Saturday, 30 November 2013

बच्चे 10

बच्चे10-
---भारत अज़ीबोग़रीब नीतिनियंताओं की अकुशल नीतियों का शिकार है। और सबसे
अधिक शिकार होते हैं कमज़ोर लोग । कमज़ोर यानि स्त्रियाँ बच्चे बूढ़े और
विकलांग। क्योंकि इनकी आत्मनिर्भरता की बज़ाय वफ़ादारी से परिवार पर
निर्भर रहने की परंपरा डाली गयी है शिक्षानीति और धर्म से । एक बच्चा जब
तक पढ़लिखकर जवान होकर खुद कोई नौकरी नहीं कर लेता तब तक हर तरीके से
परिवार और समाज की दया पर निर्भर रहता है। बुरी तरह कचोटती हैं ये
नीतियाँ जो याचक भिखारी और शरणागत दयनीय प्राणी बना डालती हैं बच्चों को।
पश्चिमी देशों में जहाँ प्रारंभ से ही आत्मनिर्भरता की सोच परंपरा में भी
है और शिक्षानीति में भी वहीं भारतीय बच्चे परिवार के बङों के रहमोकरम पर
हर फैसले के लिये मोहताज़ हैं । वज़ह है शिक्षा केवल किताबी ज्ञान देती
है । जीवन के पच्चीस और तीस साल तक अमूमन हर दूसरा तीसरा व्यक्ति
अभिभावकों पर निर्भर रहता है।
स्टॉप चाईल्ड लेबर कहने से तो बाल श्रम रूकना ही नहीं है कभी । क्योंकि
नीति चाहे वज़ीफ़ा लैपटॉप साईकिल बस्ता यूनिफॉर्म बाँटने की रहे या फिर
मिड डे मील आँगनबाङी पोषाहार और दवा वितरण की । बच्चा तो हर हाल में याचक
शरणागत और मोहताज़ ही बना दिया जाता है!!!!!!!!
एक स्कूल में अमूमन सत्तरह साल रहकर भी निकम्मा ही निकलता है वयस्क जिस
देश में वहाँ कोई कैसे बाकी जीवन में कामयाब हो सकता है?
वर्ण व्यवस्था के लाखों दोषों के बावज़ूद एक गुण था कि बच्चे खानदानी काम
शैशव से ही सीखते रहकर मास्टर बन जाते थे अपने पुश्तैनी हुनर के और बङे
होकर अपने औज़ार लेकर रोज़ी रोटी कमा लेते थे । समाज में कार्यविभाजन
होने से मारामारी नहीं थी और बेरोजग़ारी कोई समस्या नहीं । ये व्यवस्था
जब भंग हुयी है ही तो विकल्प देने चाहिये थे । किंतु पुरानी व्यवस्था जो
जैसी तब की जरूरत थी वह तो मिटा दी और नयी कोई व्यवस्था दी ही नहीं
गयी!!!
पुराना मिटाना ज़रूरी अगर था तो नयी व्यवस्था भी होनी चाहिये थी।
चरवाहा विद्यालय की योजना घोटालों का शिकार हो गयी किंतु ऐसी योजना की
सख्त ज़रूरत है । एक बच्चा प्रतिदिन पाँच घंटे स्कूल में बिताता है ।
स्कूल हर एक स्कूल में अगर प्रतिदिन पाँच की बजाय ये छह घंटे कर दिये
जायें और दो शिफ्ट में स्कूल चले जैसा कि कुछ राज्यों में चलते भी है
सुबह सात से बारह और दोपहर बारह से पाँच बजे तक । तब दो फायदे होगे एक तो
स्कूली इमारतों की संख्या ठीक दो गुनी हुयी मानी जायेगी दूसरे बङे बच्चे
और छोटे बच्चों की शिफ्ट विभाजित करके पढ़ाई की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकेगी
। तीसरे
सबसे महत्तव पूर्ण कार्य है पढ़ो और कमाओ योजना । बच्चा दस साल की आयु से
कोई भी ऐसा कार्य जो कि उसकी पसंद रुचि हॉबी और प्रतिभा के निखार की
ट्रेनिंग प्रेरणा प्रशिक्षण का हो चुन ले और वह कार्य प्रतिदिन एक घंटे
स्कूल में करे । प्रशिक्षित कारीगर आकर उन कार्यों को सिखायें । सिखाने
के दौरान जो अनगढ़ अच्छी बुरी चीजें बनें उनको स्थानीय मार्केट में
बच्चों के हुनर नाम से टैग करके बेच दिया जाये । और जो पैसा प्राप्त हो
वह बच्चों को संचयिका बचत खाता बनवाकर बैंक एकाऊंट में उनके नाम से
शिक्षा गारंटी धन के रूप में डाल दिया जाये जिसकी आधा रकम बच्चे खुद
स्कूल में खुले बैंक की शाखा से महीने में दो बार निकाल सकें निर्धारित
तारीख को । ऐसा होने पर आगे के सौ साल की आयु तक के लिये बच्चे के पास एक
हुनर होगा । वह नौकरी मिलेगी या नहीं मिलेगी के भयावह संकट आशंका से
मुक्त होगा। और ये तमाम घोटाले भ्रष्टाचार से भिखारी बनाकर अपंग कर देने
वाली योजनाओं से निज़ात भी मिलेगी। एक अनुभव है पढ़ाने के दौरान
प्रतियोगिता वगैरह से बहुत सुंदर कलाकृतियाँ जमा हो गयीं । तब सुनामी
पीङितों और अनाथों के लिये धन जुटाने को स्कूल की तरफ से प्रदर्शनी लगाई
गयी और न्यूनतम दाम हर कलाकृति का रखा गया । आपको अचंभा होगा कुछ पीस तो
बहुत चकित कर देने वाले थे और दो दिन में हज़ारों पीस अभिभावक ही खरीद कर
ले गये ।
हर बच्चा कुछ न कुछ तो खासियत रखता ही है । ये खासियत गुरू नहीं तो कौन
पहचानेगा? इनका विभाजन कला अभिव्यक्ति कारीगरी श्रम और अविष्कार के रूप
में कर दिया जाये तो सैकङों विधायें हैं जो कुटीर उद्योग स्माल इंडस्ट्री
का रूप लेकर कारोबार कर सकती हैं और हानिकारक श्रम शोषण से बालपन को
बचाया जा सकता है वह अपनी शिक्षा का अधिकतम खर्च खुद ही उठा सकता है।
ये बच्चे जिन घरों से आते हैं वहाँ सबकी समस्या होती है बच्चे का पोषण
खुराक फीस कपङे और भविष्य की पूँजी। आगे क्या जॉब मिले न मिले की
अनिश्चितता ।
एक बच्चे को केवल एक घंटे प्रतिदिन कार्य करने से अगर दस बीस तीस रूपये
तक भी रोज मिलते रहते हैं तो वहाँ जहाँ परिवार में दस साल से ऊपर के तीन
चार पाँच या अधिक बच्चे तक भी हैं एक मासिक आय मिलनी शुरू हो जायेगी ।
जिसको बच्चों की बेहतर खुराक पोशाक और हुनर के प्रशिक्षण पर व्यय किया जा
सकेगा।
जब बच्चे स्कूल छोङेगे तो उनके पास अपना ही कमाया हुआ धन भी होगा ।
ये योजना रट्टामार पढ़ाई के बाद भागभाग और बैंकड्राफ्ट फॉर्म शुल्क और
परीक्षा इंटरव्यू की शोषक नीति से मुक्त करेगा ।
अरे जब कमाता नहीं तो ड्राफ्ट कहाँ से भरेगा? इसीनीति के चलते कई
प्रतिभायें जॉब ऑपरचुनिटी खो देतीं हैं। ऊपर से एक जॉब एक लाख आवेदन करके
संस्थान जमकर पैसा कमाते रहते हैं।
पूरा एक भारत हाथ पर हाथ धरे निठल्ला जो बैठा है वह बुढ़ापे तक
रिटायरमेंट के बाद भी इन कारीगरियों कलाओं और हुनरों का इस्तेमाल करके
कमाऊ मेंबर रह सकता है सदैव ।
बच्चे के वर्तमान पर ही उसका भावी जीवन टिका है ।
एक बच्चा स्कूल और घर के अलावा कहीं भी बेहतर प्रशिक्षण पा ही नहीं सकता ।
चाईल्ड लेबर की वज़ह यही रोजी रोटी की फिकर है।
न इतना ऊँचा पढ़ पायेगे कि पढ़ाई के दम पर नौकरी मिले न ही कोई हुनर
पच्चीस साल में सीख पायेंगे तब तो गरीब गरीब ही रहेगा क्योंकि पूँजी कहाँ
से आयेगी व्यवसाय के लिये?? और नौकरियाँ इतनी है कहाँ जितने हाथ और पेट
हैं??
अपाहिज बनकर निकलती युवापीढ़ी का आधार ही कमजोर है कि वह पच्चीस साल तक
केवल रटता रहा!!!!!

अब शुरू करेगा खोज कि रट्टा पढ़ाई की किसको जरूरत है।

सोचें और सोचकर सुधार करे । केवल किताबें नहीं न ही एक वक्त की भूख
मिटाने से कोई बच्चा क़ाबिल बनेगा!!!!
कितने स्किलफुल हैं भारतीय ग्रेजुएट?????
वजह???
यही कि कमाना कैस् है उनको नहीं पता ।
अभिभावक दुर्घटना ग्रस्त हो जायें या बच्चे तब केवल याचक और अपराधी बनने
के सिवा कुछ नहीं देती ये भारतीय रट्टामार पढ़ाई।
©®सुधा राजे
क्रमशः जारी ''':''''''''''

कहानी ""आई हेट इंडियन मूवीज

""आई हेट इंडियन मूवीज""
--------------------कहानी -----सुधा राजे
30/11/2013//1:51AM..
----------------------------------—--------------
चंद्रिका अब तुम्हारी बारी है चलो शुरू हो जाओ

ओह नहीं मुझे कहाँ आता है गाना वाना? कबड्डी प्लेयर हूँ हुतूतूतूतू बोले
देती हूँ बस या फिर देशी गालियाँ सुननी हो तो बोलो दोस्तो?

ये तो बेईमानी है चंद्रिका!! तुम्हीं ने प्रस्ताव रखा था सबको एक एक गाना
सुनाना पङेगा और अब तुम्हीं नहीं सुनाओगी?

एन एस एस कैम्पमार्शल सुभद्रा ने कहा तो सब लङके लङकियाँ ताली पीटने लगे
। चंद्रिका को विवश होकर अपनी भारी परुष आवाज़ में गीत सुनाना ही पङ गया

आवाज़ भले ही भारी थी किंतु गीत सुरताल लय में होने से रोचक लग रहा था ।
---बलम मोहे बंबई शहर घुमाय ल्याओ बलम मोहे टमटम में बैठाय ल्याओ । बलम
मैं ऐसी करम की हीना। मैंने कभऊँ न देख्यौ सनीमा । मोरे लाङले बलम
तुम्हें मोरी कसम मोहे लैला मजनू दिखाय ल्याओ'''''''''

चंद्रिका स्त्री पुरुष दोनों का अभिनय करके गाती सबको हँसा रही थी ।
शाम गहरी हो गयी शहर से दूर उस पहाङी कसबे की रियासत कालीन कारीगरी से
सजी धजी बस्ती में नगर से बाहर थाने के सामने बने कॉलेज में राष्ट्रीय
सेवा योजना यूनिट का शिविर लगा हुआ था जिसके छात्र छात्रायें दिन भर
करीबी गाँव में साफ सफाई और साक्षरता पर समाज सेवा में जुटे रहते शाम को
कैंप पर मनोरंजन के दो घंटे होते फिर प्रोफेसर लेक्चर देते रात देर तक
ड्नर होता। और डिनर के बाद प्रोजेक्टर पर फिल्मे चलायीं जाती जो देश की
जानकारी और समस्याओं पर रहतीं।
सुभद्रा कैंप नायिका थी । एकदम अनुशासित और कम बोलने वाली स्वयम तक सीमित
हॉबीज वाली लङकी।
अब सुभद्रा की बारी आयी तो सब फिर चीखने और तालियाँ पीटने लग गये।
सुभद्रा को कोई भी फिल्मी गीत याद ही नहीं था। उन दिनों घरों में
टेलीविजन नहीं होते थे। बङा सा टीवी साईज का रेडियो परिवार के मुखिया के
कक्ष में कढ़ाईदार कवर से ढँका रहता था।महीने में एक बार परिवार के लोग
जोङे में जाकर फिल्म देखकर आते। लङकियाँ सिनेमा देखने नहीं जातीं थीं।
कोई धार्मिक या बाल फिल्म या राष्ट्रवादी फिल्म हो तो स्कूल कॉलेज की तरफ
से चंदा जमाकरके बच्चे देख आते । भाभियाँ जब फिल्में देखकर आतीं तो
स्टोरी सुनाई जाती । जमकर बैठजातीं सब लङकियाँ और भाभी के डायलॉग शुरू हो
जाते। साल में दो चार फिल्में पारिवारिक फिल्में घोषित होने पर पूरा
परिवार देखकर आता। और महीनों डायलॉग गीत चलते रहते । सुमित्रा अकसर छोटो
बहिन भाई के साथ एक कॉमिक्स के बदले घर पर रूक जाती ।
सब ताली पीट रहे थे और सुभद्रा को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या गाये ।
उसने हथेली पर चंद लाईने लिखीं और सुनादी।
सन्नाटा छा गया सब गंभीर हो गये।
आठ दिन बाद कैंप फायर और मंत्री जी के हाथों पुरस्कार वितरण के बाद सब
लङके लङकियों की ज़िद पर प्राध्यापक ने टॉकीज में चल रही एक फिल्म दिखाने
की इज़ाजत दे दी और शाम के शो में पूरी बाल्कॉनी बुक हो कर सब लङके
लङकियाँ फिल्म देख रहे थे। एक रोमांटिक प्रेम कथा जो साफ सुथरी कहानी थी
। उसकी खास बात थी नायक नायिका का बार बार थियेटर में नाच और नाटक देखने
जाना और बगल बगल की सीटों पर प्रेम की बढ़ता अहसास । सुभद्रा ने अचानक
अँधेरे में आस पास ध्यान दिया कि बहुत सी लङकियाँ जोङी बनाकर बैठी है
अपने अपने पुरुष मित्र या किसी सहेली के साथ जबकि सिर्फ उसके ही दोनों
तरफ की सीट खाली है । अनायास ही एक मानव सुलभ कल्पना तैर गयी मन में कि
बगल में कोई खबबसूरत स्वस्थ पुरुष बैठा है उसका अपना पुरुष और वह तल्लीन
होकर उसके कंधे पर सिर धरे सिनेमा देख रही है । बिलकुल फिल्म की कहानी की
तरह वह पुरुष कॉफी पॉपकॉर्न लाता है और जब गीत चल रहा होता है तो उसको
थपकता शरारती हो जाता है । बालों में उंगलियाँ फिराता हुआ उसका अपना सपना
कब फिल्म से अधिक प्रबल हो गया पता ही नहीं चला । तीन घंटे बाद जब सब
उठकर बाहर जाने लगे तो कुछ लङकियों ने सुभद्रा को झिंझोङकर जगाया ।
ओ हो तुम तो सो रही हो!!!!!!!
ओ माय गॉड इतनी अच्छी फिल्म भी मिस कर दी!!!! क्या तुम बोर हो रहीं थीं?
न न नहीं तो वो बस यूँ ही पता नहीं कब आँख लग गयी।
सुभद्रा चुपचाप आकर कैंप के अपने रूम में सो गयी लङकियाँ देर रात तक
फिल्म के बारे में ही बातें करती रहीं संवाद कहानी और गीत ।
सुभद्रा के मन में एक सपना पल गया चुपके से । कहीं भी किसी मनोरंजन
थियेटर फिल्म मंच होली दीवाली पिकनिक को अपने भावी पुरुष साथी के साथ
सेलीब्रेट करने जी लेने मनाने और महसूस करने का। कुछ साल बाद सब लङकियों
की एक एक करके शादियाँ होती गयीं और सुभद्रा की भी शादी हो गयी। पूरी
शिद्दत और तवज्जो से सुभद्रा ने घर सँभाल लिया । वह रोज़ अखबार में देखती
कहाँ किस टॉकीज में कौन सी फिल्म लगी है और कौन से ऑडिटोरियम में कौन सा
नाटक या डांस शो मंचित होने वाला है । कई सप्ताह महीने फिर साल बीत गये ।
सुभद्रा न तो मायके आने पर टॉकीज जाती न कभी पति के साथ जाने का कोई मौका
आया । पति का स्वभाव ही ऐसा था जिसमें आऊटिंग मनोरंजन रोमांस को कोई
स्थान नहीं था। रोज सुबह नहा धोकर खाकर घर से निकलना और शाम को नहा धोकर
खाकर सो जाना एक बेड पर सोने के पलों की रुटीन दिनचर्या में भी धीरे धीरे
एक उदासीनता बोरियत और संवादहीनता सी बढ़ा दी । सालों बीत गये न कभी
सुभद्रा ने कहा न ही कभी सुभद्रा के पति ने कोई पहल की पिकनिक सिनेमा
मॉर्निंग वॉक थियेटर और कोई भी पब्लिक मनोरंजन स्थल यहाँ तक कि मेला
मंदिर या करीबी शादियों की पार्टी तक में बहुत ही कम साथ जाना हो सका ।
धीरे धीरे सुभद्रा केवल घर तक ही सीमित रह गयी । बच्चे बढ़े हो गये और घर
में टी वी आ गया डी वी डी प्लेयर भी । किंतु सुभद्रा को कोई रुचि नहीं
रही थी। बच्चे अपनी पसंद की फिल्में लाते और पसंद के कार्टून देखते । न
सुभद्रा को वक्त मिलता बैठने का ना ही उसके पति को। सपना कब का भूल ही
गयी थी कि एक दिन बरसों बाद मायके में भतीजी की शादी में पुरानी सहेलियाँ
मिल गयीं जो पारिवारिक मित्रता के कारण बुलाईं गयीं थीं ।
लङकी की विदाई के बाद भाभियों और सहेलियों सहित सब महिलाओं का प्रोग्राम
बन गया चलो फिल्म देखने चलते हैं ये उदासी तो दूर हो ।
सुभद्रा के पति भी आये हुये थे । शाम को सब तैयार होकर चल दिये ।

अरे तुम तैयार नहीं हुयीं?
लगता है नंबरिंग चुका दोगी । चलो फटाफट बस कपङे बदल लो ।

कल्पिता चीखी

नहीं तुम लोग जाओ ।

लेकिन क्यों सुभद्रा? तुम्हें तो कितनी पसंद हैं फिल्में!!! और ये तो
तुम्हारे फेवरेट एक्टर्स की मूवी है!!

तभी छोटी भाभी चहकी जो अकसर स्टोरी सुनाती थीं और कभी कभार गीत भी।

नहीं भाभी मैं नहीं जा रही हूँ।

अब चलो भी
कजिन बहिन बोली ।

मैं रीयली कभी फिल्म नहीं देखने जाती मिन्नी!!

ओ बनो मत हर समय गुनगुनाती रहती हो फिल्मी गीत और तुमने कभी फिल्म नहीं
देखी!!!या ये कहो कि हम से अलग जीजू के साथ कहीं बॉक्स में बैठकर दूसरी
टॉकीज में जाने का प्लान है मेम?

