Friday, 28 June 2013

लेख***कब तक अनदेखी धमनियों की माँसपेश की **खंड प्रलय एक चेतावनी**

बाढ़ सूखा भूकंप बादल फटना भूस्खलन
अग्निकाण्ड तङित्पात् और
सुनामी आदि का होना बे वज़ह
कभी नहीं होता । कार्य कारण संबंध की
प्रत्येक दुर्घटना के पीछे एक
बङा लंबा सिलसिला मनुष्य के लालच और
ग़लतियों का चला आ रहा है ।
विज्ञान इतनी उन्नति कर चुका है कि व
सब विपदाओं की भविष्यवाणी पहले ही क
सकता है और करता भी रहता है । स्वार्थ
ऐसी चेतावनियों की अनदेखी की जाती है
लेकिन ये भविष्यवाणियाँ तभी काम की हैं
इनपर तत्परता से एक्शन लिया जाये और
ऐसा एक्शन लेने को चौकस और तैयार तंत्र
अभ्यास करता रहे ।
पिछली बिजनौर बाढ़ में गाँव डूबने का क
था कि पिछले पाँच सालों से हरेवली डैम के
कभी सूखी नहर पर भी खोलकर ग्रीस और
नहीं किये गये थे । जब फाटक नहीं खुला त
मैन गाँव छोङकर भाग गया और
आला अधिकारियों ने क्रेन से फाटक खिंचव
तो टूट गया फाटक और बे जरूरत बे
इंतिहा तबाही पानी ने मचा दी ।
विश्व के विविध वैज्ञानिक संगठनों रिस
सेन्टर्स ने धरती के विभिन्न पारिस्थित
तंत्रों ज्वाला मुखी सुनामी भूकंप उल्काप
अतिवृष्टि आँधी हरीकेन बवंडर और भूस्खल
क्षेत्र धरती के मानचित्र पर चिह्नित क
संबंधित सरकारों पर्यावरण और पर्यटन
पारिस्थितिक तंत्र विभागो मौसम
विभागों को सौंप रखीं हैं । समय समय पर
सूचनाये आज के तीव्र सेटेलाईट युग में अपडे
भी जायी जातीं रहती है ।
देश भले ही अलग अलग राजनैतिक
इकाईयाँ हों लेकिन कागज के नक्शे पर
नहीं पृथ्वी । वह एक जीती जागती गति
ब्रह्माण्वीय इकाई है । भूमि के एक हिस्
का परिवर्तन परोक्ष या प्रत्यक्ष पूरे
धरती ग्लोब पर प्रभाव डालता है । जैसे
ध्रुवीय हवायें और अल्ट्रवॉयलेट किरणें ।
जहाँ तक भारत का परिप्रेक्ष्य है ।
नदियाँ भारत रूपी देह की धमनियाँ और
शिरायें हैं जो हिमालय रूपी हृदय से समुद्
रूपी गुर्दों तक निर्बाध बहती रहें इसी
राष्ट्र रूपी देह का परिसंचरण तंत्र सही
करता रह सकता है । पहाङ पर्वत गिरि
इस राष्ट्र रूपी देह की अस्थियाँ और कंक
तंत्र हैं । मिट्टी माँस और पेङ व्वचा हैं ।
रोम कूप हैं तो खनिज विविध पुष्टिवर्धक
। हिमालय ही मस्तिष्क है निःसंदेह । औ
कृषि मैदान वक्ष और उदर है । पठार भुजदं
और तट पाँव पंजे । द्वीप अंगुलियाँ हैं ।
हिमाचल प्रदेश जम्मू कश्मीर उत्तराखंड
पश्चिमी उत्तर प्रदेश हरियाणा पंजाब
का पूर्वी भाग और सात बहिनों का राज्
आसाम मेघालय मणिपुर त्रिपुरा सिक्किम
अरूणाचल प्रदेश तक का क्षेत्र । कच्चे नर
बेडोल भुरभुरे पत्थरों के छोटे बङे बोल्डरों
विश्रंखलित पहाङों से निर्मित है इनमें रे
मिट्टी का मलबा हिमालय के अपरदन वि
क्षरण और जलप्लावन के संयोग से किसी प
मक्के या बूँदी के लड्डू की तरह गठित भू
संरचना है । यहाँ पक्के शैल नहीं है ।
ना ही पठार हैं । मिट्टी जमकर पत्थर औ
पत्थर टूटकर मिट्टी बनते बिगङते रहते हैं
हिमालय से निकलने वाली सब नदियाँ जो
से होकर भूटान म्यनमार नेपाल चीन बांग
तक बहतीं हैं । वर्षा काल में जब उफनती
तो पहाङ के पानी की ही वजह से जो हर
बह कर इन नदियों नालों झरनों और झील
होकर बङी नदियों तक बहता चला आता
इस समय तङित्पात बादल फटने और अतिवृ
पहाङ भूस्खलन से गुजरते हैं । नये झरने और
नदी धारायें बन जाते हैं ।
नदी वर्षा के उपरान्त जगह कई बाद बद
लेती है । ये कटान वहाँ भयंकर रूप से दिख
जहाँ पहाङ खत्म होते हैं और
मिट्टी का डेल्टा पंक और जमी हुयी भूमि
क्षेत्र को नदी कगार बनाकर काट डालत
वनस्पति इस पर लेप का काम करती है ।
फूस कुश और छोटी झाङियाँ जहाँ मिट्टी
और गोंद का काम लेकर पत्थरों को लड्डू क
आपस में बाँधते हैं बङे पेङ बादल और नदी के
को धीमा कर डालते हैं । और इसतरह सदि
जमते रहते पहाङों पर हरियाली का कवच
चढ़ा रह कर पहाङ के कंकङ पत्थरों को बि
रोके रखता है ।
अफ़सोस की बात ये है कि ये सब समझते हुये
नौकरशाह नेता प्रशासक ठेकेदार भू
माफिया टिम्बर माफिया ट्रान्पोर्ट
माफिया । ट्रैवल एंड टूरिज्म माफिया ध
ठेकेदार और अय्याशी के शौकीन धनिक लो
सारे मानको की जानबूझकर अवहेलना
करते हुये जब बहुमंजिले भवन पापङ
सी पतली दीवारें बिना मजबूत इंफ्रास्ट्
के मिलावटी रेत सीमेन्ट और घटिया निर्
सामग्री से रातदिन एक करके पहाङ को
डालते हुये नदियों के किनारे खङे करते चले
तो ।सारा बँधा हुआ पहाङ हिल जाता है
भीतर ही भीतर खिसकन शुरू हो जाती है
नदियों पर बाँध जब बनाये जाते हैं तो पूरे
में पहाङ की दरारों से
पानी रिसता रिसता पूरे इलाके को नमी
देता है ।
यही कारण है कि उत्तर काशी से बिजनौ
मकानों में भयंकर शीलन रहती है ।
नदियों पर अत्याचार ये होता है कि हर
मार्च से जुलाई तक जब पहाङ का बारिश
नहाने और गंगा बादल पहाङ के नृत्य का उ
यौवन पर रहता है तभी । मैदानों से तफर
शौकीन छुट्टी मनाने वाले हनीमून मनाने
पिकनिक मनाने और इश्क़ लङाने वाले जोङ
अलावा एडवेंचर और तीर्थ यात्रा का एक
चार काज वाले पर्यटन पर आ जाते हैं ।
दुधमुँहे बच्चे अशक्त जर्जर बूढे । मोटे
भारी भरकम लोग :और तब पहाङ पर एक
लाख यात्री का धमकता यातायात पहा
की शांति को भंग कर देता है ।
वाहनों लाउडस्पीकरों म्यूजिक सिस्टम
टीवी और बातों का शोर पहाङ में
कितना गूँजता है इसे सिर्फ
मूलनिवासी ही महसूस कर सकता है । शो
क्षरण बढ़ाता है ।
इन यात्रियों के खाने रूकने और ढोने में सह
कार्मिक और सुरक्षा तंत्र
का भी उतना ही भार बढ़ जाता है ।सीज
पश्चिमी यू पी का बहुत
बङा हिस्सा पहाङों पर रोजी कमाने चल
पङता है ।
इनके रुकने खाने और घूमने की वजह से अवैध
टेम्परेरी निर्माण और ट्रैकिंग होती है ।
खोदना और लकङी काटना जारी रहता है
नौकरशाह भ्रष्ट कमीशन खोर नेता मिल
घटिया सङकें पुल बनवाते रहते हैं ।
जब ये यात्री लौटते है तो पीछे छोङ जाते
कचरे का अंबार । मल और प्लास्टिक पॉल
पाउच सिरिंज गुटखा और सिरिंजें लेटेक्स औ
शराब की बोतलें दवाओं के रैपर पेस्ट क्री
की ट्यूबें ब्रश और टूटे जूते चप्पल और
टनों ऐसा कचरा जो खाद नहीं बनता न ग
। न ही बहता है ।
नदियों में पटक दिया जाता है सारा ।
पहाङ पर से बारिश में बहकर जब आता है
तो नदी को न केवल जहरीला बनाता वर
मार्ग भी रौंध कर प्रवाह का मार्ग बद
विवश करता है ।
नदियाँ बाढ़ से साफ करतीं हैं स्वयम् को ।
नदी में बाढ़ जरूरी है ।
लेकिन नदी का मार्ग मत रोको ।
जगह जगह
फैक्टरियाँ अलकनंदा भागीरथी रामगंगा
गंगा बाणगंगा मालन पिंडर सरयू
यमुना खो पीली तक ये
रिफाईनरियों का मैला नदियों में पटक
दिया जाता है ।
पहाङ का पानी तराई भांबर खादर को
करता है । क्योंकि ये पानी सहारनपुर ब
मुरादाबाद पंजाब हरियाणा तक पहुँचतो
धीमा होने से खङा ही रहता है महीनों त
भर जाने से ईख और धान की फसलें गल जात
मवेशी और खेत ही रोजी का मुख्य ज़रिया
मरने और खेत भरने से बरबाद किसान मजदू
कच्चे घरों को भी भरभराकर गिरता बेबस
देखते हैं । साल भर के लिये जमा अनाज और
अगली फसल का बीज सङ गल बह जाता है
फर्नीचर ईँधन प्राय जो कंडे उपले होते है
और अब फैक्टरियों के कब्जे के कारण फूस भी
दस सालों से नहीं मिलती ।
तो पलायन को विवश ये भाँबर तराई के ल
अपराध और खानाबदोश ज़िंदगी की और ध
जाते हैं ।
नहरों बैराजों डेम और बाँझ के पार्कों की
सफाई गाद और सिल्ट साफ करने का बजट
साल जनता के खून की कमाई से आता है लेक
कागज पर सब होता है । सिंचाई कॉलोन
मिलीवटी निर्माण
वाली पूरी कॉलोनी बिजनौर के खो बैरा
दस साल पहले बह गयी थी नाम निशान त
नहीं । हजारो हैक्टेयर उपजाऊ अव्वल भूम
रेत कंकङ पत्थर भर गया और दलदल बन गये
नहरों की सिल्ट साफ न होने से हर साल
दरजन पशु और मानव खप कर मर जाते हैं ।
खनन् माफिया मछली पलेज और सिघाङा आ
लिये अवैध रूप से ये तटपट्टियाँ लोगों को
रूप से लाभ लेकर दे दी जाती है । करोङो
मस्टर रोल में भरने के बावज़ूद आज तक बिज
खो बैराज का ना तो पुल चौङीकरण हुआ
नहीं रेलिंग सुधरी न ही नया पुल पैदल और
की सुविधा हो सकी हर बाढ़ में चार पाँच
सो गाँव बिना बिजली के और शेष भारत से
से कटे रहते हैं
वे जो लाभ कमाते हैं उनको पहाङ या तरा
खादर भाँबर के दर्द से कोई वास्ता नहीं
राहत बचाव के नाम पर किसी नदी तट के
नगरपालिका में मानसून के पहले नावें तक
नहीं रहतीं । बाढ़ में आसपास के
अपराधी गिरोह और सक्रिय हो जाते हैं
राहत कार्यों में
नौकरशाहों की कोठियाँ महानगरों में फ
खङी हो जातीं है ।
पहाङ ने अभी तो सिर्फ पीठ हिलायी है
कहीं अनदेखी की तो बिजनौर सहारनपुर
दिल्ली ज्यादा दूर नहीं ।
बाढ़ में जब लोग भागते
मरते घर टूटते हैं तो । मौकापरस्त
वहीं पर पहुँच जाते हैं । और ट्यूब से
रातों को सुरक्षित दूरी तक जान
जोखिम में डालकर भी लाशों पर से गहने
उतारते । गाङियों के सामान चुराते ।
घरों के भीतर से माल असबाब भरते ।
पहाङ से नीचे पानी की रफ्तार कम
होकर पानी खङा रहता है कई दिनों तक
गाँव बस्तियों घरो में तब पशु चोर
माफिया भी जिंदा या मुरदा मवेशी पर
टूट पङते हैं एक मवेशी का चमङा तीन
हजार से ऊपर का बिकता है । ये
स्थानीय लोग नहीं बल्कि मुहाज़िर और
निकटवर्ती इलाकों के गिरोह होते हैं
बाढ इनको ज़श्न बनकर आती है।
पहाङ तराई भांबर और खादर में
नदियों का जाल है ।
अलकनंदा
भागीरथी
मंदाकिनी
यमुना
गंगा
लक्षमण गंगा
पिण्डर
खो
रामगंगा
और इनसे निकलीं हजारों नहरें ।
नहरों पर डैम
बैराज
और पुल
पुल और बैराज के आसपास हर साल पंक और
रेत जमा होकर हज़ारों हैक्टेयर
भूमि तटवर्ती गर्मियों में निकल आती है

जहाँ
खिंचाई विभाग ""नामक सफेद हाथी पले
रहते हैं ।
ये हाथी इन मकानों में नहीं रहते अक्सर
किराये दार रहते हैं इनमें और
कोठियाँ होतीं हैं महानगरों में ।
ये तटवर्ती जमीनें पॉलेज यानि तरबूज
खरबूज करेले परवल तोरई लौकी कुँदरू और
मक्का ज्वार की फसल बोने के लिये अवैध
कमीशन लेकर स्थानीय लोगों को बोने
फसल उगाने दे दीं जाती हैं ।।हर नदी के
किनारे अवैध रेत खनन
माफिया भी लगा रहता है खिंचाई
विभाग । को यही रेत सिल्ट गाद और
फाटकों की रंग पुताई सफाई वृक्षारोपण
पार्क सुंदरी करण को जमकर बजट
मिलता है ।
ये पार्क बैराज जुये और असामाजिक लेनदेन
के काम भी बहुधा आते हैं । इनपर अवैध
मछली पकङन भी होता है । किनारे के
दलदलों में सिंघाङे के अंधे की रेवङी वाले
उत्पाद भी होते है ।
पटेरी घास कास का जंगल
खङा हो जाता है
तो गत्ता फैक्टरियाँ सब ढो जातीं हैं ।
गरीब और उसके ढोरों को विगत सात
वरषों से फूस का छप्पर भी नसीब
नहीं पॉलिथीन डालने लगे ।
क्योंकि
पूँजीपतियों ने गत्ते
की फैक्टरियाँ लगा कर सब खीच
डालना शुरू कर दिया फूस जो अब तक हर
घर का ओसारा था अब केवल धनिक
ढाबों की भद्रदुनियाँ की ऐशगाह रह गये

