Sunday, 7 September 2014

सुधा राजे का पत्र ::-- गली-गली संपादक??

कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ हम खुद
प्रत्यक्ष दर्शी हैं
यहाँ पश्चिमी यूपी एक महोदय।ने
एक अखबार का रजिस्ट्रेशन
करा लिया "और सब जगह प्रचार
किया 'रचनायें इकट्ठी कीं और
'हमारा नाम सब एडीटर में शामिल
कर लिया हमें मालूम तक नहीं ',एक
अंक छापा और अनेक विज्ञापन बटोर
लिये ',फिर, शहर भर के,,,,, लेखक
साहित्यकार पत्रकार """"""उसके
संपर्क में """"और वह ""पत्रकार
की ठसक में,,
एक पुलिस ऑफिसर परिचित से,,,,,,
शक जाहिर किया """""जाँच
करायी """"कुछ दिन बाद संपादक
जी गिरफ्तार """
उस धूर्त के,,, मँडराने की वजह
थी """महिलासंगठन की आङ लेकर, '
अपना ऊल जुलूल रुतबा बढ़ाना """
आज जरूरत है कि ऐसे
कुकुरमुत्तों की तरह उग आये
गली गली अखबार
को """पहचाना जाये और """
पत्रकार
केवल उनको ही समझा माना जाये
जो ""वाकई ""हैं पत्रकार
वरना
इस प्रोफेशन की रही सही इमेज
भी खत्म हो जायेगी
कोई भी एक चिंथङा छापकर
संपादक और पत्रकार की हनक में आकर
सरकारी महकमों में दखल करने
लगता है।
बहुत से व्यापारी मिल मालिक जातीय
और मजहबी नेता '''''''एक
पत्रिका या अखबार निकालने के लिये
छटपटाते है """"ताकि उनकी बकवास और
जहर बराबर लक्षित लोगों तक
पहुँचता रहे """"दूसरी तरफ पत्रकार
होने की सुविधायें और ""हनक ठसक ""से
बल और ब्लैकमेलिंग जारी रहे ""ऐसे हर
संपादक की कङी जाँच हो ।
दस बीस प्रतियाँ काँख में दाबीं दो चार
आला अफसरों को भेंट की ',लो जी हम
भी अब ""मीडिया ""बाईक पर
मीडिया '''कार अगर है तो दहेज
की हो चाहे '''प्रेस ''लिखा और ये
अकङी गरदन ''''चाहे उनको एक
दरख्वास्त तक लिखनी न आती हो? ऐसे
गली गली कुकुरमुत्तों ने मीडिया और
संपादक पत्रकार शब्द को मजाक
बना दिया है।
आप के हमारे पास अकसर ऐसे तमाम
परोपकारी संपादकों के ''ऑफर आते रहते हैं
'''रुपया दो और संकलन में रचनायें
छपवा लो '''सदस्य बनो और पत्रिका में
छपो ',सारे न सही तो इनमें से बहुत से
संपादक संपादिकायें """स्नातक तक पढ़े
लिखे भी नहीं """"""सोचो कि ये """लेखक
को "एडिट ''क्या करेगे???
(सुधा राजे)


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