अच्छा ये तो कहो कि फिल्म देखते समय किसकी बाँहों में बैठना पसंद है ?
कुरसी की या जीजू की? भई मुझे तो इनका डिस्टर्ब पसंद नहीं सारा मज़ा
किरकिरा हो जाता है।

नहीं हम लोग फिल्म कभी नहीं गये ।

किसे बना रही हो!! ऐसा भी कोई होगा जिसने फिल्में ना देखी
हों!!!!!!अमेज़िंग आई कांट बिलीव । मैं शर्त लगा सकता हूँ ।

तभी सहेली के पति बोले

तो फिर आप शर्त हार गये क्योंकि मैंने वाकई कभी टॉकीज जाकर फिल्में नहीं देखी ।

कभी नहीं!!!!! अनबिलीवेबल!!!

हाँ पापा की बाँहों में बैठकर देखी हैं जब तक कि घर पर अकेले रूकने लायक नहीं थे ।

कभी नहीं??
हैरत से बोली बङी भाभी । हाँ भाभी आप बताओ कभी देखा है??

उँ उँ न नहीं तो कभी नहीं । मगर मेरे आने से पहले ससुराल में और सहेलियों
के साथ तो गयी ही होगी? हनीमून पर?? कभी नहीं?

नहीं हम कहीं नहीं गये बाहर साथ

बट व्हाई?

बिकॉज आई हेट इंडियन मूवीज?!

ये दिमाग़ खराब कर देतीं हैं । जिंदगी के झूठे सपने रंग और अहसास जगाती
हैं । जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता । सब कुछ एकदम अलग होता है । और ये
फिल्में उस हकीकत को नॉर्मल नहीं रहने देती कङवा बनाती हैं । हर सामान्य
सी बात ये चुभन बना देती हैं ।

आई हेट
आई हेट इंडियन मूवीज
आई हेट इंडियन मूवीज।
!!!!!
सुभद्रा हाँफने लगी

और सुभद्रा के पति तेज स्वर में बोलते देखकर पहली बार चौंककर बाहर निकले
तो सुमेधा की आँखें भरीं थीं ।

क्या हुआ??

क क कुछ नहीं ।

तुम रो रही हो!!!

नहीं

चीखी क्यों थी?

सब चुप चाप एक एक करके बाहर अपनी अपनी कार में जा बैठे जोङे से

तुम नहीं चल रही हो सुभद्रा?
मैं तो तैयार हो कर भी आ गया सब ने कहा कि आज सब फिल्म देखने जा रहे हैं?
चलो फिर तब तक मैं वापसी के लिये पैकिंग ही कर लेता हूँ।

सुभद्रा के पति ने एक आश्चर्य से कहा

शी हेट इंडियन मूवीज बिकॉज दे मेक टू ड्रीम्स अन एचीवेबल थिंग्स!!!!


छोटी भाभी ने सिर झुकाकर दाँत भींचकर कहा और बाहर निकल गयीं पलकें पोंछती हुयीं ।

©®सुधा राजे
पूर्णतः मौलिक कहानी
all right reserved

Friday, 29 November 2013

बच्चे 9

बच्चे9-
प्रतिभा किसी की बपौती नहीं ।और हर प्रतिभाशाली बच्चे को सही गाईड मिलता
नहीं। बङा दुर्भाग्य है भारतीय बच्चों का जहाँ मौलिकता सिसकती है और नकल
सिर चढ़कर बोलती है । कई उदाहरण आप सबने भी देखे होंगे और हमने भी। एक
बच्ची कक्षा तीन की बालसभा में सामंती संस्कार लौहआवरण की नीति में पली
बढ़ी । केवल स्कूल ही मुक्तिधाम और वहाँ सब बच्चे तरह तरह के फिल्मी गीत
चुटकुले सुनाते वह बच्ची केवल सात साल की कुछ सुनाना चाहती है किंतु
फिल्म या टीवी ग़ुनाह जहाँ होते हों वहाँ आम आदमी के जीवन के कथा
चुटकुले कहाँ संभव हो सकते है । बच्ची रोज़ एक मासपरायण दो बार में पूरा
करती है सुबह शाम गीता पढ़ती है नानी के लिये और कठोर दिनचर्या का पालन
करती है जहाँ खेलने खाने पहनने तक के प्रोटोकोल हैं । बच्ची रोज कल्पित
कहानी और कविता सुनाने लगती हैं । क्योंकि उसको तालियाँ और शाबासी सुहानी
लगती जो दूसरों को मिलती है । बच्ची चित्र बनाती है । और लोकसंगीत की
धुनो पर गीत गाती है मौलिक । किंतु साहस नहीं होता कि कहे मैम ये गीत
कहानी हम अभी कहते कहते ही गढ़ते जा रहे हैं । मैम उस गीत को सबको साथ
लेकर मंचित करने को कहतीं है और कभी नहीं सामने आती प्रतिभा । एक दिन
गीतों की डायरी किसी बङे के हाथ लग जाती है और बङे को लगता है बच्ची की
रुचि भटक रही है । डायरी आग में डाल देती है डरी हुयी बच्ची और पेंटिग
भी। प्रतिभा को अवसर चाहिये । प्रेरणा चाहिये और चाहिये आकलन । ये कोई
विज्ञान का प्रयोग हो सकता है । थॉमस अल्वा एडीसन की माता का धीरज सब की
माता या पिता के पास नहीं होता कि स्कूल से शिक़ायत आये तो भी घर कहकर
पढ़ा ले । अक्सर बच्चों की मौलिकता उनके परिवार के उसूलों के दमन नियमन
और प्रोटोकोल में पिसकर रह जाती है। बच्ची देखती है उससे कई साल बङी
सीनियर एकदम बेकार चित्र बनाती है और केवल तुकबंदियाँ लिखती है किंतु
उसकी माँ पिता जी सब सहेजकर ही नहीं रख रहे अपितु बुक के रूप में छपवा कर
बाँट रहे हैं और वहाँ जहाँ विद्रूप चित्रण है वहाँ पूरी विद्वत्मंडली से
सलाह ले कर सुधार कर रहे हैं । बच्ची भयवश छद्मनाम से लिखकर किसी अज्ञात
की रचना कह कह कर अपने ही गीत सुनाकर सबकी तारीफ उस अज्ञात के लिये पाकर
ही प्रसन्न है ।
से अकसर प्रतिभा की मौत की वज़ह है । टीचर को लगता है वह लिख सकती है और
शोषण जारी हो जाता है । टीचर के प्रिय पात्र को भाषण लिखा दो
कोरियोग्राफी कर दो और स्किट लिख दो ।
एक बच्चा गाता है बेहद सुरीला किंतु परिजन उसे मिरासी भांड गवैया ओय
फिल्मी चैनल कह कर हताश कर डालते हैं और वह कभी गुनगुनाना तक छोङ देता
है।
नृत्य गीत चित्रकला कविता लेखन स्टोरी टेलिंग और ऐसे ही तमाम टेलेंट
चूँकि कमाई की गारंटी नहीं देते इसलिये अकसर भौतिकतावादी परिवारों और
बहुत कानून क़ायदे नियम पर चलने वाले परिवारों में ऐसे बच्चे अभागे ही
बनकर रह जाते हैं । बहिष्कृत और तनहा अलग थलग और दुखी दुखी। क्योंकि उनको
अभिव्यक्ति नहीं मिलती। नाप तौल कर बोलना नाप तौल कर चलना और वह भी होश
आने से पहले से ही। एक प्रताङना है बिना कुछ दिखाई देता अत्याचार किये भी
एक अन्याय है। सब के सब एक जैसे कैसे हो सकते हैं । भेदभाव स्कूल और घर
हर जगह तोङ डालता है निराशा कुंठा बग़ावत पैदा करती है और बच्चे एक सीमा
के बाद बाग़ी और उद्दंड या फिर हताश और सुस्त मृत हो जाते हैं । जोश
उत्साह और उल्लास नहीं रहेगा तो बचपन कैसे रहेगा। बङी क्रूरता है एक
प्रतिभाशाली बच्चे को उसकी प्राण से प्रिय चीज उसके हुनर टेलेंट हॉबी या
शोध से ज़ुदा करके वही सब करने को विवश करना रिश्तों की दुहाई पर जो सब
आम तौर पर करते हैं । वह ख़ास बच्चा काश किसी पारखी के हाथ पङ जाता तो
देश समाज विश्व को एक नायाब रत्न मिल जाता । सही विलक्षण बच्चे तो विश्व
ब्रह्म के मंदिर की ईंटें हैं । मगर हर ईंट कहाँ मंदिर तक लग पाती है ।
कुछ तोङकर पैरों के नीचे समतल राह पर बिछा दीं जाती हैं । टीचर पिता माता
और बङे बुजुर्ग जब पहचान कर भी क्रूरता से उस हुनर को मंच तक जाने
लेबोरेटरी तक जाने और एकांत सेवन से तक रोक देते हैं तो एक हत्या हो जाती
है उस बोधिवृक्ष की जिसके नीचे न जाने कितने विकल पनाह पा सकते थे। अगर
प्रतिभाशाली बच्चा लङकी है और परंपरावादी परिवार में जनमी है तब तो हर
तरह से बदनसीब ही कही जा सकती है। लङकियाँ आज भी औसतन अधिकांश परिवारों
में भाई और चाचा से कम समझी जाती हैं । जहाँ भाई को खेलने और बाहर
मित्रों के साथ समय बिताने पार्टी दावत और सभा में जाने के पूरे अवसर
मिलते हैं वहीं लङकी को स्कूल से घर के बीच ही तब तक बंद रहना होता है जब
तक जॉब या शादी न हो जाये । जॉब बहुत कम परिवारों में लङकी के लिये प्रथम
प्रायोरिटी रहती है। प्रथम बात होती है विवाह । लङकी की कुंडली मिल गयी
लङका कम दहेज पर पट गया और क्या चाहिये? पीएचडी अभी पूरी होने को है अभी
कंपटीशन की तैयारी कर रही है लङकी अरे बस बहुत पढ़ लिया जाओ अपने घर
जिम्मेदारी हटी और करना क्या है आखिर तो लङकी के पति को ही निर्णय लेना
है वह चाहे तो पढ़ा लेगा न चाहे तो जमी जमाई जॉब बंद करा देगा ।
लङकियाँ लगभग इसी नज़रिये से जिस देश में पाली जातीं हों वहाँ लङकियों के
टेलेंट डांस गायन कविता कहानी संगीत पेंटिग और फोटोग्राफी सिवा चोंचले के
कुछ गंभीर नहीं माने जाते । ये अलग बात है कि कब्र में दफनाने के बाद भी
मुरदा कब्र फाङकर निकल पङे और अपने टेलेंट को बाढ़ के पानी की तरह रास्ता
तोङकर बहाता जाये । किंतु हर बार हर प्रतिभा कब्र नबीं तोङ पाती ।
लङकियाँ जहाँ मातृत्व और परिवार के चक्रव्यूह उपेक्षा और कर्त्तव्य की
चक्की में पिस जाती है लङके वहीं कमाई दोस्ती दुश्मनी परिवार के बोझ के
तले केवल बैल की तरह गाङी खींचने में जाया हो जाते हैं।
हिंदी भाषी बच्चे भले ही वे समान रूप से कई और भाषायें समझते हों इस तरह
के दमन का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं । क्योंकि आज भी साहबों की गिनती
केवल अंग्रेजी भाषी बच्चों से ही शुरू और खत्म होती है।
भारत की शिक्षा पद्धति भी भयंकर शोषक है प्रतिभा की जहाँ नवीनता को गुनाह
और रट्टामार नकलची को पूरे अंक मिलते हैं । जहाँ टीचर का ही लिखा लिखकर
आने पर नंबर मिलते हैं जबकि चाहे टीचर औसत बुद्धि का हो बच्चा तर्कशक्ति
संपन्न जीनियस । किंतु हाँ बच्चे के पिता का पद और हैसियत ऊँची है तो हो
सकता टीचर अडंगा न डाले परंतु वह जहर नहीं दिया मगर समय पर दवा भी नहीं
दी का गुनाह कर सकता है । ये अभागी प्रतिभायें उन सितारों से कहीं अधिक
चमकदार टेलेंटेड होतीं जो पिता माता और गुरु गॉडफादर मदर मिल जाने से
माँज माँज कर चमकाये गये और दूसरे ऊँचे लोगो की बाँह पर चढ़कर जा बैठे ।
इन अभागी प्रतिभाओं की चिता और कब्र पर भी कदाचित ही फूल चढ़ें । न जाने
कितने थ्यागराजा की धुनें चुराकर कितने पद्माकर के नकलची दरबार के नवरतन
हो गये ।
बचपन को कैसे सँवारा जाता है आज तक भी एक औसत भारतीय विशेषकर हिंदीभाषी
भारतीय कतई नहीं जानते । न बच्चो के खेल का समय घोषित है न हॉबी के अवसर
न ही हुनर को स्कूल या घर या नगर से प्रदर्शन प्रेरणा। अगर ये बच्चे तब
भी कहीं दिया जुगनू शमाँ बन सके तो ये उनके ही भीतर की आग का करिश्मा ही
समझा जाये और जिजीविषा ।
कैसा अन्याय कि काँच माँजकर शिखर पर और हीरे दफन कर दिये जाते हैं ।
याद रखें प्रतिभाशाली बच्चा आपकी अपनी प्रॉपर्टी नहीं वह कुदरत के खास
मिशन प्लान के तहत धरती पर आया नक्षत्र है अगर आपने पहचान ही लिया तो उसे
विवश दमित ना करे । समय बाँट दें ताकि अगर वह आपके दिये दायित्व
अपेक्षाकृत कम समय और सही ढंग से कर दिखाये तो बचा समय उसका । समय ही
नहीं प्रेरणा भी दें ..
©®सुधा राजे
क्रमशः जारी '''''''''

सुधा राजे की एक गज़ल।

न मैं जा सकूँ न बुला सकूँ तेरी याद में भी न
आ सकूँ । तुझे याद रखना भी दर्द दे
तेरा नाम भी न भुला सकूँ ।
तुझे देख लूँ न वो ताब है तुझे सुन सकूँ ये
भी ख़्वाब है। तू वो माहो आफ़ताब सा
मेरा हक़ नहीं के मैं ला सकूँ
जैसे बादलों में नहा रहा । जैसे चाँदनी में
समा रहा । ये हवा भी तेरा ही गीत है।
कोई ख़त नहीं कि जला सकूँ ।
जिस रोज़ से तुझे खो दिया। मेरे ग़म ने
मुझको डुबो दिया । मिला आके ऐसे तू
मोङ पे ।
न मैं रो सकूँ न रुला सकूँ ।
जैसे आखिरी सी ये आरज़ू । तेरे शाने मिलके
मैं रो सकूँ । तेरी ज़ानुओ पे न मर सकूँ। तुझे
बाँहों में न झुला सकूँ।
है ये इल्तिज़ा कि तू लौट
जा मेरा इम्तिहां कि मैं हूँ "सुधा "। न मैं
पी सकूँ न दिला सकूँ। ज़ां ये ख़ुम
नहीं कि पिला सकूँ।
©®सुधा राजे
Sudha Raje
सर्वाधिकार सुरक्षित।
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
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यह रचना पूर्णतः मौलिक है।
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प्रेम और परिवर्तन

Sudha Raje
प्रेम तब एक पेट भर दूध
था और भयभीत
एकाकीपन को शोर से
मुक्त करता बाहुपाश
गुनगुनाहट के अबूझ स्वर और
हर पल एक ऐसे
देहधारी का सामीप्य
जो मेरे रोने की कार्य
कारण समीक्षा किये
बिना तुरंत मुझे चिपका लेते
वक्ष से
सुख तब केवल एक भरे पेट पर
किलकती हुलसती हुंकारे
वायु में प्रहार करते
दो पाँव छाती भर स्पर्श
और अबूझ गुनगुन भर था
दुख था इनका न होना और
लक्ष्य था चल पाना पकङ
पाना मुट्ठी में रोटी और
खिलौना
एक के बाद एक लक्ष्य बदलते
रहे उपलब्धि कुछ
भी नहीं रही यात्रा ही नियति हो
गयी और
बाहुपाश छोटे हो गये पेट
भरने से सुख का संबंध
समाप्त हो गया
तब प्रेम एक अस्तित्व
की तलाश बन गया
समष्टि का शोर और भीङ
भयभीत ही नहीं चकित
भी करते
भीङ में हर चेहरा पलट कर
देखता मन कहता
ये वो नहीं
हर सामान पलट कर
देखता कहता मन ये
तो नहीं
बाँहो के विस्तार
दृष्टि की सीमा
कंठ की गूँज
पैरों की टूटन की चरम तक
जो मिला सीखा जाना समझा
लेकिन
वहीं का वहीं था मन
निस्पृह
निराकृत
निरानंद
तब जमा की गयी सब चीजे
एक एक कर
दूसरों को सौंपनी शुरू कर
दीं उनको जिन्हें उन
व्यक्तियों वस्तुओं
की आवश्यकता मुझसे
अधिक थी
फिर कुछ ना रहा एक दिन
मेरे पास
मैंने स्वयं
को बाँटना प्रारंभ कर
दिया थोङा थोङा उन
सबमें जिन्हें मेरी उस
भूमिका की आवश्यकता मुझसे
अधिक थी
और एक दिन मैं समाप्त
हो गया शून्य निराकार
निर्विकार
तब विरक्ति के महासागर
ने मृत सागर का सांद्र रूप
देखा मैं शुद्ध प्रेम था बस
जिसमें न कोई जीवित
रहा ना डूब सका
ना पी सका
मैं
पा चुका स्वयं को
अब न मुझे
किसी की आवश्यकता थी न
किसी को मेरी
हाँ
कौतुक के पंछी धोखे में
गौर से देखते
आगे बढ़ जाते
©®¶©®
Sudha Raje
Feb
27

