Thursday, 18 December 2014

सुधा राजे की कविता :- जेहन पे ये ताले

दिल भला दर्द सँभाले तो सँभाले कैसे,
जल गये बाग कोई फूल निकाले कैसे
चीख दहशत से घुटी है कि "सुधा " नफरत
से '
पङ गये सोच पे ज़ेहन पे ये ताले कैसे
©®सुधा राजे।


Monday, 15 December 2014

सुधा राजे की कविता :- "आखिरी समय"

वह आखिरी समय टूटते टूटते इकबार
और बस
कहती उठ खङी होती है और सहने
और कहने की सोचकर
परंतु न तो हर बार
सब कुछ सहा जाता है ।न हर बार सब कुछ
कहा जाता है ।
और कोई कभी कब समझ
पाता है कुंदन कंचन के चमकते दमकते
चेहरों की खनकती बोली में कितने
शरबिद्ध सुर हैं
अंतरनाद की पीङाओं के
उसके वैभव निहार
'ईर्ष्याभरी कितनी ही आँखें
निहारती हैं उन
ऊँची खिङकियों को
जहाँ से हर सुबह शाम
दो बङी बङी डबडबायी आँखें
'टकटकी लगाये आह भर कर देखती रह
जातीं हैं पीले परागों कहकते कहकहों और
लहकते जीवनरागों को ।
हरे स्पर्शों शीतल
हवाओं और नरम मिट्टी की सौंध को एक
गहरी सांस भरने के लिये झरोखे पर आने
को विवश '
अपना अपना राग 'गाते दो ओर छोर
कहीं नदी की हवा से गीले होकर बरस
जाते हैं हर रात पुआल की ऊष्मित तृप्त
नेवाँस
और अटारी के ठंडे एकाकी रतजगे
एकांत अहसास में ।
डूबता सूरज और
उगता चांद दोनों ही मूक रह जाते हैं तब
जब हृदय से बङे हो जाते है गरिमा के
मिथक और कंठ में नहीं समातीं हिचकियाँ
©®सुधा राजे "


सुधा राजे की कविता :- "आई चली गई"

आई तो बहुत पहले ही जा चुकी थीं इस घर
से '
तब जब बाबा ने दहाङते हुये
सुना दिया था अपना फैसला कि 'आई 'अब
कभी अगर अपनी आई के घर गयी तो फिर
लौट नहीं सकेगी ।
आई रह गयी बाबा के साथ लेकिन बँट
गयी 'दो टुकङों में एक टुकङा रह
गया बाबा का और
दूसरा चला गया उसकी अपनी आई अपने
बाबा भाऊ के घर ।
आई फिर बँटी जब 'बेटी पैदा हुयी और
दादी खुश नहीं थी 'बेटा हुआ तो दादा ने
मुहल्ले भर को दावत देदी '।
बाबा और बेटे के बीच फिर रोज
बँटती रही "आई "और टूटकर बिखर
गयी खील खील जब 'विदाई की 'ताई
की आई ने '।
आई तब एक बार और निकल गयी घर से एक
और टुकङा ताई के घर जाकर रहने
लगा और 'आई 'रह गयी बस जरा सी 'भाऊ
के साथ 'बाबा और भाऊ के बीच पुल बनकर
दरकती '।
भाभी के आने का बङा चाव था आई को और
चाँद का टुकङा खोजती रह गयी आई 'एक
बार और टूट गयी जब भाऊ ले आया एक
संगमरमर का बुत अपनी पसंद से तब
पहली बार आई 'डर गयी और बाबा और
भाऊ के बीच टूट गये पुल के बीच
दरकती डोरियों पर टँगी आई
'रही सही भी चली गयी वनवास पर
वानप्रस्थ 'या सन्यास पर, ।
आई 'पोते
पोतियाँ खिलाती सँभालती फिर टुकङे
टुकङे हो गयी '
जब पहली बार पहली बार नहीं रहा और
आँगन में दीवारें खङी हो गयीं 'आई
का कमरा दो हिस्सों में बाद में बँटा 'आई
पहले ही ईँटों की तरह तपकर टूट
गयी फिर पकी माटी सी।
झुर्रियाँ जिस रफ्तार से बढ़ रही थीं आई
'बचपन की ओर उसी रफ्तार से लौट
रही थी कभी अपने कभी ताई और भाऊ
के।
आई फिर पूरी की पूरी ही निकल
गयी एक बार सारे के सारे घर से जब सबने
चीखकर 'आई को अहसास कराया कि उसने
किया ही क्या है!!!!!
और अब उसे घर के मामले में बोलने
की जरूरत ही क्या है!!!!!
जब 'पोती ने 'आई को रूढ़िवादी और भाऊ
ने झल्लाकर बेवजह टाँग अङाने
वाली कहकर 'मन से निकाल दिया ।
आई ने आखिरी बार पल्लू होंठों पर रखकर
रोना रोका रोकी चीखें हिचकियाँ और
रोक लीं बददुआय़ें ।
यह सारा उपवन तो लगाया उसीने
ही था वह शिकवा किससे करती '
बाबा और आई के बीच तो कबकी दीवारें
आसमान तक चिनी जा चुकीं थीं ।
जब छोटू ने संदेश दिया 'आऊ साहिब
चलीं गयीं हमेशा को दुनियाँ से ''
तो सबसे पहले चीखा भाऊ ।ताई
भी रोयी बाबा भी 'और सबके रोते
चेहरों पर मुझे दिख रही थी एक एक
नयी उगती हुयी झुर्री "एक एक सफेद
होती लट और सिकुङती उंगलियों पर
दरकती त्वचा '
मुझे लगा "आई "गयी भी और सबको दे
गयी "लंबी उम्र की दुआयें आखिर
माँ जो थी ।
वैसे आई गयी ही कब थी!!!! और न जाने क्यूँ
लगता है "आई अभी नहीं बहुत बहुत बहुत
पहले ही कब की जा चुकी थी ।
पता नहीं क्यों मेरे पास न आँसू थे न
विलाप न रुदन न सवाल
सबको लगता था भाऊ और ताई को आई से
बेहद प्यार था 'या फिर बाबा को '
©®सुधा राजे


Thursday, 4 December 2014

सुधा राजे का नजरिया:- जरा सा पेच। 2

जिस तरह एक पुरुष की गवाही पर एक
पुरुष को फाँसी चढ़ती थी गुलाम भारत
उसी तरह आधे गुलाम रह गये भारत में
एक "औरत की भौंक भौंक टेंटें पर
हजारों लङकियों के खिलाफ 'फरमान
जारी होते है कैरियर और विवाह
बरबाद होते है "

वीडियो बनाने से गुनाह हो गया तब
जब लङके "पिटे??? और हर तरफ से
लङकियों के 'घरेलू लङकियों के
फोटो बिना पूछे धङाधङ खीचे जाते हैं
तब कोई बिलबिलाता क्यों नहीं???
बलात्कार के वीडियो जारी किये जाते
हैं तब कोई जलता जलाता क्यों नहीं???
लङके क्यों पिटे???
क्या लङकियाँ पागल थी?? या लङकों ने
कुछ गंदा कहा या छू दिया??
जरूरी तो नहीं कि अपराध नजर आने पर
किया हो?? और लङके लङकों से रोज
पिटते हैं तब खबर नहीं?? बात तो जलने
जलाने की है ""लौण्डियों से पिट गये!!!!!
अब लङकियों को बदनाम करो '
क्या 'संभव नहीं कि "खाप "के डर से
औरतें आधुनिकता से चिढ़ी औरतें झूठ बोल
रही हो??? वीडियो तो लोग
बिल्ली के नाचने का भी हर पल बनाते
है """वीडियो बनाने
वाला अपराधी 'कैसे जब कोई
जरूरी सूचना सुबूत करनी हो?

