Tuesday, 30 September 2014

सुधा राजे का लेख :-

संवेदनशून्य समाज नैतिक और अनुशासित कैसे हो सकता है!!!!
जब एक व्यक्ति किसी कमज़ोर निरीह विवश पर कोई अत्याचार अन्याय या भेदभाव
बल धन या पद या समूह की शक्ति के दम पर थोपता है तो 'उसे जो सबसे पहला डर
होता है वह है ""सामाजिक निन्दा """
बदनामी
नककटई
और टोपी पगङी मूँछ
उखङना उछलना
ये मुहावरे नहीं 'सामाजिक 'बंधन का भय ही है ।
लोग 'यश चाहते हैं, रौबदाब सत्ता धन पद चाहते है रूप वैभव और समर्थक
चाहते हैं, 'किंतु क्यों?
सुखी तो अकेले रहकर भी हुआ जा सकता है न!!!!!
प्रतिष्ठा प्रसिद्धि नेकनामी और समाज में अमर हो जाने की चाहत ही
आदमी को ""लोकोपवाद ""से डराती है ।

पुलिस पकङ ले जाये किंतु किसी को कानों कान पता न चले तो आदमी ऊँची नाक
लगा कर कह दे वह तो पर्यटन पर गया था।
किंतु
जब सबके सामने ये प्रदर्शन हो जाये तो?
अधिकांश लोग डरते हैं बदनामी से ।
आज
ईश्वर का भय पहले जैसा नहीं है ।
आज
पाप करने से डर पहले जैसा नहीं है ।
आज बिरादरी से बहिष्कार कोई पहले जैसा हौआ नहीं ।
आज लोग नर्क की कल्पना से नहीं डरते ।
आज लोग "कर्त्तव्य "को अपनी नैतिक सामाजिक धार्मिक कानूनी ज़िम्मेदारी नहीं मानते ।

परिणाम?
आज हर तरफ एक अपराध ""सरेराह "
और
आँख बचाकर ',अपना क्या, 'कौन चक्कर में पङे, 'यार मैं ही क्यों ",,और भी
लोग हैं न वे जायें न, 'मुझे कहाँ समय, 'मुझपर जॉब रोजी परिवार का भार है
',मेरा परिवार पसंद नहीं करेगा ',तुझको पराई क्या पङी अपनी निबेङ
तू!!!!!!!

यही संवेदन हीनता और कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाने की ""कायराना ""प्रवृत्ति, '
अधिकांश "पापों "अपराधों ''सामाजिक अन्यायों को बढ़ावा देती है ':
एक शराबी अपनी पत्नी को सङक पर पीट रहा था 'माँ चीखती रही बहू को बचाओ
किसी ने जब नहीं बचाया नाबालिग बेटी ने पितापर पत्थर फेंक दिया, शराबी
पिता जब बेटी को पीटने लगा तो छोटा भाई बहिन दोनों पिता के पैर जकङ कर
लोट गये ',बूढ़ी माँ ने छङी बजा दी ।शराबी आदमी आत्महत्या करने चल पङा
''मैं मरूँगा मैं अब नहीं जी सकता ### सब परिवार मेरे खिलाफ!!!! अब सब
पकङने लगे वह आगे सब पीछे यह जुलूस रात एक बजे कई साल पहले हमारे घर के
सामने से भी निकला ',फाटक खोलकर "डाँट लगायी
'संझै एक कंटर बरफ का पानी लाना तो
'

शराबी चौंका आपसे मतलब?
घरवाली गिङगिङायी जिज्जी बुरा न मानो, 'दिमाग फिर गया मेरा नसीब खोटा
',दो चार और दरवाजे खुले ',
हमने कहा
मर जाने दो इसे 'तेरा दूसरा ब्याह हो जायेगा, वैसे भी ये तो रोटी कपङा
दवाई खाना कुछ देता नहीं 'झिक झिक मिटेगी, तुम जवान हो 'कोई भी आराम से
कर लेगा दूसरी शादी 'बच्चे भी कमाते ही है कोई बोझ है तो ये "
शराबी निकम्मा " जो हर दिन कलह तमाशे करता है, 'कूदने दो इसे नद्दी में
मगरमच्छ का तो पेट भरे बीबी बच्चों माँ तो ये पेट भर नहीं सकता, 'नहीं तो
आती होगी गश्ती पुलिस "पटे फेरकर चौङा करदेगी '
धम्म से बीच सङक पर पसर गया शराबी '
मैं क्यों मरूँ?
मैं पीता हूँ तो अपनी कमाई 'और यो मेरी घरवाली मैं पीटूँ चाहे रुपया लूँ
"आप से मतलब???
मतलब तो है ',शोर मत कर नींद खराब मत कर घर जा और औंध जा खाट पर ',
जा रया जा रिया जा रिया '''
लोग देखते रहे और कुछ नहीं बोले ',
बाद में सबने एक हिकारत भरी "उँह ये तो इनका रोज का काम है कौन पङे चक्कर में!!!!!
ये अपराध
कुछ और भी हो सकता है
जगह और पीङित कोई और भी ',
अगर आप या आपके अपने हुये तो?
दूसरे भी कह देगें "कौन चक्कर "में पङे?????????
©®सुधा राजे


Saturday, 20 September 2014

सुधा राजे का लेख --"कैसे पढ़े ग्रामीण कन्याएँ??"

सुधा राजे का लेख '
"""""""""""""""""""
महिला सशक्तिकरण की बात करते सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों के लोग,
आज़ादी के छह दशक बाद तक भी "स्त्री की बुनियादी शिक्षा तक की समुचित
व्यवस्था नहीं कर सके हैं । गाँवों में बसता भारत जिसकी तसवीर ये है कि
आज भी हजारों गाँवों न प्राथमिक पाठशाला हैं न मदरसा या आँगनबाङी जैसी
कोई व्यवस्था ।और अनेक गाँवों में हैं भी तो केवल कागज पर चल रहीं है
जबकि वहाँ गाँव में कोई जानता ही नहीं कि आँगनबाङी या पाठशाला है कहाँ
फिर जिन जिन गाँवों में जो प्राथमिक पाठशालायें और मदरसे खुले हैं उनमें
लङकियों की बज़ाय लङकों को ही सायास पढ़ने भेजा जाता है । पशुपालक,
खेतिहर,मजदूर, कारीगर, और कुटीर उद्योगों में लगे परिवारों में बेटी, को
मनहूस मानते तो हैं किंतु पाँच साल की होते ही बेटी काम काज पर लग जाती
है, और दस साल की बेटी घर में छोटे भाई बहिनों को खिलाती एक किंडर गार्टन
की आया क्रॅच संचालिका की भाँति दिन भर घर पर रहकर माँ के छोटे छोटे
बच्चे घेरती है 'गाय बकरी को पानी चारा देती है और बरतन धोती झाङू लगाती
है ',सुबह शाम खाना बनाने में माँ की मदद करती है 'सब्जी काटना सिलबट्टे
से मसाला पीसना 'बिटौङे 'से उपले कंडे लाना 'चूल्हे की ऱाख फेंककर 'पोता
लीपना 'मिट्टी लाना कूङा फेंकना अनाज साफ कराना '..
और माँ?
माँ रोज सुबह जल्दी जल्दी थोङा बहुत पका कर रख कर लेकर 'मजदूरी पर निकल
जाती है दिन भर वहीं रहती है 'कारखाने 'खेत 'पास के नगर की किसी इमारत
में या कसबे के घरों की साफ सफाई में '।देर शाम आकर माँ थकी होती है और
छोटी लङकी 'हुनर के कामकाज के अलावा सारे ऊपरी उसार काम करती है ।
'मिड डे मील 'के लालच या वज़ीफे की वजह से जो थोङे बहुत माँ बाप लङकियों
का नाम विद्यालयों में लिखवा देते हैं, उनको भी नाम तो लिख जाता है किंतु
"रोज रोज ''भेजा बिलकुल नहीं जाता स्कूल '। जैसे तैसे कुछ परिवार भेज भी
देते हैं तो 'दूर स्कूल और लङकी की जात 'का सवाल खङा हो जाता है ।
छोटी बच्चियों के साथ जिस तरह ''यौन शोषण "और बलात्कार हत्या झाङियों
खेतों में लाशें मिलने का 'माहौल बढ़ता जा रहा है अकसर माता पिता डर सहम
जाते हैं ।और लङकियाँ केवल करीब विद्यालय होने पर ही पढ़ने भेजीं जातीं
हैं । कुछ समूह में जाने वाली लङकियाँ विद्यालय पहुँच भी जातीं हैं तो,,
शिक्षक चौकीदार और विद्यालय 'स्टाफ 'तक के आचरण का आपराधिक पतन जिस तरह
''स्त्री बालिका 'को लेकर लगातार बढ़ता जा रहा है ',ऐसी एक दो घटना कहीं
दूर पास के विद्यालय मेंघटित होते ही, अनेक लङकियों को घर बिठा दिया जाता
है ।
फिर भी यदि प्राथमिक विद्यालय में जाती भी हैं तो पढ़ाता ही कौन है!!!
हालात उत्तर प्रदेश के किसी गाँव से परखे जा सकते हैं कि क्या कितना और
कैसा पढ़ाते है हजारों रुपया वेतन पाने वाले सरकारी परिषदीय विद्यालयों
के शिक्षकगण 'कि पाँचवीं उत्तीर्ण छात्रा को 'न हिंदी ठीक से पढ़नी और
इमला लिखनी आती है न गणित के गुणा भाग जोङ घटाना ब्याज और प्रतिशत
क्षेत्रफल भिन्न और समापवर्तक लघुत्तम महत्तम या रेखागणित का कुछ समझ आता
है । कारण है शिक्षक आलसवश पढ़ाते नहीं और बच्चे पृष्ठभूमि वश बहुत
उत्सुक होते नहीं पढ़ाई को लेकर ।
फिर भी प्राथमिक विद्यालय 'से आगे पढ़ाई अकसर छूट जाती है । क्योंकि
जनजातियों में आज भी बालविवाह होते हैं और 'जिनमें बालविवाह नहीं भी होते
वहाँ स्कूल दूर होने पर पढ़ने कैसे भेजे 'नदी नाला पहाङ नहर जंगल खेत रेत
पानी दलदल और लङकीभक्षी समाज ',मुँह बाए खङा रहता है ।
लङकियाँ अगर थोङे बहुत पढ़े लिखे माता पिता की इकलौती या दो तीन संतानों
में से हैं तब तो उनके नजदीक के बङे गाँव या कसबे में जाने की व्यवस्था
कर दी जाती है अथवा खुद पिता चाचा भाई कोई करीब के कसबे में पढ़ने मजदूरी
करने रिक्शा या ठेली से कमाने या छोटी मोटी नौकरी करने जाते हैं तो 'लङकी
भी पढ़ने चली जाती है ।वहाँ आठवीं या अधिकतम दसवीं बारहवीं तो बहुत बहुत
बहुत हद होने पर पढ़ पातीं हैं कि 'शादी 'कर दी जाती है और वे लङकियाँ
जिनकी शादी लङका न मिल पाने या दहेज न होने या रंगरूप की कमी की वजह से
देर से हो पाती है 'समाज की सवालिया निग़ाहों से बचने के लिये स्वयं को
घर परिवार तक सीमित कर लेती हैं पढ़ाई छूट जाना कोई बङी बात समझी ही नहीं
जाती लङकियों के मामले में । बङी बात होती है जल्दी से जल्दी शादी ।
सामाजिक ताना बाना इसी सोचपर गढ़ा गया है कि जिसने बेटी खूब पढ़ा ली वह
अच्छा बाप नहीं है वरन जिसने जल्द ब जल्द बेटी की शादी कर दी वही
सर्वोत्तम बाप है वही सर्वोत्तम माता । गाँव की लङकियों को सब्जेक्ट के
नाम पर "गृहविज्ञान और कला संकाय और बहुत हद हुयी तो वाणिज्य समूह पकङा
दिया जाता है । जिनके माता पिता नगर में रहते हैं या फिर वे बुआ मामा
मौसी आदि के घर पढ़ने रह सकतीं है नगर में जाकर ऐसी सुविधा और माता पिता
के उन नातेदारों से संबंध और खर्च उठाने की हालत है ',जोखिम उठाने का
साहस है तब, 'लङकी गाँव की बी एस सी कर पाती है ।
पी ई टी, 'पी एम टी, 'आई आई टी ',पॉलिटेक्नीक, 'आई टी आई ',ए एन एम 'जी
एन एम ',बी टीसी ',बी एड ',और कम्प्यूटर आदि की व्यवसायिक पढ़ाई भी वही
लङकियाँ कर पाती है जिवके परिजन या तो ""नगर के नातेदार के घर लङकी पढ़ने
भेज सकते हैं या ',खुद गाँव छोङकर नगर में रह पाते हैं ।कसबों में छोटे
नगरों में न तो '''कॉलेज ""की तरफ से गर्ल्ज होस्टल होते हैं ।न ही,
'किसी व्यक्ति या संस्था की तरफ से महानगरों की भाँति गर्ल्ज होस्टल या
किराये के मकान आदि चलाये जाते है समूह रूप में जहाँ लङकियाँ रहें तो
सुरक्षित महसूस हो, ।
इसलिये जब तक गाँव से आना जाना संभव होता है ',साहसी परिवारों की लङकियाँ
पढ़ लेती हैं किंतु जहाँ से, नगर जाना संभव नहीं रहता वहीं से पढ़ाई छुङा
दी जाती है ।
शहरी पुरुष जहाँ डिग्री के अनुसार बढ़िया सेलरी वाली आरामदायक जॉब न
मिलने पर रोना रोते हैं समाज का, 'वहीं लाखों पढ़ी लिखीं लङकियाँ
जिन्होंने अनेक लिट्मस पेपर टेस्ट निकष कसौटियाँ तलवार की धार पर चलने
जैसे नियम शर्तें संघर्ष पार करक करके डिगरियाँ लीं ',वे विवाह की
बलिवेदी पर कुरबान कर दीं जातीं हैं और उनकी सारी पढ़ाई लिखाई योग्यता
तपस्या कठिन हालात पार करना "रसोई, बर्तन झाङू पोंछा भोजन पकाने सेज
सजाने और ससुराल के बङोंछोटों की धाय नौकरानी बँधुआ आया नर्स और अपने
बच्चों की ट्यूटर बनकर रह जाने में सब सपनों और कैरियर के 'सब मार्गों को
बंद करने सहित "झौंक "दीं जातीं हैं ।
लगभग हर दूसरी तीसरी स्नातक परास्नातक लङकी का हश्र यही है ।मेहनत से
हासिल की गयी शिक्षा और रसोई ससुराल दांपत्य बच्चों में झोंक दिया गया
सारा हुनर ।
किसी भी देश की सर्वांगीण संपूर्ण तरक्की का उदाहरण रखते समय "ये बात
कैसे भुला दी जाती है कि "आधी आबादी "
जब तक शिक्षा से वंचित है ',स्त्री पुरुष समानता और सम्मान की बात संभव
नहीं । शिक्षित स्त्री को जब तक विवश कर करके विवाह के नाम पर मनमार कर
दमन करके घर में पराधीन पराश्रित और मानसिक शारीरिक बंधुआ मजदूर गुलाम की
सी भावना से रखा जाता है जब तक समाज में, भेदभाव खत्म नहीं होगा ।
और जब तक पूरी पूरी मानव शक्ति किसी देश के तकनीकी वैज्ञानिक आर्थिक
औद्योगिक सामाजिक राजनैतिक हुनर और कला 'जीवन स्तर और प्रतिव्यक्ति आय
सेहत और प्रसन्नता से नहीं जुङती देश को "विकसित सुरक्षित शक्तिशाली सभ्य
और सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता ।
जरूरत है गाँव गाँव कन्या विद्यालय की और हर पाँच लाख की आबादी के बीच एक
बङे कॉलेज की जिसमें आवासीय व्यवस्था निम्नआय़.और उच्चआय की बजाय सब
लङकियों को उपलब्ध हो । अच्छा हो कि, लङकियों की स्नातक तक की शिक्षा हर
तरह के शुल्क से मुक्त कर दी जाये और सरकारी गैर सरकारी नौकरियों में
सजगता से ग्रामीण और कसबाई लङकियों को अधिक अवसर दिये जायें ।
प्रसन्न और सुरक्षित स्त्री समाज की सभ्यता की कसौटी है "बढ़ती जनसंख्या
बाल विवाह दहेज प्रथा मानव व्यापार और घरेलू हिंसा कोई रोक सकता है तो
"पढ़ी लिखी स्वावलंबी स्त्रियाँ।
©®सुधा राजे


सुधा राजे का लेख -- " कैसे पढ़े ग्रामीण कन्याएँ??"

सुधा राजे का लेख '
"""""""""""""""""""
महिला सशक्तिकरण की बात करते सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों के लोग,
आज़ादी के छह दशक बाद तक भी "स्त्री की बुनियादी शिक्षा तक की समुचित
व्यवस्था नहीं कर सके हैं । गाँवों में बसता भारत जिसकी तसवीर ये है कि
आज भी गाँव में जो प्राथमिक पाठशालायें और मदरसे खुले हैं उनमें लङकियों
की बज़ाय लङकों को ही सायास पढ़ने भेजा जाता है । पशुपालक, खेतिहर,मजदूर,
कारीगर, और कुटीर उद्योगों में लगे परिवारों में बेटी, को मनहूस मानते तो
हैं किंतु पाँच साल की होते ही बेटी काम काज पर लग जाती है, और दस साल की
बेटी घर में छोटे भाई बहिनों को खिलाती एक किंडर गार्टन की आया क्रॅच
संचालिका की भाँति दिन भर घर पर रहकर माँ के छोटे छोटे बच्चे घेरती है
'गाय बकरी को पानी चारा देती है और बरतन धोती झाङू लगाती है ',सुबह शाम
खाना बनाने में माँ की मदद करती है 'सब्जी काटना सिलबट्टे से मसाला पीसना
'बिटौङे 'से उपले कंडे लाना 'चूल्हे की ऱाख फेंककर 'पोता लीपना 'मिट्टी
लाना कूङा फेंकना अनाज साफ कराना '..
और माँ?
माँ रोज सुबह जल्दी जल्दी थोङा बहुत पका कर रख कर लेकर 'मजदूरी पर निकल
जाती है दिन भर वहीं रहती है 'कारखाने 'खेत 'पास के नगर की किसी इमारत
में या कसबे के घरों की साफ सफाई में '।देर शाम आकर माँ थकी होती है और
छोटी लङकी 'हुनर के कामकाज के अलावा सारे ऊपरी उसार काम करती है ।
'मिड डे मील 'के लालच या वज़ीफे की वजह से जो थोङे बहुत माँ बाप लङकियों
का नाम विद्यालयों में लिखवा देते हैं, उनको भी नाम तो लिख जाता है किंतु
"रोज रोज ''भेजा बिलकुल नहीं जाता स्कूल '। जैसे तैसे कुछ परिवार भेज भी
देते हैं तो 'दूर स्कूल और लङकी की जात 'का सवाल खङा हो जाता है ।
छोटी बच्चियों के साथ जिस तरह ''यौन शोषण "और बलात्कार हत्या झाङियों
खेतों में लाशें मिलने का 'माहौल बढ़ता जा रहा है अकसर माता पिता डर सहम
जाते हैं ।और लङकियाँ केवल करीब विद्यालय होने पर ही पढ़ने भेजीं जातीं
हैं । कुछ समूह में जाने वाली लङकियाँ विद्यालय पहुँच भी जातीं हैं तो,,
शिक्षक चौकीदार और विद्यालय 'स्टाफ 'तक के आचरण का आपराधिक पतन जिस तरह
''स्त्री बालिका 'को लेकर लगातार बढ़ता जा रहा है ',ऐसी एक दो घटना कहीं
दूर पास के विद्यालय मेंघटित होते ही, अनेक लङकियों को घर बिठा दिया जाता
है ।
फिर भी यदि प्राथमिक विद्यालय में जाती भी हैं तो पढ़ाता ही कौन है!!!
हालात उत्तर प्रदेश के किसी गाँव से परखे जा सकते हैं कि क्या कितना और
कैसा पढ़ाते है हजारों रुपया वेतन पाने वाले सरकारी परिषदीय विद्यालयों
के शिक्षकगण 'कि पाँचवीं उत्तीर्ण छात्रा को 'न हिंदी ठीक से पढ़नी और
इमला लिखनी आती है न गणित के गुणा भाग जोङ घटाना ब्याज और प्रतिशत
क्षेत्रफल भिन्न और समापवर्तक लघुत्तम महत्तम या रेखागणित का कुछ समझ आता
है । कारण है शिक्षक आलसवश पढ़ाते नहीं और बच्चे पृष्ठभूमि वश बहुत
उत्सुक होते नहीं पढ़ाई को लेकर ।
फिर भी प्राथमिक विद्यालय 'से आगे पढ़ाई अकसर छूट जाती है । क्योंकि
जनजातियों में आज भी बालविवाह होते हैं और 'जिनमें बालविवाह नहीं भी होते
वहाँ स्कूल दूर होने पर पढ़ने कैसे भेजे 'नदी नाला पहाङ नहर जंगल खेत रेत
पानी दलदल और लङकीभक्षी समाज ',मुँह बाए खङा रहता है ।
लङकियाँ अगर थोङे बहुत पढ़े लिखे माता पिता की इकलौती या दो तीन संतानों
में से हैं तब तो उनके नजदीक के बङे गाँव या कसबे में जाने की व्यवस्था
कर दी जाती है अथवा खुद पिता चाचा भाई कोई करीब के कसबे में पढ़ने मजदूरी
करने रिक्शा या ठेली से कमाने या छोटी मोटी नौकरी करने जाते हैं तो 'लङकी
भी पढ़ने चली जाती है ।वहाँ आठवीं या अधिकतम दसवीं बारहवीं तो बहुत बहुत
बहुत हद होने पर पढ़ पातीं हैं कि 'शादी 'कर दी जाती है और वे लङकियाँ
जिनकी शादी लङका न मिल पाने या दहेज न होने या रंगरूप की कमी की वजह से
देर से हो पाती है 'समाज की सवालिया निग़ाहों से बचने के लिये स्वयं को
घर परिवार तक सीमित कर लेती हैं पढ़ाई छूट जाना कोई बङी बात समझी ही नहीं
जाती लङकियों के मामले में । बङी बात होती है जल्दी से जल्दी शादी ।
सामाजिक ताना बाना इसी सोचपर गढ़ा गया है कि जिसने बेटी खूब पढ़ा ली वह
अच्छा बाप नहीं है वरन जिसने जल्द ब जल्द बेटी की शादी कर दी वही
सर्वोत्तम बाप है वही सर्वोत्तम माता । गाँव की लङकियों को सब्जेक्ट के
नाम पर "गृहविज्ञान और कला संकाय और बहुत हद हुयी तो वाणिज्य समूह पकङा
दिया जाता है । जिनके माता पिता नगर में रहते हैं या फिर वे बुआ मामा
मौसी आदि के घर पढ़ने रह सकतीं है नगर में जाकर ऐसी सुविधा और माता पिता
के उन नातेदारों से संबंध और खर्च उठाने की हालत है ',जोखिम उठाने का
साहस है तब, 'लङकी गाँव की बी एस सी कर पाती है ।
पी ई टी, 'पी एम टी, 'आई आई टी ',पॉलिटेक्नीक, 'आई टी आई ',ए एन एम 'जी
एन एम ',बी टीसी ',बी एड ',और कम्प्यूटर आदि की व्यवसायिक पढ़ाई भी वही
लङकियाँ कर पाती है जिवके परिजन या तो ""नगर के नातेदार के घर लङकी पढ़ने
भेज सकते हैं या ',खुद गाँव छोङकर नगर में रह पाते हैं ।कसबों में छोटे
नगरों में न तो '''कॉलेज ""की तरफ से गर्ल्ज होस्टल होते हैं ।न ही,
'किसी व्यक्ति या संस्था की तरफ से महानगरों की भाँति गर्ल्ज होस्टल या
किराये के मकान आदि चलाये जाते है समूह रूप में जहाँ लङकियाँ रहें तो
सुरक्षित महसूस हो, ।
इसलिये जब तक गाँव से आना जाना संभव होता है ',साहसी परिवारों की लङकियाँ
पढ़ लेती हैं किंतु जहाँ से, नगर जाना संभव नहीं रहता वहीं से पढ़ाई छुङा
दी जाती है