बच्चे 8-

बच्चे8-
तनाव टेंशन दुख विरह एकाकीपन डर तनहाई और निराशा ।

आपको क्या लगता है ये सारे शब्द बालिग हैं?
गुङिया की समस्या है कि उसके बगल में एक लङका बैठता है जो अकसर लंच
चुराकर खा जाता है और बॉटल जूठी कर देता है । टीचर से झूठी शिकायतें करता
रहता है । मुनिया की समस्या है बस कंडक्टर रोज किसी बहाने इंटेशनली छूता
और मुसकराता है बस में चालू किस्म के गाने जोर से बजाता रहता जबकि वह उस
तीस मिनट में पढ़ना चाहती है। बबलू को चिंता है कि अगर अबकी बार भी गेम्स
में सिलेक्शन नहीं हुआ तो उसका विश्वनाथन आनंद या सचिन बनने का सपना टूट
जायेगा जबकि टीचर और कोच भेदभाव पक्षपात पर उतारू हैं। मिकी को घर में
दिन भर शोर पापा मम्मी दादी और काका काकी के झगङों की वजह से समय नहीं
मिलता पढ़ने का वह रात रात भर जाग जाग कर पढ़ती है और क्लास में सुस्त
रहती है। टोनी स्कूल इसीलिये भाग जाता है एक घंटा पहले और छुट्टी के एक
घंटे बाद आता है कि घर में सब जमकर काम कराते हैं और गलतियाँ खोजकर पीटते
हैं । गुड्डी की कोई सहेली नहीं है क्योंकि सब उसके भाईय़ों से डरते हैं
ऐर लङकियाँ गुड्डी के घर नहीं आतीं ।
बच्चे दिन भर अकेले है मजदूर किसान परिवारों के बाप परदेश गया माँ पानी
गोबर ढोर खलिहान करती है बच्चे अकेले हैं डरे सहमे रोते हुये और तनहा।
माँ जॉब करती है पापा की ड्यूटी दूर है दादी दादा गाँव से आने को तैयार
नहीं बच्चे दिन भऱ भीतर से ताला लगाये डरे सहमे बंद रहते हैं आतंकित।
लाखों बच्चे बिन माँ के बच्चे है या बिना पिता के बच्चे हैं । और करोङो
बच्चे दुष्ट पिता और लापरवाह माता के बच्चे हैं।
एकदम झूठ है ये सरासर झूठ है कि ""कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति ""
होती है माँ भी कुमाता होती है । और पिता भी कुपिता होता है।
तब जब माँ बात बात पर जैसा तेरा बाप गंदे खून की गंदी नस्ल और पिता माँ
के खून नस्ल को बच्चे की गलती पर कोसते हैं। जब शराब पीने को रोज सैकङों
रुपये फूकने वाले पिता को याद नहीं रहता कि फल सब्जी विविध अनाज दूध घी
बच्चे को पूरा कद काठ विकास देने को ज्यादा ज़रूरी हैं । माँ जब
ब्यूटीपार्लर पर तमाम खर्च करके और घर के गुलदस्ते परदे फर्नीचर पर खर्च
करती है कपङे गहने मेकअप पार्टी मगर उसे याद नहीं रहता बच्चे का थर्ड
टर्म एक्ज़ाम है और बादाम अखरोट टॉनिक शांति और अतिरिक्त समय बच्चे को
चाहिये। बच्चों की छोटी मोटी बीमारी टीकाकरण अज्ञानी ही नहीं पढ़े लिखे
दंपत्ति भी अकसर अवॉईड करते मिल दाते हैं। माँ ब्रेड बिस्किट मैगी पासता
मेकरॉनी कॉर्नफ्लेक्स टिफिन में देकर भूल जाती है कि सेहत बच्चे की
निर्भर है सुबह दोपहर शाम रात के भोजन पर ।
पूरी साढ़े छह फीट की काया विकसित हो सकती थी जिस बच्चे की वह ग़रीबी
नहीं वरन माँ बाप की लापरवाही और कर्त्तव्य चोरी की वजह से पौने पाँच फीट
का ही रह गया।
तनहा तनहा केवल इश्क़ में ही नहीं हुआ जाता । कुछ बच्चे भी तनहा किस क़दर
हो सकते हैं कलेजा चीर देने वाली बात है। दादा दादी है नहीं काका काकी
नहीं बुआ की शादी हो गयी पापा बेड पर और माँ दिन भर काम करती है । बच्चा
चुप रहने का आदी हो जाता है और ये चुप्पी क्लास में दोस्त नहीं बनने देती
। मेधावी बच्चा किंतु परिवार में कभी माँ के सिवा किसी से बात ही नहीं की
तो क्लास में क्या बोले!!!!!! बिट्टू की दशा का अहसास तक नहीं था माँ को
नर्सरी करने के बाद अचानक बिट्टू की क्लास में जाना पङा । लंच टाईम था सब
बच्चे झुंड में खाना खाते खेलते और बिट्टू चुपचाप अकेले अपनी चेयर पर एक
एक निवाला खाये जा रही है!!!! क्यों बेटा!!! जाओ खेलो न जल्दी खा के?
नहीं माँ हमारा कोई फ्रेंड नहीं!!!!

क्यों? क्योंकि बिट्टू ने कभी माँ के सिवा किसी से बात ही नहीं की!!!
उसे नहीं पता सामान्य घरों के बच्चे क्या क्या बातें करते हैं और पढ़ने
और कहानिया सुनने या माँ के गीत माँ के साथ खेलने से भी अलावा कोई रोचक
बात चीत हो सकती है। उसकी हर बात माँ से शुरू माँ पर खत्म हो जाती है ।
टीचर से पूछा । कहा बहुत जीनियस बच्ची कॉन्फिडेंट ।
शायद घंटों रोये हम । किंतु बच्चे के दोस्त नहीं बना सके लंबे समय तक
फिर बच्चे को बच्चों के बीच जहाँ मौका मिलता ले जाते । और क्लास के
बच्चों से रोज सुबह और दोपहर दो चार बातें करते तब जाकर बिट्टू का ग्रुप
बना ।
ये कहीं भी हो सकता है । कोई भी बिट्टू तनहा तनाव ग्रस्त चिंतित हो सकता
है। ये चिंता कुछ भी हो सकती है । बिट्टू को रामायण पता है महाभारत और
टॉलस्टॉय शेक्सपीयर किंतु पौकीमौन पिकाचू शिनचेन नहीं पता ।
तब?
ये मजदूर बच्चा चिंतिंत हो सकता है कि अगर आज कम पैसा कमाया तो घर पर पिटाई पङेगी।
बङे लोग मनोरंजन कर लेते है बातें बराबर वालों में और ग़म ग़लत किंतु
छोटे बच्चों की तनहाई तनाव और चिंता कोई मायने ही नहीं रखती?
बाल साहित्य बाल फिल्में बाल टीवी शो??? क्या सब बच्चों को उपलब्ध है?
आप अगर अभिभावक हैं तो पशु की तरह केवल खूँटे पर रोटी कपङा किताबें देकर
पढ़ो पढ़ो मत चीखते रहिये ।
जब तक आपको बच्चे के सब टीचर सब क्लास मेट ड्राईवर कंडक्टर और रोज की
दिनचर्या में हर तबदीली का नाम पता घटना सबके पते ठिकाने नहीं मालूम आप
ग़ैर जिम्मेदार अभिभावक हैं ।
आपके दोस्तों को चाय नाश्ता ड्रिंक और स्वागत??
लेकिन बच्चे के दोस्तों को? दुत्कार? और बस यूँ ही उँहू बच्चे हैं!!
कभी अपने मेहमानों की तरह अपने बच्चों के दोस्तों का भी स्वागत करके देखिये!!
और महसूस कीजिये वह खुशी और परिवर्तन जो आपके बच्चे में आयी है। याद
रखिये आपके बच्चे की लंबाई चौङाई सेहत और संस्कार वयस्क होने के बाद आप
चाहकर भी नहीं बदल सकते । तो पूरा विकास पूरी तवज्जो के साथ क्यों नहीं ।
वरना आप में और सूदखोर साहूकार में क्या अंतर है जो ब्याज के लालच में
निवेश करता है? और आप दहेज और बुढ़ापा वंश और समाज में प्रतिष्ठा और सेवा
कराने के लालच धर्म और स्वर्ग नर्क के लालच में बच्चे पालते हैं उनसे
बदले में सारा जीवन ज़रखरीद गुलामों की सी जी हुज़ूरी की उम्मीद रखते
हैं?
कुमाता वह माँ है जो बच्चे को परवरिश कम ताने ज्यादा दे । पिता वह कुपिता
है जो सजा अधिक और पोषण कम दे ।
©®सुधा राजे
क्रमशः जारी ''''''''

Thursday, 28 November 2013

बच्चो -7-

Sudha Raje
बच्चे भाग 7-
तमाचा!!!! थप्पङ और चाँटा!!! मुक्का लात
जूते घूँसे छङी हंटर संटी बेल्ट डंडा और
चिमटा बेलन झाङू!!!!!
क्या किसी चोर डाकू की पिटाई
हो रही है???क्या किसी मवाली की?
थाना है या अड्डा??
नहीं
ये हैं भारतीय आम बच्चे हैं और घर में पिट
रहे हैं ।
क्यों?
क्योंकि बच्चे ने जरा सा गुङ
चुरा लिया । दही चुराकर खा लिया।
क्योंकि माँ के पैसे चुराकर आईसक्रीम खाई
। क्योंकि बिना बताये खेलने चले गये ।
क्योंकि टी वी देख रहे थे ।
और सबसे ज्यादा वजह क्योंकि होम वर्क
नहीं किया और नंबर कम आये। बिस्तर पर
सू सू कर दी। दादी दादा काका को घर
की कोई बात बता दी।
बुरी तरह रो रो कर दया की भीख
माँगते ये बच्चे किस कदर पिटते हैं अगर
हमारे पाठकों ने मदरसे या गाँव के स्कूल
में शिक्षा पाई
हो तो पता हो सकता है। वैसे इंगलिश
मीडियम की झूठी पब्लिसिटी करके हर
गली में खुले निजी स्कूल
जो हिंदी मीडियम की मान्यता पर
पढ़ा रहे है अंगरेजी वहाँ भी किसी चोर
गुंडे डाकू की तरह ही मार खाते नजर आ
जाते हैं यदा कदा समाचार भी बन
ही जाते है ।
मारता कौन है???
माँ
पापा
भैया
दीदी
काका
चाचा
दादा
ताऊ
टीचर
और मेन्टॉर उस्ताद।
क्या खूब सोच है भारतीय परवरिश की!!
बच्चे समझाया नहीं आतंकित करके दहशत
पैदा करके बात मनवाई जाती है!!!
दो पङौसिने या सास बहू या ननद
भाभी देवरानी जेठानी या कोई
भी दो के बच्चे किसी बात पर झगङ
ही गये शिक़वा शिकायत झगङा बङों ने
किया और बङों को ही अपमानबोध
इतना अधिक हो गया कि अपने बच्चे
को तङातङ पीट दिया!!
ले और ले और ले और ले ।
???
कैसी खुन्नस? किसका कुसूर
सज़ा किसको क्यो?
सास ने बच्चे को पाँच रुपये दे दिये बहू से
बोलचाल बंद है बहू ने दनादन पीट
दिया बच्चे को।
पत्नी ने कुछ कह दिया पिता ने बेटे
की पिटाई लगा दी।
पति से झगङा हुआ औऱ एक भयानक
घटना कि बच्चा गले में बाँधकर एक बहू
कुँयें में कूद गयी ।
ज़ान निकलने लगी तो बचाओ बचाओ
चीखी और जब
दोनों को निकाला बच्चा मर चुका था ।
ग़म में आग लगा ली।
आप होते कौन हो बच्चे को ज़ान से मारने
का फैसला करने वाले?
बॉस ले टें टें हो गयी घर में
बच्चों की हुल्लङ बाज़ी मातमी मन
को नहीं लगी बस पीट दिया??
आप पूरे देश के आँकङे जुटाकर देखें कि कलह
की वजह से सुसाईड करने
वाली कितनी माँयें बच्चे की हत्या करके
मर जाती हैं । उनमें से
अभागियों की संख्या भी बङी है जिनमें
बच्चा मर गया माँ जिंदा बच गयी ।
कलह में पिता ने नवजात पटक कर मार
दिया। जलन वश नाते रिश्तेदार ने मार
दिया।
जिन दंपत्तियों में अनबन ज्यादा रहती हैं
वहाँ बच्चे भी बँट जाते हैं ।
माँ का दुलारा और बाप का लाङला अलग
अलग बच्चा।भले ही अज़ीब लगे किंतु
पिता माता के बीच अगर झगङा है
तो बच्चे रात दिन एक अशांत और भयानक
माहौल का सामना करते हैं । बङे होते
जाते बच्चे जैसे माँ बाप के झगङों में
हथियार बन जाते है माँ बेटे
को पिता की हिंसा की ढाल के रूप में
खङा करती है तो बेटी को पिता कुकिंग
चाय नाश्ता कपङे जैसी सेवाओं के बदले
पत्नी के विरोध में
बढ़ावा देता जाता है।
तलाक अलग होता है तो सबसे
ज्यादा आहत कोई होता है तो बच्चे।
न कोई सौतेला पिता न
सौतेली माँ प्रायः विकल्प बन पाते हैं ।
अपवाद भले ही हों किन्हीं रेयरेस्ट ऑफ
रेयर केस में किंतु यह सच है इंसान केवल
अपने ही बच्चे को मन से ग्रहण करता है
संतान के रूप में।
सास बहू ननद देवरानी जेठानी वाले
डिरामा में तो बच्चों से जासूसी और
कूटनीज्ञ सलाहकार बना कर रख दिये
जाते हैं। अगर आप माँ हैं तो याद करें
कि बच्चा माँ के प्रति कितना पजेसिव
होता है । माँ का दूध पीते समय सप्ताह
भर का शिशु भी दूसरे स्तन पर हाथ
रखकर जैसे
अपनी माँ को किसी को भी छूने
नहीं देना चाहता। बहुत कम अंतर वाले
भाई बहिनों में झगङे की वजह माँ पर हक़
ही अचेतन में होता है।
ये बच्चा जो ज़ान से
प्यारा कहा जाता है फिर क्यों आखिर
क्यों झूठे अहंकार प्रतिष्ठा और
ईर्ष्यावश पीटा जाता है???
स्त्री को पति सास ससुर पीट दें
तो घरेलू हिंसा!!!! और माँयें बेरहमी से
बच्चे को पीटती रहें वह कुछ भी नहीं??
जवान विवाहित लङको को बूढ़ा बाप
पीट दे तो बस पिताजी?? और मासूम
बच्चे को जब
युवा पिता जल्लादों की तरह पीट दे
तो कुछ भी नहीं??
ये पीटना दरअसल एक कमज़ोरी है।
हिंसकता से अपनी बात मनवाने की आदत
।जो ये साफ साफ घोषित करता है
कि बच्चे को समझाना और हृदय में
राज़ी ख़ुशी उत्साह से
भागीदारी को कन्विस
करना आपको नहीं आता।
अगर पीट कर बात मनवानी तक नौबत है
तो एक फेल और अयोग्य
माँ पिता कहना पङेगा।
क्रमशः जारी '''''''
©®सुधा राजे।

बच्चे 6

Sudha Raje
बच्चे 6-
एक था हेयर ड्रैसर जब जब छोटी और
किशोर लङकियों के बाल काटता ।
कैंची बालों पर चलती और
उंगलियाँ गालों पर साशय टिकी रहती ।
हमेशा शराब के नशे में रहता । हुनरमंद
कारीग़र कि नगर में जोङ नहीं दूसरा ।
कटे बाल गिरते उठाने को जानबूझकर
लङकियों के गले पीठ छाती पर हाथ
का प्रेशर बढ़ जाता। एक दिन एक
टोली लङकियों की झगङ
बैठी तो लङकियों को ही वहमी और
गलत विचार की कहकर माफी माँग ली ।
लेकिन धीरे धीरे ये बात नगर में फैल
गयी और जब एक महिला हेयर ड्रेसर
उपलब्ध हुयी तो दुकान ठप्प हो गयी।
हुनरमंद फिर कैची लिये
घोङों की हज़ामत में रहे। बाद में
हुनरमंद के बेटों ने
पूरी निष्ठा ईमानदारी से दुकान री अरेंज
करके चलानी शुरू कर दी किंतु
लङकियाँ कतराने लगीं।
एक थे डॉक्टर त्वचारोग एवं
अस्थि रोग विशेषज्ञ सी एम ओ भी।
किशोरी हो या बच्ची चैकअप के बहाने
पेट पीठ कमर पेडू को नीचे और नीचे
तक छूते चले जाते । ऊपर हाथ रखते
तो ब्रा की स्टेप तक चले जाते ।
बहाना पक्का और चिकित्सक गुणवान ।
एक बार कॉलेज
की लङकियों की टोली ने
सारा चिट्ठा खोल दिया । डॉक्टर साब
की बात पर कई ने परस्पर हाँ भरी तब
जाकर डॉक्टर जी का तबादला हुआ।
डॉक्टर एक पवित्र पेशा। जिसके हाथ
ईश्वर के कहे जाते हैं ।
जो किसी भी मरीज को केवल एक मानव
सब्जेक्ट की तरह ही देखता है अकसर
डॉक्टर महान और पवित्र ही माने जाते
है । टीचर डॉक्टर और
माता पिता को समाज में सबसे अधिक
सम्मान प्राप्त है । और अब तक सबसे
कम पतन इस त्रिदेव का हुआ
माना जा सकता है।
किंतु अपवाद तो हैं ही । डॉक्टर से
नन्हीं बच्ची ने डरते डरते
कहा इतना सारा ब्लड सैंपल मत
लीजिये अंकल दर्द हो रहा है । और वह
सौ दो सौ में से एक शैतान डॉक्टर
बोलता है क्यों बेबी इससे ज्यादा ब्लड
तो पीरियड्स मेन्सुरेशन में हर रोज पाँच
दिन तक निकल जाता है लङकियों को ।
बच्ची नहीं समझी और
बोली वो क्या होता है अंकल कौन
सी बीमारी होती है। और दुष्ट डॉक्टर
उस बच्ची को बुरे आशय से समझाता है
कि क्या है ये बीमारी।
ऐसे उदाहरण किसी को भी सुनने देखने
और सामना करने को मिले हो सकते हैं ।
यह एक अपमान सा है स्त्रीबालक
का । जिन परिवारों के माँ बाप सचेत और
बच्चों के साथ मित्रवत हैं वे
लङकियाँ कॉन्फिडेंट होकर हर बात
माता पिता को बता देती हैं और लङके
भी।
और ये विश्वास तभी हो सकता है जब
पापा हौआ न हो और मम्मी हिटलर
मुसोलिनी डिक्टेटर नहीं हो।
किंतु ऐसा बहुत कम परिवारों में
हो पाता है दुर्भाग्य है भारतीय
बच्चों का। कि संस्कार के नाम पर
बच्चों और माता पिता के बीच असंवाद
की कठोर दीवार खङी रहती है । लङके
पापा से डरते हैं लङकियाँ माँ से।
जबकि माँ ही सही समाधान कर
सकती है। और पिता ही सही प्रोटेक्शन
। पापा मम्मी अगर आतंकित न करे
तो ऐसे डॉक्टर टीचर हेयर ड्रेसर के
बारे में अपनी चिढ़ नाराज़ी वगैरह
की वज़ह बच्चे बता सकते हैं।
किसी खास कर्मचारी से अगर बच्चे
दूरी रखना चाहते हैं तो विवश न करें
बल्कि दोस्ताना लहजे में बात करके
पता करें ।
हमने देखा कि एक
पढ़ी लिखी लगती महिला ने ट्रेन में
बच्ची को भीङ होने पर
अज़नबी की गोद में
बैठा दिया जबकि बच्ची आधा मिनट
बाद जिद करने लगी माँ के पास
खङी होने की लेकिन बजाय
बच्ची को सपोर्ट देने के पापा ने पीट
दिया। और खङा करके
दूसरा बच्चा बिठाना चाहा तो अजनबी ने
मना कर दिया बहाने से और बगल में
जगह दे दी।
इसी तरह की कई
मामूली लापरवाहियाँ किंतु खतरनाक
बातें बच्चे अकसर फेस कर रहे होते हैं ।
दो साल की बच्ची को माँ ने पीट
दिया क्योंकि वह लङकों की तरह सू सू
करने खङी हो गयी । किंतु कभी इस
बात पर ध्यान या सख्ती शायद
ही उसने की हो कि जब बाईक पर
परिवार जाता है तो पति बच्ची के
ही सामने किस तरह हाजत से निबटते हैं