तो सिल्ट क्यों साफ करें???
नदी नहर जब बारिश आती है तो अपने
कैनल से बाहर बहने लगती है ।
मवेशी जो रोजी का जरिया हैं पजिहार
कछवार जो रोजी देते है बह जाते हैं
किसी को समझ में आया हमने क्या कहा??
इन होटलों की तीर्थ पर जरूरत
क्या थी???? तीर्थ तो ""वीत
रागियों के लिये है!!!!!!!
देखा है वहाँ तफ़रीह छुट्टी मनाने और
जवान जोङे इश्क़ फ़रमाने जाते हैं ।।
क्या चारधाम का अर्थ शराब मांस
मदिरा हनीमून और बाजारीकरण है????
तो ये तो पहाङ ने सिर्फ पीठ
हिलायी है थोङी सी बस!!!!
अगर शिव का त्रिनेत्र खुला तो????
मौसम विभाग ने ""एलबम वार्निंग""
दी थी ।फिर प्रांतीय सरकार ने बयान
दिया ऐसी चेतावनी तो मौसम विभाग
देता ही रहता है ।।।एलबम वार्निंग
मतलब भीषण चेतावनी ।।
आज फिर मौसम विभाग ने चेतावनी दी है
कि 21-28 जून तक मौसम दुबारा भयंकर
रूप ले सकता है ।।
अब
सहारनपुर के गाँवो तक यमुना में लाशें
बहकर आ रही हैं ।
ग्रामीण उनके किनारे लगने पर वापस
बहा दे रहे हैं ।
सङते मानव
उजडे गाँव??????
किसके लिये?? कैसे विकास
जब
पहाङ को पारिस्थितकीय तंत्र ने
खतरनाक ज़ोन में पहले ही घोषित
किया रखा है????
फिर पहाङ खोदे क्यों ।
ये कमीशन खोरी के मिलावटी निर्माण
किनके हितपोषण को बनाये????
अगर पहाङ के बाँधों को कुछ
हो गया तो?????? न दिल्ली रहेगी न
दौलताबाद मत छेङो ये
देवभूमि चारधाम सिर्फ
वानप्रस्थियों की साधना के है हरे रहने
दो पहाङ ताकि हरा रहे देश
पहाङ खादर भांबर तराई सब जूझ रहे हैं
जलप्रलय और भूस्खलन के दुष्परिणाम ।
सवाल है
कि दो चार नेता मरने पर राज्यीय शोक
घोषित कर दिया जाता है
आज लाखों लोग बेघर सदा को गरीब और
अनाथ हो गये पहाङ बरबाद हो गया ।
अब भी ""कपकोट''और बागेश्वर में लघु
विद्युत परियोजना चल रही है
मलबा खोद खोद कर ।सरयू नदी में
पटका जा रहा है । ये नदी के मार्ग जब
अवरूद्ध होंगे तो वह
मनुष्य के मार्ग पर चलकर सब
बहा देगी ।।
टिंमबर माफिया
भू माफिया
होटल माफिया
ट्रैवल टूरिज्म का ऐशगाह बना देना ।
नदियों नहरों की सिल्ट ।सफाई
का पैसा कागज पर काम दिखाकर हङप
कर डालना ।पुलो सङकों की ठेकेदारी के
भ्रष्टाचार
नदियों के किनारे बहुमंजिले निर्माण ।
पहाङ को खोद डाला!!!!!
क्या ये शोक का विषय नही!!!!!!!
तब भी आई पी पर
चर्चा फिल्मी उद्घाटन!!!!
ज़श्न?????
सेना का एक एक जवान
सौ सौ कामचोरों से ज्यादा कीमती है ।
वे सब वहाँ मौत हथेली पर लिये जूझ रहे है
।पानी चाँदी के भाव बिक रहा है ।
कपङा चाहिये
खाना चाहिये
चादरें भेजो
हर घर से पाँच चादरें और पाँच
आदमी की एक हफ्ते की खुराक़ जमा करके
भेजो सेना और अधिकृत कैंप तक
राष्ट्रीय दुख किसे कहते हैं????
वहाँ एक तिहाई मुस्लिम भी है
पश्चिमी यू पी के दुकानदार कारीगर
ड्राईवर छात्र ।
सिख भी हैं
और ईसाई भी
ये किसी दल
मज़हब
या इलाके का मामला नहीं है
लोगो का साल भर का जमा राशन जीवन
भर की पूँजी बह गयी परिजन मर गये और
दिशाज्ञान जीने की इच्छा मर रही है
आशायें
ये मसला है राष्ट्र को एक तत्पर देश
घोषित करने का ।
लोग रो रहे है आप ज़ाम जलसे कैसे
लगा सकते है
उत्तराखण्ड संकट को राष्ट्रीय संकट
घोषित कीजिये।
आपको कैसे बतायें बाढ़ क्या है ।। अनाज
जो सालभर कोठियों में मिट्टी और टीन
में बोरियों में भरकर ऱखा जाता है सङकर
फूलकर टंकियाँ फट जातीं है और अगले साल
तक न बीज बचता है न खाना!!!! वहीं साल
भर उपले पाथती कंडे लकङी जुटातीं औरतें
। पति ससुर जेठ बेटा कहीं परप्रान्त में
नौकरी पर है या दुकान पर ।
सारा ईधन गलकर बह गया । पहाङ पर
आज भी एक रजाई की सरदी है । हम लोग
जो जरा सा नीचे हैं आज भी रात दस बजे
बाद खुले में नहीं सो सकते ठंड लगती है ।
एक महीने बाद बरफ जमनी शुरू
हो जाती है रजाईयाँ स्वेटर जो पाँच
पाँच साल चलते सब गल सङ बह गये ।
मकान फट गये जो जीवन भर के तिनके थे
बह गये । बेटी का दहेज बेटे की किताबें
कागज पहचान पत्र????? क्या क्या???
कई गाँव जहाँ क्यारियाँ खेत और बाग थे
वहाँ रेत कंकङ पत्थर बोल्डर भर गये ।।।
गाँव का नक्शा ही खत्म।
पहाङ पर फँसे लोगों की जितनी चिंता है
उससे ज्यादा तराई पहाङ भांबर और
खादर के बरबाद लोगों की कब
होगी???????
दिल्ली का पानी आया चला जायेगा ।।
लेकिन धनवानों का सैर गाह पहाङ अगर
तबाह हुआ है तो क्या खाँयेगे सब????
तराई भाँबर खादर पहाङ के लोग?????
हमने देखी और भुगती है तबाही ।।।बह
गये गेंहू ।।सङ गये फरनीचर।।गल गये
इलेक्ट्रॉनिक्स।।खङे रहने से पानी में हुये
घाव और ढह गये मकान मर गये
मवेशी सङती लाशें खेतों में
सङी हरियाली और बची भर गयी रेत
कंकङ ईँधन खत्म औरते प्रसव पीरियड्स
दर्द बच्चे भूख चोर लुटेरे भीगे बदन बुखार
और बाद में महामारी । राहत???
हुँहहहह शासक वर्ग के कारिन्दे,??? अब
देखना सब नहीं तो बहुत से
इसी का मस्टर रोल भरकर कैसे
मालामाल!!!! फिर
बाढ़ के साथ मुँह बाये खङी है
समस्या ।।पीने का पानी ।।खाना ।।
अपनों के बिछोङे।।संपर्क खत्म।।भीगते
रहने से बीमारी संक्रमण ।।।सुरक्षित
छत।।दवाईयाँ ।।
अधिकांश पुल और इमारतें धराशाली जल
में प्यासे लोग

Tuesday, 18 June 2013

**बस और नहीं सहा सुना जाता दीदी**

18--06--2013--//6:19Pm//
कहानी **बस और नहीं सहा सुना जाता दीदी**

++++++++++++++++++++++++++++
क्या हाल कर रखा है कमरे का?
ऐसे ही रखती थी क्या मैं?
आठ बजने को हैं डैडी का दूध नाश्ता और कपङे कुछ भी तैयार नहीं ।ये कल्लू
भी जाने कहाँ मर गया!!!
मेरे जाते ही सब नौकर ही नहीं घर के मेम्बर तक सिर चढ़ गये ।

'नियति' जीजी जब से आयी थी मायके बङबङ ही करती रहती थी। हर छोटी से छोटी
लापरवाही पर । घर की बङी बेटी थी । दो भाई और एक बहिन से बङी ।त्याग और
तपस्या की मूर्ति नियति । तीनों को पढ़ाया लिखाया जॉब दिलायी और जब सब
छोटों की शादी हो गयी सब सैटल हो गये तब अपने इंतजार में प्रौढ़ हो चले
अपने प्यार को विवाह का सादगी से नाम देकर टेक्सास चली गयी थी। वहाँ
चित्रकला की शिक्षा देती थी । जीजाजी वहीं भाषाविज्ञान के शिक्षक थे ।
पूरे सात साल बाद वह भारत आयी थी । अपने गोरे चिट्टे बेटे और सांवली बेटी
के साथ ।

छोटी बहिन पारुल भी बुलवा ली थी कलकत्ते से । हम सब छोटे भाई बहिनों के
बच्चे ज़वान हो चले थे ।क्योंकि सात साल पहले शादी हो गयी थी सबकी । मेरे
पति तो दीदी को जीजीमाँ ही कहते रहते ।
नियति जीजी के बच्चे छोटे थे। हिंदी बहुत कम बोल पाते लेकिन समझते खूब थे।

छोटे भाई ही नहीं बहुयें औऱ भतीजे तक जानते थे बङी बुआ का अर्थ क्या है ।
सब कहानियाँ सुन सुन कर बङे हुये थे कि कैसे माँ को हार्ट अटैक पङा डैडी
का एक्सीडेंट हुआ डैडी सस्पेंड हो गये । घर गिरवी रखकर नौकरी बची । दीदी
ने पढ़ाई छोङकर बीच में ही स्कूल में नौकरी कर ली और चित्रकला की कोचिंग
चलायी । छोटे भाई बहिन पढ़ाये । किचिन से बाजार तक सब माँ के बदले सँभाला
। डैडी शऱाब में डूबे रहते तब बाप बनकर बैंक बाजार बिजलीघऱ डाकघर सब
सँभाला । डैडी को भी राह पर लायी । मकान छुङाया और पूरी तरूणाई निकाल दी
यहाँ तक कि अमेरिका में जॉब करने लगे अपने मंगेतर तक को इनकार कर दिया
विवाह से जबकि दोनों में बचपन का प्यार था। वो तो उनका प्यार सच्चा था जो
कनपटियाँ सफेद होने तक नियति का इंतजार जीजाजी ने किया वरना उनके घऱ की
चौखट पर रोज नये रिश्ते वाले दौलत का अंबार लगाने को तैयार खङे रहते ।
बङी उम्र में शादी और बच्चे होने से नियति की सेहत बिगङ गयी थी । और हवा
पानी बदलने परिवार के बीच भावनात्मक सपोर्ट लेने वह इंडिया चली आयी थी ।
लखनऊ का इंदिरानगर और अवध की नज़ाक़त बहुत बयान करती थी वह टेक्सास में
भी । नियति जीजी की सेहत अच्छी होने लगी
थी । पारुल दीदी हम सबसे छोटी थीं । परंतु सबसे धनाढ्य परिवार में शादी
उन्हीं की हुयी थी । छोटे ननदोई को हूर जैसी बे इंतिहा खूबसूरत पारुल से
बेहद प्यार था हम तो यही देखकर खुश रहते कि ननदें बहुत सुखी थीं । कभी
कभी 'ये'कहते

""-ये सब नियति जीजी की तपस्या पुण्य और त्याग का प्रताप है । हम सबने
जरूर कुछ पुण्य किये होंगे जो ऐसी माँ से बढ़कर हमें मिली । बीमार माँ तो
पारूल की शादी के दो साल बाद ही चल बसी थी । जीजी न होती तो हम न पढ़
पाते न खा पाते । बिगङने लगे थे डैडी तो बस पैसा फेंककर पलटकर भी नहीं
देखते । सच जीजी न होतीं तो हम ही नहीं डैडी भी बरबादी के रास्ते पर चल
पङे थे । """

नियति जीजी डैडी को बहुत प्यार करतीं । या यूँ कहें छोटे बच्चे की तरह
खयाल रखतीं । छोटी उमर से ही माँ की सेहत अच्छी नहीं रहती तो जीजी ने ही
कपङे धोने बटन सिलाई प्रेस पॉलिश खाना नाश्ता दवा और हिसाब किताब पैसे
रखना शॉपिंग सब सँभाल लिया था । चार बजे से रात दस बजे तक जीजी सबसे पहले
जागतीं सबसे बाद में सोतीं । हम सबके बच्चे भी बङी बुआ के कमरे में ही
सोते । प्रारंभिक पढ़ाई भी बङी जीजी ने ही करायी भतीजों की । परदेश गयीं
जीजी तो सब महसूस करते माँ दुबारा छोङ गयीं । परंतु जीजी ऑन लाईन संपर्क
में रहतीं सबके ।
नियति जीजी जितनी त्यागी उतनी सख्त गुस्सैल और अनुशासन प्रिय । डैडी
बूढ़े हो चले थे । उनका हम सब भरसक खयाल रखते । लेकिन नियति जीजी की कमी
तो पूरी हम दोनों देवरानी जेठानी ही क्या पारूल सहित हम सबके छह बच्चे भी
और छह प्राणी हम मिलकर भी नहीं कर सकते । डैडी अब भी बनठन कर रहते और
पूजापाठ के बाद क्लब चले जाते या टी वी देखते रहते ।
कल्लू उनकी सेवा में हम सब हों या नहीं हाज़िर रहता ।
फिर भी जिस दिन से जीजी आयीं तब से ही कभी आरती कभी तुलसी तो कभी सुबह की
सैर कभी लंगर का चंदा तो आज कभी डैडी की सेवा की कमियों पर टोका टाकी ।
बङे भाई साहब को कल ही तोंद बढ़ने पर डाँट लगायी थी ।
पारुल दीदी कम ही आतीं हैं हमारे यहाँ अब । बहुत आलीशान कोठी और सुख
सुविधा कलकत्ते की रौनक । हम सब ही घूम आते हैं बारी बारी राखी दूज के
बहाने । जितना देते हैं उससे ज्यादा विदाई में लौटा देती हैं भतीजों को ।
"अरे तू यहाँ क्या कर रहा है बहुओं के कमरे में चल जरा गाङी निकाल सबको
हज़रत गंज और चिङिया घर होते हुये पार्क घुमाकर लायें वहीं आज सब डिनर कर
लेंगे । डैडी का पैक करा लेंगे । ""
नियति जीजी ने अपने छोटे भाई के कान खीचें ।
"""पारू" चल बहिना डैडी को बोल के आ कि चलना है तो तैयार हो जायें या
यहीं टिफिन ले आयेंगे और हाँ जरा रिवाईटल कैप्सूल देती आना दूध मैंने
ठंडा होने वहीं टेबल पर रखा है ।"

जीजी ने प्यार से पारूल को थपका ।
पारुल जीजी के कंधे पर ढहती हुयी बोली । आप ही जाओ जीजी आपके लिये ही
महान् हैं आपके पिता । मैं तो शक्ल भी नहीं देखना चाहती । मुझे निठल्लों
की सेवा का कोई शौक़ नहीं ।

पारू """""""""""
ज़ुबान सँभाल कर बोल """""!!!!!
ख़बरदार जो डैडी के लिये अपमान का एक भी लफ्ज़ कहा तो!!!

जीजी का हाथ हवा में उठ गया ।

रुक क्यों गयीं जिज्जी!!!
मारो मुझे कि मेरी माँ हो तुम मेरा बाप हो तुम मेरा भाई हो तुम ।

मारो जिज्जी ये चाँटे खाने को तरस तरस जाती है तेरी पारु ।

लेकिन मैं उस शराबी कबाबी निकम्मे बेटियों की खुशियाँ चर जाने वाले जानवर
से कोई वास्ता नहीं रखना चाहती ।
पारुल चीखी । चेहरा ही नहीं आँखें भी लाल । नियति जीजी से किसी की भी
इतनी ऊँची आवाज़ में बात करने की पहली बार हिम्मत हुयी थी । वरना घर ही
नहीं पङौस और दफ़्तर तक में जीजी का बहुत सम्मान था।

तङाक् तङाक् तङाक्

जीजी का हाथ पारुल दीदी के दोनों गालों पर बारी बारी से तीन बार इतनी जोर
से पङा कि कद काठी में नियति दीदी से दोगुनी हृष्ट पुष्ट पारूल दीदी बुरी
तरह लहराती हुयीं दीवार से जा टकरायीं ।

लेकिन ये क्या । रोना पारुल दीदी को था रोने नियति जीजी लगीं ।

पारुल दीदी आगे बढ़ी और चेहरा जीजी के सामने कर दिया । जीजी मारो मुझे पर
जो कहने जा रही हूँ सुन लो । बहुत पुत्रवत् श्रवण कुमार बनने का शौक था न
आपको । बनी भी आप । श्रवण ने तो सिर्फ अंधे माँ बाप को ढोया था । परंतु
आपने तो
जीजी हम सबको भी इन अंधों के साथ ढोया ।
हाँ जीजी तुम रक्षक थीं हमारी तुम न होतीं तो हम सब कीङों की तरह खाये जाते ।
याद है जब मैं टी वी देखने की लत में फेल हो गयी तब आपने हमारा प्रायवेट
फॉर्म वहाँ से भरा दिया था जहाँ डैडी की पोस्टिंग थी?

हाँ तो वहाँ तो तुम सिर्फ एक महीने रूकीं वो भी इम्तिहान देने । वो भी
छोटे मामा को साथ भेजा था मैनें रोटी बनाने ।माँ भी वहीं गयीं थीं ।
""हाँ जीजी तभी तो परीक्षा देने के बाद मामा हर वक्त मुझे साथ रखते ।माँ
तो होना ना होना बराबर था । काश वे पहले मर गयीं होतीं ।

पारु!!!!!!

सुन लो जीजी बरसों से पक रहा मवाद है ।

जब रात को माँ को हार्ट की दवाई देते तो माँ बेहोश सो जातीं । मामा आऊट
हाऊस में और डैडी मुझे अपने साथ सुला लेते । मुझे पता नहीं था जीजी वो सब
क्या करते मगर मैं जब रोकती तो बुरी तरह मार खाती । फिर रोज जबरदस्ती
गोली खिलाते । और माँ सहित जान से मारने की धमकी देते । मैंने एक दिन
मामा से कहा तो मामा को नौकरी से निकाल दिया और मुझे पीटा । माँ से कहा
तो माँ मुझे लेके यहाँ तो चलीं आयीं लेकिन मुझे ही मारपीट कर धमकाकर चुप
रखती रहीं । कि डैडी खरचा नहीं देंगे तो सब भूखों मर जायेगे नियति कितना
कमायेगी । चुप कर सबको पल जाने दे । आपको याद है जीजी एक बार यहीं जब माँ
का हाथ टूटा था?? तो माँ चीखीं थी आपको बुलातीं बचाओ । जब माँ गिरी नहीं
थीं फिसल कर डैडी ने दीवार पर पटक दिया था । नशे मैं मुझे दुबारा कई साल
बाद नींद से घसीटने लगे थे जबकि तबसे मैं आपके कमरे में सोती थी । उस दिन
माँ के पास आपके इंतजार में सो गयी थी । क्योंकि आप सहेली के जन्मदिन की
पार्टी देर से आने वालीं थीं । तब अचानक आप आयीं और डैडी को नशे में
समझकर ले गयीं पकङ कर बंद कर दिया बैठक में । वो माँ को नहीं कुछ कह रहे
थे । माँ ने जो कहा था उसे मेरा झूठा इल्जाम कह कर सचमुच ऐसा कर डालूगा
कहकर मुझे सोते में झिंझोङने चले थे । तब मैंने आपसे कहा था । जीजी आप
ससुराल चली जाओगी तो मुझे भी ले चलना। जब आपने कहा
मैंने तो पहले ही ठान लिया था पहले तुझे ससुराल भेजूँगी । औऱ मैंने कहा
जीजी बस अब नहीं पढ़ना तब एड देकर आपने घर वर खोजा और मेरी शादी कर दी?
तब मैंने कहा था मेरा गठजोङा जीजी बाँधेगी!!! जब मैं माँ बाप के गले लगे
बिना चल दी तब सबने बातें बनायी कि दौलतवाला मिल गया तो मिज़ाज आ गये!!
जीजी नरक की तरह गुजरे ये पंद्रह साल सुख औऱ संपत्ति है । लेकिन जब भी
नमन हाथ लगाते हैं मुझे वे आठ दिन गिजगिजे नाग और चीखें दम घुटना याद आ
जाता है । तेरह साल की ही तो थी मैं । और कुछ ज़्यादा ही मूर्ख । नमन् की
जगह कोई और होता तो नहीं निभा पाता जीजी । यहाँ मैं सिर्फ तेरी सूरत
देखने आय़ी हूँ मेरी धाय माँ । तू दकियानूसी है न बेटी मानकर ब्याह किया
मेरा तो मेरे घर का अन्न नहीं खाती ।
पर जीजी अब तेरी मजबूरियाँ दूर हो गयीं माँ मर गयी । भाई कमाते हैं पारू
की शादी हो गयी देख मैं सचमुच महलों की रानी हूँ । अब ये श्रवण कुमार
बनना बंद कर । आपकी ये असुर पूजा हमसे नहीं देखी जाती । जीजी अब या तो
मेरे घर आना या मुझे बुला लेना । अब नही सुना सहा जाता ""
पारु पारु मेरी बच्ची मेरी लाल
ओहहहह माई गॉड ओहह माई गॉड । मैं विफल हो गयी पारु मैं तेरी रक्षा नहीं
कर सकी । पारु मैं तेरा बङा भाई साबित होने चली थी ।"""
बस करो जीजी । तुम नहीं हुयी विफल । मैं तुमसे कह नहीं पायी । माँ हर बार
रोक देती थीं ।
ये तीस साल से इतना बङा घाव पाल रहीं थीं!!!!
अब क्या करूँ मैं? किसे दंड दूँ? नब्बे साल के बूढ़े को? जो कब मर जाये पता नहीं?
या घुटती रहूँ ये घाव पालकर कि एक बहिन का फ़र्ज़ नहीं निभा पायी ।
ओफ्फ!!!!
मैं तो सोचती थी मेरे सब फ़र्ज पूरे हुये ।
जीजी बिलख रहीं थीं । पारुल दीदी जीजी की गोद में सिर रखे रो रो कर सो
चुकीं थीं ।सुबह दोनों बहिनों के सामान पारुल दीदी की गाङी में रखवा कर
जीजी डैडी के कमरे में गयीं हाथ जोङे और बोलीं -""मैं शायद ही अब दुबारा
मिलूँ । जाने अंजाने सबसे होश या बेहोशी में पाप हो जाते हैं । अंत समय
है भजन करो । बिना गले लगे जीजी चल दीं।
©®sudha raje