Thursday, 18 September 2014

सुधा ''दोहावली:-

1. सुधा'प्रेम दुःस्वप्न हित ',
तजत,त्रिया सर्वस्व,
भाग रसोई, अग्नि, दुःख
सृजन', क्षुधा 'निज ह्रस्व,
©®सुधा राजे


Wednesday, 17 September 2014

सुधा राजे का कविता :-- घर में जाले कैसे हैं

काश किसी ने समझा होता
घर में जाले कैसे हैं?
चूङी वाले नरम हाथ में खंज़र भाले कैसे
हैं?
"सुधा" सहारा बनते बनते बोझ बन
गये सब नाते '
सीने में डर कैसे कैसे
मुँह पर ताले कैसे है?
©®सुधा राजो।


Friday, 12 September 2014

सुधा राजे का लेख :- स्त्री'' सारी बीच नारी है कि सारी की ही नारी है।" (3.)

सलवार कुरता और घाघरा भी विशुद्ध
भारतीय परिधान है
''धोती को ""रेडी टु वीयर ""बनाने
की तकनीक से सलवार और
पाजामी अस्तित्व में आयी ''''तैरने के लिये
',कूदने के लिये, 'पहाङ चढ़ने के लिये
',मुसीबत में लङने और आत्मरक्षा के लिये
""""कौन सा वस्त्र सही है?
निंदा तो हर ""उस प्रथा की सरासर
करनी पङेगी जहाँ """""लिंगभेदी दमन के
भाव से थोपी गयी चीजें।
पदार्थ ईश्वर नहीं ',हर धर्म
यही कहता है और कहता है कि पदार्थ
मात्र साधन है ',तब कोई पदार्थ जब
धर्म से जोङ दिया जाकर
अनिवार्यता बना दिया जाये कि ""
विवाहिता ""होने का लेबल लगाकर
रहो!!!!!पदार्थ साधन है मंजिल है जीवन
जो जो जीवन जीना सुविधाजनक
बनाता है वह वह सही है ',जो प्राण
संकट में डाले शरीर को आराम न दे
जो गर्भवती स्त्री मैक्सी गाऊन कंधे से
झूलता या ढीला कुरता सलवार
दुपट्टा पहनती है इनकी तुलना में
नौ माह का पेट निकाले पल्लू से ढँकने
की असफल कोशिश
करती स्त्री की हालत समझी जाये
",,जो पेट के ऊपर छाती से पेटी कोट बाँधे
या नीचे कमर की लाईन से यह
""नहीं ""समझ पाती कि ढीली करे
तो साङी खुल जाये ',',पिनें लगाये तो चुभे
और सेप्टिक हो जाये ',जब ये इतनी सरल
है तो क्यों नहीं वर्दी बना दी जाये
"""पुरुष ""की???एक बहू पैन्ट कमीज
पहनकर फेरे ले और
पति हो धोती कुरता अंगरखा पगङी जमेऊ
टीका चोटी खङाऊँ लँगोट और
बैलगाङी पर????नही जमा?
साङी खराब नहीं है """""""खराब है
उसको "स्त्री होने की अनिवार्यता से
जोङकर विवश करने वाली सोच ',
'मोबाईल आज लेटेस्ट वर्जन
का खरीदा जाये??
कि नये और अधिक और उम्दा फीचर कम
दाम में मिले????
???? और कपङा??
तो फिर चिट्ठी भोजपत्र पर लिखो न
कबूतर ले जायें!!!
मजदूर औरतों पर सामाजिकतावश
थोपी गयी साङी """"वे लुंगी की तरह
बनाकर काम करती है कमर पर
बाँधी कूल्हे पर खोंसी और पीछे से कंधे पर
गिरा दी!!!!! मतलब वहाँ साङी एक
लटकता टुकङा रह जाता है """हिंदू औरत
की मजबूरी के नाम पर वह """दरअसल
लुंगी या कछोटाछाप सलवार बन
चुकी होती है!!!! तो क्यों न वही प्रॉपर
कपङा पहनने दें?
©®सुधा राजे।


सुधा राजे का लेख :- स्त्री'' सारी बीच नारी है कि सारी की ही नारी है।" (2.)

एक बात साफ साफ कह दें ',
कि अगर हम बुरके पहनाने
की जबरदस्ती का विरोध करते हैं ',
तो
आपको ये भ्रम नहीं पालने देगें
कि "आपकी महान
संस्कृति की "साङी "को आज
भी ढोया जाना चाहिये ",,
यह तो बुरके से भी वाहियात और
बेकार का कपङा है ',।
अगर स्त्रियों को मसजिद में जाने
का हक होना चाहिये
ऐसी हमारी सोच है ',
तो हम उस सोच का भी विरोध करते
है '''जिसमें पति के पाँव पत्नी से
पुजवाना हक समझा जाता है पुरुष
स्त्री के कुदरती नैसर्गिक जोङे में :।
अगर बहुविवाह प्रथा को पर्सनल
लॉ से हटाने के लिये कहते हैं तो कतई
मतलब नहीं कि "बदले में पोंगे
पंथियों की "अधिक औलाद और
बहुविवाह प्रथा को पुनर्जीवित
करने का समर्थन करने वाले है ।
अगर 'सप्ताह में एक बार नहाने
की परंपरा गलत है ',तो गलत है यह
परंपरा कि हर ससुराल ये उम्मीद कर
कि बहू हर हाल में सबसे पहले उठकर
सुबह सुबह नहा धो कर नाश्ता बनाये
और सब पङे पङे चरते रहें ।
कुरीतियाँ है अगर "तीन तलाक
की परंपरा तो बदलने की बात
करनी भी जरूरी है ',
किंतु यह सोच
भी क्यों नहीं बदलनी चाहिये
कि ',एक बार खराब
शादी हो गयी तो "तलाक दिलाकर
सही घर वर खोजकर उस
लङकी का सही विवाह
करवाया जाना भी जरूरी है ।
दरअसल जैसे ही
एक ""मजहब
""की गलतियाँ दिखानी शुरू करते है
',
दूसरे मजहब के कट्टरवादी
अपनी
कट्टरताओं को जारी करवाने
का ""पिटारा ""खोल डालते है
बङी सी बिंदी नथ
साङी लंबी चोटी की अनिवार्यता भी उतनी ही दकियानूसी है
"
और तत्काल त्यागने लायक
जितना
बुरका ',
इबादत के समय औरत का जमीन से
चिपकना
हिलाला
तीन शब्द में तलाक
और
मेहर के रूप में वधू मूल्य की परंपरा
'"
कोई भी प्रथा जिसका कोई
""लॉजिक नहीं ""
कोई भी पहनावा जो ""मूवमेंट में
बाधक हो ",
अनिवार्य थोपा गया नियम
जो ""स्त्री होने की वजह से
ही थोपा जाता है '""""
धर्म के नाम पर हो या संस्कृति के
नाम पर """सिवा ढकोसले के कुछ
नहीं,,,
कट्टरपंथी
स्त्री का भला नहीं चाहते
केवल
अपना अपना
धर्म
थोपना चाहते हैं।
न तो हिंदू स्त्री को आज तक
आसानी से कुछ मिला है ',न कद्र किसी ने
खैरात में की है """"लंबा संघर्ष है
""""जिस दिन उनमें से आवाज
उठेगी """वहाँ भी """हाहाकार
मचेगा """"रही कदर? कोई कोई सीखा है
"""बाकी दहेज प्रथा,? परदा,,
पुत्रीहत्या,?? साङी घूँघट और घरेलू
जुल्म?? करवा चौथ और तीज???

सती से विधवा विवाह को गले
उतारना तक की यात्रा तो """नरक से
गुजरी है।
सच्चे दिल से अब तक """कोई भी हिन्दू
गले नहीं उतार पाया ""नथ
'''छोङना तक? मंडप में अभी ',दुल्हन
का दान होता है।
आपके "मानने में 'योद्धा होना शामिल
नहीं आप न पायलट हैं न सैनिक न आप
कमांडो न आप अकेले यात्रा करने
वाली महिला """"""तमाशा देखना है
तो बस में हाथ ऊपर करे
खङी भिंची दबी स्त्री देखो और
पता करो कि कितनी स्त्रियाँ साङी पहिन
कर रस्सी पर चढ़ सकतीं है।
कोई भी कपङा जो ""रक्षक
नहीं पुरुषों ने त्यागा क्योंकि वह
कार्यकुशलता घटाता है ''''फेमिनाईन लुक
""""ग्लैमर सुंदरता केवल """पुरुष
को लुभाने वाली मानसिकता '''''न
तो स्त्री का भला कर सकी है न
ही रक्षा।
साङी प्राथमिक युग का कपङा है जब
सिलाई कला का आविष्कार नहीं था तब
पुरुष भी धोती पहिनते थे ''''वह पेन्ट
में????? औरत अब तक साङी पर विवश??
क्योंकि "स्त्री सुंदर लगती है!!!!! और
कार्यकुशलता???
तकनीक "मानव ने विकसित की ',मानव
परंपरा का गुलाम नहीं होना चाहिये
''''''''जो तकनीक सुविधाजनक है कम समय
लेती है आरामदायक है रक्षक है
"""वही लेटेस्ट और सही है """""जिन
औरतों को घर बैठना है या मेहनत
नहीं करनी वे सजधजकर """फेमिनाईन
बनी रह सकती है """""किंतु जब एक
ग्रामीण स्त्री जंगल घास काटने
लकङी काटने ईंटें पाथने में लगती है तब?
वही साङी आफत लगती है
मजबूरी भी '''''अगर उनको सलवार कमीज
दिये जायें तो? देखनी है तो बस से आते
जाते ',पेट पीठ उघङे बदन पर
चिपकी नजरें और सङक किनारे
साङी का लाँग बाँधे मजदूरनी देखो।

साङी ',व्यक्ति मसला किसी को लगे
तो लगे किंतु """"""पेट पीठ न ढँके जिस
कपङे में वह चीज है ब्लाऊज
""""जिसको पहिन कर दौङा न जा सके
और रस्सी पर चढ़ा या ऊँचाई से कूदा न
जा सके या चौङे में बेधङक सोया न जा सके
वह है साङी।
ट्रक पर चढ़ना पङे तो घुटनो तक झलक
मारे साङी।

रास्ता चलता लफंगा खींच दे
तो "पेटीकोट ब्लाऊज में खङी स्त्री!!!
रात में घर से बाहर ट्रेन में बस में मैदान
में सोना पङे तो सारा बदन
प्रदर्शनी करे साङी।

बैठकर घास काटती औरत के पेटीकोट में
जहरीले कीङे चढ़ जाने
की हजारों घटनाये खेत खलिहानों में
होती है।
तत्काल कहीं जाना है तो पहनने को एक
'खास' समय ले साङी।
हर स्त्री आपकी तरह 'दिल्ली में
नहीं रहती ',मिल कारखाने फैक्ट्री में
मशीनों पर काम करती है औरते है
''पहाङों पर चढ़ती है और रेगिस्तान में
दौङती है बरफ पर रहती है।
साङी की वकालत आप करते रहिये
""""""लेकिन न तो यह भारत
का प्रतिनिधि वस्त्र है """"न ही आज
की स्त्री की रफ्तार का।

मणिपुर आसाम सिक्किम सिंध पंजाब
कश्मीर गोवा राजस्थान गढ़वाल
यहाँ का वस्त्र साङी नहीं।
साङी केवल ',अंग्रेजी शासन काल में
प्रचलित हुयी बंगाली भद्र बालाओं
की देन है '''आज भी लांग बाँधकर
मरदाना धोती ही पहनती है
मराठी वीरांगना।

साङी, 'न तो केरल का पहनावा है न
कबीलों का।

वीर नारियाँ '''मरदानी धोती वह
भी बिना पेटीकोट की पहनती थी।
पेटीकोट अंग्रेजी गाउन और ब्लाऊट
अंग्रेजी टॉप था जो बंगाली ग्रेजुएट
महिलाओं ने ''साङी से मिलाकर पहिना।
ब्लाऊज नहीं पहनती थीं पुरानी औरते
"आज भी मरदाना शर्ट ही पहनती है
हरियाणी और
पश्चिमी यूपी की ग्रामीण औरतें ।
फिल्मों से ये चोली नुमा ब्लाऊज
तथाकथित "धनिक फैशनेबल स्त्रियों तक
पहुचे और आज साङी जो टाँगों के बीच
लांग बाँधने की बजाय खोल कर
पहनी जाने लगी """यह राजनैतिक
उत्तरप्रदेशियों का फैशन था ''''।
न तो हिन्दी पूरे भारत
की मातृभाषा थी न साङी पूरे भारत
का पहनावा '''दिल्ली और
यूपी को ""राजनीति ने पूरे भारत पर
थोप दिया।

जबरन पहनाया जाने वाला हर वस्त्र
एक गुलामी है ''''''स्वेच्छा से कोई
नहीं रोक
सकता किसी को बुरका पहिनने से
"""""किंतु इसका मतलब यह नहीं है
कि कोट पैंट टाई पहिनने वाला पुरुष
स्त्री बगल में पाँच हजार साल पुराने
वस्त्र पहिनने पर विवश करे।
सवाल "मॉडर्न "शब्द का नहीं है सवाल
जबरन """""केवल स्त्रियों का ब्रेनवॉश
किये जाने से है """"""कि वे साङी में
ही सुंदर लगती है और साङी बहुत महान
परंपरा है """"""वैज्ञानिक डॉक्टर
इंजीनियर पायलट "पैराग्लाईडर और
एस्ट्रोनॉट स्त्रियों से """यह शर्त कोई???
हर वह चीज जो ""आरामदायक सुरक्षित
और वर्क में सुविधा देने वाली है पुरुष
अपनाता चला गया """"""छोटे बाल
'''पेन्ट शर्ट """बाईक """मशीने और रहन
सहन '''किंतु स्त्री की तरफ नजर
डालो """"""आज भी आदर्श
स्त्री की उसकी कल्पना बिना सिले
धान में लिपटी कोमल परजीवी स्त्री?

क्यों नहीं """"जब ये खाप पंचायतें
लङकियों पर आज इतना थोपती है तो घर
घर क्या हाल होता होगा तब जब
"""स्त्रियों को जरा भी सांविधानिक
हक नहीं थे??? बिलकुल फर्क पङता है
''''कम से हम यह करते है और
जो भी परिवार रूढ़वादी "बहू पर
थोपा थापी करता है सामने पङने पर हम
टोकते है """""जिओ और जीने दो " कैसे रखेगा???
लोग चोटी जनेऊ खड़ाऊ तिलक
धोती लंगोट ', जब खुद पहने तब
जो लङकी विवाह करना चाहे समझ ले
कि उसे साङी बिंदी चोटी ब्लाऊज
सैंडिल में जीना है।
हर स्त्री अपनी लङाई खुद नहीं लङ
सकती ',चार साहसी औरतें आगे बढ़कर
उदाहरण रखतीं है तब चार
सौ को प्रेरणा मिलती है।
जब किरण बेदी आगे आयीं तब
सिलसिला जारी हुआ ',जब
इंदिरा जी बढ़ीं तब सिलसिला बढ़ा जब
सुनीता विलियम
हुयी तो सिलसिला बढ़ा ', एक
दबी कुचली बेबस स्त्री अपनी आवाज
नहीं बन सकती इसलिये कानून बनाये
उन्होने जिनमे समझ थी ताकत थी।

सौन्दर्य का पैमाना """"असुविधा जनक
बंधनकारी गहनों कपङों को बनाया ही इसलिये
गया कि """मोहताजी बनी रहे """कोई
ताकतवर चुस्त तंदुरुस्त कमांडो टाईप
लङकी का पति बनना किसी """लल्लू पंजू
के बस की बात नहीं ''''तो वह
तो "कोमला और डरपोक लजालु 'नथ
साङी चोटी वाली के ही गुण गायेगा।
जमाना ताकत और अक्ल से चलता आया है
जिनमें ताकत थी वे मुगल थे जिनमें अक्ल
थी वे अंगरेज """""खैरात में घूँघट और
रसोई से
आजादी नहीं मिली """"""परंपरा का क्रूर
रूप
यही था कि आपकी माताजी दादी नानी को डेढ़
हाथ के घूँघट में चादर ओढ़कर घर में
रहना पङता था और ये संघर्ष जिन
औरतों ने किया उनको उस जमाने
को ""पोंगे """गालियाँ देते थे।
' मानव नग्न रहता था आदिकाल में वस्त्र
""न फैशन था "" न ही लाज का ढक्कन
",वह केवल "ठंड और धूप से बचाने
का साधन था आग की तरह का आविष्कार
आज भी वस्त्र """""हर आदमी के कामकाज
मौसम शरीर और रूचि का मामला है
"परंपरा मतलब विकास से पलायन और
शक्ति बढ़ाने का नाम प्रगति है विकास
है और विज्ञान है ',,नियम बदलते है
मशीने बदलती है वस्त्र भी कार्य शरीर
मौसम और रुचि के अनुसार क्यों नहीं बदल
सकती स्त्री रहा मन
तो किसी को बाईस गज का थान पसंद है
तो पहिने कौन रोकता है?????किंतु
उसकी तारीफ नहीं की जाती इस आधार
पर कि इसमें ""नारीत्व झलकता है!!!
या सुंदर लगती है???सुंदर लगना मैटर है
अपनी सोच का जिस साङी में एक पुरुष
को उसकी पत्नी सुंदर लगती है
उसी साङी को एक शौहर बदन दिखाऊ
अश्लील मँहगा और समय खपाऊ ओल्ड
टाईप कहता है उसे अपनी पत्नी सेम टू
सेम अपने जैसे पेन्ट शर्ट में "प्रिय
"लगती है।

आज जो जो ""संक्रमण काल दिख रहा है
उस सब के लिये कई पीढ़ी के स्त्री पुरुष
""""खप गये ""संघर्ष में और आज भी सत्तर
प्रतिशत स्त्रियाँ गाँव में है विवश औऱ
गुलाम है और स्कूल तक नहीं आ पायी है अब
तक हर लङकी।
जिस तरह आप
',किसी दादी नानी काकी माताजी को अब
आयु के तीसरे चौथे दौर में
नहीं """समझा सकते कि """वे घर में अगर
मैक्सी गाऊन नाईटी या ट्राऊजर कमीज
पहिन लें
"""""क्योंकि पूरी जिंदगी उन्होने
साङी ब्लाऊज पहिना है ""आदत ""बन
गयी है वे अटपटा और लज्जित महसूस
करतीं है दूसरे कपङों में """""वैसे
ही """एक लङकी जो पच्चीस साल तक
सलवार कमीज ""कुरता पाजामी ""पैन्ट
शर्ट """जीन्स टीशर्ट """नाईट सूट
ट्राऊजर शॉर्ट्स जैकेट कोट ओवरकोट
"""पहनती रही हो """अचानक एक सुबह
कह दिया जाये कि अब बस
""""चलो साङी बाँधो और इसे ही पहिन
कर सोना है सारे कामकाज करने है,,,,,,,,,
वह खुश नहीं हो सकती।
बंद गले फुल बाँहों वाला गरम कपङे
का कुरता पाजामा सलवार
पाजामी पेन्ट """और स्कार्फ
दुपट्टा जितना ढँकता है
उतना ही आजादी देता है शरीर
को """"फिर साङी ही पहिननाने
की जिद क्यों बहू पर??? बेटी होने पर
लङकी सब कुछ अपनी पसंद
का पहनती है!!!!! एक लङका पूरा जीवन
सब कुछ अपनी पसंद का पहिनता है
",,शादी होते ही कोई प्रोटोकोल
नहीं कि ""ले बेटा अब से तू
परदनी धोती ही बाँध अब तू
शादी शुदा है!!!!!!!!!
स्त्री की सेक्सुअलिटी से
"""साङी को जोङकर ""सलवार कमीज
और पेंट शर्ट में बहू न बरदाश्त करने वाले
परिवार """"कितने महान होते होगे???