बङी छोटी छोटी बातें है किंतु मानो या न
मानों भारतीय बच्चे एक तनाव और
मारपीट शोषण दुख से
भरी जिंदगी जी रहे हैं।
ये टी वी रेडियो कॉमिक्स सब बरस रहे
हैं अश्लीलता की बारूद लेकर और आग
ही आग हर तरफ फैली है। बच्चे झुलस
रहे हैं।
मनोरंजन का सबसे सुंदर तरीका है
फैमिली गेम । बच्चों के साथ माँ बाप
का रोज एक घंटा खेलना।
पापा का घोङा बनना मम्मी की लुकाछुपी।
बॉल बैट या चेस कारम या बैंकव्यापार
साँपसीढ़ी लूडो। कुछ भी । लेकिन
फैमिली गेम ।
और वे बच्चे जिनके साथ माँ बाप रोज
कमसे कम तीस मिनट खेलते हैं आप
परख लीजिये दूसरे बच्चों से अधिक
कॉन्फिडेंट और मुखर दोस्ताना स्वभाव
के होंगे। वे किसी भी गलत को चुपचाप
नहीं सहेगे बल्कि माँ बाप को बता देगे
और बुरे व्यक्ति को डाँट फटकार देगे।
हमारी माँ सा अकसर
भाभी चाची को बच्चे डराने पर डाँट
देतीं थीं । उनका कहना था कोई हौआ
भूत पिशाच या जानवर है ऐसा कहकर
डराकर बच्चे को सुलाना गुनाह है
क्योंकि इससे बच्चे डरपोक हो जाते हैं ।
वे अकेले होने से अँधेरे से और
किसी ताकतवर से डरते हैं । ये डर कई
बार जीवन भर साथ रहता है।
एक भतीजे को अकसर कजिन पुलिस से
डरा कर चुप करा देते थे । एक दिन
हमारी कंपनी कमांडेट मित्र
बावर्दी मिलने आ गयी और दूसरे दिन
एक नातेदार पुलिस वाले वरदी में ।
बच्चा बोला अरे!!!!! ये तो आदमी है??
सब चौके मतलब??
मतलब कि बच्चे की कल्पना में तब तक
पुलिस की आकृति जाने किसी प्रेत
की थी या पशु की।
और हर बार वह पुलिस पकङ ले
जायेगी सुनकर चुप होकर न जाने
क्या क्या कल्पनाये
करता रहता होगा । पश्चिमी यू पी में
लिल्लू से डराते है तो मध्य भारत में
हौआ से ।यहाँ तक कि कृष्ण के शिकवे
में सूर का पद भी है। ''कि बलदाऊ
भैया डराते हैं जंगल से हौआ आकर
पकङ लेगा और अकेला छोङकर सब
छिप जाते है तब मैं माँ को याद कर करके
रोता हूँ।
हमें याद है अपना डर वह था माँ के मर
जाने का । और ये डर
मिला था धमकी में कि अगर दुद्धू
नहीं पिओगी तो मम्मी मर जायेगी।ये
डर एक केयर टेकर
महिला का दिया हुआ था कहानी के
माध्यम से । गाय का दूध हमें पसंद
नहीं था किंतु बिना नागा रोज चुपचाप
पी जाते थे । कि कहीं माँ को भगवान न
लें जायें । हद की हद है कि बालपन में
माँ से बिछुङने का आतंक
इतना रहा कि कहीं पढ़
लिया कि धतूरा खाने से मर जाते है लोग
क्लास सेकेंड की किताब में ""कनक
कनक से सौ गुनी मादकता अधिकाई
इहि खाये बौरात नर उहि पाये
बौराई""बस माँ ने घुटनों पर बाँधने के
लिये धतूरा मँगाया और बीज निकालकर
भूनकर रखे । हम डर गये कि माँ खाकर
मरना चाहती है । बस नौ दस साल
की उमर में बीज खुद खा लिये
कि माँ ही मर जायेगी तो जीकर
क्या करेगे। कैसे रात भर राई अमचूर
और तमाम दवाईयाँ घोल कर पिलाकर
माँ भाई भाभी ने जान बचाई वही जाने ।
कई महीने हालत खराब रही । एक डर
किसी बच्चे को कितना रुलाता है।
कि आज जब माँ नहीं है तो बालपन
की तरह कभी कभी अंधविश्वास
होता कि कहीं हमने दूध पीने में
आनाकानी की थी इसीलिये
तो नहीं भगवान ने माँ को बुला लिया ।
हमारा निवेदन है सब परिजनों से
बच्चा कुछ भी कर रहा हो सजा और दंड
पुरस्कार और प्यार की नीति पर चले
जो अहानिकर हो परंतु कभी डरायें
नहीं ।
पता नहीं अपनी अधकचरी जानकारी में
वह बच्चा किस डर को किस तरह
कल्पित कर ले।
copy right ©®सुधा राजे
क्रमशः जारी

बच्चे

Sudha Raje
आप अगर स्त्री हैं तो अपना बचपन याद
कीजिये। और खुद ब खुद याद आ
जायेगा कि किस तरह इंप्रोपर चैनल से
सेक्स एज्यूकेशन मिलती है लङकियों को ।
और याद आ जायेंगे बङों बुजुरगों के
असली रूप। असली चेहरे। तब जब आप में से
बहुत सीं स्त्रियाँ छोटी बच्ची थीं और
माँ आदरणीय जनों की सेवा में
आपको भोजन परोसने दवा पानी चाय
देने भेज देतीं थीं और छू छू कर प्यार जताते
दस में से दो हाथ किन्हीं अपने लगते
शैतानों के थे। शायद ही कोई
स्त्री हो जिसने बचपन में जब अबोध
रही तब जब पता नहीं था कि ये सब
क्या और क्यों है बङों का घूरना छूना और
गंदे लालच को न महसूस किया हो।
कमज़ोर आर्थिक वर्ग के परिवार में दस
साल तक की बच्ची को मेहमान के आने पर
बेड कम हुआ तो घर के बङों के साथ
सुला देना आम बात है। भले ही सुनने में
खराब लगे परंतु ऐसे कई लोग नींद में
या जानबूझ कर नींद का बहाना करके
बच्चियों के साथ घिनौनी हरकतें करते
पाये गये। ऐसा सैकङों स्त्रियो को तब
याद आता है जब वे बङी सयानी समझदार
हो जातीं हैं और ये सब क्यों होता था वे
जान जाती हैं । तब नफरत हो जाती है
ऐसे नातों रिश्तों से । बहुत कम
लङकियों का बचपन ऐसे गंदे स्पर्शों से
सुरक्षित रह पाता है। समाज?
बलात्कार के पहले किसी हरकत
को गंभीरता से नहीं लेता । किंतु शायद
यह सब एक मनोचिकित्सक ही समझ
सकता है कि कामुक छेङछाङ स्पर्श
बातचीत लालच किस कदर विकृत कर देते
हैं बच्चों के काम विचार । सोलह
मनोविकार में सबसे प्रबल क्रोध काम
मोह और स्वामित्व है जो काम से
महाविकृत होकर पूरा जीवन ही तहस
नहस कर सकते हैं । बरसो पूर्व
हमारी एक क्लाईंट का तलाक़ केवल
इसलिये हो गया कि वह पति के साथ
नॉर्मल नहीं रह पाती थी बल्कि करीब
जाने पर डर आतंक या अभिनय पर उतर
आती पति को लगता वह रेप करने
जा रहा है । क्यों? क्योंकि उस लङकी के
मंदबुद्धि होने लाभ शऱाबी बाप ने
उठाया बचपन में माँ की उदासीनता के
कारण स्त्री की हवस में पुत्री तक
को चबा जाने वाले पिता शराब
का बहाना लेकर एक नहीं कई
ज़िंदगियाँ बरबाद कर चुके होते हैं ।
नशा करने वाले पुरुष रिश्तेदार से
बच्चों को बचाना आज़
भी चौकन्नी क्यों नहीं मातायें? जैसे
उनको लगता है पति बूढ़ा हो चला जोश
नहीं रहा और वह ऐसी गिरी हरकत
नहीं कर सकता। घर में कहाँ डर है।
लेकिन सवाल है आज कि कहाँ डर नहीं है।
वक्त आ चुका है घरों से शराब ड्रग्स नशे
का पूर्ण बहिष्कार सब मिल कर करें ।
विशेष कर लङकियों वाले घर से । मगर
अफसोस स्त्रियाँ खुद
आधुनिकता की अंधी दौङ में शैतान
की टीम में शामिल होती जा रहीं हैं ।
पुरानी कहावत है स्त्री की नकल पुरुष
करे तो देवता बन जाये ।किंतु पुरुष के
दोषों की नकल स्त्री करे तो डायन बन
जाये। अगर आप पिता हैं माता हैं
तो नशा क्यों? बच्चों के बचपन का सुख
नंदबाबा य़शोदा की तरह लीजियें आप
को किसी नशे की जरूरत नहीं । सिर्फ
इतना करना है
कि बच्चा खिलखिलाता रहे । कुछ
भी ऐसा न करें कि रोये या डर जाये।
©®सुधा राजे
क्रमशः जारी

बच्चे, समाज और बचपन::-2

जब जब डिसिप्लेन की बात आती है
तो सर्कस जिम्नास्टिक और नट बंजारे
बेड़िये और जादूगर बनने वाले बच्चे
अनायास याद आ जाते हैं ।
क्या कभी आपने देखा है सर्कस? नट
का करतब? अक्सर लोग तमाशा देख कर
चले जाते हैं पैसा फेंककर । लेकिन पेटा और
पशु हिंसा निवारण अधिनियम ने
जहाँ सरकस मदारीगीरी बाज़ीगरी जादू
आदि से जानवरों को कम कर दिया है ।
वहीं बच्चे आज भी इस अत्याचार
का हिस्सा हैं। लचीला बदन और
हैरतअंग़ेज़ कारनामा दिखाने के चक्कर में
जितना अधिक हो सके
बच्चों को प्राकृतिक विकास के विपरीत
करतब सिखाते समय मारपीट
की जाती है और लगातार परिश्रम
कराया जाता है। बाल फिल्मों के
कलाकार बालकों के विज्ञापन बालकों के
लाईव शो और बालकों के खतरनाक
करतब। परदे के पीछे हकीकत दूसरी है।
बच्चों के एक स्कूल की प्रिंसिपल रहने के
दौरान ये दर्दनाक अहसास हुआ
कि बच्चों का कितना दुरुपयोग
सालाना फंक्शन में चीफ गेस्ट को खुश करने
के नाम पर होता है । और
यही नहीं वहाँ मन पर भी अत्याचार
होता है । महान नेता जी को आना है
बच्चे तपती धूप में मेकअप करके
घंटों प्रतीक्षा में खङे हैं स्वागत को ।
नेता जी के आते ही स्वागत गीत गा रहे
बच्चे । फिर मंच पर नाच रहीं मेकअप
करके लङकियाँ और नेतागण बङे
अतिथि प्रसन्न हो रहे हैं । मंच के पीछे
बच्चे रो रहे हैं भूख लगी नींद आ रही है ।
सू सू आ रही है टीचर धमका रहे हैं
छङी लेकर । बच्चे बोर हो गये
अपनी बारी आने तक सारी सजावट
बेकार । महीनों रिहर्सल के बाद
निकाल दिया प्रोग्राम से टीचर ने
क्योंकि कुछ बच्चे एक लय में नहीं कर
पा रहे एक्शन बच्चे का समय खराब
गया मन उदास अपमानित हो गया। बच्चे
जुलूस रैली जलसे हर जगह कतार बाँध कर
स्कूल का प्रचार बनकर खङे है!!!!
ये सब क्या तमाशा है?
बङों को बच्चों का मनोरंजन
करना चाहिये और बच्चे खुश होकर
ताली बजायें । ये नेता चीफ गेस्ट पाँच
घंटे लेट आ रहे हैं तो बच्चे मार्चपास्ट
रैली स्वागत को खङे बेहोश होकर गिर
रहे हैं । कल धामपुर के तमाम बच्चे आयरन
की गोली खाकर अस्पताल में पहुँच गये ।
चार महीने पहले सैकङों बच्चे बिहार में
मिड डे मील खाकर मर गये। जगह जगह
फूड पॉयजनिंग हो गयी। बच्चे स्कूल
अस्पताल घर मंदिर कहीं भी यौन
हवसी भेड़ियों के निशाने पर । प्यार
करके के बहाने बङे लोगो में छुपे शैतान
बच्चों पर वासना के गंदे स्पर्श उँडेल रहे
हैं । हमारे आसपास ऐसे लोग मिल जायेंगे
जिन के आचरण बच्चों के प्रति घिनौने हैं
किंतु आप चाहकर भी पहचान कर भी कुछ
नहीं कह सकते । पापा के दोस्त टीचर
सहेली के पापा चाचा मामा ताऊ
फूफा मौसा बाबा और चीफ गेस्ट तक गोद
में उठाकर बच्चे के गाल और जगह ब जगह
चूमकर प्यार छू कर चिपटाकर अपनापन
दिखा रहे हैं । किंतु दस में से
दो की भावना गंदी घिनौनी है । ये
मेरी पोती बहिन बेटी जैसी है तो केवल
आङ लेने का बहाना है। एक छात्र
को मिलिट्री के सिपाही ने लालच देकर
फँसाया और सोचकर दिल दहलता है
कि नन्हें नन्हें लङके कुकर्म का शिकार
हो रहे हैं । इनको डांस सिखाने जादू
सिखाने ड्राईवरी सिखाने तरह तरह
की पेट पालने वाली कलायें सिखाने के
नाम पर यातनादायक कुकर्म लङकों के
साथ किया जाता है। मुहल्ले के दादा ।
बच्चा जेल आश्रम होस्टल में बॉस बनकर
रह रहा स्टाफ सीनियर लङके
जरा सी दादागीरी दिखाकर छोटे
लङकों से भीषण अप्राकृतिक कुकर्म करते हैं
। लङकी के मामले जहाँ उबलते रहते हैं ।
वहीं लङकों के मामले रफा दफा कर दिये
जाते है। पीङित को सुविधायें देकर
पैसा देकर शोषण की आदत सहने
की चुप्पी सिखा दी जाती है। कोच और
सीनियर गार्ड और पङौसी बङा कजिन
और नातेदार जाने कौन कब छोटे लङके
को खींचकर ललचाकर दबा धमकाकर
कुकर्म कर डाले पता नहीं । रैगिंग
का रोग कुकर्म लीला बनता जा रहा है।
बच्चों ने बचपन में जो जो अत्याचार सहे
होते हैं। वही सब बङे होकर
उनको परिवर्तित विकृत करते हैं माँ बाप
को पता तक नहीं चलता और बचपन खून से
लिखी दासतान बनकर रह जाता है।
आपके आसपास छोटे बच्चे के नजदीक
बङों किशोरों से ही सबसे ज्यादा डर है
वही फुसलाकर सिखाते है कि ये सब जस्ट
गेम है। और बताना नहीं माँ बाप
को वरना साथ नहीं रखेगे। आप सोच
भी नहीं सकते कि बच्चे के आसपास कितने
राक्षस अपनों और वरिष्ठों के रूप में
मँडरा रहे हैं ।

Wednesday, 27 November 2013

बच्चे, समाज और बचपन।

दुनियाँ में सबसे अधिक हिंसा बच्चों और
स्त्रियों पर होती है ।
अगर बच्चा स्त्री है तो हिंसा किस क़दर
भयावह हो सकती है कोई शायद
ही कभी विचार करता हो ।
एक खबर के मुताबिक
गोवा में सेक्स वर्कर बच्चे पचास पचास
रूपये तक में आसानी से उपलब्ध कराये जाते
पाये गये ।
ये तो एक खबर है दूसरी एक और भयावह
सच्चाई की तरफ से लोग और शासन मुँह
मोङे बैठा है कि आखिर अपहृत बच्चे जाते
कहाँ है?
ये बच्चे अरब देशों में ऊँट दौङ पर ऊँट के
ऊपर बाँधे जाते है ।जब ऊँट दौङता है
बच्चे चीखकर डर से चपेटकर पकङते रोते हैं
तो ऊँट तेज भागता है।
ये बच्चे वेश्यालय चलाने वाले रैकेट तक बेचे
जाते हैं जहाँ ब्रेनवॉश करके
पुरानी बूढ़ी मौसियाँ इनको बेचने के
लिये तैयार करती नाच गाना अदायें
सिखाती हैं ।
ये बच्चे भीख माँगने वाले गिरोह
खरीदकर विकलांग और नशेङी बनाकर
करोङो कमाते है
ये बच्चे ड्रग्स पैडलर जेबकतरे और
खूनी चोर लुटेरे बनाये जाते है
ये बच्चे पालकर
बङी बङी कोठियों स्पा मसाजपारलर
औऱ
होटल ढाबो भट्ठी खदानों पर गुलाम
बनाकर रखे जाते हैं ।
इसके अलावा अनाथालयों विकलांग और
बालिका आश्रमों की बार बार सामने
आती दुरदांत कथायें बताती हैं
कि वहाँ भी कई अपराधी सक्रिय है औऱ
अनेक झूठे दावे किये जाये मगर कई पकङे
गये संचालक कर्मचारी जो यौन शोषण
करते और बाहर वेश्यावृत्ति कराते थे ।
ये बच्चे जब घरो में हैं तब भी बहुत सारे
घर ऐसे हैं जहाँ।
रिश्तेदारों पर निर्भर अनाथ बच्चों से
गुलामों की तरह काम कराया जाता है
और मारपीट भी की जाती है ।
ये माँ बाप के साथ रहते भी तब भी ऑनर
किलिंग शराबहिंसा और माँ बाप
की गुलामी के शिकार है।
खुद माँबाप मारपीट कर पढ़ाई छुङाकर
काम पर भेजते है कमाई को और
जो धनवान है उनके पास बच्चे के लिये
समय ही नहीं ।
एक बच्चा सस्ता नौकर मुफ्त का गुलाम
और सरल शिकार
कहाँ है भविष्य के शुभचिंतक???
ये बच्चे जब अमीर के बच्चे होते है तो सबसे
ज्यादा शिकार होते है फिरौती माँगने
वालों के लिये ।
और घरेलू नौकर की वासना के ।
ये कुक बटलर आया धाय माली ड्राईवर
गार्ड वाचमैन और वॉशरमेन पापा के
असिस्टेंट मम्मी के हैल्पर
सब का सॉफ्ट टारगेट बच्चा हो जाता है
। जो लोग ऐसे घरों में पलकर बङे हुये है वे
समझ सकते है कि एक नौकर कई बार
रिश्तेदार से ज्यादा इंपोर्टेंट
हो जाता रहा है । अब ये
ज़माना शाही नवाबी तो रहा नहीं क्
सरकार आपका नमक खाया है और
गोली भी खा लेंगे । इसलिये वफ़ादारी न
तो आदत होती है न ही फ़र्ज़ वे सब नौकर
केवल पैसे के लिये काम करते है और मालिक
के प्रति ईर्ष्या पाले रहते हैं कि काश
हम भी धनवान होते । जरा सी डाँट
पङते या ग़लती से अपमानित करके
नौकरी से निकाले जाते
ही पहला निशाना बच्चा होता है
नज़ीबाबाद के तेजस का किडनैप इसी तरह
हुआ जब सरदार जी ने बच्चे के ड्राईवर
को डाँटकर नौकरी से निकाल दिया वह
सीधा स्कूल जाकर बच्चा ले गया और
पंद्रह लाख फिरौती वसूली ।
हालांकि तेजस भाग्यवान था कि पुलिस ने
रकम सहित किडनेपर पकङ लिये ।
लेकिन कई बच्चों की लाश ही मिली ।
ये घरेलू नौकरों पर न तो इलज़ाम है न शक़
लेकिन आँखों देखी कानो सुनी है कि दस में
से एक नौकर तो बच्चे को पटा कर रखने के
चक्कर में बच्चे की नाज़ायज माँगें इच्छायें
तक पूरी करता है औऱ मालिक से
छिपाता है । बच्चा जिद
करेगा तो नौकरी पक्की ।
बातों बातों में समय पूर्व सेक्स की विकृत
जानकारी नशा और पिता माता से झूठ
बोलना सिखाना ।
ये बच्चे घरों से मीलों दूर तनहा रहते ऐसे
नौकरों की हवस का राज़ी खुशी शिकार
बन जाते हैं जबकि नौकर
बच्चों को बहलाफुसला कर वासना को खेल
बनाकर बच्चे को बिगाङते चले जाते हैं ।
माँ बाप दोनों नौकरी करते हैं और बच्चे
के पास पॉकेट में मोटा पैसा हो तब बच्चे
का मन जीतकर लाभ लेने की साज़िश रचते
नौकर हर तरह से बच्चे का लाभ उठाते हैं

