलने
वाले भी मौजूद है ।
कई बार तो छत्तीस गढ़ जयपुर या कहीं और के आवासीय बालिका विद्यालय जैसी
घिनौनी वारदातों का सच सामने आ जाता है जहाँ ''शिक्षक चौकीदार वार्डन तक
लङकियों को लूटते खसोटते और ग्राहक ला ला कर बेचते रहे । अंग प्रत्यारोपण
और तंत्र मंत्र की बलि के लिये भी लङकियाँ बेची किडनेप करके मार दी जाती
है । लगभग दस साल पहले बिजनौर के शेरकोट कसबे में ही पाँच बच्चे दो सगी
माँ ने मार डाले थे जो ननद भाभी थीं और उन बच्चों को कई दिन केवल जिन्नात
उतारने के नाम पर जंजीरों से बाँधकर धुआँ सुँघाकर कलमे पढ़कर पीटा गया ।
एक दो लोमहर्षक घटनायें सामने आती है जब पुत्र के लिये पङौसी या अपनी ही
बेटी का बलिदान तांत्रिकों के कहने पर कर दिया ।
कब बाहर निकलेगा समाज??? सभ्य़ता चाँद पर भले ही बस्तियाँ बसाने की बात कर
रही हो चलती गाङियों बसों अस्पतालों मेलों और गली कूचों में आज भी कहीं न
कहीं हर दिन कुछ लङकियाँ बेचने के लिये घरवालों से छिपाकर चुरा ली जाती
है ।दतिया की एक लङकी रूमाल सुँघाकर बोरे में भरकर ले जायी गयी थी, जो
दारू में धुत्त किडनैपरों को चकमा देकर भागी बेतहाशा और सिपाहियों की
टुकङी से टकराकर बचा ली गयी । मतलब कहीं भी चॉकलेट टॉफी प्रसाद पानी में
नशा देकर बच्चियाँ चुरा ली जाती है, नाक पर रूमाल रखकर चुरा ली जातीं है
और माँ बाप की उँगली छुङाकर भीङ से भी चुरा ली जाती हैं ।
अगली बार सोचना कि ये बच्चा जो भीख माँग रहा है या कूङा बीन रहा है या
मंच पर ये युवती नाच रही है इसे कौन चुराकर लाया?????
और क्यों नहीं सारा समाज इस मुद्दे पर संगठित होकर ""पोलियो भगाओ "की तरह
किडनैपर मिटाओ अभियान चलाता!!!!!!!


--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
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Friday, 29 August 2014

सुधा राजे का एक विचार- ""हिंदू धर्म निर्मित विकसित धर्म हैं।""

Sudha Raje
हम अगर अपना धर्म नहीं बदलना चाहते
तो केवल इसलिये क्योंकि हम
"""इसी धर्म में राम को कृष्ण
को रामायण को गीता को वेद को और
पुराणों को सब देवी देवताओं
को """""""गरिया सकते हैं ',खुले आम साधु
संत महंत की आलोचना कर सकते हैं, हम
मजबूर नहीं मंदिर जाने को ",न विवश है
धार्मिक अनिवार्य टैक्स चुकाने को ",,न
मजबूर किसी फास्ट या रोजे को न तीर्थ
स्नान की बंदिश!!
हम पर कोई मजबूरी नहीं कि मंत्र
रटो पाठ करो उपवास करो या मंदिर
जाओ या तीर्थ जाओ ',ये सब
मजबूरी नहीं ",,हमारा नाम
किसी मंदिर के रजिस्टर में
लिखा हो या न हो हमारे
बच्चों को अपने धर्म के लिये
""खतना ""बपतिस्मा क्राईस्टेनिंग
""जरूरी नहीं ',कोई गुरूदीक्षा ",जनेऊ
कलावा चोटी तिलक, 'टोपी बुरका,
'क्रॉस लटकाना जरूरी नहीं ',न रंग
डालने से मेरा धर्म खंडित होता है न
किसी का भी माँस खाने से ',मेरे धर्म
की अनिवार्यता जुङी है ',यहाँ तक गाय
सुअर तक का माँस खा जाने वाले तक
का धर्म कहीं नहीं चला जाता ',न
तो नेल पॉलिश हटाये
बिना पूजा करनी गुनाह है :न
ही कोहनी कलाई कनपटी भवें कपङे से ढँके
बिना पूजा करना गुनाह मैं
किसी भी वस्त्र में पूजा कर सकती हूँ और
मेरी पूजा का तरीका मेरे भाई से अलग
नहीं कि ',वह तो मंदिर जाये मैं घर में
पूजा करूँ??न यूँ कि मेरे झुकने में चूहा भी न
निकले इतना झुकना है सिजदे को ',और न
भाई को यूँ फर्क से कि बकरी निकल जाये
झुकने पर इस तरह अंतर है, 'मेरे लिये कोई
मजबूरी नहीं मेरा धर्म मुझे
नयी ""किताब लिखने की इजाजत देता है
""और मैं दम रखती हूँ ज्ञान
का तो शंकराचार्य की तरह नये सिद्धांत
बना सकती हूँ ",मुझ पर
किसी पुजारी मौलवी पादरी की हुकूमत
धमकी नहीं '
©®sudha raje

--
Sudha Raje
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Wednesday, 27 August 2014

सुधा राजे का एक विचार:- ""धिक्कार""

कहाँ चली जाती है तुम्हारी आस्था?
नैतिकता
धर्म
और परमात्मा
जब एक ही मजहब धर्म के लङके
लङकियों का पीछा करते हैं, '
जब उनको सीटी बजा कर आँखें
मिचकाकर, गंदे इशारे करके, और अंग
छूने की जबरन हरकर करके कपङे
खींचकर, गंदे शब्द बकते हैं, '
???
थर थर काँपती है जब माँ ट्यूशन स्कूल
अस्पताल बाजार और दफ्तर भेजते, '
जब हिंसक पिशाच की तरह ये लङके
अपने ही मजहब की लङकियों से
जानबूझ कर वाहन टकरा देते हैं और वे
भरे बाजार शर्मिन्दा होकर
रो पङती है,
थर थर काँपता है
बूढ़ा पिता युवा बेटी को कहीं भी साथ
लाने ले जाने से, '
तब खून क्यों नहीं उबलता मेरे
मुरदा नगर का?????
मैं पूछना चाहती हूँ, 'सब
आस्तिक धार्मिक दीनदारों से
कि तुम्हारे घर की लङकियों के
सिवा बाकी सब क्या तुम्हारी हवस
काम वासना के लिये
पैदा की गयीं माँस
की पुतलियाँ हैं??????
तो तुम ही हत्यारे हो अपने घर
की लङकियों के सपनों और हुनर के ????
तुम उनके लिये निर्मित करते हो नये
राक्षस ???
तब कहाँ चला जाता है
'तुम्हारा पुरुषत्व??????
जानते
हो तुम्हारी घिनौनी हरकतों से
कमजोर परिवारों की होनहार
लङकियाँ डर कर घर
बिठा दीं जातीं है??
बेमेल शादियाँ कर दीं जातीं है
असमय??
और
कितनी ही तो आत्महत्या कर लेती है
या आजीवन कारावास में बंद कर
दीं जातीं है??
धर्म के नाम पर पौरुष???
और नैतिकता के नाम पर???
क्या है तुम्हारे मुरदा ज़मीरों में??
लाशें नोचने वाले गीध से भी गये बीते
हो तुम
लानत्त, '
उस दीन धर्म मजहब पर
तुम पर
उस परिवार पर
जिसमें ऐसे भयानक राक्षस जन्मते
पलते हैं ।
©®सुधा राजे।

--
Sudha Raje
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सुधा राजे का लेख ---"""संगठित सामाजिक आपराधिक षडयंत्र ::और स्त्रियाँ ::- एक नज़र।।""""

संगठित सामाजिक आपराधिक
षडयंत्र ::::::::और स्त्रियाँ ::एक नजर
★★★★★सुधा राजे ★★★★★★
आदिमानव गुफाओं में रहता था और और
पशु पक्षियों की भाँति ही शिकार
करता घर की जगह गुफा और
झोपङी बनाता नग्न रहता जोङे
बनाता संतान उत्पन्न करता और
परिवारों के समूह में रहता ।आज
भी भारत
अफ्रीका अमेरिका ऑस्ट्रेलिया में ऐसे
अनेक कबीले यूँ ही रहते हैं ।जिसमें
स्त्रियाँ भी वैसी ही और
उतनी ही स्वतंत्र और अधिकार
सम्पन्न है जितने कि पुरुष
बल्कि संतान की वजह से कुछ अधिक
ही सुरक्षा और अधिकार पाने
की अधिकारिणी हैं ।
किंतु जैसे मानव सभ्य होता गया, वह
संपत्ति और रहन सहन के नियम
रचता गया, एक शक्तिशाली संपन्न
व्यक्ति का आचरण प्रेरक बनकर दूसरे
शक्ति पाने के इच्छुक सब लोगों ने
बिना सोचे समझे
अपना लिया जो रूढ़ि और
परंपरा रीति और रिवाज़ बन गया,

आज का भारत, विविध संस्कृतियों के
मिश्रण से टूट बिखर कर
रचा बसा भारत है जिसमें, वर्तमान
में एक ओर तो स्त्रियों को संविधान
में विशेष अधिकार और
विधि विधायन में विशेष संरक्षण
प्राप्त है तो दूसरी ओर, पूरा देश
स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों से
त्राहि त्राहि कर रहा है ।
लङकियाँ अंतरिक्ष में हैं,
लङकियाँ पायलट है ड्राईवर है,
खिलाङी है, शार्पशूटर हैं सर्कस में है
जिमनास्टिक में हैं सैनिक हैं जासूस हैं
पत्रकार लेखक वकील जज डॉक्टर
नर्स शिक्षक व्यापारी मैनेजर
वैज्ञानिक इंजीनियर कलाकार फिल्म
निर्माता निर्देशक
अभिनेत्री नृत्यांगना कलाकार
""""""सबल और स्वावलम्बी सब कुछ
हैं,,
तो दूसरी ओर आज भी ""घरेलू हिंसा,
पर्दाप्रथा, दहेजप्रथा,
कन्याभ्रूणहत्या 'बालविवाह,
कौमार्य पवित्रतता की अवधारणा,
छेङछाङ, रैगिंग बुलीईंग, बेटी बेटे के
पालन पोषण में भेदभाव,
लङकी वालों को दयनीय हीन समझने
और वंश दीपक, पिंडदान, कुलगोत्र
का नाम चलाने, गैंग रेप,, अपहरण
करके बलात्कार और वेश्यावृत्ति के
लिये बेच देना, भीख मँगवाने और
नाचगाने, खाङी देशों में पैसों के बदले
हरम में भेजने और बेटा न पैदा करने पर
घर पर अत्याचार दहेज न देने पर घर
पर मारपीट और अपमान से हाहाकार
करती तसवीर पर
अत्याचारों की कलंकगाथा की पात्र
हैं ।
सामूहिक बलात्कार 'एक नया और
घिनौना अपराध है
जो मानवजाति पर
ही नहीं प्राणि मात्र पर
बदनुमा कोढ़ है, 'कैसे कोई
व्यक्ति सबसे पहले
तो किसी स्त्री की इच्छा के
विपरीत उसे
रोता तङपता चीखता बचाव
को मदद माँगता देखकर भी यौन सुख
महसूस कर सकता है!!!!
उस पर भी जिस मानव समाज में
जाति, धर्म, भाषा, कुनबा, और
क्षेत्र तक पर कोई एक व्यक्ति दूसरे
से सहमत नहीं हो पाता, विवाह
करना मना कर देता है वहाँ,, कुछ
स्त्रीभक्षी नरपिशाच आपस में
योजना बनाकर साजिश रचकर
किसी स्त्री को जबरन अपहृत करके
उसको सामूहिक बलात्कार करने पर
राज़ी हो जाते हैं!!!! तब न घिन
लगती है न दया न पाप का डर न
अल्लाह ईश्वर य़ीशु ख़ुदा गुरू और
परमात्मा के दंड नर्क दोज़ख हेल्ल
की परवाह!!!! एक दोस्त दूसरे दोस्त
का मजहब जाति अलग होने पर
जूठा पानी पीने से इंकार कर देता हैं
जिस देश में वहाँ अलग अलग जाति और
मजहब पंथ के लोग एक अलग
जाति की स्त्री का बलात्कार करने
को सहमत ही नहीं प्राण और मृत्युदंड
आजीवन कारावास और सामाजिक
बदनामी से भी नहीं डरकर, क्रूर से
भी क्रूरतम अपराध पर उतर आते है!!!
कोई भी, मन मस्तिष्क
वाला व्यक्ति हत्या 'चोरी 'डकैती '
लूट 'जेबकतरी 'वेश्यावृत्ति 'तक
को हालात परिस्थिति के मद्देनज़र
जस्टीफाईड कर सकता है ',किंतु
'सामूहिक बलात्कार, बलात्कार,
छोटी बच्चियों से बलात्कार घर
की बहिन बेटी बहू 'भांजी'
भतीजी 'साली 'भाभी, सास, बुआ,
आदि से बलात्कार को कैसे जस्टीफाईड
कर सकता है!!!!!
यह क्रूर से क्रूर से क्रूरतम अपराध है
और हर मज़हब हर धर्म हर संविधान
में वर्जित निंदित दंडनीय पाप भी है