ये बहू """"साङी ""में रहेगी की सोच
बङी घिनौनी सोच से जन्म लेती है
जिसपर अभी कहना अजीब लगेगा किंतु
सोच """वही रहती है अब वह
स्त्री """""कुमारी नहीं """"विवाहिता होने
पर सारे दास चिह्न चस्पां कर दिये जाने
की कुप्रथा के सिवा क्या है???????
सिलाई कला और सिलने की मशीनों के
अविष्कार के बाद """"अगर "थान लपेटे
बिना संस्कृति घायल होती है """"तो यह
सोच केवल विकास पथ का रोङा ही है।
चूल्हे की जगह मॉड्यूलर गैस ओवेन
वाला किचिन!!!!! और कपङे?? पुरुष सब
पहिने """"बस औरते
वहीं की वहीं रहेगी घूम फिर कर दस
मीटर के थान में!!!!!!

आधुनिकता का मतलब है क्या???? जो लोग
नग्नता से लगाते हैं वे भी गलत है तो """वे
भी गलत है जो स्त्री को ""लिंग
स्त्री विंग होने से """"यह मानकर चलते
हैं कि उसको """"कोमल नाजुक छुई मुई और
साङी दुपट्टे घूँघट पल्लू में
ही रहना चाहिये """"""बेटी और बहू में
ससुर जेठ के लिये अंतर क्यो है????
©®सुधा राजे

Thursday, 11 September 2014

सुधा राजे का लेख :- स्त्री'' सारी बीच नारी है कि सारी की ही नारी है।"

स्त्री ',सारी बीच नारी है कि सारी की ही नारी है
★★★★★
मानव के सिवा लगभग सभी पशु पक्षियों ने मामूली खान पान और निवास की आदतों
के सिवा कुछ भी नहीं बदला ।आग और पहिये के अविष्कार के बाद की क्रान्ति
थी वस्त्र का अविष्कार 'जिसका पहला प्रयोग लाज शरम और स्त्री पुरुष
प्रायवेट पार्ट्स को ढँकना नहीं था, 'अपितु ठंड से बचाव था । बाद में यही
वस्त्र बिछौने और धूप से बचाने के काम आने लगे जो कि पशुओं का चमङा और ऊन
और रेशों पत्तों छाल छिलकों के बने होते थे । नर और नारी के वस्त्रों में
कोई भेदभाव नहीं था ',एक लंबा सा चादर या थान लपेट कर डोरियों की मदद से
जगह जगह बाँध लेना ',फिर धोती अंगवस्त्र और शॉल फिर पगङी तक भी स्त्री
पुरुष के वस्त्र एक समान ही थे । उत्तर वैदिक काल में भी स्त्रियाँ लांग
बाँधकर धोती पहनती थी और पुरुष भी, एक चादर ऊपर से लपेट कर एक पटका सीने
पर बाँधती थी ',
केश स्त्री पुरुष दोनों ही लंबे रखते थे 'जेवर भी पुरुष और स्त्री एक
समान ही पहनते थे ।
मराठी साङी और पुरुष के धोती पहनने का कोई अंतर है तो बस 'ब्लाऊज के रूप
में है ।अगर याद करें तो हमारे बचपन मेंदादी नानी पेटीकोट ब्लाऊज नहीं
पहनतीं थी बल्कि लांग वाली धोती ही कसकर बाँधतीं थी, 'ब्लाऊज आधुनिक काल
की देन है और राजे रजवाङों के अलावा बहुत कम परिवारों में स्त्रियाँ आज
की तरह पेटीकोट या ब्लाऊज पहनतीं थी ।
और आज भी सिख समुदाय में स्त्री पुरुष दोनो के बाल लंबे रहते है कटार और
कंघी और कङा समान रहता है ।
समय बदलता रहा ',पुरुष ने चोटी कटाई, जनेऊ उतार फेंका, दाङी मूँछ साफ कर
दी और धोती, फेंटा, पगङी, कटार, पिछौरा यादर अंगवस्त्र पटका शॉल सब उतार
फेंका ',लँगोट और बंडी गंजी भी त्याग दी अंगरखा भी हट गया!!!!!!!!
आज सिवा फिल्म और नाटक या बहुत ड्रेसकोड की ड्रामेटिक शादी के पुराने
कपङे कहीं नहीं दिखाई देते । शर्ट, टीशर्ट, पोलोशर्ट, जैकेट, कोट, पैन्ट,
ट्राऊजर, बैगी, ब्रीचिज, कुर्ता, पाजामा, कैप, हैट, और जूते, 'टाई मोजे
और रूमाल!!!!!
कहाँ गयी, पुरानी चोटी, लँगोटी, खङाऊँ, धोती' बंडी, तिलक, अँगोछा, दाङी,
मूँछ, लंबे बाल, और चादर!!!!!
क्यों नहीं पैरों में तोङा, गले में हँसली, कान में कुंडल सिर पर पगङी???
हाथ में लाठी पैर में नागरा और खङाऊँ?
संस्कृति और संस्कार परंपरा और धर्म की ठेकेदारी सारी की सारी केवल
स्त्रियों की ही क्यों हो?
दूल्हा आता है कोट पैन्ट शर्ट बूट टाई घङी और रेडीमेट दूल्हाटोपी में जो
केवल एक रस्म के बाद फेंक दी जाती है ।
किंतु दुलहन, 'आज भी वही सन बारह सौ के पारंपरिक कपङों गहनों वाली लजाती
शरमाती चाहिये और वही 'पुराना माहौल उसके व्यक्तित्व पर??
बङी अज़ीब सी सोच है संस्कृति के नाम पर इस भयंकर भेदभाव की ',।जिस
परिवार के पुरुष धोती नहीं पहनते कोट पैन्ट सूट टाई शर्ट अंडरवीयर पहनते
हैं ',उस परिवार की स्त्रियों पर धोती ब्लाऊज पायल बिंदी चूड़ी लंबे बाल
नाक कान बिंधवाने और चप्पल पहनने का बंधन क्यों??? या तो खुद भी, धोती
पहनो लँगोट बाँधो, जनेऊ पहनो, अँगरखा बाँधों चादर लपेटो कुंडल चोटी तिलक
तोङा हँसली खङाऊँ नागरा पहनो और, संस्कृत पढ़ो, बोलो ',या फिर, 'जितने
आधुनिक आप हो उतना ही आधुनिक घर की बहू बेटियों को भी रहने दो ',।
पुरुष सुविधा जनक कपङे रहन सहन और आदते अपनाता चला गया और, 'उत्तर वैदिक
काल से आज इक्कीसवीं सदी का नागरिक पुरुष ही नहीं बल्कि घोर देहात गाँव
कबीलों तक का पुरुष पैंट शर्ट जूते अंडर वीयर वेस्ट और कोट जैकेटे स्वेटर
पहनने लगा ',बाल कटवाने लगा और, 'सेफ्टीरेजर का इस्तेमाल करने लगा है ।
साबुन शैम्पू और पेस्ट ब्रुश प्रयोग करने लगा है । असुविधा जनक धोती और
पगङी जेवर और लंबे चादर दुशाले केश पगङी और दाङियाँ कब के पीछे छोङ
दिये!!!!
किंतु दुराग्रह के रूप में आज भी स्त्री पर असुविधा जनक कपङे और लंबी
चोटी हाथ भर कर कङे चूङियाँ नाक कान बिंधाने की जिद जारी है!!!
सुरक्षा और कार्यकुशलता के लिहाज से, 'कुर्ता पाजामा, 'पैन्ट शर्ट जैकेट
कोट, 'बेल्ट ',जूते ',छोटे बाल ',और बिना नाक कान पैरों कलाईयों में गहने
पहने ही रहने वाली स्त्रियाँ चुस्त दुरुस्त और अधिक तीव्रता कुशलता से
काम काज कर पाती हैं ।
आज लङकियाँ बाईक चलातीं है 'घुङसवारी करती हैं, बोट चलाती है, बंदूक
चलाती है, विमान उङाती है, रॉकेट से अंतरिक्ष जाती है, जूडो कैराटे
ताईक्वांडो युयुत्सू नॉनचेको कुश्ती, बॉक्सिंग, कबड्डी हॉकी क्रिकेट
टेनिस बैडमिन्टॉन और धनुष बाण, जैसे खेलों में जीत कर दिखा रही हैं ।
लङकियाँ, पेट्रोल पंप चला रहीं है और ऑटो रिक्शा भी, 'लङकियाँ कुली भी
हैं और, ट्रैक्टर भी चला रही है, ' वे टीचर, डॉक्टर, वैज्ञानिक, खिलाङी,
वकील, पत्रकार, पुलिस ऑफिसर, बिजनैस हैड, पैरामिलिट्री कमांडो और, जासूस
भी है ',संगीतकार कलाकार, निर्माता निर्देशक कैमरापर्सन और सांसद मंत्री
नेता विधायक भी है ।
तब?????
आज भी देश की आधी आबादी का बहुत बङा हिस्सा किस तर्क के साथ विवश कर दिया
जाता है ',असुविधा जनक जेवर कपङे चूङियाँ बिंदियाँ गहने चप्पलें और सर
सामान से लदकर काम करने को!!!!! ऐसा जो जो लोग सोचते हैं कि स्त्री साङी
में ही अच्छी लगती है उन सब पुरुषों को सात दिन तक दोनों हाथों में नौ नौ
चूङियाँ, 'पेटीकोट ब्लाऊज और कमर तक लंबी चोटी लटका कर "नाक कान गले पांव
में जेवर बाँधकर ',रसोई में सब काम करके दफतर जाने का आदेश दे देना
चाहिये ',ताकि उनको पता तो चले कि, उनके और साङी गहने चोटी बिंदी पायल
वाली स्त्री के पहनावे का ",,कामकाज पर कार्य क्षमता और मूड तथा
अनुभूतियों पर कैसा असर पङता है ।
एक बार बरसात के दिनों में कोटद्वार यात्रा के समय 'रास्ते में पानी भरने
से वाहन वहीं छोङकर आगे पैदल जाना पङा और वहाँ से लौटते समय कई घंटों की
प्रतीक्षा के बाद ट्रक मिला ',हम सब सहेलियाँ जिन जिन ने सलवार कुरता या
पैन्ट कुरता पहिन रखा था आराम से चढ़ गये ',किंतु जिन्होने साङी पहिन रखी
थी बहुत खराब हालत थी पहले तो भीगी साङी में पैदल चलकर उनके पांव छिल छिल
गये थे, ऊपर से ट्रक पर चढ़ते समय तो परदा बेपरदा के चक्कर में बेचारी
नीचे ही रह गयीं ',आखिर कार हम सबको उतरना पङा ',हुआ यूँ कि फिर कई घंटों
तक कोई वाहन नहीं मिला ',फिर आधा किलोमीटर हपङ धपङ करती साङी में वे सब
हम सब पैदल चले और 'तब बस मिली, 'साङी शरीर से चिपक कर पारदर्शी हो चुकी
थी और फिटिंग के ब्लाऊज में वे दोनों शर्मिन्दा महसूस कर रहीं थीं ',हम
चार पाँच लोगों ने अंडरशर्ट और कुरते पहिन रखे थे जो जल्दी सूख गये तो
अपने दुपट्टे उन लोगों को दे दिये । अकसर यही तमाशा आपको लोकल ट्रेन या
बस में देखने को मिलता रहता है ',ठसाठस भरी गाङी में ट्राऊजर पैंट और
शर्ट कुरता सलवार कमीज वाली महिलायें आराम से चढ़ जाती है ',या फिर लांग
वाली मराठी साङी वाली ',किंतु बंगाली बिहारी उत्तरभारतीय तरीको से ब्लाऊज
साङी पहिनने वाली महिलायें कभी पल्लू सँभालती कभी चुन्नट पकङती कभी पेट
पीठ ढँकने की असफल कोशिश करतीं तमाशा बन जातीं हैं ',।बस में अगर सीट
नहीं मिली और खङे होना पङे तो साङी वाली महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी
होती है क्योंकि उनका आधा बदन उघङ कर बेपरदा ही हो जाता है । तेजी से
दौङना हो या भागना तो भी 'साङी 'मतलब एक मुसीबत ही है ।न साङी पहन कर
ट्रक या डंपर जैसे किसी ऊँचे वाहन में चढ़ा जा सकता है, न साङी पहिन कर
बास्केटबॉल फुटबॉल कबड्डी खो खो खेली जा सकती है, न साङी पहिन कर
पर्वतारोहण किया जा सकता है, न साङी पहिन कर बरसात आँधी तूफान बाढ़ आदि
के समय तेजी से बचाव के भागा जा सकता है, न साङी पहिन कर जंप या हाईजंप
लगायी जा सकती है न साङी पहिन कर बहुत तेजी से सीढ़ियाँ चढ़ीं उतरीं जा
सकतीं है न ही साङी पहिन कर बेधङक खुली जगह जैसे रेलवे प्लेट फॉर्म या
'कंपार्टमेन्ट में सोया जा सकता है न साङी पहिन कर पैराग्लाईडर ग्लाईडर
या पैराशूट में उङा जा सकता है । किसी खतरनाक मशीनों वाले कारखाने या मिल
में साङी पहिन कर जाना सख्त मनाही ही रहता है ',। असामाजिक तत्वों का
साङी पहिन कर मुकाबिला बहुत कठिन हो जाता है '। अकसर जब जब भीङ की
दुर्घटनायें हुयीं तो भगदङ में साङी वाली महिलायें और उनकी गोद में
नन्हें बच्चे सबसे अधिक मारे गये 'जबकि 'लङकियाँ बच गयीं और वे लङके जो
पैंट शर्ट में थे । रेलिंग या बाङ फलांगना हो या चौङी नाली नाला गटर या
खड्डा 'साङी सिवा मुसीबत के कुछ नहीं '।जरा सा खिंचाव पङते ही फट जाये या
खुल जाये!!!! ऊपर से एक मीटर के कपङे का ब्लाऊज पेट पीठ गला सब खुला!!!!!
अगर साङी खिंचकर अलग हो या उङ जाये तो, निर्वसना जैसी हालत हो जाये
',जबकि अंडर शर्ट और अंडरसमीज के साथ कुरता पाजामा पेन्ट शर्ट ',संभव हो
तो नेहरूकट वेस्टकोट या जैकेट 'पहनने वाली स्त्रियाँ ',बहुत हद तक एक्टिव
सुरक्षित और कूदने दौङने चलने भागने फलांगने और चढ़ने उतरने उङने तक में
आसानी महसूस करती है "बाईक राईडिंग या हॉर्स राईडिंग 'साईकिलिंग या कार
ड्राईविंग "साङी हर जगह मुसीबत!!!!!!
परंपरा?
तो ये परंपरा है कि स्त्री को जमाने के मुताबिक कमजोर और मुसीबत ज़दह रखा जाये
मौसम के लिहाज से भी साङी न तो गरमी में आराम देती है ',न बरसात में
अनुकूल है, 'न ही सरदी से कुछ बचाव होता है ।
सरदी में आखिरकार स्वेटर 'कार्डिगन, कोट, पहन कर भी साङी के नीचे स्लैक्स
पाजामी 'इनरवीयर पहनने पङते हैं ',फिर भी जहाँ कुरता पाजामा और पैंट शर्ट
पहिनने वाली महिलायें ',वंद गले के कपङों के नीचे गर्म थर्मल इनरवीयर और
पाजामी दोनो पहिन सकतीं है वहीं साङी वाली स्त्रियाँ ब्लाऊज की वजह से
पाजामी तो पहिन लेती है पेटीकोट के भीतर किंन्तु ',ब्लाऊज के भीतर कुछ
गर्म कपङा नहीं पहिन पाती अतः मोटे स्वेटर विकल्प रह जाते है या कोट
कार्डिगन ऊनी ब्लाऊज ',
जाङों के दिनों में साङी सिवा एक ढकोसले के कुछ और नहीं रह जाती क्योंकि
बाकी सब कपङे तो अत्याधुनिक होते ही है सिवा एक साङी के!!!!!!
इसीलिये "बहुत "ठंडे प्रदेशों में भारतीय महिलायें साङी नहीं पहिनतीं न
कश्मीर , न हिमाचल प्रदेश, न गढ़वाल, न कुमाऊ, और न ही, लद्दाख में ।
बेहद गर्म प्रदेशों में भी साङी नहीं पहिनी जाती ',क्योंकि थार की रेत पर
चलना साङी पहिनकर असंभव है ',ऊँट पर चढ़ना असंभव है 'इसीलिये राजस्थान का
मूल पहनावा कांचरी कुरती घाघरा और जूतियाँ मोजरी है ',जिनको दो मिनट में
पहिन कर मीलो दौङा जा सकता है ',तेज आँधी और धूल में सहजता से चला भागा
जा सकता है ',जरूरत पङने पर लँहगे की लांग बाँध कर ',पहाङ पर भी चढ़ा जा
सकता है ।
फिर भी एक मेहनत कश स्त्री और 'धनिक स्त्री के 'घाघरे में अंतर है ।
मुंबईया फिल्मों ने घाघरे का जैसा दुष्प्रचार किया है वह असली घाघरा है
ही नहीं ',फिल्म में कांचरी पहना कर नायिका छोटे से घाघरे में नचवा दी
जाती है जबकि वह तो अतः वस्त्र होती है ',उसके ऊपर से कुरता पहिना जाता
है जो पूरा पेट कूल्हे गला सब ढँक देता है ',

साङी से सहूलियत केवल दुःशासन की नस्ल के लोगों ही रहती है ताकि वे साङी
खींच सकें और पतले से पेटीकोट छोटे से ब्लाऊज में स्त्री ""लाज बचाओ ""की
गुहार लगाती रहे ।
वीरांगना, कर्मयोद्धा स्त्री की पोशाक साङी नहीं हो सकती ',उसे बाँधने का
तरीका पाजामा और सलवार की मरदानी धोती के ही शैली में होता आया है ।
कपङा हो या गहना केवल वही अच्छा है उसकी एक ही कसौटी है कि ""गरमी सरदी
बरसात धूल धूप तेज हवा कीङे मकोङे पतिंगे विषाणु बैक्टीरिया और संक्रमण
से कितनी रक्षा करते हैं ।
शरीर को पहनने के दौरान कितना आराम और कामकाज करने में कितनी सुविधा देते
है । युद्ध हमला आक्रमण बचाव के समय प्राणों पर संकट कितना कम करते हैं
',जान बचाने और बलात्कार छेङछाङ आदि से बचने में कितनी मदद करते हैं ।
सोते उठते चलते भागते दौङते कूदते कोई अङचन तो नहीं करते?
जो भी कपङा शरीर की शक्ति और मूवमेन्ट की रफ्तार को कम करता है वह "सही
"वस्त्र नहीं हो सकता ।
साङी इस नजरिये से बिलकुल "प्रारंभिक आविष्कार की अवस्था का वस्त्र है, '
जिसे "पहनना "सीखना पङता है औऱ ठीक तरीके से पहनना तब भी "अधिकांश
स्त्रियों को नहीं आता जो बरसों से पहिन रही हैं । यह बाईसवीं सदी का
"विकसित मानव फ्रैण्डली वस्त्र नहीं है ।
पुरुषों की चोटी कर्णवेध जनेऊ लंगोटी खङाऊँ जूङे की तरह ही अब साङी को भी
म्यूजियम में रखने का समय आ चुका है ।
जैसा कि हमने पहले भी कहा है कि "विकास की रफ्तार के साथ 'तकनीकी से
कुशलता बढ़ाने वाली हर चीज अपनाने के युग में भी परंपरावादी पोंगापंथी
लोग "अगर नहीं चाहते कि "स्त्रियाँ ''नथ और साङी पहिनना छोङे तो उसकी वजह
है "मालिकाना अहंकार "जो ऐसी हर चीज के त्यागने का विरोध करता है जिससे
स्त्री को तनिक भी, स्वतंत्रता मुक्ति हक या समानता मिलती हो ।
वैसे भी "साङी "भारत का प्रतिनिधि वस्त्र नहीं बल्कि केवल कुछ राज्यों का
वस्त्र था जो आजादी के दौरान उत्तरभारत और बंगाल से 'प्रचार "पा गया ।
मणिपुर आसाम नागालैंड मेघालय सिक्किम पंजाब हरियाणा सिंध कश्मीर जम्मू
गढ़वाल कुमाऊँ राजस्थान गुजरात गोवा, """"और अनेक वन्यप्रांतरवासियों की
पोशाक साङी नहीं है,,,
दिल्ली और उत्तर प्रदेश की हर बात को "भारतीयता "कह कर थोपना पुरानी आदत
है 'समाज के खुद को ठेकेदार समझने वालों की ',जैसे सबकी मातृभाषा हिंदी
नहीं वैसे ही सबकी पोशाक साङी नहीं ।
स्त्री पुरुष समानता के संदर्भ में ',साङी पहनाने का हक केवल उसे है जो
खुद धोती पहिन सके ।
©®सुधा राजे



Tuesday, 9 September 2014

सुधा राजे की कहानी:- ""भाभी की नई साङी।""

कहानी ""भाभी की नई साङी ""
'''''''''27-3-2014-/-6:28AM./(सुधा राजे)
,,,,,,:::::::::::::
अरे जौ का भैन जी '! अपुन फिर दो धुतियाँ लिआयीं!