पहले पीढ़ी दर पीढ़ी सेवक होते थे जिनसे
पीढ़ी दर पीढ़ी प्रेम वफा नमक
हलाली और नाता रहता था ।
आज नवधनाढ्य जिनको काम पर पैसे के
बदले रखते हैं वे परदेशी होते हैं न गाँव
का पता न चालचलन परिवार ।
ऐसी उम्मीद ही बेवकूफी है कि वे
बच्चों को हानि नहीं करेगे।
संस्कार गलत डाल सकते है यौनशोषण
धनशोषण कुछ भी कर सकते है।
तब क्यों न खुद बच्चे के सेवक बना जाये??
लेकिन ऊँची तालीम परवरिश
का खरचा कहाँ से आये???
ये बच्चे जब मिडिल क्लास फैमिली के बच्चे
होते हैं तो माँ बाप की अधूरी इच्छाओं
और अधकचरे संस्कारों का बोझ लेकर घूमते
हैं अपने कंधों पर पापा चाहते हैं
बेटा इंजीनियर बने और बेटी डॉक्टर
मम्मी चाहती है बेटा आई पी एस बने और
बेटी आई ए एस जबकि बच्चा सपने
देखता है आर्किटेक्ट और म्यूजिशियन बनने
के सपने । वहीं से संघर्ष शुरू हो जाता है
।आप अगर मिडिल क्लास परिवार से हैं
तो याद कीजिये टीचर की मार
पापा की पिटाई माँ के ताने बङे भाई
की झिङकियाँ और थोपे गये सपने । और
इमोशनल अत्याचार । आज भी कुछ
नहीं बदला । मम्मियाँ बात बात पर
अहसान जतातीं मिल जायेंगी कि हम
पाँच बजे उठकर टिफिन बनाते हैं
पापा अहसान जताते मिल जायेगे कि हम
मरखप कर कमाते हैं दादा दादी के अलग
ही सपने हैं और शायद ही किसी को याद
रहता हो कि बच्चा कभी कभी देर तक
सोना चाहता है ।बस एक दिन
ही सही । बच्चा बच्चों के साथ
खेलना चाहता है बच्चे
को बच्चों वाली किताबें फिल्में और
बच्चों वाली जगह देखने का मन है । वह
मिट्टी में लोटना चाहता है और कुत्ते के
पीछे दौङना । कंचे पतंग न सही कम से कम
टेनिस क्रिकेट हॉकी चैस तो खेलने दो!!
मिडिल क्लास बच्चा शायद सबसे
ज्यादा शोषित बच्चा जिसकी पिटाई
पढ़ाई के नाम पर संस्कार के नाम पर
बाहर बिना पूछे घूमने जाने के नाम पर
पैसा और चीजें चुराने के नाम पर होती है

और जो काम गिने ही नहीं जाते वे काम
बच्चे रात दिन करते है ।
दरवाजा खोलना चाय बनाना। सफाई
करना । और कढ़ाई बुनाई सिलाई दुकान
दफ्तर के काम काज करना ।
यानि एक नजर से देखें तो माँ बाप बच्चे
नहीं बल्कि बच्चे माँ बाप की देखभाल
करते हैं।
इन बच्चों के सपने बङे औकात छोटी होने
से मनमारकर ज़ीनै की मजबूरी और खुद
का मान बचाने की विवशता की चक्की में
बचपन तो जैसे होता ही नहीं????
तंत्र मंत्र जादू टोने में स्त्रियों का सबसे
ज्यादा इस्तेमाल होता है और
स्त्री बच्चों का उससे भी ज्यादा ।
पङौस की एक लङकी दो दिन ग़ायब
रही बाद में कब्रिस्तान में गले तक
गङी हुयी मिली अमरूद तोङने गये
मजदूरों को देखकर तांत्रिक भाग गया ।
बिजनौर में दस साल पहले एक परिवार में
ज़िन्नात शैतान उतारने के नाम पर
माँ और बुआ ने मिलकर पाँच बच्चे खुद के
ही कमरे में जंजीर से बाँधकर धुँआ कर करके
पीट पीट कर मार डाले थे।
कुँवारी लङकी की बलि या पुत्र
प्राप्ति के लिये पराई संतान
की बलि जैसे तमाम दुर्दांत कांड आये दिन
भारत के ग्रामीण कस्बाई
ही नहीं नगरीय इलाकों तक से आते रहते
हैं ।
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

अधिकार छीनो

जब अधिकार नहीँ मिलते तो छीनो आगे
बढ़ो चलो
न्यायालय सत्ता चुप हों तो
ज्वाला बनो ज़ुर्म कुचलो
सुधा कहो हर कन्या से
चिंगारी नहीँ मशाल बनो
दहशत का मुँह नोच जला दो
इंक़लाब की ज्वाल बनो
जब पूँजीपतियों के हित में
कानूनों का साग बिके
तब मजदूर किसान और फ़नकार उठो इक
साथ मिलो
जहाँ पसीना सूख न पाये पारिश्रमिक न
मिलता हो
वहाँ शोषकों की रोटी पर
अपने दिल का लहू मलो
जिस घर में अपमान
बेटियों बहिनों बीबी माँ का हो
उस घर की दीवारें तोङो
हाथ मिला बाहर निकलो
क्यों खाती हो बासी सूखी पिछली तुम
भी मानव हो
जीवन का हक़ है तुम को भी
सोच बदल रस्में बदलो
बूढ़ी बेबस माँ बीबी पर हाथ उठाया??
चल थाने
थाने में सुनवाई न हो तो
बन हुजूम गलियों में चलो
मार खदेङो विद्यालय से
नारी भक्षक शिक्षक नर
चौराहों पर छेङ करें जो लुच्चे
जूतों से कुचलो
कब तक?? आखिर कब तक??
देवी कन्या पूजन ढोंग सहें
कोख जाँच वध करते उनको जेल डाल पापङ
सा तलो।
Sudha Raje
वक़्त आ चुका अब अश्लील किताबें
फूकों सङकों पर
उठो भाई
बहिनों लोगो जो हो जिंदा कुछ
तो मचलो
©®¶
Sudha Raje
Apr 4

छोटा पत्रकार

क्या कर लेगा फोटो लेकर
कहाँ सभी छापते विचार है
काहे ऐंठ रहे हो भैया!!!!
ये तो छोटा पत्रकार है ।
जाने भी दो पत्रकार है ।
खोज रहा है खबर सनसनी
हत्या चोरी लूट रहज़नी
रोज कहाँ हीरोईन मॉडल!!
कहाँ सभी की कलम गुणधनी!!
इसकी खबर करें विश्लेषण
कहाँ छेङ कहँ बलत्कार है
जाने भी दो पत्रकार है
ये जो छोटा कलमकार है
संपादक ने वाट लगा दी
लंबी खबरें छाँट लगा दी
भेजीं दस छापी बस दो ही
बाकी कचरे आठ लगा दी
दुखद कर्ज से डिगरी लेकर
पढ़ा लिखा बेरोज़गार है
ये तो छोटा पत्रकार है
करता खेती बीमे ट्यूशन
एजेन्सी दुकान कन्फ्यूज़न
घर चलता है "भूत लेख "से
कविता कथा गीत इंट्यूजन
कहीँ ठसकते बीबी बापू
ऐंठे भैया लेक्चरार है
जाने भी दो पत्रकार है
प्रेस ब्रीफ में रौब
दिखाता
क्लबों कचहरी पब मँडराता
गाँव न जाता भूले से भी
थाने अस्पताल से नाता
पिये विधायक के घर इंगलिश
ढाबे में ठर्रा ख़ुमार है
ये तो छोटा पत्रकार है
फिरे पटाता हवलदार को
ठेकेदाऱ् को थानेदाऱ् को
मिले मामला बमचिक चटपट
नहीँ बताता भाई य़ाऱ को
बाईक /कार पर लिखा "प्रेस "है
पर दहेज में ये शुमार है
ये तो छोटा पत्रकार है
इंटर बी जे ग्रेजुएट है
परिजन सब ग्रामीण ठेठ हैँ
नसें दबी हैँ ज़ान माल डर
खुलें तो क्या नेता क्या सेठ है
रात रात भऱ नेट से झगङे
दिन में ट्रैफिक हवलदार है
ये तो छोटा पत्रकार है ।
जाने भी दो पत्रकार है ।
©®¶©®¶
Sudha Raje
विज्ञापन को कहे
प्रकाशक
जो भी लाये छपे धकाधक
ये चाहे गुमनाम बना दे
चाहे चेहरा करे चकाचक
हाफ सांसद फुल पर मंत्री
ओने कोने गाँव चार है ।
जाने भी दो!! पत्रकार है
ये तो छोटा पत्रकार है
ब्लैकमेल होता करता भी
ये जासूस है अभिकर्त्ता भी
छपने पर सौ नईँ तो पाँच सौ
खोज खबर खतरे डरता भी
विधि संविधि सरकार बाहुबल
दिखलाते नये नये प्रहार है
जाने भी दो पत्रकार है
©®¶©®¶
Sudha Raje
Dta/Bjnr
बाढ़ ज़लजला सूखा आता
दंगो में भी पौ बारह पाता
जिलाधीश आयुक्त अधीक्षक
जब ललचाते रूपिया नाता
सौ मरते पच्चीस बताओ
चुपके दिखला कुछ हजार है
जाने भी दो!!! पत्रकार है ।
इनमें भी कई -कई श्रेणी है ।
अभिनति राजनीति कथनी है
मर गये मरते नहीं बिके कुछ
कुछ की खोजें लहू सनी हैं
सत्यपंथ पर सबकुछ खोया
ऐसे भी कुछ बा-वक़ार है
ये तो छोटा पत्रकार है
जाने भी दो पत्रकार है ।
पेट है खाली चाय का भूखा
रूखी रोटी चावल रूखा
चौथा पाया लोकतंत्र का
पूँजी का हमला ना चूका
तंत्र मंत्र वर्गीकृत छपते
मुख्य पृष्ठ पर सिनेकार हैँ
जाने भी दो पत्रकार है ।
sorry
for
this
but I only mention
a Bitter position of
of
half side
जो अपनी आलोचना नही सह सकता वह
सत्य कैसे खोजेगा
5-2-2012

Tuesday, 26 November 2013

"हम किसान" सुधा राजे लेख और कविता।

सुधा राजे ।
**********
ग्रामवासिनी
हम गँवार देहातिन बाबू !! गाली है शहर
खा गये सब कुछ
मेरे गाँव
की झोली खाली है
1-दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते फल खाते
माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के रमदसिया मरने
वाली है
2-
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये आम आँवले बेर
तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है
3-
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख पिसी तिल
धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है
4-
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
जोरू बिटिया काली है
भैया जी कें गये थे इक दिन शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है
6-धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर काट काट
कें चिक्कर गये
"अव्वल की यो
डिगरी "ऊँची "बिन रिश्वत बेमाली है
7-
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी
मिक्सर
कहाँ कुदाली है
8-
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है
9-
ले जाते मजदूर बनाकर
बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे किसान
की फूटी लोटा थाली
10-
कहाँ कौन सा देश और
सरकार हमें तो थाना है इज्जत जाये कतल
हो चाहे पंचों की दल्लाली है 11- पाँच
साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है
12-
पटबारी को पैसे नई गये पैमाईश में
फँसा दियौ गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है
13-
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोरो
अबके कान की बाली है
14-
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे शहर पढ़ाबें
जी काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है
15-
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर तबीजें करते
रये
तीन छोकरी हो गयीं
तिस पे अब आया बंगाली है
16-
रोज रात कूँ हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोबे
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे खोटी, किस्मत
वाली है
17-
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है
18-
सुधा भात पे 'चीज'
चढैगी
भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें चिंता नींद
उङाली है
19-
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी
मेट की भेंट चढ़ाली है
20-
हस्पताल
की दवा डागधर
शहर बेचते चोरी से
दाई जनाबै बच्चा मर गयी बिंदू
की घरवाली है
21-
मच्छर, बाढ़, बुखार
चोर ,नट
ओझा पंडिते दर्रोगा
बची खुची बिगङी औलादें नाबालिग
धौँचाली है
22-
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला में
जो केबें परधान वो होबे शासन देश
सवाली है
23-
मिल वालों ने अब तक लौं पेमेन्ट
दिया नईँ बोबें क्या । क्ऱॉप लोन
की किश्त बिके टिरक्टर ट्राली हैं।
24-पुरखों की ऊसर ज़मीन पर
कितनों को रुज़ग़ार मिले। दादालाई
टुकङे टुकङे बँट गयी हर ख़ुशहाली है
25-हमसे घृणा करें रिश्ते भी नही बताते
देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा "सुधा "गाँव में
ठाली है
©®
सरकार जी सुनिये --यू पी के
गन्ना किसान भी वोटर हैं जनता हैं और
मेहनतकश भी.

खुला प्रार्थना पत्र ----———सेवा में
महामहिम राष्ट्राध्यक्ष महोदय भारत
संघ।
राज्यपाल महोदय उत्तरप्रदेश
__________द्वारा---
प्रधानमंत्री महोदय केंद्रीय
कृषिमंत्री महोदय कृषि राज्य
मंत्री महोदय उत्तरप्रदेश
मुख्यमंत्री महोदय उत्तरप्रदेश विषय --
गन्ने की खेतों में खङी फसल और
मिलों की पेराई ना चालू करने
की घोषणा ।और संकट में गेंहू की फसल
भी और किसान की बरबादी के आसार
माननीय
!!!!!!!!!!!!!
हम सब पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान ।
जो अधिकतर दुरूह यातायात वाले
इलाकों में रहते हैं । जहाँ आज
भी बिजली पानी सङक अस्पताल प्रसव
केंद्र और कॉलेज डाकघर दूर ही होते हैं
या नहीं होते । हम किसान अधिकतर
कच्चे घरों में और कुछ मामूली पक्के परंतु
अपर्याप्त सुविधा वाले घरों में रहते है ।
एक कृषक परिवार में औसत दस
व्यक्ति शामिल होते हैं । और चार पशु ।
हमारी जमीने जंगलों में होती हैं
जहाँ अक्सर हाथी साँप अजगर भेङिये
नीलगाय लंगूर बंदर गुलदार और संरक्षित
बाघ तक आ जाते है। जहाँ कीचङ है और
काँटे है । ऐसी दुरूह जगहों पर हम सुबह
सूर्योदय से पहले से जाकर रात होने तक
हाङ तोङ पसीने से लथ पथ बारहों महीने
हर मौसम में धूप वर्षा सरदी पाला ओंस
गरमी लू शीतलहर सब को झेलते हुये काम
करते हैं । पुरखों से मिली जमीनें बँटते
बँटते अब छोटे छोटे टुकङे बचे हैं । बाढ़ और
सूखा । औला और हिमपात की भी लङाई
हम अकसर ही झेलते हैं।पहले हम
साहूकारों से घर जेवर गिरवी रखकर लोन
कर्ज सूद ब्याज पर लेते थे । फिर बैंक से
कृषिभूमि गिरवी रखकर लोन कर्ज लेने
लगे । करजे का चक्कर सा ही चलता है
जो एक बार चलता है तो फिर कभी बंद
ही नहीं होता । बाबा ने
कर्जा लिया तो हम पोतों तक चक्रव्यूह
जारी है ।पिछला ब्याज और मूलधन
जमा करने के बाद हमारे पास
बचता ही क्या है जो हम किसी दम पर
अगली फसल बो ले??? इसलिये
पिछला कर्ज जमा करके नया कर्ज
उठाकर खेती करते
रहना हमारी विवशता है। हमारा बैल
कर्ज से आया और बीज भी कर्ज से
आया खाद भी कर्ज से आयी और कीटनाशक
दवाईयाँ भी । कृशि के करने के लिये
तमाम हल खुरपे फावङे
दराँती पंचा पचा थ्रेसर बखर
पटेला नाल कुदाल
गेंती गँडासा कुल्हाङी मूसर कोल्हू कंटर
ओखली बिरबार बरमा सब्बल
हँसिया पहसुल और इनकी पजाई धार
धराई बेंट डलाई में लगता पैसा भी कर्ज
से चलता है । हम लगातार कर्ज में
ही रहते हैं । बहुत कम किसान ऐसे है
जो ट्रेक्टर वाले हैं । सो भी एक ट्रैक्टर
में पाँच से सात भाईयों तक
का हिस्सा होता है। जो किसान
होता है वह और कुछ
भी नहीं हो पाता इस क्षेत्र
की खेती कठिन है क्योंकि दुरगम
जगहों पर खेत हैं जहाँ खेत के करीब तक बने
हुये मार्ग नहीं है । हम किसानों में
अकसर बोलचाल विवाद भी इसीलिये
हो जाते है कि मेरे तेरे खेत से
बैलगाङी या भैंसा बुग्गी क्यों निकाली ।
हम सब किसानों के पास
तो भैंसा बुग्गी भी नहीं होती । वह
भी करज् पर खरीदी जाती है और दस में से
सात किसान बिना बैलगाङी वाले हें
जो अपने
पङौसी की बुग्गी बैलगाङी या ट्रैक्टर
उधार के वादे पर चलाते है और जुताई
निराई के हल बखर कल्टीवेटर थ्रेसर
स्पेलर पर भी काम उधारी कर्जे से
होता है । माननीय!!!!!! ★ये कर्ज हमें
बनिया के राशन और दवाई पढ़ाई
कपङा बरतन सब पर लेना होता है। ★ये
कर्ज मिलता इस भरोसे विश्वास
आशा उम्मीद पर है कि ★*फसल आते
ही सबको ब्याज सहित कर्ज अदा कर
दिया जायेगा। किसान कर्ज हर हाल में
चुकायेगा ।बहिन के घर
भातमायरा ससुराल में शादी ।
बेटी का ब्याह बेटे की फीस
बीबी की दवाई पिता का इलाज
माता का अंतिम संस्कार पङौस के
जलसों का व्यवहार तोहफा और मकान
की मरम्मत सब पेट की रोटी बदन
की धोती सब इसी कर्जे से चलता है। एक
शहरी नौकरीपेशा बँधी तनख्वाह
वाला आदमी निश्चिंत होता है
कि पहली ताऱीख को तनखाह
मिलेगी और रिटायरमेंट पर पेंशन । हम
किसान हर समय दुआ और डर के साथ रहते
हैं हमारा भाग्य तो आधा मौसम और
आधा कीङों मकोङों जानवरो मिलमालिकों नेता मंत्री और
सरकारी गैर सरकारी बाबुओं के
हाथों लिखा होता है ।
बीबी बच्चों बूढ़ो पशुओं समेत रात दिन
हाङतोङ मेहनत करने के बाद। जब फसल
पक कर खेत में खङी होती है तब हम
सपरिवार सबकुछ भूलकर कटाई और मिल
मंडी और काँटे तक पहुँचाने
चोरों रिश्वतखोरों घटतौलियों जैसा कि खुद
विगतवर्ष मुख्यमंत्री जी ने काँटा खुद
तुलकर पकङा था । इन सबके बीच जूझते हैं
क्योंकि महोदय हमारा धन सर्वस्व
प्राण आत्मी जीवन तो पकी फसल के रूप
में खुलेआम बिखरा रहता है । जिसे
दुर्घटनाओं से बचाकर मिल पर पहुँचाकर
हमारा मन शांत हो जाता है घङी भर
को । तब भी ★हमारे माल
का पैसा हमको तुरंत
नहीं मिलता सरकार!!
★हमारा पैसा मिलवाले पूरा सत्र
पेराई करते रहते है गन्ना हम ढो ढो कर
मीलों दूर दराज से काँटों तक पहुँचाते है
तौल क्लर्क घंटों खङा रखता है और
अतिरिक्त तौल मारता है और वह
अतिरिक्त तौल अपने खाते में
पूलियाँ डलवाकर वसूलता है। बस
यहीं तक ★हम अपनी फसल के मालिक
रखवाले नौकर रहते हैं ★यहाँ से शुरू मिल
वालों का चक्कर रहता है । वे लोग
सबका मिलाकर अरबोंं रुपया बैंक में
जमा रखते हैं
जिसका करोङों रुपया ब्याज आता है और
ये ब्याज किसान के लिये नहीं होता ।
वह तो मिल मालिक के लाभ में जाता है ।
हर पेमेंट रोककर देने से एक
श्रंखला बनी रहती है जिसका ब्याज
बराबर मिल वाले लेते रहते है मान
लो एक किसान का औसतन तीन लाख एक
साल बैंक में रहा तो अगले साल किसान के
पेंमेंट दिया वह भी आठ दस किश्तों में अब
किसान को एकमुश्त माल देते ही दाम
मिलता तो यह ब्याज तीन लाख
रुपया एक साल जमा रखने पर किसान
को मिलता न??? सरकार? ★अब ये एक
और भीषण संकट है कि रक़बे में अगर सब
किसान गन्ना बो रहे हैं
तो हमारी भी मजबूरी ही है
कि गन्ना ही बोयें कियोंकि एक का खेत
पच्चीस किसानों के बीचों बीच आ
रहा होता है तो सात फीट उँची ईख के
बीच मीलों दूर तक चलकर कोई अपने खेत
तक कैसे हर दिन जाकर अलग तरह
की फसल बोये ऱखवाली करे? इसलिये सब
एक साथ बोते काटते है जंगलों में
बिना हुजूम के औरतें ले कर बच्चे लेकर
जाना भी खतरनाक है। हम सब ही अगर
गन्ना बोना छोङ दें तो ही सब लोग
बदल बदल कर फसल बो सकते हैं । हम
भी बीमार होते है दर्द चोट घाव
तकलीफें हमें भी होती हैं मगर हमें कोई
सरकारी मेडिकल से दवा इलाज
तो मिलना नहीं । ढुलाई नकद
देनी होती है। मजदूरी दिन ढलते ही। ये
पैसा आता है कर्ज से । सोचिये
जरा हमारा पैसा मिलवालों के पास है
औऱ वे कम से कम एक साल बाद देते है वह
भी बिना ब्याज के जबकि हम
सरकारी बैंक को ब्याज देते हैं साहूकार
को ब्याज देते है बनिया औऱ सुनार
को ब्याज देते हैं । तो मिल वाले जिस
दिन काँटे पर गन्ना लेबें उसी दिन से
जिस दिन पेंमेंट हमारे खाते में डालें तब
तक का सरकारी बैंक रेट से ब्याज
भी चुकाबें यही नियम बनाया जाये ।अब
अगर खङी फसल पर मिल
नहीं चली तो पक चुका गन्ना सूखने
लगेगा । औऱ वजन कम होता जायेगा ।
गेंहूँ की फसल नहीं बोयेंगे तो भूखों मर
जायेगे वही तो भरोसा है जिंदा रहने
का । कि चलो मिल वाले जब तक पेमेंट
नहीं देते तब तक खाना तो मिलेगा नमक
रोटी माँड भात ये हाङ पेलने को कुछ पेट
में तो चाहिये ही। ब्लैकमेलिंग है ये ।
क्योंकि लङकियों की शादियाँ तय
हो चुकी हैं । बच्चों की परीक्षायें आने
वाली हैं । हम पर हल बैल ट्रैक्टर खाद
बीच कटाई नलाई सिंचाई इंजन डीजल
यूरिया पोटाश फासफेट बोरिंग
सबका कर्ज बढ़ रहा है। कहाँ से
चुकायेगे??????????!?????? सरकारी बैंक
तो एक नोटिस भेज देता है अगर कर्ज
नहीं चुकाया तो जमीन कुर्की कर लेंगे??
मगर हम मिल वालों को कौन सा नोटिस
भेजे कि पिछली रकम
नहीं भेजी तो क्या कुरकी कर लेगें??? और
मिल पेराई शुरू नहीं की तो बारह
महीनों की आशा सपना उम्मीद जो कर्ज
का कपङा पहने खङी है मर रही है पल पल
क्या कर लेगें । अब तो खांडसारी गुङ रस
के भी कोल्हू बंद पङे है वरना वहीं कुछ
फसल बेचकर गेंहूँ तो बो लेते और
मजदूरों ढुलाई वालो लङकी के ब्याह
बहिन के भात बच्चों की फीस का कर्ज
तो पटा लेते??? महोदय सियासत कोई
करे इस इलाके का गन्ना किसान
गरीबी सांप्रदायिकता और कर्ज से कतई
नहीं बच पा रहा है । एक मास्टर क्लर्क
और किसान के घर बारी बारी ।से जाईये
अंदाजा लगाईये कि छोटे बङे सब
कितनी मेहनत करते और क्या पहनते खाते
देखते कैसे रहते हैं । एक भयंकर संकट
मिलमालिकों ने किसानों के सामने
खङा कर दिया है हम गंदे और कम पढ़े लिखे
गरीब लोग न्याय की उम्मीद सुनवाई के
इंतज़ार में हैं हमें नहीं पता कि सियासत
क्या करेगी मिल और सरकार की मगर हम
दहशत में हैं कि मिल
नहीं चली तो क्या होगा पेमेंट
नहीं मिला तो क्या होगा मँहगाई के
हिसाब से लागत और अगली फसल के लिये
बाज़िब दाम नहीं मिले तो क्या होगा ।
प्रार्थी समस्त अनपढ़ कम पढ़े लिखे
ग्रामीण । और किसान मित्र भारतीय
पश्चिमी उत्तरप्रदेश . लेखिका सुधाराजे
COPYRIGHT
©®सुधा राजे
वास्ते कृषक ब्लॉक अल्हैपुर।उत्तरप्रदेश ।
nOTE**
पाठकगण कृपया दरख्वास्त शेयर करते
जायें ताकि किसानों के बारे में
सबको पता चले।
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