लोग आज मजहब को लेकर तनाव बढ़ाते
हैं, झुंड के झुंड निकल आते हैं मसज़िद के
नाम पर मंदिर के नाम पर
कब्रिस्तान के नाम पर श्मशान के
नाम पर, जुलूस 'माईक लाउडस्पीकर
और धार्मिक यात्रा प्रदर्शन के
नाम पर, ' किंतु दामिनी कांड के
पहले तक कभी किसी तरह का विरोध
प्रदर्शन पूरी ताकत से "बलात्कार के
विरुद्ध "भारत में तो क्या एशिया के
किसी भी देश में नहीं हुआ, '
भारत विभाजन में तो नफरत ज़ाहिर
करने का बर्बर तरीका ही यही सबसे
अधिक
रहा कि परधरमी स्त्रियों का बर्बर
बलात्कार और क्रूरतम तरीके ये
यौनांगों को काट डालना और
तङपा तङपा कर मारना ',!!!
ये सब घिनौने वीभत्स तरीके ईज़ाद
किसने किये????निःसंदेह पशु
पक्षी कतई ऐसा नहीं करते
उनका ऋतुकाल होता है, और
जोङा बनाने की नैसर्गिक
प्रक्रिया होती है, कुछ जोङे बदलते
रहते है हर ऋतु काल में तो अनेक पशु
पक्षी आमरण आजीवन सदैव एक
ही जोङे में तक रहते पाये गये और एक
परिवार कुनबा समूह बनाकर जीवन
यापन करते हैं '
तब? नर बलात्कारी को पशु
कहना पशु का भी अपमान है ।
स्त्री के प्रति वाचिक यौन हिंसा से
मनोग्रंथि ग्रस्त लोग।
ये एक सामान्य बात नहीं है कि कुछ
पुरुष बालिग और नाबालिग एक
योजना बनाकर स्त्री अगवा करके
सामूहिक रेप करके बर्बर तरीकों से
मार डालते हैं यातनायें दे देकर
''सवाल उस मानसिकता उस परिवार
के माहौल उन दोस्तों के शौक पेशे और
परवरिश पर भी उठता है ।
जैसा कि हर
बलात्कारी किसी स्त्री की संतान है
स्त्रियाँ उसके घर कुनबे और पास
पङौस में है । ऐसे अपराध को केवल
दैहिक कामवासना का चरम
नहीं कहा जा सकता,
क्योंकि भूखा मनुष्य भी मानव माँस
नहीं खाने लगता जब तक
कि वैसी मांस भक्षी मानसिकता के
लिये अनुकूल माहौल में न पला हो और
वैसा होता देखा सुना न हो ।
मतलब??
मतलब ये कि जितनी अधिक
हिंसा बच्चा माता बहिन
भाभी दादी काकी मौसी बुआ पर
की जाती हुयी बचपन से देखता है
परिवार के पुरुषों द्वारा वह "नर
"होने के कारण मात्र से स्त्रियों पर
हिंसा करना सही मानने लगता है ।
जिस परिवार में रोती पिटतीं मार
खाती तङपतीं और
बङों की गुलामी करतीं स्त्रियाँ
अधिक नारकीय जीवन जीती है, उनके
बच्चे "नर "होने के बोध से उतने
ही अधिक पाशविक मानसिकता से भरे
जाते हैं । बचपन में
पिता बुरा लगता है माँ पर
दया आती है किंतु जैसे जैसे
मनमानी करने के अवसर मिलते जाते
है, पुरुष होने की सुविधायें सेवायें
मिलती जाती है, हिंसक भावनायें
बुरी नहीं लगतीं और जब एक से दो एक
जैसे लङके मिलते हैं वहीं संस्कार
नैतिकता कमजोर पङ जाती है ।
जितनी अधिक खबरें सूचनायें और
आपराधिक
वारदातों की कहानियाँ ऐसे
लङकों की जानकारी में
बढ़ती जाती है बजाय मन सिहरने और
स्त्री मात्र को बचाने की भावना के
',ऐसे नरपिशाच कुभाव से भरे पुरुष, खुद
को बचाने वाले की बजाय
'बलात्कारी की भूमिका में कल्पित
करने लगते हैं ।नशा, और निठल्लापन,
शिक्षा की प्रॉपर तरीके से पूरी न
होने की समस्या और
अमीरी गरीबी की खाई के कारण
मिली हीनभावना या श्रेष्ठता की
अहंकारिता काष्ठ पर पेट्रोल
छिङकती रहती है ।इसी पर पोर्न
फिल्में जो अब मोबाईल पर ही देख
लेना उपलब्ध होने लगा है,
सीडी डीवीडी गाँव गाँव कसबे नगर
महानगर सब जगह उपलब्ध है और
तो और टीवी सिनेमा सब जगह
बलात्कार के दृश्य आम बात है और पत्र
पत्रिकाओं सीरियल और पोस्टर पर
हर जगह नग्नता से भरे मॉडल्स के
चित्र और विज्ञापन ''पेट्रोल
भीगी लकङी को आग दिखाने का काम
करते हैं ।
नशा किया मौज के लिये, गैंग
बनी नशा और खाना पीना फिल्म सैर
सपाटे के नाम पर, अब
भङकी हुयी जुनूनी कामवासना के लिये
चाहिये बस लङकी, सबसे आसान
शिकार लङकी दोस्त की गर्लफ्रैण्ड,
घर पङौस की लङकी,
अकेली दुकेली देर
रात्रि की यात्री कलीग
या सहकर्मी, और आप आँकङे देखें
कि अधिकांश बलात्कार, एक
या दो की संख्या में अकेली पाई
गयी लङकी, का परिचितों ने
किया है, या कस्टडी में ऐसे अपराध
जो स्त्री अभिरक्षक थे 'पिता,,
शिक्षक,, वार्डन,, जेलर
या सिपाही,, थानेदार या स्टाफ,,
डॉक्टर कंपाऊण्डर या बार्ड बॉय,,
ड्राईवर कंडक्टर या क्लीनर,,
दुकानदार,, हैल्पर,, या कारीगर,,
दंगों में भी सामूहिक बलात्कार
ही सबसे जघन्य अपराध के रूप में
सामने आते हैं और
बहाना मजहबी प्रतिशोध
घृणा रहती है किंतु यह साबित हुआ
बार बार कि दंगों में दो तरह के
अपराध करने वाले ""पहले से ही मन
मस्तिष्क से अपराध के लिये तैयार
रहने वाले आपराधिक मानसिकता के
मौकापरस्त लङके थे, जो घर जलाने के
बहाने कीमती सामान लूटकर ले
जाना,
विरोधी की रोजी रोटी का जरिया
मकान दुकान मशीन लूटकर
जलाना और
लङकियों औरतों को बलात्कार करके
विरोधी का अपमान करने और
बदला लेने की हिंसा करने
की पैशाचिकता से भरे हुये थे ।
मुजफ्फरनगर में एक एक्नानबे साल
की जर्जर वृद्धा का बलात्कार पोते
की आयु के युवक ने
किया वृद्धा बिस्तर पर
पङी पङी कुछ दिन बाद मर गयी ।
हरिद्वार में एक हाथ वाली सत्तर
साल की वृद्धा का बलात्कार पुत्र
की आयु के युवक ने किया हर
की पैङी पर, दामिनी के
बलात्कारी अलग अलग जाति मजहब
और गाँवों के लोग थे जिनमें सबसे क्रूर
पिशाच नाबालिग था, मुंबई पत्रकार
का बंद पङी मिल परिसर में
बलात्कार करने वाले में भी अलग अलग
मजहब और जाति के लङके थे जिनमें एक
नाबालिग ही सबसे क्रूर
अपराधी था । अनेक नाबालिग
अपराधी बच्चियों के
बलात्कारी पाये गये और अनेक बूढ़े
भी बलात्कारी पाये गये भोपाल में
सगा नाना, गुजरात में सगा मामा,
केरल में पिता भाई चाचा, बैंगलोर में
शिक्षक, और मुंबई में बस ड्राईवर,
"""""""न कोई रिश्ता विश्वसनीय
रह गया न कोई आयु,, इमराना के
ससुर ने रेप किया और पति से तलाक
दिलवा दिया मौलवियों ने,,
बिजनौर में चाची कहने वाले पङौस के
लङकों ने छप्पन साल
की स्त्री को घास काटते समय रेप
करके मार डाला, शेरकोट में गैंग रेप
करने के बाद
लङकी का वीडियों बनाकर
फैला दिया, सुहागपुर में स्कूल
जाती लङकी खेत में खीचकर रेप करके
मार डाली, """मेरठ में ट्यूशन से
लौटती लङकी कार में खींचकर रेप
करके सङक पर फेंक दी, ""गाजियाबाद
में चार पाँच साल की बच्ची जिसे
मामा कहती उसी ने तीन और
लङकों के साथ रेप किया और प्राईवेट
पार्ट्स में प्लास्टिक की बोतल ठूँसकर
गला घोंट दिया तहखाने में
"""मोहनलाल गंज में लहू का पैशाचिक
वीभत्स कांड देखने के बाद,, कैसे कोई
चाहेगा कि उसके घर
बेटी पैदा हो??????????
स्त्रियों का व्यापार आज
भी जारी है और लाख उपाय करने
कानून बनाने के बाद भी प्रतिवर्ष
लगभग एक लाख बच्चे घरों से
'विद्यालयों से, अस्पतालों से,
बाजारों, मेलों, हाटों, मन्दिरों,
दरगाहों, जुलूसों, बसों, रेलगाङियों,
आदि से चोरी या अपहृत हो जाते हैं
या खो जाते हैं, 'जिनमें से बावन
प्रतिशत से भी अधिक केवल
लङकियाँ ही होतीं हैं और कुल
बच्चों में से बयालीस प्रतिशत
बच्चों का कभी कोई सुराग
नहीं लगता! एक सनसनीखेज खबर के
मुताबिक कुछ गाँव जहाँ हाईवे है और
टूरिस्ट्स आते जाते हैं वहाँ नगर
महानगर की बजाय छोटे
कसबों गाँवों में, कुटीर उद्योग
की तरह वेश्यावृत्ति की जाती पाई
गयी जो नाबालिग लङकियाँ अपहृत
करने वाले अपराधियों से
लङकियाँ खरीद कर
दवाईयाँ हार्मोन्स दे देकर
उनको जल्दी जवान बनाते हैं और, आस
पास पब होटल डाकबंगलों ढाबों पर
ठहरने वाले यात्रियों को सूचना और
बुलावा देकर ग्राहक फँसाकर लाने
वाले दलालों के माध्यम से चलाये जाते
हैं, कुछ कुटीर वेश्यालय तो सामाजिक
संस्था, या दिन में कोई भला कार्य
करने वाली कार्यकारिणी जैसे दिखते
हैं । लङकियाँ विदेश भी भेजी और
बेची जाती हैं जिसका माध्यम
समुद्रयात्रा हवाई यात्रा और
नेपाल बांगलादेश पाकिस्तान जैसे
पङौसी देशों के माध्यम से
भी होता है। सवाल उठता है संभव
कैसे है?? क्या पुलिस कस्टम
कोस्टगार्ड ट्रैफिक कंट्रोल और
जासूसी संस्थाओं को भनक
भी नहीं लगती होगी??
यहाँ बिना सुबूत के कुछ कहना मुश्किल
है किंतु अनेक मामलों में, विधायक,
सांसद, पुलिस ऑफिसर व्यापारी,
पत्रकार, वकील, जज, बङे
अधिकारी तक, कालगर्ल के साथ
किसी होटल या बंगले पब या बार में
रँगे हाथ पकङे गये । चाहे ऐसे
लोगों की संख्या बेहद कम हो किंतु
इतना घोषित करने के लिये काफी है
कि कहीं न कहीं हर विभाग में कुछ
काली भेङें बनकर बैठे भेङिये हैं और
सूचनाये सुविधायें ऐसे भेङ
रूपी भेङियों से
ही अपराधियों को मिलती है । जब
तक कोई बङा खुलासा जनता,
मीडिया, या कोई विदेशी संचार
माध्यम या ईमानदार
कर्मचारी नहीं कर देता तब तक ये सब
जघन्य अपराध चर्चा तक में नहीं आने
दिये जाते, 'एन जी चलाने के दौरान
एक बच्ची डेढ़ साल
की रोती हुयी मिली कदाचित कोई
बुरी नीयत से लाया और उसी जगह से
महिला संगठन की टोली गुजरती देख
छोङ भागा, तमाम विज्ञापन और
तलाश के बाद असली माँ बाप
नहीं मिले, बच्ची किसी संपन्न
परिवार की थी, जो कार स्कूटर
की आवाज पर चौंकर
कहती ""पापा ""और कुछ
बोलना नहीं जानती थी । अब वह
बच्ची एक परोपकारी निम्न मध्यम
वर्गीय परिवार में इंटरमीडियेट में
पढ़ रही है । ऐसे कई केस सामने आये
"निठारी कांड लोग भूले
नहीं जहाँ चालीस से अधिक बच्चों के
कंकाल नाले में मिले, और अमीना कांड
जब एक एयर होस्टेस ने
बिकी हुयी लङकी को बूढ़े शेख के चंगुल
से छुङाया जिसे माँ बाप ने निकाह के
नाम पर बेच दिया था ।
बंगाल बिहार नेपाल और
पहाङी क्षेत्रों की अनेक
युवतियाँ विवाह के नाम पर वधू मूल्य
चुकाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश
हरियाणा और राजस्थान के रेतीले
इलाकों के उन
युवको बूढ़ों प्रोढ़ों को बेच
दी जाती है पत्नी के रूप में बंधुआ
मजदूर बनाकर रखने
को जिनकी शादी परिवार
की खराब छवि, लङके
की कुरूपता या विकलांगता, परिवार
में हुये अंतर्जातीय अंतर्धार्मिक
विवाह या लङके की शराब हिंसा और
आपराधिक आदतों या परिवार
की मोटी दहेजी रकम की आशा में
बढ़ती गयी आयु या पत्नी मरने पर
बच्चों की वजह से
हो ही नहीं पाती ।
ये
बिकी हुयी स्त्रियाँ पत्नी कहलातीं
तो हैं किंतु इनका सामाजिक सम्मान
कुछ भी नहीं रहता और मोल की बहू
का खिताब मुँह दबा दबाकर चाहे जब
सुना दिया जाता है । मायका बहुत
दूर और किराया बहुत अधिक होने
की वजह से न बाप भाई आ पाते हैं न
मोल की बहू कभी मायके
भेजी जाती है, यदा कदा दशक
दो दशक में कभी मुलाकात हो जाये
तो हो जाये,, किंतु इन मोल की बहुओं
की हालत बंधुआ मजदूर से भी बदतर
रहती है जिनको रात में बिस्तर पर
रौंदा जाता है दिन भर पशुओं
की कुट्टी चारा सानी पानी गोबर
उपले और घर की साफ सफाई के बाद
रसोई और बचा समय खेत पर
लगा दिया जाता है उस पर
बङा क्या छोटा क्या सब रौब झाङते
हैं । बोली और खानपान अलग होने से
सामाजिक उत्सवों पर ऐसी मोल
की बहुयें पृथक छोङ दी जाती है
उनको न
रसमों की जानकारी होती है न
गाना बजाना मेल का कि कोई
गा गवा सके,, ।
यातना दायी अकेलापन झेलने
को अभिशप्त ये मोल की बहुयें भयंकर
शारीरिक मारपीट और मानसिक
तानों टोंचनों का शिकार रहतीं हैं ।
न कोई घर की संपत्ति के मामले पर
विश्वास करता है न ही इनकी कोई
कीमत समझी जाती है एक काम काज
करने वाली कठपुतली से अधिक ।एक
लँगङ नामक पङौसी की पत्नी को बुआ
से सीखी रेसिपी पर पूरन
पोली "बखीर "और दही बङे भेज दिये
तो रो पङी, बोली काकी जी, कई
साल बाद खाई, यहाँ कोई
अपनी पसंद का खाना बनाने
ही नहीं देता ।ये मोल की बहुये
बहुतायत कैदी की ही तरह तरह
रहतीं है जिनके बाजार मेला मंदिर
समारोह में नहीं ले जाया जाता कई
साल तक, 'बाद में इनके बच्चे
भी दोयम दर्जे के ही समझे जाते है ।
बेचने खरीदने का काम 'दलाल पब
होटल और सरकस के लिये भी करते हैं
कई बार तो बच्चियाँ ही सब कुछ भूल
चुकी होतीं है और अपने खरीददार
या अपहर्ता को ही माता पिता
समझने लगती हैं पीढ़ी दर
पीढ़ी धँसी तो धँसी, फिर
दुबारा समाज की मुख्यधारा में
वापसी नहीं ।पता लग जाने पर
भी कदाचित ही कोई परिवार
हो जिसने स्वीकार कर
लिया हो कि "अमुक बदनाम पेशेवर
वेश्या उसकी बीस साल पहले अपहृत
हो गयी बहिन या बेटी है ",,और यह
सच सब बिक चुकीं लङकियाँ जान समझ
लेतीं हैं इसलिये जब एक बार फँस
जातीं हैं तब कीचङ से बाहर आने
की कोशिश करना ही बंद कर देतीं हैं
।सामने कोई परिजन पङ जाये
तो पहचानने से बचकर निकल जातीं हैं
।ये अपराध एक समाज स्वीकृत
अपराध है और तमाम कोशिशों के बाद
भी वेश्यावृत्ति और
स्त्रियों को तवायफ बनाकर
नचवाना बंद नहीं हो पा रहा है,
'अभी हाल में ही एक पुलिस ऑफिसर
जेल के भीतर मातहतों सहित
नर्तकियों के साथ नाचते नजर आये पूरे
हरियाणा और पश्चिमी उप्र में
वैरायटी शो कला के नाम पर राम
लीला रास लीला और तमाम जुलूसों में
नर्तकियाँ बुलवा कर
नचवायीं जातीं है, एक नेता तक के
प्रचार में कई बार
नर्तकियाँ दर्शकों को बाँधे रखने
को नचवायीं गयीं जैसा बागपत में एक
कथित किसान नेता के मंच पर हुआ
पाया गया,, ।
दहेज और घरेलू हिंसा
एक ही सिक्के के दो पहलू और सबसे
बङा सामाजिक संगठित अपराध जिसे
मान्यता मिली हुयी है ।लोग मजे से
एक कम दहेज देने वाले लङकी के
पिता की होङ में
नीलामी की बोली की तरह
बढ़चढ़कर अपनी बेटी बहिन
की शादी के लिये उसी परिवार
को लालच देते हैं कि आप को वह गरीब
क्या देगा मैं इतने लाख दूँगा,
और यह बढ़िया मौका होता है लङके
के परिवार के पास वह खुद हर आने
वाले लङकी वाले को बताता है
"फलानानगर वाले तो, 'पंद्रह लाख
नकद और पूरा सामान घर लाकर
कंपनी का देने को कह गये हैं, 'परंतु मेरे
बच्चे को लङकी पसंद नहीं आयी, 'अब
लङकी वाला नीलामी की बोली की
तरह बोली बढ़ाता है और
लङकी की दस बीस विशेषतायें
भी सोच सोचकर बताता है, 'तब
भी इतने जल्दी डील फाईनल
नहीं होगी, 'अभी और
प्रतीक्षा की और करवायी जायेगी,
लङकी वाले को फँसाकर देखने दिखाने
का कार्यक्रम मुफ्त की दावत सैर
सपाटा आवभगत और नगर पर्यटन रे
लिये तय करके नये लङकी वाले को आने
पर बताया जायेगा,,
""देखो जी अमुकशहर
वालों की लङकी भी पसंद है और दहेज
बीस लाख दे रहे है ऊपर से
शादी भी हमारे ही शहर आकर होटल
से करने को तैयार है बस
कुंडली नहीं मिल रही,अब आप
अपना टोटल ""एस्टीमेट ""बताओ,,,,,
ये सब कोई काल्पनिक बबात नहीं है,
हम में से अधिकतर भुक्तभोगी है बहिन
बेटी भतीजी या अपनी स्वयं
की शादी के अनुभव से । ये दहेज एक
बार की डील फिनिश एंड फाईनल
नहीं है ',भारतीय लङके वाले
किसी माफिया गिरोह के रेंसम
हफ्ता या रंगदारी की तरह
ब्लैकमेलिंग का सिलसिला बनाते है
सारा जीवन, ।लङकी की शादी के
चौथे दिन फिर
पहली होली पहली राखी पहली तीज
