Wednesday, 20 November 2013

कुँवारे मातृत्व की अवधारणा।

Sudha Raje
कुँवारे मातृत्व की अवधारणा
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एक सफेद स्याह और सलेटी पहलू
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हमारा मन बँधी बँधाई लीक पर
ही सोचने का आदी है सो हम जब भी कुछ
नया या क्रांतिकारी सोचते है
घबरा जाते हैं ।ये सोच भी बँध गयी है
कि अकेले रहकर जीवन बिताने का हक़
पुरुषों को तो है तब वे महान
ब्रह्मचारी और भीष्म योगी जोगी जाने
क्या क्या कहलायेंगे लेकिन
स्त्री को अकेले रहने का हक़
नही "जिमि स्वतंत्र भयें बिगरई
नारी"तो तुलसी बाबा कह ही गये हैं
तमाम संहिताओं में बचपन
पिता किशोरावस्था भाई यौवन
पति प्रौढ़ावस्था पुत्र और
जरायुता पौत्र के नियंत्रण में
स्त्री को रहने का उपदेश देते हैं ।
यहाँ कारण दो हैं एक बलात्कार का डर
और दूसरा स्त्री के स्वेच्छाचारी होकर
विवाहेत्तर पुरुष संबंध बना लेने
की आशंकायें ।
तीसरी कोई वज़ह है तो एकमात्र
आर्थिक निर्भरता ।
स्त्री जब
कमा रही हो पुरुषों की तुलना में
ज्यादा ।देह से बलिष्ठ और योग्य
हो अपनी रक्षा स्वयं कर सकने में और
अपने लिये भूमि भवन भोजन भेष भेषज स्वयं
खरीद सकती हो और अपने ही बुद्धि बल
कौशल से भीख भी दे सकती हो और
अपना मान सम्मान पहचान अपने ही बल
बूते हुनर पर बनाये रख सकती हो तब??
समाज कुतर्क पर उतर आता है ।
परंपरा और प्राकृतिक जरूरत? परंपरा ये
कि स्त्री को पिता दान कर दे
जिसको उसके घर जाकर रहो और
जो जो स्त्री का कमाया और
पिता का दिया है उसका मालिक वह
पुरुष सात चक्कर आग के लगाते
ही हो गया । अब स्त्री का कुछ
भी अपना नहीं रहा वह पुरुष जब जगाये
जागो जब तक जो जो कार्य करने को कहे
करो जिस जिस के सामने जाने से मना करे
मत जाओ और जहाँ जहाँ उसके परिवार
वाले जैसी जैसी परीक्षा लेना चाहे
देती रहो ।कोख में फतनी बार बच्चे ढोओ
जितनी बार पपरुष चाहे और
मरो सा जीओ पैदा करो लङके जब तक
पुरुष चाहे । पाल पोसकर बङा करके सब
संताने पुरुष को सौंप दो ताकि वह
लङकियाँ दान कर दे पुण्य के लिये और
लङकों को अपनी शान का परचम बना ले
क्योंकि परंपरा से संतान का सरनेम
पिता का और पिता ही अंतिम निर्णय
कर्त्ता ।स्त्री से हर जोङे में पुरुष
को प्रेम ही होता है और पूरे पचास साठ
सत्तर अस्सी साल तक बना रहता है ये
उतना ही बङा झूठ है जितना कि मैं
सुधा राजे संयुक्त राष्ट्र संघ
की महासचिव हूँ
अब तसवीर का एक अनचाहा पहलू ये है
कि एक प्रतिभाशाली लङकी जो स्ट्रगल
करके पढ़ी और कठोर परिश्रम से उसने
जीवन की हर उपलब्धि हासिल की और
जॉब तक पहुँचकर
अपनी गृहस्थी जोङी फरनीचर कपङे जेवर
जमीन और पहचान बनायी सम्मान
हासिल किया । धीरे धीरे एक ठहराव से
निरंतर गति में चलता कैरियर जारी है
और लङकी सुबह देर से सोकर उठती है
रात देर तक लगातार कामकाज में
जुटी रहती है और वह अपनी एक
नियमावली बनाकर
सोती खाती उठती बैठती है लोगों से
मिलती है । एक सुखी जीवन जी रही है
माँ बाप का सहारा है और बहिन
भाईयों की संरक्षक है ।
या दूसरे मामले में माँ बाप भाई नहीं हैं
और बहिनों ने अपने अपने घर बसा लिये ।
वह लङकी जिसकी किसी मामले में
किसी पर भी निर्भरता है ही नहीं!!! वह
एक मात्र प्यार ही की तलाश में
हो सकती है बस । न पैसा न मकान न
शरण न सहारा कुछ नहीं चाहिये उसे ।
तब अगर उसको किसी से भी प्राकृतिक
अनुभूतियों के तहत प्यार नहीं होता है
और सब कहते हैं कि उसे शादी कर
लेनी चाहिये । वह सोचती है और तलाश
के बाद भी उसकी उम्मीदों पर खरा युवक