लोगों को परेशानी लङकों के पिटने से
है????? या इस बात से है कि ""मर्द
होकर लङकियों से पिटे????या इस बात
से है कि """वीडियो बनाया क्यों???
आज तक लङकियों के नाम पते सब उजागर
कर दिये गये '''???और लङकों को मुँह ढँक
के रखा गया???? कोई
जरूरी नहीं कि मामला छेङछाङ
का हो """""लेकिन हर बार जब
लङकी पर यौन हमला होता है तब
भी तो कोई ""जरूरी नहीं कि लङकी के
कपङे मैटर होते हैं??? हो सकता है
लङकियों ने सीट के पीछे ही पीट
दिया हो लङकों को!!!!!!!
तो मुकदमा करो मारपीट शांति भंग
का और क्या!!!!!!

लेकिन केवल ""इस आधार पर
कि लङकियों ने वीडियो "पीटने
का क्यों बनाया!!!!!!
लङकों को निर्दोष और शरीफ घोषित
करने से पहले
"लङकियों को भी सुनना चाहिये "हर
बार लङकी ही क्यों छेङी जाये पिटे और
वीडियो की शिकार हो?

और अगर """देश में
ऐसी मानसिकता पनप रही है
कि लङकियाँ जीरो "टॉलरेन्स पर आने
लगी है """और हर बार
मजनूगीरी की धुनाई करके
"वीडियो बनाकर ""सबको बताने से
शरमाती नहीं तो!!! वजह कौन है?
यही कायर समाज ही न
''जो अपनी बच्चियों को "खुली साँस न
दे सका?
©®sudha raje


सुधा राजे का नजरिया:- जरा सा पेच।

जरा सा पेच
एक लङकी को हर जगह लोग छेङते हैं
कोहनी वक्ष पर मार कर चुभा देते हैं '
गंदे इशारे आँख से हाथ ले गाना और वाक्य
से करते हैं "
छूने चिपक कर बैठने कमर पेट पीठ सिर
कहीं भी हाथ पांव लगाने
की कुचेष्टा करते हैं
नींद या नशे का बहाना करके लद जाते हैं
सभा कचहरी बस रेल वायुयान तक में!!!!!!!!
लङकी वो जो बिना कुछ कहे या बस
जरा सा विरोध करके चुप रह जाती है
बवाल के डर से और आगे बढ़ जाती है तो वे
लोग दूसरी लङकी को शिकार बनाते हैं ।
और
पेंच
ये है कि ऐसा एक लङकी की जिंदगी में
एक दो चार बार नहीं ★
बार बार
हर जगह
हर दिन होता रहता है #
सतर्क और सावधान
लङकियों को ही रहना पङता है
सो जब
# कोई घूरता है 'वे निगाहें चुरातीं है
छूना चाहता है वे सिकुङ कर दूर हटतीं है
कोंचने से बचने के लिये किसी स्त्री के
बगल में और सहेली के साथ झुंड या कोने में
बैठती हैं ।
हम सब गंदे स्पर्शों से बचने के लिये डेनिम
के मोटे जैकेट पहनते थे और बैग में धातु
की स्लेट रखते थे 'डिवाईडर के तौर पर
'स्कूल कॉलेज या ट्रेन में दूसरी सवारी से
बचने को कोहनी बाहर की तरफ फिर बैग
और छतरी बीच में ''""""
पिनअप दुपट्टे और चौङे बेल्ट
भी इन्हीं सब का हिस्सा होते थे ।
फिर भी ''''घूरती आँखें कहकहे और गाने
जुमले '''''!!!!!
हर लङकी का पीछा करते रहते हैं
लगातार बार बार हर दिन '''''
अंतर बस इतना है कि जब तक सहन
किया जाता है ये सब जब तक
कि "अपहरण बलात्कार और
बदनामी की नौबत ना आ जाये """
कोई
बाप भाई अगर यह कहता है
कि उसकी बेटी घर से बाहर
आती जाती तो है लेकिन कोई कभी छेङ
नहीं सकता तो ''''या तो वह बंद
निजी वाहन में जाती होगी या बंदूकों के
साये में """""""
परंपरावादी
औरतें ही ऐसी लङकियों की सबसे अधिक
निंदा करती हैं और '''''कारण होता है
उनका पढ़ना '
उन लङकियों के कपङे
उन लङकियों का बिना बाप भाई के अकेले
आने जाने का साहस """""
आप को यकीन न हो तो ""कम
पढ़ी लिखी बुजुर्ग महिलाओं के सामने
""लङकियों का ज़िक्र करके देख
लीजिये!!!!!!!!!!
वे लङकों को कुछ
नहीं कहेंगी बल्कि लङकियों को अकेले आने
जाने से रोकने
जींस पेंट कमीज पहनने से रोकने
और ऊँची तालीम दिलाने से रोकने
की बात करेंगी
वे महिलायें "मोबाईल रखने का मतलब
""छिनाल होना ""समझा देगी 'उनके
हिसाब से लङकियों को मोबाईल केवल
"यारों को बुलाने के लिये चाहिये "
माँ बाप भाई बहिन के संपर्क में
रहना सुरक्षा हेतु पुकार
को भी मोबाईल होता है मुसीबत में मदद
देता है या जानकारी देकर पढ़ाई मे
सहायक है यह वे नहीं मानतीं """"
बहुत सी महिलाओं के आधुनिक लङकियों के
प्रति इस क्रूर रवैये की वजह है
उनकी अपनी जिंदगी '
जब उनकी छोटी आयु में
शादी हो गयी नाबालिग आयु में अनेक
बच्चों की माता और प्रौढ़ होने से पहले
दादी बन गयीं ।अब
पूरी जिंदगी तो गुजार दी मेहनत
सेवा और बंदिश में ।
वे संचार क्रांति के बाद का युग
नहीं समझती ।
वे लङकियों को ""कल्पना भी नहीं कर
सकतीं कि वे शादी किये
बिना अकेली नगर में
रहतीं पढ़ती या जॉब करती और लङकों के
छेङे जाने पर विरोध करतीं है ।
अगर सारा आयु हर लङकी हर छेङने वाले
को "ऐ काश!! कि धुनाई रख सके तो?????
ये कितनी बार होगा????
एक दो दस पाँच बीस पच्चीस??
प्रौढ़ महिलायें तक कोहनी बाजी और
बैड टच की शिकार तो होती ही हैं
उन पर भी फिकरे कसे जाते हैं
ये और बात है कि आते जाते रोज
उनको आदत हो जाती है दूरी रखकर
निबटने और डपटने की """""
अगर सब औरतें हर दिन हर घूरने फिकरे
कसने और बैड टच करने वाले को ""धुन दें
तो???
रोज कहाँ कहाँ कितनी घटनायें होगी??
तो "आज ये कौन सा तर्क है कि अमुक
लङकी ने पहले भी एक को "पीटा????
पूछो जरा दिल पर हाथ रखकर हर
लङकी से
कि कितनो को पीटा या फटकारा या डपटा या ""बचकर
भागी या सिकुङ कर बैठी!!!!!!
अगर लङकी को परेळान किया जाये और
वह चुपचाप सहकर सिकुङ जाये तो ठीक "
चर्चा तक नहीं होता "???
कि अरे आज बङी बुरी बात हुयी वहाँ एक
चौराहे पर कुछ लफंगों ने
लङकियों को "छेङा??????
मगर '
ये जरूर 'दर्द का विषय है कि हाय हाय
लङकियाँ "लङकों को पीट गयीं??
जब लङके लङकियों को तंग कर परेशान
करते हैं कि विवश डरकर पढ़ना तक छोङ
देती हैं अनेक लङकियाँ तब कैरियर खराब
नहीं होता??
जब छेङछाङ के डर से
लङकियों की शादी कर दी जाती है तब
""एक प्रतिभाशाली लङकी का कैरियर
बरबाद नहीं होता????
तब ये "ब्रैनवाश्ड ""बुजुर्ग
स्त्रियाँ नैतिक दैत्य बनकर
लङकी का ब्याह कर दो की रट लगाकर
माँ बाप का जीना हराम कर देती हैं और
बेमेल बेप्रेम की बेवक्त शादियाँ करके कैद
कर दी जाती है हजारों लङकियाँ "
ऐसे हर गली हर रेलगाङी हर बस हर
दफ्तर हर सभा में यत्र तत्र मौजूद
""लङकियों को फिकरे टोंचने बैड टच और
टँगङी कोहनी चिकोटी 'बकौटा भरने
वाले """
तब कब ऐसा होता है कि ""दस नैतिक
दैत्यानियाँ और नैतिक दानव उठकर छेङने
वालों की """लात जूतम पैजार करके "
गारंटी बने कि ""लङकियो डरो मत
दो चार नैतिक ""रक्षक हर जगह तैनात
है????
बङी तकलीफ होती है लङकियाँ बिगङने
पर लेकिन एक दो मामले भी ऐसे
नहीं """कि पाँच बुजुर्ग औरतें
कभी "छेङछाङ करने वालों के खिलाफ
थाने जाकर शपथ पत्र दें????
या कि चप्पलें बजा दें बदतमीज
छिछोरों पर दस बीस महामानव????
चिंतन जारी है """
किसे डराया जा रहा है??
और क्यों??
हम सबने कभी न कभी ये घूरती आँखें
महसूस की हैं ।अभी कुछ ही महीनों पहले
की घटना है कि एक लंबी मॉडल
जैसी देह की लङकी 'सुभारती मेरठ से
हमारे साथ ऑटो में बैठी रेलवे स्टेशन के
लिये और ऑटो ड्राईवर ने
उसको जानबूझ कर नोंच लिया ठीक
पसलियों पर 'लङकी भभक
ही तो पङी और ड्राईवर प्रौढ़ होकर
भी ढिठाई पर 'सब मजे लेकर पूछने लगे
क्या हुआ!!!लङकी बताये तो कुछ
नहीं किंतु हमने कहा कॉलर पकङ बुड्ढे
का और
'लगा 'ऑटो वाला भागा खाली ऑटो लेकर
""""लोग आपस में बतियाने लगे "कपङे
तो देखो छोरियों के 'जबकि उस
लङकी ने पैन्ट कमीज काफी ढीली और
मफलर पहन
रखा था ''साङी वालियों से अधिक
ढँकी थी वह ''''हमने उसको शाबास
कहा और कुछ
चेतावनियाँ भी """"मेडिकल आने
वाली मरीज मजदूर महिलाओं की नजर
में लङकी की गलती थी,,,, जबकि वह
लङकी मेडिक या इंजीनियरिंग
की छात्रा थी 'परदेश में होस्टल में
रहकर पढ़ती है '''''अगर कोई
सवारी वीडियो बनाती तो??
ऑटो वाले का लायसेंस चला जाता न!!!!
बेशक "पोर्न की हर हाथ में उपलब्धि ने
लङकों को ""सेक्स
कीङा ""बना डाला है और हर वक्त
भङके यौनपिपासु कीङे की भावना से
भरे रहते है अधिकतर पोर्न दर्शक ।
सवाल ये है कि """"छेङछाङ में पिटने
या जेल जाने वाले लङके को बचाने
"""जिस तरह गवाह बनकर औरतें
या आदमी खङे हो हो जाते हैं
""""""क्या कभी ऐसा भी हुआ
कि ""लङकी चुपचाप चली गयी हो और
बस ड्राईवर या कंडक्टर
या सवारियों की औरतें आदमी """पहल
से स्वेच्छा से उतर कर
थाना कचहरी जायें और
दोषी लङकों को पहचान कर
गवाही दें?????
अकसर रोज अपडाऊन करने वाली टीचर
वकील क्लर्क प्रोफेसर नर्स महिलायें
खूब ट्रैण्ड हो जातीं हैं कि """कंधे पर
झुकर सोने लगते हैं लोग
"""खिङकी खोलने के बहाने झुकते है
जानबूझ कर बगल में बैठे हों तो लगातार
हाथ पांव चलाते हैं और बस में मोबाईल
पर भद्दे गाने बजाते हैं """"चुपचाप
लङकियों की वीडियो या तसवीर खींच
लेते हैं """""अब लङकियाँ अगर
''''''ऐसा करने लगीं है तो???
सिखाया किसने कि "सुबूत
रखो "वरना क्या पता कल
क्या कहानी गढ़ दें?
आप "कभी स्कूल जाती बस पर गौर करें
''स्कूली लङकियों को भी सिकुङकर
बैठना पङता है कुछ लङके अगर जानबूझ
कर हरकतें कर रहे हैं तो कंडक्टर
ड्राईवर 'अनदेखी तब तक करते हैं जब
तक कि पेरेन्ट्स से लङकी शिकायत न करे
""""दो बस बदलने के बाद 'लङकी और
भी तो है
आपकी ही लङकी का झगङा क्यों??
सवाल उठा दिया जाता है """"कौन
समझाये कि वे विवश लङकियाँ सह
लेतीं है ये सोचकर कि "पापा नाराज
होकर कहीं पढ़ना न छुङा दें??
जिस देश में एक
यूनिवर्सिटी का वी सी ""लायब्रेरी जाना बंद
करवा देता लङकियों का """कि लङके
पीछे आयेंगे तो भीङ होगी??
वहाँ ऐसी लङकी ही सुहाती है जो आँसू
बहाती दुपट्टा सँभालती घर जा दुबकें।
ये बिडंबना नहीं तो और क्या है
कि """लङकों की बदतमीजी नहीं रोक
पाने वाला कायर समाज
"""लङकियों के जींस मोबाईल और
कॉलेज ट्यूशन जाने पर रोक लगाता है??
खासकर हरियाणा पंजाब
यूपी बिहार???? और '''''फिर ये
गारंटी भी नहीं लेता कि साङी सलवार
कमीज बुरका घूँघट में """लङकी जान
माल आबरू से सुरक्षित रहेगी????