गाँव में पीपल तले।

Sudha Raje
गाँव में पीपल तले फिर खाँप बैठी
काँप ऐंठी प्रीति
ऐंठी मूछ वाले पंच काले
और गोरे मुँह मरोरे
गुङागुङाते एक हुक्का
कुच उचक्का और छक्का उस तरफ कुछ
बीङियों के मुख सुलगते और लगते धूल में है
लोट आये चोट खाये कई पँखेरू चहचहाते कुछ
अहाते में बँधे डंगर मवेशी शुद्ध
देशी घी लगाकर थम थमाकर
रोटियाँ खाते बुलाते भाग दौङै हाथ
जोङे
सिर झुकाये मार खाये नौजवानों में कई
खीसें निपोरें डाल बैठे खाट तकते बाट अब
मुखिया पधारे
शॉल डारै
गाँव के उङके दुआरे
फुसफुसाते
मान खाते
दमदमाते नूर चेहरे
भाव गहरे
प्राणबक्शी
गिन अपीले सुन दलीलें मौत माँगें प्रश्न
टाँगे
बाँध मुश्कें
जंगलों तक खींच टाँगे
डोर माँगे
और दूजे दिन खबर भी
इचभर भी
एक जोङा गाँव छोङा
खुदकुशी की
मर गया
आतंक ऐसे डर गया
खाँप बैठी आज फिर पीपल तले
हर दिल हिले
©®¶©®¶SudhaRAJE
DATIA--BIJNOR
Jan 28

अंजानी की कहानी।

Sudha Raje
मौन के गाँव
गाँव में छाँव
छाँव के घाव
घाव में टीस
टीस में आह
आह में व्यथा
व्यथा में पीर
पीर में धीर
धीर में बानी
एक थी गुङिया
गुङिया की कहानी
कहानी में नदिया
नदिया में धार
धार में किलोल
किलोल में मुक्ति
मुक्ति में खेल
खेल में झूले
झूलों में गीत
गीतों में राग
राग में बाजा
बाजा पे ताल
ताल पे नैया
नैया में सखियाँ
सखियाँ गुङ धानी
धान की कहानी
कहानी में खेत
खेतों में ईख
ईख में रस
रस में सरबस
सरबस था घर
घर में थी माँ
माँ में थी चिंता
चिंता के टापू
टापू जैसे बापू
बापू की चिट्ठी
चिट्ठी में रिश्ता
रिश्ते में खुशियाँ
खुशियों में गुड्डा
गुड्डे से ब्याह
ब्याह में विदाई
विदाई पर रोना
रोने का बिछोङा
बिछोङे ने छोङा
छोङी वो गलियाँ
गलियाँ में घर
घर में वो अपने
अपनों की बानी
बानी की कहानी
कहानी में दूरी
दूरी मजबूरी
मजबूरी बंधन
बंधन में क्रंदन
क्रंदन में नीर
नीर में मौन
मौन की पीङा
पीङा में प्रेम
प्रेम में छल
छल में विवशता
विवशता के पल
पल के संबल
संबल था मन
मन में सिपाही
सिपाही का प्यार
प्यारी बहार
बहारें गयीं रूठ
रूठे जब ठूँठ
ठूँठों पर बुलावा
बुलावे पर हूक
हूक का बिछोङा
बिछोङे में देश
देश पर कुरबानी
कुरबानी की कहानी
कहानी गोली
गोली पर हल्ला
हल्ले पर धावे
धावों पर लाशें
लाशों में बर्फ
बर्फ पर निशान
निशान पर तिरंगा
तिरंगे का कफन
कफन पर जयहिंद
जयहिंद पर चितायें
चिता पर सिंदूर
सिंदूर पर अरमान
अरमान में बचपन
बचपन में लाचारी
लाचारी में बुढापा
बुढापे सी जवानी
जवानी की कहानी
कहानी में कफन
कफन पर मुहब्बत
मुहब्बत पर साथ
साथ जो टूटा
टूटा मन झूठा
झूठे संसार
संसार में वियोगी
वियोगिनी विलाप
विलापों की आग
आग पर कुटुंब
कुटुंब में संताप
संताप का पाप
पाप सी साँसें
साँसे अकेली
अकेली वो सुहागन
सुहागन वो विधवा
विधवा वो धरनी
धरनी वो बेटी
बेटी वो अंजानी
अंजानी की कहानी
©®¶©®
Jan 28

साँसों का ।

Sudha Raje
बहुत हुआ अब क्या करना है
आनी जानी साँसों का
बोझ बढ़ाती रही ज़िदग़ी यूँ
ही फ़ानी साँसो का।
आना जाना खेल तमाशा
जीवन रेलमपेल
तमाशा।
नापैदा क्या नामरता क्या
झूठा सारा मेल तमाशा।
एक तमाशा रहा बिछुङना
इन बेग़ानी साँसों का।
बोझ बढ़ाती रही ज़िंदग़ी यूँ
ही फ़ानी साँसों का।
मतलब की है दुनिया सारी
रिश्ते नाते उल्फ़त यारी।
मतलब जो ना समझा टूटा
प्यार बिके जैसे ज्यों गहने सारी।
बिकी साँस गिरवी हस्ती पर बोझ
ग़ुमानी साँसों का।
क्या है एक खिलौना दिल है
दौलत ही सबकी मंज़िल है।

कौन दिलों का दर्द पियेगा
जिसने पिया ज़िया मुश्किल है
"बा-ज़मीर दिल
हो ना पाया "सुधा "विरानी साँसों का
©®¶©®¶Sudha Raje
June 13 at

इक तमाशा है मुहब्बत।

Sudha Raje
इक तमाशा है मुहब्बत आज फिर
बाज़ार में
एक दूल्हा फिर बिका है रस्म के
दरबार में
एक माँ ने फिर लिया है कोख
का पूरा किराया
दूध का भी दाम माँगा फर्ज़ के
किरदार में
एक वालिद ने बिकाऊ कर
दिया कुलदीप को
और कीमत परवरिश की
माँगता रोज़गार में
भाई बहिनों ने लिये हैं दाम बचपन
खेल के
कुछ भिखारी भी हैं देखो
शक्ले रिश्तेदार में
क्या अजूबा शादियाँ क्या ही ग़जब
हैं धर्म ये
फायदा नुकसान देखा
दिल के कारोबार में
क्या गुनहगर हैं कि बादे-शब
भी डरने लग गये
चोर की शक्लों में बैठे
ठग सुधा परिवार में
©®¶©®¶
Sudha Raje
Feb 2 ·

देखा ही नहीं

Sudha Raje
Sudha Raje
जी भर के जिसे
देखा ही नहीं
हम ऐसे प्यार पे रोये
हैं
इनक़ार नहीं इक़रार नहीं
दिल के इज़हार पे रोये हैं

इक़ तर्ज़े तमन्ना की शम्माँ
इस दिल में जली आतश
बनकर
इक फर्ज़े मक़ैयद मोहलिक़
दिल
गम -नौश मुहाज़िर दम
नाज़िर
★दीवार नहीं दैयार
नहीं हम क़ौलो क़रार पे
रोये हैं
जी भर के जिसे
देखा ही नहीं
हम ऐसे प्यार पे रोये हैं
★वो शख्से -शराफ़त
नादीदा
मैं मर्ज़े मुकद्दस ख़्वाबीदा
ना वस्ले हरम ना हिज़्रे
क़रम
वो ख़िज्रो -
बहारां हदी सदा
*★आसार नहीं अहज़ार
नहीं
इश्क़े -अहरार पे रोये हैं
★ज़ी भर के जिसे
देखा हि नहीं
हम ऐसे प्यार पे रोये हैं
अनजान मुसाफ़िर रस्ते में
इक दर्द
का रिश्ता सा क़ायम
अहलामे मुहब्बत थे तो मगर
अहसासे अदब
भी था दाईम
आज़ार नहीं
अज़्कार नहीं अपने इख़्त्यार
पे रोये हैं
ज़ी भर के जिसे
देखा ही नहीं हम ऐसे प्यार
पे रोये है
©®¶©®
Sudha
Raje
Feb 14

बस मैं क्यों।

अज़नबी ग़ैबी शहर में अब
तलक बस मैं ही क्यों
आज तक इस रहगुजर पै बेशज़र
बस मैं ही क्यों
मैं ही क्यों बेज़ार सबसे बे
नज़र बे दार गुम
रंज़ो ग़म खुशियाँ मुरव्वत बे
असर बस मैं ही क्यों
हर तरफ निस्बत
शनासा लोग कितने
आशना
फिर
यग़ाना यक़ता तन्हा उम्रभर
बस मैं ही क्यों
दिल ये क़ाफिर
जां नमाज़ी रूह ये
आतशपरस्त
अक़्ले अज हद ये किताबी
बे ख़बर बस मैं ही क्यों
क्या रखा है मेरे पहलू में बरफ़ आतश
ज़हर
जलता जमता मरता साक़िन
घर बदर बस मैं ही क्यों
काँच के वे ख़वाब लगते थे कभी ना खोयेंगे
हाथ में टूटे चुभे ख़ूने ज़िग़र बस मैं ही क्यों
क्या कोई मेरे
सवालों का ज़वाबी भी कहीं
है सुधा शायर वले
बाग़ी मुहाज़िर मैं
ही क्यों
©®¶©©¶©®
Sudha Raje
Dta ★Bjnr
Mar 10

मेरे पापा।

मेरी ज़िद हर बार किये पूरी वो मेरे
पापा ।
जिनके लिये व्यर्थ सीमायें
दूरी वो मेरे पापा ।
डर? जिनके आते डर जाते नटनागर मेरे
पापा ।
धीरज जिनके आगे नीरज वो सागर मेरे
पापा ।
सबसे पहले घर में जागे वो चिङिया मेरे
पापा ।
बुनते गये स्वप्न बिन माँगे
वो घङियाँ मेरे पापा।
बिना कहे चेहरे से पढ़ ली भूख प्यास
वो जादूगर ।
मेरे ग़म में रोये खुशी में नैना भर मेरे
पापा ।
पहली गाङी पहला घोङा शिक्षक
भी मेरे पापा ।
सखी सहेली आया सेवक रक्षक
भी मेरे पापा ।
सुधा सवेरा शाम रात दिन
सरदी गरमी पावस भी ।
धूप चाँदनी पूनम दीवालीमावस
मेरे पापा ।
मिलन बिछोङे आँगन
गलियाँ पापा सपनों की गलियाँ ।
आँसू में मुस्कान खुशी
की कलियाँ भी मेरे पापा ।
I love you Papa!!!!!!
©®Sudha Raje

वक़्तऐसा भी कभी आता ह

वक़्त
ऐसा भी कभी आता है
आईना भी हँसी उड़ाता है
एक अंजान शक्ल
दिखती है
कोई गुमनाम
मुँह चिढ़ाता है
चीख भीतर से
चीरती सीना
दर्द आँखों में तैर जाता है
ये मैं नहीं हूँ अक़्स कहता है
ग़म ख़यालों में डूब
जाता है
टूट जाता है दर्द से कोई
जी ते जी दिल
क़फ़न
ओढ़ाता है
खुद
उठाता है
ज़नाजा अपना
कब्र भी अपनी खुद
बनाता है
मर्सिया अपना खुद
ही पढ़ता है
फातिहा खुद का खुद
ही गाता है
मिट्टियाँ मुट्ठियों से
खुद अपनी
रोज़ खुद खोद के
चढ़ाता है
खुद से खुद होके
ज़ुदा रोता है
अपना ताबूत खुद
बनाता है
रोज तिल तिल
सा खींचता मय्यत
खुद को यूँ कब्र में
सुलाता है
फिर तड़प के बिलख के
रोता है
और घुट घुट के दिन
बिताता है
अपने अरमान
शम्माँ की सूरत
अपनी दरग़ाह पे
जलाता है
अपने रेज़ा हुये से
ख्वाबों को चादरे-ग़ुल
में छिपा जाता है
अपना मौला हो मन्नतें
खुद से खुद
रिहायी की माँग
आता है
खुद से करता है
इल्तिज़ा ज़ी ले
कोई मरके भी जिये
जाता है
वालिशे-दर्द पे
बिखरता है
महफिले-ज़श्न
मुस्कुराता है
थी "सुधा" शर्त
जिन्दा रहने की
मेरा दिल
दोस्तो निभाता है
© SUDHA RAJE

गाँव मेरा हो गया बीमार बाबू क्या कर

गाँव
मेरा हो गया बीमार
बाबू क्या करें
अब नहीं पीपल में
ठंडी ब्यार बाबू क्या करें
हल बिके तो बैल
भी कलवा कसाई ले गया
गाय बूढ़ी कट
गयी लाचार बाबू
क्या करें
मेंड से सौ पॉपुलर के पेङ
लगवाये थे कल
आज नालिश पर
पङौसी यार बाबू
क्या करें
शाम से
देशी का ठेका रोज
ही आबाद है
और मंदिर हो गये बेकार
बाबू क्या करें
कल तलक चौपाल पर
था पंच परमेश्वर खुदा
आज बस ऐयार की जयकार
बाबू क्या करें
दूध डेरी पर
गया सब्जी गयी शहरों को सब
गुङ मठा दुर्लभ हुआ अच्चार
बाबू क्या करें
रोज गन्नों
झाङियों नदियों में लाशें
मिल रही
लङकियाँ दहशत में खुश
बदक़ार
बाबू क्या करें
कौन लिखता है रपट खर्चे
बिना चौकी पे अब
फैसला रिश्वत
का थानेदार बाबू
क्या करें
गाँव के तालाब पर परधान
का गोदाम है
मच्छरों कुत्तों की है
भरमार बाबू क्या करें
पाठशाला में जुआ दिन
रात चलता है यहाँ
दोपहर का भोज खाते
स्यार बाबू क्या करें
कब से आँगनबाङियों का
माल मंडी जा रहा
बनते बीपीएल जमीनदार
बाबू क्या करें
सस्ते राशन की दुकानें एक
दिन ही खोलते
करते काला माल फिर
बाज़ार बाबू क्या करें
फौजदारी के मुकदमें भाई
बेटों से चले
गाँव का गुंडा ही ठेकेदार
बाबू क्या करें
अब जनानी जात पर
भी छेङखानी ज़ुल्म भी
रामलीला में
पतुरियाँ चार बाबू
क्या करें
कल तलक जो गाँव लगता
चित्र
में इक मित्र सा
आज जैसे देश का ग़द्दार
बाबू क्या करें
चोर भी हैं ठग लुटेरे तंत्र मंत्रों के क़हर
भूत प्रेतों के सिपहसालार बाबू क्या करें
इमरती का मर्द कलकत्ते से
लाया एड्स है
शामली की कोख
बेटी मार बाबू क्या करें
गाँव में आकर
सुधा "देखो तो कितना है
सितम
औरतों पर रोज अत्याचार
बाबू क्या करें
©®¶©®
Sudha Raje
Dta★Bjnr

कैसे इतनी व्यथा सँभालेबिटिया हरखू बाई की

कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की
अम्माँ मर गई परसों आ
गयी जिम्मेदारी भाई
की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की
आठ बरस की उमर
अठासी के
बाबा
अंधी दादी
दो बहिनों की पर के
करदी बापू ने जबरन शादी
गोदी धर के भाई हिलक के
रोये याद में माई की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की
चाचा पीके दारू करते
हंगामा चाची रोबै
न्यारे हो गये ताऊ चचा सें
बापू बोलन नईं देबे
छोटी बहिना चार साल
की
उससे छोटी ढाई की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की
भोर उठे अँगना बुहार कै
बाबा कहे बरौसी भर
पानी लातन नल से तके
परौसी देबे लालिच कर
समझ गयी औकात
लौंडिया जात ये पाई
पाई की
कैसे इतनी व्यथा सॅभाले
बिटिया हरखू बाई की
गोबर धऱ के घेर में
रोटी करती चूल्हे पे रोती
नन्ही बहिन उठा रई
बाशन
रगङ राख से वो धोती
बापू गये मजूरी कह गये
सिल दै खोब
रजाई की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की
भैया के काजैं अम्माँ ने
कित्ती ताबीजें बाँधी
बाबा बंगाली की बूटी
दादी की पुङियाँ राँधी
सुनते ही खुश हो गयी
मरतन ""बेटा ""बोली दाई
की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखू बाई की
जा रई थी इसकूल रोक दई
पाटिक्का रस्सी छूटे
दिन भर घिसे बुरूश
की डंडी
बहिनों सँग मूँजी कूटे
दारू पी पी बापू रोबै
कोली भरैं दुताई की
बाबा टटो टटो के माँगे
नरम चपाती दादी गुङ
झल्ला बापू चार सुनाबै
चाची चुपके कहती पढ़
छोटी बहिन
पूछती काँ गई
माई रोये हिलकाई की
©®¶¶©®¶Sudha Raje
Datia --Bij

ये हिंद बेटियों का भीहिन्दोस्तान हो

Sudha Raje
संविधान अब बदल
नया विहान हो
ये हिंद स्त्रियों का भी
हिंदोस्तान हो
जिस देश के नियम करें
विभेद न्याय में
क्या दुर्दशा कि
ऱिश्वतें हैं मान्य आय में
ये देश आधा जब न
दर्द का ग़ुलाम हो
ये हिंद औरतों का भी
हिंदोस्तान हो
जब तक हैं बेटियाँ
विवश कि, बोझ स्त्रियाँ
कानून व्यर्थ
व्यर्थ तंत्र व्यर्थ
व्यर्थ कुर्सियाँ
गणतंत्र का न
अर्थ
व्यर्थ तामझाम हो
ये हिंद बेटियों का भी
हिन्दोस्तान हो
कैसै रूकें ये
डोलियाँ दहेज में जलीं
कैसे बचें ये मेंहदियाँ
जो प्रेम में छलीं
नर वासना में
बच्चियाँ
ना क़त्ले आम हों
ये हिंद खबातीनों का
हिंदोस्तान हो
कैसा वतन कि देश
मातृभूमि सरज़मी?????
बेघर है लावतन है
दुख्तराते हिंदवी
रहने-उङान
भरने
ज़मी--आसमान हो
ये हिंद बच्चियों का भी
हिंदोस्तान हो
हो क्यों कतल ग़रीब
की बेटी की हसरतें
क्यों टुकङे टुकङे माँस
काटती ज़रूरतें
लाशें न पेट से गिरें
ये घर की शान हों
ये हिंद नारियों का भी
हिंदोस्तान हो
है ख़ौफ से क़फस में
जब तलक ये लङकियाँ
मज़बूर हैं बढने से
और पढने से बेटियाँ
तब तक फिजूल हैं
विकास के बखान हो
ये हिंद लङकियों का भी
हिंदोस्तान हो
हमने भी जान दी है मुक्त
देश के लिये
जौहर किये है
भूख सही
होंठ सी लिये
अब देश पे शहादतों
का इम्तिहान हो
जयहिंद
देश मेरा भी
हो
आनबान हो
आज़ादियाँ
गुलामियों से मिलके
खो गयीं
साज़िश है
मज़हबों की
या सरकार सो गयी
फिर से
नयी ये
जंगे आजादी
का गान हो
कहते हो जन्म भूमि
इसे मादरे वतन
जननी को गालियाँ

