Tuesday, 26 November 2013

"हम किसान" सुधा राजे लेख और कविता।

सुधा राजे ।
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ग्रामवासिनी
हम गँवार देहातिन बाबू !! गाली है शहर
खा गये सब कुछ
मेरे गाँव
की झोली खाली है
1-दूध पिये बिल्ली कुत्ते तोते फल खाते
माखन तुम
क्या जानो बिन रोटी के रमदसिया मरने
वाली है
2-
सारी साग़ सब्ज़ियाँ महुये आम आँवले बेर
तलक
भर ले जाते आढ़त बाबू बस
हमरी रखवाली है
3-
बोबें ,छेतें ,छोलें ,रोपें,ईख पिसी तिल
धान उङद
मिल ,काँटे ,मंडी ,कोल्हू पे
गाङी की भी डाली है
4-
जो भी आबे खाता जाबे
हम जाबे तो दुत्कारे
बिही केर गुङ परमल बिक
गये
जोरू बिटिया काली है
भैया जी कें गये थे इक दिन शहर
बिमारी विपदा में
बहिना ने
भी नाही चीन्हा भौजी
मतलब वाली है
6-धिल्ली नखलऊ दून के चक्कर काट काट
कें चिक्कर गये
"अव्वल की यो
डिगरी "ऊँची "बिन रिश्वत बेमाली है
7-
सुधा गाँव की गौरी नईँ
अब
ठेठों वाली कल्लो भयी
शहर गाँव
की कैसी यारी
मिक्सर
कहाँ कुदाली है
8-
बिजली आने का त्योहार
मनाते हफ्तों बाद यहाँ
राशन की लाईन
घोटाला करे पंच
की साली है
9-
ले जाते मजदूर बनाकर
बंबई
बेचें बच्चों को
हम गँवार गंदे किसान
की फूटी लोटा थाली
10-
कहाँ कौन सा देश और
सरकार हमें तो थाना है इज्जत जाये कतल
हो चाहे पंचों की दल्लाली है 11- पाँच
साल पे भोट डालने
पकङ पकङ
ले जाबेंगे
दारू दे के बिलमाबेंगे
रैली जोर निकाली है
12-
पटबारी को पैसे नई गये पैमाईश में
फँसा दियौ गिरदाबल के नक्शे में अब
ग्राम समाजू ढाली है
13-
चकबंदी में नायब और
वकीलों ने ऐसा फाँसा
परके करधन बेची रोरो
अबके कान की बाली है
14-
बिटिया पढ़ गई इंटर कैसे शहर पढ़ाबें
जी काँपे
गाँव के बाहर भेजे पे
तो पीछे रोज मवाली है
15-
बेटे की उम्मीद में सासू ससुर तबीजें करते
रये
तीन छोकरी हो गयीं
तिस पे अब आया बंगाली है
16-
रोज रात कूँ हाङ तुङाके
कमली की अम्माँ रोबे
कच्ची पी के लठ्ट चलाबे खोटी, किस्मत
वाली है
17-
गोबर
सानी कुट्टी मट्ठा रोटी बाशन
चरखा भी
जोरू गोरू खेत रखाबे
हमरी बात निराली है
18-
सुधा भात पे 'चीज'
चढैगी
भैंस बिके चाहे
दो बीघे
कैसे हमरी धिया बिआहें चिंता नींद
उङाली है
19-
बी पी एल पे नाम लिखाबे
नकद माँग परधान करे
मनरेगा की मजदूरी भी
मेट की भेंट चढ़ाली है
20-
हस्पताल
की दवा डागधर
शहर बेचते चोरी से
दाई जनाबै बच्चा मर गयी बिंदू
की घरवाली है
21-
मच्छर, बाढ़, बुखार
चोर ,नट
ओझा पंडिते दर्रोगा
बची खुची बिगङी औलादें नाबालिग
धौँचाली है
22-
क्या होता गणतंत्र कायें
की बँटी जलेबी शाला में
जो केबें परधान वो होबे शासन देश
सवाली है
23-
मिल वालों ने अब तक लौं पेमेन्ट
दिया नईँ बोबें क्या । क्ऱॉप लोन
की किश्त बिके टिरक्टर ट्राली हैं।
24-पुरखों की ऊसर ज़मीन पर
कितनों को रुज़ग़ार मिले। दादालाई
टुकङे टुकङे बँट गयी हर ख़ुशहाली है
25-हमसे घृणा करें रिश्ते भी नही बताते
देहाती
लोकतंत्र किस पोखर डूबा "सुधा "गाँव में
ठाली है
©®
सरकार जी सुनिये --यू पी के
गन्ना किसान भी वोटर हैं जनता हैं और
मेहनतकश भी.

