Friday, 5 September 2014

सुधा राजे की रचनायें -""मन के वन को जेठ ज़िंदगी

Sudha Raje
Sudha Raje
मन के वन को जेठ जिंदगी
सावन बादल तुम साजन!!!!
थकते तन को मरुथल सा जग मनभावन जल
तुम साजन!!!!
पाँव के नीचे तपी रेत पर छल के गाँव
सभी नाते ।
कङी धूप में हरा भरा सा शीतल अंचल तुम
साजन!!
आशाओं के शाम सवेरे दुपहर ढलकी उम्मीदें

निशा भोर से पंछी कलरव चंचल- चंचल तुम
साजन ।
सुधा परिस्थियों के काँटे नागफनी के दंश
समय
हरे घाव पर चंदन हल्दी रेशम मलमल तुम
साजन!!!
डरे डरे दो नयन अँधेरों से रस्मों से
घबराये ।
स्मित अधर सरल आलिंगन । मंचल मनचल
तुम साजन
इकटक लक्ष्यबेध शर लेकर । मैं
भूली कर्तव्य सभी । मेरी सफलता पर
खुशियों के । नयना छल छल तुम साजन!!
®©¶सुधा राजे ।

दिल में कुछ होठों पर कुछ है कलम लिखे कुछ
और सुधा।
जहां न हो ये हलचल इतनी चल चल चल उस
ठौर सुधा।
कल तक थी उम्मीद रोशनी की घुटनों पर
टूट गयी।
अक़्श नक़्श ज्यों रक़्श दर्द का ये है कोई
और सुधा।
किसे समझ
आयेगा वीरानों का मेला कहाँ लुटा ।
कौन सजाये नयी दुकाने रहे परायी पौर
सुधा।
बाँध लिये असबाब बचा ही क्या था बस
कुछ गीत रहे।
भँवरी हुये सिरानी सरिता रही एक
सिरमौर सुधा।
©®Sudha Raje

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