Monday, 15 December 2014

सुधा राजे की कविता :- "आई चली गई"

आई तो बहुत पहले ही जा चुकी थीं इस घर
से '
तब जब बाबा ने दहाङते हुये
सुना दिया था अपना फैसला कि 'आई 'अब
कभी अगर अपनी आई के घर गयी तो फिर
लौट नहीं सकेगी ।
आई रह गयी बाबा के साथ लेकिन बँट
गयी 'दो टुकङों में एक टुकङा रह
गया बाबा का और
दूसरा चला गया उसकी अपनी आई अपने
बाबा भाऊ के घर ।
आई फिर बँटी जब 'बेटी पैदा हुयी और
दादी खुश नहीं थी 'बेटा हुआ तो दादा ने
मुहल्ले भर को दावत देदी '।
बाबा और बेटे के बीच फिर रोज
बँटती रही "आई "और टूटकर बिखर
गयी खील खील जब 'विदाई की 'ताई
की आई ने '।
आई तब एक बार और निकल गयी घर से एक
और टुकङा ताई के घर जाकर रहने
लगा और 'आई 'रह गयी बस जरा सी 'भाऊ
के साथ 'बाबा और भाऊ के बीच पुल बनकर
दरकती '।
भाभी के आने का बङा चाव था आई को और
चाँद का टुकङा खोजती रह गयी आई 'एक
बार और टूट गयी जब भाऊ ले आया एक
संगमरमर का बुत अपनी पसंद से तब
पहली बार आई 'डर गयी और बाबा और
भाऊ के बीच टूट गये पुल के बीच
दरकती डोरियों पर टँगी आई
'रही सही भी चली गयी वनवास पर
वानप्रस्थ 'या सन्यास पर, ।
आई 'पोते
पोतियाँ खिलाती सँभालती फिर टुकङे
टुकङे हो गयी '
जब पहली बार पहली बार नहीं रहा और
आँगन में दीवारें खङी हो गयीं 'आई
का कमरा दो हिस्सों में बाद में बँटा 'आई
पहले ही ईँटों की तरह तपकर टूट
गयी फिर पकी माटी सी।
झुर्रियाँ जिस रफ्तार से बढ़ रही थीं आई
'बचपन की ओर उसी रफ्तार से लौट
रही थी कभी अपने कभी ताई और भाऊ
के।
आई फिर पूरी की पूरी ही निकल
गयी एक बार सारे के सारे घर से जब सबने
चीखकर 'आई को अहसास कराया कि उसने
किया ही क्या है!!!!!
और अब उसे घर के मामले में बोलने
की जरूरत ही क्या है!!!!!
जब 'पोती ने 'आई को रूढ़िवादी और भाऊ
ने झल्लाकर बेवजह टाँग अङाने
वाली कहकर 'मन से निकाल दिया ।
आई ने आखिरी बार पल्लू होंठों पर रखकर
रोना रोका रोकी चीखें हिचकियाँ और
रोक लीं बददुआय़ें ।
यह सारा उपवन तो लगाया उसीने
ही था वह शिकवा किससे करती '
बाबा और आई के बीच तो कबकी दीवारें
आसमान तक चिनी जा चुकीं थीं ।
जब छोटू ने संदेश दिया 'आऊ साहिब
चलीं गयीं हमेशा को दुनियाँ से ''
तो सबसे पहले चीखा भाऊ ।ताई
भी रोयी बाबा भी 'और सबके रोते
चेहरों पर मुझे दिख रही थी एक एक
नयी उगती हुयी झुर्री "एक एक सफेद
होती लट और सिकुङती उंगलियों पर
दरकती त्वचा '
मुझे लगा "आई "गयी भी और सबको दे
गयी "लंबी उम्र की दुआयें आखिर
माँ जो थी ।
वैसे आई गयी ही कब थी!!!! और न जाने क्यूँ
लगता है "आई अभी नहीं बहुत बहुत बहुत
पहले ही कब की जा चुकी थी ।
पता नहीं क्यों मेरे पास न आँसू थे न
विलाप न रुदन न सवाल
सबको लगता था भाऊ और ताई को आई से
बेहद प्यार था 'या फिर बाबा को '
©®सुधा राजे


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