कितने ही कॉलेज """लङकियों के पैंट
पहनने को दोषी मानने लगे हैं
""""गजब??? क्या गांव की परदानशीन
औरतें सपरक्षित हैं??? आज की खबर है
कि कटिहार की बारह तेरह साल
की कक्षा छह की लङकी """यौन शोषण
से गर्भवती????
सवाल ये है ही नहीं अब कि "रोहतक
बस में क्या हुआ "सवाल है कि जब "लङके
रेप करके लङकियों के वीडियो बनाकर
ब्लैक मेल करते हैं और आत्महत्या करतीं हैं
लङकियाँ तब एक समाज
की कुंभकरणी नींद
क्यों नहीं टूटती????????तब ये
दादी नानी लङकों पर लगाम
क्यों नहीं लगातीं???????हरियाणा बस
में जो 'साबित हो कि लङकियों ने
लङको को मारा पीटा तो 'उनपर
मुकदमा चलेगा गुंडागीरी और चोट
पहुँचाने का "किंतु जिस तरह से ""एक
दम ये प्रचार किया जा रहा है
कि """लङकियाँ जींस न पहने मोबाईल
न रखे और क्यों वीडियो बनायी ""उस
को "क्यों "बल देकर ये
हौवा बढ़ाया जा रहा है
ताकि "लङकियों के प्रति मनोबल टूटें
और "छेङछाङ पर भी कल कोई हिम्मत न
करे??
जब "लङके महिला सीट से उठते
ही नहीं जब लङके गंदे गीत बजाते हैं जब
लङके 'भीङ में हाथ टलाते है """तब
दादी नानी अम्माँयें क्यों नहीं गवाह
बनती??? और क्यों नहीं इतना प्रबल
विरोध होता? जब
लङकियों की फोटो कोरल ड्रा और
फोटोशाप से बिगाङ कर ब्लैक मेल किये
जाते हैं तब समाज सङक पर उतर कर
क्यों नहीं एक दम """बंद कराता "ये
हमले!!!!!!!!!!