पहली करवा चौथ पहला गर्भ पर
गोदभराई पहली संतान का छठ छूछक
दसटोन, और गौना, वर विदाई,
समधी भेंट,, ये तो दुबारा एक और
शादी बराबर ही बैठ जाते हैं ।
फिर क्रमशः जितनी बार
भी लङकी को लिवाने जाओ सब
ससुरालियों को पैसे रुपये मिठाई कपङे
लेकर जाओ, जब लङकी को लिवाने
ससुराल वाले आयें तब लङके और उसके
परिवार तथा लङकी और उसके
बच्चों को कपङे रुपया सामान धातुयें
दो ।मतलब आये
तो क्या क्या क्या लाये मायके
वाले?? और जब बहू पत्नी भाभी के
मायके हम जायें तो क्या क्या दोगे??
इतना ही नहीं लङकी के ससुराल में
चाहे देवर ननद
की शादी हो या गृहप्रवेश नये मकान
का चाहे दादा ससुर और सास बुआ
की मृत्यु तब भी रस्म पगङी और
त्रयोदशी ग्यारवीं पर शुद्धि वस्त्र
रुपये हर बहू के मायके से जरूर आने
चाहिये,, यही नही कथा रामायण
पाठ भागवत या कोई धार्मिक
अनुष्ठान करवाया जाये तब भी बहू
पत्नी के मायके से
रुपया कपङा सामान अनाज
आना ही चाहिये ।जितना भी दे
दो मना महीं करेगे हक जो है असीम
अनंत सब कुछ दे दो भिखारी हो जाओ
तब भी परवाह किसे है """भई
जो दिया अपनी बिटिया बहिना को
हमें क्या?????? दोगे
तो सुखी भी तो तुम्हारी ही लङकी
रहेगी!!!!! मतलब साफ अगर नहीं दोगे
तो लङकी सुखी नहीं रहेगी, और ये
धमकी नहीं क्रूर सत्य है कि, अकसर
उन परिवारों की बहू
पत्नी भाभी पर भीषण क्रूर
मानसिक, शारीरिक और आर्थिक
अत्याचार किये जाते हैं जिनके मायके
से ""निरंतर धन दान का अविरल
प्रवाह लङकी के ससुराल की ओर
नहीं बहता रहता ""।
बात बात पर उसको जलील करके ताने
दिये जाते हैं और अहसास
कराया जाता है कि यह सब उत्पीङन
इसीलिये किया जा रहा है
क्योंकि उसका बाप भाई दुनियाँ के
सबसे गये गुजरे घृणित जीव है
जिनकी कोई औकात नहीं, इसलिये तू
होश में रह ये तेरे बाप का घर नहीं है
"बाप की औकात
होती तो सहीं क्यों आती किसी और
बङे घर में ना चली जाती, 'रही बात
माँगने की हम ऐरे गैरे नहीं जो माँगते
फिरें जिसको ज़मीर और कर्तव्य
का जरा भी अहसास है वह
बिना माँगे ही दे देते है तेरा बाप
तेरा भाई घोर नीच प्राणी हैं
जो कुछ नहीं देते और जो देते भी है वह
इतना नहीं कि तुझे इस घर में सम्मान
मिले """'"'"अब जिसके मायके में दम न
हो पैसा रुपया कपङे से कवच बनाने
की उसकी बिटिया की पीट पेट सिर
कमर तो लात जूते लाठी घूँसे और
दीवारों की मार से रक्त रंजित
होकर लाल नीले रहेगे ही,
बिना रीढ़ की स्त्री गिरकर
रहेगी ही नीचे और नीचे, ।'गजब
तो इस बात का है कि इस अत्याचार
अनाचार में एक कम रुपया लाने
वाली बहू पर ज्यादा कुपया लाने
वाली बहू भी हिंसक मानसिक
उत्पीङन ताने व्यंग्य छींटाकसी और
नीचा दिखाने पर लगी रहती है और
कम लाने वाली भी दूध
की धुली नहीं वह भी हर तरह से
कोशिश करती है कि उस धनवान
की जाई को फूहङ निकम्मी गुणविहीन
घोषित करदें, 'यही नहीं जिस सास ने
बहू रूप में तमाम दुख झेले होते हैं वह
भी अपनी बहू आते ही बहुतायत
मामलों में षडयंत्रकारी और शोषक
सामंत बनाम बँधुआ मजदूर
का सा अन्यायी व्यवहार करती है
',लङकी का परिवीर जब भी आये
दो फीट नीची गरदन के साथ, और
मिलने मिलाने का टैक्स चुकाये तब
लङकी से मिल सकता है । अनेक
मामलों में तो मायके जाना और मायके
वालों का आना दोनों ही बंद कर
दिये जाते है
",,लङकी की सलामती चाहते
हो तो दिल पर पत्थर रख कर सब कुछ
झेलो । जिस प्यार मुहब्बत
सुखी परिवार के सपने देखकर
लङकी मंगलसूत्र पहनती है वे बहुत कम
ही भाग्यवान लङकियों के साकार
हो पाते है ।
इस सबके बाद भी दहेज हत्यायें आज
भी हो रहीं है औऱ अपराधी अकसर
वकीलों की दलीलों और
ताऱीखों के जाल में पीङिता के मायके
वालों को उलझा कर ज़मानत पर छूट
जाते हैं और बहुत कम मामलों में
किसी को पूरी सजा और कम समय में
सही सजा मिल पाती है, अपील पर
अपील लङता बेटी बहिन वाला थक
जाता है किंतु पहले ही धन लूट खसोंट
कर भर चुका लङके वाला, समाज
को बुरा नहीं लगता अकसर दहेज
हत्यारोपी लङकों की भी शादी
फटाफट दूसरी किसी लङकी से
हो जाती है और अकसर दूसरा विवाह
भी माल असबाब से लङके का घर भर
देता है ।कभी तो समाज की इस
मानसिकता पर अचंभा होता है
कि जिस लङके के विवाह से तीन तीन
या चार तक भी पत्नियाँ रहस्यमय
कारणों से मर गयीं और
किसी पीङिता के पिता ने
मुकदमा ठोक रखा है फिर
भी लङकी वाला उस दुहेजू तिहेजू
की जाँच परख किये
बिना ही लङकी उस घर पटक कर
निश्चिंत हो जाते है, 'सबीना का एक
मामला आया हमारे सामने जिसमें
उसी के पङौस की लङकी मर गयी और
एक औऱ लङकी को तलाक दे कर
बेटी मायके वालों पर फेंक दी जिस
आदमी ने उसीसे सबीना के पिता ने
शादी करवा दी ये बात
सबीना को निकाह के बाद
पता चली और जब उसका भी आर्थिक
शोषण उत्पीङन होने लगा तब, एक
ही रास्ता बचा लङकियाँ लेकर
मायके आ पङना, और तब जब कई साल
तक उस
आदमी की पाँचवी शादी नहीं हुई तब
वह, अपनी बेटियाँ भी हल्ला गुल्ला
मचाकर ले गया, लेकिन उससे
पिछली बीबी की बेटी फिर
भी नहीं ले गया ।
हमारी बहिन
की सखी "भारती जुमनानी "की क्रूर
हत्या कर
दी गयी थी उसकी शिकायत पर
पहली बार माँ चाचा ने
समझा बुझाकर ससुराल भेज दिया, वह
कहती रही चाचा मुझे वे लोग मार
देगे, वह एक
सिन्धी शरणार्थी की बेटी थी
जिसका पिता बिछुङ
गया था चाचा और माँ ने भरपूर दहेज
भोपाल में ससुर डॉक्टर था,
पढ़ी लिखी बेहद सुंदर लङकी जिसके
गुरदे फट गये थे कि उसे "खल बट्टे
की लोहे की मूसली से पीटा गया और
जहर का इंजेक्शन देकर
जला दिया गया 'उसने
हट्टी कट्टी होने के कारण ससुर देवर
पति तीनों से जमकर संघर्ष किया और
जलते समय ससुर का हाथ पकङ
लिया ""अस्पताल में बयान देकर मर
गयी ""सत्ते चाचा!! मैंने कहा था न
कि वे लोग मुझे मार डालेंगे, ""।
वह लङकी हमेशा हमें आँखों में झाँककर
पूछती है "दीदी! वे लोग इतना मारते
हैं फिर भी सब लोग मुझे
वहीं क्यों भेजना चाहते है?
हमारी तयेरी जेठानी की लङकी, एक
और जेठानी की बेटी की ननद
दोनों को एक ही गाँव के
दो परिवारों ने अलग अलग समय पर
मार डाला और लंबी लङाई कई साल
चलने के बाद एक को सजा हुयी,
'दूसरा बरी और
शादी तो दोनों की हो गयी, 'जेल
जाने से पहले भरा पूरा परिवार
हो गया ', सजा किसे मिली?????
ये उत्पीङन केवल पुरुष करता है
ऐसा नहीं है, 'एक मामले में
कुँवारी बङी आयु की ननदों ने
अपना दहेज जुटाने के लिये जुल्म किये
छोटे भाई की पत्नी पर तो एक
मामले में सास
को पङी थी बङी पूँजी बङा घर
बङा आदमी बनने की ललक!!!! ये औरतें
अगर न चाहें ससुराल की तो दहेज
माँगना भी एक चौथाई मामलों में कम
हो सकता है, 'क्योंकि सास ननद
देवरानी जेठानी ननद के ससुराल बुआ
सास तक के उपहार दहेज में शामिल
रहते हैं '। और अगर सास ननद
जेठानी देवरानी बुआ सास
मामी सास मौसी सास कंपटीशन न
करें और रोकें हर दहेज से संबद्ध
उत्पीङन को तब तो निश्चित ही ऐसे
अपराध आधे तक कम हो जायेंगे, मतलब
ये "कहावत सबको याद इसीलिये
आती है स्त्री ही स्त्री की सौतन
होती है!!!!
स्त्रियों पर एक और भयंकर संगठित
सामाजिक अपराध जारी है और वह है
कन्या भ्रूण हत्या ':।
ये कन्या भ्रूण हत्या "अनेक कारणों से
होती है, जिनमें दहेज प्रथा,
बलात्कार और छेङछाङ का बढ़ता डर,
लङकी ससुराल चली जायेगी सब कुछ
लेतर तो वंश पुश्तैनी जायदाद और
गोत्र नाम पिता की संपत्ति सब
खत्म हो जायेगे, फिर कौन आगे याद
रखेगा किस "फलनवा "का गाँव
कसबा कौन सा था, ''? शास्त्रोक्त
विधि विधान से पिंड दान श्राद्ध
कर्म तेरहवीं और दाहसंस्कार के बाद
बरसों तक हर पितर पक्ष में
पानी खाना कौन करेगा?
लङकी की ससुराल में कैसे जाकर रहेगे?
कौन बुढ़ापे में रोटी पानी दवाई
देगा गू मूत उठायेगा? खानदान
की ताकत बेटियाँ पैदा होने से
कमजोर होती जाती है और बेटे
पैदा होने से बढ़ती जाती है? फिर ये
मकान ये सामान किसी गैर जात
मजहब वाले को बेचकर दामाद
तो अपने पिता का ही नाम
चलायेगा हमारा क्या? पूथ नामक
नर्क से मोक्ष कौन दिलायेगा?
बेटी के घर रहना खाना पाप है?
खेती 'दुकानरात बेरात बाजार
दवाई, पिता के मान अपमान
कर्जों के बदले बेटी कैसे करेगी?????
और माने चाहे न माने कही बङी हद
तक ये सब चिंतायें ही कन्या भ्रूण
हत्या की बङी वजह है । पहले जमाने
में जब सोनो ग्राफी और अल्ट्रासाउंड
तकनीक नहीं थे तब कन्या जन्मने के
बाद कुछ ही लोग "नाक ऊँची "रखने
को लङकी मारते थे,, वह तरीका खाई
नदी में फेंकना या तंबाकू गले में धरकर
खाट के पाये से
गला दबाना होता था "बाकायदा "
बिटमारो बुढ़ियाँ,, नियुक्त
रहतीं किंतु अघोषित गुप्त ।आज
बङी संख्या में
यूपी हरियाणा राजस्थान में हर
आठवीं दसवीं स्त्री की एक
या दो कन्या गर्भ में ही मार
डालीं जाती हैं । और ऐसा हिंदू सबसे
अधिक करते हैं जो खुद को ""दुर्गापूजक
कहकर कन्यायें पूजते है?? घोर
आश्चर्य!!!
ये गर्भपात चौथे महीने के बाद
होता है जब लङकी पूरी बनकर पेट में
साफ साफ दिखने लगती है और
जो तकनीक पेट के भीतर
की गङबङी दूर करके जाँच कर निरोग
रहने के लिये बनायी गयी थी शिशु
रक्षा के लिये, 'आज वही तकनीक
हत्यारे ""रेडियोलॉजिस्ट,,
हत्यारी नर्सों दाईयों डॉक्टरों और
कन्या न चाहने वाले हत्यारे
माता पिता के हाथों कंस की तलवार
बन कर रह गयी है!!!!! ये गर्भपात
माँ के गर्भ से
जबरदस्ती बच्चा खींचकर निकालने
की तकनीक अथवा गर्भ में नश्तर
डालकर काट कतर कर बच्चे के टुकङे
टुकङे करके निकाल कर गर्भ पात
किया जाता है ',जबकि हर
प्रसूति केंद्र और अल्ट्रा साऊंड सेंटर
पर लिखा रहता है ""भ्रूण
हत्या अपराध है, यहाँ लिंग की जाँच
नहीं की जाती, 'तो फिर ये
कन्या वध होता कहाँ है? कई गाँव ऐसे
हैं जहाँ गर्भपात का कार्य सफाई
करमी रही दाईयाँ करतीं है, परंतु वे
कन्या होने की जाँच नहीं कर सकती,
'वे केवल अनचाहा गर्भ गिरातीं है
जिसमें से एक तकनीक है पेट पर
दिया धरकर घङा रख देना जिससे
गर्भ टूट मरोङ जाये,
यातनादायी पीङा से ',
दूसरी ""सिटेंगल "नाम
की लकङी का टुकङा जो गर्भिणी के
सर्विक्स का मुँह जबरन खोलने के लिये
फँसा दी जाती है लकङी फूलकर कई
गुनी होकर सर्विक्स का मुँह खोलकर
रक्तस्राव जारी कर देती है ",।
ये सब यातनायें, 'उन
स्त्रियों को सहनी पङती हैं जो गाँव
कसबों में रहतीं है । नगरों तक
नहीं जाने दी जाती । किंतु ये
अपराध कोई गरीब अनपढ़ और
आपराधिक पृष्ठभूमि के खराब कहे जाने
वाले लोग नहीं करते ।ये सफेद
वस्त्रों में सजे धजे
फरिश्तों का अपराध है, । डॉक्टर
नर्स रेडियोलॉजिस्ट और माँ बाप
का सामूहिक अपराध है कन्या वध ।
और एक प्रसूति केन्द्र पर साल भर में
कितनी हत्यायें होती होगी??
सोचकर झुरझुरी छूट जाती है ।
हालांकि कानून की सख्ती से
कमी आयी है । किंतु अब अधिक
चालाकी से मामले निबटाये जाते है ।
पहले जो काम पाँच सौ में
होता था अब पाँच हजार से दस
हजार रुपये तक फीस वसूली जाती है
और अल्ट्रासाउंड करते वक्त परिवार
के किसी सदस्य को बिठाकर कोड
वर्ड कह दिया जाता है, '।
रेडियोलॉजिस्ट अपराध मुक्त समझ
लेता है खुद को क्योंकि इसका मतलब
ये तो नहीं कि वह कह रहा है जाओ
मार डालो? नर्स और
गायनोकॉलोजिस्ट कहती है गर्भ से
माँ की जान को खतरा था और हम
क्या जाने माँ बाप जाने, हम तो केस
सब्जेक्ट समझ कर काम करते हैं ।सोचने
और शर्मिंदा होने का वक्त
किसी डॉक्टर नर्स रेडियोलॉजिस्ट
और माँ बाप के पास नहीं । माँ सोच
लेती है मेरे जैसी नरक जिंदगी से
अच्छा तू अभी मर जा । और वर्तमान
भारत के स्त्री पर भीषण अत्याचार
को देखकर कभी न कभी हर
माँ को लगता है कि काश उसके
बेटी होती ही नहीं या पेट में
ही मार दिया होता!!!!!!!!!!
छेङछाङ, और रैगिंग, के नाम पर यौन
शोषण यौन हमले, एक और भयंकर रूप
लेता जा रहा संगठित सामाजिक
अपराध है जिसको कोई भी लङके
का पिता और यहाँ तक
कि माता भी अपराध मानते
ही नहीं 'जबकि इसी अगस्त में
ही हरियाणा में दो बहिनों ने रोज
छेङछाङ पीछा करने और धमकियाँ देने
से डरकर "आत्महत्या कर ली "।
सुसाईड नोट में उस मेधावी छात्रा ने
जो 98%अंकों से हाई स्कूल कर
चुकी थी, लिखा है कि ऐसे अपराध
रोको ताकि कोई और लङकी न मरे
मेरी तरह, '। मेरठ में आज
मीडिया जिस लङकी को शाबासी दे
रहा था कार सवार छेङछाङ करने
वालों से जूझकर बूढ़े पिता को पिटने
से बचाने के लिये,
वही मीडिया फोटो खींचने में मगन
था तब भी और तब भी जब विगत गणेश
उत्सव पर, एक टीनेज लङकी को लङके
ग्रुप बनाकर बीच में लेकर बुरी तरह
नोंच भँभोङ रहे थे ठीक सीने पर!!!!!
वहाँ पुलिस और बाकी भले भद्र लोग
चुपचाप तमाशा देख रहे थे? लखनऊ
हो या कानपुर गाजियाबाद
हो या मेरठ यूपी बिहार
हरियाणा मध्यप्रदेश महाराष्ट्र
कोई भी प्रांत हो "बस में
चढ़ती लङकी की छातियाँ नोंच लेना,
गाल पर सिर हाथ टिका देना, ऊँघने
का बहाना करके बगल की लङकी पर
लुङक जाना, पल्लू या दुपट्टा खींच
देना, भीङ में से निकलते समय जानबूझ
कर अपनी जाँघें हाथ कमर लङकियों से
घिसकर निकलना?प्रायवेट पार्ट छू
देना चिकोट लेना ?गंदे इशारे करना,
बीच की उंगली दिखाना, आँख
मिचकाना, हवाई चुंबन, गंदे गीत या डायलॉग बोलना सीटी मारना,फिकरे कसना,
चिट्ठी फेंक मारना, गंदी फिल्में और एसएम एस या एम एम एस लङकी का नंबर
खोजकर उसको भेज देना, बार बार फोन करके तंग करना, क्लास स्कूल या मुहल्ले
में उससे अफेयर की बदनामी करना, प्रेम होट गया दावा करना और गर्ल फ्रैंड
बनने को धमकाना, मेले बाजार अस्पताल स्कूल बस बस ट्रेन मेट्रो ऑटो
रिक्शा रेलगाङी, ट्र्क, कार कोई भी जगह हो, लङकी देखी और जुनून सवार
पागलों की तरह पेंट पाजामे के जोङ खुजलाने लगना, घूर घूर कर लगातार साशय
बुरे नजर इरादे से घूरना, ग्रुप बनाकर राह रोक लेना या ठहाके लगाकर मजाक
उङाना, फोटो खींच लेना, वीडियो बना लेना "पब्लिक टॉयलेट में गंदी बातें
लिखना अश्लील चित्र बनाना ""लङकियों के नाम गंदे संदेश सिंबॉल इमारतों
दीवारों पर लिखना "पेशाब करने जानबूझ कर सङक किनारे लङकी आती देखकर खङे
हो जाना और मुङ मुङ कर दोस्तों से बतियाना!!!!!!!!! क्या है ये सब?पागलों
के देश में रहते हैं हम सब? वीभत्स रूप से कामवासना से भरे घिनौने जीवों
के बीच
सेक्स का ऐसा वीभत्स रूप???
पाँच हजार साल पुरानी सभ्यता का दावा करने वालों के देश में आज तक
पुरुषों को "प्रेम करने लङकी को रिझाने और विवाह करके परिवार बसाने सेक्स
और सामाजिक समरसता स्त्रियों के प्राणी मानव होने के हक और स्वतंत्रता के
तौर तरीके लायक भी सलीका तमीज सभ्यता धीरज संयम नहीं!!!
पता है आज हर स्त्री मन ही मन सोचती है काश मैं भारत में न हुयी होती
या लङकी न होती

