Monday, 11 August 2014

सुधियों के बिखरे पन्ने- एक थी सुधा---- राखी पर हङताल।

शाक़िर ख़ान "
हमारे छोटे भाई का दोस्त 'बचपन से
ही मार खाता डाँट खाता पिटाई
और पढ़ाई के बीच, नाटक
ड्रामा वगैरह भी करने लगा और "एक
बार जब छोटू को डाँटने ठोकने तंबाकू
खाते देखने पर हम रूठ कर
बोलना छोङ गये तब ',स्टेज पर नाटक
के लिये 'स्क्रिप्ट कौन लिखे "
छोटू ने शाकिर को भेजा । शाकिर
दो चार दिन मान मनौवल
करता रहा और आखिर कार एक
""रहस्यवादी नाटक "कोई है?? है
कोई?? कोई तो हो?
का लेखन पूरा हुआ "
नाटक पूरे भारत के तमाम कंपटीशन
जीतता कलकत्ता भोपाल तक
चला गया और सब चकित कि एक बहुत
कम आयु की लङकी ने इतना गंभीर
नाटक कैसे लिख डाला?
हालांकि छोटू और शाकिर
की जोङी बल्कि गैंग को बचपन से
ही हम ही स्किट लिख कर देते रहे
किंतु सब नेकी कर दरिया में डाल और
भूल जा ।
शाकिर अज़ीब लङका था । घर में
अब्बा पढ़ने देते नहीं थे सो घर
की दीवार फाँदकर रात को छोटू के
साथ पढ़ने गेस्ट रूम में आकर छिप
जाता रात भर पढ़ता और सुबह चार
बजे भाग जाता, ताकि अज़ान से पहले
बिस्तर पर पहुँच जाये ।
नौ बहिने और एक छोटे भाई
की सारी देखभाल करता, एक बहिन
मंद बुद्धि थी उसकी सेवा करता,
भयंकर क्रोधी पिता के सामने
चुपचाप मार डाँट खाता और
माँ का दुख सुख बाँटता रहता । पढ़ने
के ज़ुनून को देखा है हमने शाकिर में
हमेशा पैरों के पास बोरी बिछाकर
बैठे रहते छोटू और शाकिर
पढ़ाई के अलावा उसके हर सवाल
का ज़वाब देने को एक मात्र
ठिकाना थी दीदी और कोई नहीं ।
कई बार वह स्ट्रीट लाईट में
पढ़ता रहा जब छोटू कहीं बाहर
जाता वह घर नहीं आता ।
चाय पानी खाना बहुत संकोच से
मना कर देता । किंतु परिवार के
नियम के मुताबिक सब बच्चों के
कमरों में टी पॉट और हीटर लगे होने
से गेस्ट रूम में रात की चाय हॉट पॉट
में रख दी जाती । एक दो और
भी लङके छोटू के साथ पढ़ते किंतु बात
शाकिर की फिलहाल जिसकी वजह से
छोटू अंदर का अपना कमरा छोङकर
बाहर गेस्ट रूम में पढ़ता था ।
शाकिर अक्सर छोटू की डाँट पङने पर
आङे आ जाता और हमारी डाँट
पाता ।
कई बार हम भाई दूज पर रूठ जाते
"बङों से या छोटों से "
अकसर धूम्रपान मांसाहार या बीयर
पीने पर '
और कमरा बंद कर लेते भीतर से तब
'छोटू की तो एक दो पुकार के बाद
हिम्मत बंद बङों को तो लिफ्ट
मिलती ही नहीं गलती उनकी ही रहती तब
"शाकिर आगे बढ़ता '
अपने हाथ से भाभी से लेकर
थाली सजाता उसमें याद करके चावल
रोली चंदन दूब सिक्के
पानी नारियल मिठाई
दिया कोरा कपङा कलावा कटार
और "राखी हो तो राखिया "भाई
दूज हो तो 'बङे बताशे जिन्हें
"खङपूरी "कहते हैं रखकर
कमरे के दरवाजे पर धरना दे देता ।
दीदी!!!!!
दीदी!!!
खोलो दरवाजा देखो मैंने खुद
थाली सजायी है और देखो "आज मैंने
कोई मीट मच्छी नहीं खाई
"सच्ची खुदा कसम!!
भीतर हमारी हँसी छूट जाती मन
करता दरवाज़ा खोल दें लेकिन अब
इतनी जल्दी कैसे माने ।
तब छोटू को धौल जमाता चल बोल
कि अब मीट नहीं खायेगा दूज और
राखी के दो दिन पहले से ही । बोल
न, और छोटू महाशय घिघियाते
हाँ हाँ जिज्जी सच्ची में एक बार
भी अब नहीं,,,,
अंदर से हम मुँह फुलाकर कह देते चल चल
तू तो मुसलमान है क्या पता कल गाय
मारकर खा जाये चलो भागो सब
असुरो!!!
मेरा कोई भाई नहीं है कोई मुझे
प्यार नहीं करता सब मुझे ही टोकते
डाँटते झगङते हैं,
तब पिताजी आते
अच्छा हमारी जिज्जी बन जाओ हमें
तो बाँध दो राखी,
नई आप की भी हम जिज्जी नहीं बनेगे
आपने हमारी बत्तखें कंजरबेटर को दे
दीं, और वाईन पी थी उससससससस
दिन ।
तब बङों के भी वादे आ जाते और
शाकिर धरना देकर दरवाजे पर बैठ
जाता लो तो आज हमारा रोजा है
हमारी दीदी खाना नहीं खायेगी तो हम
भी भूख हङताल करेगे ।
मजबूरन दरवाजा खोलकर
टीका करना पङता राखी बाँधनी पङती और
जो पांव छूने का नंबर
आता तो चूँकि वहाँ बङे भाई
भी बहिन के पाँव छूते हैं तो सब
पैरों में चिकोटी काटते । हम भागते,
मगर अब पाँव नहीं छूने दोगी तो नेग
नहीं मिलेगा ',
नेग मिलता "चवन्नी और अठन्नी,
जब भुनभुनाते कि कंजूस मख्खीचूस!!
तो सब ठहाके लगाते
अगले जनम में बैलबनकर चुका देगे ।
फिर दोपहर को पिकनिक पर जाते
सब
शाकिर भी साथ जाता दो दरजन
लङकियाँ चार दरजन लङके सब
परस्पर भाई बहिन ।
शाकिर के लंच बॉक्स में कुछ खास
नहीं होता किंतु हम उसका लंच
ही माँग लेते और सारी चीजें
पत्तलों पर शेयर की जाती, ऊँचे
पहाङों पर बने मंदिर और गिटार
बाँसुरी डफली की संगत पर
अंत्याक्षरी के साथ खाना स्वादिष्ट
हो जाता । शाकिर हमारे साख हर
एक मंदिर जाता और
वहाँ की पूजा पाठ में भी शामिल
होता । एक दो मुसलिम
सखियाँ भी साथ रहतीं ।
अब वह बङा वकील है ।
भरा पूरा परिवार है और बहुत
मुश्किल से कभी एक वक्त पर एक शहर
में हम सब भाई बहिन रह पाते हैं ।
किंतु कभी नहीं भूलती उसकी हङतालें
और धरने ।
©®©®सुधा राजे

--
Sudha Raje
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Fatehnagar
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