बेटियों को
बस कफ़न
??????
छीने है जीने के
हुकूक़
बेईमान हो
गायेंगे
वंदेमातरम् जय
जयदेशगान हो
©®¶©®¶
We want justice
AAdha Desh Hunara Ho

अब भी सहरा में आँसुओंकी नदी बहती है।

Sudha Raje
अब भी सहरा में आँसुओं
की नदी बहती है।
बर्फ़ सरहद पे गिरी
गाँव" वो"सिहरती है
ख़ून में
लिपटा तिरंगा वो जिस्म
कद्दावर
बर्फ़ में दफ़्न
हरी वर्दियाँ बिखरती हैं
धुंध कोहरे को चीरते
वो लफ़्ज़ "जय भारत"
वो सफेदी पे लाल बारिशें
बरसतीं हैं
वो झुर्रियाँ वो आँखें
धुँधली हुयी रो -रो के
थरथराती वो थकाने
जो रोज़ मरतीं हैं
सफेद थान में
जिन्दा वो लाशें तन्हा हैं
वो "किलक" मुफ़्लिसी में
जो यतीम पलती है
वो उड़ाने जो मय्यतों पे
लायी आबादी
वो ज़नाज़े जो बरातें
भी रश्क़ करतीं हैं
वो सख्त सर्द
हवा जख्मी सिपाही कोहन
वो चिट्ठियाँ लहू से धुल के
अश्क़ भरतीं हैं
वो आँसुओं से तर-ब-तर भिंचे
नरम तकिये
कलाई सूनी रजाई खनक
पिघलती है
आह वो आग वो दिल
ज़िस्मो -ज़ां ज़मीर जले
वो ख्वाहिशें जो गर्म ख़ून
में मचलतीं हैं
वो गर्म गर्म बयानों पे
सियासत ठंडी
वो सर्द फर्ज़ राहतें फ़रेब
करतीं हैं
वो ख़ैरख्वाह वो ग़ंज़ीने
कहाँ गये बोलो? ?
अब भी बंदूक वो सरहद पे यूँ
ही चलती है
वो राखियाँ समाधियों पे
हिचकियाँ रखतीं
वो डोलियाँ जो बिना भाई
के निकलती हैं
वो आईने पे चाक़ चूर लहू
की बिन्दी
वो अपने खून से ज़र-बर्क़
माँग भरती है
आग बारूद वो संग़ीन
वो चमक़ लाशें
वो गली उँगलियाँ जलती बरफ
अकड़तीं हैं
सर्दियाँ वर्दियाँ ठंडी बरफ़
घने कोहरे
शबनमें चश्मे "" सुधा"" उफ्फ
चिनाब जलती है
©®¶©®¶
Sudha Raje
Datia--Bijnor

खनकती धूप की चादर प

Sudha Raje
Sudha Raje
खनकती धूप की चादर पे
सुखाया होगा
सिसकती रात ने जो दर्द
भिगाया होगा
आज ही घर में नहीं कोई
बात करने को
आज ही बच्चे ने इक दोस्त
बनाया होगा
शाम खामोश बिना बात
मुङ गयी होगी
मोङ पे तारों ने
"काली है"
चिढ़ाया होगा
रात ओढ़े हिज़ाब दर्द
धो रही होगी
चाँद पे दाग छुपा फिर नज़र
आया होगा
खुश-बयां खुश-रू-वो खुश-
रफ़्तगी में गुम होगा
ख़ू-बहा उसने ख़यानत से
कमाया होगा
नर्म होंठों पे गर्म बात
भी दबी होगी
ख़ूने-दिल रोकने को होंठ
चबाया होगा
उलटी रख्खी किताब पढ़
के रो रही होगी
कोई ख़त उसमें ऱखा फूल
छिपाया होगा
दैऱ के वास्ते थाली में
उदासी रख दी
कोई पत्थर का सनम मिलने
ना आया होगा
©®¶©®
Sudha Raje
Feb
19 ·

Monday, 17 June 2013

केवल एक खबर है साहब।

Sudha Raje
आना जाना अनजाने का केवल
एक खबर है साहब।।

कौन किसी के दर्द पे
रोया ऐसा मेरा शहर है
साहब।।

रोज किसी की चिता से
जिनकी रोजी रोटी चलती हो।।

कत्ले-आम' पे 'गिरती 'लाशें
त्यौहारी मंज़र है
साहिब।।

कल फुटपाथ बाँह में भरकर सोता था नभ
ओढ़ के जो।।

वो अनाथ मंटुआ शहर का दादा भाई क़हर
है साहिब।।

बस्ती में क्यों आग लगी थी जाँच
कमेटी बैठी है।।


झुग्गी बस्ती पर बिल्डर की ठेकेदार
नज़र है साहिब।।


कब्रिस्तान बहाना भर था असल बात
मतगणना है।।


राजनीति का ठेठ पहाङा बहुसंख्यक बंजर
है साहिब।।

नील लगे लकदक कुरते पर लाल
दाग थे धोये गये ।।


लालढाँग दरभा दिल्ली तक चूङी की झर
झर है साहिब।।

बहुत
चीखती हुयी आवाज़ों की मुखिया थी हरप्यारी।।

कई महिने से हुयी लापता
मरद हुआ बेघर है साहिब।।

भुने हुये काजू पिश्ते में
मुर्गी तंदूरी भी थी।।


शपथपत्र पर दस्तखतों पे लहू हिना खंज़र
है साहिब
copy right ®¶©®¶
सुधा राजे ।
Sudha Raje..........

Sunday, 16 June 2013

कहानी **तुम्ही हो बंधुसखा तुम्हीं हो****

बाप की औक़ात
तो थी नहीं लौण्डिया पैदा करके बैठ
गया । लगाओ फोन नौटंकी बाज़ को । ले
के जाये अपना ये तौफ्फा!!!!!
जोर से गरजते पति को मोबाईल पर नंबर
लगाते देख मीरा दौङी और मोबाईल
मुठ्ठी में पूरी ताक़त से भींच लिया ।
""पापा को बीच में मत लाओ प्लीज ।
तुम्हें जो भी कहना है मुझसे कहो ।
पापा की उमर हो गयी । अब कितने
दिन के मेहमान हैं कुछ पता नहीं ।
उन्होंने क्या किया!!! तुम्हें दहेज चाहिये
था तो विवाह के पहले कहा होता!!!
या तो दहेज मिलता या मना कर देते ।
तुम्हें लङकियाँ बहुत मिल जातीं ।
पापा को अगर घर वर
नहीं मिलता तो मुझमें ताक़त थी मैं
पापा की देहलीज पर सारी उमर काट
देती । या कुछ भी करती तुम कौन होते
औक़ात तक पहुँचने वाले? ""
?
मीरा कहते कहते आक्रोश में भर उठी ।न
चाहते हुये भी आँसू और आवाज़ तेज हो गये ।
आहा हाहा जैसे दूध का धुला है
तेरा बाप!!!! ये क्या पता था कि कंगले
कबाङी भिखारी की औलाद साले
मख्खीचूस धोखा दे देंगे चार
सौ बीसी करेंगे!!!!
सोचा था अच्छा खासा परिवार है कुछ
तो अपने मन से देंगे ही । लेकिन
नहीं यहाँ तो बारात चढ़ावे और दावत
का भी खर्चा पूरा नहीं निकला । कपङे
भी ऐसे दिये कोई संगम पै
भिखारियों को भी नहीं देता!!! और
तुम्हारी कमाई क्या हुई । कॉन्वेन्ट में
पढ़ातीं थीं वो पैसा कहाँ गया मोटी तन
थी सब खा गये साले बेटी का धन
पापी कहीं के ।
मेरी मति मारी गयी थी जो मैं हाँ कर
बैठा ।धोखे बाज नीच कहीं के । ""
मीरा के लिये यह कोई नई बात
नहीं थी । हर बार जब कोई
शादी परिचितों में और लङकी वाले
मोटी रकम दहेज दे जाते । पारस
का माथा चढ़ जाता । उसे लगता वह
योग्य था सुंदर और परिवार
का इकलौता चिराग तो उसे तो इससे
ज्यादा दहेज मिलना चाहिये था ।
मामाजी के थोथे आदर्शवाद ने
उसका लाखों का नुकसान कर दिया । अब
रही मीरा तो एक ही बच्चा होने के
बाद एक दम देहातिन और अनाकर्षक
लगती है । करती भी क्या है दस बीस
रोटियाँ बनाने के सिवा । एक मैं हूँ
सारा दिन खटता रहता हूँ । एक एक
सामान खरीदने में दस कीमती साल
निकल गये । एक ये कल के छोकरे ट्रक भर
सामान बिजनेस को मोटी पूँजी एक झटके
में मिल गयी ।मैं झींकता रहूँगा एक एक
सामान को सारी उमर ।
नर्क हो जाते वे दिन जब पारस
किसी की शादी से आता ।
पढ़ी लिखी सुंदर
मीरा आदर्शों की बलि चढ़ गयी । उसने
चाहा था बिना दहेज विवाह करे ।
किया भी । तभी हाँ की जब पारस के
परिवार मामाजी और सब जिम्मेदार
रिश्तेदारों ने मना कर दिया कुछ भी लेने
से । साल भर मीरा घर सँभालती रही ।
शादी के कपङे पुराने हो चले । पारस के
पिता भयंकर भौतिकवादी । एक एक पैसे
का हिसाब माँगते । कपङे की दुकान पर
पारस जैसे नौकर बनकर रह गया था ।
निजी कोई व्यापार करने
को पूँजी नहीं । पढ़ाई जैसे तैसे बी ए
किया था आता कुछ नहीं था नकल और
गाऊडें सिफारिशे और
नेता जी का भांजा होने से पास
होता रहा ।
घर से ज्यादा मामा के संगठनों के प्रचार
में बॉडीगार्ड कम ड्राईवर ।
मामा जी शातिर राजनीतिक लाभ के
लिये बिना दहेज की शादियाँ उन
रिश्तेदारों की करानी शुरू कर
दीं जो ठलुये या बङी उम्र के बेरोजगार थे
। पिता से बाग़ी पारस को पुत्र समान
घोषित कर जमकर तारीफें ली और
मीरा के परिवार में भी महान् बन गये
मीरा की दूर की मौसी पारस
की मामी थीं ।
लेकिन मीरा का जीवन बरबाद
हो गया । पिता से वह कभी कह
नहीं सकती थी कि पारस और उसके
पिता एक एक पैसे यहाँ तक कि चाय तेल
साबुन तक को तरसाते हैं । और पारस
दिनों दिन उग्र होता जा रहा था ।
पिता का सारा गुस्सा वह मीरा पर
निकालता ।
"""पुत्र भी पैदा करके नहीं दिया मनहूस
ने ""
अक्सर बङबङाता । दोनों के बीच पहले
साल का रिश्ता हमेशा को खत्म
हो चुका था ।दिन भर नयी नयी ग्राहक
लङकियों से मीठी मीठी बातें
करता मधुरभाषी प्रसिद्ध पारस
सीधा सादा लगता । जबकि ट्यूशन पर
सख्ती से इंग्लिश साईन्स मैथ
पढ़ाती मीरा तेज लगती ।
अब तो हाथ भी छोङ देता ।बहस का अंत
मीरा के बाप को जी भर गालियाँ देने के
बाद ही होता ।मीरा का मन दुखता ।
पापा को कैसे कहे कि
""पैसे की वज़ह से रिश्ता टूट गया!!! वह
अपनी सारी साधना समर्पण के बाद
भी दिल नहीं जीत पायी पति का!!!
पापा कर भी क्या लेंगे!!!! अब सब
संपत्ति भाईयों में बँट गयी। एक
कमरा पापा के पास बचा है । पेंशन है
सो भाभी को न दें तो खिलाये पकाये
कौन!!! पापा को बँटवारा करने से पहले
बेटी का खयाल तक क्यों नहीं आया?
पापा केवल फोन पर ही सुनकर कैसे मान
लेते हैं कि मैं सही हूँ!!!
वहाँ थी तो कितना दुलार जताते थे ।अब
याद भी नहीं रहता कि बिना बिजली के
बेटी पर क्या गुजरती होगी जबकि खुद ए
सी में पङे रहते हैं । सैकङों चैनल
वाला टी वी देखते हैं बेटी को घर में रात
दिन काम में जुटे रहने से फुरसत ही नहीं!!!
पापा आप सचमुच स्वार्थी हो पारस
सही कहते है । एक पुत्र होने के नाते
उसका हक़ है अपने पिता की संपत्ति पर
तो मेरा भी पुत्री होने के नाते है ।
पारस जिस परेशानी से गुजर रहे हैं
उसका हल है पूँजी । और पूँजी जब आपने
भाईयों में बे ज़रूरत बाँटी वे सब जॉब में थे
मकान बनवा कर बैठ गये तब बेटी याद
क्यों नहीं आयी पापा ।न पारस ने
माँगा न मैंने । लेकिन आपको अपने घर और
बेटी के घर का अंतर
तो दिखता ही होगा न!!! आपसे
या भाईयों से दो दिन भी बिना ए
सी रौशनी फ्रिज और डिश टीवी के
रूका नहीं जाता । तब उसी माहौल में
पली बेटी कैसे रहती होगी आप
कभी क्यों नहीं सोचते ।
मीरा का दिमाग उबल रहा था । अपने
आदर्शों की लहू लहू होते
दोनों परिवारों से देख रही थी ।
पापा ने मामाजी की बातों पर यकीन
कर लिया कि कपङे की दुकान पारस
चलाता है!! जबकि असली मालिक पारस
के पिता थे पारस तो बस खरचा निकालने
जा बैठता । दुकान भी किराये
की थी जबकि मामाजी ने न बताया न
पापा ने पूछा बस
अंदाजा लगा लिया कि दुकान निजी है।
घर में एक बाईक और एक बेड के अलावा हर
चीज पर पारस के पिता का दखल था ।
पारस अब सँभलना चाहता था मगर देर
हो गयी थी । वंशनाशिनी के कलंक से
पीङित मीरा जानती थी दूसरे बच्चे
का खरचा ट्यूशन के दम पर
नहीं उठाया जा सकेगा । ससुर तो सब
कमाई अपनी दोनों बेटियों पर लुटाते
रहते जिनकी शादी को बीस बीस साल
हो गये । दीदियाँ चालू शातिर वज़ीर
की तरह सलाहकार भी थीं ससुर जी की ।
मीरा तकिये में मुँह गङाकर रो उठी ।
सारी हिम्मत ढह गयी ।
ये आपने धोखा दिया पापा मुझे
डुबो दिया आपने ।मैंने इतना प्यार
किया भरोसा किया और मेरे आदर्शों में
कहीं आपकी संपत्ति शामिल नहीं थी ।
परंतु आपने तो पैरों से ज़मीन सिर से
आसमान ही खींच लिया ।
चलो चाय पी लो ।
ये पारस था
हमेशा की तरह झगङा शुरू होता मीरा के
बाप को कोसने से । और इसी तरह बेबस
मीरा जब रोती तो पारस खुद चाय
बनाकर पिला देता । लेकिन प्यार
तो भाप बनकर उङ गया था ।
मीरा बिलख पङी पारस की गोदी में
सिर रखकर ।
मुझे जलाकर मार दो । मगर मुझे विवश
मत करो पारस!!!
मैं उस घर से कभी दो पैसे नहीं माँग
सकती ।
किस मुँह से कहूँगी कि वे सब
बङी बङी बातें हवा हो गयीं!!!
चलो शहर चलते हैं कोई
नौकरी मजदूरी करेगे ।
पारस भी भावुक हो उठा
मैं कितना बे वकूफ हूँ ।
गलती किसी की सज़ा किसी और
को देता हूँ ।
बरसों बाद दोनों एक दूसरे की बाँहों में
थे । पारस का हाथ गीला हो गया ।
उसने बत्ती जलाकर देखा तो मीरा के
सिर से खून बह रहा था ।
ये कैसे लग गयी!!!
फिर उसे याद आया कि मीरा ने जब
मोबाईल भींचा हाथों में तब उसने तेज
धक्का दिया था कि मीरा खिङकी की च
से जा टकरायी और वही बैठी रह
गयी छोङ गया था वह ।
मीरा कभी चोट लगने पर नहीं रोती ।
आज इतना रोयी तो कुछ सोच
रही होगी ।
उसने पट्टी बाँधकर मीरा को बाँहों में
भींच लिया ।
अब नहीं कभी नहीं । कसम से कभी नहीं ।
सॉरी ।मीरा!!
पारस ने कान पकङे ।
कसम मत खाओ पारस । तुम जिस बात
की क़सम खाते हो वही टूट जाती है सबसे
पहले ।
अँधेरा खामोशी और दर्द
का साझा दीवार पिघल गयी ।
एक दिन मीरा को फिर उलटियाँ हुयीं ।
अब???
वह सोच में पङ गयी । पारस ने
कहा अबॉर्शन नहीं । अब जो होगा देखेंगे

दस साल बाद फिर बच्चा!!!डॉक्टर ने
खतरे की चेतावनी दी ।
पापा किसी को भेज देंगे । भाभी बहिन
भतीजी नौकर कोई तो आ ही जायेगा तुम
चिन्ता मत करो ।
मगर कोई नहीं आया मीरा को दर्द शुरू
हुये तो अस्पताल जाते नौ साल
की बच्ची अकेली कहाँ छोङती मीरा ।
साथ ले आयी ।
महिला सरकारी अस्पताल
की तीमारदार औरतों और आशा ने टोका
""कोई औरत साथ नहीं?
चुप पारस क्या कहता मीरा के परिवार
ने फिर धोखा दिया था । आने को कहकर
कोई नहीं आया था । क्योंकि महानगर से
इस कस्बे की असुविधाओं में पंद्रह दिन
बिताना उन लोगों के लिये नरक से कम
नहीं था । वह हँस पङा बोला
--""सिस्टर मेरे माँ बाप भी मर गये इसके
भी माँ बाप ही नहीं भाई बहिन भी मर
गये """
दर्द से चीखती तङपती मीरा ने
देखा पारस मुस्करा रहा था वर्षों बाद
ये फ़िदाईन मुस्कुराहट उसके चेहरे पर
थी ।
ऑपरेशन थियेटर में ले जाने से
पहले पारस ने रिस्क फॉर्म पर हस्ताक्षर
किये तो दहशत थी चेहरे पर
बच्ची की उंगली पकङे
लुटा पिटा सा खङा था ।
स्ट्रेचर पर से टॉप्स मंगलसूत्र उतारकर
पारस को दाँत भींचकर मीरा ने थमाये
और हाथ दबाकर चूमते पारस से
बोली ----"""तुम्हीं हो बंधु
सखा तुम्हीं हो तुम्हीं हो माता पिता तु
वह बेहोश हो चुकी सी लंबी गैलरी में
स्ट्रेचर पर ले जायी जा रही थी ।
पारस लॉबी में बेटी को कमर में भींचे
मृत्युंजय शिव की तस्वीर के सामने अंदर
ही अंदर चीख
रहा था मेरी मीरा को बचा को बचा लो