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mobile- 9358874117

Saturday, 23 August 2014

सुधा राजे का लेख - हिंसा के बीज और स्त्री।

प्रकृति ने नर और मादा बनाये
जोङा बनाकर प्रजनन और धरती पर
जीव बरकरार रखने और सहजीवन में
परस्पर सहयोगी प्रेमी समर्थक
सहचर होकर संतानों को पालने के
लिये ',
किंतु
भारतीय समाज में बदलते बदलते
"हैबिट सोशल प्रैक्टिस "ऐसे बदल
गयी कि
""सेक्स पार्टनर और
सहजीवी जोङा होने की बजाय "पुरुष
"पति परमेश्वर दुनियावी खुदा और
''भर्ता कर्ता पति देव हो गया!!!!!!!
जामाता?
बेटी का सहजीवन साथी होकर सास
ससुर के पुत्रवत होकर सेवा सम्मान
करने की बजाय
"जामाता दशम ग्रह "
होकर
ससुर साले साली '
शब्द गाली हो गये!!!!!
रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं
',और तेरी नानी मरी ''कहने
का रिवाज़ ',
इसी तरह की लपेटकर वाचिक
हिंसा ही तो है ।
कोई भी परस्त्री को "माताजी "
कह देगा
किंतु परपुरुष को ""मेरे बाप
"तभी कहेगा जब वह
आत्महीनता का बोध कर
चुका होगा ।
स्त्री और पुरुष
लाईफ पार्टनर सहजीवी जीवन
साथी न होकर
""कन्यादान लेने वाला महान पुरुष ""
और
लङकी
""पति स्वामी मालिक
की '''दासी सेविका और
परिचारिका!!!!
गृहकिंकिरी???
भारतीय स्त्री पुरुय़ यौवन
का जोङा नहीं बनाते है ',
बल्कि ""मिलने वाले दाम रंग
की गोराई बाप का रुतबा और जीवन
भर अविरल धन दोहन की उम्मीद के
आधार पर लङके वाले चुनते है कि उन
छाँटी गयी डेढ़ लङकियों में से किससे
"""मेरा बेटा विवाह सेक्स प्रेम
करेगा ""!!!!!
सीधे हाथ से नहीं तो उलटे हाथ से
पकङ कर बोल दें कुल मिलाकर,
लङके की कीमत चुकायी जाती है
उसको लङकी को घर में लाकर रखने के
बदले जो जो सामान धन चाहिये यह
उसका हक है ।और लङकी के सब के सब
नाते दार लङके को देगें!!!! और लङके
वाले मजे से सब गङप करते जाते है
आखिर लौण्डा पैदा करने का महान
काम जो किया है!!!
भारतीय पुरुष स्त्री जोङे से सेक्स
नहीं करते ',या यूँ कहें कि उनकी सोच
है ऐसी कि, बहुत प्रेम का दावा करने
वाले जोङे तक में, पुरुष की सोच
रहती है कि वह स्त्री को भोगता है
",
और ये सब वैसे ही ऐशो आराम के
सामान में शामिल है जैसे स्कॉच बीयर
वाईन वोदका शैम्पेन
टकीला व्हिस्की मार्टिनी या ब्लडी मैरी!!!
भारतीय जोङे में गृहस्थी के काम काज
करना मतलब बेरोजगार बेकमाऊ और
निठल्ली स्त्री है । क्योंकि उस
स्त्री को अपनी मेहनत के बदले "कोई
पैसे नहीं देता!!! जबकि पुरुष दूसरों के
काम करता है और हर काम के पैसे
लेता है इसलिये वह घर के काम
नहीं करता क्योंकि वह कमाता है और
स्त्री को पैसा खरचने का हक नहीं है
बिना हिसाब दिसे क्योंकि वह
करती ही क्या है पैसे कमाने को!!!
भारतीय जोङा संतान
पैदा नहीं करना चाहता, बल्कि केवल
नर
लङका ही पैदा करना स्त्री की जिम्मेदारी है,
चाहे बार बार लङकियाँ जान से मार
डालना पङे लङकों का जोङा होने तक
उससे संताने
पैदा करवामा पति ही नहीं ससुरालियों का मामला है
और खूब बोलते हैं इस मामले में दूर पास
के सब नाते रिश्तेदार
ही नहीं पङौसी मित्र तक!!
मतलब संतान
लङका ही होनी चाहिये और ये केवल
जोङे के स्त्री पुरुष
का न्जी मामला नहीं बीस साल पहले
ससुराल जा बसी ननद और साठ साल
पहले घर से निकल गयी फुआसास
का भी मामला है घर के नौकरों और
नेगियों तक का मामला है!!!
©®सुधा राजे।