रख लो 'भब्बी 'साब ' अपुन पै जौ पीरौ हरौ रंग भौतई नौनौ लगत!

कहते तो बङी भाभी के शब्द इनकार थे किंतु चेहरे पर खुशी थी नया कीमती
उपहार पाने की ।
सोने की नथ और भतीजी को पायल दोनों भतीजों को पैन्ट शर्ट और भतीजी को कई
जोङी सलवार सूट बूट घङी भाभी के लिये स्वेटर शॉल और भाभी के किचिन के
लिये तमाम बर्तन डिब्बे प्रेशर कुकर छोटी भाभी के किचिन के लिये डिनर
प्लेटें गैस सिलेंडर और साङी कपङे सब करने के बाद जब "सृष्टि " वापस
लौटने लगी तो ', स्टेशन पर बङे भैया भेजने आये
छोङने साथ में बङी भतीजी और भतीजा भी ।


"मैं माँ की एक साङी ले जा रही हूँ ये साङी मैंने ही माँ को गिफ्ट की थी
एक दर्जन साङियों के साथ "

कौन सी वाली बुआ जी?
मुक्ति 'के चेहरे से साफ दिख रहा था कि उसे पसंद नहीं आया 'दादी के सामान
को बुआ छू लें 'वह अब खुद को हर चीज की मालिक और बुआ को दूर की मेहमान
समझने लगी थी ।
बच्चों का दोष क्या घर के बङों से जो सुनते देखते हैं वही समझते हैं । कल
तक यही मुक्ति बुआ के लिये सबकुछ थी ।

और हाँ ""एक हाथ का पंखा भी जो माँ ने बनाया था अधूरा ही रह गया ""

अबकी बार भैया को लगा कि अतिक्रमण उनके हक पर किया गया है । माँ के बर्तन
गहने कपङे जेवर घर जमीन और सब कुछ रखने के बाद माँ की दो निशानियाँ तक
"नाग़वार "गुजर रहीं थीं जिन लोगों को बाँटनी वे कल तक "सृष्टि के अपने
थे 'सोचकर वह मन ही मन हँस पङी ।

उसे याद आया """"""""""तब उसने इंटरमीडियेट किया था """"""

गोरखपुर वाले काका के लङके की शादी थी । तब बङे भैया की एक कलीग से लङाई
के चक्कर में नौकरी छूट गयी थी । भाभी तब कहीं उदास न हों इसलिये सुलेखा
हर बार कॉलेज से आते समय कुछ न कुछ सामान खाने पीने पहनने या मेकअप वगैरह
का भाभी के लिये खरीद लाती थी । मुक्ति और मुन्ने के लिये भी हर तरह के
सामान लाती । बापू जो पॉकेटमनी देते जो पैसा तीज त्यौहार पर मेहमान दे
जाते वह सब केवल भाभी और भतीजों पर ही खर्च कर देती थी ।
भाभी को शादी में जाना था बापू ने सबको बराबर पैसे दिये कपङों के लिये
'लेकिन सृष्टि अपने लिये सिर्फ दो सूट लायी और वह भी सस्ते वाले जबकि
भाभी के लिये पाँच साङियाँ चूङी बिंदी मैचिंग सहित लाई ।
बारात वापस आने का समय था और काकी ने अचानक फरमान सुना दिया कि सब बहिनें
साङी पहिन कर तिलक करेगी लौटने वाले भाई और बारातियों को शरबत पिलाने
जायेंगी ।

कदाचित काकी और बुआ का विचार था अपने कुटुंब की धाक जमाना । रहन सहन और
परंपरा की । ताई चाहतीं थी कि उनकी बेटी को बारात में बनारस के बाबू साहब
पसंद कर लें । और? लङकी लङके को पता भी न चले अनजाने में देख दिखा ले ।

सृष्टि ने भाभी से कहा भाभी 'वह क्रीम कलर की साङी निकाल दो जरा काकी
कहतीं है सब साङी पहनो मेरे पास तो केवल सूट हैं ।

भाभी, अनसुनी करके चली गयी । सृष्टि ने सोचा सुना नहीं वह पीछे पीछे गयी
और हाथ पकङ कर बोली 'भाभी साङी निकाल दो न "। भाभी बोली, चाभी नहीं मिल
रही है जब मिल
जायेगी निकाल दूँगी ।
थोङी देर बाद सब लङकियाँ तैयार हो गयीं । सृष्टि सबको साङी पहनने में
मदद करती रही और ',सब की सब लङकियाँ थाली शरबत आरती सजाने में लग गयीं
।तभी काकी आकर डपटती हुयी बोली "अरे सृष्टि बेटा तुम तैयार नहीं हुयीं
अब तक?
जी काकी वो चाभी नहीं मिल रही है भाभी की वही ढूँढ रही हैं "साङी तो भाभी
के संदूक में ही है न!
कौन सी चाभी 'फूलमती की? वह तो अभी खुद पहिन ओढ़कर तैयार हुयी है बहू
आगमन के लिये जेठानी है न वही तो लायेगी नयी बहू को भीतर ।

सृष्टि लगभग भागती हुयी कोने वाले कमरे में पहुँची जहाँ भाभी सजधजकर
तैयार खङीं थी विशेष रूप से वही क्रीम कलर की साङी पहिन कर ।

भाभी तो आप दूसरी कोई साङी निकाल दो देर हो रही है । पहली बार साङी
पहिननी है तो देर तो लगेगी न काकी गुस्सा कर रहीं है काकी से जाकर ले लो
'मैं तो नहीं
देती अपनी नई की नई साङी ''


भाभी ने जैसे चबाकर शब्द बोले । पीछे काकी खङीं थीं सृष्टि की हिलकी भर
उठी "सब लङकियों को उनकी भाभी सजा रहीं थीं और वे लङकियाँ वे थीं जो रात
दिन केवल पढ़ने और हुकुम चलाने में रहतीं थी ।सृष्टि ने ग्यारह साल की
उमर से भाभी की सेवा की थी भतीजी की परवरिश माँ बनकर की थी और एकदम देहात
की भाभी को रहन सहन सिखाकर सुंदरता सँवारने में कोई कसर नहीं छोङी थी ।

सृष्टि पलट कर चली गयी । बारात बाहर आ चुकी थी । वह काकी के अनाज वाले
कमरे में जा बैठी गला दुख रहा था 'आँसू भरभरा रहे थे । काश माँ साथ आयीं
होतीं और भाभी का ये रूप देखतीं ।
तभी काकी आयीं उनके हाथ में हरी सी सुंदर साङी थी और साथ में जेवरों का डिब्बा ।

काकी!!
मैं नहीं पहनूँगी ये बहुत कीमती है ।
पहन ले अपनी छोटी माँ की है न, तेरी माँ से मैंने बहुत गिफ्ट वसूल करे हैं ।

सृष्टि ने काकी का मन रखने के लिये साङी पहिन तो ली । लेकिन मन बुझने से
चेहरा बुझ चुका था । लौटकर आयी बारात में भाईयों का तिलक करते आँखे छलछला
पङीं ।

भईया ने कभी नहीं जाना क्या हुआ । लेकिन सृष्टि को याद आता रहा कि वह
"कहीं भी पार्टी में जाने से पहले नाईन को बुलाकर लाती थी कि भाभी का
उबटन कर देना कहीं जाना है ।भाभी को लेकर ही अपनी हर सहेली की पार्टी में
जाती थी । भाभी को मंदिर मेले बाज़ार ले जाना सब उसे अच्छा लगता था कितनी
खुश थी भाभी पाकर ।


फिर कभी उसने भाभी की साङी नहीं पहनी न ही कोई छोटी बङी चीज इस्तेमाल की
एक अदृश्य दीवार खङी हो चुकी थी, सवाल साङी का नहीं था भावना थी अपनn की


जब लङके वाले देखने आये तब माँ ने कहा कि साङी पहिननी पङेगी परसों तो
साफ कह दिया 'खरीद सको तो पहनूँगी "किसी की साङी नहीं पहिननी मुझे । और
माँ खुद दिलवा लायीं गुजराती साङी ।


जब भी मायके आती भाभियों के लिये साङी जरूर लाती और जिस साङी को देखती कि
भाभी को ज्यादा ही पसंद है जानबूझकर भूल जाती और भाभी के कमरे में छोङ
देती ।

अबकी बार "माँ की तेरहवीं पर आयी थी "और शायद अब आने जाने का बहाना भी
नहीं रह गया ।

माँ थीं तो हर हाल में आना था तब भी दो साल में एक बार आना । क्योंकि एक
साल की छुट्टी में वह अपनी ननदों को बुलाकर आव भगत करती । सबसे पहले
आलमारी खोल देती लो दीदी अपने कपङे इसमें रख दो और जब तक यहाँ रहो अपने
कपङे नहीं पहिनना मैंने साङी ब्लाऊज गाउन सब तैयार करके रख दिये हैं ।

जब दीदियाँ जाती तो अपनी पसंद से शॉपिंग करके जातीं ।
एक दिन जब सुना कि "दीदी अपनी चचेरी भाभी से कह रही है '''हमारी सृष्टि
है तो हमसे बीसियों साल छोटी मगर कभी कहीं ताले नहीं लगे देखे उसके राज
में अम्माँ की जगह सँभाल ली उसने ।


सृष्टि को महसूस हुआ ''कहीं गहरा घाव था जिसपर आज मरहम लग गया और ज़ख्म
भरने लगे हैं।

©सुधा राजे
पूर्णतः मौलिक रचना


Sunday, 7 September 2014

सुधा राजे का पत्र ::-- गली-गली संपादक??

कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ हम खुद
प्रत्यक्ष दर्शी हैं
यहाँ पश्चिमी यूपी एक महोदय।ने
एक अखबार का रजिस्ट्रेशन
करा लिया "और सब जगह प्रचार
किया 'रचनायें इकट्ठी कीं और
'हमारा नाम सब एडीटर में शामिल
कर लिया हमें मालूम तक नहीं ',एक
अंक छापा और अनेक विज्ञापन बटोर
लिये ',फिर, शहर भर के,,,,, लेखक
साहित्यकार पत्रकार """"""उसके
संपर्क में """"और वह ""पत्रकार
की ठसक में,,
एक पुलिस ऑफिसर परिचित से,,,,,,
शक जाहिर किया """""जाँच
करायी """"कुछ दिन बाद संपादक
जी गिरफ्तार """
उस धूर्त के,,, मँडराने की वजह
थी """महिलासंगठन की आङ लेकर, '
अपना ऊल जुलूल रुतबा बढ़ाना """
आज जरूरत है कि ऐसे
कुकुरमुत्तों की तरह उग आये
गली गली अखबार
को """पहचाना जाये और """
पत्रकार
केवल उनको ही समझा माना जाये
जो ""वाकई ""हैं पत्रकार
वरना
इस प्रोफेशन की रही सही इमेज
भी खत्म हो जायेगी
कोई भी एक चिंथङा छापकर
संपादक और पत्रकार की हनक में आकर
सरकारी महकमों में दखल करने
लगता है।
बहुत से व्यापारी मिल मालिक जातीय
और मजहबी नेता '''''''एक
पत्रिका या अखबार निकालने के लिये
छटपटाते है """"ताकि उनकी बकवास और
जहर बराबर लक्षित लोगों तक
पहुँचता रहे """"दूसरी तरफ पत्रकार
होने की सुविधायें और ""हनक ठसक ""से
बल और ब्लैकमेलिंग जारी रहे ""ऐसे हर
संपादक की कङी जाँच हो ।
दस बीस प्रतियाँ काँख में दाबीं दो चार
आला अफसरों को भेंट की ',लो जी हम
भी अब ""मीडिया ""बाईक पर
मीडिया '''कार अगर है तो दहेज
की हो चाहे '''प्रेस ''लिखा और ये
अकङी गरदन ''''चाहे उनको एक
दरख्वास्त तक लिखनी न आती हो? ऐसे
गली गली कुकुरमुत्तों ने मीडिया और
संपादक पत्रकार शब्द को मजाक
बना दिया है।
आप के हमारे पास अकसर ऐसे तमाम
परोपकारी संपादकों के ''ऑफर आते रहते हैं
'''रुपया दो और संकलन में रचनायें
छपवा लो '''सदस्य बनो और पत्रिका में
छपो ',सारे न सही तो इनमें से बहुत से
संपादक संपादिकायें """स्नातक तक पढ़े
लिखे भी नहीं """"""सोचो कि ये """लेखक
को "एडिट ''क्या करेगे???
(सुधा राजे)


Saturday, 6 September 2014

सुधा रसोई :- लौकी"

लौकी केवल सब्जी नहीं औषध भी है
"""1-
लौकी कद्दूकस करके आम कद्दूकस करें
बेसन में फेंटकर हरे मसालों की कतरन
मिला लें पकौङियाँ बनालें ""सॉस के
साथ बच्चे खायेगे ""
2-
पकौङियाँ बच जायें तो सब्जी बना लें
अथवा ""दही डालकर
रखे और खायें खिलायें फुलकी "
गरमी में लौकी वरदान है ।
बच्चे मुँह बिचकाते हैं ।
तो
रेसिपी बदल कर देखें ।
3-
लौकी के बारीक गोल स्लाईस
पर बेसन मसाला लगाकर तल लें
और
टौमैटो केचअप
या पोदीने की हरी चटनी के साथ
परोसें ।
याद रखे लौकी पर रोंयें
हो तभी तोङ लें या नरम
छोटी लौकी खरीदे जो सफेद न
हो छिलका मुलायम हो बीज में
कङक छिलके न बने हो

4-
तब तक लौकी का रायता भी बनवा लें
""बारीक लच्छे हल्की आँच पर जीरे घी से
छौंक दें और अधपका होने पर दही में
मिला दें ""सूखा जीरा तवे पर भूनकर
पीस लें और दही में मिला दें नमक
दोनों प्रकार के काला सफेद डालें
""प्याज पसंद हे तो बारीक कतरी प्याज
हरी मिरची धनिया पोदीना डाले और
लौकी का रायता चावल के साथ खायें
खिलायें """पौष्टिक निरापद और
शीतलकारी "
5-
दही चावल निषेध नहीं है
""सिवा शीतलहर के दिनों के
"""बल्कि दही में उङद और दूध में लहसुन
निषेध है """""किंतु जब उङद के बङे बनते हैं
तब ""उत्तम है ""और लहसुन घी में तलकर
खाने से बल बढ़ता है ।
5-
दही खट्टा न हो जाये इसलिये केवल पाँच
घंटे का जमा हो या कपङछन करके दूध
डालकर फिर मिला लें
हो सके तो मिट्टी के बरतन में दही जमायें ।
7-
हाँ लौकी के पराँठे और लौकी वाली चने
की दाल ''भी बना सकती है
8-
लौकी को कद्दूकस करें गाढ़े किये गये
उबलते दूध में पकायें ।
चीनी इलायची कतरे हुये बारीक मेवे
बादाम डालें और ठंडा करे
""लौकी की लौच ""व्रत उपवास में
भी पौष्टिक आहार है ।
9-
लौकी को कद्दूकस करके देशी घी से छौंक
दे ""चिरौंजी और खसखस डालकर """जब
पक जाये तो "मावा 'खोआ डालें और
गाढ़ा होने पर
पिसी हुयी चीनी या बूरा डालकर
घी लगी थाली में फैला दें ""काटकर
बरफी परोसे ""चाहे तो चाशनी बना कर
चार तार की फिर मावा और
लौकी की भुनी हुयी पिट्ठी डालकर
गाढ़ा करे घी लगी थाली में फैलाकर कतरे
हुये नारियल और मेवे चिपका कर चोकोर
टुकङे काटकर बरफी रखे ठंडी होने पर
खायें """"यह सबसे स्वादिष्ट बरफियों में
से एक है
10-
लौकी कद्दूकस करके पानी निचोङ लें
जिससे या तो आटा गूँथ लें या दाल में डाल
लें ।।अब लौकी के लच्छों को नमक डालकर
बेसन में कङक गूँथें और हाथ पर तेल लगाकर
गोले बना ले ""पानी उबालकर कुकर में ये
गोले गरम पानी में छोङ दें दो सीटी ले लें
।उताकर ठंडा करके गोले आलू की तरह
काट लें कटे हुये टुकङे हलके से तेल में भूनकर
निकाल लें """""अब आलू की तरह
मसाला पेस्ट दही डालकर भून ले ।।।
लौकी के गट्टे डालें और दो मिनट चलायें
फिर पानी डालकर एक सीटी लें
"""ग्रेवी गाढ़ी होने पर उतार कर
'''बारीक कतरी धनिया और
हल्का सा पिसा गरम मसाला बुरक दें ''11-

हर घर में एक गृहिणी है और अकसर
ही भारतीय गृहिणी बहुत तरीकों से
पकातीं हैं """बस
उनको पब्लिसिटी नहीं करनी आती ""
लौकी मुलायम बतिया ही तोङ लें बारीक कतरें और छलनी में रखकर भाप दें,
उतार कर अंकुरित मूँग और अंकुरित चने मिलायें,
बारीक कतरे टमाटर प्याज चुकंदर के जूलियन लच्छे कद्दूकस करके मिला लें और
हरी मिर्च धनिया और एक चम्मच मनपसंद तेल या घी फिर हलका नमक और कालीमिर्च
मिला लें बढ़िया सलाद तैयार हो जायेगा
11-


लौकी को तुलसी के पत्तों के साथ
उबालकर अर्क पीने से बंद धमनियाँ खुल जाती हैं
12-
लौकी की भुजिया बनाते समय अन्य
हरी सब्जियाँ भी मिक्स करके ""मिक्स
बेज बना सकते हैं
©®सुधा राजे


Friday, 5 September 2014

सुधा राजे की गज़ल :- सहेली आज हूँ बिलकुल अकेली

Sudha Raje
Sudha Raje
सहेली आज हूँ बिलकुल अकेली इस हवेली में

ये केवल नाम का घर है खिलौनों का नगर
कोई।

मैं कठपुतली हूँ जैसे
नाचती गाती तमाशा हूँ ।

सज़ावट करके पिछली साँझ दर पर धर
गया कोई।

हँसी थी आसमां भर की जमीं भर के सफ़र
भी थे ।

उङ़ानें थी खला भर की कटा पर शाह-पर
कोई ।

ये नगमातो ग़ज़ल
गीतों तरानों का बहाना है ।

फ़साना है
कहा सा अनकहा बहरो बहर कोई।

समाता ही नहीं है औऱ्
सहा जाता नहीं फिर भी।

सिसककर मुसकराता दिल ।
कहीं ग़ुस्ताख़
सर कोई ।

नहीं होगा बयां ये दर्द अब हमसे
नहीं होगा ।

नये औराक़ नई स्याही न
हो ।
दे दे ज़हर कोई।


ये वो ही खाक़ है चुपके सँभाला है जिसे
बरसों ।

बिखर ना जाये छूने से जला यूँ उम्र भर
कोई ।

रहा हर पांव मंज़िल के सफ़र पे बे सबब
बेहिस।

हैं आदमख़ोर ख़ुम फिर भी जिया है डूबकर
कोई ।

चले जायेंगे बस यूँ ही ज़रा कुछ देर ठहरे हैं


निदां आयी है मिट्टी को जगा है रात
भर कोई।

मरेगा कौन से असलाह से ये तो सुधा बोले
। ये यकतां ख़्वाब जो अब तक बचा है आँख
पर कोई।
©®SudhaRaje

सुधा राजे की गजलें :- कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं।

Sudha Raje
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ऐ दिल!!!!!
सहने दे ।
मुश्क़िल है अंज़ुमन में आना ,अब,मुझे
अकेला रहने दे।
कुछ ग़म ख़ामोश पिये जाते हैं पीने दे औऱ्
ज़ीने दे ।
कुछ ज़ख़्म छिपाये जाते है,, ख़ुद चाक़
ग़रेबां सीने दे।
बेनुत्क़ तराने ऐसे कुछ बे साज़ बजाये जाते
हैं
कुछ अफ़साने चुपचाप दर्द, सह सह के
भुलाये जाते हैं ।
हर साज़ रहे आवाज़ रहे ।ख़ामोश!!!!न आँसू
बहने दे
।।।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं । ऐ
दिल!!!!!!
सहने दे ।
कुछ यादें होतीं ही हैं बस दफ़नाने और
भुलाने को ।
हर बार कोई कब होता है देकर आवाज़
बुलाने को ।
कुछ पाँव पंख घायल पागल बेमंज़िल मक़सद
चलते हैं ।
कुछ तारे चंदा सूरज हैं चुपचाप पिघल कर
जलते हैं ।
कुछ ज़ख़्म लगे नश्तरो-,नमक बे मरहम हर
ग़म
ढहने दे ।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ।। ऐ
दिल!!!!!
सहने दे ।
©सुधा राजे ।।
Sudha Raje
©सुधा राजे ।
Sudha Raje
©®¶

उल्फत उल्फ़त छलक रही थी जिन
आँखों की झीलों में ।
उनके भरे समंदर जिनमें
वहशत वहशत रहती है ।
इक दीवाने आशिक़ ने इक रोज़
कहा था चुपके से ।
मेरे दोस्त तेरे दम से दम हरक़त हरकत
रहती है ।
हुये बहुत दिन शहर बदर
थीं मेरी नज़्मों यूँ शायर ।
इस पहलू में दिल के भीतर ग़ुरबत गुरबत
रहती है ।
काला जादू डाल के नीली आँखें साक़ित कर
गयी यूँ ।
दिल का हिमनद रहा आँख में फ़ुरक़त फ़ुरक़त
रहती है।
ग़म का सहरा दर्द की प्यासें ज़ख़म
वफ़ा के गाँव जले ।
क़ुरबानी के रोज़ से रिश्ते फुरसत फुरसत
रहती है ।
झीलों की घाटी में वादी के पीछे
दो कब्रें हैं ।
जबसे बनी मज़ारे घर घर बरक़त बरकत
रहती है।
दीवारे में जब से हमको चिन गये नाम
फरिश्ता है ।
वो अब जिनकी ज़ुबां ज़हर थी इमरत
इमरत रहती है ।
सुधा"ज़ुनूं से डर लगता है । अपने बाग़ीपन
से भी ।
दर्द ज़जीरे सब्ज़ा हर सू । नफ़रत नफ़रत
रहती है ।
©सुधा राजे