प्रकट में
बुदबुदा उठा --"""तुम्हीं हो माता पिता
तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो °°°°°°°°°°
°°°°°°°°°°°
ऑपरेशन थियेटर तीन घंटे बाद नर्स
बाहर निकली गुलाबी कपङे में नरम
बच्चा थरथराते हाथों में थमाकर बोली
""मुबारक़ हो भाईसाब बेटी हुयी है
भाभी जी खतरे से बाहर हैं । शाम तक
होश आ जायेगा ।
पारस ने बेटी को सीने से चिपकाकर जेब से
पाँच पाँच सौ के कुछ नोट निकाले और
नर्स के हाथ में थमा दिये

बङी बेटी नन्हीं बहिन को देख
ताली बजाकर गाने लगी उसे गोद में
बैठाकर
--""तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो ।
तुम्हीं हो बंधु सखा तुम्हीं हो '''''
पारस ने दोनों को बाँहों में भींच
लिया ।
""मुझपर गयी है ""
©®¶©®¶
सुधा राजे
Sudha Raje

इतना तो सह लूँगी।

इमरतिया!!!! अरी ओ कलुमँही!!!! कहाँ मर
गयी राँड!!!!
इस आवारा लौंडिया ने भी जी दिक् कर
रखा है ।
जब देखो तब 'छूटी धाई घोङी भुसौरे पै
ठाङी'
आने दो आज टाँगें तोङती हूँ ।
ओ छिद्दू!!! छिद्दू बेटा!!!
इमरतियाँ की अम्माँ की हाँक सुनकर एक
किशोर लङका आ खङा हुआ । चेचक के
दागों से भरा चेहरा और गुटके से रंग दाँत
। वह दुछत्ती में बैठा अश्लील किताबें पढ़
रहा था और रेडियो पर गाने सुनता हुआ
बीड़ी में सुलफा भर के पी रहा था ।
अम्माँ की चीख पुकार सुनकर मिट्टी से
लिपे पुते कच्चे घर के कच्चे आँगन में नीम के
नीचे मिर्च का अचार
भरती अम्माँ की खाट पर आ बैठा ।
और पनडिब्बा से सरौता निकालकर
छाली कतरने लगा । अम्माँ बोली
""चल दो पान लगा और इमरतिया को देख
के आ तो कहाँ उङ गयी भूरी बिल्ली । ""
लङके ने इत्मिनान से पान लगाये एक
अम्माँ को दिया एक शान से अपने जबङे के
हवाले किया और गुर्राया
""
का है अम्माँ काँयें काँयें फिर शुरू??? ""
अब का हम हर वखत
इमरतिया की रखवाली में बैठे रहें???
इम्तिहान सिर पर हैं पढ़न देओ तौ ठीक है
नहीं फेल हो गये तो नाक
तो तुम्हारी कटेगी ।बाउजी तो जैसे
जनम जनम का खार खाये बैठे हैं ।
लङका बङबङाता खपरैल के घर से बाहर
धूल उङाती गली में बने मिट्टी के चबूतरे
पर जा खङा हुआ तनकर और पूरी ताकत से
चीखा
--""इमरती sssssssssssss
घर चल मुंडी फोङ दूँगा
दूर मास्टर साहिब की बिटिया के
साथ पाईथागोरस की प्रमेय
समझती इमरती की चोटियों से
एङियों तक पसीना छूट गया ।।
वह किताबें समेटती भाभी बेतहाशा दम
छोङकर ।
""आयी दादा ""
लङका विजयी भाव से मुस्करा उठा ।
लङकी अपराधी की तरह सिर झुकाये
खङी थी ।
लङके ने उन मूँछों पर ताव
दिया जो अभी निकली ही नहीं थीं
"""फिर उस मास्टर की लौंडिया से
मिलने चल पङीं???
कित्ती बार रोका है!!!! वे लोग अच्छे
लोग नहीं हैं!!!
वो लौंडिया तो पक्की बदमाश है । पूरे
स्कूल में बदनाम ।!!!
कहते कहते भेङिये की सी गुर्राहट के साथ
लङके ने लङकी को पीटना शूरू कर
दिया । लङकी जमीन पर गिर पङी ।
चोटियाँ पकङ कर फिर उठाया और फिर
पीटना शुरू कर दिया ।।
""नहीं दादा अब कब्ही कब्ही भी नईँ
जाऊँगी """
लङकी चीख रही थी मार
खाती जाती और हाथ जोङती जाती ।
लङके ने अब नीम की झुकी डाली से
टहनी तोङी और साँय साँय हवा में
भाँजी । लङकी का हलक़ सूख गया वह
आतंक से चिल्लायी ।
""दादा नईँ नईँ दादा नईँ
अम्माँ बचा लो अम्माँ अब
कभी नहीं जाऊँगी ""।
अम्माँ ने चोटी पकङ कर दोहत्थङ पीठ
पर ठोके और गालियाँ देनी शुरू कर दी
"""कुतिया रंडी छिनाल हरामखोर
आवारा!!!!!!! मैं यहाँ अचार
का मसाला कूटने को कबसे बैठी हूँ तू
वहाँ उस बदमाशन के साथ मौज ले
रही है। """
लङकी के होंठों से खून बह
रहा था चोटी खुल गयी बाल बिखर गये
और वह खटिया के नीचे घुसी पङी थर थर
कांप रही थी ।
लङके ने अहसान दिखाया ।
"""देख लो अम्माँ कहे देता हूँ अबके घर से
बाहर मिली तो टँगङी तोङ दूँगा ।एक
तो इंटरमीडियट की पढ़ाई ऊपर से ट्यूशन
मास्टर को कुछ समझाना नहीं आता और
क्लास टीचर है उस बदमाशन मीनू
का बाप । जो लौंडिया तो सँभाल
नहीं सकता मैथ का खाक़ पढ़ायेगा । हमने
तो कहा था आर्ट लिये लेते हैं बाउजी के
मारे चले तब न!!!! अरे आर्ट पढ़के भी आई ए
एस बन गया मंटुआ का भाई । """
अम्माँ अहसान मानती भारी भरकम
जिस्म को ठेलती उठी और अंदर घी दूध
मलाई डालकर सत्तू घोलकर ले आयीं ।
लङके ने कटोरा भर सत्तू खाया । आँख
बचाकर अम्माँ के कूल्हे पर धोती की लपेट
में रखे रुपये जेब के हवाले किये और
गुनगुनाता हुआ घर से बाहर निकल
गया कहके कि जा रहा है नोट्स बनाने ।
इमरतिया खाट से बाहर निकली हाथ मुँह
धोये और अमचूर राई हल्दी मिर्ची कूटने
बैठ गयी । लोहे का भारी "खल -बट्टा"
चलाते वह कल्पना कर रही थी कि ये
मोटी गाँठें हल्दी की नहीं छिद्दू
की खोपङी है । और हाथ तेजी से चलने लगे
दाँत भींचकर । सारा काम निबटा कर
लालटेन माँजी और अटारी में रखने
गयी तो देखा छिद्दू की टेबल पर
किताबों के बीच अश्लील किताबें दबी हैं
। रंग देकर उत्सुकता वश खोल ली और
पढ़ना शुरू किया तो सनसनी रहस्य
रोमांच का सन्नाटा खिंच गया ।
""तो यो पढ़ते हैं छिद्दू दादा!!!! मैं
अभी बाऊजी को बताती हूँ ।
सोचते सोचते वह
मिट्टी की बनी सीढ़ियाँ उतरती जा रह
तभी आँगन से बाऊजी की पुकार
सुनायी दी ।
""इमरत!!!
बेटा पानी लाना तो ।
वह जल्दी से पीतल का लोटा माँजकर गुङ
चने और भूजा लेकर बाऊजी के आगे
जा पहुँची ।
हाथ पाँव धोकर बाऊजी ने गुङ चने
भूजा खाकर
पानी पिया वरदी उतारी और खपरैल
वाले पौर की लकङी की एक
बङी सी खूँटी पर टाँग दी ।
इमरती ने हाथ में थमी किताबों का बंडल
बाऊजी के आगे रख दिया ।
""पढ़ते हैं छिद्दू दादा ""
बाऊजी लुटे पिटे ठगे से देख रहे थे । साथ
में बटोर लायी थी बीङियों और
सिगरेटों के टोटे ।
छिद्दू हमेशा ऐसी चीजें संदूक में
ताला लगाकर बंद करके जाता था । उस
दिन धोखे से वह भूल गया ।
इमरती दसवीं में पढ़ती थी । छिद्दू हर
कक्षा में दो साल कभी सपली मेंट्री से
निकलता जबकि बिना ट्यूशन के
रोटी चौका बाशन मसाला अचार पापङ
झाङू सँभालती इमरती हर साल पास
हो जाती । बाऊजी चपरासी की पोस्ट
पर आठवीं करके भर्ती हुये
सो बङा अरमान था बेटे को इंजीनियर
बनाने का । मास्टर की बिटिया मीनू ने
बताया था कि छिद्दू दादा बदमाश है
और उसको छेङता था । उसने पापा से कह
दिया तो उसके साथियों सहित
प्रिंसिपल ने मुर्गा बनाया था सबको ।
इमरती लङकियों के स्कूल में
पढ़ती थी जहाँ साईंस नहीं थी । वह
गणित पढ़ने मीनू के पास
चली जाती थी वे लोग अभी चार साल
पहले किरायेदार बनकर आये थे पंडित
जी के मकान में वहाँ झूला था गुड्डे
गुङियाँ और कैरम
भी जो कभी कभी इमरती भी सब
सहेलियों के बीच खेल लेती । हर पिटाई
के बाद एक दो सप्ताह वह जाना छोङ
देती थरथरा कर । फिर जैसे
ही अम्माँ लापरवाह होतीं सतसंग में
जातीं या सो जातीं वह पाँव दबाकर
बेंड़ा खोलकर चुपके से निकल जाती । मीनू
समझाती मत आया कर जब इतनी मार
पङती है । इमरती बताती मार तो रोज
ही किसी न किसी बात पर पढ़नी है ।
बस जब तुम्हा
घर आऊँ तो जानलेवा पङनी है । तो फिर
पढ़ाई ही जो पूरी कर लूँ । मीनू का घर
प्यार का मंदिर लगता । माँ चाय दे
जाती दोनों को अक्सर नमकीन और
बिस्किट भी । मीनू को लगता काश
मेरी माँ ऐसी होती ।तब झुरझुरी छूट
जाती गालियाँ और दुहत्थङ याद आ जाते
।,
*******
रात को आँगन में उपन्यासों का ढेर जल
रहा था । अश्लील
किताबों की होली जला दी थी इमरती
बाऊजी ने । अम्माँ हा हा कर करतीं रह
गयी मगर छिद्दू की जमकर
पिटायी हुयी । इमरती पर जब नीम
की टहनी से मार खाते छिद्दू की नजर
पङी वह मुस्कुरा रही थी । छिद्दू ने
ठान लिया इस मुस्कान का हिसाब
जल्दी चुकाऊँगा ।
इमरती बाऊजी के साथ ज़िद करके
चली गयी कस्बे में किराये के कमरे पर
रहने जहाँ बाऊजी और कुछ पुलिस वालों के
परिवार रहते थे ।
वहाँ गोपी पढ़ने में मदद कर देता छोटे
दरोगा जी का बेटा ।
इमरती के सपने जवान होने लगे । उस
दिन जो किताबें पढ़ीं थी दो तीन पेज
सब दिमाग में थरथरा जाते ।
गोपी की माँ नहीं थी इमरती कभी कभी
बनाकर दे आती । सपने गोपी के
भी जवान होने लगे थे । एक दिन
चिट्ठी लिख दी गोपी ने इमरती को ।
छिद्दू जब पैसे लेने आया गाँव से
तो इमरती की क़िताब देखने लगा ।
इमरती को पता ही नहीं था कि उसमें
गोपी ने कुछ रखा है वह अभी सिर्फ
सोचने तक ही डर डर कर लौट जाती ।
छिद्दू हँसा बङी जोर से ।
चिट्ठी बाऊजी के हाथ में थी ।
बाऊजी ने आव देखा न ताव कमर से बेल्ट
निकाली औऱ चोरों मुज़रिमों की तरह
इमरती को पीटकर अधमरा कर दिया ।
*****
इमरती की शादी हो गयी । रो धोकर
इमरती ससुराल आ गयी । बूढ़ा ससुर
खटिया पर बैठा हर वक्त
इमरती को घूरता रहता । घूँघट डाले कई
दिन हो गये घर में सास ननद
नहीं इमरती सारे काम करती ।
सोचती पति कैसा मिला??? सुबह
ही निकल जाता दुकान पर रात देर
को आता सो जाता ।
धनिया मिरची बसाते रहते । शहर में
किराने की दुकान थी पक्का घऱ गाँव में
बिना दहेज इकलौता गोरा लङका ।
एक महीना बीत गया । एक रात को
इमरती ने पति के सो जाने पर कमरा बंद
किया किताबी अंदाज़ में काले
अंतः वस्त्र पहने औऱ पति की पीठ से
जा चिपकी ।
उसकी उंगलियाँ जहाँ तहाँ भटक
रहीं थीं पहले शर्ट फिर पैंट निकालते
आदमी की नींद खुल गयी ।
"""बावली हो गयी क्या?? ये क्या कर
रई है??
उसने बत्ती जलाई
सजा धजा कमरा जगमगा उठा ।
काले अंतः वस्त्रों में
इमरती का मेहनती ठोस बदन
पुरानी चोटों के दागों सहित दम
दमा उठा ।
किताबी अंदाज़ में उसने अँगङाई ली।
आदमी आगे बढ़ा इमरती को बाँहों में भऱ
लिया उसके हाथ इमरती के ज़िस्म पर
भटकने लगे ।
वह हाँफ गया ।इमरती के सपने जल कर
खाक हो गये
उसके मुरदा जिस्म में जान नहीं पङी ।
लेकिन थोङी ही देर बाद वह
इमरती की छाती पर पाँव रखकर जूते से
उसे पीट रहा था ।
हर्रामजादी बदन में इतनी आग लगी है
तो कोठे पे जा के बैठ जा ।
जी भऱ के पीट कर जब वह थक
गया तो इमरती के पैर पकङ कर फूट फूट
कर रो पङा ।
!"मुझे छोङ के चली जा तू ""
अपने किसी पसंद के लङके के साथ ...
मैं तेरे लायक नहीं हूँ । वो तो बापू ने
जबरन शादी करा दी कहके गरीब
की लौंडिया है । खाने पहनने
को तरसी हुयी पङी रहेगी दूध
घी सोना देख के मैने सोचा बापू
को रोटी तो तमीज की मिलन लगेगी बस
जाईसे ब्याह कर लियो ।
इमरती चुपचाप उठी कपङे पहने कमरे के
कोने रखी मच्छर
दानी की लाठी उठा लायी ।
"""लेओ लाला जी रोज
की सौ लाठी मारियो इमरती उफ्
भी नहीं करेगी । पर अब जे घर छोङ के
दूसरा करबे वारी बात कतई सें बी कतई
तक मती बोलियो ।
आदमी ने लाठी हाथ में ले ली और तोङ
दी ।
"""ये घर तेरो ।मैं तेरो नौकर।
कभी कानी उंगली से भी चोट लगाऊँ
तो साँप काटे ।""
इमरतिया बच्चे की तरह पति का सिर
गोद में रखे सोच रही थी ।
सौदा बुरा नहीं सुना है चंपा का मरद
दारू पी के हाथ पाँव तोङ के मायके पटक
गया दहेज में राजदूत माँगी है ।
^^^^
इमरतिया मायके आयी है ।
अम्माँ को कलकतिया साङी । छिद्दू
को जीन्स टी शर्ट और बाऊजी के लिये
चमङे का दरोगा जी जैसा बैग लायी है ।
बायने में टिपारे की सब मिठाई मावे
की बादाम वाली ।
शाम को सब मुहल्ले की औऱतों से
अम्माँ कह रहीं थीं
""ऱानी बनाकर रखते
है पहुना ।"
छिद्दू बोल पङा
"""औऱ हार नहीं देखा इमरती का पूरे
सात तोले का ""
वापस ससुराल आकर जब इमरतिया ने बटुआ
खोला तो मुसकुरा पङी उसमें रखी एक
जोङी पायलें गायब थीं ।
आदमी से कहा तो बोला । गिर गई
तो गिर जाने दो दूसरी ला दूँगा ।
इमरती पायलें पहनकर बार बार पैर
बजा रही थी ।
इतनी मार खायी देवा अब दर्द
नहीं होता ।
गाय रँभा रही थी वह पानी पिलाने चल
पङी ।
©¶©®¶
sudha Raje
सुधा राज