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
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Friday, 22 August 2014

स्त्री::--"दीवारों के भीतर चीख"" सुधा राजे का लेख ।

स्त्री :::दीवारों के भीतर चीख
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
लेख :सुधा राजे
"""""''''
रुबिया, सबीना 'चाँदो 'लक्ष्मी अरुणा, गीता, क्रिस्टी, मार्था """"""केवल
नाम बदलते रहते हैं ।नहीं बदलती तो 'दीवारों के भीतर घुटी घुटी चीखें,
सिसकती रातें दुखते दिन और बेबस शामें । विश्व की सर्वाधिक सहनशील
स्त्रियाँ कहीं रहतीं हैं तो एशिया में और उससे भी सबसे अधिक भारत
प्रायद्वीप के सात पङौसियों में । ससुराल तो हिंसक परिजनों के लिये
कुख्यात है ही गौर से देखें तो हिंसा मायके में ही माँ की कोख में आने से
भी पहले से प्रारंभ हो जाती है, जब "बेटी "अवांछित जीव हो जाती है । पहली
बेटी जैसे तैसे स्वीकार कर भी ली जाती है किंतु दूसरी बेटी की तो कल्पना
भी कोई बङे से बङा उदारवादी परिवार करना ही नहीं चाहता । जब ये
अल्ट्रासाउंड और सोनो ग्राफी की सुविधायें नहीं थी तब की आँखों देखी याद
है बचपन की कि, एक माँ को "भिण्ड "मप्र से अपनी सास को धकेलकर प्रसव के
कुछ ही घण्टे उपरान्त, घर से भागते हुये बस पकङ कर पति की पोस्टिंग जहाँ
थी "सेंवढ़ा "वहाँ जाना पङा । क्योंकि "बिटमरौ बऊ "मतलब बेटियाँ मारने
वाली दाई तंबाकू बनाकर नवजात कन्या के गले में रखकर खटिया के पाये से
गरदन दबाने वाली थी। अब ये "बिटमारो "जगह- जगह खुले प्रायवेट सरकारी
प्रसूति केन्द्र हैं । जैसे तैसे जन्म ले चुकी बेटियों के पालन पोषण में
भयंकर भेदभाव रहता है ।जो नजर नहीं आता उनको जो करते हैं सिर्फ वे समझ
सकते हैं जो 'मानव "होने का अर्थ जानते हैं । गर्भाधान के लिये तमाम टोने
टोटके पूजा इबादत धागे और मन्नते करके जब, मन नहीं भरता तब, शै बदलने की
दवाई के नाम पर गांव कसबे नगर महानगर सक्रिय 'नीम हकीम से पुङिया लाकर
पिलायी जाती है, जो भी स्त्री ऐसा करने से आनाकानी करे उसकी शामत, फिर भी
बेटी हो गयी तो एक आँकङा है कि केवल दिल्ली में मिले तेरह लावारिस
नवजातों में से बारह 'लङकियाँ है "जिस माँ बाप को ईश्वर की समता दी जाती
है वही किसी अवांछित विषैले कीङे की भाँति बेटी को सङक कचरेदान नाले
कहीं भी फेंक देते है!!!!!
क्यों? इसका उत्तर है वे सब भयावह यातनायें जो बिना किसी दोष के केवल
स्त्री होने मात्र से लङकियों को झेलनी पङती हैं । दहेज की प्रथा और
बलात्कार के डर के अलावा जो सबसे बङी तीसरी बात है वह है "वंश और अंतिम
समय कौन साथ रहेगा कौन अरथी को उठायेगा । ये सब समझा समझाकर हार गया
मीडिया और समाज सुधारक कि बेटी भी बेटे सा सहारा है परंतु व्यवहार में
ऐसा होता नहीं है और देश भर से जलती आत्महत्या करतीं नववधुयें तेजाब की
शिकार लङकियाँ बलात्कार की शिकार लङकियाँ और दहेज की ऊँची बोली के बाजार
में हार कर बेमेल विवाह से बाँध दी जातीं विवाहितायें ',किसी भी दंपत्ति
को यह सोचने पर विवश कर देतीं हैं ""बेटी न हो "। हो ही गयी तो खेलने और
खाने में माँ बाप भेदभाव जाने अनजाने करते हैं और जब तब सुनी गुनी बातों
से विवाह होने से पहले ही उसे "पराये "होने का अहसास कराया जाता है । जिस
ससुराल और पति के ऊपर उसके सारे सपने, सारी खुशियाँ, सब तमन्नायें अरमान
और, जीवन जीने की उमंग हर्ष उल्लास निर्भर होता है ',वही, बहुत शीघ्र उसे
सोचने पर विवश कर देते हैं कि ""वह यदि पिता का घर था तो ये पति का घर है
"वह तो वास्तव में बेघर है ।
हिंसा, का बङा मोटा रूप सामने आता है ससुरालियों के तानों के रूप में कि
""क्या दिया ""और तेरे बाप की औक़ात हैसियत क्या!
आज एक कॉमेडी सीरियल तक में व्यंग्य का विषय "पत्नी का बाप और पत्नी का
मायके में आर्थिक स्तर रह गया है ।वह कितनी भी गुणवान हो योग्य हो
वफ़ादार और समर्पित हो, यदि वह मोटी रकम और ढेर सारा सामान अनवरत जीवन भर
नहीं लाती रहती है तब अधिकांश परिवारों में ताने मजाक व्यंग्य पिता माता
जन्मभूमि और यहाँ तक कि इस बहाने उस अभागी लङकी से जुङी हर चीज का अपमान
होना सुनिश्चित है । स्वावलंबी होना कमाऊ होना आर्थिक हैसियत में ससुराल
के सदस्यों से मायके का बङा होना भी हिंसा का प्रतिशत तो कम करता है
किन्तु घरेलू हिंसा नामक मामूली लगते "यातनादायी "नर्क से बचने की कोई
गारंटी वारंटी नहीं है । ज्यों ज्यों महानगरों से नगरों कसबों और गाँव की
तरफ बढ़ते जाते हैं घरेलू हिंसा का वीभत्स रूप सामने आता है । बात बात पर
हँसने वाली 'नंदिनी 'अब किसी बात पर नहीं हँसती । विवाह के तुरंत बाद
ससुर ननद देवर जेठ सबको शिकवा था बारात का स्वागत बढ़िया नहीं रहा, फिर
हनीमून का पहला सप्ताह गुजरते उसे पता चल गया कि पति अर्धनपुंसक की सी
स्थिति में है और उसके सब सपने रसोई में धुँधाते रह गये, तमाम इलाज के
बाद हुई तो बेटी औऱ वह सुहागिन विधवा बन कर रह गयी जो घऱ के सब काम काज
करती किंतु उसको हर शाम तनहा ही रहना था,। वह चाहकर भी पति को छोङ नहीं
सकती थी पहले तो संस्कारों की जकङन दूसरे स्त्री का भावुक मन तीसरे वह
जानती थी कि बङी मुश्किल से तो विवाह हो सका है और सब जमा पूँजी खर्च
करके अब बूढ़े माँ बाप खुद भाईयों के मोहताज हो चुके हैं । वह क्या
कहेगी? कैसे साबित करेगी कि पति उसके कमरे में सोता तो है किंतु प्रेम
जैसा कुछ नहीं । बहुत रोयी फिर पत्थर धर लिया दिल पर, विवाह से पहले
प्रायवेट जॉब करती थी वह छूट गयी अब सामने बेटी सुबूत बन चुकी थी पति की
मरदानगी का और जिस देश में कुमारी को वर मिलना कठिन वहाँ एक बच्चे की
माँ को कौन जीने देगा । यही समर्पण उसकी कमजोरी बन गया और आये दिन उसपर
हाथ लात भूसे की तरह धुनने को पङने लगे । एक दो बार लंबे समय तक मायके
रही और जब महसूस कर लिया कि वहाँ लोग गिनते है दिन और खरचा तो वापस आ गयी
। पति जो उसको दैहिक रूप से भोग नहीं सकता था जलन कुढ़न में "" तेरी
जवानी निकालूँ ""कह कर मारता, अक्सर नंदिनी के जिस्म पर घाव रहने लगे ।
पुलिस अदालत कानून क्या करे?


♦→§…‰★‡†—
बेटी सयानी होने लगी कल पति को जेल भेज दे तो रहे कहाँ खाये क्या और बेटी
को छोङकर इस क्रूर समाज में काम परy कैसे जाये । परदेश का माहौल अजनबी सब
लोग! मायके में कोई नहीं चाहता कि वह दो महीने भी जाकर रहे । बदनामी और
बोझ उठाने से सब डरते । नंदिनी एक नाम नहीं ऐसी लाखों नंदिनियाँ होगी जो
विधवा हैं व्यवहार में और श्रंगार सुहागिन का करके कैदी तनहा जीवन केवल
बच्चे बङे होने के इंतिज़ार में भुगततीं रहतीं हैं ।
सबिया की हालत दूसरी थी उसका पति बिना मासिक की पीङा, गर्भ की अवस्था या
दिन रात समय मौसम मूड देखे उसका बलात्कार करता, और जब वह मना करती तो
तलाक की धमकी देता । थाली फेंक कर मार देता सिर पर, यदि भोजन में त्रुटि
होती तो ससुर देवर जेठ तमाशा मचा देते । कभी पसली टूट जाती कभी सिर पर
टाँके लगते । और एक दिन तलाकu देकर बच्चे छीनकर घर से निकाल दिया, भाई
ने शरण तो देदी किंतु मेहर मिलते ही, अपने दूर के नातेदार से निकाह करा
दिया, सबिया कभी तीन बच्चों की याद में रोती तो कभी सौतेले जवान बच्तों
की ईर्ष्या उद्दंडता से आतंकित रहती । अकसर कोई न कोईj मामूली सी गलती पर
खरी खोटी सुना डालता "ऐसी भली होती तो पहला क्यों छोङती,,,,
लक्ष्मी काल्पनिक नाम नहीं सच है जो ससुर की वासना का शिकार होने से तो
बच गयी किंतु तीन भ्रूण हत्याओं से हुये गर्भाशय के कैंसर से नहीं बच सकी
पति उसकी मौत के बाद एक "मोल की बीबी ले आया और वह केवल रसोई बिस्तर तक
ही नहीं सीमित रही बल्कि "ब्रुश बनाने का सारा मैनुअल कार्य उसको ही करना
पङता 'मोल की औरत का ताना सुनते सुनते एक दिन घर से भाग गयी, किंतु जाती
कहाँ, पकङ लायी गयी और तब से छत दरवाजा तक गुनाह कर दिया गया, एक दिन
सुना गंगा में कूद मरी ।
कितने उदाहरण??
लोग जब एक स्त्री पर मार पिटाई गाली गलौज देखते हैं तो उनको दया नहीं आती
अचंभा नहीं लगता ', क्योंकि यह एक सोशल प्रैक्टिस बन चुकी है कि विवाह के
बाद ससुरालियों को हक है 'दहेज के ताने देने का और पति को हक है जब मन हो
तब बिस्तर पर घसीट लेने का 'पुत्र संतान जोङे से हो जाने तक बच्चे पैदा
करवाने का और जब जैसा मन करे हर घरेलू सेवा कार्य कराने का, जो स्त्री उस
सब को नहीं कर पाती वह सुशीला नहीं वह, ताने मार डाँट खाने की पात्र है
और यदि वह हक की बात करे जवाब दे तो मारो मारो मारो जब तक कि उसकी सारी
अकङ नहीं निकल जाये ।
घरेलू हिंसा अधिनियम को बने हुये दशक होने को आया किंतु सबसे कम
फरियादें दर्ज होती है घरेलू हिंसा की । जबकि लगभग हर दूसरा घर
'स्त्रियों पर किसी न किसी रूप में ताने टोंचने व्यंग्य बंदिशें और
प्रतिभा हनन ही नहीं भीषण मारपीट आर्थिक और दैहिक अत्याचार भी करता है ।
कहीं जहाँ दंपत्ति पढ़े लिखे है स्त्री बोल लेती है कुछ अधिक किंतु जहाँ
दंपत्ति किसान मजदूर कारीगर दुकानदार है वहाँ स्त्री को बोलने देना
""नामर्दों "का काम कहा जाता है ।
ऐसा होता क्यों है?
क्योंकि भारतीय मर्दवादी पुरुषवादी समाज को ""स्त्री दासी के रूप में ही
देखने की आदत पङी हुयी है "याद करें तो कम से कम तीन पीढ़ियों की याद आती
है जहाँ बुजुर्ग स्त्रियाँ तक घर के लङकों के आने पर सँभल कर बैठ जाती
थीं ।
आज तक "लङकी दिखाकर ''पसंद कराने की क्रूर प्रथा जारी है ' बहुत कम
परिवारों में लङकी से पूछा जाता है लङका पसंद है? वैसे भी विवाह योग्य वर
घर खोजने में जो हाल हो चुका होता है वहाँ लङकी को अवसर कहाँ बचते है ना
कहने के ।
भारतीय लङकियों को "जीवन के लिये तैयार नहीं किया जाता, उनको होश आते ही
ससुराल के लिये ही तैयार किया जाता है बहुतायत घरों में आज भी, । लङकी
प्रेम विवाह कर ले तो पिता की नाक कट जाती है किंतु जो लङका उसे पसंद
नहीं उसके साथ ही विवाह करके भेजने पर कभी पिता माता को नहीं लगता कि
उन्होने एक लङकी को बलात्कार के लिये सौंप दिया है!!!
ये बलात्कार रोज होता है यौनिकता में कम किंतु हर पसंद को बदलकर हर इच्छा
को दबाकर हर सपने को मारकर ये बलात्कार नहीं? आगरा की एक बहिन राखी पर
आत्महत्या करके मर गयी क्योंकि वह वंचित कर दी गयी भाई से मिलने से ।
मेरी अपनी कजिन की बेटी मार दी गयी केवल अपने आभूषण ननद के विवाह पर सौंप
ने से इंकार करने पर ।
कितनी ही स्त्रियाँ चोटों पर मरहम पट्टी करके ताने खाती उठकर फिर काम काज
में लग जाती हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
क्या हुआ जैसे ही कोई पूछता है वह अपनी ही बदनामी संतान की बदनामी और
बदले में फिर हिंसक व्यवहार होने के डर से बहाना बना देती है 'सीढ़ी से
गिर गयी "चक्कर आकर फिसल गयी, ।
जिन काँच की चूङियों को कलाई की रौनक बनाकर सुहाग के नाम पति को रिझाने
का प्रतीक समझा जाता है, 'वही चूङियाँ घरेलू हिंसा का सबसे बङा सुबूत है,