जब एक लङका ये कहता है कि """ये
तो "ऐसी ही लङकियाँ है
"""तो ऐसी ही लङकियाँ?? मायने
कहाँ तक जाता है?? रही बात तीन
लङके!!!!!!!!!!! दो लङकियाँ???????? और
फिर भी पिटते रहे????? जब तक नैतिक
कमजोरी न हो "लङके मार नहीं खाते ।
हम कोई दावा नहीं करते
कि "लङकियों को छेङा गया """""किंतु
इतना जरूर है कि जिस तरीके से फटाफट
गवाह और लङकियों के घर पहचान
की कुख्याति की जा रही है और
पिछला एक वीडियो भी सामने आ
गया कि एक लङका और वे पीट चुकी है
""""तो कोई तर्क
नहीं बनता क्योंकि ""हर दिन
यात्रा में जाते आम आदमी को पता है
रोज एक न एक ""लफंगा हर बस रेल भीङ
में मिल ही जाता है """"छूने
की कुचेष्टा ''साबित करना असंभव है
'''क्या दिखता है कोंचना या आँख
दबाना या किस उछालना?
सोचें तो """""हर रोज
हजारों लङकिया हाईस्कूल तक आते आते
बिठा दी जाती है घर केवल
"""""छेङछाङ की हरकतों के डर से??????
कितनी लङकियों को झूठे फोन कॉल
डराकर घर में बंद करा देते हैं?? कितने
माँ बाप ""अपडाऊन यात्रा के डर से
कैरियर रोक देते हैं
हजारों लङकियों का????? कब ऐसा हुआ
कि ड्राईवर ने बस थाने ले
जा खङी की हो कि "लो साब ये
छेङछाङ कर्ता अपराधी???

अब सच जो भी हो """"""असंभव ही है
सामने आना """"क्योंकि लङकों के पिटने
की तो वीडियो है """किंतु उससे पहले
क्या हुआ ये कौन गारंटी ले? चूंकि तीन
लङकों के कैरियर का सवाल है तो ""
नातेदार ही नहीं """स्त्रियों पर
तालिबानीकरण के समर्थक भी टूट पङे
हैं """""परंतु काश ये सब बहादुर
"""समाज से सदा को छेङखानी बंद
कराने को ऐसे ही बिलबिलाते तो ""ये
सब आक्रामक लङकियाँ न बनती।
हरियाणा वह प्रांत है जहाँ सबसे कम
स्त्री पुरुष अनुपात है """""जहाँ भ्रूण
कन्या वध सबसे अधिक हुये पाये गये
""जहाँ खाप पंचायतें सर्वाधिक हिंसक
हैं """जहाँ तालिबानी फरमान लागू है
""""वहाँ जींस पहनना ही गुनाह है
"""आँखें तरेरे बिना कोई
जींसवाली लङकी देखता ही कब है?
बिलकुल """"कम
पढ़ी लिखी दादी नानी "पोता चाहती है
और """आज इसीलिये बहू मोल लानी पङ
रही है अनेक "सासों को "उनको "नई
बहुयें और लङकियाँ पसंद नहीं

और यही ""ब्रैनवाश्ड
स्त्रियाँ """स्त्री शिक्षा की दुश्मन
हैं """लङकों की गलतियों पर
परदा डावती है और बहू पर जुल्म
करती है और बेटी को जॉब नहीं करने
देती """"हालात बदल रहे है धीरे धीरे
""

अनेक पिता अपनी बेटियों की पढ़ाई
लिखाई के लिये
"""अपनी बेटी की माँ से झगङते रहे हैं
जबकि माँ चाहती रही लङकी पढ़ाई
छोङ गोबर पाथे रोटी बेले """"अनेक
लोगों ने बेटियों के हित में प्रांत
ही छोङ दिया।
गलत हाथ गंदी आवाजें गंदे इशारे
फब्तियाँ और घिनौने दबाब स्पर्श और
गीत '
कोई देखता नहीं होगा क्या "????बस रेल
मेट्रो, ऑटो टैम्पो 'स्टेशन, बाजार
हस्पताल 'स्कूल कॉलेज, ऑफिस गली सङक
मुहल्ले ट्यूशन कक्षा ''
'
'????
क्यों नहीं एक माहौल बनता कि अश्लील
फिकरे गीत टच और इशारे करने वाले
तत्काल वहीं दबोच लें आस पास के लोग
कि """पकङो मारो ये है वह
लफंगा जानवर इसकी वजह से शरीफ लङके
भी शक के और शरीफ लङकियाँ डर के
कारण परेशान रहते है """"!!!!!!!
पकङो पकङो मारो मारो
चोर चोर चोर
की आवाज तो अकसर झुंड लगाकर लगाते हैं
व्यापारी दुकानदार पङौसी????
तब
क्या ""वीर विहीन मही मैं जानी????
फिर क्यों बिलबिलाते हैं तथाकथित
'सौन्दर्य के पुजारी कि अब
लङकियाँ "मर्दों की तरह होने लगीं?
क्यों न हों जब "मर्द स्त्रैण होने लगे!!!!!!
सुंदर नाजुक और कीमती चीजें तभी रह
सकती हैं जब 'लोग भले ईमानदार और
स्वच्छ मन तन वाले हों,
क्या हर लङकी 'किसी बाप भाई
की बेटी बहिन नहीं???
तो ऐसा क्यों कि अजनबी लङकी के साथ
कोई "छेङछाङ बदतमीजी 'समाज के हर
मानव का मामला नहीं???
क्या हम भारतीय इसी कारण बदनाम
नहीं???
क्यों नहीं बङी आयु की औरतें तब बढ़कर
झुंड बुलाकर पहचान कर ""लफंगों को पीट
डालतीं जब कोई
लफंगा किसी स्कूली छात्रा हो बच्ची को "बैड
टच या बैड कम्पलीमेन्ट देता है!!!!!
रहा सवाल कपङे?
तो "सबसे अधिक बुरा व्यवहार सलवार
कमीज और साङी वालियाँ ही झेलतीं आ
रही हैं और लोग बुरके में भी घूरते हैं और
मौका मिले तो टच भी करते है "
यह भी समाज की अजीब मानसिकता है
कि बाजार में बैठकर "सबकुछ बेचता है "?
और घर में बैठकर बुराई करता है?
"जो लङकी 'लङकों से झगङा करे वह
"बदचलन? और जो चुपचाप 'छेङसहकर घर
बैठे वह "सुशीला?
जींस मोबाईल और पढ़ने पर पाबंदी?
अरे डूब मरो कायरो तुम सब कभी ''समाज
में शराब गुटखा दहेज सिगरेट
गाँजा तंबाकू ड्रग्स कन्यावध और छेङछाङ
पर पाबंदी लगाने के नाम पर?
""""""""मरदानगी मर जाती है?
भूल गये यही देश था जहाँ मुँह अँधेरे औरतें
शौच को खेत जातीं कुंयें ताल नदी पर
नहाती रहीं पनघट पर
पानी भरती रहीं?
ये दादी नानी अम्मायें '''घर के
दारूबाजों के आगे भीगी बिल्ली? और
लङकियों पर 'दबादब भौंकना?
जिस तरह एक पुरुष की गवाही पर एक
पुरुष को फाँसी चढ़ती थी गुलाम भारत
उसी तरह आधे गुलाम रह गये भारत में
एक "औरत की भौंक भौंक टेंटें पर
हजारों लङकियों के खिलाफ 'फरमान
जारी होते है कैरियर और विवाह
बरबाद होते है "
©®सुधा राजे।


Wednesday, 3 December 2014

सुधा राजे का " नजरिया" :- जरा सा पेच

जरा सा पेच
एक लङकी को हर जगह लोग छेङते हैं
कोहनी वक्ष पर मार कर चुभा देते हैं '
गंदे इशारे आँख से हाथ ले गाना और वाक्य से करते हैं "
छूने चिपक कर बैठने कमर पेट पीठ सिर कहीं भी हाथ पांव लगाने की कुचेष्टा करते हैं
नींद या नशे का बहाना करके लद जाते हैं
सभा कचहरी बस रेल वायुयान तक में!!!!!!!!