कहानी **एक और दक्ष यज्ञ **

तो तुम आयी ही क्यों???
तुम्हें बुलाया किसने था??
एक तो बिना बुलाये मुँह उठाये
चली आती हो!!!!
फिर हर काम में दखलंदाज़ी करती हो!!!
विशालकाय आँगन के बीच
खङी अपनी बेटी पर गरज़ते उस हृष्टपुष्ट
प्रौढ़ पिता के सामने सिर झुकाये
तुलसी चौरे की टेक लिये एक हाथ में
पूजा की थाली पकङे
सौदामिनी की आँखों में लरज़ते उबलते आँसू
सँभल नहीं रहे थे । वह रूलाई रोकने
की ज़द्दो ज़हद में काँप उठी । जब कुछ
नहीं सूझा तो धम्म से ज़मीन पर बैठ
गयी ।
ये वही घर है क्या???
जिसे बचपन से रँगोली से सबसे
ज्यादा हुलसकर वही सजाती थी!!!जब
दीवाली होली राखी गणपति और तमाम
त्यौहार आते ही वह पत्थर के चबूतरे गाय
के गोबर से लीपकर।फूल दूब अक्षत
रोली हलदी गुलाल आम अशोक
की मंजरियों केले के
पत्तों मौली कलावा सिंदूर से सारे
देहरी दरवाजे खिङकी रोशनदान
सजा धजा कर कलश रखती ।
मकान की दूसरी मंजिल जब बन
रही थी तब किशोरी सी उम्र में
कितनी ईँटे ढोयीं!!! नन्हें
हाथों की उंगलियों के पोर छिल छिल
जाते खून रिसने लगता लेकिन
सौदामिनी का जोश नहीं रूकता ।
तुलसी गुलाब मेंहदी मनी प्लांट फर्न
डहेलिया और कितने ही फूल पौधे उसने
सहेलियों स्कूल कॉलेज बाजार से
ला लाकर गमलों क्यारियों में लगाये थे ।
मकान जब पुताई होती तो पूरे
दो सप्ताह वह हर सामान रगङ रगङ कर
साफ करती धोती पोंछती और
चूना रगङती हथेलियों पर छाले पङ जाते
। आज भी उसके काढ़े कुशन तकिये चादरें
मेजपोश परदे बे मिसाल नमूने की तरह हर
खास मौके पर निकाले और सहेज कर रख
दिये जाते हैं ।
हर कमरे में उसके बनाये चित्र अब भी टँगे
है ।
काँच का शो केस अब भी उसके लाये हुये
सजवटी सामानों से भरा पङा है । उसके
जीते इनाम और संकलित गीत
गजलों की कैसेट्स अब भी रखी हैं और
बजायी जातीं हैं । पीले बल्बों की जगह
हर कमरे में सी एफ एल उसने
ही अपनी छोटी छोटी बचतों से
लगवायीं थीं ।
बस एक झटके में इस घर से
उसका रिश्ता हमेशा को ख़त्म?????
इस घर में घुटनों के बल चलकर बङी हुयी ।
इसी आँगन में तुलसी की आरती के दीप
धरते वह एक दिन दूसरे घर चली गयी । ये
दीवारें ये छत ये आँगन ये चबूतरे उसके लिये
केवल भौतिक पदार्थ या सामान मात्र
नहीं थे । यहाँ की हर चीज एक
रिश्ता रखती थी । स्टेशन पर उतरते
ही वह सबसे पहला काम
करती थी भूमि को प्रणाम् । घर पर
टैक्सी से उतरते ही देहरी पर दोनों और
माथा टेकती और स्वर्गवासी माँ को नमन्
करती जहाँ आखिरी बार
माँ को देखा था पलट कर जाते
छलछलाती आँखों से ।
भतीजी की शादी थी । वह निमंत्रण
पाये बिना ही चली आयी थी । जब
भतीजी ने फोन पर कहा कि बुआ जी आप
जल्दी आ जाना क्योंकि यहाँ कोई
दूसरा मदद को नहीं है । कार्ड
तो अभी छपे नहीं हैं और
पापा को छुट्टी अभी नहीं मिली ।
माँ के मरने के पूरे तीन साल बाद
आयी थी वह । आ ही नहीं पाती थी ।
ससुराल में भरा पूरा संयुक्त परिवार
था और हजारों तरह
की ज़िम्मेदारियाँ थीं ।
आयी तो देखा माँ की तसवीर
हटा दी गयी थी । हर तरफ
अफरा तफरी मची थी । सारे गमले पौधे
सूख चुके थे और अब सब हटाकर छत पर
कबाङ में पङे थे । तुलसी घरूआ
तोङा जा रहा था । क्योंकि मँझले भाई
बँटवारा चाहते थे । आँगन के ठीक बीच में
कभी उसने नन्हें
हाथों मिट्टी का तुलसी चौरा बनाया थ
कुछ साल बाद माँ ने उसके चारों तरफ
सीमेंट लगाकर पक्का करा दिया था ।
काले पत्थर के सालिगराम एक बार स्कूल
टूर पर जाते वक्त वह नदी से निकाल
लायी थी । रोज चंदन लगाती और
परिवार के लिये दुआयें माँगती माँ यहीं ।
पिताजी तो बस तनख्वाह सौंप कर
बरी हो जाते । माँ खटती रहतीं एक एक
पैसे को । ऊपरी कमाई तन्ख्वाह से
ज्यादा थी और शराब कबाब शबाब पर
पिताजी उङाते रहे थे । माँ कुछ
कहतीं नहीं थी मगर
कुढ़ती घुटतीं रहतीं वेतन से अलग एक
पैसा नहीं लेती पिताजी से ।
उन्हीं पैसों को जोङ जोङ कर माँ ने बीस
साल में एक कच्चे घर को विशालकाय
कोठी में तब्दील कर दिया था तीन
बेटों के तीन बङे बङे कमरे बनवाये थे और
अपने लिये रसोई के बगल
वाली कच्ची कोठरी रख छोङी थी जिसे
अबके इसी को पक्का कराना है कहते कहते
माँ कच्चे कमरे में ही चल बसीं थीं ।
माँ के मरते ही बङे ने
कोठरी पक्की कराके अपनी जवान
हो रही बेटी को पृथक कमरा सौंप
दिया था ।
सौदामिनी और
कामिनी दोनों बहिनों के कमरे छोटे और
मँझले ने बाँट लिये थे । सबके हिस्से
दो दो कमरे और एक एक टॉयलेट किचिन
आया था जो माँ ने पहले
ही बनवा छोङा था । बङी सी विशाल
बैठक पोर और बाहरी मेहमान खाने के
तीनों कमरों से तीन दरवाज़े अलग अलग
कर लिये गये थे । मुख्य
दरवाजा जहाँ माँ को आखिरी बार
देखा था सौदामिनी ने मँझले के हिस्से
आया ।
सौदामिनी ने सिर्फ़
इतना कहा था कि कामिनी और
भतीजी मिलाकर परिवार की तीन
ही बेटियाँ है छोटे और मँझले के
बेटी नहीं है तो आँगन में दीवार मत
खङी करो । इसे बेटियों का खेल
खिलौना आना जाना समझ के खुला रहने
दो सबके लिये क्या फर्क पङता है!!!!
आखिर बाहर ग़ैरों से बस ट्रेन
ऑटो रिक्शॉ पब्लिक टॉयलेट बैंक डाकघर
प्लेटफॉर्म अस्पताल दफ्तर कचहरी और
मंदिर हम सब साझा करते ही रहते हैं ।
कौन से ग़ैर हैं सब!!!! वही तो तीन बच्चे हैं
जो कभी एक ही पेट से निकले थे!!! एक
ही माँ का दूध पी कर पले!!! सब एक
ही बेड पर माँ से चिपके पङे रहते थे!!!! एक
ही स्कूल कॉलेज और कमरे में बङे होते रहे।
तीन बेटियाँ गयीं तो तीन आ
गयीं माँ गयीं तो मेहमान भी अब
नहीं आते । पिताजी के कमरे में
काफी जगह है जो आयेगा वहाँ ठहर
जायेगा ।
तुलसी घरुआ रहने दो । इसे देखकर माँ के
होने का अहसास होता है । बङे तो कुछ
नहीं बोले चुपचाप दफ्तर निकल गये ।
लेकिन आखिरी बार
तुलसी पूजती सौदामिनी बेबसी से बिलख
पङी सालिगराम के पत्थर पर सिर रख
कर । अब तुम किसके हिस्से जाओगे
सालिगराम जी??? वह
जानती थी कि आखिरी बार ये जल
चढ़ा रही है । जैसे तमाम सामान बँट
गया और बेचकर दाम बँट गये ।
बाकी अभी छत पर तिमंजिले के टीनशेड के
नीचे पङा है ये भी कहीं किसी दूसरे ठौर
हो जायेंगें ।
कबाङे में माँ के बनाये हाथ के दो पंखे
बिना डंडी के पङे थे उसने बङी भाभी से
पूछकर माँ की निशानी के तौर पर रख
लिये । कूलर ए सी के कमरों में
इनकी जरूरत ही कहाँ थी ।
पिताजी को पेंशन मिलती है ज़िस्म में
ताक़त है हजारों काम अनजाने में करते हैं
। सो हर लङका चाहता है पिताजी मेरे
हिस्से में आ जायें तो वह कमरा और
सालाना लाखों की पेंशन के साथ मुफ़्त
का रखवाला और नौकर भी मिले । चटोरे
पितजी खुद भी बाजारू चीजें खाते और
पोतों को भी लाते रहते । माँ के जाने के
बाद पङौस
की बेवा आंटी का आना जाना भी बढ़
गया था । भतीजी जयंती और बङे के
अलावा अब
किसी को सौदामिनी का आना पसंद
नहीं था । कामिनी करोङपति घर में
थी सो जब आती तब छोटे के साथ
रूकती मँझले के घर खाती और बङे के घर
मनोरंजन करती । जाते हुये
कीमती तोहफे रख जाती ।
बङी सी मँहगी विदेशी कार दरवाजे पर
खङी होती तो शान से तीनों बहुँयें नगर
भ्रमण कर डालतीं । बच्चे होटलों में
छोटी बुआ से पार्टी लेते । सब
कामिनी की सेवा में जुट जाते ।
कामिनी को घर या घरवालों की बजाय
पुराने दोस्तों सहेलियों और रईस
रिश्तेदारों से मिलने और पति पर मायके
का इम्प्रेशन जमाने का ज्यादा फितूर
सवार रहता । कामिनी के जाते ही सब
आलोचना करने बैठ जाते घमंडी है चालू है
स्वार्थी कंजूस हृदयहीन ।
सौदामिनी का वज़न अज़ीब था ।
उसकी उपस्थिति में सब संयत हो उठते ।
वह जैसे माँ के स्थान पर आ
खङी होती सबको एक पल
को भुला देती कि अब चूल्हे बरतन अलग हैं
। वह भतीजी के कमरे में रूकती और आँगन में
तुलसी के पास बैठकर सबको मजबूर कर
देती साथ खाने को । बङे न भी आयें
तो इन दिनों बच्चे औरतें सब साथ खाते ।
अपना खरचा कभी नहीं डालती किसी पर
। मगर आज दिल टूट गया था ।
पिताजी कठोर हैं सदा से ये
तो पता था लेकिन इतने निर्मम
भी हो सकते हैं उसने नहीं सोचा था ।
पङौस वाली भाभी ने
इशारा दिया तो था कि तुम
ऑटोरिक्शॉ से आती हो सस्ते
सूती कपङों में दो टके की अटैची लिये
बिना गहनों के
तो भाभियों भाईयों की इन्सल्ट
होती है । बुलाते तभी हैं जब घर में
फ्री की मजदूरनी चाहिये होती है
या बात कोर्ट कचहरी से बाहर सुलझाने
की नौबत हो तब ।
पिताजी का वश चले तो बुढ़ापे में
दूसरी रख लें । तुम्हारे आने से भतीजों के
गुरछर्रों पर भी लगाम हो जाती है ।
बहुओं के चाट मेले ठेले बंद तो कान भरती है
पिताजी और भाईयों के ।
सौदामिनी ने चुपचाप तुलसी के बीज आँचल
के छोर में बाँधे । कुछ पत्ते तोङे ।
मोबाईल से ठाकुर जी तुलसी और
माँ की तस्वीर की तस्वीरें लीं ।
तुलसी की जङ से मुठ्टी भर मिट्टी रूमाल
में बाँधी । माँ वह
साङी पहनी हुयी भतीजी से पूछकर
खोजी और ऱख ली जो वह माँ को दे
गयी थी परंतु मँहगी होने से
माँ पहनती कम थीं । सामने वाले घर से
लङके को कुछ रूपये एक्स्ट्रा देकर
रिक्शॉ बुलाया । और चल पङी ।
शादी तीन हफ
बाद थी । भतीजी को हाथ से एक
अँगूठी उतार कर पहनायी चार
साङियाँ रखीं माथा चूमकर सुहागिन
होने का आशीष दिया।
मोबाईल से पति को सूचना दी स्टेशन पर
लिवाने आ जाना ।
उसे लगा एक सती दहन आज फिर हुआ ।
दक्ष के महल में सती की भस्म
बिखरी पङी है ।
एक साल बाद उसके घर के आँगन में
तुलसी सालिगराम का विवाह
था देवोत्थानी एकादशी पर ।
माँ की तस्वीर सास की तस्वीर के बगल
में बिन डंडी बाले हथपंखे के फ्रेम पर
जङी मुस्कुरा रही थी ।
बिटिया आँगन में
आरती गा रही थी """वृन्दा वृंदावनी वि
सौदामिनी ने दुपट्टे से आँखें पोंछ ली । ये
आँगन हमेशा तेरा रहेगा मेरी लाडो तू
कहीं भी आये जाये ।
©®©®©®¶
Sudha Raje
सुधा राजे ।

मत कुरेदो घाव

आप अपने आपको बुद्धि जीवी मानते हैं
तो ज़ख्म क्यों कुरेदते है????
अभी एक मित्र की पोस्ट पढ़ी ।
सोचा वहाँ कमेंट कब डिलीट हो जाये इसे
कह ही डालूँ ।
************************
मत कुरेदो सूखते घाव दोस्तो
नफरतों का इतिहास बङा लंबा है
दोस्तो किसने किस तरह के और कैसे घाव
खाये है ये बार बार मत दुहराईये ।
आप हम सब जानते हैं कि कितने फर्क और
नफरतें कहाँ किन लोगों में कैसे कैसे पल
रही है ।
छोटी छोटी घटना मत कुरेदो जो भूल सके
तो भूलने दो चुन्नियाँ अर्थियाँ चीखें
दीवारे पलायन खंज़र बारूद और शरारे ।
न मिलें प्यालों से प्याले दिखावे
को ही सही एक कतार में चलो एक कुँयें से
पानी भरकर तो पी लें!!!!!
खाना पीना क्या ज़रूरी है एक
ही थाली में हो!! ।
एक दीवार के साये में पढ़ तो लें!! ।
न तेरा अल्ला वो माने न तू उसका ईश
मान पर दोस्ती तो तेरी और उसकी है!!!
अल्लाह और ईश्वर दोस्ती करेंगे
या नहीं ये उन पर छोङ दो!!!
वो तेरे घर बङे माल के कबाब
कोरमा बिरयानी पाये हलीम न खाये
तो बुरा मत मान ।
वो
अपने भाई के घर भी तो मच्छी पैटीज
आमलेट शिकार नहीं खाता ।
वो जब नहीं खाता लहसुन प्याज माँस
मछली तो उसे
परेशानी होती होगी दोस्त!!
उसकी बीबी और बेटी भी उसका अंडे
वाला केक नहीं खाती । न ही सिगरेट
पीने देतीं हैं कमरे में बैठकर ।
उसका बेटा उन गिलासों से
कभी पानी नहीं पीता जिनमें वह शाम
को ज़ाम बनाकर पीता है ।
बेटी भूले से भी उस हांडी में आलू
नहीं उबालती जिसमें दादा जी के लिये
मछली पकती है और ताऊजी के लिये झींगे
तले जाते हैं जिन कङाहियों में
उसकी भाभी माँ और दीदी उन
कटोरियों को अलग रख देती है
धो माँजकर जिनमें उसके दोस्त कबाब
बिरयानी माँस के कोफ्ते खाते हैं ।
सहेली के साथ वह हलुआ तो खाती है
लेकिन कबाब नहीं ।शीर और
सिवईयाँ तो खाता है वो । लेकिन जब
हलीम की बात आती है तो वह उसी तरह
दूसरी टेबल पर बैठ जाता है जैसे
पापा बचपन में फ्राईड फिश
खिलाना चाहते और वह दूर भाग
जाता था । वह हर रोज गाय
को पूजता है और वो सोचकर परेशान
हो जाता है कि किस बरतन में गाय
पकाकर खायी गयी होगी ।
परेशानी समझने की कोशिश करो ।
कल ही रसोईये अहसान चाचा ने हलुआ
मांडे बनाये जर्दा बनाया डटकर
खाया तो है उसने । तुम वह सब चीजें खाते
हो जो वह खाता है । लेकिन कुछ चीजें वह
तुमसे परिचय होने से पहले से
भी नहीं खाता ।
इस बात को तूल न दो वो पापा के
गिलास में पानी नहीं पीता लेकिन
पापा को खून दिया था ।
माँ उसका अंडाकेक नहीं खाती पर जान से
प्यारा है वो उसे ।
समझने की कोशिश कर तू मत लगा रंग ।
लेकिन इससे नफरत कब बढ़ती है!!!
दोस्ती और प्यार तो दिल के जज्बात है
। पता है नानी जब हरे चने का बूँट
की निमोना खाती और नाना हिरण
तो कहते चिढ़ा के घासफूसखोर ।
तूल न दो विभेदों को बस समानतायें
तो देखो कितनी हैं!!!
एक नागरिकता एक मुल्क वही अन्न
पानी हवा मिट्टी सङके गाँव
नदी तालाब पेङ कपास रेशम!!!
चल घर चल आज अदरक़ वाली चाय
पीनी है बाजी के हाथ की चाचा खजूर
लाये हैं मुनियाँ बता रही थी ।
चल फिर शतरंज खेलेंगे ।
दोस्ती दिल से जज्बातों से पगले ।
सामान तो बहिन भाई भी बाँट लेते हैं ।
©®¶©®¶
sudha Raje
सुधा राज

ससुराल का हौआ।

क्या तुम जाओगे इसके साथ ससुराल?
दिन चढ़ने को आया शहज़ादी जी अभी तक सो कर नहीं उठीं । दिन भर कभी टी वी
कभी रेडियो कभी पाटिक्का कंचे पतंग और सहेलियाँ । कल ही पूरा क्रॉकरी सैट
तोङ डाला । सिर चढ़ा रखा है छोरी को । कल को ससुराल में ये नखरे नहीं
चलने वाले । नाम तो मेरा थुकेगा कि माँ ने कुछ नहीं सिखाया ।
""""
कहते हुये माँ ने कल्पना चादर खींची ।
"उठिये राजदुलारी जी आठ बज गये "

क्या है माँ सोने दो ना । रात को एक बजे तक तो पढ़ाई की थी । अगले हफ्ते
एक्ज़ाम्स हैं । सुबह सुबह फिर भाषण ओफ्फ।""

कल्पना ने वापस चादर खींची तकिया सिर पर कान दबाकर रखा और अंग्रेजी का"
के"बनकर सो गयी ।

पापा ने मिन्नत सी की --
""सोने दो बेचारी को अभी नादान बच्ची ही तो है । समय के साथ अपने आप सब
समझ जायेगी । ""

-नादान?
माँ ने आँखें फाङीं!