आप किसी स्त्री की कलाईयाँ और पीठ, उघाङकर देखें फोरेंसिक जाँच करायें
वहीं सबसे अधिक दाग मिलते हैं क्रूरता के ।
कैसे हिम्मत करे? घर से थाने चौकी जाने की?
जहानआरा, ने की थी ज़ुर्रत रिक्शे में बैठकर चली गयी थाने किंतु 'इतना
कानून हर स्त्री कहाँ समझती है कि' एफ आई आर 'लिखवाये!!

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
Email- sudha.raje7@gmail.com
Mobile- 9358874117

स्त्री::--"दीवारों के भीतर चीख"" सुधा राजे का लेख ।

स्त्री :::दीवारों के भीतर चीख
"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""
लेख :सुधा राजे
"""""''''
रुबिया, सबीना 'चाँदो 'लक्ष्मी अरुणा, गीता, क्रिस्टी, मार्था """"""केवल
नाम बदलते रहते हैं ।नहीं बदलती तो 'दीवारों के भीतर घुटी घुटी चीखें,
सिसकती रातें दुखते दिन और बेबस शामें । विश्व की सर्वाधिक सहनशील
स्त्रियाँ कहीं रहतीं हैं तो एशिया में और उससे भी सबसे अधिक भारत
प्रायद्वीप के सात पङौसियों में । ससुराल तो हिंसक परिजनों के लिये
कुख्यात है ही गौर से देखें तो हिंसा मायके में ही माँ की कोख में आने से
भी पहले से प्रारंभ हो जाती है, जब "बेटी "अवांछित जीव हो जाती है । पहली
बेटी जैसे तैसे स्वीकार कर भी ली जाती है किंतु दूसरी बेटी की तो कल्पना
भी कोई बङे से बङा उदारवादी परिवार करना ही नहीं चाहता । जब ये
अल्ट्रासाउंड और सोनो ग्राफी की सुविधायें नहीं थी तब की आँखों देखी याद
है बचपन की कि, एक माँ को "भिण्ड "मप्र से अपनी सास को धकेलकर प्रसव के
कुछ ही घण्टे उपरान्त, घर से भागते हुये बस पकङ कर पति की पोस्टिंग जहाँ
थी "सेंवढ़ा "वहाँ जाना पङा । क्योंकि "बिटमरौ बऊ "मतलब बेटियाँ मारने
वाली दाई तंबाकू बनाकर नवजात कन्या के गले में रखकर खटिया के पाये से
गरदन दबाने वाली थी। अब ये "बिटमारो "जगह- जगह खुले प्रायवेट सरकारी
प्रसूति केन्द्र हैं । जैसे तैसे जन्म ले चुकी बेटियों के पालन पोषण में
भयंकर भेदभाव रहता है ।जो नजर नहीं आता उनको जो करते हैं सिर्फ वे समझ
सकते हैं जो 'मानव "होने का अर्थ जानते हैं । गर्भाधान के लिये तमाम टोने
टोटके पूजा इबादत धागे और मन्नते करके जब, मन नहीं भरता तब, शै बदलने की
दवाई के नाम पर गांव कसबे नगर महानगर सक्रिय 'नीम हकीम से पुङिया लाकर
पिलायी जाती है, जो भी स्त्री ऐसा करने से आनाकानी करे उसकी शामत, फिर भी
बेटी हो गयी तो एक आँकङा है कि केवल दिल्ली में मिले तेरह लावारिस
नवजातों में से बारह 'लङकियाँ है "जिस माँ बाप को ईश्वर की समता दी जाती
है वही किसी अवांछित विषैले कीङे की भाँति बेटी को सङक कचरेदान नाले
कहीं भी फेंक देते है!!!!!
क्यों? इसका उत्तर है वे सब भयावह यातनायें जो बिना किसी दोष के केवल
स्त्री होने मात्र से लङकियों को झेलनी पङती हैं । दहेज की प्रथा और
बलात्कार के डर के अलावा जो सबसे बङी तीसरी बात है वह है "वंश और अंतिम
समय कौन साथ रहेगा कौन अरथी को उठायेगा । ये सब समझा समझाकर हार गया
मीडिया और समाज सुधारक कि बेटी भी बेटे सा सहारा है परंतु व्यवहार में
ऐसा होता नहीं है और देश भर से जलती आत्महत्या करतीं नववधुयें तेजाब की
शिकार लङकियाँ बलात्कार की शिकार लङकियाँ और दहेज की ऊँची बोली के बाजार
में हार कर बेमेल विवाह से बाँध दी जातीं विवाहितायें ',किसी भी दंपत्ति
को यह सोचने पर विवश कर देतीं हैं ""बेटी न हो "। हो ही गयी तो खेलने और
खाने में माँ बाप भेदभाव जाने अनजाने करते हैं और जब तब सुनी गुनी बातों
से विवाह होने से पहले ही उसे "पराये "होने का अहसास कराया जाता है । जिस
ससुराल और पति के ऊपर उसके सारे सपने, सारी खुशियाँ, सब तमन्नायें अरमान
और, जीवन जीने की उमंग हर्ष उल्लास निर्भर होता है ',वही, बहुत शीघ्र उसे
सोचने पर विवश कर देते हैं कि ""वह यदि पिता का घर था तो ये पति का घर है
"वह तो वास्तव में बेघर है ।
हिंसा, का बङा मोटा रूप सामने आता है ससुरालियों के तानों के रूप में कि
""क्या दिया ""और तेरे बाप की औक़ात हैसियत क्या!
आज एक कॉमेडी सीरियल तक में व्यंग्य का विषय "पत्नी का बाप और पत्नी का
मायके में आर्थिक स्तर रह गया है ।वह कितनी भी गुणवान हो योग्य हो
वफ़ादार और समर्पित हो, यदि वह मोटी रकम और ढेर सारा सामान अनवरत जीवन भर
नहीं लाती रहती है तब अधिकांश परिवारों में ताने मजाक व्यंग्य पिता माता
जन्मभूमि और यहाँ तक कि इस बहाने उस अभागी लङकी से जुङी हर चीज का अपमान
होना सुनिश्चित है । स्वावलंबी होना कमाऊ होना आर्थिक हैसियत में ससुराल
के सदस्यों से मायके का बङा होना भी हिंसा का प्रतिशत तो कम करता है
किन्तु घरेलू हिंसा नामक मामूली लगते "यातनादायी "नर्क से बचने की कोई
गारंटी वारंटी नहीं है । ज्यों ज्यों महानगरों से नगरों कसबों और गाँव की
तरफ बढ़ते जाते हैं घरेलू हिंसा का वीभत्स रूप सामने आता है । बात बात पर
हँसने वाली 'नंदिनी 'अब किसी बात पर नहीं हँसती । विवाह के तुरंत बाद
ससुर ननद देवर जेठ सबको शिकवा था बारात का स्वागत बढ़िया नहीं रहा, फिर
हनीमून का पहला सप्ताह गुजरते उसे पता चल गया कि पति अर्धनपुंसक की सी
स्थिति में है और उसके सब सपने रसोई में धुँधाते रह गये, तमाम इलाज के
बाद हुई तो बेटी औऱ वह सुहागिन विधवा बन कर रह गयी जो घऱ के सब काम काज
करती किंतु उसको हर शाम तनहा ही रहना था,। वह चाहकर भी पति को छोङ नहीं
सकती थी पहले तो संस्कारों की जकङन दूसरे स्त्री का भावुक मन तीसरे वह
जानती थी कि बङी मुश्किल से तो विवाह हो सका है और सब जमा पूँजी खर्च
करके अब बूढ़े माँ बाप खुद भाईयों के मोहताज हो चुके हैं । वह क्या
कहेगी? कैसे साबित करेगी कि पति उसके कमरे में सोता तो है किंतु प्रेम
जैसा कुछ नहीं । बहुत रोयी फिर पत्थर धर लिया दिल पर, विवाह से पहले
प्रायवेट जॉब करती थी वह छूट गयी अब सामने बेटी सुबूत बन चुकी थी पति की
मरदानगी का और जिस देश में कुमारी को वर मिलना कठिन वहाँ एक बच्चे की
माँ को कौन जीने देगा । यही समर्पण उसकी कमजोरी बन गया और आये दिन उसपर
हाथ लात भूसे की तरह धुनने को पङने लगे । एक दो बार लंबे समय तक मायके
रही और जब महसूस कर लिया कि वहाँ लोग गिनते है दिन और खरचा तो वापस आ गयी
। पति जो उसको दैहिक रूप से भोग नहीं सकता था जलन कुढ़न में "" तेरी
जवानी निकालूँ ""कह कर मारता, अक्सर नंदिनी के जिस्म पर घाव रहने लगे ।
पुलिस अदालत कानून क्या करे? बेटी सयानी होने लगी कल पति को जेल भेज दे
तो रहे कहाँ खाये क्या और बेटी को छोङकर इस क्रूर समाज में काम पर कैसे
जाये । परदेश का माहौल अजनबी सब लोग! मायके में कोई नहीं चाहता कि वह दो
महीने भी जाकर रहे । बदनामी और बोझ उठाने से सब डरते । नंदिनी एक नाम
नहीं ऐसी लाखों नंदिनियाँ होगी जो विधवा हैं व्यवहार में और श्रंगार
सुहागिन का करके कैदी तनहा जीवन केवल बच्चे बङे होने के इंतिज़ार में
भुगततीं रहतीं हैं ।
सबिया की हालत दूसरी थी उसका पति बिना मासिक की पीङा, गर्भ की अवस्था या
दिन रात समय मौसम मूड देखे उसका बलात्कार करता, और जब वह मना करती तो
तलाक की धमकी देता । थाली फेंक कर मार देता सिर पर, यदि भोजन में त्रुटि
होती तो ससुर देवर जेठ तमाशा मचा देते । कभी पसली टूट जाती कभी सिर पर
टाँके लगते । और एक दिन तलाक देकर बच्चे छीनकर घर से निकाल दिया, भाई ने
शरण तो देदी किंतु मेहर मिलते ही, अपने दूर के नातेदार से निकाह करा
दिया, सबिया कभी तीन बच्चों की याद में रोती तो कभी सौतेले जवान बच्तों
की ईर्ष्या उद्दंडता से आतंकित रहती । अकसर कोई न कोई मामूली सी गलती पर
खरी खोटी सुना डालता "ऐसी भली होती तो पहला क्यों छोङती,,,,
लक्ष्मी काल्पनिक नाम नहीं सच है जो ससुर की वासना का शिकार होने से तो
बच गयी किंतु तीन भ्रूण हत्याओं से हुये गर्भाशय के कैंसर से नहीं बच सकी
पति उसकी मौत के बाद एक "मोल की बीबी ले आया और वह केवल रसोई बिस्तर तक
ही नहीं सीमित रही बल्कि "ब्रुश बनाने का सारा मैनुअल कार्य उसको ही करना
पङता 'मोल की औरत का ताना सुनते सुनते एक दिन घर से भाग गयी, किंतु जाती
कहाँ, पकङ लायी गयी और तब से छत दरवाजा तक गुनाह कर दिया गया, एक दिन
सुना गंगा में कूद मरी ।
कितने उदाहरण??
लोग जब एक स्त्री पर मार पिटाई गाली गलौज देखते हैं तो उनको दया नहीं आती
अचंभा नहीं लगता ', क्योंकि यह एक सोशल प्रैक्टिस बन चुकी है कि विवाह के
बाद ससुरालियों को हक है 'दहेज के ताने देने का और पति को हक है जब मन हो
तब बिस्तर पर घसीट लेने का 'पुत्र संतान जोङे से हो जाने तक बच्चे पैदा
करवाने का और जब जैसा मन करे हर घरेलू सेवा कार्य कराने का, जो स्त्री उस
सब को नहीं कर पाती वह सुशीला नहीं वह, ताने मार डाँट खाने की पात्र है
और यदि वह हक की बात करे जवाब दे तो मारो मारो मारो जब तक कि उसकी सारी
अकङ नहीं निकल जाये ।
घरेलू हिंसा अधिनियम को बने हुये दशक होने को आया किंतु सबसे कम
फरियादें दर्ज होती है घरेलू हिंसा की । जबकि लगभग हर दूसरा घर
'स्त्रियों पर किसी न किसी रूप में ताने टोंचने व्यंग्य बंदिशें और
प्रतिभा हनन ही नहीं भीषण मारपीट आर्थिक और दैहिक अत्याचार भी करता है ।
कहीं जहाँ दंपत्ति पढ़े लिखे है स्त्री बोल लेती है कुछ अधिक किंतु जहाँ
दंपत्ति किसान मजदूर कारीगर दुकानदार है वहाँ स्त्री को बोलने देना
""नामर्दों "का काम कहा जाता है ।
ऐसा होता क्यों है?
क्योंकि भारतीय मर्दवादी पुरुषवादी समाज को ""स्त्री दासी के रूप में ही
देखने की आदत पङी हुयी है "याद करें तो कम से कम तीन पीढ़ियों की याद आती
है जहाँ बुजुर्ग स्त्रियाँ तक घर के लङकों के आने पर सँभल कर बैठ जाती
थीं ।
आज तक "लङकी दिखाकर ''पसंद कराने की क्रूर प्रथा जारी है ' बहुत कम
परिवारों में लङकी से पूछा जाता है लङका पसंद है? वैसे भी विवाह योग्य वर
घर खोजने में जो हाल हो चुका होता है वहाँ लङकी को अवसर कहाँ बचते है ना
कहने के ।
भारतीय लङकियों को "जीवन के लिये तैयार नहीं किया जाता, उनको होश आते ही
ससुराल के लिये ही तैयार किया जाता है बहुतायत घरों में आज भी, । लङकी
प्रेम विवाह कर ले तो पिता की नाक कट जाती है किंतु जो लङका उसे पसंद
नहीं उसके साथ ही विवाह करके भेजने पर कभी पिता माता को नहीं लगता कि
उन्होने एक लङकी को बलात्कार के लिये सौंप दिया है!!!
ये बलात्कार रोज होता है यौनिकता में कम किंतु हर पसंद को बदलकर हर इच्छा
को दबाकर हर सपने को मारकर ये बलात्कार नहीं? आगरा की एक बहिन राखी पर
आत्महत्या करके मर गयी क्योंकि वह वंचित कर दी गयी भाई से मिलने से ।
मेरी अपनी कजिन की बेटी मार दी गयी केवल अपने आभूषण ननद के विवाह पर सौंप
ने से इंकार करने पर ।
कितनी ही स्त्रियाँ चोटों पर मरहम पट्टी करके ताने खाती उठकर फिर काम काज
में लग जाती हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो ।
क्या हुआ जैसे ही कोई पूछता है वह अपनी ही बदनामी संतान की बदनामी और
बदले में फिर हिंसक व्यवहार होने के डर से बहाना बना देती है 'सीढ़ी से
गिर गयी "चक्कर आकर फिसल गयी, ।
जिन काँच की चूङियों को कलाई की रौनक बनाकर सुहाग के नाम पति को रिझाने
का प्रतीक समझा जाता है, 'वही चूङियाँ घरेलू हिंसा का सबसे बङा सुबूत है,