लङकी वो जो बिना कुछ कहे या बस जरा सा विरोध करके चुप रह जाती है बवाल के
डर से और आगे बढ़ जाती है तो वे लोग दूसरी लङकी को शिकार बनाते हैं ।


और
पेंच
ये है कि ऐसा एक लङकी की जिंदगी में
एक दो चार बार नहीं ★
बार बार
हर जगह
हर दिन होता रहता है #
सतर्क और सावधान लङकियों को ही रहना पङता है
सो जब
#कोई घूरता है 'वे निगाहें चुरातीं है
छूना चाहता है वे सिकुङ कर दूर हटतीं है
कोंचने से बचने के लिये किसी स्त्री के बगल में और सहेली के साथ झुंड या
कोने में बैठती हैं ।
हम सब गंदे स्पर्शों से बचने के लिये डेनिम के मोटे जैकेट पहनते थे और
बैग में धातु की स्लेट रखते थे 'डिवाईडर के तौर पर 'स्कूल कॉलेज या ट्रेन
में दूसरी सवारी से बचने को कोहनी बाहर की तरफ फिर बैग और छतरी बीच में
''""""

पिनअप दुपट्टे और चौङे बेल्ट भी इन्हीं सब का हिस्सा होते थे ।


फिर भी ''''घूरती आँखें कहकहे और गाने जुमले '''''!!!!!
हर लङकी का पीछा करते रहते हैं
लगातार बार बार हर दिन '''''


अंतर बस इतना है कि जब तक सहन किया जाता है ये सब जब तक कि "अपहरण
बलात्कार और बदनामी की नौबत ना आ जाये """


कोई
बाप भाई अगर यह कहता है कि उसकी बेटी घर से बाहर आती जाती तो है लेकिन
कोई कभी छेङ नहीं सकता तो ''''या तो वह बंद निजी वाहन में जाती होगी या
बंदूकों के साये में """""""

परंपरावादी
औरतें ही ऐसी लङकियों की सबसे अधिक निंदा करती हैं और '''''कारण होता है
उनका पढ़ना '
उन लङकियों के कपङे
उन लङकियों का बिना बाप भाई के अकेले आने जाने का साहस """""


आप को यकीन न हो तो ""कम पढ़ी लिखी बुजुर्ग महिलाओं के सामने ""लङकियों
का ज़िक्र करके देख लीजिये!!!!!!!!!!


वे लङकों को कुछ नहीं कहेंगी बल्कि लङकियों को अकेले आने जाने से रोकने
जींस पेंट कमीज पहनने से रोकने
और ऊँची तालीम दिलाने से रोकने की बात करेंगी
वे महिलायें "मोबाईल रखने का मतलब ""छिनाल होना ""समझा देगी 'उनके हिसाब
से लङकियों को मोबाईल केवल "यारों को बुलाने के लिये चाहिये "

माँ बाप भाई बहिन के संपर्क में रहना सुरक्षा हेतु पुकार को भी मोबाईल
होता है मुसीबत में मदद देता है या जानकारी देकर पढ़ाई मे सहायक है यह वे
नहीं मानतीं """"

बहुत सी महिलाओं के आधुनिक लङकियों के प्रति इस क्रूर रवैये की वजह है
उनकी अपनी जिंदगी '

जब उनकी छोटी आयु में शादी हो गयी नाबालिग आयु में अनेक बच्चों की माता
और प्रौढ़ होने से पहले दादी बन गयीं ।अब पूरी जिंदगी तो गुजार दी मेहनत
सेवा और बंदिश में ।
वे संचार क्रांति के बाद का युग नहीं समझती ।
वे लङकियों को ""कल्पना भी नहीं कर सकतीं कि वे शादी किये बिना अकेली नगर
में रहतीं पढ़ती या जॉब करती और लङकों के छेङे जाने पर विरोध करतीं है ।

अगर सारा आयु हर लङकी हर छेङने वाले को "ऐ काश!! कि धुनाई रख सके तो?????

ये कितनी बार होगा????

एक दो दस पाँच बीस पच्चीस??

प्रौढ़ महिलायें तक कोहनी बाजी और बैड टच की शिकार तो होती ही हैं
उन पर भी फिकरे कसे जाते हैं
ये और बात है कि आते जाते रोज उनको आदत हो जाती है दूरी रखकर निबटने और
डपटने की """""

अगर सब औरतें हर दिन हर घूरने फिकरे कसने और बैड टच करने वाले को ""धुन दें तो???


रोज कहाँ कहाँ कितनी घटनायें होगी??

तो "आज ये कौन सा तर्क है कि अमुक लङकी ने पहले भी एक को "पीटा????


पूछो जरा दिल पर हाथ रखकर हर लङकी से
कि कितनो को पीटा या फटकारा या डपटा या ""बचकर भागी या सिकुङ कर बैठी!!!!!!

अगर लङकी को परेळान किया जाये और वह चुपचाप सहकर सिकुङ जाये तो ठीक "
चर्चा तक नहीं होता "???
कि अरे आज बङी बुरी बात हुयी वहाँ एक चौराहे पर कुछ लफंगों ने लङकियों को
"छेङा??????

मगर '
ये जरूर 'दर्द का विषय है कि हाय हाय लङकियाँ "लङकों को पीट गयीं??


जब लङके लङकियों को तंग कर परेशान करते हैं कि विवश डरकर पढ़ना तक छोङ
देती हैं अनेक लङकियाँ तब कैरियर खराब नहीं होता??
जब छेङछाङ के डर से लङकियों की शादी कर दी जाती है तब


""एक प्रतिभाशाली लङकी का कैरियर बरबाद नहीं होता????


तब ये "ब्रैनवाश्ड ""बुजुर्ग स्त्रियाँ नैतिक दैत्य बनकर लङकी का ब्याह
कर दो की रट लगाकर माँ बाप का जीना हराम कर देती हैं और बेमेल बेप्रेम की
बेवक्त शादियाँ करके कैद कर दी जाती है हजारों लङकियाँ "

ऐसे हर गली हर रेलगाङी हर बस हर दफ्तर हर सभा में यत्र तत्र मौजूद
""लङकियों को फिकरे टोंचने बैड टच और टँगङी कोहनी चिकोटी 'बकौटा भरने
वाले """


तब कब ऐसा होता है कि ""दस नैतिक दैत्यानियाँ और नैतिक दानव उठकर छेङने
वालों की """लात जूतम पैजार करके "

गारंटी बने कि ""लङकियो डरो मत दो चार नैतिक ""रक्षक हर जगह तैनात है????


बङी तकलीफ होती है लङकियाँ बिगङने पर लेकिन एक दो मामले भी ऐसे नहीं
"""कि पाँच बुजुर्ग औरतें कभी "छेङछाङ करने वालों के खिलाफ थाने जाकर शपथ
पत्र दें???? या कि चप्पलें बजा दें बदतमीज छिछोरों पर दस बीस
महामानव????

चिंतन जारी है """

किसे डराया जा रहा है??
और क्यों??
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लेख :- स्त्री और समाज :- माँ महान है !!पर किसकी??