अच्छा जी!!
पूरे सत्रह साल की हो गयीं लाडली समझे कुछ!!!
इतनी उमर में तो मेरे पिंटू भी हो लिया था । पूरे दस आदमी का खाना पकाती
थी मैं ""।

माँ ने पानी का लोटा भरा और कल्पना के ऊपर उँडेल दिया ।

ये क्या दुष्टता है लक्ष्मी? तुम्हें न तो कॉलेज में पाँच घंटे लेक्चर
सुनने पङते थे । न ही रात रात भर जाग के नोट्स बनाने पङते थे । छोटी उमर
की शादी और बच्चों ने कितनी बीमारियाँ परेशानियाँ दीं सब भूल गयीं क्या?
मेरी तन्ख्वाह का एक बङा हिस्सा आज तक तुम्हारे दवा औऱ परहेज पर जाता है
। औऱ ये क्यों भूल गयीं कि उन मेहनती काम काजों से ही परेशान होकर तुमने
परिवार से अलग होने की ज़िद ठान ली थी? । कितना हंगामा हुआ था जब तुम
मायके जा बैठीं थीं नन्हीं सी बच्ची को छोङकर? मुझे शहर किराये का कमरा
लेकर परिवार रखना पङा? सब मुझे ज़ोरू का ग़ुलाम बुलाते थे!!

पापा झल्लाये हुये ।

कल्पना भुनभुनाती उठी और बाथरूम में कपङे लेकर नहाने चली गयी ।

माँ चिढ़ गयीं ।

""ये ताने भी बच्चों के सामने मारने हैं!! चढ़ाओ सिर चढ़ाओ । मुझे क्या
फिर कल को मत कहना । कहे देतीं हूँ जिस घर जायेगी नाक कटायेगी कङिया
शहतीर काले करेगी । दाल छौंकने तक के लच्छन नहीं । दहेज में दो नौकर भी
भेज देना । पढ़ाई लिखाई से क्या होता है जाके चूल्हा और बच्चे ही तो
सँभालने हैं । इतने नखरे कोई मरद बर्दाश्त नहीं करेगा । हाँ मिल गया कोई
लल्लू मील्ला तो भले चल जाये । !"

पापा चीखे

खबरदार लक्ष्मी अब जो एक भी लफ्ज़ कोसा मेरी बच्ची को । ""

माँ रूँआँसी हो गयीं ।

हाँ हाँ मैं ही दुश्मन हूँ सौत की बेटी है न मेरी ये इसलिये जलती हूँ ।
ये चलेगी अगले हल लेकर । इसीसे होगा नाम रौशन । ये देगी चिता को आग ।
ये करेगी पिंडदान । आज से बोलू जो तो बिच्छू काटे ।


पापा बैठक में चले गये । माँ भीतर मढ़ा वाले कमरे में । कल्पना रसोई में
गयी । चाय परांठे सूखी सब्ज़ी बनायी । माँ के सामने रखी माँ ने मुँह फेर
लिया । पापा के सामने रखी । पापा तारीफ़ें करते नहीं थक रहे थे ।

बोले -"बेटा अपनी माँ की बात का बुरा मत माना कर । बङे दुख उठाये हैं ।
तेरे भले के लिये ही झगङती है ।

मैं जानती हूँ पापा ।

कल्पना कॉलेज को निकली तो माँ ने आवाज़ दी

सीधी घर आना ।

जी माँ ।

°°°°°°°
पाँच साल बाद कल्पना ससुराल से मायके आयी है।
लेक्चरर कल्पना ।

माँ हुलस कर पूछ रहीं हैं ससुराल के हाल चाल । अबके बस एक लङका और करले ।


पापा एलबम देख रहे हैं

कलपना से पूछते हैं । कैसा है मेरा बेटा?

कल्पना कुछ नहीं कहती बस दोनों हाथ पापा के गले में डालकर बैठ जाती है
सोफे पर कंधे पर सिर टिकाकर ।

पापा """"""""""""""

माँ मुहल्ले की औरतों में बैठी बता रहीं थीं
।""दामाद जी ने दो दो नौकर लगा रखे हैं । सास तो चाय भी बनाने नहीं
देती। धेवती के होने पर हजारों आदमियों को दावत दी ।""
तभी एक स्त्री बोली

--क्यों न हो लक्ष्मी जिज्जी!! चालीस हज़ार रूपिया हर महीने कमाकर जो
देती है कल्पो सबको । आपने तो हाईस्कूल कराके ही परायी कर दी होती । वो
तो भाई साब की बज्जुर की छाती थी जो पूरे कुनबे से टक्कर ले के छोरी को
आसमान पै बिठा के माने ।""

माँ की आँखें भरी थीं
""सही कहती हो कम्मो इसके पापा का ही कलेज़ा था जो कल्पो के लिये चट्टान
बने रहे मैं बावली तो डरती ही रह गयी ।""

कल्पना ने पीछे से आकर माँ के गले में सोने की चेन पहनाते हुये कहा ।
""और माँ के डरावने विवरणों ने मुझे मास्टर शैफ के साथ पढ़कर कमाने को
विवश किया ।माँ अब मैं रोज जल्दी उठ जाती हूँ ।
""
तभी पीछे से आवाज़ आयी
स्माईल प्लीज!!
""ये कल्पना की बेटी भी नाना पर गयी है ""

कम्मो हँसी
सबका फोटो खिंच गया ।

कल्पना ने आँखें पोंछी।

आय लव यू पापा।
©¶©®¶
Sudha Raje
सुधा राजे

Saturday, 15 June 2013

राजनीति आप और हम।

देश के पास कमज़ोर सरकार हर
समस्या की जङ है । भूटान जैसे छोटे से देश
तक में सांसद की न्यूनतम
योग्यता स्नातक होना है ।
क्या भारत जैसे दुनियाँ के सबसे बङे
लोकतंत्र में लगभग छह सौ लोग सांसद
स्नातक नहीं निकल सकते?????
हर राज्य में कुल लगभग ढाई सौ से पाँच
सौ लोग स्नातक होने पर ही मंत्री बने
संभव नहीं ।
ये भी कि सत्तर साल से ऊपर की आयु के
लोग सक्रिय चुनाव से हट कर
पार्टियों के थिंक टैंक क्यों नहीं बन
जाते????
क्यों नहीं एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में
मज़हबी प्रचार संरक्षण को शासन से
मदद बंद हो जानी चाहिये ।
जाति आधारित आरक्षण बंद
क्यों नहीं होने चाहिये ।
क्यों नहीं सांसद विधायक मंत्री और
प्रथम द्वितीय श्रेणी के अधिकारियों के
वारिसों को वजीफे आरक्षण और
सरकारी विशेष लाभों से अलग कर
दिया जाना चाहिये । क्यों व्यक्तिगत
और धार्मिक आयोजनों में सरकारी वाहन
भवन सबसिडी का इस्तेमाल बंद
होना चाहिये । क्यों नहीं अदालतों में
धर्मग्रंथों पर शपथ बंद करवानी चाहिये
। किसी भी पद के लिये सबको समान अंक
की अर्हता रखी जानी चाहिये ।?????
एक मज़बूत सरकार बनानी है तो अब
स्नातक सांसद विधायक चुने । और
जाति धर्म का हल्ला लगाने वाले भाषण
बहिष्कृत करें
देश के बिना आपका कोई अस्तित्व
नहीं हो सकता । आपको विमान में चढ़ने
से पहले एक पासपोर्ट चाहिये
वीज़ा चाहिये एक नाम और पता चाहिये

ये सब देता है देश अन्यथा आप कितने
ही महान् योग्य और
क्रांतिकारी हों कोई भी मुल्क़
आपको अपनी सीमा में नहीं आने देगा ।
कभी स्कूल के दिनों में
नारा लगाया जाता था """अन्न
जहाँ का हमने खाया ।वस्त्र जहाँ के हमने
पहने । वह है प्यारा देश हमारा ।
इसकी रक्षा हम करेंगे ।"""""
आज बहुत बङी संख्या के लोग स्वयं
को ग्लोबल नागरिक सीमाओं से ऊपर
घोषित करते हैं ।
उनसे कहिये ये पारपत्र और
वीजा समर्पित कर दें ।
फिर जायें विश्व भ्रमण पर ।
जिन राष्ट्रों में उनके
विचारों का स्वागत होता है
वहीं की जेलों का दरवाज़ा खुला है ।
आपको घर से लेकर विदेश तक अपने देश
की व्यवस्था से सुरक्षा चाहिये ।
कोई अनहोनी न हो इसके लिये सब
आपात्कालीन सेवायें चाहिये ।
कुछ अवांछित घट जाये तो सरकार
न्यायपालिका और सुरक्षा एजेन्सियों से
मदद और निदान चाहिये ।
रात दिन व्यवस्था को कोसते नहीं थकते
आप ।
किंतु आपकी जब बारी आती है तब?
जहाँ भी जिस भी जॉब में हैं आप क्या एक
ईमानदार कर्त्तव्यनिष्ट कर्त्ता है?
क्या आप हर बार मतदान करने घर से
निकलते हैं?
क्या आप ने अपने क्षेत्र की जनसुविधाओं के
लिये कोई पत्र लिखा संबंधित संस्था को?
क्या आपने जो आपकी निजी संपत्ति है
का सही टैक्स भरा ।
क्या आप संविधान के दस
करतव्यों का पालन करते हैं?
क्या आपको वोट देते समय
प्रत्याशी की योग्यता याद रहती है?
क्या आप देश के
संसाधनों पानी बिजली नदियाँ तालाब
हवा शांति वन पेङ पशु पक्षी यातायात
और कानून व्यवस्था को बनाये रखने में
याद करके अपना योगदान सृजनात्मक देते
हैं??
रुपया कमजोर क्यों हो रहा है?
क्या आपने समझने की कोशिश की?
क्या आप देशी वस्तुओं का इस्तेमाल ध्यान
से करते हैं जहाँ तक संभव हो?
देश स्त्रियों के लिये घातक
देशों की सूची में प्रथम दस की लिस्ट में है
क्या आप इस कलंक को मिटाने में कोई
सकारात्मक भूमिका रखते है?
देश भुखमरी के प्रथम पाँच देशों में शामिल
है क्या आपकी आय में अन्न बचाकर
भूखों को खिलाना शामिल है ।???
देश
किसका है???
जो देश का है
©®¶©®¶
Sudha Raje

कहानी**झूठी पत्तल**

क्या कह रहे हौ चौबे!!!!
क्या सचमुच वो इतनी सुंदर है?
ल्यो म्हाराज का हमाओ मूँङ सटक गओ।
केरा जैसो गाभ सुपेत पिंड धरौ फक्क ।
कँकरा मारें लोऊ बगर जै ऐसी कौँरी नरम
काया ।
लाला जू !!
ऐसी जनींमांसें तौ लखबै खौं कितऊँ
टिपतींयईँ नईँयाँ ।
लालाजी सोच में पङ गये । पत्नी पागल
मिली थी । ससुराल वालों ने धोखे से
विवाह कर दिया । पता लगते लगते देर
हो गयी दो बच्चे हो गये ।प्रारंभ में वह
चुप रहती । साथ आयी हुयी छोटी बहिन
चुपचाप सुबह शाम
दवाईयाँ खिलाती थी ये
पता भी नहीं चला । एक दिन
देखा तो सिर दर्द
का बहाना बना दिया । उस समय के
हिसाब से छोटे बाल स्त्री के दोष माने
जाते थे । जब कटे बालों की बात
पूछी तो रटा रटाया ज़वाब मिला चोट
लग गयी थी डॉक्टर ने पट्टी करते बाल
काट दिये थे । बढ़ा लूँगी। माथे के
दोनों बगल निशान थे ।
लालाजी आश्वस्त हो गये । मायके वाले
जल्दी जल्दी लिवा ले जाते
पता ही क्या चलता । जचगी मायके में
हुयी । उस ज़माने में दिन भर घूँघट डाले
स्त्रियाँ घर के काम करतीं और पुरूष
प्रातः से देर रात्रि तक बाहर
कामकाज़ में व्यस्त रहते । पत्नी के कमरे
में देर रात को ही जाना होता ।
दूसरे बच्चे की जचगी के बाद लंबे समय तक
जब नहीं भेजा तब लालाजी बिन बुलाये
अचानक चले गये लिवाने । अब तक ससुर
जी खुद ही लिवा जाते छोङ जाते ।
सुबह को दिशा मैदान जाते एक परिचित
ग्राहक मिल गया जो लाला जी के गाँव
का जँवाई और किराने का फुटकर
व्यापारी था ।
कुशल मंगल के बाद जब बताया कि किस के
घर जामाता हैं तो चकित् रह गया ।।
जो बताया अविश्वसनीय किंतु सत्य था।
लाला जी की पत्नी भयंकर पागल थीं ।
किशोरावस्था से ही पागलखाने
की चिकित्सा चल रही थी। बिजली के
शॉक् लगवाये जाते तो कुछ महीने शान्त
रहतीं । नशे की गोलियों के प्रभाव में
रखा जाता । युवा होने पर भयंकरता बढ़
गयी थी । घर से भाग जातीं आक्रमण कर
देतीं और कपङे फाङकर निर्वस्त्र तक
हो जाती। तब जंजीरों से बाँधकर
रखा जाने लगा । कुछ चिकित्सकों ने
लाइलाज़ घोषित कर दिया था तो कुछ
का मानना था कि अभी भी आशा की जा
कोई चमत्कार हो जाये ।
निम्फोमेनिया नामक रोग
भी बताया कि विवाह हो जाये तो ये
उग्रता तोङ फोङ आक्रमण घर से
भागना और कपङे फाङना बंद
भी हो सकता है । पुरूष का प्यार मिले
तो लङकी ठीक हो सकती है किंतु
आशा निराशा दोनों के अवसर बराबर हैं

तांत्रिकों ने बताया कि इस पर भयंकर
प्रेत का साया है । विवाह
नहीं किया तो ये मरकर पिशाच
बनेगी और पिता को पाप लगेगा ।।
किंतु कोई दूसरा पुरूष इससे विवाह
करेगा तो ये प्रेत भी इसके साथ फेरे लेकर
सदा साथ रहेगा ।अतः विवाह की हवन
वेदी पर कन्या को अकेले एक मटके से फेरे
दिलाकर मटके में सारे विवाह सामान
रख कर मटका कसकर बंद करें और दूसरे
नगर पुल पार करके श्मशान के पीपल के
नीचे गाङ दें ।फिर कन्या को विधवा करें
सारी चूङियाँ तोङ दें और किसी कुँवारे से
विवाह करा दें तो कन्या ठीक हो जाये
।समस्या थी विवाह करे कौन?
ऐसा हो कहीं पता लगा तो ?
तब चिकित्सक की सहायता ली गयी ।
लाला जी ठहरे रात दिन व्यस्त
आदमी घर में बूढ़ी अनपढ़
माँ तो दुनियाँ की अफवाहों का पता क्य
छाया चित्र देख कर हाँ कर दी ।
करना ही क्या था घर में
ही तो रहनी थी घूँघट में ।
लालाजी को काटो तो ख़ून न
बचा हो जैसे । एक एक करके सारी बातें
ढाई साल में से मात्र छह महीने साथ रह
पाने की मसतिष्क में मँडराने लगीं ।
जो विचित्र तो लगतीं थीं किंतु
सेवा इतनी शांति से करती सुंदर थी चुप
रहती और कोई फ़रमाईश
नहीं करती बेटा बेटी दो बच्चे दे दिये ।
छोटी बहिन आकर पूरा काम सँभाले
रहती । लाला को उलाहने प्रतिवाद
का अवसर ही कहाँ था ।
लालाजी ने ससुर जी से साफ साफ
जा पूछा । बात खुल गयी ससुर जी ने
पगङी रख दी पैरों में जामाता के ।
अबकी बार लालाजी बहू तो लाये किंतु
साली को नहीं भेजा सास ने डर के मारे ।
एक हफ्ते तक सब सही रहा ।
लालाजी डर के मारे कमरे में नहीं गये ।
उस दिन
लालाजी दुकान पर आये ही थे कि नौकर
भागा हुआ
आया बताया कि लाला की माँ को बहूजी
रहीं हैं और दरवाज़ा अंदर से बंद है।
लाला जी भागे दुकान पर ताला लगाकर

पङौसी की छत के सहारे घर में
झाँका तो कलेजा फटने लग गया देख कर ।
बहू ने सास के बाल पकङ रखे थे और भयंकर
गालियाँ बकती हुयी पीटे जा रही थी ।
बूढी सास सहायता को पुकार रही थी ।
लाला जी थर्रा गये यह रूप देखकर ।
गाँव के लङके छत के रास्ते लाला जी के
साथ रस्सी लेकर आँगन में उतरे बहू
को हाथ पाँव बाँध कर डाल
दिया गया ।
ससुर जी को खबर भिजवाई बच्चे छुङाकर
बहू को ससुर के साथ लानत्त मलामत करते
हुये भेज दिया कभी कोई रिश्ता न रखने
की कहकर ।
सोचते सोचते लालाजी व्याकुल हो उठे ।
बच्चे दादी सँभालती और नौकर । रात
काटने को दौङती और ढाई साल
का चुपचाप का साथ हृदय में कभी प्रेम
भरता कभी घृणा । कभी मन करता उङकर
जायें लिवा लायें । कभी आतंक से कंठ सूखने
लगता ।
पाँच साल निकल गये ।
लालाजी को सब सलाह देते
दूसरा विवाह कर लो किंतु कद से नाटे
और आयु से प्रौढ़ हो चले दो बच्चों के
पिता को जाति का कोई भी परिचित
अपनी बेटी देने को तैयार नहीं था ।
लालाजी को जब
पता चला कि पङौसी गाँव के चौबे
जी हर तरह के विवाह करवाते हैं
तो जा पहुँचे जन्मपत्री दक्षिणा लेकर ।
अगले महीने चौबे जी कुछ
कुंडलियाँ छायाचित्र और विवरण लेकर
लाला जी की बैठक में लड्डू खाने आ धमके ।
दरजन भर विवरण देखकर
आखिरी दो चित्रों पर
चर्चा जा टिकी ।
एक लङकी विधवा थी और बहुत ही सुंदर
पढ़ी लिखी सुशील मातृ पितृ विहीन
थी जो भाई के साथ रहती थी ।
दूसरी साधारण रंग रूप की थी बङी आयु
की कुँवारी थी क्योंकि बहुत निर्धन
परिवार की सातवीं बेटी थी बूढे
पिता की संतान जिसने पुत्र चाहने के
लालच में प्रौढ़ होने तक बेटियाँ जनने तक
विवश किया पत्नी को और पत्नी चल
बसी । घर वर खोजे कौन बूढ़ा असमर्थ
और जामाताओं ने संपत्ति बाँट ली थी ।
लालाजी को चौबे जी ने
बताया कि पिता को कई दुहेजू नाते
बताये किंतु वह कुँवारा वर चाहता है
कन्या के लिये । बूढ़ा मरने वाला है
शीघ्र ही । हिस्से में बचा घर और
गेंवङा छोटी बेटी के होंगे ।
लालाजी की आँखें भटक
रहीं थीं विधवा लङकी इतनी सुंदर थी ।
फिर ध्यान आता वह दो वर्ष किसी पर
पुरूष की भोग्या रही है ।
अंततः पुरूषवाद हावी हुआ और
लालाजी ने चौबे जी से साँवली लङकी से
विवाह की बात चलाने की कह दी ।
विवाह हुआ और बहू घर आ गयी ।
लाला जी घर आते ही बच्चे दादी के
हवाले छिपा दिये गये ।
अतिथि विदा हुये तो बहू के कमरे में
लालाजी जा पहुँचे । धङकते दिल से बैठे
ही थे सात साल बाद स्त्री के निकट थे ।
किंतु ये क्या दुल्हन घूँघट फेंककर उठ
खङी हुयी ।
""हाथ मत लगाना लालाजी! "
इतना बङा धोखा??
तुम्हारी पत्नी जीवित है दो बच्चे हैं बङे
बङे । तलाक़ तक नहीं हुआ और तुमने ये सब
कुछ भी बताये बिना शादी कर ली मुझसे!!!
बहू ने जोर जोर से रोना प्रारंभ कर
दिया ।
लालाजी पत्थर की प्रतिमा की तरह
खङे थे हाथ जोङे ।
सुबह बहू जिद करके शोर गुल मचाकर
मायके चली गयी । लाला जी की बहुत थू
थू हुयी ।
बूढ़े ने धोखाधङी का मुक़दमा ठोक
दिया । ले देकर प्राण बचाये ।
अबकी बार चौबे जी चार महीने बाद आये
। लालाजी को फिर दरजन भर चित्रों में
से वही चित्र दिख गया ।
बोले
"""चौबे यार बात पक्की कराओ ""
अगले ही दिन सब परिवार के बीच
लालाजी और चौबे जी दावत उङा रहे थे
। बात पूरी होने
को ही थी कि लङकी बोल पङी ।
"" ये विवाह नहीं हो सकता भैया!!
क्योंकि पिछली जिस लङकी से इन्होने
धोखा देकर इन्होंने विवाह
किया था वह मेरी सहपाठी रही है ।
उस दिन मैं भी वहाँ । जब
लालाजी फेरों के बाद चौबे जी से बातें
कर रहे थे । अचानक मेरा नाम आया तो मैं
रूक गयी । लालाजी कह रहे थे कि,
--लङकी तो गोविन्दपुर
की गौरा ही दिल को भा गयी थी ।
बङी क़यामत चीज़ है चौबे जी । मगर
क्या करें ये मर्द का दिल है
नहीं मानता कि जूठी पत्तल चाटें । चाहे
दो ही कौर खाया पर है तो पराये मर्द
की जूठन ही ।इनसे
पूछो कि दो बच्चों का बाप ढाई साल
एक औरत के साथ रहा ये
किसी परायी औरत की थूकन है
कि नहीं । इतनी घटिया सोच के इंसान
किसी की उजङी जिंदगी नहीं बसा सकते
। सिर्फ खिलवाङ कर सकते हैं ।
लङकी तमतमायी हुयी खङी थी ।
साक्षात् रति की मूर्ति । लाला जी ने
चुपचाप लड्डू वापस थाली में रखा और
टोपी सँभालते थके हारे बाहर निकल आये