आप किसी स्त्री की कलाईयाँ और पीठ, उघाङकर देखें फोरेंसिक जाँच करायें
वहीं सबसे अधिक दाग मिलते हैं क्रूरता के ।
कैसे हिम्मत करे? घर से थाने चौकी जाने की?
जहानआरा, ने की थी ज़ुर्रत रिक्शे में बैठकर चली गयी थाने किंतु 'इतना
कानून हर स्त्री कहाँ समझती है कि' एफ आई आर 'लिखवाये!!

--
Sudha Raje
Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
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Tuesday, 19 August 2014

सुधा राजे का लेख -- दूसरा मौका।

लङका पढ़ा लिखा है
कुंडली मिल गयी
दहेज अधिक नहीं माँग रहे
देखने में ठीक ठाक है
अपनी बिरादरी का है ।
और????
और क्या???
इतनी दूर???
तो क्या हुआ, 'खाते पीते लोग हैं ' जब
मन करेगा लङकी आ जायेगी या इतने
सारे भाई भतीजे हैं चले जायेंगे?
और?
और क्या??
अब इतने कम पैसों में
तो ऐसा ही लङका मिलेगा!!! न!!
लङकी की जॉब छोङनी पङेगी?
तो क्या अब कोई खाने पहनने के लाले
तो हैं नहीं जो लङकी का जॉब
करना जरूरी हो!!!
और
ससुराल गाँव में है परिवार बङा है
लोग परंपरावादी है ',,?लङके के
स्वभाव का पता नहीं?
तो?
तो क्या गाँव की लङकी शहर आती है
वह नहीं रहती क्या?
शहर की कोई ये पहली लङकी है
जो गाँव रहेगी!!!
नसीब अपना अपना है जी अब
शादी के बाद तो रसोई घर बच्चे
ही लङकी का जीवन होते है!!!
और??
और क्या??
लङकी के नाम जमीन नहीं मकान
नहीं लॉकर नहीं और कोई आर्थिक
जरिया नहीं?
तो? तो क्या?
लङकी की शादी के बाद
पति की कमाई ही उसकी कमाई है ।
"
"
"
"
"
"
हैलो बेटा कैसे हो बेटा?
"
"
अच्छे हैं पापा "
"
"तुम रो क्यों रही हो दीदी?
"
कुछ नहीं बस तुम सबकी याद आ
रही थी,,
"
"
"
"
"
लीजिये सब्जी और दूध ये बाकी पैसे
अरे आंटी ये निशान कैसे?
"
"
"
कुछ नहीं बेटा बस 'जरा सीढ़ियों से
ही गिर गयी थी,!!
"
"
"
अब माँ नहीं रही और सब भाई अलग
अलग 'हो चुके हैं ' मैं पेंशनर हूँ
मेरी दवाई और पूजापाठ खाने पहनने
के ही खर्चे इतने हैं ',एडजस्ट
करो बेटा, '
'"
"'
"'
"'
"'
"'
और अब?
तलाक?
आत्महत्या?
पुनर्विवाह?
पुलिस?
"
"
"
"
और बेकसूर बच्चे?
"
"
"
"या
फिर घुट घुट सिसक सिसक कर दम
तोङ देना?
"
"
"
गुनहग़ार कौन??????
सब कुछ गँवाकर
क्या करे? """""तलाक? पुनर्विवाह?
आत्महत्या? पुलिस केस? या मर मर कर
घुटती रहे ''सबके सामने मुखौटा लगाकर?
ये सवाल हर ''तीसरे दूसरे घर का सवाल
है!!
"""पुरानी पीढ़ी नहीं तोङ
सकी """किंतु जैसे जैसे स्त्री का घरेलू सच
बाहर आ रहा है ""नई पीढ़ी अब
ठगी जाने को तैयार
नहीं """स्त्री का हर
क्रांतिकारी फैसला उसके बच्चों के
खिलाफ ही जा बैठने से ही वह ब्लैक मेल
होती रहती है """"रीढ़
की कमी मायका पैदा करता है """और
पाँव कट जाते है जॉब न होने से।
जैसे एक ""टी बी कैंसर या डायबिटीज
का रोगी """"पछताता है किंतु अंतिम
स्टेज पर अब कुछ नहीं केवल चमत्कार और
धीरज """"किंतु कहता है सबसे
भैया बीङी सिगरेट शराब
गुटखा नशा और अतिशय
मीठा छोङो """"वैसा हाल एक दशक
दो दशक बाद """ओवर एज्ड बेरोजगार
स्त्री का।
कैद "एक एक शक्ति छीनती जाती है ।
पहले सखी सहेलियाँ फिर
पिता माता भाई भतीजे फिर कजिन
फिर ',हॉबीज, फिर नौकरी करने की आयु
और फिर हुनर """"सबसे बाद में जो चीज
छिनती है, जीने और खुश रहने की इच्छा ',

एक "आयु होती है पंद्रह से पैंतीस """जब
कोई मानव सबसे अधिक कठिन टास्क
भी चुनौती लेकर पूरे कर लेता है
'''यही आयु होती है बनने बनाने कर
दिखाने की बाकी सब उस पर
खङा रहता है जो इस आयु में कर
लिया ",लेकिन अब """"भारत के संदर्भ में
ये नियम बदलना चाहिये """"आयु बंधन
स्त्रियों को जॉब देने में """सबसे
बङी बाधा है ""विवाह बीस से तीस के
बीच और विवाह होते ही बच्चे
"""ससुराल पति की जिम्मेदारी और
"""अजनबी अघटित
को झेलना """"स्त्री को दूसरा मौका मिलता कब
है??

ये पहला मौका जब "पुरुष पढ़ कर जॉब
दुकान व्यापार की तैयारी पर
लगाता है लङकी "को अवसर नहीं मिलते
या मिले हुये अवसरों को छीन
लिया जाता है "विवाह
उसकी सारी तकदीर तसवीर बदल कर
रख देता है "वह जब बङी आयु तक विवाह
न करे तो समाज को चुभे ""कर ले
तो ""कैरियर छिने ""घर कैरियर केवल
उनके बच पाते है ज्नका मायका करीब है
पिता भाई समर्थक और जॉब
नहीं छोङी ससुराल में लोग सही या कम
बुरे है और पति ""समान
विचारों का या समान जॉब
शिक्षा वातावरण संस्कारों का हो बच्चे
दादी या नानी सँभाल ने में मदद करें ।
©®सुधा राजे


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Sudha Raje
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Monday, 18 August 2014

सुधा रसोई--"पंजीरी""।

पँजीरी /कषार
"""""""
भारतीय पूजा पाठ का अभिन्न अंग है "पँजीरी "जिसे कषार भी कहते है ।
इसकी मूल बात है "पाँच "

पाँच अन्न
पाँच मेवे
पंचामृत
पंच फल
पंच पत्र
पंच मिष्ठ

,,,""

गेंहू का दरदरा आटा
चावल का दरदरा आटा
चने का दरदरा बेसन
जौ का दरदरा आटा
सिंघाङे या मक्के का दरदरा आटा
बराबर मात्रा में लें

लगभग तीन सौ ग्राम प्रति अनाज का आटा ।

बूरा
चीनी
गुङ
मिश्री
खांड
प्रत्येक सौ सौ ग्राम ।

बादाम
काजू
खसखस
पिश्ते
मखाने
प्रत्येक पचास पचास ग्राम
सबको तवे पर हलका कुरकुरा होने तक घी से भून लें ।



गौ घृत सौ ग्राम
गौ दुग्ध सौ ग्राम
गौ दुग्ध का खोवा या मावा दो सौ ग्राम
गौ माखन नवनीत सौ ग्राम
गौ दुग्ध या ताजा दही सौ ग्राम



दो केले
दो सेब
दो अमरूद
दस सूखे अंजीर
दस सूखे छुहारे
सब अंदाज से मोटे या बारीक काट लें

काली मिर्च
हरी इलायची
चिरौंजी दाना
पीपरामूल
बबूल की गोंद पचास ग्राम
बाकी सब पाँच पाँच ग्राम

अब,, बङी भारी तले की कङाही में पचास ग्राम घी डालकर सब पाँचों आटे डालकर
धीमी आँच पर गहरा सुनहरा भूरा होकर सुगंध देने तक भून कर उतार लें ।

सारे पंच मेवा बारीक कतर लें चाहैं तो सरौता या कद्दूकस से कतर लें

भुने हुये पंचान्न चूर्ण में सब मेवे मिला दें ।
फिर घी गुङ(फोङकर)
चीनी खाँड बूरा मिश्री मिलादें

फिर माखन 'मावा (खोवा), दही दूध मसलकर मिला दें और अंत में काली मिर्च
हरी इलायची पीसकर और चिरौजी भूनकर मिला दें
पीपरामूल भी मिला दें दरदरा पीसकर

गोंद को घी में भूनकर मिलायें कूटकर ।

तुलसी के कतरे पत्ते डालें
और
अंत में सब पर कटे हुये फल रख कर प्रसाद लगाकर बाँटें ।

बहुत ही पौष्टिक नाश्ता है ।
बहुत दिन रखना हो तो कटे फल केले सेब अमरूद बस तीन चीजें न मिलायें ।

रोज एक कटोरी "पँजीरी के साथ गुनगुने दूध में किशमिश उबालकर पियें यह
बेहद बलवर्द्धक अनुभूत आहार है ।

हर आयु के लिये उत्तम नुस्खा ।
तो क्यों न लगे मेरे कान्हा को पँजीरी प्यारी!!!!
जय श्रीकृष्ण ।
©®सुधा राजे


और पंचान्न चूर्ण में यदि सोंठ घी गरम गुङ मिला दें ।तो लड्डू भी बना सकते हैं आप ।
याद रखें बहुत धीमी आँच पर धीरे धीरे धैर्य से निरंतर चलाकर भूने बनायें हर चीज
©®सुधा राजे


--
Sudha Raje
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Sunday, 17 August 2014

सुधा राजे का लेख - "कितने पिशाच??"

स्त्री और समाज।
लेख ::सुधा राजे
***********
चार साल की एक बच्ची 'गाजियाबाद के निर्माणाधीन मकान के तहखाने में चार
हिंस्र नरपशुओं द्वारा सामूहिक बलात्कार के बाद गुप्तांग में प्लास्टिक
की बोतल ठूँस कर मरने छोङ दी जाती है, '
एक बच्ची स्कूल के बाथरूम में रेप करके छोङ दी जाती है,गोवा
एक बच्ची को स्कूल बस ड्राईवर बस में रेप करके फेंक देता है,मुंबई
एक बच्ची गैंग रेप के बाद झाङियों में बिजनौर,
एक बच्ची सगे नाना द्वारा बलात्कार करके मार डाली जाती है, भोपाल,
एक बच्ची माता पिता बूढ़े शेख को बेच देते हैं निक़ाह के नाम पर वह खुद
को बलात्कार से बचाने के लिये कमरे में बंद कर लेती है 'यूएई,
एक बच्ची की बहिन गैंग रेप से तंग आकर मर जाती है और छोटी लङकी स्कूल से
घर जाने के नाम पर थरथराकर रोने लगती है क्योंकि चाचा भाई पिता और उनके
दोस्त उसको रेप करते है!!!!!!!!!!!
""""""""किसी भी अखबार का स्थानीय पृष्ठ ऐसी ही लोमहर्षक खूरेंज कहानियों
ने रँगा पुता मिलता है ।फिर भी रह जाती है उन लाखों अभागिनों की कहानियाँ
जिनको खिलाने घुमाने पालने पोसने वाले हाथ चाचा बाबा नाना मामा ताऊ फूफा
मौसा कजिन और तो और बङे भाई तक बचपन में ही हवस का शिकार बना डालते
हैं!!!!
ये कहानियाँ कभी बाहर नहीं निकलतीं दम घोंटने वाली हालत हो चुकी है समाज की ।
संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने वालों को ये बातें अच्छी नहीं लगतीं
उठानी, किंतु इन को चुप रह कर टाला नहीं जा सकता ।
क्यों, क्यों, क्यों आखिर क्यों, बच्चियों में वासना और यौन संतुष्टि
खोजने लगे है 'हिंस्र नरपशु????
केवल एक ग्रास एक निवाला हवस का पूरा करने का यौनआहार भर रह जाती है किसी
के जिगर प्राण आत्मा का टुकङा लङकी?
केवल एक बार की यौन भूख को मिटाने का सेक्स टॉय????