जिसकी सोच और शैली उसको सूट
करती हो नहीं मिले तब? क्या वह सिर्फ
विवाह के लिये विवाह कर ले?
वह अपना अच्छा भला घर मकान एक
अटपटे अनमैच पुरुष को सौंप दे ।और
बदबूदार जुराबें खोजकर साफ
करना पसीने की बनियान कच्छे धोना.
बेटाईम जागना सोना औऱ अपनी नापसंद
के पकवान बनाना औऱ जो लोग उस
स्त्री को कतई पसंद नहीं करते
उनको सम्मान दे दे कर झुकते रहना औऱ
नफरत करने वालों के बीच सुशील विनम्र
रहने का अभिनय करना । पुरुष के
मित्रों के लिये किचिन में सिर्फ इसलिये
तपते रहना कि विवाह के पहले उस पुरुष
ने खूब दावतें दोस्तों के घरों में उङाई अब
बीबी के हाथ का भोजन
खिलाना उसकी शान है। कि वह
ऐसी हुनरमंद स्त्री का मालिक है। सुबह
जल्दी उठकर बेड टी तैयार करना ।
दफतर से आते ही बिन बुलाये
मेहमानों का स्वागत करना औऱ उनके
सघन व्यंग्यबाणों से भरे मीनमेख इंटरव्यू
को मुसकराकर झेलना।
अपनी मेहनत से
खङी गृहस्थी को सबको बेदर्दी से
इस्तेमाल करने देना और टूट फूट
गंदगी का हँसकर सह जाना। जब कोई
सृजनात्मक कार्य करना हो तो टाईम
बेटाईम थके या पीङा में मूड या बेमूड में
पुरुष की दैहिक भूख पर चुपचाप बिछते
जाना । और वह जितनी बार
जितनी संताने चाहे पैदा कर करके देना ।
उनको पालना पोषना और पुरुष
का स्वामित्व मानना ताकि वह कन्यायें
दान करके पुण्य पाये और पुत्रों से शान
मान नाम क्योंकि परंपरा से
पिता का ही सरनेम लगता है और
पिता का ही हक है और पिता ही अंतिम
निर्णायक है ।
ये सब केवल इसलिये कि उस
स्त्री को दैहिक तृषा है और संतान
की इच्छा??
बाकी तो कुछ
भी वैसा नहीं जैसा उसको चाहिये ।
तब?
केवल विवाह के लिये विवाह
सिवा अपनी अच्छी खासी पटरी पर
दौङती गाङी को खुद ही तोङ कर चूर
चूर कर देना ही है ।
क्योंकि यौवन विगत ये संबंध नारकीय
हो जाते हैं कि जिनमें स्त्री से पुरुष
को प्यार तो नहीं है परंतु समाज में
बीबी बच्चों वाला कहलाने
को शादी कर ली । स्त्री के धन
का अपहरण किया और पद
प्रतिष्ठा का लाभ उठाया।
औऱ जिन मामलों में स्त्री के पास अपने
अति व्यस्त कैरियर के चलते बेडरूम
की पुरुष तमन्नायें पूरी करने
को मा तो वक्त है न ही दैहिक इच्छा ।
अथवा जिन रिश्तों में पुरुष
ही इतना सक्षम नहीं या वक्त और मन
तन नहीं रख पाता कि वह स्त्री से एक
संतुलित बेडरूम लाईफ शेयर कर सके तब?
यहाँ वह एक बिझार साँड से ज्यादा कोई
हैसियत नहीं रह जाती पुरुष की । सीमेन
डोनर मात्र??? तब विवाह
की बनी बनाई धारणा धङधङाकर
गिरती चली जाती है ।
वह पुरुष ना तो स्त्री के खरचे
उठा रहा है ना ही उसे घर बनाकर दे
रहा है । न ही सुख सुविधा गृहस्थी के सर
सामान जुटा कर दे रहा है । और
ना ही उसका सामाजिक मान सम्मान
अमुक या फलां की बीबी होने से बना है ।
ना ही वह उसकी रक्षा करता है अकेले
दुकेले आते जाते सुरक्षा के लिये उस
स्त्री को उस पुरुष की जरूरत नहीं?
तब?
तब ये रिश्ता बनाकर वह लङकी जो पूर्ण
है हर तरह से क्यों खोये अपना तन मन धन
। क्यों बेकार में अपनी बँधी बँधाई
दिनचर्या और लाईफ स्टाईल में तोङफोङ
करके जगह बनाये?
उसे एक बच्चा चाहिये!!!! ताकि जब वह
बूढ़ी हो जाये तो ये घर धन सौंप सके और
बच्चे के साथ का सुख हो । बुढ़ापे
का सहारा हो ।
तब वह कुँवारे मातृत्व
का फैसला क्यों नहीं ले ले!!!
आज विज्ञान ने घोषित कर दिया है
कि स्त्री को पुरुष सीमेन तक की जरूरत
नहीं वह खुद अपने ही शरीर के कणों से
संतान पैदा कर सकती है ।
और जब वह माँ भी पुरुष की गुलामी किये
बिना बन सकती है तब?
क्यों एक विकलांग जिंदग़ी स्वीकार करे