खुला प्रार्थना पत्र ----———सेवा में
महामहिम राष्ट्राध्यक्ष महोदय भारत
संघ।
राज्यपाल महोदय उत्तरप्रदेश
__________द्वारा---
प्रधानमंत्री महोदय केंद्रीय
कृषिमंत्री महोदय कृषि राज्य
मंत्री महोदय उत्तरप्रदेश
मुख्यमंत्री महोदय उत्तरप्रदेश विषय --
गन्ने की खेतों में खङी फसल और
मिलों की पेराई ना चालू करने
की घोषणा ।और संकट में गेंहू की फसल
भी और किसान की बरबादी के आसार
माननीय
!!!!!!!!!!!!!
हम सब पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान ।
जो अधिकतर दुरूह यातायात वाले
इलाकों में रहते हैं । जहाँ आज
भी बिजली पानी सङक अस्पताल प्रसव
केंद्र और कॉलेज डाकघर दूर ही होते हैं
या नहीं होते । हम किसान अधिकतर
कच्चे घरों में और कुछ मामूली पक्के परंतु
अपर्याप्त सुविधा वाले घरों में रहते है ।
एक कृषक परिवार में औसत दस
व्यक्ति शामिल होते हैं । और चार पशु ।
हमारी जमीने जंगलों में होती हैं
जहाँ अक्सर हाथी साँप अजगर भेङिये
नीलगाय लंगूर बंदर गुलदार और संरक्षित
बाघ तक आ जाते है। जहाँ कीचङ है और
काँटे है । ऐसी दुरूह जगहों पर हम सुबह
सूर्योदय से पहले से जाकर रात होने तक
हाङ तोङ पसीने से लथ पथ बारहों महीने
हर मौसम में धूप वर्षा सरदी पाला ओंस
गरमी लू शीतलहर सब को झेलते हुये काम
करते हैं । पुरखों से मिली जमीनें बँटते
बँटते अब छोटे छोटे टुकङे बचे हैं । बाढ़ और
सूखा । औला और हिमपात की भी लङाई
हम अकसर ही झेलते हैं।पहले हम
साहूकारों से घर जेवर गिरवी रखकर लोन
कर्ज सूद ब्याज पर लेते थे । फिर बैंक से
कृषिभूमि गिरवी रखकर लोन कर्ज लेने
लगे । करजे का चक्कर सा ही चलता है
जो एक बार चलता है तो फिर कभी बंद
ही नहीं होता । बाबा ने
कर्जा लिया तो हम पोतों तक चक्रव्यूह
जारी है ।पिछला ब्याज और मूलधन
जमा करने के बाद हमारे पास
बचता ही क्या है जो हम किसी दम पर
अगली फसल बो ले??? इसलिये
पिछला कर्ज जमा करके नया कर्ज
उठाकर खेती करते
रहना हमारी विवशता है। हमारा बैल
कर्ज से आया और बीज भी कर्ज से
आया खाद भी कर्ज से आयी और कीटनाशक
दवाईयाँ भी । कृशि के करने के लिये
तमाम हल खुरपे फावङे
दराँती पंचा पचा थ्रेसर बखर
पटेला नाल कुदाल
गेंती गँडासा कुल्हाङी मूसर कोल्हू कंटर
ओखली बिरबार बरमा सब्बल
हँसिया पहसुल और इनकी पजाई धार
धराई बेंट डलाई में लगता पैसा भी कर्ज
से चलता है । हम लगातार कर्ज में
ही रहते हैं । बहुत कम किसान ऐसे है
जो ट्रेक्टर वाले हैं । सो भी एक ट्रैक्टर
में पाँच से सात भाईयों तक
का हिस्सा होता है। जो किसान
होता है वह और कुछ
भी नहीं हो पाता इस क्षेत्र
की खेती कठिन है क्योंकि दुरगम
जगहों पर खेत हैं जहाँ खेत के करीब तक बने
हुये मार्ग नहीं है । हम किसानों में
अकसर बोलचाल विवाद भी इसीलिये
हो जाते है कि मेरे तेरे खेत से
बैलगाङी या भैंसा बुग्गी क्यों निकाली ।
हम सब किसानों के पास
तो भैंसा बुग्गी भी नहीं होती । वह
भी करज् पर खरीदी जाती है और दस में से
सात किसान बिना बैलगाङी वाले हें
जो अपने
पङौसी की बुग्गी बैलगाङी या ट्रैक्टर