वो सूखी डाल पे
नन्ही हरी पत्ती लजायी
सी

जो देखा आपने हँसकर,
लगी फिर
मुँह दिखायी सी।
लगा फिर
आईना मुझको बुलाने अपने साये में,।
सुनी जब आपके होठों ग़ज़ल
मेरी बनायी सी ।
लगी वो फिर शक़ीला इक़ गुलाबी फूल
को तकने ।
शहाना शोख़ चश्मी से
झरा जैसे बधाई सी।
बजे हर तार दिल का आपकी आवाज़ सुनकर
यूँ ।।
नदी की धुन समंदर के हो सीने में समाई
सी।
न भूला दिल सरो-अंदाम
ज़लवा आपका पहला ।
ख़ुमारी फिर वही चेहरे पै सेहरे के सगाई
सी ।
हमारी उम्र फ़ानी ये दिलो ज़ां बस
निशानी है ।
हमारी रूह में ख़ुशबू मुहब्बत
की बनायी सी ।
सरकती रात की चादर वो ढलते लाज के
घूँघट।
हज़ीं वो ज़ां सितानी ज़ां पे बनती याद
आई सी।
असीरी उम्र भर की है
सुधा किश्वर क़फस नफ़सी।
क़यामत हो कि ज़न्नत आपके पहलू समाई
सी ।
©Sudha Raje
©®©SUDHA Raje


सुधा राजे की गजलें

हर एक शख़्स मोहब्बत का दम
नहीं रखता।
दर्द आमेज़ राह पर क़दम नहीं रखता ।
वो एक शै कि जिसे इश्क़ कहा करते हैं ।
ख़ुदा के बाग़ में हव्वा अदम नहीं रखता।
जिसे है कुछ भी तमन्ना ज़हां में पाने की।
वो अपने दिल में युँ क़ाफ़िर सनम
नहीं रखता।
ये लौ है ऐसी बुझाओ तो औssर भङके है ।
विसाले यार की हसरत ये ग़म
नहीं रखता ।
कहाँ वो शख़्स जिसे
ज़िन्दग़ी सुधा समझा।
हमारे मर्ग़ पे भी आँख नम नहीं रखता।
वफ़ा की ज़िद में कोई आग़ से नहाये ज्यूँ ।
दुआ को जिसके कोई है वहम नहीं रखता ।
©®सुधा राजे

मैंने सबकुछ दाँव लगाकर
हारा जिसको पाने में ।।
वही इश्क़ लेकर आया अब दर्दों के मयखाने
में ।।
दिल पर ऐसी लगी ,कि सँभले बाहर,,
भीतर बिखर गये ।।
पूरी उमर गँवा दी हमने बस इक घाव
सुखाने में ।।
अक़्सर बिना बुलाये आकर
जगा गयीं पुरनम यादें ।। दर्द
रेशमी वालिश रोये पूरी रात सुलाने में
।।
अपना बोझ लिये गर्दन पर कब तक ज़ीते
यूँ मर गये ।।
एक ज़नाजा रोज उठाया ।
अपने ही ग़मखाने में ।।
ता हयात वो खलिश नहीं गयी चार लफ्ज़
थे
तीरों से ।।
जलते थे औराक़ लबों पर जलती प्यास
बुझाने में ।।
आहों के अंदाज़ दर्द के नग्मे खुशी भर
गाता
।।
कितने दरिया पिये समंदर । दिल -
सहरा को बहलाने में ।। नदी रेत में
चली जहाँ से
भरी भरी छलकी छलकी ।।
सबको मंज़िल मिले नहीं था ये आसान
ज़माने में ।।
शायर जैसी बातें करता पागल कमरे के
अंदर ।।
ले गये लोग शायरी पागल फिर
भी पागलखाने में ।।
कभी यहीँ पर एक रौशनी की मीनार
दिखी तो थी ।।
हवा साज़िशे करती रह
गयी जिसको मार गिराने में । ।
मर मर कर ज़िंदा हो जातीं प्यासी रूहें
रात गये ।।
सब आशोब तराने गाते है
डरना बस्ती जाने में ।।
हाथ न छू इक ज़मला बोली
"""ये मेंहदी है जली हुयी""" ।। मौत मेरे
दरमियाँ कसम है तुझको गले लगाने में।
मुट्ठी में भर आसमान ले बाहों में
जलता सूरज ।
सुधा चाँद की नींद खुली तो टूटे ख़ुम
पैमाने में
©®¶©®¶
सुधा राजे
sudha Raje
पूर्णतः मौलिक रचना सर्वाधिकार
लेखिका सुधा राजे बिजनौर /दतिया



सूख रहे ज़ख़्मों पर नश्तर - नमक लगाने आते
हैं।
भूल चुके सपनों में अपने से आग जगाने आते हैं।
किसी बहाने किसने कैसे कितनी कट
गयी कब देखा
बची हुयी दर्दों की फसलें लूट चुराने आते
हैं ।
उफ् तक कभी न की जिन होठों से पी गये
हालाहल सब ।
सुधा उन्हीं पर गंगा जमुना सिंध बहाने
आते हैं।
आज़ न बहे जो गूँगे आँसू दरिया आतश
का अहबाबों अलविदा ज़माने बाँध
गिराने आते
हैं ।
एक लम्स भर
जहाँ रौशनी ना थी वहीं ग़ुज़र कर ली ।
हमको तिनके तिनके मरकर अज़्म बनाने
आते
हैं।
कौन तिरा अहसान उठाता खुशी तेरे
नखरे ।
भी उफ्
हम दीवाने रिंद दर्द पी पी पैमाने आते
हैं ।
आबादी से बहुत दूर थे फिर भी खबर
लगा ही ली ।
कोंच कोंच कर दुखा दिया फिर
दवा दिखाने आते हैं। वीरानों की ओर ले
चला मुझे नाखुदा भँवर भँवर।
जिनको दी पतवार वही तो नाव डुबाने
आते हैं।
अंजानों ने मरहम दे घर नाम न पूछा मगर
हमें ।
जानबूझ कर डंक चुभोने सब पहचाने आते हैं

मासूमी ही था कुसूर बस औऱ्
वफ़ा ही गुनह मिरा।
हमको सिला मिला सच का ग़म यूँ समझाने
आते हैं।
©सुधा राजे ।

कि जैसे छू लिया तूने ।
हवा शरमायी सी क्यूँ है ।
ख़ुमारी तेरी आँखों में अभी तक
छायी सी क्यूँ है ।
बहुत संज़ीदग़ी से बर्गो -शाखो-ग़ुल
को छूती है।
चमन में आई तो तेरी तरह
अलसायी सी क्यूँ है।
नज़र लब ज़ुल्फ़ सब इतने इशारे ये तबस्सुम
क्यूँ ।
लगे तेरी तरह मयनोश ये घबरायी सी क्यूँ
है । ।
बहक़ कर लग्जिशे पा फिर सँभल कर
गुनगुनाती सी ।

अदा भी है अदावत भी ये यूँ अँगङाई
सी क्यूँ है।
सुधा वो शोख बातें सरसराती गोशबर
ख़ुशबू ।
तेरे आग़ोश में ग़ुम कसमसाती आई सी क्यूँ है।

©सुधा राजे Sudha Raje

आग के फ़र्श पे इक रक़्श किये जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिंद पिये जाती है ।
इक जरा छू दें तो बस रेत
सी बिखरती है ।
एक दुल्हन है जो हर शाम को सँवरती है ।
एक शम्माँ जो अँधेरों को जिये जाती है ।
दर्द रिंद के मानिंद पियेजाती है । कुछ
तो सीने में बहकता है दफ़न होता है । आँख
बहती भी नहीं बर्फ़ हुआ सोता है ।
तन्हा वादी में छिपे राज़ लिये जाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

जो भी मिलता है धुँआ होके सुलग जाता है

इश्क़ है रूह है आतश में जो नहाता है ।
अपनी ही धुन में वो शै क्या क्या किये
जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

सख़्त पत्थर की क़लम है कि वरक़ वहमी हैं

कितनी ख़ामोश जुबां फिर भी हरफ़
ज़ख्मी हैं

ज्यों सुधा दश्त-ए-वहशत में दिये बाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है
©®सुधा राजे


सुधा राजे की रचनायें -"पेट में बच्चा नहीं बाबू किसी का पाप है"

Sudha Raje
Sudha Raje
पेट में बच्चा नहीं बाबू किसी का पाप है
???????
पर वो पगली क्या बताये
कौन इसका बाप है!!!!
रात को फुटपाथ
पर सोयी बिछाकर
वो ज़मीं
आसमां नोचे
गया किसको यहाँ
संताप है
???
चार दिन से कुछ
नहीं खाया जलेबी
लूट गयी
देह मैली किंतु औरत
का बदन अभिशाप है
कोई
भी उसका नहीं छूता कटोरा भीख का
खा गये हैवान जिसकी
रूह तक हम आप है
कौन थे वो लोग जो इक
रात इसको छोङ गये
एक तो लङकी वो भी पागलअभागिन शाप
है
खूब चिल्लायी वो रोयी
कोई भी जागा नहीं
बस सुनी गयी रात
कई-कई
जोङियाँ पदचाप है
पेट लेकर घूमती थी
रोज पत्थर मारती
मर्द को देखे तो चीखे साँपअल्ला साँप है
खूब हँसते हैं तमाशाई दुकानें खोलकर
चीथङों पर रक्त
देखो तो कलेजा काँप है
प्यार से
दो रोटियाँ कपङा दिया तो रो पङी
दर्द है बोली बहूजी
औऱ् बदन में ताप है
कल छप़ा अखबार में
बच्चा जना फुटपाथ पर
अब लिये हँसती है रोती क़ल्मा है
या जाप है
भेङियों की नस्ल के
वहशी हैं बस्ती में छुपे
कौन है अगला निशाना
खोजते नई माप है
आप नैतिकता की बातें
धूप में समझा रहे??
रात ने क्या डँस लिया
क्या इसका पश्ताचाप है
कौन पालेगा ये पागल
कोख का फल पाप का??
क्यों तुम्हारी संस्कृति में जात मजहब
खाँप है???
अब भी उस पर गीध वाली
घूरतीं नज़रें कई
कोई जो आता निकट
वो चीखती आलाप है
क्या समाजों की दुहाई?? सभ्यता इंसाफ
क्या
हम जरा सा रो लिये बस
आप भी चुपचाप हैं
क्या कभी सोचा "हरामी"
शब्द का क्या अर्थ है??
क्या बनेगा ये बढ़ा होकर कोई अनुमाप
है??
कौन??? पूछेगा सुधा ये
कौन मजहब धर्म था???
उफ कि बस कैसे कहूँ
वो पापिनी निष्पाप है
©®¶©®
Sudha
Raje
Dta★Bjnr
Mar 5
Oct 25, 2013
Sudha Raje
Sudha Raje
Sudha Raje
सोच के देखो जला गाँव घर कैसा लगता है

मरता नहीं परिन्दा 'बे -पर
कैसा लगता है ।
जिन को कोई
डरा नहीं पाया वो ही राही।

मार दिये गये मंज़िल पर डर
कैसा लगता है ।
आदमखोर छिपे
बस्ती में ,,अपने अपने घर ।
अपनों से मासूम हैं थर थर कैसा लगता है ।
अभी शाम
को ही तो कंघी चोटी कर
भेजी ।
सङी लाश पर नोंचा जंफर
कैसा लगता है ।
इश्क़ मुहब्बत प्यार
वफ़ा की लाश पेङ पर थी।
श्यामी का फाँसी लटका
"वर 'कैसा लगता है ।
चुन चुन कर सामान बाँध
कर रो रो विदा किया ।
जली डोलियों पर वो जेवर कैसा लगता है

बाबुल
का सपना थी वो इक
माँ की चुनरी थी ।
शबे तख़्त हैवान वो शौहर कैसा लगता है

छोटे बच्चे आये बचाने
माँ जब घायल थी ।
वालिद के हाथों वो खंज़र कैसा लगता है

जाने कब खा जाये लगाना फिर भी रोज
गले ।
रिश्तों के जंगल में अजगर कैसा लगता है ।
सुधा कहानी कब
थी उसकी सुनी गुनी जानी।
हुआ बे क़फन ज़िस्म वो मंज़र कैसा लगता है
।???????
©Sudha Raje
©सुधा राजे।
Oct 27, 2013
Sudha Raje
Sudha Raje
किरचें टुकङे तिनके क़तरे
रेज़ा रेज़ा आईना ।
दिल सी हस्ती ग़म सी बस्ती चाक़
कलेजा आईना।
रूह की गहरी तहों में बैठा हर पल शक़्ल
दिखाता सा।
कभी चिढ़ाता कभी रूलाता किसने
भेजा आईना।
जब भी दिखा दिया अहबाबों को, सारे
ही रूठ गये।
राहत का तकिया हमको था
उनको नेज़ा आईना।
जिस दिन से पीछे से उसने ग़ौर से
देखा था चुपके ।
क़दर बढ़ गयी इसकी तबसे अब *आवेज़ा-
आईना।
जो कोई ना देख सके ये
"सुधा" वही दिखलाता है।
या तो इसको तोङ फोङ दूँ या रब। ले
जा आईना।
लगा कलेजे से हर टुकङा नोंक ख्वाब
की सूरत सा।
टुकङे टुकङे था वज़ूद
भी युँही सहेज़ा आईना ।
जब तक कोई तुझे न तुझ सा दिखे रूह
की राहत को ।
तब तक तनहा तनहा यूँ ही मिले गले
जा आईना ।
मंदिर की देहली पर जोगन ,,जोगन
की देहली मोहन ।
मोहन की देहलीज़ ये टूटा जगत् छले
जा आईना ।
दागदार चेहरे भी हैं इल्ज़ाम आईने पर
ऱखते ।
जितना तोङे अक़्श दिखाकर ख़ाक मले
जा आईना ।
चुभी सचाई लहू निकल कर चमक उठे
**औराक़ भी यूँ ।
तोङ के जर्रों में फिर नंगे पाँव चले
जा आईना ।
©®Sudha Raje
Dta/Bjnr
Apr 13
आवेज़ा =झुमका
औराक़=पृष्ठ
Oct 27, 2013
Sudha Raje
Sudha Raje
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की।
अम्माँ मर गई पर कैं आ
गयी जिम्मेदारी भाई
की।
कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की।
आठ बरस की उमर
अठासी के
बाबा
अंधी दादी।
दो बहिनों की ऐसों
करदी बापू ने जबरन शादी।
गोदी धर के भाई हिलक के
रोये याद में माई की।
कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की।
चाचा पीके दारू करते
हंगामा चाची रोबै।
न्यारे हो गये ताऊ चचा सें बापू बोलन
नईं देबे।
छोटी बहिना चार साल
की
उससे छोटी ढाई की।
कैसे इतनी व्यथा सँभाले
बिटिया हरखूबाई की।
भोर उठे अँगना बुहार कै बाबा कहे
बरौसी भर।
पानी लातन नल से तकैँ।
परौसी देबे लालिच कर।
समझ गयी औकात
लौंडिया जात ये पाई
-पाई की..
कैसे इतनी व्यथा सॅभाले बिटिया हरखू
बाई की।
गोबर धऱ के घेर में
रोटी करती चूल्हे पे रोती।
नन्ही बहिन उठा रई
बाशन
रगङ राख से वो धोती।
बापू गये मजूरी कह गये
सिल दै खोब
रजाई की।
कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की।
भैया के काजैं अम्माँ ने कित्ती ताबीजें
बाँधी।
बाबा बंगाली की बूटी
दादी की पुङियाँ राँधी।
सुनतन ही खुश हो गयी
मरतन ""बेटा ""बोली दाई
की।
कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की।
जा रई थी इसकूल रोक दई
पाटिक्का रस्सी छूटे।
दिन भर घिसे बुरूश
की डंडी।
बहिनों सँग मूँजी कूटे
दारू पी पी बापू रोबै
कोली भरैं दुताई की।
कैसें इतनी व्यथा सँभालै
बिटिया हरखूबाई की।
बाबा टटो टटो के माँगे
नरम चपाती दादी गुङ।
झल्ला बापू चार सुनाबै
चाची चुपके कहती पढ़।
छोटी बहिन
पूछती काँ गई
माई!!! रोये हिलकाई की
कैसे इतनी व्यथा सँभाले बिटिया हरखू
बाई की???? ©®¶¶©®¶Sudha Raje
Datia --Bij
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सुधा राजे की रचनायें -""मन के वन को जेठ ज़िंदगी

Sudha Raje
Sudha Raje
मन के वन को जेठ जिंदगी
सावन बादल तुम साजन!!!!
थकते तन को मरुथल सा जग मनभावन जल
तुम साजन!!!!
पाँव के नीचे तपी रेत पर छल के गाँव
सभी नाते ।
कङी धूप में हरा भरा सा शीतल अंचल तुम
साजन!!
आशाओं के शाम सवेरे दुपहर ढलकी उम्मीदें

निशा भोर से पंछी कलरव चंचल- चंचल तुम
साजन ।
सुधा परिस्थियों के काँटे नागफनी के दंश
समय
हरे घाव पर चंदन हल्दी रेशम मलमल तुम
साजन!!!
डरे डरे दो नयन अँधेरों से रस्मों से
घबराये ।
स्मित अधर सरल आलिंगन । मंचल मनचल
तुम साजन
इकटक लक्ष्यबेध शर लेकर । मैं
भूली कर्तव्य सभी । मेरी सफलता पर
खुशियों के । नयना छल छल तुम साजन!!
®©¶सुधा राजे ।

दिल में कुछ होठों पर कुछ है कलम लिखे कुछ
और सुधा।
जहां न हो ये हलचल इतनी चल चल चल उस
ठौर सुधा।
कल तक थी उम्मीद रोशनी की घुटनों पर
टूट गयी।
अक़्श नक़्श ज्यों रक़्श दर्द का ये है कोई
और सुधा।
किसे समझ
आयेगा वीरानों का मेला कहाँ लुटा ।
कौन सजाये नयी दुकाने रहे परायी पौर
सुधा।
बाँध लिये असबाब बचा ही क्या था बस
कुछ गीत रहे।
भँवरी हुये सिरानी सरिता रही एक
सिरमौर सुधा।
©®Sudha Raje

सुधा राजे की रचनायें -"रात गये"

Sudha Raje
Sudha Raje
पत्थर चाकू लेकर सोये
गाँव शहर से परे हुये
रात पहरूये बरगद रोये अनहोनी से डरे
हुये
कब्रिस्तान और शमशानों
की सीमायें जूझ पङीं
कुछ घायल ,बेहोश ,तङपते
और गिरे कुछ मरे हुये
रात-रात भर समझाती नथ-
पायल ,वो बस धोखा है
ख़त चुपके से लिखे फ़गुनिया जब -जब सावन
हरे हुये
फुलझङियाँ बोयीं हाथों पर
बंदूकों की फसल हुयी
जंगल में जो लाल कुञ्ज थे
आज खेत हैं चरे हुये
बारीकी से नक्क़ाशी कर बूढ़े 'नाबीने
'लिख गये
पढ़ कर कुछ हैरान मुसाफिर रोते आँखे भरे
हुये
हिलकी भर कर मिलन
रो पङा
सूखी आँख विदायी थी
वचन हमेशा शूली रखे
चला कंठ दिल भरे हुये
ज्यों ज्यों दर्द खरोंचे
मेरी कालकोठरी पागल सा
मेरे गीत जले कुंदन से
सुधा "हरे और खरे हुये
©®¶¶©®¶SudhaRaje

Sudha Raje
Sudha Raje
पढ़ना सुनना आता हो तो पत्थर पत्थर
बोलेगा
जर्रा जर्रा,पत्ता पत्ता अफसानों पे
रो लेगा
वीरानों से आबादी तक
लहू पसीना महका है
शर्मनाक़ से दर्दनाक़ नमनाक़ राज़
वो खोलेगा हौलनाक़ कुछ हुये हादसे लिखे
खंडहर छाती पे
नाखूनों से खुरच
लिखा जो, इल्म शराफ़त तोलेगा कुएँ
बावड़ी तालाबों
झीलों नदियों के घाट तहें खोल रहे हैं
ग़ैबी किस्से पढ़ के लहू भी खौलेगा आसमान
के तले जहाँ तक
उफ़ुक ज़मी मस्कन से घर कब्रिस्तानों से
श्मशानों क्या क्या लिखा टटोलेगा चेहर
रिसाला
नज़र नज़र सौ सौ नज़्में हर्फ़ हर्फ़
किस्सा सदियों का वरक़
वरक़ नम हो लेगा
हवा ग़ुजरती हूक तराने अफ़साने
गाती सुन तो
"सुधा" थरथराता है दिल
भी ख़ूनी क़लम
भिगो लेगा
©सुधा राजे

रात गये .
Sudha Raje
जाने किससे मिलने आतीं ' सर्द हवायें
रात गये
बस्ती से आतीं हैं सिसकती दर्द कराहें
रात गये
दूर पहाङों के दामन में छिपकर सूरज
रो देता
वादी में जलतीं जब दहशतग़र्द निग़ाहें
रात गये
चाँद को लिख्खे चिट्ठी
ठंडी झील बरफ के
शोलों पे
ख़ामोशी से कोहरे की
फैली जब बाँहे रात गये
परबत के नीचे तराई में हरियाली चादर
रो दी
फूलों कलियों की गूँजी
जब गुमसुम आहें रात गये
कितने आदमखोर मुसाफिर रस्ते से गुजरे
होंगे
मंज़िल तक जाने से डर गयीं लंबी राहें
रात गये
पेङ तबस्सुम नोंच के खा गये नाजुक
नन्ही बेलों के
धरती रोती शबनम भरके
मौत की चाहें रात गये
प्यार वफ़ा के गाँव में अमराई
पर लटकी लाशें थीं
सुधा" मुहब्बत छोङ के चल
दी
पीपल छाँहे रात गये
©®¶©®¶SudhaRaje