Monday, 25 November 2013

बाल कहानी- डब्बू बीङी लाया कि नहीं। (लेखिका ""सुधा राजे)दतिया मप्र

Sudha Raje
25-11-2013/1:52pm.सोमवार।
★कहानी★डब्बू बीड़ी लाया कि नहीं?
------लेखिका-"सुधा राजे "
पूर्णतः मौलिक रचना
all right ©®™सुधा राजे
_________
**********
चौं रे लला तैं फिर आ गऔ?
अभई तौ ले गऔ तौ तैं मुतकी बीङी?
का तेओ भज्जा बिङियई बिङी खातु ए?
के तैऊँ पिअन लगौ रे?तोय काजें काल
सौं आड़त बारे सें कैनो परेगो मोय ।""
दुकानदार तसलीम
खाँ की मज़ाकिया आवाज़ से वह दस साल
का लङका सिटपिटा कर झेंप गया और
जल्दी से बोला
-""नही चचा मैं बीङी नईं
पीता कभी नईँ
विद्या कसम!! वो तो दद्दा ने मँगाई है
।वहाँ दिनभर उनके दोस्त यार ताश
खेलते रहते हैं या कुछ और तो हर समय
कोई
न कोई बीङी पीता ही रहता है।
जल्दी से दो बिंडल शेर बीङी देदो और
दो बिंडल गुप्ता बीङी स्कूल को देर
हो रही है मास्टर जी फिर डाँटेगे
नहीं तो""
लङके ने बीङी ली और घर की तरफ दौङ
लगा दी ।
पीछे से दुकानदार तसलीम खाँ चिल्लाया
ओ रे बावले छोरे ओ ssssडब्बू!!!!
ये पैसे तो लेता जा नई अभैई कुटम्मस
होबेगी तोयी ""
लङका हाँक सुनते ही थरथरा गया ।और
अहसान मानता सा वापस लौटकर पैसे
लेतर फिर वापस दौङ गया ।
घर के भीतर पाँव रखते ही जम
गया देहलीज पर ।
भीतर से भेङिये की सी गुर्राहट में
बङा भाई पूछ रहा अपनी पत्नी से
""कहाँ मर गया वो तुम्हारा लखनलाल?
अब तक नहीं आया?
दरवाजे पर बेचैनी से झाँकती एक बारह
साल की लङकी खङी थी उसने दीवार के
पीछे छिपते छोटे भाई को देखा और
झपटकर बाहर आकर बीङियाँ हाथ से
लेकर भागकर स्कूल चले जाने को कहकर ।
बिंडिल अंदर लाकर बङे भाई के हाथ में
थमा दिये ।
""डब्बू कहाँ गया? तुम बीङी लेने
गयी थी क्या? "
"नहीं दद्दा! वो डब्बू स्कूल
चला गया तो मैं लेने चली गयी थी। "
'आने दो उसे आज टाँगें तोङ दूँगा । बहुत
हरामपंथी देने लग गया मेरे काम में । '
युवक ने दाँत पीसे और बंडल लेकर फिर
बाहर बैठक के बगल में बने मेहमानकक्ष में
जाकर दोस्तों के साथ बैठ कर ताश खेलने
लग गया।
लङकी ने बस्ता उठाया और पिछले
दरवाज़े से स्कूल की तरफ दौङ लगा दी ।
डब्बू अपनी क्लास में क्लास में मैथ पढ़
रहा था लेकिन गुड्डी की क्लास छूट
चुकी थी। वह स्कूल के पिछवाङे जाकर
खिङकी के पास खङी होकर लेक्चर सुनकर
नोट करने लगी । तभी एक
सहेली गोपिका की नज़र पङ गयी ।
गोपिका की नज़र का पीछा करते
मास्टर श्रीवास्तव जी की नजर
खिङकी के किनारे चिपकी गुड्डी पर
पङी तो कङक कर बोले -
-"यू आर लेट अगेन गुड्डी!!
कम इन ।
गुड्डी चुपचाप अंदर आ गयी
पूरी दीवार
घूमकर और चुपचाप कान पकङकर बेंच पर
खङी हो गयी। अकसर यही होता ।
गुड्डी कभी डब्बू को पिटने से बचाने के
चक्कर में लेट हो जाती तो कभी सुबह
की झाङू चाय नाश्ता और सफाई करने में

माँ अकसर बाऊजी के आतंक और बङे
भाईयों के झगङे सुलझाने में लगी रहती ।
नयी दुलहन भाभी से अभी तक रसोई
छुवाई नहीं गयी थी और बङे भाई पढ़ाई
के बहाने अलग अलग कमरों पर
कब्ज़ा किये
दोस्तों के जमघट में बीङी गाँजा चिलम
पीते रहते । भाईयों के दोस्त
गुड्डी को अज़ीब से ढंग से घूरते रहते ।
उसको जरा भी अच्छा नहीं लगता लेकिन
कर भी क्या सकती थी। डब्बू और
गुड्डी दोनों साथ स्कूल जाते साथ सोते
साथ साथ खाना खाते और साथ साथ
खेलते
।खेलना कोई अलग से समय नहीं था ।
अक्सर बीङी लाने या कोई
छोटा बङा सामान लाने में दोनों जब
साथ जाते तो रेलवे की रेजीडेंस लाईन के
फाटक से बाहर निकलते ही खेल चालू
हो जाता । गुड्डी बाऊजी की साईकिल
कैंची चलाकर डब्बू
को सिखाती तो कभी मिल लाईन पर
पङी रेत के ऊपर घरौंदे बनाते रहते सारे
रेलवे मजदूरों के बच्चे।
इंटरवल जब हुआ तो डब्बू चुपचाप क्लास
से
बाहर आ गया । वह आज भी लंच
नहीं ला पाया था । गुड्डी ने दौङकर
बस्से में से घी नमक शक्कर
लगी हुयी दो रोटियाँ निकाली और
रूमाल डब्बू के हाथ पर रख दिया ।
थेक्यू जिज्जी!!
डब्बू ने रूमाल से रोटियाँ निकाल कर
जल्दी जल्दी खा लीं और पानी पीने
भागा ।
भूख तो गुड्डी को भी लगी थी । लेकिन
वह जल्दी जल्दी बस दो ही रोटी सेंक
पायी थी। अगर खुद खा लेती तो डब्बू
भूखा रह जाता । गुड्डी ने मन ही मन
हँसकर डब्बू को देखा ।
डब्बू दौङकर उसके पास ही आ रहा था ।
जिज्जी तुमने खाना खाया?
हाँ खा लिया डब्बू!
तो चलो बेर तोङने चलते हैं चले?
चलो अभी तो बीस मिनट की रेसेस है ।
गुड्डी को भूख लग रही थी । सुबह पाँच
बजे से सात बजे तक झाङू बरतन रसोई
करते फिर आधा किलोमीटर पैदल आते वह
थक गयी थी।
दोनो बच्चे स्कूल के पिछवाङे पहुँचे और
बाऊंड्री फलाँगकर बाहर निकल आये ।
जरा सी दूरी पर
पहाङी थी नहीं झरबेरी का जंगल
था अकसर दोनों भाई बहिन स्कूल के
इंटरवल या प्रेयर से पहले यहीं आ जाते ।
बेर खाते तोङते और बस्ते में जेबों में
भी भरते जाते ।
जिज्जी मैं बङा कब होऊँगा?
जब खूब सारा खाना खायेगा डब्बू!
लेकिन कैसे खाऊँगा जिज्जी? जब भी खाने
बैठता हूँ बङे दद्दा मँझले दद्दा किसी न
किसी काम से दुकान पर दौङा देते है!!
और अब तो तसलीम
चच्चा भी हँसी उङाते
है कहते है "बीङी तैं भी पियन लगौ का रे
छोरे?
डब्बू! ये बीङी गंदी चीज होती है । तुम
कभी नहीं पीना ।
देखा नहीं जबसे दद्दा बीङी पीने लगे
सबको मारते डाँटते रहते हैं ।
हाँ जिज्जी वे तो बीङी में चूरन भरकर
पीते हैं
डब्बू ने बङी बङी आँखें फैलायी
गुड्डी का चेहरा भी ऱुआँसा हो गया।
हाँ डब्बू पता है। मैंने भाभी से
कहा कि रोक
लो दद्दा को तो बेचारी भाभी को भी दद्दा ने
तमाम डाँटा और तमाचा जङ दिया ।
हमने अगर
बाऊजी को बता दिया तो भी पिटाई
खानी पङेगी। दद्दा तो बच जायेगे
जरा सा मुर्गा बन बनाकर मगर हम
लोगों को मार ही डालोगे बाऊजी के
ड्यूटी पर जाते ही फिर कौन बचायेगा?
अम्माँ तो दद्दा की ही मानती हैं ।
तभी घंटी की आवाज़ सुनकर दोनों बच्चे
दुबारी दीवार चढ़कर स्कूल में आ गये।
डब्बू!!!
जी दद्दा!!
जरा चार बिंडिल लेकर आ तो!!
दद्दा रात हो गयी अब तो तसलीम
चचा की दुकान तो बंद
हो गयी होगी वो तो सात बजे अपने
गाँव चले जाते हैं ।
अबे बातें मत बना । चार कदम पर होटल
इंद्रलोक है वहीं पर मिल
जायेगी जा भागकर ले आ ।
दद्दा मुझे डर लगता है वह तो पूरा एक
मील दूर है ।
अबे डर मरने से लगता है तो ला मैं
ही मार डालूँ डरपोक
कहीं का लङका होकर डरता है?
जा जल्दी वरना अभी उधेङ दूँगा ।
जी दादा
लङका पैसे मुट्ठी में दबाये दरवाजे पर
भरी आँखें लिये खङी गुड्डी के पास आकर
रो ही पङा ।
जिज्जी वहाँ मरघट पङता है सङक
किनारे और कुत्ते भौंकते रहते हैं
अँधेरा भी है ।मुझे बहुत डर लगता है।
चल डब्बू मैं चलती हूँ तेरे साथ ।जब तू
बङा हो जायेगा न तब तुझे कोई
नहीं पीट सकेगा ।
जिज्जी!
कल से तुम दो रोटी ज्यादा ले
चलना स्कूल मैं
जल्दी बङा होना चाहता हूँ।
इस दद्दा का ग़ुलामी से तो पीछा छूटे।
ठीक डब्बू! पर तू
जिज्जी को तो नहीं पीटेगा ना ।
ऐ ऐ ऐ क्या कह रही हो जिज्जी!!!!!
सारी दुनियाँ रूठे चाहे भाङ में जाये बस
मेरी जिज्जी मेरे साथ रहे ।
सच डब्बू?
एकदम सच्च जिज्जी । अब देखो न
अम्माँ बाऊजी के साथ दद्दा भाभी और
मँझले दद्दा के तो दरजन भर दोस्त हैं
छुटकी के लिये
अम्माँ दद्दा भाभी सबको फिकर है।
एक बस मैं हूँ किसी को मतलब
ही नहीं कहाँ हूँ कौन हूँ।तुम
वहीं होगी तो मुझे कौन पढ़ाये कौन
रोटी दे कौन नहलाये और किसके पास
सोऊँगा मैं । मुझे तो रात को चारपाई
पर अकेले डर लगता है।
डब्बू तेरे तो फिर भी दस पाँच दोस्त हैं
मेरा तो कोई भी नहीं । डर तो मुझे
भी लगता है लेकिन तेरी तरह भूत प्रेत
और पिटने से नहीं बस पढ़ाई छूटने से और
ससुराल से ।अम्माँ दद्दा रोज ही कहते है
कि फेल हो गयी या कोई काम काज ठीक
से नहीं किया तो अबके
अक्ती या देवठान
पर ब्याह करके ससुराल भेज देगे फिर
कभी नहीं बुलायेंगे।
अरे वाह कैसे फेल हो जाओगी तुम
जिज्जी!!!
मास्टर हो तुम तो पूरी!! और फिर मैं हूँ