क्योंकि अकेले होना ही अकेले
होना नहीं है वरन अकेला होने
का अहसास तब क्रूर होता है जब कि एक
व्यक्ति को साथी बना लिया और वह
तो केवल शोषण कर रहा हो भावनाओं
का तन का मन का धन का पद
प्रतिष्ठा परिश्रम हुनर कौशल और
भलमनसाहत का
ऐसी लङकी जो स्वाधीन
स्वावलंबी सशक्त और सक्षम है ।
जिसकी दैहिक जरूरतें उसके संयम से कतई
तक भी बढ़ी चढ़ी नहीं हैं और वह हर
तरीके से अकेले रहकर सुखी और खुश है ।
केवल एक
सदियों की सङी गली परंपरा को समाज
के नाम पर ढोने लगे कि उसके बच्चे
को पिता का नाम चाहिये??
शायद भूल रहे हैं हम गणेश जी केवल
माँ की संतान हैं ।
भीम अर्जुन नकुल सहदेव युधिष्ठिर केवल
माँ की संतान थे ।
और क्यों याद नहीं आतीं वे
सद्यः विधवायें जिनका जीवन विवाह के
चंद दिन बाद ही अकेला हो गया और
उन्होने अपनी संताने अकेले ही परवान
चढ़ायी!!!!!!
क्यों नहीं याद आती वे परित्यक्तायें
जिनको विवाह के नाम पर
धोखा मिला और प्रेम के नाम पर
यौनशोषण और घर के नाम पर यातनायें
देकर निकालने का अपमान ।उन माँओं ने
अकेले ही रहकर
अपनी संतानों की परवरिश
की बदनामियाँ झेलीं और कुरबान कर
दी हर तमन्ना ।
क्यों याद नहीं आती वे बुआय़ें
दीदियाँ मौसियाँ ।
जिन्होनें अपने भाई बहिन या भतीजे
भतीजी या भांजे भांजियाँ पालने
परवरिश करने की चुनौती लेकर खुद
का विवाह ही नहीं किया वही भाई
बहिन या भतीजी भतीजे या भांजी भाजे
उनकी संतान हैं!!! ऐसी ' दरजन भर
माँओं को जो कोख में ना रखकर
भी मातृत्व निभाये गयीं हम खुद जानते हैं
। आप भी दो चार को जरूर जानते होगें ।
ऐसी बुआ मौसी दीदी । की शादी से
अनाथ भी हो जाते है अनेक बच्चे
जो माँ नहीं कहते परंतु होते तो संतान
ही हैं।
कुँवारे मातृत्व की अवधारणा लोगों के गले
नहीं उतर रही है । किंतु
नीना मेहता याद होंगीं?
शहीदों की लाखों बेवायें याद होगी ।
और तमाम सामाजिक राजनैतिक
महिला नेत्रियाँ याद होगी जिनके पास
दत्तक संतानें हैं । सुष्मिता सेन भी याद
होंगी ही।
यहाँ कुँवारे मातृत्व की व्यापक
व्याख्या की जरूरत है कि सुखी संपन्न
सक्षम सशक्त स्त्री जबकि उसके मन में
जगह ही नहीं किसी पुरुष
की दासता गुलामी और हुकुम
की कठपुतली बनकर जीने की न ही कोई
प्यार व्यार जैसा नाता है । तब केवल
माँ होने के लिये सत्तर साल तक एक
अवांछित पुरुष को ढोते रहना मन मार
मार कर एडजस्ट करना और अपनी हर
चीज़ पर से अपना हक़ नियंत्रण औऱ शासन
खो देना जबकि न मन न तन न जीवन न
ही जरूरत कोई मजबूरी भी नहीं??
तब चाहे वह संतान गोद ले ले
कहीं अनाथालय से तो किसी एक
या दो बच्चों का नसीब भी बन जाये औऱ
माँ बनने
का उसका सपना भी पूरा हो जाये इसमें
बुराई क्या है अगर सब अकेली समर्थ
महिलायें दो दो अनाथ बच्चे गोद ले लें
तो???
दूसरी है अपना ही तनय तनया पाने
की तमन्ना तो अब जब तकनीक उपलब्ध है
तो अपना बच्चा पाकर खुद
अपनी मरजी से पालना औऱ एक परिवार
बनाना कोई बुरा क्यों माने? कि उस के
पास पति नामक का टैग लेबल नहीं है!!!
वह दो हफ्ते की विधवा से ज्यादा ठीक
है और तीन माह
की तलाक़शुदा या छली गयी प्रेमिका से
भी ।
विवाह तभी सार्थक है जब
स्त्री अपना सबकुछ शेयर करने को तैयार
हो अपना वज़ूद खोने तक को और पुरुष
ऐसा मिल जाये जो बुरे वक्त
बदसूरती गरीबी और बीमारी में
भी प्यार से निभा सके।
तो तैयार रहे बिना पापा वाले मम्मी के
बच्चों का स्वागत करने को
¶©¶©®™सुधा राजे
बिजनौर /दतिया
all right reserved©®™Sudha Raje