उधार के वादे पर चलाते है और जुताई
निराई के हल बखर कल्टीवेटर थ्रेसर
स्पेलर पर भी काम उधारी कर्जे से
होता है । माननीय!!!!!! ★ये कर्ज हमें
बनिया के राशन और दवाई पढ़ाई
कपङा बरतन सब पर लेना होता है। ★ये
कर्ज मिलता इस भरोसे विश्वास
आशा उम्मीद पर है कि ★*फसल आते
ही सबको ब्याज सहित कर्ज अदा कर
दिया जायेगा। किसान कर्ज हर हाल में
चुकायेगा ।बहिन के घर
भातमायरा ससुराल में शादी ।
बेटी का ब्याह बेटे की फीस
बीबी की दवाई पिता का इलाज
माता का अंतिम संस्कार पङौस के
जलसों का व्यवहार तोहफा और मकान
की मरम्मत सब पेट की रोटी बदन
की धोती सब इसी कर्जे से चलता है। एक
शहरी नौकरीपेशा बँधी तनख्वाह
वाला आदमी निश्चिंत होता है
कि पहली ताऱीख को तनखाह
मिलेगी और रिटायरमेंट पर पेंशन । हम
किसान हर समय दुआ और डर के साथ रहते
हैं हमारा भाग्य तो आधा मौसम और
आधा कीङों मकोङों जानवरो मिलमालिकों नेता मंत्री और
सरकारी गैर सरकारी बाबुओं के
हाथों लिखा होता है ।
बीबी बच्चों बूढ़ो पशुओं समेत रात दिन
हाङतोङ मेहनत करने के बाद। जब फसल
पक कर खेत में खङी होती है तब हम
सपरिवार सबकुछ भूलकर कटाई और मिल
मंडी और काँटे तक पहुँचाने
चोरों रिश्वतखोरों घटतौलियों जैसा कि खुद
विगतवर्ष मुख्यमंत्री जी ने काँटा खुद
तुलकर पकङा था । इन सबके बीच जूझते हैं
क्योंकि महोदय हमारा धन सर्वस्व
प्राण आत्मी जीवन तो पकी फसल के रूप
में खुलेआम बिखरा रहता है । जिसे
दुर्घटनाओं से बचाकर मिल पर पहुँचाकर
हमारा मन शांत हो जाता है घङी भर
को । तब भी ★हमारे माल
का पैसा हमको तुरंत
नहीं मिलता सरकार!!
★हमारा पैसा मिलवाले पूरा सत्र
पेराई करते रहते है गन्ना हम ढो ढो कर
मीलों दूर दराज से काँटों तक पहुँचाते है
तौल क्लर्क घंटों खङा रखता है और
अतिरिक्त तौल मारता है और वह
अतिरिक्त तौल अपने खाते में
पूलियाँ डलवाकर वसूलता है। बस
यहीं तक ★हम अपनी फसल के मालिक
रखवाले नौकर रहते हैं ★यहाँ से शुरू मिल
वालों का चक्कर रहता है । वे लोग
सबका मिलाकर अरबोंं रुपया बैंक में
जमा रखते हैं
जिसका करोङों रुपया ब्याज आता है और
ये ब्याज किसान के लिये नहीं होता ।
वह तो मिल मालिक के लाभ में जाता है ।
हर पेमेंट रोककर देने से एक
श्रंखला बनी रहती है जिसका ब्याज
बराबर मिल वाले लेते रहते है मान
लो एक किसान का औसतन तीन लाख एक
साल बैंक में रहा तो अगले साल किसान के
पेंमेंट दिया वह भी आठ दस किश्तों में अब
किसान को एकमुश्त माल देते ही दाम
मिलता तो यह ब्याज तीन लाख
रुपया एक साल जमा रखने पर किसान
को मिलता न??? सरकार? ★अब ये एक
और भीषण संकट है कि रक़बे में अगर सब
किसान गन्ना बो रहे हैं
तो हमारी भी मजबूरी ही है
कि गन्ना ही बोयें कियोंकि एक का खेत
पच्चीस किसानों के बीचों बीच आ
रहा होता है तो सात फीट उँची ईख के
बीच मीलों दूर तक चलकर कोई अपने खेत
तक कैसे हर दिन जाकर अलग तरह
की फसल बोये ऱखवाली करे? इसलिये सब
एक साथ बोते काटते है जंगलों में
बिना हुजूम के औरतें ले कर बच्चे लेकर
जाना भी खतरनाक है। हम सब ही अगर