बङा होकर सबको ठीक कर दूँगा ।
बस तुम मुझे जल्दी जल्दी बङा कर
दो दद्दा और बाऊजी से भी लंबा और
तगङा।
दद्दा खुद क्यों नहीं जाते जिज्जी?
कोई बाऊजी से ना कह दे इसलिये डब्बू ।
रास्ता लंबा था और रेलवे क्वार्टरों से
दूर चलते ही अँधेरा होने लगा गाढ़ा।
कुत्ते भौंक कर पीछे लगे
तो दोनों बच्चों ने दौङना शुरू कर
दिया।
होटल पर चारपाईयों पर पसरे ट्रक
ड्राईवर शराब की फैली भभक और अंडे
मुरगे चाय पेट्रोल की मिली जुली बदबू
और महक से डरे सहमे बच्चों ने बिंडल
लिया और घूरती आँखों से बचते हुये तेज तेज
कदमों से घर की तरफ चल पङे ।
गुड्डी लङकों वाले कपङों में
लङका ही लगती थी । लेकिन न जाने कैसे
एक प्रौढ़ ड्राईवर को शक हो गया और
उसने खरखरी आवाज़ को यथासंभव मधुर
बनाने की कोशिश करके पूछा-"ओय तू
छोरा है कि छोरी?
तुमसे मतलब??
डब्बू अकङते हुये गुड्डी को पीछे धकेल कर
आगे आया ।
चल डब्बू!!
गुड्डी ने खींचा ।
और दोनों ने दौङ लगा दी ।
आदमी ने उठकर
पीछा करना चाहा कि कुत्ते आदमी के
पीछे दौङ पङे ।
नशे में होने से वह लङखङाकर वहीं एक बेंच
पर लुढ़क गया।
घर पहुँच कर दोनों ने बैठक से ही बाहर
से
मेहमान कक्ष में बंडल फेंके और आवाज़
लगायी
"दद्दा बीङी।
दो दिन बाद ।
डब्बू जा भागकर बीङी ला तो ।
नहीं जाऊँगा दद्दा!! खुद जाकर ले आओ
क्या? क्या बोला तू!
होश में तो है?
नहीं जाऊँगा दद्दा मार डालो फिर
भी नहीं जाऊँगा ।
तङाक तङाक तङाक एक के बाद एक कई
तमाचे पङते ही डब्बू ज़मीन पर गिर
पङा ।
गुड्डी जा तू ले के बीङी
नहीं जाऊँगी दद्दा आप जाओ चाहे
भाभी को भेज दो ।
क्या!!!!!! बित्ते भर की छोरी और गज भर
की ज़ुबान?
नहीं जायेगा डब्बू बीङी लेने और
ना ही मैं । आप मारोगे तो हम
बाऊजी अम्माँ को बता देगें ।
तुम लोग बता तो दोगे फिर बाद में हम
कितने हाङ कूटेगे ये भी पता है!
गुड्डी को बाल युवक की मुट्ठी में थे ।
और
उंगलियों के निशान गाल पर छपे थे ।
क्यों मार रहे हो बचचों को आप खुद चले
जाओ न? य़ा फिर छोङ दो पीना
।तभी भाभी बोली किवाङ की आङ से ।
अभी बात पूरी भी नहीं हुयी थी कि एक
लात पीठ पर पङी और वह अचकचाकर बैठ
गयी।
पेट में चार माह का गर्भ था और
बङी देर
तक फिर पेट
दबाये कराहती रही।
बाऊजी न जाने कब आकर बरामदे में खङे थे
बैग अटैची होलडाल लिये आज दो हफ्ते
बाद घर आये थे तनखाह लेकर ।
डब्बू गुड्डी बहू ने सोचा अब
मुक्ति मिली और डाँट पङेगी बङे
दद्दा पर ।
लेकिन बाऊजी जैसे अनजान बनकर सीधे
अम्माँ के कमरे में चले गये ।
आज गुड्डी छुटकी डब्बू कोई
नहीं लिपटा टाँगों से किलक कर ।
ना बहू ने आखर पाँव छुये । ना दद्दा ने
बढ़कर सामान थामा।
डब्बू गुड्डी सुबह चुपके से मेहमान कक्ष में
झाँकने गये कि देखें दद्दा क्या कर रहे हैं

वहाँ दद्दा नहीं थे ।
लेकिन बाऊजी ने पूरा बंडल का पैकेट
टेबल
पर माचिस के साथ नजर चुराकर
रखा और
चुपचाप बाहर निकल कर अपने कमरे में
चले
गये ।
गुड्डी और डब्बू अवाक् से देख ऱहे थे ।
शाम को दद्दा के बुलावे पर
दोनों पिटने
के इंतजार में खङे
पैसे कहाँ से आये इत्ते सारे बंडल एक साथ
पटककर क्या सोचते हो अब
कभी दुबारा नहीं जाना पङेगा बीङी लेने!!!
डब्बू गुड्डी बीङी लेने नहीं जायेंगे ।
मैं लाया हूँ इतने सारे बंडल
और जितने चाहिये उतने सारे बंडल मैं
ही लाकर रखूँगा । आखिर डब्बू
को भी तो तुम
मेरा ही कमाया पैसा देकर मँगाते
हो बंडल!!!
अब शादी जो हो गयी तुम्हारी और कुछ
दिन बाद बाप भी बन ही जाओगे ।
दद्दा चुपचाप कमरे में चले गये ।
डब्बू और गुड्डी बाऊजी की टाँगों से
जा चिपके ।
©®™सुधा राजे
All right reserved
5112/2, Peetamabara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

माँ दे वीणा मैं गाऊँ

Sudha Raje
पग के छाले
मन के ताले
हृदय कंठ में
रुँधने वाले
कहे अनकहे
सहे अनसहे
मैं सब गीत सुनाऊँ
दे वीणा में गाऊँ
व्यथा वेदना
यूँ हर लूँगी
सुख दुख
गीतों में भर दूँगी
माँ ये मन जो
भरा पीर से
सारा ही रीता
कर दूँगी
निर्मम जग की
कटुक वेदना
मैं सुर तार बजाऊँ
दे वीणा मैं गाऊँ
माँ तेरे ढिंग आऊँ
SudhaRaje
®©¶¶©®¶SudhaRaje
Jan 21

my mate and me

Sudha Raje
the flowers of rose are swaying
their bun
the colours or rainbow sprinkle on
her face
that snow and ice of alps and
himalaya'peeping in her sight
O DUSKY EVENING ! FOR WHOM
YOU
ARE WAITING. when i ask she sighs
deep
and hide her self in a black shawl
stiched with stars and sang a
solitary
song which I wrote long ago for
some one now we are singing
together and waiting for none till
the morning we drink,we dance,we
cry we laugh and without any
promise we wait for each other and
never betray
(c)sudha raje
May 18

सुझा राजे की एक नज्म

Sudha Raje
आना जाना अनजाने का केवल
एक खबर है साहब
कौन किसी के दर्द पे
रोया ऐसा मेरा शहर है
साहब
रोज किसी की चिता से
जिनकी रोजी रोटी चलती हो
कत्लेआम पे गिरती लाशें
त्यौहारी मंज़र है
साहिब
कल फुटपाथ बाँह में भरकर सोता था नभ
ओढ़ के जो
वो अनाथ मंटुआ शहर का दादा भाई क़हर
है साहिब
बस्ती में क्यों आग लगी थी जाँच
कमेटी बैठी है
झुग्गी बस्ती पर बिल्डर की ठेकेदार
नज़र है साहिब
कब्रिस्तान बहाना भर था असल बात
मतगणना है
राजनीति का ठेठ पहाङा बहुसंख्यक बंजर
है साहिब
नील लगे लकदक कुरते पर कल तक लाल
दाग भी थे
लालढाँग बस्तर दिल्ली तक चूङी की झर
झर है साहिब
बहुत
चीखती हुयी आवाज़ों की मुखिया थी हरप्यारी
कई महिने से हुयी लापता
मरद हुआ बेघर है साहिब
भुने हुये काजू पिश्ते में
मुर्गी तंदूरी भी थी
शपथपत्र पर दस्तखतों पे लहू हिना खंज़र
है साहिब
©®¶©®¶
Sudha Raje
Feb 18
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Sunday, 24 November 2013

सुधा राजे की कुछ यादग़ार बहुचर्चित रचनायें

Sudha Raje
Sudha Raje
★e
मैंने सबकुछ दाँव लगाकर
हारा जिसको पाने में ।

वही इश्क़ लेकर आया अब दर्दों के मयखाने
में ।

दिल पर ऐसी लगी ,कि सँभले बाहर,,
भीतर बिखर गये ।

पूरी उमर गँवा दी हमने बस इक घाव
सुखाने में ।

अक़्सर बिना बुलाये आकर
जगा गयीं पुरनम यादें ।
। दर्द
रेशमी वालिश रोये पूरी रात सुलाने में ।

अपना बोझ लिये गर्दन पर कब तक ज़ीते
यूँ मर गये ।

एक ज़नाजा रोज उठाया ।
अपने ही ग़मखाने में ।

ता हयात वो खलिश नहीं गयी चार लफ्ज़
थे
तीरों से ।

जलते थे औराक़ लबों पर जलती प्यास
बुझाने में ।

आहों के अंदाज़ दर्द के नग्मे खुशी भर
गाता


कितने दरिया पिये समंदर दिल -
सहरा को बहलाने में ।।
नदी रेत में
चली जहाँ से
भरी भरी छलकी छलकी ।

सबको मंज़िल मिले नहीं था ये आसान
ज़माने में ।

शायर जैसी बातें करती पगली कमरे के
अंदर ।

ले गये लोग शायरी पगली फिर
भी पागलखाने में ।

कभी यहीँ पर एक रौशनी की मीनार
दिखी तो थी ।

हवा साज़िशे करती रह
गयी जिसको मार गिराने में ।
। मर मर
कर ज़िंदा हो जातीं प्यासी रूहें रात गये


सब आशोब तराने गाते है
डरना बस्ती जाने में ।

हाथ न छू इक ज़मला बोली
"""ये मेंहदी है जली हुयी""" ।
। मौत मेरे
दरमियाँ कसम है तुझको गले लगाने में।
मुट्ठी में भर आसमान ले बाहों में
जलता सूरज ।
सुधा चाँद की नींद खुली तो टूटे ख़ुम
पैमाने में
©®¶©®¶
सुधा राजे
sudha Raje
पूर्णतः मौलिक रचना सर्वाधिकार
लेखिका सुधा राजे बिजनौर / दतिया /
बिजनौर

Sudha Raje
Sudha Raje
सूख रहे ज़ख़्मों पर नश्तर - नमक लगाने आते
हैं।
भूल चुके सपनों में अपने से आग जगाने आते हैं।
किसी बहाने किसने कैसे कितनी कट
गयी कब देखा
बची हुयी दर्दों की फसलें लूट चुराने आते
हैं ।
उफ् तक कभी न की जिन होठों से पी गये
हालाहल सब ।
सुधा उन्हीं पर गंगा जमुना सिंध बहाने
आते हैं।
आज़ न बहे जो गूँगे आँसू दरिया आतश
का अहबाबों अलविदा ज़माने बाँध
गिराने आते
हैं ।
एक लम्स भर
जहाँ रौशनी ना थी वहीं ग़ुज़र कर ली ।
हमको तिनके तिनके मरकर अज़्म बनाने
आते
हैं।
कौन तिरा अहसान उठाता खुशी तेरे
नखरे ।
भी उफ्।
हम दीवाने रिंद दर्द पी पी पैमाने आते
हैं ।
आबादी से बहुत दूर थे फिर भी खबर
लगा ही ली ।
कोंच कोंच कर दुखा दिया फिर
दवा दिखाने आते हैं।
वीरानों की ओर ले
चला मुझे नाखुदा भँवर भँवर।
जिनको दी पतवार वही तो नाव डुबाने
आते हैं।
अंजानों ने मरहम दे घर नाम न पूछा मगर
हमें ।
जानबूझ कर डंक चुभोने सब पहचाने आते हैं

मासूमी ही था कुसूर बस औऱ्
वफ़ा ही गुनह मिरा।
हमको सिला मिला सच का ग़म यूँ समझाने
आते हैं।
©सुधा राजे ।
Apr 26
All Right ©®©®

कि जैसे छू लिया तूने ।
हवा शरमायी सी क्यूँ है ।
ख़ुमारी तेरी आँखों में अभी तक
छायी सी क्यूँ है ।
बहुत संज़ीदग़ी से बर्गो -शाखो-ग़ुल
को छूती है।
चमन में आई तो तेरी तरह
अलसायी सी क्यूँ है।
लब ज़ुल्फ़ सब इतने इशारे ये तबस्सुम क्यूँ ।
लगे तेरी तरह मयनोश ये घबरायी सी क्यूँ
है । ।
बहक़ कर लग्जिशे पा फिर सँभल कर
गुनगुनाती सी ।

अदा भी है अदावत भी ये यूँ अँगङाई
सी क्यूँ है।
सुधा वो शोख बातें सरसराती गोशबर
ख़ुशबू ।
तेरे आग़ोश में ग़ुम कसमसाती आई सी क्यूँ है।

©सुधा राजे Sudha Raje
Dta-Bjnr
May 22

Sudha Raje
आग के फ़र्श पे इक रक़्श किये जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिंद पिये जाती है ।
इक जरा छू दें तो बस रेत
सी बिखरती है ।
एक दुल्हन है जो हर शाम को सँवरती है ।
एक शम्माँ जो अँधेरों को जिये जाती है ।
दर्द रिंद के मानिंद पियेजाती है । कुछ
तो सीने में बहकता है दफ़न होता है ।
आँख
बहती भी नहीं बर्फ़ हुआ सोता है ।
तन्हा वादी में छिपे राज़ लिये जाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

जो भी मिलता है धुँआ होके सुलग जाता है

इश्क़ है रूह है आतश में जो नहाता है ।
अपनी ही धुन में वो शै क्या क्या किये
जाती है ।
दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

सख़्त पत्थर की क़लम है कि वरक़ वहमी हैं

कितनी ख़ामोश जुबां फिर भी हरफ़
ज़ख्मी हैं

ज्यों सुधा दश्त-ए-वहशत में दिये बाती है

दर्द को रिंद के मानिन्द पिये जाती है

All rights ©®¶©®©सुधा राजे ।
(★)
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ऐ दिल!!!!!
सहने दे ।
मुश्क़िल है अंज़ुमन में आना ,अब,मुझे
अकेला रहने दे।
कुछ ग़म ख़ामोश पिये जाते हैं पीने दे औऱ्
ज़ीने दे ।
कुछ ज़ख़्म छिपाये जाते है,, ख़ुद चाक़
ग़रेबां सीने दे।
बेनुत्क़ तराने ऐसे कुछ बे साज़ बजाये जाते
हैं

कुछ अफ़साने चुपचाप दर्द, सह सह के
भुलाये जाते हैं ।
हर साज़ रहे आवाज़ रहे ।ख़ामोश!!!!न आँसू
बहने दे
।।।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं । ऐ
दिल!!!!!!
सहने दे ।
कुछ यादें होतीं ही हैं बस दफ़नाने और
भुलाने को ।
हर बार कोई कब होता है देकर आवाज़
बुलाने को ।
कुछ पाँव पंख घायल पागल बेमंज़िल मक़सद
चलते हैं ।
कुछ तारे चंदा सूरज हैं चुपचाप पिघल कर
जलते हैं ।
कुछ ज़ख़्म लगे नश्तरो-,नमक बे मरहम हर
ग़म
ढहने दे ।
कुछ दर्द अकेले ही सहने पङते हैं ।। ऐ
दिल!!!!!
सहने दे ।
©सुधा राजे ।।
Sudha Raje
©सुधा राजे ।
Sudha Raje
©®¶
May 1
Sudha Raje
उल्फत उल्फ़त छलक रही थी जिन
आँखों की झीलों में ।
उनके भरे समंदर जिनमें
वहशत वहशत रहती है ।
इक दीवाने आशिक़ ने इक रोज़
कहा था चुपके से ।
मेरे दोस्त तेरे दम से दम हरक़त हरकत
रहती है ।
हुये बहुत दिन शहर बदर
थीं मेरी नज़्मों यूँ शायर ।
इस पहलू में
दिल के भीतर ग़ुरबत गुरबत रहती है ।
काला जादू डाल के नीली आँखें साक़ित कर
गयी यूँ ।
दिल का हिमनद रहा आँख में फ़ुरक़त फ़ुरक़त
रहती है।
ग़म का सहरा दर्द की प्यासें ज़ख़म
वफ़ा के गाँव जले ।
क़ुरबानी के रोज़ से रिश्ते फुरसत फुरसत
रहती है ।
झीलों की घाटी में वादी के पीछे
दो कब्रें हैं ।
जबसे बनी मज़ारें घर घर बरक़त बरकत
रहती है।
दीवारों में जब से हमको चिन गये नाम
फरिश्ता है

वो अब जिनकी ज़ुबां ज़हर थी इमरत
इमरत रहती है सुधा"ज़ुनूं से डर लगता है ।
अपने बाग़ीपन से भी ।
दर्द ज़जीरे सब्ज़ा हर सू । नफ़रत नफ़रत
रहती है ।
©सुधा राजे
May 22
Nov 1
Sudha Raje
सुधा राजे
511/2पीतांबरा आशीष
बङी हवेलियाँ
फतेहनगर
शेरकोट
बिजनौर
246747
उप्र

कुछ रचनायें सुधा राजे की

Sudha Raje
Sudha Raje
किशना पगली किशना
*******
तीन बेटियों में सबसे
बङी बिना भाई की किशना
नहीं सुनती माई की बात नहीं करती घर
के काम ।
दुत्कारी भी दुलारी भी
अंग अंग फूटी जवानी जिसे देख
बौरा गये तालाब बाग पेङ
नदी बाढ़ सी आयी गाँव में रिश्ते
के जीजा बह गये और रोती रह
गयी किशना
आम के पेङ के नीचे ।
वह
आयी क्यों माई ने
कितना रोका जीजा वीजा कुछ
नहीँ होता ।
लेकिन
चली आयी पक्के आम खाने घने बाग
में जंगल के बीच ।
चुपचाप घर आ पङी अकेली
किशना उदास है
दुखी है अँधेरी कोठरी में जी भर
रोती है पाठशाला भी नहीँ जाती ।
माई के जेहन में कीङे कुलबुला रहे हैं
कैसे पूछे क्या हुआ ।
काढ़े पीये
जा रही है किशना बिना कुछ पूछे
बुखार की दवा है माई ने कहा ।
पूछ पूछ हार गयी माई कुछ
नहीँ बोली किशना ।
अनुत्तीर्ण
हो गयी आठवीँ में । नहीं गाती ना आम
खाती है कभी । बस माई का हर काम
करती रहती चुपचाप ।
आम पर फिर
फल आये हैं सारी बहिनें जा रही हैं
माई बाऊजी भी जा रहे हैं
फुआ आई है ।नहीँ जा रही किशना ।
कोई
नही है घर में और आया है
वही रिश्ते का जीजा साल भर
बाद फिर बेशरमाई से
मुसकुरा रहा है । किशना बर्तन
माँज रही है और पाँच
किलो की लोहे ही कढ़ाही राख
रेत और निरमा से रगङते हाथ कब
उठे पता नहीँ कढ़ाही जीजा के
माथे पर जा लगी भीषण चिघ्घाङ के
साथ।
खून बह चला एक
सिर फटी लाश पङी है आँगन में
दौङती जा रही है बाल बिखेरे
राख के हाथ भरे चीखती बदहवास
आँधी की तरह आम के
बागों की तरफ किशना "माई हम
राक्षस के मार डरलीं "
कचहरी में घोषणा होती है
नाबालिग किशना पागल है ।
बाऊ रो रहे हैं माई चुप देख
रही है किशना लगातार आम
खा रही है
फूआ बुक्का फाङकर चीख रहीँ है "ऐ
वंश बुझौवनी अब तुहार बिआह कैसे
होई ।
किशना हँस रही है सारे कपङे मुँह
हाथ आम के रस से सराबोर ।
माई देख रही है एक साल बाद
काली माई की हँसी उसे
लगा किशना के चेहरे पर रक्त है
बुदबुदा उठी "ऐ माई नज़र न होखे
"पगली किशना अब जोर जोर से
गा रही है।
©®¶©®¶
Sudha Raje
Dta//Bjnr
सत्यकथा
Mar 25
Sudha Raje
Sudha Raje
Sudha Raje
दिल की बस्ती लूट रहा ये कारोबार
रूपैये का
लोकतंत्र या साम्यवाद हो
है सरकार रुपैये का
बहिना बेटी बुआ खटकती क्यों है
रुपिया लगता है
भैया पैदा रो ले 'हँस मत साझीदार रूपैये
का
प्यार खरा बेबस रोता है
मेंहदी जली गरीबी की
उधर अमीरं ले गया डोली सच्चा प्यार
रुपैये का
क्यों गरीब
का प्रतिभाशाली बच्चा ओहदे पाये
सखी!!!
अलग अलग विद्यालय
किस्मत है ललकार रुपैये का
वचनपत्र पर लगी मुहर है
अंकसूचिका पहचानो
काग़ज असली नकली चलता यूँ दमदार
रूपैया का
रूपिया है तो ननदी खुश है ननदोई देवर
सासू
बीस लाख का तिलक पाँच का भात बज़ार
रूपैये का
कोई भी ना हो तेरा फिर
भी जलवे जलसे दम होँगे
इकला ही रैबैगा रहा जो मारा यार
रूपैये का
रूपिया दे वो ही 'सपूत है रूपिया दे
वो बीबी है
रुपिया दे वो ही तो माँ है दिल
दिलदार रूपैये का
न्याय मिलेगा उसे कङक
जो रुपिया देय वकीलों को
सुनवाई होगी गड्डी दे थानेदार रुपैये
का
रूपिया दे दरबान
मिला देगा मंत्री से चटपट सुन
रूपिया दे तो वोट
मिलेगा ज़लवेदार रुपैये का
रूपिया हारा नहीँ हार गये
जोगी भोगी संन्यासी मंदिर गिरिजे
मस्जिद चढ़ता है दरबार रुपैये का
रूपिया होता बाबूजी तो हम
भी संपादक होते बीस किताबेँ छप
गयीँ होती बेफ़नकार रूपैये का
रुपिया हो तो आवे
रुपिया बहुरुपिया रिश्ता है "सुधा"
ऐब हुनर हैँ हुनर ऐब हैँ
फ़न दरकार रुपैये का
©®¶©®¶
Sudha Raje
Dta//Bjnr
Mar 28