तसवीरें जैसी दिखतीं हैं वैसी होतीं नहीं हैं ।
रिश्ते तत्काल नहीं टूटते ', वा ही कोई तोङने के लिये विवाह करता है ।
धोखाधङी की शादियों को जाने दें तो अमूमन "हर लङकी लङका हमेशा साथ रहना
है ये भावना लेकर ही विवाह करते हैं ।
फिर जहाँ पत्नी केवल गृहिणी होती है वहाँ अकसर "पति का रौब ग़ालिब रहता
है और स्त्री का अस्तित्व बच्चों सास ससुर पति में खो जाता है ।
जहाँ पत्नी ""आर्थिक स्तर पर मजबूती से खङी होती है और सामाजिक रूप से
सक्रिय होती है वहाँ "तमाम पुरुष स्त्री और तमाम अवसर उसे मिलते हैं ।
पुरुषप्रवृत्ति की तरह दोस्ती और मनोरंजन भी । स्त्री में प्रतिभा है
सुन्दरता है और बैक मजबूत है फिर उसका पेट भरा है बदन पर कपङे बढ़िया है
आर्थिक सुरक्षा मजबूत है । तब ""पुरुष अहंकार आहत होता है ""दाता
""स्वामी ""और पति ""होने का ""अभिमान ""इन सब बातों को ''क्रमशः टोकने
रोकने लगता है । क्योंकि ',अक्सर ग़ार ज़िम्मेदार पुरुष करते भी यही हैं
अपनी पत्नी को घर में दायरे में रखकर ""परस्त्री को "आई टॉनिक "सभा री
रौनक समझकर "हँसी मज़ाक बतियाना और "फ्लर्टिंग " अनेक विद्रूप संबंध इन
"बातों बातों में पनप जाते हैं । कहीं स्त्री का मन आहत असंतुष्ट होता है
कहीं तन । कहीं हिंसा मानसिक सह रही होती है कहीं शारीरिक । कहीं उसके
सपने बङे और कैरियर की महात्त्वाकांक्षा और ऊँची होती है जबकि पति परिवार
"हालात "अनुकूल नहीं होते और कहीं ',पति का मन कहीं और धन परस्त्री
कैरियर या अपनी मंजिल में उलझा होता है । अब ये सब बातें एक ""गैप ""पैदा
करतीं हैं ""छोटे नगरों और कसबों में जहाँ संस्कार समाज जाति खाप
पंचायतें बिरादरी बदनामी धर्म पाप पुण्य कमजोर आर्थिक शक्ति बच्चों का
भविष्य मायके ससुराल के परोक्ष दवाब स्त्री और हाँ पुरुष को भी ""हर हाल
में जोङे में रहने पर विवश रखते हैं ""वहीं महानगरीय अत्याधुनिक जीवन
शैली में कब चुपके से किसके वैवाहिक जीवन में कौन चोर बनकर "पति चुरा ले
गयी "या पत्नी चुरा ले गया "पता तब चलता है जब एक दिन झगङा तलाक की नौबत
पर आ जाता है । ये तलाक ''वैवाहिक हिंसा मारपीट असाध्य रोग छूत की असाध्य
बीमारी वैवाहिक संबंध न निभा पाने लायक मानसिक या दैहिक नपुंसकता गायब
रहना और चरित्रहीनता पॉलीगेमी वगैरह कुछ भी हो सकता है । आज भी
अत्याधुनिक समर्थ महानगरीय "परिवार की स्त्री को छोङ दें तो अमूमन औसत
भारतीय स्त्रियाँ ""हर हाल में अपनी शादी क़ायम रखती है ""

पति विकलांग है । मानसिक विक्षिप्त है । क्रोधी है शराबी है । यहाँ तक कि
दहेज उत्पीङन नपुंसकता या बलात्कार और बंदी कर रखने वाले पति को भी
निभातीं हैं ।


Monday, 1 December 2014

सुधा राजे की रचनाएँ-:-

1. सोच के देखो जला गाँव घर कैसा लगता है

मरता नहीं परिन्दा 'बे -पर
कैसा लगता है ।
जिन को कोई
डरा नहीं पाया वो ही राही।

मार दिये गये मंज़िल पर डर
कैसा लगता है ।
आदमखोर छिपे
बस्ती में ,,अपने अपने घर । अपनों से
मासूम हैं थर थर कैसा लगता है ।
अभी शाम
को ही तो कंघी चोटी कर
भेजी ।
सङी लाश पर नोंचा जंफर
कैसा लगता है ।
इश्क़ मुहब्बत प्यार
वफ़ा की लाश पेङ पर थी।
श्यामी का फाँसी लटका
"वर 'कैसा लगता है ।
चुन चुन कर सामान बाँध
कर रो रो विदा किया ।
जली डोलियों पर वो जेवर कैसा लगता है

बाबुल
का सपना थी वो इक
माँ की चुनरी थी ।
शबे तख़्त हैवान वो शौहर कैसा लगता है

छोटे बच्चे आये बचाने
माँ जब घायल थी ।
वालिद के हाथों वो खंज़र कैसा लगता है

जाने कब खा जाये लगाना फिर भी रोज
गले ।
रिश्तों के जंगल में अजगर कैसा लगता है ।
सुधा कहानी कब
थी उसकी सुनी गुनी जानी। हुआ बे क़फन
ज़िस्म वो मंज़र कैसा लगता है ।??????

2. किरचें टुकङे तिनके क़तरे
रेज़ा रेज़ा आईना ।
दिल सी हस्ती ग़म सी बस्ती चाक़
कलेजा आईना।
रूह की गहरी तहों में बैठा हर पल शक़्ल
दिखाता सा।
कभी चिढ़ाता कभी रूलाता किसने
भेजा आईना।
जब भी दिखा दिया अहबाबों को, सारे
ही रूठ गये।
राहत का तकिया हमको था
उनको नेज़ा आईना।
जिस दिन से पीछे से उसने ग़ौर से
देखा था चुपके ।
क़दर बढ़ गयी इसकी तबसे अब *आवेज़ा-
आईना।
जो कोई ना देख सके ये
"सुधा" वही दिखलाता है।
या तो इसको तोङ फोङ दूँ या रब। ले
जा आईना।
लगा कलेजे से हर टुकङा नोंक ख्वाब
की सूरत सा।
टुकङे टुकङे था वज़ूद
भी युँही सहेज़ा आईना ।
जब तक कोई तुझे न तुझ सा दिखे रूह
की राहत को ।
तब तक तनहा तनहा यूँ ही मिले गले
जा आईना ।
मंदिर की देहली पर जोगन ,,जोगन
की देहली मोहन ।
मोहन की देहलीज़ ये टूटा जगत् छले
जा आईना ।
दागदार चेहरे भी हैं इल्ज़ाम आईने पर
ऱखते ।
जितना तोङे अक़्श दिखाकर ख़ाक मले
जा आईना ।
चुभी सचाई लहू निकल कर चमक उठे
**औराक़ भी यूँ ।
तोङ के जर्रों में फिर नंगे पाँव चले
जा आईना ।

3.