कैसी मानसिकता से गुजर रहे लोग होते हैं वे जिनको मासूम अबोध नन्ही बच्ची
पर प्यार दुलार नहीं आता वरन, उसके जिस्म में एक मात्र अंग एक "मादा
"दिखती है सारा शरीर नजर से गायब रहकर वे उसको, भोग कर मार डालते
हैं!!!!!!

ऐसा तो पशु भी नहीं करते? ऋतुकाल और यौवन के बिना किसी मादा को पशु भी
नहीं लुभाते!!

क्या है वह "कमजोर कङी जो एक पिता और पिता तुल्य शिक्षक संरक्षक परिजन के
दिल दिमाग पर से "नैतिकता "का सारा खोल तोङ डालती है । उसके संस्कार उसका
नाता मानवता रिश्ता अपराध बोध कानूनी सजा सामाजिक बदनामी पाप और ईश्वरीय
दंड तक का भय उसको नहीं रोक पाता?????

मतलब "वासना "सिर चढ़कर पागल कर रही है ऐसे लोगों को और हम उम्र युवा
स्त्री पर हाथ डालने से अधिक कहीं आसान लक्ष्य हो रही है मासूम अबोध
बच्चियाँ??

जो न तो गंदे स्पर्श का अर्थ समझ पाती हैं और न ही टॉफी चॉकलेट खिलौना
प्रसाद दुलार आशीर्वाद को देने वाले के पीछे छिपी भयानक वासना को, ।

ये किसी समाज के नैतिक खात्मे का लक्षण है जब बच्चे बच्चे न रहकर लिंग
भेद के आधार पर नर या मादा कहकर अलग कर दिये जायें ।

कोई समझे उस भयानक यातनादायी सोच को जब एक माँ बच्ची को जन्म देने के
बाद, हर समय ये खयाल रखने लगे कि कहीं पिता उसे एकांत में गोद न उठा सके?
कपङे न बदलवा सके,? अब इस सबको सोचने से कैसे रोका जा सकता है?

लोग स्त्रियों के पहनावे और बाहर निकलने को या जींस स्कर्ट बिकनी मोबाईल
डीप गले और स्लीव लेस को खूब कोसते हैं, मान भी लें तो भी,

जीरो वर्ष से पंद्रह साल तक की लङकी को किस अपराध में ये सब सहना पङा?
उसमें न तो कोई यौवन न कोई यौन व्यवहार न कोई पुरुषों को लुभाने दिखाने
लायक संचेतना?

जाहिर है
ये सब बहाने है । इन घिनौने अपराधों की जङें छिपी है क्रूर मानसिकता में
जहाँ अमूमन तीसरे चौथे हर पुरुष को लङका होने भर से वरीयता प्राप्त हो
जाती है और उस लङका होने भर से नैतिकता उसकी जिम्मेदारी नहीं रह जाती
।वह बचपन में ही भाभियों और सहपाठी लङकियों को मजाक मजाक में छेङने को
स्वतंत्र है ।
और किशोर होने तक उसको जता बता दिया जाता है कि लङकियाँ केवल लङकों के
यौन सुख और घरेलू सेवा के लिये ही बनी है ।
युवा होते होते उसको यौन संबंध बनाने की पूरी आजादी मिल जाती है । वह अगर
लङकी छेङता पाया जाये, या किसी स्त्री से सेक्स कर ले यह खबर घर वालों को
पता चल जाये तो कहीं तूफान नहीं आ जाता, न कोई "नाक कटती है " न पगङी
उछलती है न चादर मैली होती है ।न सतीत्व खंडित होता है ।
जबकि लङकी के केवल प्रेम या प्रेम तो दूर लङकों से बोलचाल दोस्ती होने पर
तक आज भी अधिकांश की नाक कट जाती है।

हद से गुजर चुकी है स्त्रियों पर हिंसा

लेख का संबंध किसी एक व्यक्ति एक
स्थान या घटना से नहीं बल्कि सदियों पुरानी सङी गली सोच
से है । और सोच तो बदलनी ही पङेगी ।
अब तक अगर सोच नहीं बदली तो वजह वे उदासीन लोग भी हैं जो सोचते हैं उँह
मुझे क्या!! लङकी जिसकी वो जाने किंतु खुद पर बीते तो
बिलबिलाते हैं ।

मुजफ्फर नगर दंगा हिंदू मुसलिम
नहीं था
एक ग्रुप के
आवारा लङकों का लङकियों से
बदत्तमीजी करना था जिसे कोई हक
नहीं था पढ़ने जाती लङकी को छेङने
का ।
दामिनी का और मुंबई की पत्रकार
बैंगलोर की कानून की छात्रा का रेप
कोई एक
अचानक घटा अपराध नहीं था ।
ऐसे कामपिपासु बहुत से हैं छिपे जगह
ब जगह जो नजर के सामने हैं
तो पहचाने
नहीं जाते ।
किंतु
ये क्यों ऐसा करते हैं??
वजह है मर्दवादी सोच
ये सदियों से चला आ रहा रिवाज
कि हर जगह औरत को खुद
को बचाना है और कोई
भी कहीं भी उसको मौका लगा तो छू
देगा भँभोङ देगा छेङ देगा ।
बलात्कार अचानक नहीं होते ।
एक
विचारधारा से ग्रस्त रहता है मनुष्य
जो समाज में रह रही है सदियों से कि
पुरुष
को किसी की लङकी को सीटी बजाने
आँख मिचकाने और इशारे करने गाने
पवाङे गाने और छू देने और
पीछा करने का हक है ।
यही
विचार जो भरा रहता है समाज के हर
अपराध के लिये ज़िम्मेदार है ।
आदमी रात को सङक पर ड्राईव कर
सकता है औरत नहीं
आदमी एडल्ट मूवी देखने
जा सकता है बालिग लङकी नहीं ।
आदमी घर से बाहर तक
किसी भी लङकी को अपने इरादे
जता सकता है लङकी नहीं ।
आदमी शराब पी सकता है हुल्लङ
पार्टी नाच गाना कुछ भी कर
सकता है औरत नहीं ।
अब
जबकि औरतें बाहर आ जा रही है और
रात दिन हर जगह मौजूद है तो
इसी
मर्दवादी मानसिकता से ग्रस्त लोग
केवल औरतों को रोकने की बात करते
हैं ।
जाने दो न????
चलने दो पार्क सिनेमा थियेटर
ऑफिस दफतर रेलवे स्टेशन बस
स्टॉप ।
कुछ साल पहले आनंद विहार बस
स्टॉप पर एक परिवार के साथ
रूकी स्त्री का
रेप हुआ था क्योंकि लोंग रूट की बस
चूक जाने से बीच यात्रा में रुकने की
नौबत आ गयी ।ट्रेन में हजारो केस
हो चुके ।
ये सब क्राईम नहीं हैं
एक
सोच है एक विचार है
एक मानसिकता है जो
समाज की ठेठ कट्टरवादी मर्दवाद
से ग्रस्त है जिसमें औरत मतलब
एक समय का भोजन
बस
और उसके साथ नाता रिश्ता कुछ
नहीं ।
मुसीबत हैं अच्छे पुरुष
वे
जो स्त्री के रक्षक और पहरेदार
और समर्थक हैं ।
ये अच्छे पुरुष भी इसी समाज का अंग
हैं और इनकी वजह से ही कन्फ्यूजन
फैलता है ।
अगर सब के सब खराब हों औरते
खत्म हो जायें ।
और दुनियाँ का झंझट ही निबट जाये

और
गजब ये कि इन
अच्छों को अच्छी पवित्र औरते
चाहियें और वे जूझ रहे हैं
खराब पुरुषों से कि बचाना है समाज
परिवार और जोङे ।प्रेम
की अवधारणा और
प्रकृति ।
किंतु
बहुतायत पुरुष के दिमाग
का भारतीयकरण हो चुका ।
उदाहरण कि मध्य प्रदेश के एक
प्लांटेशन पार्क में स्वीडन
का साईक्लिस्ट
जोङा आकर टेंट लगाकर प्रकृति के
मनोरम जगह पर रहने की सोचता है ।
और प्रौढ़ स्त्री का गैंग रेप
हो जाता है । सब वनवासी अनपढ़
कंजर शराब
उतारने वाले लोग!!!!!
जरा सोचो
कि क्या भारतीय दंपत्ति पर्यटन पर
जाते समय बांगलादेश के किसी जंगल
पार्क
में टेंट लगाकर रूकते????????
नहीं रुकते!!!!
कभी नहीं!!!!
वजह?
क्योंकि भारतीय स्त्री को पता है
कि किसी अकेली जगह एक पुरुष के
सहारे
नहीं रुका जा सकता । और जान माल
से अधिक स्त्री के शरीर पर
आक्रमण की ही
आशंका संभावना डर ज्यादा है ।
लेकिन
स्वीडन में ऐसा डर नहीं था
लोग
नदी पहाङ जंगल कहीं भी पिकनिक
मनाने रूक जाते हैं ।
ये सबकी सोच नहीं ।
लेकिन सब चीखने लगे
दंपत्ति की गलती है कि सुनसान
जगह जंगल में क्यों टेंट लगाया???
वे लोग जंगल ही तो देखने आये
थे????
जब एक
पर्यटक से ऐसा बरताव होता है
तो क्या उम्मीद है
कि किसी वनवासी या गरीब
मामूली लङकी के साथ
किसी भी अकेली जगह क्या बरताव
होता है ।
राजधानी हो या कश्मीर
भारतीय
स्त्री कहीं भी अकेली सुरक्षित
नहीं और एक दो पुरुष के साथ भी
सुरक्षित नहीं परिचित देखकर ढाढस
बँधता है किंतु डर बराबर रहता है ।
क्या किसी सज्जन पुरुष को यह
अच्छा लगता है कि एक परिचित
लङकी पूछे कि
""कहीं आप अकेला पाकर रेप
तो नहीं करोगे ""
नहीं लगेगा अच्छा लेकिन एक
अघोषित शक हर स्त्री लगभग सब
पुरुषो पर करने
को विवश है ।
आज माता अपनी बेटी को परिजनों के
बीच अकेली नहीं छोङती जब
कि बुआ दादी
ताई चाची घर पर ना हो ।
और यही हाल पिता का है वह सगे
भाई जीजा साढू किसी के घर
मेहमानी तक को
लङकियाँ भेजने से हिचकता है ।
बहुत
परीक्षा मन ही मन लङकी माँ बाप
और अभिभावक करते है कि वहाँ कौन
कौन है ।
और कितनी लङकियाँ है ।
लोग कैसे है
लङकी को खतरा तो नहीं तब
लङकी को होस्टल मेहमानी वगैरह
भेज पाते है ।
ये
औक़ात है बहुतायत पुरुष समाज की ।
वजह वही विचारधारा ।
विदेशों में लङकियाँ बीच पर लेटी है
तैर रही है और क्लबों में नाच रही है
और कार ड्राईव करके रात
को यात्रा कर रही है ।
चूम कर गले भी लग जाती है
परिचितोॆ के
लेकिन
बलात्कार का डर नहीं लगता
घुटनो तक की स्कर्ट और बिना बाँह
की मिडी पहन रखी है मगर
बलात्कार का डर
नहीं लगता ।
शराब पीकर गाती नाचती है लेकिन
बलात्कार का डर नहीं लगता ।
और
अगर वहाँ कोई किसी स्त्री को कुछ
प्रपोज करना चाहता है तो ये
स्त्री की
चॉयस है कि वह स्वीकारे
या अस्वीकार कर दे ।
भारतीय सहन ही नही करते!!!!
अस्वीकृति का प्रतिशोध तेजाब और
रेप से लेते हैं!!!!
और तमाम इलज़ाम अंततः औरत के
सिर पर
कि नैतिकता का ठेका तो औरत
का है?
मर्दवादी लोग
समझे न समझे मगर सामंजस्य
वादी समझने लगे है और अब ये
मिटाना चाहते हैं ।
किंतु अफसोस कि आज भी बहुत
सारी स्त्रियाँ मर्दवादी सोच बदलने
की बजाय
खुद को ""नारी वादी "नही हूँ ये ।
साबित
करने के चक्कर में अंधाधुन्ध
ऐसी विचारधारा हटाने की बजाय
कुरेदकर
पहाङ काटना चाहती है औरतों पर
ही प्रतिबंध की पक्षधर है ।
जबकि कटु सत्य है ये कि वे खुद
कभी न कभी दहशत में रही है ।
स्त्री की समस्याओं का अंत है हर
जगह हर समय ढेर सारी स्त्रियाँ जैसे
रेलवे स्टेशन बस स्ट़ॉप होटल स्कूल
कॉलेज अस्पताल सङके दुकाने
गलियाँ
दफतर संसद राजभवन और घर ।।।।
विचार पर प्रहार करो घटना पर
हमारा कोई प्रहार बदलाव
नहीं ला सकता ।
सोच बदलो रिवाज़ बदलो ।और जीने
दो स्त्री को जीने दो ।
कि सोचो एक तरफ हिंस्रऔर
दूसरी तरफ एक अजनबी पुरुष
स्त्री किससे ज्यादा डरे?
©®सुधा राजे

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Sudha Raje
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