खलनायक जो नायक लगते हैं

Sudha Raje
जिंदग़ी के aखलनायक नायक सहनायक
और jउनके स्त्री रूप भी ।
अक्सर चलचित्रों की aतरह बहुत स्पष्ट
और काले सफेद और सीधे बुरे और सीधेr भले
नहीं होते ।
होते हैं नायक aकई बार वे लोग
जिनको सब भले hकहलाने वाले लोग
बुरा नीचा और गंदा कहते है ।
कभी dबूढ़ा सब्ज़ीफ़रोश कभी सबसे
ज़्यादा शरारती दुष्ट बच्चा मुहल्ले
का ।कभी घर का सबसे
निकम्मा आवारा लङका तो कभी राहगीर
जिसे अभी अभी आपने डपट दिया था बस
की सीट पर ।
खलनायक सबसे प्यारी सखी ।बहिन
माँ भाभी शिक्षक जिसके होठों पर
सदा आपकी तारीफ़
या सदा निंदा रहती है ।
हो सकते हैं खलनायक वे पिता पति पुत्र
भाई बाबा मित्र और रिश्तेदार
जो कभी बुरा बरताव करते नहीं दिखते ।
बस उनकी उम्मीदें बढ़ी होती है और समय
पर मदद ग़ायब दवा खत्म हो जाती ।
ये कभी अत्याचार करते दिखते नहीं ।
और
कभी कोई साबित कर
ही नहीं सकता कि कुछ भी अहित करने
का इरादा रहा उनका।
जीवन के नायक खलनायक न डॉक्टर डेंग हैं
न मुगेंबो लेकिन वे है कोई बस कंडक्टर
जो सीट नहीं दिलाने की ज़हमत उठाते
जब सतमासी माँ जा रही मज़बूर प्रसव के
लिये नैहर।
ये होते हैं घर की देहरी पर बैठे दादा जब
न पढ़ने का फ़रमान जारी हो जाता है
बहू बेटी पोती के लिये ।
ये है दफ्तर में बैठे लकदक
कीमती कपङों वाले
अधिकारी जो किसी मामूली से क़ागज
को महीनों तक टरकाते रहते है
इतना कि जरूरत ही न रहे ।
ये नायक और खलनायक लगते है कुछ और
होते हैं कुछ और
कई बार
हम तब पहचान पाते है जब वे uलोग दूर
हो जाते है और कई बार तब जब sकुछ कहने
करने को शेष नहीं रहता ।
©®™¶SudhaRaje
Oct 19
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Saturday, 23 November 2013

मीडिया और महिलाये भाग 1

महिलायें और मीडिया(लेख)-----23/11/2013--सुधा राजे--
##############
महिलाओं का यौन शोषण अपने वरिष्ठों द्वारा कोई नई बात नहीं है। किंतु
यहाँ सवाल है मीडिया का जो स्त्रियाँ मीडियाँ में कार्यरत हैं वे कोई आम
घरेलू डरी सहमी दबी शर्मीली लजीली अबलायें नहीं हैं। वे स्त्रियाँ
मीडियाँ में आईँ ही इसलिये हैं कि दबी कुचली डरी सहमी आवाम की आवाज़ बन
सके । खोजें कि क्या क्या कहाँ कहाँ ग़लत हो रहा है । अपराध अन्याय शोषण
हिंसा भेदभाव के खिलाफ लङने की घोषणा के साथ मीडिया में कलम कीपैड कैमरा
कम्प्यूटर उठाने वाली स्त्रियाँ ही अगर अपने खुद के शोषण के खिलाफ़ ही
आवाज़ नहीं उठा सकेगीं और अपने साथ हो रहे भेदभाव हिंसा और शोषण के
खिलाफ़ लङाई में एक जुट होकर नहीं लङ सकेंगी तो क्या ख़ाक़ पत्रकारिता
करेंगी?
यहाँ बात कुछ बहुआयामी भी है । लङकियाँ जब पत्रकार बनने का सपना देखती
हैं तो सीधा सा नज़रिया टी वी पर अखबार में और रेडियो पर महिलाओं की
दमदार गिनती उनको आकर्षित करती है । और हाल ही में तमाम टीवी चैनलों की
बाढ़ ने इस सपने को और हवा दी है । किंतु दूसरे नज़रिये से देखें तो
मीडिया में कैमरे के सामने बहुत से निजी चैनल जिस महिला पत्रकार को रखते
हैं वह लगभग हर दूसरे तीसरे निजी चैनल पर एक ग्लैमरस कठपुतली सी रखी जा
रही है । कोई भी स्टोरी तङातङ बोलकर पढ़ देने वाली स्क्रीन से बढ़िया
मेकअप करके और बदन दिखाऊ सेक्सी कपङे पहना कर खङी कर दी जाती लङकी
पत्रकार किन मायनों में है?
उसे अधिकांशतः न कुछ शोध करनी होती है न लिखना होता है न कवरिंग करनी
होती है न कोई दिमाग़ इस पढ़ देने में उसका लगा होता ।
बस एक आकर्षक साक्षर स्त्री होना काफी होता है इस प्रकार के कैमरा फेस
करने के लिये समार्ट ग्लैमरस अभिनेत्री । उसको पत्रकारिता नहीं कहा जा
सकता यह एक नौकरी ही है जो बॉस और सीनियर के आदेशानुसार चलती रहती है ।
यहाँ कैमरा के सामने आने से पहले ड्रेसिंगरूम और ब्यूटी पार्लर अधिक
महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं । लङकी की फिगर कैसी है हाईट कितनी है बॉडी
लैगवेज कैसा है और आवाज़ में कितनी खनक और कर्णप्रियता है यही प्रधान है
। यहाँ दिमागी काम करने वाली टीम तो कोई दूसरी ही होती है।
विगतयौवन लेखिकायें और बुलंद ज़मीर शोधार्थी स्त्रियाँ जो वास्तव में
लिखती है और खोजकर लाती हैं सुबूत तसवीरें और मैटर वे अकसर कैमरे के पीछे
ही रह जाती है और कारण होता है रंगरूप साधारण होना कद काठी अनाकर्षक होना
।फिगर बेडौल या नयनाभिराम न होना

किंतु ऐसा पुरुष पत्रकारों के साथ नहीं है । अकसर गंजे मोटे थुलथुले और
काले नाटे प्रौढ़ बुजुर्ग पत्रकार मजे से किसी कार्यक्रम को लैपटॉप धरकर
होस्ट करते नजर आते हैं और उनके रूप रंग या कद काठी से कार्यक्रम की
गुणवत्ता जरा भी प्रभावित नहीं होती । लोगों का सारा ध्यान उनके द्वारा
उठाये जाने वाले सवाल ज़वाब पर और मुद्दों पर होता है। अलबत्ता आकर्षक
व्यक्तित्व है तो प्लस पॉईन्ट हो जाता है। कोई पत्रकार बहुत शार्प वक्ता
हो ये भी बहुत जरूरी नहीं किंतु विषय का ज्ञाता हो यही बात मुख्य होती है

यानि सफल पत्रकार होने के लिये जहाँ स्त्री के साथ युवा होना सुंदर होना
और लंबाई होना फिगर साँचे में होना और आवाज अंदाज ग्लेमरस होना एक अघोषित
शर्त होती है वहीं पुरुष पत्रकार के लिये ऐसी कोई शर्त नहीं मात्र
सुदर्शन होना प्लस पॉईन्ट होता है।
ये सवाल लाज़िमी है माईन्डेड मौलिक विलक्षण जीनियस और कर्त्त्व्यनिष्ठ
होना ज्यादा ज़रूरी है या कमनीय सुंदर वाकपटु और ग्लैमरस??
क्यों?
क्योंकि यह शो बिजनेस है । यहाँ लोग औरत को केवल आँखें सेंकने के लिये
देखते है । औरत कैमरे के सामने खङी हो और खूबसूरत न हो जवान न हो कमनीय न
हो वाकपटु न हो तो उसकी सारी बौद्धिक कुशलता चातुर्य और प्रतिभा बेकार है
वह पार्श्व की कर्मचारी है ।
एक छोटी सी पत्रिका के एक संपादक ने बातों बातों में बताया कि महिला
कवियत्रियों की रचनायें कई बार बहुत मामूली होते हुये भी केवल इसलिये
स्वीकार कर लेनी पङती हैं कि उनके सुंदर सुंदर चित्र पत्रिका को सजा कर
सुंदर बनाते हैं और स्त्रियों की उपस्थिति भी दर्ज हो जाती है और स्त्री
की रचना अगर प्रेम श्रंगार आदि पर है तब तो सोने पर सुहागा होता है। हाँ
पत्रिका को गंभीर बनाये रखने के लिये कभी कभी खङूस तेज दिमाग बुजुर्ग
स्त्रियों की रचनायें भी छाप देता हूँ।
ये एक सोच है भारतीय मीडिया की आम सोच । आप किसी संस्था में जाईये
रिशेप्सनिस्ट स्त्री ही अक्सर रखी जाती है । स्त्री पुरुष दोनों क्यों
नहीं? पर्सनल सेक्रेटरी अकसर स्त्री ही रखी जाती है । स्त्रीपुरुष दोनों
क्यों नहीं ।

ये एक सोच है कि स्त्री मतलब सुंदरता ग्लैमर यौवन कमनीयता नयनसुख!!!!!!
एक स्त्री की प्रतिभा हुनर दिमाग बुद्धिकौशल और लेखन वाचन वक्तृत्वकला
हाज़िरज़वाबी तेज दिमाग़ से समस्या का हल खोजी विचारशील अविष्कारक होना
इतना महत्तवपूर्ण नहीं है यदि वह बहुत अनाकर्षक हो ।स्त्री होने की शर्त
सुंदर होना ही रख दिया गया जैसे ।
किंतु पत्रकारिता में ये शर्त नहीं होनी चाहिये थी। यहाँ तो मौलिक
बुद्धिजीवी और विलक्षण खोजी विचारक स्त्री होने को महत्त्व मिलना चाहिये
था!!!!!
अकसर महिला संपादक जितनी हैं उनमें बहुत सी महिलाओं का पैसा कारोबार में
लगा है और पारिवारिक समूह होने से यह पद उन तक पहुँचा है । जबकि लाखों
माईन्डेड स्त्रियाँ कहीं हाशिये पर केवल बौद्धिक जंग़ लङ रहीं हैं अपनी
इकलौती संपत्ति कलम और विचार के दम पर । नाम है महिला पत्रकार और काम
क्या क्या सौंपे गये हैं जरा विचार कीजिये? जो एक होटल की वेट्रेस या
अस्पताल की रिशेप्सनिस्ट या बार की अटेंडर को सौंपे गये होते हैं ।
बेशक ज़मीर वाली तेज तर्रीर और विचारशील महिलायें भी हैं और हर सीमा
तोङकर आगे बढ़ रही हैं । परंतु सोच अभी तक बदली नहीं ।
आज समय आ चुका है कि मीडिया मूल्यांकन करे आत्ममंथन करे कि चौथा स्तंभ अब
मरम्मत माँग रहा है और पुनर्विलोकन पुनर्मूल्यांकन भी।
संगीत कला साहित्य वकालत विज्ञान खेल और पत्रकारिता किसी के दम पर कब तक?????

यहाँ एक न एक दिन गुरू और मेन्टॉर की उंगली छोङकर ही आगे बढ़ना पङता है ।
टीमवर्क हैं ये सारे कार्यक्षेत्र और स्त्री यहाँ बिना मौलिक प्रतिभा के
केवल कठपुलती या शोकेस की एफिजी से ज्यादा कुछ भी नहीं।
शराब सिगरेट गालियाँ और बेशर्म बातचीत सिर्फ पुरुषों की नकल के सिवा कुछ नहीं ।
कई मामले ऐसे केवल इसलिये यौन शोषण होते हुये भी दब कर रह जाते हैं कि
वहाँ चल रही पार्टी में लङकी पत्रकार ने शराब पी ली थी भले ही उसका जोर
औऱ दवाब पुरुष सीनियर साथी या नियोक्ता का रहा था किंतु नशे में हालत
बिगङने पर संस्था होटल निवास दफतर या किसी सहकर्मी के वाहन और कमरे पर
धुत्त पङी होने पर उस लङकी का यौन शोषण हुआ औऱ वह किसमत पीट कर रह गयी।
क्योंकि वह नशे में थी औऱ ये साबित करना मुश्किल था कि पुरुष से उसके
संबंध उसकी इच्छा के विपरीत जोर जबरदस्ती से बने थे। वहाँ नशा कैमरा और
प्राकृतिक उत्तेजना में नशे में सहयोग करती लङकी । खुद अपने खिलाफ ही
सुबूत बन जाती है। चुप रह जाने के सिवा और कोई चारा ही नहीं रह जाता ।
सवाल लाज़िमी है कि संस्कृति सभ्यता और तमाम बङी बङी बातों पर लंबे लंबे
स्तंभ कॉलम और लेख रिपोर्ट्स आदि देनेवाला पत्रकार जगत अपने ही भीतर
व्याप्त शराब सट्टा जुआ नशा कॉकटेल पार्टियाँ भ्रष्टाचार और ब्लैकमेलिंग
जैसी बीमारियों पर चुप क्यों है। क्यों नशाखोर होते जा रहे है पत्रकार ।
पंद्रह साल पहले जब हमने महिलाओं की समस्यायें लेकर अपने एनजीओ के माध्यम
से ससुराल के जनपद में प्याप्त समस्याओं पर लगातार लिखना शुरू किया तो
कोई लेख नहीं छपा । बस एक रात ग्यारह बजे नशे में धुत्त एक ब्यूरोप्रधान
का फोन आया -""आप हैं कौन? और रातों रात कहाँ से प्रकट हो गयीं ये झाँसी
की रानी? न कभी पढ़ा न सुना न देखा? देखिये मेम ये मीडिया है मीडिया
।यहाँ ये मामूली बातें नहीं छपती पति ने मारा ससुर ने घऱ से निकाला
खरीदकर शादी की रात को घर से बाहर निकाल दिया । ये पश्चिमी यूपी है यहाँ
ये सब होता ही रहता है । आप कहीं शहर में जाकर क्यों नहीं बस जाती पङौस
छोङकर । वैसे आप हैं कौन ये लेखक पत्रकार वकील सब यूँ ही नहीं लिखे जाते
मैम जी हम तो नहीं जानते आपको ऐसा भी कोई है जिसे हम ना जाने!!! बङी आई
लेखक!! """

और कुछ दिन बाद उसी ब्यूरो से लगातार कई महीनों सालों तक फिर हमारे नाम
से ही टाईटिल न्यूज लगती रहीं । किंतु वह प्रथम अभद्र बात चीत टोन और
धमकी भरा लहजा जिसमें बङे अश्लील ढंग से व्यंग्य किये गये थे कि औरतें और
होती किस लिये हैं बहुत कुछ जिसे यहाँ नहीं लिखा जा सकता।
ये चेहरा मीडिया का कौन सा चेहरा है?
एक सहपाठी लङकी ने बताया कि उसने अपनी अप्रैंटिस छोङकर लाईन चेंज कर ली
क्योंकि एक सीनियर जब भी कुछ सिखाते छू छूकर इंटेशन से और बातचीत
घुमाफिराकर अश्लील बातों पर लाकर हमेशा स्त्रियों की बुराई करना शुरू कर
देते खुद सिगरेट शराब में धुत रहते और लगातार प्रेरित करते कि पियो ।
इससे कॉन्फिडेंस बढ़ता है।
ऐसा नहीं है कि सब शराबी हैं और सब शोषक ।
किंतु सवाल है कि जब मीडिया के भीतर पीना पिलाना और लङकियों पप गंदी
हरकतों का प्रचलन बढ़ रहा है तो बाकी बुद्धिजीवी और मज़लूम की आवाज़
उठाने वाले जीनियस माईन्डेड धुआँधार वक्ता हाजिरज़वाब पत्रकार विचारशील
महान संपादक संवाददाता शोधी खोजी रिपोर्टर कहाँ हैं?? और क्यों चुप है?
जो अपने ही परिवार की स्त्रियों को इंसाफ नहीं दिला सकता वह व्यक्ति
गैरों अजनबियों की स्त्रियों को बचाने की समाज बदलने की और जमाना सुधारने
की बात करता है तो ये एक क्रूर मज़ाक है।
क्यों नहीं चाहते मीडिया परसन अपने भीतर अनुशासन?
1-कार्यस्थल पर शराब पीना मनावहो सिगरेट और गुटखा तंबाकू भी सख्त मना।
2-कार्यस्थल और औपचारिक मीटिंग रिपोर्टिंग के वक्त महिलाओं पुरुषों की
समान यूनिफॉर्म ड्रेस कोड हो ।
3-डिग्री डिप्लोमा मिलते ही बार कौंसिल औऱ बीमा निगम के आई आऱ डी ए की
तरह लायसेंस पंजीयन नामांकन परिचय पत्र औऱ जीवन बीमा न्यूनतम राशि का
जारी हो । तथा प्रेस क्लब की जिला तहसील मंडल राज्य संघीय शाखाओं में
सदस्यता बार असोशियेशन की तरह ही प्राप्त हो ।
4-प्रत्येक प्रेसक्लब पर लायब्रेरी औऱ सूचना केंद्र हो ताकि नौजवान
पत्रकार प्रतिदिन बैठकर सूचनायें पढ़ सुन देख लिख सकें । सालाना चुनाव
हों बार की तरह ही हर जनवरी से नयी यूनियन कार्य करे जो निर्वाचित हो ।
5-मंथली और छमाही सालाना मीडिया शिविर लगें ताकि समस्यायें समाधान
प्रेरणायें औऱ विचार विनिमय होता रहे ।
6-प्रेस क्लब से लायसेंस बनते ही वहीं से या कॉलेज से ही पत्रकारों का
चैनल रेडियो टीवी अखबार आदि में सिलेक्शन योग्यता औऱ रूचि के आधार पर हो

7-न्यूज एजेंसियाँ ऐसे लायसेंस धारक पत्रकारों को जॉब सुनिश्चित करायें
ताकि किसी को किसी की चमचागीरी न करन शोषण न
हो