सुधा राजे की रचनायें '''भूख "मुहब्बत ''और लङकियाँ

Sudha Raje
Sudha Raje
भूख जब हो गयी मुहब्बत से बङी ऐ
ज़िंदग़ी!!!!!!!
बेचकर जज़्बात लायी भात
मैं तेरे लिये
दिल से ज्यादा पेट में जब
आग हुयी ऐ बंदग़ी!!!!!!
ख्वाब
सी पिसता रही दिन
रात मैं तेरे लिये
बुतपरस्ती से
ख़ुदा मिलता न था ,रोज़े से भी
रोटियों लिखती रही सफ़हात मैं तेरे
लिये
टूटती रह गयी बदन
की ख्वाहिशें पर्दों में यूँ बिक
गयी थी रेत सी हर
रात मैं तेरे लिये
आग लग गयी जब मेरे
रिश्तों के पुल पर ,भीङ थी
तैरती मुर्दों पे थी हालात मैं तेरे लिये
गाँव में गुरबत के जब सैलाब आया दर्द का
छोङ गये सब हाथ
खाली हाथ मैं तेरे लिये
हुस्न के परतौ पे आशिक़ भूख का मारा हुआ
नाचती रह गयी सङक
अब्रात मैं तेरे लिये
बस ज़ने -फ़ासिद थी उल्फ़त पेट के इस दर्द
को
मौत लायी कोख पर ज्यूँ
लात मैं तेरे लिये
सब चले गये छोङकर कल तक
जो मेरे थे वली
कब्र या ससुराल औरत ज़ात मैं तेरे लिये
एक टूटा ये कटोरा ज़िस्म ,दीवारें क़बा
साँस माँगे भीख ज्यूँ ख़ैरात मैं तेरे लिये
चंद टुकङे काग़जों के कुछ निवाले अन्न के
चंद चिंथङे ये
सुधा "औक़ात मैं तेरे लिये
चाँद तारे फूल तितली इश्क़ और शहनाईयाँ
पेट भरने पर हुयी शुहरात मैं तेरे लिये
किस नदी की रूह
प्यासी हूँ मैं सबकी प्यास में
रेत पी गयी शायरी क़ल्मात मैं तेरे लिये
चंद गीली लकङियों पर
आखिरी कुछ रोटियाँ
जोहते बच्चे हुयी शह -मात मैं तेरे लिये
बाप था ज्यादा कि बेटा कौन
भूखा क्या पता
खा गयी चोरी से आलू
सात मैं तेरे लिये
आज तक तो रोज
मिलती रह गयी उम्मीद
सी
आयी ना खुशियों की वो बारात मैं तेरे
लिये
सब कुँवारे ख़्वाब पी गयी इक
ग़रीबी की हिना ।
तीसरी बीबी सुधा ग़ैरात मैं तेरे लिये
©®¶©®¶

यह रचना पूर्णतः मौलिक है अंश या पूर्ण
नकल आपराधिक मानी जायेगी all right
®©™

Sudha Raje
माचिसों में
तिलमिलाती आग सी ये लङकियाँ
माँओं के
ख्वाबों की खिङकी ताज
सी ये लङकियाँ
कालकोठी में
पङीं जो भी तमन्ना खौफ़
से
उस अज़ल का इक मुक्म्मिल राज़ सी ये
लङकियाँ
तोङकर डैने
गरूङिनी हंसिनी के
बालपन
हसरतें छू ती ख़ला परवाज़ सी ये लङकियाँ
घूँघटों हिज़्जाब में घुट गयीं जो चीखें हैं
दफ़न
वो उफ़ुक छूती हुयी आवाज़ सी ये लङकियाँ
ग़ुस्ले-आतश में
हुयी पाक़ीजगी के
इम्तिहाँ
इंतिहा उस दर्द के अंदाज़ सी ये लङकियाँ
आह में सुर घुट गये
रोटी पे मचली नज़्म के
तानपूरे औऱ् पखावज़
साज़ सी ये
लङकियाँ
अक्षरों चित्रों सुरों छैनी हथोङों की दफन
जंग खायी पेटियों पर
ग़ाज सी ये लङकियाँ
ग़ुमशुदा तनहाईयों में दोपहर की नींद सी
एक
बिछुङी सी सखी ग़ुलनाज़
सी ये लङकियाँ
दहशतों की बस्तियों में रतजगे परदेश के
पंछियों सँग भोर के आग़ाज सी ये लङकियाँ
वंशदीपक दे न पाने पर
हुयी ज़िल्लत लिये
कोख दुखते ज़ख़्म पर हिमताज़ सी ये
लङकियाँ
रूखसती के बाद से
हो गयी परायी धूल तक
गाँव से
लाती वो पाती बाज़
सी ये लङकियाँ
सब्र की शूली पे
जिंदा ठोंक
दी गयी हिम्मतें
बाईबिल
लिखती सुधा अल्फ़ाज
सी ये लङकियाँ
©®¶©®Sudha
Raje
Dta★Bjnr
©®¶©®
Sudha Raje
Dta★Bjnr



सुधा राजे का लेख:- रजस्वला 'जननी या अपवित्रा???



स्त्री ::रजस्वला ',जननी या अपवित्रा?
"""""""""सुधा राजे "का लेख '
"""""
नारी हो, नर हो, किन्नर हो, मानव मात्र का शरीर, मज्जा अस्थि मांस वसा
रक्त नाङियाँ सब बिलकुल सब जिस मूल पदार्थ से निर्मित है वह है माता का
रजरक्त ',',और कैसी विडंबना आज भी गरीब के घर जब लङकी रजस्वला होती है तो
माता दादी ताई माथा ठोंक कर पछताती है ""हाय दईया अब तो 'कथरी, दुताई,
गुदङी, दरी, खोल, लिहाफ, थैले, पोंछे बिछौने को भी चींथङा नहीं बचेगा!!!
""
दुनिया रॉकेट साईंस की बात करे या बुलेट मेट्रो ट्रेन की, 'हम बात करना
चाहते हैं उस क्रूर सच की ',जिसमें आज इक्कीसवीं सदी तक म में भी
"स्त्रियाँ कमर में एक धज्जी बाँधकर, एक चिंथङे में कभी मैले रद्दी कपङे,
कभी बेकार पङी कतरन, कभी रद्दी अखबार कागज, कभी खराब पङी रुई, कभी सूखी
घास पत्ते राख और कभी, बेकार पङे स्पंज टाट जूट आदि को जाँघों के बीच
बाँध लेती हैं ताकि ',हर महीने होने वाला "रजस्राव का रक्त सोखा जा
सके!!!!!!!
हैं बेशक ढेर सारे ब्रांड बाजार में किंतु 'खरीदने की औकात? ""जिस देश के
माननीय, पच्चीस से पैंतीस रुपये दिहाङी कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर
मानते हैं ',उस के परिवार की पाँच स्त्रियों के लिये पच्चीस पैड हर महीने
हर स्त्री मतलब एक सौ पच्चीस पैड औसत आठ सौ रुपये प्रतिमाह!!!!!!
कितने परिवारों के बजट में स्त्रियों के प्रतिमाह के सेनेटरी नैपकिन हैं?
दाङी ब्लेड हेयर कटिंग, दारू अंडा, सब संभव है, किंतु आज भी अनेक लङकियाँ
सिर्फ इसलिये घर से बाहर नहीं निकलती पाँच सात दिन क्योंकि सेनैटरी
नैपकिन नहीं और जो पैड वे बाँधकर समय काटतीं है उसको हर घंटे बदलना पङता
है और डंप करना पङता है ',। कई कई बार धो धो कर सुखा कर फिर फिर वही वही
चिंथङा बाँध लेती हैं और ये दो चार टुकङे कपङे के बार बार सैकङों बार धो
कर रख दिये और उपयोग किये जाते रहते हैं साल साल भर तक भी!!!!!!
स्कूल दूर हैं, 'नाव से जाना बस से ऑटो से रेलगाङी से बैलगाङी
भैंसाबुग्गी ताँगे से या कई जगह तो तैरकर जाना पङता है ',!!ऐसी हालत
में कोई कैसे जाये ',??ऊपर से चाहे चाय सब्जी पसीने या कपङे का रंग ही
लग गया हो 'दाग 'देखते ही अजीब सी नजरें, 'ग्लानि अपमान लज्जा और
शर्मिंदगी का बोध कराते शब्द हाव भाव?? जैसे जानबूझ कर फस स्त्री ने ये
दुर्दान्त अपराध कर डाला हो?? रजस्वला होना स्त्री का गुनाह है? तो
रजस्वला हुये बिना जननी कैसे मिलेगी मानव को?
ये भयंकर रिवाज आज तक जारी है कि अनेक समुदायों में रजस्वला स्त्री को घर
के कोने में दरी चटाई डालकर अकेला छोङ दिया जाता है ',कोई पुरुष परिजन
नहीं देख बोल सकता, वे रसोई में भंडार में पूजा में भोज की कतार में,
पवित्र आयोजन में, नहीं जा सकतीं ।अनेक लोग घर की लङकियों को रजस्वला
होने पर घेर बाङी या करीब के बगीचे खेत या पिछवाङे कहीं फूस के छप्पर में
पाँच सात दिन तक रखते है, 'नेपाल झारखंड उङीसा आदि कई जगह ऐसा है कि लङकी
रजस्वला होने पर मामा छप्पर बनाता है नातेदार चादर देते है और विवाह
प्रस्ताव चालू हो जाते हैं । बेहद पढ़े लिखे लोग तक अनेक रजस्वला स्त्री
के हाथ का छुआ भोजन नहीं करते ', किंतु उसे अवकाश देने की बजाय घर के
निम्नकोटि के समझे जाने वाले कार्यों पर लगा देते हैं । रजस्वला के रक्त
को लेकर तमाम जादू टोने टोटके किये जाते हैं ।और रजस्वला को भूत प्रेत
बाधा होने के डर से भयभीत कराया जाता है । ऐसा माहौल बना दिया गया है कि
रजस्वला होना गंदी बात घोर पाप गुनाह और बोलने बतियाने समझने समझाने नहीं
वरन छिः छिः कहकर दुत्कारे जाने वाली बात है ',। प्याज पर सरकार गिराने
और पेट्रोल पर जाम लगाने वाले क्रांतिकारी देश की लङकियाँ ",,सेनेटरी
नैपकिन अंडवीयर और टॉयलेट के अभाव में ''श्वेत प्रदर, ल्यूकोरिया,
अंडाशय, बच्चेदानी, फैलोपिन ट्यूब के कैंसर, खुजली, संक्रमण "गुप्तरोग,
और मौत तक का शिकार हो जाती है ",,बाँझ तक हो जाती है, 'कोई बोलना तक
नहीं चाहता!!!!! क्यों?? क्योंकि ये कोई जरूरी मुद्दा नही?? माता स्वस्थ
नहीं होगी तो स्वस्थ पीढ़ी के नर नारी होंगे कहाँ से? सरकार चाहे जो भी
दावे करे आँखों देखा सच यही है, 'कि बाढ़ पीङित शिविर में जब गाँव वालों
के बीच पुकारने पर भी कुछ बच्चियाँ स्त्रियाँ भोजन पैकेट लेने महीं आयीं
तब करीब जाकर पूछने पर कान में बम फटा "रुआँसी आवाज में वे बच्चियाँ पूछ
रहीं थी 'आंटी/ दीदी! कपङा है? जब डॉक्टर से पूछा तो लाचारी से हाथ खङे
कर दिये, 'कलेक्टर से पूछा एसडीएम से पूछा तो पता चला ""ये तो सोचा ही
नहीं?? क्यों नहीं सोचा साब!!!! लैपटॉप सोचा और सैनेटरी नैपकिन अंडरवीयर
टॉयलेट नहीं सोचा??? चादरें चंदा करके कैंप में भिजवाने के बाद आज तक
हृदय बेचैन है, 'इस देश में स्त्री देवी कामाख्या के रजस्राव को ताबीज
में धरने वाले लोग, लङकियों को आज तक नैपकिन मुहैया नहीं करा सके? जरूरी
नहीं कि ये ब्रांडेड हों, 'एन एस एस के गाँव सेवा के दौरान लङकियों को
देशी लँगोट पहनना और चौकोर रुमाल की तिकौनी बनाकर धुले साफ निःसंक्रमित
इस्तरी करे गये पुराने कपङे कतरन आदि से पैड बनाकर बाँधना सिखाया जो
'कमलाराजा हॉस्पिटल की
नर्सों से सीखा था । गाँव गाँव लघु कुटीर उद्योग की तरह सरल सस्ती तकनीक
से स्त्रियों के स्वयं सहायता समूहों, स्कूल, कॉलेज, आँगन बाङी, आशा,
प्रसूतिकेन्द्, और समाजसेवियों द्वारा हर स्त्री तक ये पैड नैपकिन
अंडरवीयर पहुँचाये जा सकते हैं । किंतु इसकी क्या गारंटी है कि पोषाहार
मनरेगा और चारा मिडडेमील की तरह घोटाला नहीं होगा?? भले ही रजिस्टर कुछ
बोलें अस्पताल के किंतु कुछ मँहगे प्राईवेट और महानगरीय अस्पतालों को
छोङकर, 'हर प्रसूति केन्द्र का यही आलम है कि, 'फिंगर चैकअप एक ही
दस्ताने से अनेक स्त्रियों का कर दिया जाता है ',गंदगी में प्रसव कराया
जाता है, और बोरी भरके कपङे ले जाने पङते हैं, 'आसन्न प्रसवा स्त्री को
जिनमें से भी आधे तो ',दाई रख लेती है स्ट्रेचर साफ करने के नाम पर ।
अकसर संक्रमण और समस्याये लेकर लौटतीं है स्त्रियाँ वहाँ से ।
जिस रज से मानव बना है उस रजस्वला से ऐसा भीषण बरताव??बाल विवाह की
कुप्रथा के पीछे भी यही सोच है कि लङकी रजस्वला होने लगे तो पिता को
प्रति वर्ष दौहित्रवध का पाप लगता है और कन्यादान का फल नहीं मिलता??
कब तक सहमी अपमानित और ग्लानिग्रस्त रहेगी रजस्वलायें? आपकी अपनी बेटी,
माता बहिन भाभी,
कब तक????
आखिर कब तक??
©®सुधा राजे