सुधा राजे की रचनाएँ-:-

1. > कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखूबाई की।
>
> अम्माँ मर गई पर कैं आ
> गयी जिम्मेदारी भाई
> की।
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखू बाई की।
>
> आठ बरस की उमर
> अठासी के
> बाबा
> अंधी दादी।
>
>
> दो बहिनों की ऐसों
> करदी बापू ने जबरन शादी।
>
> गोदी धर के भाई हिलक के
> रोये याद में माई की।
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखू बाई की।
>
> चाचा पीके दारू करते
> हंगामा चाची रोबै।
>
> न्यारे हो गये ताऊ चचा सें
> बापू बोलन नईं देबे।
>
> छोटी बहिना चार साल
> की
> उससे छोटी ढाई की।
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखूबाई की।
>
> भोर उठे अँगना बुहार कै
> बाबा कहे बरौसी भर।
>
> पानी लातन नल से तकैँ।
>
> परौसी देबे लालिच कर।
>
> समझ गयी औकात
> लौंडिया जात ये पाई
> -पाई की..
>
>
> कैसे इतनी व्यथा सॅभाले
> बिटिया हरखू बाई की।
>
> गोबर धऱ के घेर में
> रोटी करती चूल्हे पे रोती।
>
> नन्ही बहिन उठा रई
> बाशन
> रगङ राख से वो धोती।
>
> बापू गये मजूरी कह गये
> सिल दै खोब
> रजाई की।
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखू बाई की।
>
> भैया के काजैं अम्माँ ने
> कित्ती ताबीजें बाँधी।
>
> बाबा बंगाली की बूटी
> दादी की पुङियाँ राँधी।
>
> सुनतन ही खुश हो गयी
> मरतन ""बेटा ""बोली दाई
> की।
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले
> बिटिया हरखू बाई की।
>
> जा रई थी इसकूल रोक दई
> पाटिक्का रस्सी छूटे।
>
> दिन भर घिसे बुरूश
> की डंडी।
>
> बहिनों सँग मूँजी कूटे
> दारू पी पी बापू रोबै
>
> कोली भरैं दुताई की।
>
> कैसें इतनी व्यथा सँभालै
बिटिया हरखूबाई की।
>
>
> बाबा टटो टटो के माँगे
> नरम चपाती दादी गुङ।
>
> झल्ला बापू चार सुनाबै
> चाची चुपके कहती पढ़।
>
> छोटी बहिन
> पूछती काँ गई
> माई!!! रोये हिलकाई की
>
> कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की????

2. दिल की बस्ती लूट रहा ये कारोबाररूपैये
का।
लोकतंत्र या साम्यवाद हो
है सरकार रुपैये का।
बहिना बेटी बुआ खटकती क्यों है
रुपिया लगता है।
भैया पैदा रो ले 'हँस मत साझीदार रूपैये
का।
प्यार खरा बेबस रोता है
मेंहदी जली गरीबी की।
उधर अमीरं ले गया डोली सच्चा प्यार
रुपैये का।
क्यों गरीब
का प्रतिभाशाली बच्चा ओहदे पाये
सखे!!!!
अलग अलग विद्यालय
किस्मत है ललकार रुपैये का । वचनपत्र
पर
लगी मुहर है अंकसूचिका पहचानो। काग़ज
असली नकली चलता यूँ दमदार
रूपैया का।
रूपिया है तो ननदी खुश है ननदोई देवर
सासू

बीस लाख का तिलक पाँच का भात बज़ार
रूपैये का।
कोई भी ना हो तेरा फिर
भी जलवे जलसे दम होँगे

इकला ही रैबैगा रहा जो मारा यार
रूपैये का।
रूपिया दे वो ही 'सपूत है रूपिया दे
वो बीबी है

रुपिया दे वो ही तो माँ है दिल
दिलदार रूपैये का।
न्याय मिलेगा उसे कङक
जो रुपिया देय वकीलों को । सुनवाई
होगी गड्डी दे थानेदार रुपैये का।
रूपिया दे दरबान
मिला देगा मंत्री से चटपट सुन ।
रूपिया दे
तो वोट
मिलेगा ज़लवेदार रुपैये का।
रूपिया हारा नहीँ हार गये
जोगी भोगी संन्यासी ।
मंदिर गिरिजे
मस्जिद चढ़ता है दरबार रुपैये का।
रूपिया होता बाबूजी तो हम
भी संपादक होते ।
तीस किताबेँ छप
गयीँ होती बेफ़नकार रूपैये का।
रुपिया हो तो आवे
रुपिया बहुरुपिया रिश्ता है "सुधा" ।
ऐब
हुनर हैँ हुनर ऐब हैँ
फ़न दरकार रुपैये
का

3. Sudha Raje
(Nota)
अस्वीकृति का अधिकार
और
नेता के कुलक्षण
*****
व्यंग्य है कृपया बुरा न माने । 1.
राजनीति के
कामचोर हैं
अव्वल ये हर्रामखोर
हैं
1-वे जो संसद में सोते हैं
वे जो हंगामे बोते हैं
2-वे जो आज ज़मानत पर
हैं
ख़्यानत पर हैं लानत
पर हैं
3-काला अक्षर भैंस
बराबर
रिश्वत बाज़ी ऐश
सरासर
4-
ये ही तो हैं चौपट
राजा
भाजी भात बराबर
खाजा
5-
वे जो ए.सी.में सोते हैं चुपके
नोटो को ढोते
है
6
वे जो पहरों में चलते हैं पाँच साल पर घर
मिलते हैं
6-
वे जो जाते रोज
विलायत
जिनकी तोंद फोङने
लायक
7-
वे जो इंगलिश में
बतियाते
जात पाँत हिंदी
टर्राते
8
वे जो भौंके दंगा करने
रात
गली को नंगा करने
9
वे जो सिर्फ
विदेशी पीते
चोरी डायलिसिस
पर जीते
10-
जो कुनबे का ठाठ
बढाते
ज़ुर्मों का क़द काठ
बढ़ाते
11-
वे जो करते बहुत शोर
हैं
नेता ना हर्रामख़ोर
हैं
राजनीति के
"वही" चोर हैं
12-
वे जो बाँहे रोज
चढ़ाते
भाई भाई में बैर
बढ़ाते
13-
वे जो कुत्ते चमचे पाले ओहदों पर है
जीजा साले
14-
वे जो झक सफेद कुरते में टँगङी चबा रहे
भुरते में
15-
वे
जो पंचसितारा रूकते
जिनके घर जेनरेटर
फुँकते
16-.
पीते बस बोतल
का पानी
हैं डाकू बनते हैं दानी
17-.
जिन पर
लंबी ज़ायदाद है
जिनको पैसा
खुदादाद है
18-
वे जो बस उद्घाटन
करते
वे जो रोज उङाने
भरते
19-
जिनसे मिलने आम न
जाते
जिनको गुंडे लुच्चे
भाते
20
जिनकी हैं अवैध
संताने
बात बात पर अनशन
ठाने
जनहित के
मुरगी मरोर हैं
पृष्ठ दिखाते नचे मोर
हैं
अव्वल ये हर्राम ख़ोर
हैं
राजनीति के
यही चोर हैं

4. सोच के देखो जला गाँव घर कैसा लगता है

मरता नहीं परिन्दा 'बे -पर
कैसा लगता है ।
जिन को कोई
डरा नहीं पाया वो ही राही।

मार दिये गये मंज़िल पर डर
कैसा लगता है ।
आदमखोर छिपे
बस्ती में ,,अपने अपने घर । अपनों से
मासूम हैं थर थर कैसा लगता है ।
अभी शाम
को ही तो कंघी चोटी कर
भेजी ।
सङी लाश पर नोंचा जंफर
कैसा लगता है ।
इश्क़ मुहब्बत प्यार
वफ़ा की लाश पेङ पर थी।
श्यामी का फाँसी लटका
"वर 'कैसा लगता है ।
चुन चुन कर सामान बाँध
कर रो रो विदा किया ।
जली डोलियों पर वो जेवर कैसा लगता है

बाबुल
का सपना थी वो इक
माँ की चुनरी थी ।
शबे तख़्त हैवान वो शौहर कैसा लगता है

छोटे बच्चे आये बचाने
माँ जब घायल थी ।
वालिद के हाथों वो खंज़र कैसा लगता है

जाने कब खा जाये लगाना फिर भी रोज
गले ।
रिश्तों के जंगल में अजगर कैसा लगता है ।
सुधा कहानी कब
थी उसकी सुनी गुनी जानी। हुआ बे क़फन
ज़िस्म वो मंज़र कैसा लगता है ।???????
©Sudha Raje
©सुधा राजे।


सुधा राजे की कविता :- ""कारोबार रुपैये का ""

Sudha Raje
दिल की बस्ती लूट रहा ये कारोबार रूपैये
का।
लोकतंत्र या साम्यवाद हो
है सरकार रुपैये का।
बहिना बेटी बुआ खटकती क्यों है
रुपिया लगता है।
भैया पैदा रो ले 'हँस मत साझीदार रूपैये का।

प्यार खरा बेबस रोता है
मेंहदी जली गरीबी की।

उधर अमीर ले गया डोली सच्चा प्यार
रुपैये का।

क्यों गरीब का प्रतिभाशाली बच्चा ओहदे पाये सखे!!!!