चौबे जी लङकी के भाई को दूसरी तसवीरे
विवरण कुंडली दिखाने में लगे पङे थे ।
©®¶©®¶©®
Sudha Raje
सुधा राजे ।

ओ बेटियों।

Sudha Raje
यातनागृह मात्र हों
जो बेटियों!!!!!!
वे घर
जला दो
सिर्फ औरत के शिकारी
गीध
बालो-पर
जला दो
जो ""बिकाऊ माल ""होकर
सर उठा आदेश दे
सोचती हो क्या जलाये
जो
हिना
वो वर जला दो
हाथ
वो तोङो जो नारी केश
खींचें वो जुबां
माँ बहिन की दे
जो गाली नर
हो या किन्नर
जला दो
एक तरफा या दुतरफा प्रेम
हो या आशिकी
जो भयादोहन करे तेज़ाब
से
वो सर
जला दो
पाँव वो घुटनों से
तोङो
ठोकरें औरत को दे
कोख पर थूके
जो आवारा वो
अहले ज़र
जला दो
फोङ दो वो आँख
जो अपनी ही बेटी पर उठे
चीर जो खींचे
ससुर हो जेठ
या देवर जला दो
जो लिखेंअश्लील छापें
भोग्या औरत नगन
पोस्टर अखबार फिल्में औऱ्
सिनेमाघर जला दो
ये जलाना कई तरह
का हो कि दिल से तख्त
तक
बिलबिला उठ्ठे ज़माना
दर्द के जेवर जला दो
तोङ दो दीवार ये घूँघट
नक़ाबें चिलमनें
अब मशीनें थाम लो
ये सुई बटन स्वेटर जला दो
छीन लो आधा गगन
आधी धरा संसद औ हक़्क
फाङ दो झूठी किताबें
खौफ़ के खंज़र जला दो
ज़िस्म का बाज़ार
लगता हो जहाँ बेबस बिके
अपहरण करके
खङीं वो कोठियाँ परिसर
जला दो
छेङखानी से डरी दारूल
उलुम की जो गली
पीट कर काला करो मुँह
फूल और पत्थर जला दो
जात मज़हब खाँप वोटों पर
सियासत गर्म हो
लङकियों पर भद्दे फिकरे
वो सभी दफ़्तर जला दो
बेटियो!! हमने शहादत
दी तुम्हारे वास्ते
अब
सुधा "काँधा दे मुझको
ये
क़फ़न अह्मर Red जला दो
©®¶¶©
Sudha Raje
Dta †Bjnr
Mar 10
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Wednesday, 12 June 2013

मैं ही क्यों।

अज़नबी ग़ैबी शहर में अब
तलक बस मैं ही क्यों


आज तक इस रहगुजर पै बे
शज़र
बस मैं ही क्यों


मैं ही क्यों बेज़ार सबसे बे
नज़र बे दार गुम

रंज़ो ग़म खुशियाँ मुरव्वत बे
असर बस मैं ही क्यों

हर तरफ निस्बत
शनासा लोग कितने
आशना


फिर
यग़ाना यक़ता तन्हा उम्रभर
बस मैं ही क्यों

दिल ये क़ाफिर
जां नमाज़ी रूह ये
आतशपरस्त

अक़्ले अज़हद ये क़िताबी
बे ख़बर बस मैं ही क्यों

क्या रखा है मेरे पहलू में बरफ़ आतश
ज़हर??

जलता जमता मरता साक़िन
घर बदर बस मैं ही क्यों

काँच के वे ख़वाब लगते थे कभी ना खोयेंगे

हाथ में टूटे चुभे ख़ूने ज़िग़र बस मैं ही क्यों

क्या कोई मेरे
सवालों का ज़वाबी भी कहीं

है सुधा शायर वले
बाग़ी मुहाज़िर मैं
ही क्यों
©®¶©©¶©®
Sudha Raje
Dta ★Bjnr
Mar 10
· Unlike

Tuesday, 11 June 2013

बिन पइसा सब सून।

देर सवेर आपको यह मानना ही पङता है
कि आप जो जो हुनर रखते हैं उनमें सबसे
कीमती वही हुनर है जिससे आप जीवन
यापन हेतु धन कमा पाते हैं ।।।
कालांतर जब आपके लिये अभिभावक धन
देना बंद कर देते हैं तो वही एक मात्र
हुनर ही सबसे आगे चलता है जिसने धन
दिया हो ।।
अब ।।
देश महान है या नहीं उसने
क्या किया या नहीं ।
व्यक्ति की तरह यही बात लागू है कि ।
देश पर व्यय के लिये धन????? कौन दे????
कैसे बने सङके?
पुल
अस्पताल
बिजलीघर
बाँध
नहरे
छात्रावास
रेलें
मेट्रो ट्रेन्ज
बसें
जहाज
वायुयान
सीमा पर बाङ खाई दीवार सुरक्षा।
प्लान्टेशन
बाग बगीचे पार्क स्टेडियम
हर जरूरत के सार्वजिक सुविधा गृह
आपात्कालीन सेवाये
एंबुलेंस
फायर बिग्रेड
राहत कार्य
बाढ़ भूकंप आग
सूखा महामारी आतंकवादी हादसा दुर्घट
बचाव
जीवनरक्षक टीम सेना पुलिस डॉक्टर ।
अनाज
पानी
दवा
कपङा
शेल्टर
सुरक्षा
शिक्षा ।
सब चाहिये सब
सबके लिये धन चाहिये । ढेर सारा धन
।।
ये धन खुद कमा कर खुद खाने को जिन्हें कम
पङा रहता है । वे नहीं जुटा सकते ।
अपना पेट भऱना तो सूअर और कॉक्क्रौच
भी कर लेता है ।
पूरे देश के लिये सङकें पुल बाग रेल
अस्पताल
नहीं बना सकता ।
जो खुद राहत कार्य का आटा चावल
सरकारी कम मूल्य का राशन कैरोसीन
लेता हो ।जातिगत मज़हबगत
वज़ीफा पाता हो ।सरकारी सेवायें मुफ्त
प्राप्त करता हो ।
वह तो अर्थ व्यवस्था पर घर के विकलांग
गैर दुधारू पशु की तरह बोझ ही रहता है

ये पैसा संग्रहीत कमाई है उन
लोगों की जो टैक्स अदा करते हैं ।
सरकार को लेवी देते है।
राहत बचाव और सेवाओं को चंदा दान और
अनुदान देते है।
जलने कुढ़ने से क्या होगा??
सबमें समान योग्यता नहीं होती।
एक ही कोर्स एक ही कक्षा के सब बच्चे
एक सी बुद्धि नहीं रखते ।
दुनियाँ ट्रेनिंग से नहीं बदलती।
गॉड गिफ्टेड लोग बदलते हैं जो अनोखे
होते हैं
बाकी सब कार बस सङक मोबाईल यूज
करते है । बना नहीं सकते।
जो अविष्कारक नहीं है वह सिर्फ
उपभोक्ता है।
विचार
विज्ञान की जननी है ।जब नया विचार
आये तो नया अविष्कार भी होगा।
जो विचारक और अविष्कारक को शीर्ष
पर रखते हैं वे देश आगे होते हैं ।
दान लेने वाला हमेशा छोटा रह्ेगा ।
किसी मिल का संचालन सङक किनारे पङे
मजदूर के हाथ में सौंपकर ।
मिलप्रबंधन किसी नितांत अनजानी जगह
चला जाये तो कुछ साल बाद वह
वहाँ भी नया कारोबार बना लेगा।
लेकिन
मजदूर मिल को बरबाद करके
भिखारी बन चुके होंगे।
दान का जिगरा।
पूँजी का प्रबंध
समग्र कल्याण
और
धन कमाना सबके बस की बात नहीं।
रूपये का अवमूल्यन गवाह है।
आपको बेटे बेटी के लिये
नौकरी चाहिये???
नौकरी मतलब मोटी पगार
भी तो चाहिये!!!!
भई बिना तनख़्वाह के तो ना डॉक्टर
इलाज करे न मास्टर पढ़ाये ।
ऊँची तन्ख्वाह ऊँची नौकरी????
यही तो सारी योग्यताओं का फल ।
इस तनख्वाह से करना क्या क्या है???
एक कार एक कंप्यूटर एक बंगला और ढेर
सारे बरतन फरनीचर गहने कपङे मशीने
सजावट खाने की सर्वोत्तम चीजें रूप रंग
की सज़ावट और घूमना फिरना सैर
सपाटा मौज
मस्ती पार्टी सार्टी बीयर डिनर ।।।
और भगवान के लिये परसाद जो खुद
खाना है ।
बच्चे स्पाउस और उनके सब खर्चे ।
तो??????
देश या समाज कहाँ शामिल है आपके सपने
में???
आपको देश से शिकायत है बढ़िया जॉब
नहीं मिली ।
आपको समाज से शिकायत है हर जगह
आपकी आजादी में दखलंदाजी करता है ।
आपको घर की रखवाली चाहिये???
मुहल्ले में साफ सफाई???
शहर में अमन चाहिये???
आपके लिये दफ्तर
सङक बसअड्डा रेलवे स्टेशन सार्वजनिक
शौचालय बैंक बीमा स्कूल कॉलेज
युनिवर्सिटी पुलिस सेना डॉक्टर
अस्पताल फायर बिग्रेड बिजली गैस
इंटरनेट
सब हो जो जब जहाँ जरूरत हो???
लेकिन ये बनाये जो वह जो जो नियम
लागू करे वो आप नहीं मानेंगे?????!
क्योंकि आप आज़ाद देश के आज़ाद नागरिक
हैं ।
किसी भी जगह गाङी खङी करना
कहीं भी मुँह उठाके के गुटखा पान थूक
देना ।
कहीं भी मल मूत्र विसर्जन
कहीं भी खाया पिया रैपर छिलके फेक
देना ।
कहीं भी तेज आवाज़ में मोबाईल पर
या म्यूजिक सिस्टम पर
गाना बजाना नाचना ।
कहीं भी लाऊडस्पीकर पर अजाने जगराते
अखंड रामायण और सतसंग और
शादियों का शोर मचाना ।।
कहीं भी
नल खुला छोङ देना ।
बिजली पंखे टीवी चलता छोङ देना ।
कहीं भी जोर जोर से हॉर्न बजाना ।
गाली देना ।
बहस करना ।
दीवारों पर पोस्टर चिपकाना
नारे प्रचार कुप्रचार लिख देना ।
किसी भी बात पर बस प्रशासन
को कोसना ।
अपने काम की तेजी के लिये लाईन
तोङना रिश्वत की पेशकश डोनेशन
का लालच आरक्ष्ण का लाल झूठे प्रमाण
पत्र बनवाकर छूट प्राप्त करना ।
कौन है आप???
ये नौकरियाँ कौन दे???
कहाँ से आयें आपको तनख्वाह देने के लिये
पैसे???
क्या जो कार्यभार आपको सौंपा गया है
वह ईमान से करते हो??
आठ घंटे ड्यूटी यही कर्तव्य है ।।
तो जिस किसी ने ड्यूटी ऑवर्स में कुछ
भी कोताही की है वह कौन हुआ??
हरामख़ोर
जो गाली आप घर के चिनाई मजदूर
या कामवाली बाई को देते हो । जब वह
बीच बीच में रोटी खा ये बीङी पी ले
या सुस्ताये या धीमी रफ्तार से काम करे
तो नीम मिर्च नींबू सब लगता है???
आप ड्यूटी ऑवर में कितनी बार
निजी कॉल करते हो?
सिगरेट गुटखा या ड्रिंक लेते हो???
दोस्तों और कलीग से गप्पियाते हो??
क्या रफ्तार है ।आपके उन
कार्यों की जो आपकी ड्यूटी हैं । आप
जो भी हों जिस ज़रिये से भी धन कमाते
हों क्या सही सेवा दे रहे हैं??
क्या जो सेवा सुविधा मिल रही है उसके
ज़ायज लाभार्थी हैं??
क्या जो जो कर्तव्य़ है वो पूरे किये?
कोई अवैध नाज़ायज लाभ
तो नहीं उठा रहे ।??
कहीं आप ऐसा कर रहे हैं तो नमकहराम
हरामखोर और देशद्रोही ये लफ्ज़ अब किस
के लिये होने चाहिये सोचना ।
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Sudha Raje

Monday, 10 June 2013

ये भी कोई बात हो गई।

हमने माँगे बेर
निगोङा ले आया अंगूर
भला कोई बात
हो गयी!!!!!
तिल के लड्डू माँगे
बैरी लाया मोतीचूर
भला कोई बात हो गयी
!!!!
जब मैं जागूँ वो सो जाये
वो जागे मैं सोऊँ
और चिढ़ावै हरजाई जब
खीझ खीझ कर रोऊँ
फागुन सावन छुट्टी ना ले
जाबे लंबे टूर
भला कोई बात हो गयी
वो गेंदा गुलाब पे रीझे
मुझको बेला भाती
उङद भात वो कढ़ी मँगावे
मुझको कङक चपाती
तीखे गट्टे
बूँट करेले देख के भागे
दूर
भला कोई बात हो गयी!!!
मैं जामुन भुट्टे जब माँगू
परमल पूङे लाये
उसको लँहगा हरी छींट
का
मुझको कोट सुहाये
मैं कॉफी की दीवानी
वो चाये गिंदोङे बूर
भला कोई बात हो गयी
मुझको घूमर कत्थक भावे
वो नोटंकी लीला
जब में लिखते रो दूँ हँस के कहे
पेंच है ढीला
मैं सोचूँ कुछ फुरसत हो वो
जाने ना दे दूर
भला कोई बात हो गयी
इतना मीठा बोले
लगता डायबिटीज
हो लेगी
मैं जब बोलूँ कहे अनाङी
लाल मिर्च रो लेगी
राजपुतनी परी सखी ।।
वो यू पी का लंगूर!!!
अजी कोई बात हो गयी ।।।
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Sudha
Raje

पैगाम लिखा।

Sudha Raje
Sudha Raje
आँधी में इक
उङता पत्ता पत्ते पर पैग़ाम
लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त
साँवरिया के नाम लिखा
कहाँ हो तुम आ जाओ
अजी अब हम
को भला नहीं लगता
चंदा सूरज तारे जुगनू दीपक
जला नहीं लगता
बुझे बुझे दोपहर सवेरे
सूनी रातें शाम लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त
साँवरिया के नाम लिखा
कहाँ हो तुम ले जाओ
अजी ये घर अब लगे
पराया सा
बोझिल
हँसना गाना खाना भूली सब
धुँधलाया सा
सखियाँ बहिनें भाभी छेङें
किस्मत शाहे-आम लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त
साँवरिया के लिखा
कौन हो जी तुम कब ले जाओ गे
कैसे हो कब आओगे
तन मन जीवन किये तुम्हारे
नाम प्रेम दे पाओगे
जनम जनम अधिकार परस्पर
मैं तेरी बेदाम लिखा
एक साँवरी लङकी ने खत
साँवरिया के नाम लिखा
सुख देखे दुख देखे देवा अब
ज़ी प्यार मिले रब्बा
तनहाई की कटे न रैना दिल
बेदार खिले शब्बा
काँधे धर सर भूलूँ
दुनियाँ सँग दे आठों याम
लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त
साँवरिया के नाम लिखा
छोटा सा आशियाँ बना के
गुल गुलशन गुलज़ार करें
अपनी ही इक रच लें
दुनियाँ आजा इतना प्यार
करें
ले जा मितवा देश पराये
रहती मैं गुलफ़ाम लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त
साँवरिया के नाम लिखा
ना जानूँ
वो तेरी नगरी ना वो तेरा पता जानूँ
ना जानूँ तेरी वो सूरत बस
आजा इतना ठानूँ
नाते नैहर लिखे बिछोङे
दर्द विदा अंज़ाम लिखा
एक साँवरी लङकी ने ख़त "'!
साँवरिया के नाम लिखा
नादीदा ओ मेरे सजन
हमदोशे ज़न्नत घऱ तेरा
नाआशना सनम मेरे
ली मन्नत जीवन भर मेरा
कैसी दीवानी सपनों में
"सुधा "प्यास को ज़ाम
लिखा
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Sudha
Raje
DTA★BJNR
Feb 17