On 9/4/14, Sudha Raje <sudha.raje7@gmail.com> wrote:
> attachments
> On Aug 23, 2014 2:20 PM, "Sudha Raje" <sudha.raje7@gmail.com> wrote:
>
>> attachments
>> On Aug 23, 2014 2:11 PM, "Sudha Raje" <sudha.raje7@gmail.com> wrote:
>>
>>> लेख : स्त्री : दीवारों में घुटतीं चीखें '★घरेलू हिंसा *
>>> (सुधा राजे)
>>> आये दिन किसी न किसी स्त्री के चेहरे पीठ पेट हाथ पाँव पसली पर चोटें और
>>> नीले काले लाल कत्थई निशान दिखते है, कलाईयों में धँस कर टूटी चूङियाँ
>>> खींच कर तोङे केश और बहुत हद से जब बढ़ गयी बात तो टाँकें पट्टी और
>>> फ्रेक्चर की मरम्मत ',पूछो तो वही पुराने जवाब
>>> —""चक्कर खाकर गिर गयी, —फिट आ गया, —सीढ़ियों से फिसल गयी, —गाय भैंस ने
>>> मार दिया,!!!!!!!!
>>> स्टोव फट गया, —गैस लीक हो गयी?,जलती ढिबरी गिर गयी,!!!!!
>>> भूरी को मदन ने दारू पीकर रोज पीटा और जब वह पैर पकङ कर रोकने लगी तो
>>> घासलेट डालकर जला दिया, किंतु भूरी कहती है, ढिबरी गिर गयी!!
>>> सबिया के ऊपर जलती दाल की पतीली ससुर ने डाल दी, लेकिन वह कहती है कुकर
>>> का सेफ्टी वाल्व बस्ट हो गया!!!
>>> नंदिनी का पति गे है और बच्चे आई वी एफ से हुये, वह रोज बेदर्दी से उसके
>>> रूप जवानी पर चिढ़कर भोग न पाने की वजह से पीटता है कि आ तेरी जवानी
>>> निकालूँ,लेकिन वह बहाने बनाती रहती है, बेध्यानी में पाँव फिसल गया!!!!
>>> उस अभागिन के तो गुप्तांग में मिरची और दारू की बोतल डंडा तक ठूँस कर
>>> पीटा गया, फिर भी वह, मर गयी ये लिखकर कि अपनी मौत की वह खुद जिम्मेदार
>>> है!!!
>>> लवली को उपलों के बिटौङे में धरकर जला दिया गया, क्योंकि वह प्रेम करने
>>> लगी थी किसी लङके से!!
>>> और खेत फूँक कर कह दिया गन्ने में जलमरी!
>>> विनीता ने पिटाई के डर से 'रामगंगा में छलांग लगा दी!!! क्योंकि वह लङका
>>> पैदा नहीं कर सकती थी ।
>>> लक्ष्मी के बेटी पर बेटी होती गयीं और तीन बेटियों के बाद चार बार भ्रूण
>>> हत्या करवाकर जब लङका हुआ तो बच्चेदानी के कैंसर से मर गयी!!!
>>> शिक्षा" नाम की ही शिक्षा है उसका पति इस कुढ़न में रोज पीटता है कि वह
>>> "साली की तरह स्मार्ट पढ़ी लिखी और सुंदर क्यों नहीं!!!
>>> 'सुमेधा' का दोष ये है कि वह पिता से हिस्सा लेकर क्यों नहीं आती ताकि वह
>>> पति के बिजनेस को पूँजी दे सके!!!
>>> ममता केवल इसलिये मार खाती है क्योंकि दहेज में सामान कम मिला और छटी
>>> दशटोन छूछक राखी तीज में मायके वाले सोना चांदी रुपया कपङा बरतन नहीं
>>> देते!!
>>> माँ बाप मर गये भाईयों के पास कोई पुश्तैनी जमीन नहीं!!
>>> सबीहा, को बेल्ट पङते हैं क्योंकि "ठंडी "औरत है और मदीहा को घसीट घसीट
>>> कर इसलिये पीटा जाता है कि पति खाङी देश में जमकर रुपया कमा रहा है जो
>>> पहले गरीब था अब ये रुपया ससुर सास ननद देवर जेठ को चाहिये!!!!
>>> गुनाह कोई हो, नाम कोई, बस स्त्री होना ही सबसे बङी भूल है उसकी, उस पर
>>> भी भारतीय स्त्री ।
>>> चीखती रोती मदद की गुहार लगाती औरत की मदद भी कोई नहीं करता क्योंकि ""यह
>>> उस पति का पारिवारिक मामला है ""कह कर सब तमाशा देखकर स्त्री को उपहास और
>>> पुरुष को ""महामर्द ""की नजर से देखने के आदी हो चुके है ।
>>> ग़जब तो ये है कि कभी खुद हिंसा की शिकार रह चुकी औरतें तक किसी स्त्री
>>> पर रहम करने की बजाय पैरवी करने लगती है? मारो और मारो कि सारी अकङ निकल
>>> जाये, बहुत जुबान चलाती है, मार नहीं खायेगी? हिजङा है साला, लल्लू है
>>> साला, नपुंसक है साला, जोरू का गुलाम है पिंधोला है,!!!! क्यों? क्योंकि
>>> एक औरत की बोलती बंद नहीं कर पा रहा है? दबकर नहीं रहती? मर्दमार लुगाई
>>> है?
>>> ये हिंसा पालने से पहले से ही प्ाती है जब, लङकी अवांछित और लङका मनौती
>>> का जीव, 'ये लङके बचपन से ही बहिन निम्नकोटि का जीव है यह अचेतन अहसास
>>> पालकर बढ़े होते हैं । हनीमून के नशे के बाद, केवल घरेलू सेविका रह जाती
>>> है स्त्री,!! पुरुष को आदत है बचपन से बहिन भाभी माँ दादी से सेवायें
>>> लेते रहने की, 'पत्नी उन सबकी सेवाओं का बदला नहीं चुकाती तो "मार खायेगी
>>> "विरोध करेगी तो मार खायेगी, पत्नी का बाप दुनियाँ का सबसे घृणित जीव
>>> क्योंकि बेटी पैदा की है तो नदी की तरह लगातार धनापूर्ति क्यों नहीं
>>> करता??? और बीबी मायके वालों को गाली मजाक व्यंग्य के बहाने मनोबलात्कार
>>> का शिकार बनाना पति का हक??? "साला गाली है ससुरा गाली है और रिश्ते में
>>> तो हम तुम्हारे बाप लगते है गाली है, मजाक में भी "नानी मरती है "दादी
>>> नहीं । लोग परस्त्री माताजी कह सकते हैं किंतु परपुरुष को "पिताजी "नहीं
>>> ।
>>> घरेलू हिंसा के बीज दबे हैं इन सब सोशल प्रैक्टिस के पुराने रोग में ।
>>> भारतीय स्त्री सास ससुर देवर जेठ की हिंसा के विरोध में तो यदा कदा बोल
>>> लेती है किंतु महानगर की कुछ स्वावलंबी उच्च शिक्षिताओं को छोङ दें तो,
>>> कसबों नगरों गाँवों की स्त्रियाँ पति के विरोध में कभी खङी नहीं हो पातीं
>>> । चाहे वह पूरा राक्षस हो रोज बलात्कार करता हो, या नामर्द हो, या कभी
>>> प्रेम न कर सका परस्त्रीगामी!!!! हो, या चाहे बाँझ का कलंक लङकी ढो रही
>>> हो जबकि शुक्राणु पुरुष में न हो।
>>>
>>> घरेलू हिंसा कानून काफी नहीं सामाजिक अभ्यास में ढल चुकीं बर्बरतायें हर
>>> स्तर पर रोकनी होंगी,
>>> क्या आप तैयार है?????????
>>> ©®सुधा राजे
>>>
>>> On 8/18/14, Sudha Raje <sudha.raje7@gmail.com> wrote:
>>> > स्त्री और समाज।
>>> > लेख ::सुधा राजे
>>> > ***********
>>> > चार साल की एक बच्ची 'गाजियाबाद के
>>> > निर्माणाधीन मकान के तहखाने में चार
>>> > हिंस्र नरपशुओं द्वारा सामूहिक बलात्कार के
>>> > बाद गुप्तांग में प्लास्टिक
>>> > की बोतल ठूँस कर मरने छोङ दी जाती है, '
>>> > एक बच्ची स्कूल के बाथरूम में रेप करके छोङ
>>> > दी जाती है,गोवा
>>> > एक बच्ची को स्कूल बस ड्राईवर बस में रेप
>>> > करके फेंक देता है,मुंबई
>>> > एक बच्ची गैंग रेप के बाद झाङियों में
>>> > बिजनौर,
>>> > एक बच्ची सगे नाना द्वारा बलात्कार करके
>>> > मार डाली जाती है, भोपाल,
>>> > एक बच्ची माता पिता बूढ़े शेख को बेच देते हैं
>>> > निक़ाह के नाम पर वह खुद
>>> > को बलात्कार से बचाने के लिये कमरे में बंद कर
>>> > लेती है 'यूएई,
>>> > एक बच्ची की बहिन गैंग रेप से तंग आकर मर
>>> > जाती है और छोटी लङकी स्कूल से
>>> > घर जाने के नाम पर थरथराकर रोने लगती है
>>> > क्योंकि चाचा भाई पिता और उनके
>>> > दोस्त उसको रेप करते है!!!!!!!!!!!
>>> > """"""""किसी भी अखबार का स्थानीय
>>> > पृष्ठ ऐसी ही लोमहर्षक खूरेंज कहानियों
>>> > ने रँगा पुता मिलता है ।फिर भी रह जाती है
>>> > उन लाखों अभागिनों की कहानियाँ
>>> > जिनको खिलाने घुमाने पालने पोसने वाले हाथ
>>> > चाचा बाबा नाना मामा ताऊ फूफा
>>> > मौसा कजिन और तो और बङे भाई तक बचपन में
>>> > ही हवस का शिकार बना डालते
>>> > हैं!!!!
>>> > ये कहानियाँ कभी बाहर नहीं निकलतीं दम
>>> > घोंटने वाली हालत हो चुकी है समाज की ।
>>> > संस्कृति और सभ्यता की दुहाई देने वालों को ये
>>> > बातें अच्छी नहीं लगतीं
>>> > उठानी, किंतु इन को चुप रह कर
>>> > टाला नहीं जा सकता ।
>>> > क्यों, क्यों, क्यों आखिर क्यों, बच्चियों में
>>> > वासना और यौन संतुष्टि
>>> > खोजने लगे है 'हिंस्र नरपशु????
>>> > केवल एक ग्रास एक निवाला हवस
>>> > का पूरा करने का यौनआहार भर रह जाती है
>>> > किसी
>>> > के जिगर प्राण आत्मा का टुकङा लङकी?
>>> > केवल एक बार की यौन भूख को मिटाने
>>> > का सेक्स टॉय????
>>> > कैसी मानसिकता से गुजर रहे लोग होते हैं वे
>>> > जिनको मासूम अबोध नन्ही बच्ची
>>> > पर प्यार दुलार नहीं आता वरन, उसके जिस्म
>>> > में एक मात्र अंग एक "मादा
>>> > "दिखती है सारा शरीर नजर से गायब रहकर
>>> > वे उसको, भोग कर मार डालते
>>> > हैं!!!!!!
>>> > ऐसा तो पशु भी नहीं करते? ऋतुकाल और
>>> > यौवन के बिना किसी मादा को पशु भी
>>> > नहीं लुभाते!!
>>> > क्या है वह "कमजोर कङी जो एक पिता और
>>> > पिता तुल्य शिक्षक संरक्षक परिजन के
>>> > दिल दिमाग पर से
>>> > "नैतिकता "का सारा खोल तोङ डालती है ।
>>> > उसके संस्कार उसका
>>> > नाता मानवता रिश्ता अपराध बोध
>>> > कानूनी सजा सामाजिक बदनामी पाप और
>>> > ईश्वरीय
>>> > दंड तक का भय उसको नहीं रोक पाता?????
>>> > मतलब "वासना "सिर चढ़कर पागल कर
>>> > रही है ऐसे लोगों को और हम उम्र युवा
>>> > स्त्री पर हाथ डालने से अधिक कहीं आसान
>>> > लक्ष्य हो रही है मासूम अबोध
>>> > बच्चियाँ??
>>> > जो न तो गंदे स्पर्श का अर्थ समझ पाती हैं
>>> > और न ही टॉफी चॉकलेट खिलौना
>>> > प्रसाद दुलार आशीर्वाद को देने वाले के पीछे
>>> > छिपी भयानक वासना को, ।
>>> > ये किसी समाज के नैतिक खात्मे का लक्षण है
>>> > जब बच्चे बच्चे न रहकर लिंग
>>> > भेद के आधार पर नर या मादा कहकर अलग कर
>>> > दिये जायें ।
>>> > कोई समझे उस भयानक यातनादायी सोच
>>> > को जब एक माँ बच्ची को जन्म देने के
>>> > बाद, हर समय ये खयाल रखने लगे
>>> > कि कहीं पिता उसे एकांत में गोद न उठा सके?
>>> > कपङे न बदलवा सके,? अब इस सबको सोचने से
>>> > कैसे रोका जा सकता है?
>>> > लोग स्त्रियों के पहनावे और बाहर निकलने
>>> > को या जींस स्कर्ट बिकनी मोबाईल
>>> > डीप गले और स्लीव लेस को खूब कोसते हैं, मान
>>> > भी लें तो भी,
>>> > जीरो वर्ष से पंद्रह साल तक
>>> > की लङकी को किस अपराध में ये सब
>>> > सहना पङा?
>>> > उसमें न तो कोई यौवन न कोई यौन व्यवहार
>>> > न कोई पुरुषों को लुभाने दिखाने
>>> > लायक संचेतना?
>>> > जाहिर है
>>> > ये सब बहाने है । इन घिनौने अपराधों की जङें
>>> > छिपी है क्रूर मानसिकता में
>>> > जहाँ अमूमन तीसरे चौथे हर पुरुष
>>> > को लङका होने भर से वरीयता प्राप्त हो
>>> > जाती है और उस लङका होने भर से
>>> > नैतिकता उसकी जिम्मेदारी नहीं रह जाती
>>> > ।वह बचपन में ही भाभियों और
>>> > सहपाठी लङकियों को मजाक मजाक में छेङने
>>> > को
>>> > स्वतंत्र है ।
>>> > और किशोर होने तक
>>> > उसको जता बता दिया जाता है
>>> > कि लङकियाँ केवल लङकों के
>>> > यौन सुख और घरेलू सेवा के लिये ही बनी है ।
>>> > युवा होते होते उसको यौन संबंध बनाने
>>> > की पूरी आजादी मिल जाती है । वह अगर
>>> > लङकी छेङता पाया जाये, या किसी स्त्री से
>>> > सेक्स कर ले यह खबर घर वालों को
>>> > पता चल जाये तो कहीं तूफान नहीं आ जाता,
>>> > न कोई "नाक कटती है " न पगङी
>>> > उछलती है न चादर मैली होती है ।न सतीत्व
>>> > खंडित होता है ।
>>> > जबकि लङकी के केवल प्रेम या प्रेम तो दूर
>>> > लङकों से बोलचाल दोस्ती होने पर
>>> > तक आज भी अधिकांश की नाक कट जाती है।
>>> > हद से गुजर चुकी है स्त्रियों पर हिंसा
>>> > लेख का संबंध किसी एक व्यक्ति एक
>>> > स्थान या घटना से
>>> > नहीं बल्कि सदियों पुरानी सङी गली सोच
>>> > से है । और सोच तो बदलनी ही पङेगी ।
>>> > अब तक अगर सोच नहीं बदली तो वजह वे
>>> > उदासीन लोग भी हैं जो सोचते हैं उँह
>>> > मुझे क्या!! लङकी जिसकी वो जाने किंतु खुद
>>> > पर बीते तो
>>> > बिलबिलाते हैं ।
>>> > मुजफ्फर नगर दंगा हिंदू मुसलिम
>>> > नहीं था
>>> > एक ग्रुप के
>>> > आवारा लङकों का लङकियों से
>>> > बदत्तमीजी करना था जिसे कोई हक
>>> > नहीं था पढ़ने जाती लङकी को छेङने
>>> > का ।
>>> > दामिनी का और मुंबई की पत्रकार
>>> > बैंगलोर की कानून की छात्रा का रेप
>>> > कोई एक
>>> > अचानक घटा अपराध नहीं था ।
>>> > ऐसे कामपिपासु बहुत से हैं छिपे जगह
>>> > ब जगह जो नजर के सामने हैं
>>> > तो पहचाने
>>> > नहीं जाते ।
>>> > किंतु
>>> > ये क्यों ऐसा करते हैं??
>>> > वजह है मर्दवादी सोच
>>> > ये सदियों से चला आ रहा रिवाज
>>> > कि हर जगह औरत को खुद
>>> > को बचाना है और कोई
>>> > भी कहीं भी उसको मौका लगा तो छू
>>> > देगा भँभोङ देगा छेङ देगा ।
>>> > बलात्कार अचानक नहीं होते ।
>>> > एक
>>> > विचारधारा से ग्रस्त रहता है मनुष्य
>>> > जो समाज में रह रही है सदियों से कि
>>> > पुरुष
>>> > को किसी की लङकी को सीटी बजाने
>>> > आँख मिचकाने और इशारे करने गाने
>>> > पवाङे गाने और छू देने और
>>> > पीछा करने का हक है ।
>>> > यही
>>> > विचार जो भरा रहता है समाज के हर
>>> > अपराध के लिये ज़िम्मेदार है ।
>>> > आदमी रात को सङक पर ड्राईव कर
>>> > सकता है औरत नहीं
>>> > आदमी एडल्ट मूवी देखने
>>> > जा सकता है बालिग लङकी नहीं ।
>>> > आदमी घर से बाहर तक
>>> > किसी भी लङकी को अपने इरादे
>>> > जता सकता है लङकी नहीं ।
>>> > आदमी शराब पी सकता है हुल्लङ
>>> > पार्टी नाच गाना कुछ भी कर
>>> > सकता है औरत नहीं ।
>>> > अब
>>> > जबकि औरतें बाहर आ जा रही है और
>>> > रात दिन हर जगह मौजूद है तो
>>> > इसी
>>> > मर्दवादी मानसिकता से ग्रस्त लोग
>>> > केवल औरतों को रोकने की बात करते
>>> > हैं ।
>>> > जाने दो न????
>>> > चलने दो पार्क सिनेमा थियेटर
>>> > ऑफिस दफतर रेलवे स्टेशन बस
>>> > स्टॉप ।
>>> > कुछ साल पहले आनंद विहार बस
>>> > स्टॉप पर एक परिवार के साथ
>>> > रूकी स्त्री का
>>> > रेप हुआ था क्योंकि लोंग रूट की बस
>>> > चूक जाने से बीच यात्रा में रुकने की
>>> > नौबत आ गयी ।ट्रेन में हजारो केस
>>> > हो चुके ।
>>> > ये सब क्राईम नहीं हैं
>>> > एक
>>> > सोच है एक विचार है
>>> > एक मानसिकता है जो
>>> > समाज की ठेठ कट्टरवादी मर्दवाद
>>> > से ग्रस्त है जिसमें औरत मतलब
>>> > एक समय का भोजन
>>> > बस
>>> > और उसके साथ नाता रिश्ता कुछ
>>> > नहीं ।
>>> > मुसीबत हैं अच्छे पुरुष
>>> > वे
>>> > जो स्त्री के रक्षक और पहरेदार
>>> > और समर्थक हैं ।
>>> > ये अच्छे पुरुष भी इसी समाज का अंग
>>> > हैं और इनकी वजह से ही कन्फ्यूजन
>>> > फैलता है ।
>>> > अगर सब के सब खराब हों औरते
>>> > खत्म हो जायें ।
>>> > और दुनियाँ का झंझट ही निबट जाये
>>> > ।
>>> > और
>>> > गजब ये कि इन
>>> > अच्छों को अच्छी पवित्र औरते
>>> > चाहियें और वे जूझ रहे हैं
>>> > खराब पुरुषों से कि बचाना है समाज
>>> > परिवार और जोङे ।प्रेम
>>> > की अवधारणा और
>>> > प्रकृति ।
>>> > किंतु
>>> > बहुतायत पुरुष के दिमाग
>>> > का भारतीयकरण हो चुका ।
>>> > उदाहरण कि मध्य प्रदेश के एक
>>> > प्लांटेशन पार्क में स्वीडन
>>> > का साईक्लिस्ट
>>> > जोङा आकर टेंट लगाकर प्रकृति के
>>> > मनोरम जगह पर रहने की सोचता है ।
>>> > और प्रौढ़ स्त्री का गैंग रेप
>>> > हो जाता है । सब वनवासी अनपढ़
>>> > कंजर शराब
>>> > उतारने वाले लोग!!!!!
>>> > जरा सोचो
>>> > कि क्या भारतीय दंपत्ति पर्यटन पर
>>> > जाते समय बांगलादेश के किसी जंगल
>>> > पार्क
>>> > में टेंट लगाकर रूकते????????
>>> > नहीं रुकते!!!!
>>> > कभी नहीं!!!!
>>> > वजह?
>>> > क्योंकि भारतीय स्त्री को पता है
>>> > कि किसी अकेली जगह एक पुरुष के
>>> > सहारे
>>> > नहीं रुका जा सकता । और जान माल
>>> > से अधिक स्त्री के शरीर पर
>>> > आक्रमण की ही
>>> > आशंका संभावना डर ज्यादा है ।
>>> > लेकिन
>>> > स्वीडन में ऐसा डर नहीं था
>>> > लोग
>>> > नदी पहाङ जंगल कहीं भी पिकनिक
>>> > मनाने रूक जाते हैं ।
>>> > ये सबकी सोच नहीं ।
>>> > लेकिन सब चीखने लगे
>>> > दंपत्ति की गलती है कि सुनसान
>>> > जगह जंगल में क्यों टेंट लगाया???
>>> > वे लोग जंगल ही तो देखने आये
>>> > थे????
>>> > जब एक
>>> > पर्यटक से ऐसा बरताव होता है
>>> > तो क्या उम्मीद है
>>> > कि किसी वनवासी या गरीब
>>> > मामूली लङकी के साथ
>>> > किसी भी अकेली जगह क्या बरताव
>>> > होता है ।
>>> > राजधानी हो या कश्मीर
>>> > भारतीय
>>> > स्त्री कहीं भी अकेली सुरक्षित
>>> > नहीं और एक दो पुरुष के साथ भी
>>> > सुरक्षित नहीं परिचित देखकर ढाढस
>>> > बँधता है किंतु डर बराबर रहता है ।
>>> > क्या किसी सज्जन पुरुष को यह
>>> > अच्छा लगता है कि एक परिचित
>>> > लङकी पूछे कि
>>> > ""कहीं आप अकेला पाकर रेप
>>> > तो नहीं करोगे ""
>>> > नहीं लगेगा अच्छा लेकिन एक
>>> > अघोषित शक हर स्त्री लगभग सब
>>> > पुरुषो पर करने
>>> > को विवश है ।
>>> > आज माता अपनी बेटी को परिजनों के
>>> > बीच अकेली नहीं छोङती जब
>>> > कि बुआ दादी
>>> > ताई चाची घर पर ना हो ।
>>> > और यही हाल पिता का है वह सगे
>>> > भाई जीजा साढू किसी के घर
>>> > मेहमानी तक को
>>> > लङकियाँ भेजने से हिचकता है ।
>>> > बहुत
>>> > परीक्षा मन ही मन लङकी माँ बाप
>>> > और अभिभावक करते है कि वहाँ कौन
>>> > कौन है ।
>>> > और कितनी लङकियाँ है ।
>>> > लोग कैसे है
>>> > लङकी को खतरा तो नहीं तब
>>> > लङकी को होस्टल मेहमानी वगैरह
>>> > भेज पाते है ।
>>> > ये
>>> > औक़ात है बहुतायत पुरुष समाज की ।
>>> > वजह वही विचारधारा ।
>>> > विदेशों में लङकियाँ बीच पर लेटी है
>>> > तैर रही है और क्लबों में नाच रही है
>>> > और कार ड्राईव करके रात
>>> > को यात्रा कर रही है ।
>>> > चूम कर गले भी लग जाती है
>>> > परिचितोॆ के
>>> > लेकिन
>>> > बलात्कार का डर नहीं लगता
>>> > घुटनो तक की स्कर्ट और बिना बाँह
>>> > की मिडी पहन रखी है मगर
>>> > बलात्कार का डर
>>> > नहीं लगता ।
>>> > शराब पीकर गाती नाचती है लेकिन
>>> > बलात्कार का डर नहीं लगता ।
>>> > और
>>> > अगर वहाँ कोई किसी स्त्री को कुछ
>>> > प्रपोज करना चाहता है तो ये
>>> > स्त्री की
>>> > चॉयस है कि वह स्वीकारे
>>> > या अस्वीकार कर दे ।
>>> > भारतीय सहन ही नही करते!!!!
>>> > अस्वीकृति का प्रतिशोध तेजाब और
>>> > रेप से लेते हैं!!!!