गन्ना बोना छोङ दें तो ही सब लोग
बदल बदल कर फसल बो सकते हैं । हम
भी बीमार होते है दर्द चोट घाव
तकलीफें हमें भी होती हैं मगर हमें कोई
सरकारी मेडिकल से दवा इलाज
तो मिलना नहीं । ढुलाई नकद
देनी होती है। मजदूरी दिन ढलते ही। ये
पैसा आता है कर्ज से । सोचिये
जरा हमारा पैसा मिलवालों के पास है
औऱ वे कम से कम एक साल बाद देते है वह
भी बिना ब्याज के जबकि हम
सरकारी बैंक को ब्याज देते हैं साहूकार
को ब्याज देते है बनिया औऱ सुनार
को ब्याज देते हैं । तो मिल वाले जिस
दिन काँटे पर गन्ना लेबें उसी दिन से
जिस दिन पेंमेंट हमारे खाते में डालें तब
तक का सरकारी बैंक रेट से ब्याज
भी चुकाबें यही नियम बनाया जाये ।अब
अगर खङी फसल पर मिल
नहीं चली तो पक चुका गन्ना सूखने
लगेगा । औऱ वजन कम होता जायेगा ।
गेंहूँ की फसल नहीं बोयेंगे तो भूखों मर
जायेगे वही तो भरोसा है जिंदा रहने
का । कि चलो मिल वाले जब तक पेमेंट
नहीं देते तब तक खाना तो मिलेगा नमक
रोटी माँड भात ये हाङ पेलने को कुछ पेट
में तो चाहिये ही। ब्लैकमेलिंग है ये ।
क्योंकि लङकियों की शादियाँ तय
हो चुकी हैं । बच्चों की परीक्षायें आने
वाली हैं । हम पर हल बैल ट्रैक्टर खाद
बीच कटाई नलाई सिंचाई इंजन डीजल
यूरिया पोटाश फासफेट बोरिंग
सबका कर्ज बढ़ रहा है। कहाँ से
चुकायेगे??????????!?????? सरकारी बैंक
तो एक नोटिस भेज देता है अगर कर्ज
नहीं चुकाया तो जमीन कुर्की कर लेंगे??
मगर हम मिल वालों को कौन सा नोटिस
भेजे कि पिछली रकम
नहीं भेजी तो क्या कुरकी कर लेगें??? और
मिल पेराई शुरू नहीं की तो बारह
महीनों की आशा सपना उम्मीद जो कर्ज
का कपङा पहने खङी है मर रही है पल पल
क्या कर लेगें । अब तो खांडसारी गुङ रस
के भी कोल्हू बंद पङे है वरना वहीं कुछ
फसल बेचकर गेंहूँ तो बो लेते और
मजदूरों ढुलाई वालो लङकी के ब्याह
बहिन के भात बच्चों की फीस का कर्ज
तो पटा लेते??? महोदय सियासत कोई
करे इस इलाके का गन्ना किसान
गरीबी सांप्रदायिकता और कर्ज से कतई
नहीं बच पा रहा है । एक मास्टर क्लर्क
और किसान के घर बारी बारी ।से जाईये
अंदाजा लगाईये कि छोटे बङे सब
कितनी मेहनत करते और क्या पहनते खाते
देखते कैसे रहते हैं । एक भयंकर संकट
मिलमालिकों ने किसानों के सामने
खङा कर दिया है हम गंदे और कम पढ़े लिखे
गरीब लोग न्याय की उम्मीद सुनवाई के
इंतज़ार में हैं हमें नहीं पता कि सियासत
क्या करेगी मिल और सरकार की मगर हम
दहशत में हैं कि मिल
नहीं चली तो क्या होगा पेमेंट
नहीं मिला तो क्या होगा मँहगाई के
हिसाब से लागत और अगली फसल के लिये
बाज़िब दाम नहीं मिले तो क्या होगा ।
प्रार्थी समस्त अनपढ़ कम पढ़े लिखे
ग्रामीण । और किसान मित्र भारतीय
पश्चिमी उत्तरप्रदेश . लेखिका सुधाराजे
COPYRIGHT
©®सुधा राजे
वास्ते कृषक ब्लॉक अल्हैपुर।उत्तरप्रदेश ।
nOTE**
पाठकगण कृपया दरख्वास्त शेयर करते
जायें ताकि किसानों के बारे में
सबको पता चले।
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

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