अलग अलग विद्यालय
किस्मत है ललकार रुपैये का ।

वचनपत्र पर लगी मुहर है अंक तालिका पहचानो।

काग़ज असली नकली चलता यूँ दमदार
रूपैये का।

रूपिया है तो ननदी खुश है ननदोई देवर
सासू

बीस लाख का तिलक पाँच का भात बज़ार रूपैये का।

कोई ना हो तेरा फिर
भी जलवे जलसे दम होँगे

इकला ही रैबैगा रहा जो मारा यार
रूपैये का।

रूपिया दे वो ही 'सपूत है रूपिया दे
वो बीबी है

रुपिया दे वो ही तो माँ है दिल
दिलदार रूपैये का।

न्याय मिलेगा उसे कङक
जो रुपिया देय वकीलों को ।

सुनवाई होगी गड्डी दे थानेदार रुपैये का।

रूपिया दे दरबान
मिला देगा मंत्री से चटपट सुन ।

रूपिया दे तो वोट
मिलेगा ज़लवेदार रुपैये का।

रूपिया हारा नहीँ हार गये
जोगी भोगी संन्यासी ।

मंदिर गिरिजे मस्जिद चढ़ता है दरबार रुपैये का।

रूपिया होता बाबूजी तो हम
भी संपादक होते ।

शतक किताबेँ छप
गयीँ होती बेफ़नकार रूपैये का।

रुपिया हो तो आवे
रुपिया बहुरुपिया रिश्ता है "सुधा" ।

ऐब हुनर हैँ हुनर ऐब हैँ
फ़न दरकार रुपैये का

©©सुधा राजे

पूर्णतः मौलिक
सर्वाधिकार सुरक्षित रचना ।

संप्रति पता —
सुधा राजे
511/2
पीतांबरा आशीष
बङी हवेली
शेरकोट
बिजनौर
246747
उप्र


सुधा राजे की अकविता :- विखंडित खंड।

अपने ही विखंडित खंडों को बटोरकर छू छू
कर देखने का साहस न था मुझमें इसीलिये
चुपचाप चली आई मैं बिना यह कहे
कि जा कहाँ रही हूँ और
रुकना क्यों असंभव है ।
विखंडित अस्तित्व से बार बार कुछ गढ़ने
की मेरी चेष्टा व्यर्थ ही रही क्योंकि न
मेरे पास रंग बचे थे न न सुर न ही कूची और
लेखनी तूलिका और पृष्ठ '
कुछ कण थे गीली मिट्टी के और कुछ टुकङे
बांयी पसली के ऊपरी भाग के दुखते हुये
दांये हाथ की कुछ स्पंदित उंगलियां और
स्पर्श से अनुभूति के कातर अंतर्ज्ञान
'''''बस इतने से ही उगाना था मुझे बंजर
वीरान मरुस्थल में एक पङाव भर छाँव और
एक कुनबा भर
तृप्ति '''''उंगलियाँ जो थी तृप्ति के लिये
चबायीं जाती रही और बायां आलिंद
दांया निलय अनुभूतियों के लिये
उगाता रहा हर रोज एक पङाव भर
बहाना ठहरने का ।
हर बार सारे टुकङे याद आये किंतु न मैं
लौट सकी न वे मुझ तक आ पाये '
नयी त्वचा हर घाव पर आ गयी और
अंगों की जरूरत होकर भी फिर अब
कभी जुङने की संभावना ही न रही '
न आँखें थी न पांव न हाथ न ही उदर पृष्ठ
और पूरा मस्तिष्क '
वहाँ जहाँ यादें जमा होती है उस टुकङे
को लाते लाते 'बिखर गया वह यब
वहाँ जहाँ सब भूला और 'सहेजा जाता है ।
रीते ही थे सब टुकङे और क्लोन बनकर
खङा हो गया मेरा अस्तित्व
बिना इतिहास और बिना किसी जङ के
'मुझमें
जिजीविषा भी होती तो क्यों 'दूर दूर
तक सिर्फ मैं ही मैं थी और कोई नहीं था '
दांयें या बांये आगे या पीछे हर तरफ 'मैं
घूम कर देख चुकी थी '
सपनों के कफन और अरमानों की कब्रें
बनाकर पङाव छोङ दिये मैंने 'मुझे
किसी की प्रतीक्षा न थी न
था किसी लक्ष्य को पाने का चाव '
टीसते भभकते घाव धीरे धीरे ठूँठ हो गये
और 'मैं अपना ही वजूद लिये
अपनी ही तलाश में खोजती रही बाँह भर
अँधेरा 'वक्ष भर विश्राम काँधे भर रुदन
और कंठ भर हँसी '
परंतु
हर बार मुझे मिली आँचल भर उदासी और
आकाश भर तनहाई मुट्ठी भर अहसास
लिये मैं धरती से ब्रह्माण्ड
की यात्रा करती रोज छोङ जाती अपने
बचे खुचे टुकङे 'और 'सोचती अब इनमें वापस
नहीं लौटूँगी '
मैं मरती ही नहीं थी क्योंकि मेरे इतने
टुकङे होकर 'बिखर चुके थे इतनी दूर दूर
कि मुझे समेटा नहीं जा जा सकता था ।
मैं जीवित भी नहीं हो सकती थी कि मेरे
हर टुकङे में शेष प्राण अनंत यात्रा पर
रहा कभी लौटा ही नहीं '
विराट से पूछती रही ""मैं ही क्यों "
ये पीङा ही देनी थी तो ये
चेतना क्यों दी?
निश्चेतक सारे व्यर्थ हो हो जाते '
और
जब मेरी आवाज टकरा कर शून्य से वापस
आती तो मुझे पता चलता कि मेरे पास
तो ध्वनि ही नहीं है वह केवल अहसास है
मेरा कि मैं पुकारती हूँ रोज
'किसी निराकार को मूक '
और यूँ वायपविहीन शून्य सुरविहीन
संगीत मेरी वक्ष भर तनहाई को समेट
लेता "
प्रकृति मेरे हर टुकङे को अंकुरित
करती जा रही है और मैं विलीन
होती जा रही हूँ '
कभी कुछ भी हुये बिना 'ये एकांत मुझे
'मिटने नहीं देता और ये 'शोर मुझे पनपने
नहीं देता '
मुझे थोङी सी धूप जरा सी हवा और
थोङी सी नमी चाहिये थी '
किंतु इस 'मिट्टी के नीचे कुछ
भी नहीं सिवा अनंत प्रतीक्षा के '
यहाँ न मेरा कुछ है न मैं किसी से जुङ
पा रही हूँ '
मेरे टुकङे '
कभी नहीं समेटे जा सकेगे और औऱ मेरे
रिक्त हिस्सों का कोई विकल्प
प्रकृति बनाना ही भूल
गयी उगाना ही भूल गया विराट उस
मिट्टी हवा पानी पङाव और
सहजीवी 'ब्रह्माण्ड पदार्थ को 'जिसे
मेरा होना था '
इतना अकेला तो ईश्वर भी नहीं '
यह जानने के बाद '
नक्षत्र भर हँसी और रोयी में समय भर '
मैं अमर हूँ "
न मर सकती हूँ न नष्ट हो सकती हूँ '
क्योंकि मैं
'अपनी पीङा का ही निराकार हूँ और
मूर्त रूप हूँ अपने ही प्रेम के यथार्थ
की कल्पना का '
जब सारी कल्पनायें मर जायेंगी तब मैं
'समेटी जा सकूँगी एक मुट्ठी आँसुओं में एक
आलिंगन भर स्पर्श प्रेम के बिना कोई यूँ
कैसे मर सकता है!!!!!!
©®सुधा राजे