>>> > और तमाम इलज़ाम अंततः औरत के
>>> > सिर पर
>>> > कि नैतिकता का ठेका तो औरत
>>> > का है?
>>> > मर्दवादी लोग
>>> > समझे न समझे मगर सामंजस्य
>>> > वादी समझने लगे है और अब ये
>>> > मिटाना चाहते हैं ।
>>> > किंतु अफसोस कि आज भी बहुत
>>> > सारी स्त्रियाँ मर्दवादी सोच बदलने
>>> > की बजाय
>>> > खुद को ""नारी वादी "नही हूँ ये ।
>>> > साबित
>>> > करने के चक्कर में अंधाधुन्ध
>>> > ऐसी विचारधारा हटाने की बजाय
>>> > कुरेदकर
>>> > पहाङ काटना चाहती है औरतों पर
>>> > ही प्रतिबंध की पक्षधर है ।
>>> > जबकि कटु सत्य है ये कि वे खुद
>>> > कभी न कभी दहशत में रही है ।
>>> > स्त्री की समस्याओं का अंत है हर
>>> > जगह हर समय ढेर सारी स्त्रियाँ जैसे
>>> > रेलवे स्टेशन बस स्ट़ॉप होटल स्कूल
>>> > कॉलेज अस्पताल सङके दुकाने
>>> > गलियाँ
>>> > दफतर संसद राजभवन और घर ।।।।
>>> > विचार पर प्रहार करो घटना पर
>>> > हमारा कोई प्रहार बदलाव
>>> > नहीं ला सकता ।
>>> > सोच बदलो रिवाज़ बदलो ।और जीने
>>> > दो स्त्री को जीने दो ।
>>> > कि सोचो एक तरफ हिंस्रऔर
>>> > दूसरी तरफ एक अजनबी पुरुष
>>> > स्त्री किससे ज्यादा डरे?
>>> > ©®सुधा राजे
>>> >
>>> > On 8/9/14, Sudha Raje <sudha.raje7@gmail.com> wrote:
>>> >> नमन, सादर
>>> >> लेख श्रंखला बद्ध हैं और क्रमशः करके आप चाहें तो लगातार "क्रमशः "चलता
>>> >> रह सकता है ।
>>> >>
>>> >> कुछ दूसरे सीरीज जो बच्चों पर है वे दूसरे अखबार चला रहे हैं ।
>>> >>
>>> >>
>>> >> आगे जो भी लेख भेजेंगे उसकी शब्द संख्या 700/800ॆतक
>>> >>
>>> >> कर दी जायेगी
>>> >>
>>> >> ,'
>>> >> चित्र
>>> >> हमारे कॉपी राईट के स्वयं की फोटोग्राफी के भी हैं
>>> >>
>>> >> और
>>> >>
>>> >> गूगल से भी "जरूर "
>>> >>
>>> >> आज या कल भेजते हैं ।
>>> >>
>>> >> नमन
>>> >>
>>> >> परिचय
>>> >>
>>> >> नाम-सुधा राजे
>>> >> पता - बिजनौर, उ.प्र
>>> >> जन्मस्थान- दतिया, म.प्र.
>>> >> शिक्षा- एम.ए. एल.एल. बी
>>> >> एम.जे.एम.सी. एम.टी.
>>> >> सम्प्रति- एडवोकेट, जर्नलिस्ट पब्लिक ओरेटर 'सोशल एक्टिविस्ट
>>> >> आशु कवि 'लेखक' विचारक '
>>> >>
>>> >> एक उपन्यास,
>>> >> सहस्त्राधिक कवितायें, निबंध कहानियाँ कुछ नाटक एवं आलेख विविध पत्र
>>> >> पत्रिकाओं में प्रकाशित, कुछ का अवैतनिक संपादन,
>>> >>
>>> >> On 8/9/14, Singh Omprakash <singhomprakash15@gmail.com> wrote:
>>> >>> बहुत अच्छा। बस कालम के लिहाज से थोड़ा सा बड़ा है। अगली किश्त में
>>> >>> २-३००
>>> >>> शब्द
>>> >>> छोटे कर दीजियेगा। इसके साथ एक चित्र भी देना चाहते हैं। गूगल से आप
>>> चुन
>>> >>> देंगी , कैप्शन भी दे देंगी तो इस कॉलम से पूरी तरह जुड़ा होगा। अपना
>>> >>> भी
>>> >>> चित्र
>>> >>> और संक्षिप्त परिचय दे देंगी तो उपयोगी होगा। इसे स्त्री\वैचारिकी
>>> शीर्षक
>>> >>> देते हैं। या कॉलम का जो नाम आप देने चाहें बता दें। समय हर पंद्रह
>>> >>> दिन
>>> >>> में
>>> >>> एक रखते हैं। महीने में दो। घटनाक्रम से जुड़े हुए।
>>> >>> मुंबई में पत्रकारिता को फिर से रास्ते पर लाना चाहता हूँ , इसलिए यह
>>> सारी
>>> >>> मशक्कत। पहला स्तम्भ बुधवार २० अगस्त को छाप रहे हैं। उस समय हमारा
>>> विशेष
>>> >>> महोत्सव है।
>>> >>> बहुत बहुत आभार। प्रणाम।
>>> >>>
>>> >>>
>>> >>> 2014-08-08 12:09 GMT+05:30 Sudha Raje <sudha.raje7@gmail.com>:
>>> >>>
>>> >>>> तलाक के बाद
>>> >>>> मारी मारी फिरती औरतें??? पति मरने
>>> >>>> के बाद मारी मारी फिरती औरते??
>>> >>>> पिता के पास धन न होने से
>>> >>>> कुँवारी बङी उमर तक बैठी लङकियाँ??
>>> >>>> और योग्य होकर भी दहेज कम होने से
>>> >>>> निकम्मे और खराब मेल के लङकों को ब्याह
>>> >>>> दी गयीं लङकियाँ "धक्के मार कर घर से
>>> >>>> निकाली गयीं माँयें और बीबियाँ??????
>>> >>>> इसी एशिया और भारत के तीन टुकङों में
>>> >>>> सबसे अधिक है????
>>> >>>> क्योंकि इनका निजी घर इनके नाम
>>> >>>> नही और कमाई का निजी निरंतर
>>> >>>> जरिया नहीं
>>> >>>> और जो बाँझ औरतें है?? वे कसाई
>>> >>>> की गौयें?क्योंकि हर बात पेरेंटिंग के नाम पर
>>> >>>> स्त्री पर थोप दी जाती है
>>> >>>> कि माता अगर घर पर रहकर घर
>>> >>>> की सेवा करेगी तो बच्चों को हर वक्त
>>> >>>> ममता की
>>> >>>> छांव मिलेगी ?तो जिनके बच्चे किसी कारण से
>>> >>>> नहीं हो सकते वे औरतें? अपनी
>>> >>>> मरज़ी बच्चा गोद नहीं ले
>>> >>>> सकतीं क्योंकि पति को अपने ही बीज से
>>> >>>> पैदा बच्चा
>>> >>>> चाहिये और ग़ैर के बीज के पेङ
>>> >>>> को अपनी संपत्ति का वारिस बनाना ग़वारा
>>> >>>> नहीं । तब? परिणाम स्वरूप भयंकर मानसिक
>>> >>>> टॉर्चर समाज भी करता है और परिवार
>>> >>>> भी बहुत कम पुरुष स्त्री के बाँझ होने पर
>>> >>>> बच्चा गोद लेते हैं अकसर बच्चा
>>> >>>> गोद तब लिया जाता है जब कमी प्रजनन
>>> >>>> बीजों की पुरुष में निकल जाती है ।
>>> >>>> इसके विपरीत जो स्त्रियाँ स्वावलंबी हैं वे
>>> >>>> यदि चाहें तो स्वस्थ होने पर
>>> >>>> भी अपना बच्चा जन्म देने के बज़ाय समाज हित
>>> >>>> में अनाथ बच्चों को भी गोद ले
>>> >>>> सकती है ।
>>> >>>> बच्चों को हर तरह से ""पढ़ा लिखा कर
>>> >>>> योग्य बनाने को करोङो रुपया चाहिये
>>> >>>> """"कितने पुरुष अकेले ये बोझ उठा पाते
>>> >>>> है?एक लेडी डॉक्टर लेडी नर्स
>>> >>>> लेडी टीचर लेडी पुलिस
>>> >>>> """कैसी मिलेगी '''घरेलू गृहिणियों को?
>>> >>>> यदि लङकियाँ किसी न किसी परिवार से
>>> >>>> जॉब करने नहीं निकलेगीं तो कहाँ से
>>> >>>> आयेंगी लेडी गायनोकोलोजिस्ट और
>>> >>>> स्त्री शिक्षक स्त्री पुलिस स्त्री नर्स?
>>> >>>> व्यवहार में यही साबित हुआ है
>>> >>>> कि डॉक्टर टीचर नर्स प्रोफेसर
>>> >>>> वैज्ञानिक माता के बेटे बेटियाँ ""अधिक
>>> >>>> योग्य सुखी और जिम्मेदार नागरिक बनतेआये है
>>> >>>> """"बजाय पूर्ण कालीन पति और
>>> >>>> मायके पर निर्भर गृहिणी के ।क्योंकि एक
>>> >>>> माता जो मेहनत हुनर या शिक्षा और
>>> >>>> तकनीक के बल पर जब पैसा रुपया कमाती है
>>> >>>> तो बच्चों को बचपन से ही माता के
>>> >>>> संरक्षण में अपने निजी कार्य स्वयं करने और
>>> >>>> अधिकांश घरेलू कार्यों में
>>> >>>> आत्मनिर्भर रहने की आदत पङ जाती है । वह
>>> >>>> पैसे रुपये कमाने खर्चने और
>>> >>>> बचाने के सब तरीके समझने लगता है ।
>>> >>>> जबकि जिनकी माता पूर्ण कालीन गृहिणी
>>> >>>> है वे बच्चे बहुत बङी आयु तक न तो भोजन
>>> >>>> पकाना सीख पाते हैं न परोसकर खाना
>>> >>>> और कपङे धोना स्वयं पहनना समय का पालन
>>> >>>> करना और सारी चीज़ें सही जगह रखना
>>> >>>> और अपने जूठे बर्तन सिंक पर
>>> >>>> रखना कूङा डस्टबिन में डालना तक
>>> >>>> जरूरी नहीं
>>> >>>> समझते ।
>>> >>>> आप किसी छोटे नगर कसबे गाँव या महानगर
>>> >>>> के आम साधारण परिवारों में जाकर
>>> >>>> देखें, बङे बङे किशोर और युवा बेटे माता के
>>> >>>> सामने कपङों का ढेर लगाकर हर
>>> >>>> समय कुछ न कुछ हुकुम झाङते मिलेंगे ।माँ न
>>> >>>> हुयी हर वक्त चलता मुफ्त का
>>> >>>> रोबोट हो गयी!!!
>>> >>>> कभी पढ़ाई के बहाने कभी खेल के बहाने
>>> >>>> कभी मूड के बहाने घर में काम काज
>>> >>>> में वे बच्चे अकसर काम में हाथ नहीं बँटाते
>>> >>>> जिनकी मातायें पूर्णकालीन
>>> >>>> गृहिणी हैं ।उनको लगता है
>>> >>>> माँ करती ही क्या है । चूँकि चॉकलेट
>>> >>>> टॉफी कपङे
>>> >>>> खिलौने और सब चीजें मनोरंजन और खाने पीने
>>> >>>> की "पिता की कमाई "से आतीं हैं
>>> >>>> तो सीधा असर यही पङता है कि बच्चे
>>> >>>> पापा की चमचागीरी पर उतर आते हैं ।
>>> >>>> पापा घुम्मी कराने ले जाते हैं माँ घर में
>>> >>>> सङती रहती है । पापा खुश तो हर
>>> >>>> फरमाईश पूरी और मम्मी? अब ये
>>> >>>> तो खाना पकाने साफ सफाई करने की मशीन है
>>> >>>> ।
>>> >>>> ज्यों ज्यों बङे होते जाते हैं परिवार में
>>> >>>> "अधूरी पढ़ाई छोङकर पूर्णकालीन
>>> >>>> गृहिणी बनने वाली माता की अनसुनी होने
>>> >>>> लगती है ।सीधी सीधी बात सात साल के
>>> >>>> बाद हर दिन बच्चा सीखता है
>>> >>>> कि खुशियाँ आतीं हैं पैसे रुपये से और पैसा
>>> >>>> रुपया लाते हैं पापा । तो घर का मालिक
>>> >>>> पापा हैं और हुकूमत उसकी जिसकी
>>> >>>> कमाई ।
>>> >>>> जबकि जिन घरों में माता भी कमाती हैं
>>> >>>> वहाँ पिता का व्यवहार माता के प्रति
>>> >>>> कम मालिकाना कम हुकूमती कम क्रूर होता है
>>> >>>> और बराबरी जैसी स्थिति घरेलू
>>> >>>> खर्चे उठाने में होने की वजह से
>>> >>>> बच्चा माँ पिता दोनों के साथ लगभग समान
>>> >>>> बरताव करता है पति भी स्त्री से हर बात
>>> >>>> पर राय मशविरा करना जरूरी समझता
>>> >>>> है ।
>>> >>>> घर में रुपया पैसा ज्यादा आता है तो स्कूल
>>> >>>> बढ़िया हो जाता है । खाने की
>>> >>>> थाली में व्यञ्जन भरे भरे हो जाते हैं और नहाने
>>> >>>> धोने पहनने देखने सोने और
>>> >>>> घूमने फिरने को अधिक संसाधन होते हैं ।बच्चे
>>> >>>> को अनुशासित दिनचर्या मिलती
>>> >>>> है और ""तरस ''कर नहीं रह जाना पङता ।
>>> >>>> क्रूरता कम होती है माता पर तो ऐसा
>>> >>>> बच्चा ""स्त्रियों का सम्मान
>>> >>>> करना सीखता है ।
>>> >>>> ये सही है कि बच्चे को स्कूल के समय के
>>> >>>> अलावा हर समय अभिभावक चाहिये ।
>>> >>>> किंतु ये भी सही है कि कोरी ममता से कुछ
>>> >>>> भविष्य बनता नहीं है बच्चे । चरा
>>> >>>> चरा कर साँड बना डालने से कुछ हल नहीं है
>>> >>>> जीवन को आगे विकसित उन्नत और
>>> >>>> सभ्य समाज की प्रतियोगिता में
>>> >>>> ""अच्छा स्कूल अच्छे कपङे अच्छा भोजन
>>> >>>> बढ़िया टॉनिक फल सब्जी दाल साबुन शेंपू
>>> >>>> बिस्तर मकान जमीन बैंक बैलेंस और
>>> >>>> बढ़िया व्यवसायिक शिक्षा चाहिये ।
>>> >>>> ये
>>> >>>> सब आता है रुपये पैसे से । कितने पिता हैं
>>> >>>> जिनके अकेले के बूते की बात है
>>> >>>> ज़माने के हिसाब से एक घर पढ़ाई दवाई कपङे
>>> >>>> बिजली कूलर गीजर पानी
>>> >>>> सबमर्सिबल एयर कंडीशनर आलमारी डायनिंग
>>> >>>> टेबल बिस्तर और मोटी फीस चुकाकर
>>> >>>> जॉब दिलाने की दम रखते हैं?
>>> >>>> अकसर सात साल तक आते आते बच्चे की जरूरतें
>>> >>>> ही विवश करतीं हैं स्त्री को
>>> >>>> छोङी गयी पढ़ाई और जॉब फिर से शुरू करने के
>>> >>>> लिये ।
>>> >>>> मँहगाई तो है ही कमर तोङ बच्चे बङे होते
>>> >>>> जाने के साथ साथ "निरर्थक बचा
>>> >>>> समय भी चारदीवारी में बंद बँधा जीवन
>>> >>>> भी काटने लगता है । और एक एक करके
>>> >>>> सब अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त हो जाते हैं
>>> >>>> । कौन फिर वह एक एक रात
>>> >>>> गिनता है जब माता देर से सोयी और
>>> >>>> जल्दी जागी?
>>> >>>> जब पत्नी दिन भर कुछ न कुछ काम हाथ में
>>> >>>> लिये कोल्हू के बैल सी पूरे घर
>>> >>>> में मँडराती रही?
>>> >>>> देह कमजोर और किसी न किसी व्याधि से
>>> >>>> ग्रस्त हो जाती है शरीर बेडौल हो
>>> >>>> जाता है क्योंकि बंद दीवारों से
>>> >>>> आधी सदी बाहर नहीं निकली स्त्री फिर
>>> >>>> बाहर
>>> >>>> जाने का शौक और आत्मविश्वास ही खो देती है
>>> >>>> ।
>>> >>>> इसके विपरीत
>>> >>>> जो स्त्रियाँ किसी न किसी जॉब में
>>> >>>> लगी रहती हैं वे अपनी कमाई का कुछ न
>>> >>>> कुछ हिस्सा खुद पर भी खर्च करने से स्वस्थ
>>> >>>> ऱहती है और प्रतिदिन ठीक से सज
>>> >>>> सँवर कर काम काज करने जाने
>>> >>>> की दिनचर्या से चुस्त दुरुस्त भी रहतीं है ।
>>> >>>> और बाहरी समाज से
>>> >>>> मिलना जुलना एकरसता और तनाव
>>> >>>> को तोङता रहता है । अच्छे
>>> >>>> कपङे पहनने और नियमित दिनचर्या के अनुसार
>>> >>>> अनुशासित रहने से वे देर तक
>>> >>>> युवा रहती हैं और खुश भी
>>> >>>> हर मामूली सी चीज के लिये पति से
>>> >>>> रुपया माँगने को मजबूर स्त्रियाँ अधिकतर
>>> >>>> मन मारकर जीना सीखती रहती है दमन
>>> >>>> ही आदत हो जाती है । या तो फिर झूठ
>>> >>>> बोलकर रुपया बचाती है निजी खर्च के लिये
>>> >>>> । और तब भी कुछ पसंद का खाना
>>> >>>> पहनना उनको अपने ऊपर फिजूल
>>> >>>> खर्ची लगता है । बहुत अमीर पति नहीं है तब
>>> >>>> तो
>>> >>>> कलह की जङ ही बन जाता है
>>> >>>> बीबी का कपङा गहना मेकअप और कुछ अलग
>>> >>>> सा खा लेना
>>> >>>> और किसी बहिन भांजे भतीजे
>>> >>>> माता पिता सहेली को कोई ""उपहार
>>> >>>> देना तो सपना
>>> >>>> ही रह जाता है "
>>> >>>> ज्यों ज्यों बच्चे युवा होकर अपने कैरियर
>>> >>>> विवाह और परिवार बसाते जाते हैं
>>> >>>> स्त्री ""बेकार ""पङी ट्राईसाईकिल
>>> >>>> पालना वॉकर की तरह की याद बनकर रह
>>> >>>> जाती
>>> >>>> है ।
>>> >>>> जबकि आत्मनिर्भऱ स्त्री का सबसे
>>> >>>> बढ़िया समय ही पचास साल की आयु के बाद
>>> >>>> प्रारंभ होता है वह पर्याप्त सामाजिक
>>> >>>> हैसियत धन और अनुभव जुटा लेने के
>>> >>>> बाद ''स्वावलंबी बच्चों को ताने देने डिस्टर्ब
>>> >>>> करने के बजाय अपनी फिटनेस
>>> >>>> हॉबीज समाज सुधार के कार्य आध्यात्म और वे
>>> >>>> सब शौक पूरे करने पर जुट जाती
>>> >>>> है जो वक्त न मिलने के कारण विवाह के बाद
>>> >>>> से बीस साल बंद रह गये ।
>>> >>>> माता की ममता दूध कोख का तो कर्ज़
>>> >>>> रहता ही है सब पर किंतु वह माता "सुपर
>>> >>>> मॉम "साबित होकर हमेशा अपनी संतान के
>>> >>>> जीवन में आदर पाती है जो उसको आगे
>>> >>>> बढ़ाने में अपनी कमाई का पैसा भी लगाती है
>>> >>>> ।
>>> >>>> ऐसी कोई भी साजिश जो औरतों पर
>>> >>>> थोपती हो """स्वयं को केवल
>>> >>>> सेविका दासी और बच्चे पैदा करने
>>> >>>> की मशीन होना """""समय
>>> >>>> का पहिया उलटा घुमाने की साजिश है
>>> >>>> """बौखलाया तो गोरों का समाज
>>> >>>> भी था जब कालों ने
>>> >>>> दासता छोङी थी आज सब बराबरी से
>>> >>>> रहते हैं """पुरुषों को भी घर में झाङू
>>> >>>> पोंछा बरतन कपङे रोटी टॉयलेट कच्छे
>>> >>>> बनियान बराबरी से हाथ बँटाकर
>>> >>>> बिना लज्जित हुये करना सीखना जब तक
>>> >>>> नहीं आयेगा """"ये
>>> >>>> जाती सत्ता बौखलाती रहेगी """दलित
>>> >>>> सेवक न मिलने पर सामंतो की तरह
>>> >>>> ये ""महिलायें तय
>>> >>>> करेंगी उनको क्या करना है ''''ये तय करेगे
>>> >>>> काले लोग उनको क्या करना है ""ये तय
>>> >>>> करेगे दलित उनको क्या करना है """
>>> >>>> माँ विधवा है बूढ़ी है लाचार है और
>>> >>>> बेटा परदेश लेकर
>>> >>>> चला गया फैमिली """"बेटी पढ़ी लिखी है
>>> >>>> या अनपढ़ है लेकिन गृहिणी रह गयी
>>> >>>> वह बिलखती है रोती है तङपती है किंतु
>>> >>>> माँ को दवाई कपङे और अपने साथ रखकर
>>> >>>> सेवा नहीं दे सकती????? क्यों जँवाई
>>> >>>> भी तो बेटा है??? जब बहू ससुर सास की
>>> >>>> सेविका है तो??? लेकिन
>>> >>>> ऐसी हजारों बेटियाँ आज है
>>> >>>> जो बिना नजर पर लज्जित होने का बोध
>>> >>>> कराये माँ बाप को ""सहारा सेवा दे
>>> >>>> रही हैं ।और ये केवल
>>> >>>> वही बेटियाँ जिनको उनके माँ बाप ने या खुद
>>> >>>> उन्होने
>>> >>>> संघर्ष करके पढ़ा और कला या शिक्षा के दम
>>> >>>> पर आत्मनिर्भर हैं ।
>>> >>>> ऐसी बेटियाँ पिता माता को मुखाग्नि भी दे
>>> >>>> रहीं हैं और पुत्र से अधिक सेवा
>>> >>>> भी कर रहीं हैं बहू
>>> >>>> या जामाता तो पराया जाया है किंतु
>>> >>>> बेटी और बेटा तो
>>> >>>> अपनी ही संतान है । फिर वह बेटी ही विवश
>>> >>>> रह जाती है जो पूर्ण कालीन
>>> >>>> गृहपरिचारिका बन कर रह जाती है इससे
>>> >>>> भी अधिक बजाय माँ बाप का बुढ़ापे का
>>> >>>> सहारा बनने के ऐसी बेटी के घर भात
>>> >>>> छटी छूछक और तीज चौथ के सिमदारे भेंटे
>>> >>>> भेजने को बूढ़े माँ बाप की पेंशन पर भी लूट
>>> >>>> पाट रहती है ।
>>> >>>> क्या वीभत्स चित्र है
>>> >>>> कि युवा बेटी को विधुर बूढ़ा बाप
>>> >>>> या बूढ़ी माता
>>> >>>> पेशन से कटौती करके त्यौहारी भेजती है!!!
>>> >>>> """विधवा स्त्री तलाकशुदा स्त्री और
>>> >>>> विकलांग पति की स्त्री और बाँझ
>>> >>>> स्त्री और तेजाब जली स्त्री को केवल एक
>>> >>>> सहारा"निजी कमाई " जिसने बेटी ब्याहने में
>>> >>>> सब
>>> >>>> लुटा दिया उनको?केवल जँवाई का इंतिज़ार
>>> >>>> की कब बुढ़िया मर जाये तो कब घर
>>> >>>> जमीन बेच कर अपने वैभव में समाहित कर लें ??
>>> >>>> अगर ""परंपरा से पुरुषों ने स्त्रियों पर
>>> >>>> जुल्म नहीं किये होते ""विधवाओं
>>> >>>> को अभागन न
>>> >>>> माना होता विवाहिता को ठुकराया न
>>> >>>> होता ""निःपुत्र सास ससुर
>>> >>>> की सेवा की होती ""अपनी कमाई पर
>>> >>>> स्त्री का हक समझा होता """"तो ये
>>> >>>> नौबत
>>> >>>> ही नहीं आती कि बिलखती स्त्री ''यौवन
>>> >>>> गँवाकर प्रौढ़ावस्था में कमाई के नाम पर
>>> >>>> सताई जाती और विवश होकर
>>> >>>> अगली पीढ़ी पहले ही अपने भविष्य
>>> >>>> को अपने हाथ में ऱखने निकल पङती????
>>> >>>> एक ठोस संदेश
>>> >>>> भी सदियों की दासता की आदत
>>> >>>> छोङो और घर बाहर बराबर काम
>>> >>>> करो ''पेरेंटिंग दोनो की जिम्मेदारी है
>>> >>>> ''नौ महीने पेट में रखकर माँ तो फिर
>>> >>>> भी अधिक करती ही है वह कमाऊ
>>> >>>> गृहिणी है या घर रहती है उसके
>>> >>>> "आर्थिक हक "तय करने वाला कोई
>>> >>>> दूसरा क्यों? वह अपना हित अपने स्वभाव के
>>> >>>> हिसाब से तय करे।
>>> >>>>
>>> >>>> --
>>> >>>> Sudha Raje
>>> >>>> Address- 511/2, Peetambara Aasheesh
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