Friday, 1 August 2014

सुधा राजे का संस्मरण:- सुधियों के बिखरे पन्ने - एक थी सुधा

अब नागपंचमी पूजा!!!!
अब इसमें भी लॉजिक है ।
वो ये कि हमारे बचपन में एक लच्छू
बाबा थे "सपेरे "
लगभग दर्जन भर साँप काँच
की हवादार पेटी में बंदकरके दिखाने
निकलते कांवङ लेकर ।
ये तरह तरह के नाग सबको दिखाते
एक गजब सम्मोहन उन पतले लंबे चिकने
चमकीले चित्रित जीवों में ।
सब बच्चे कौतुक से देखते और लच्छू
बाबा का विवरण चालू हो जाता ।
"""ये गेहुँअन ये घोङापछाङ ये करैंत ये
पीवणां ये नागराज ये पनिहाँ ये
दुमुँहा ये """""अजगर ""
लंबी सँङसी से निकालकर दिखाते ।
हड्डी की कीप बनाकर दूध पिलाते
और रख देते ।
सर्प नृत्य देखते झुरझुरी छूट जाती ।
स्त्रियाँ दुमुँही नागिन को स्पर्श
करतीं कि रसोई में पूरियों में आज से
तेल कम लगेगा ऐसा करने से ।
लेकिन
ये सब था इसलिये कि लोग """देखते
ही मार डालने की प्रवृत्ति त्यागें ।
बल्कि सपेरे को बुलायें ।
और ""नाग पकङा कर जंगल में
छुङवाना """
कालराहु दोष से मुक्ति का उपाय
माना गया ।
यानि सर्प को मारो मत जंगल
भिजवा दो ।
आज
वैज्ञानिक भी वही कह रहे हैं ।
लच्छू बाबा नहीं रहे सर्प दंश से मरे
किंतु जब तक रहे सबको जहरीले और
बिना जहर वाले सर्पों की पहचान
कराते रहे और पकङने का तरीका भी
(सुधा राजे)

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