हमारा विचार अडिग है अगर सुयोग्य
वर नहीं मिलता है और प्रेम नहीं है तब
जबकि मायके से सपोर्ट है परिवार
का अपने बूते बच्चे पालने का दम है तब
।।।समझौता करके किसी बेमेल विवाह
को गले मत लगाईये ।।।रही बात साथ
देने की ।।।सामान सौ बरस का पल
की खबर नहीं है ।।।जब जिंदगी मौत
का ही ठिकाना नहीं तो किसी ।।।
माटी के पुतले के भरोसे कोई कब तक
सुखी??? अपना हाथ जगन्नाथ ।।।और
विवाह तभी करें जब विवाह के लिये तन
मन हालात सब अनुकूल हों ।।।लोगों के
कहने या परंपरा के डर से नहीं ।।।ये खुद
ही समझा जा सकता है कि वह
लङकी कितनी तैयार है किस तरह के
साथी की तमन्ना है और क्या क्या वह
अपने भीतर बदल सकती है
क्या नहीं ।।।।अविवाहित
रहना बुरा नहीं ।।।बुरा है समझौते
करके खुद को झौंक देना जानबूझकर
वहाँ जब कि मालूम हो वह व्यक्ति पसंद
नहीं प्यार नहीं होगा नहीं परिवार
आपके मन सोच विचार जैसा है न वे बदलेगे
ना आप तब क्यों न अकेले ही माता बनकर
परिवार बना लें ।।ये सबके लिये
नहीं उनके लिये है
जो अपनी अस्मिता नहीं खो सकती और
देर सवेर ये टकराव सामने आकर सब तहस
नहस करते है


संदेह था लोगों को कि फेसबुक जैसी कोई
बला होगी??? लोग चाँद पर जायेंगे???
लाईव टेलीकास्ट होगे वीडियो फोन
होगा??? मगर है । ।।

विधवा तलाकशुदा और
जिनकी शादी गरीबी कुरूपता या मजबूरी से
नहीं हो सकी वे भी मानव है और एक
तनहा माता भी ।।।।विवाह संस्था अब
तक है और रहेगी लेकिन ये भी है कि अब
बदलेगी शर्ते पुरुषवादी नहीं रहेगी हर
शादी में स्त्री को कुछ छूट मिलेगी जीने
की ।।।।

अत्याधुनिक समाज जिनको कहा जाता है
वहाँ पवित्रता जैसी हिंदुस्तानी अवधारणा से
चिपके नहीं है लोग और आंतरिक अनुशासन
है बहुल कि स्त्री को जीने देते है

जब ये आंतरिक सह अस्तित्व
यहाँ होगा तो वहाँ की तरह
यहाँ भी आधे से ज्यादा औरते तलाक देकर
दूसरी से नौंवी तक शादी करने पर
भी हेय नहीं समझी जायेगी ।।और घरेलू
या पब्लिक प्लेस पर
लोगों को लङकी की शादी की बजाय
जॉब की चिंता होगी


की है स्त्री माया है दुष्ट
तिरिया चरित्तर है नारी नरक
का द्वार है कामिनी ही नर का नाश है
सब ग्रंथ जो पुरुषों ने रचे पढ़ लीजिये
नहीं बदली है वह अगर
बीबी को थोङी बहुत छूट देता है तो ये
समझकर कि रुपया आ रहा है बच्चे पल रहे
है दहेज मिल रहा है खाना पक रहा है और
मालिक तो पुरुष ही है सो मैं
रहूगा विवाह
की संस्था का स्वामी जो मेरी न
चली तो स्त्री है मारपीटकर बराबर कर
दूँगा वरना जायेगी कहाँ?? सुहाग
सतीत्व धरम के फंदे है और
ममता की बेङियाँ!!
तोङना कुछ भी नहीं है दा बस नये
को भी जोङना है जो सकारात्मक है ।
यातनाजनक घिसटन से
स्वावलंबी अकेलाजीवन साहसी और सुखद
हो सकता है ये आयपास तमाम उदाहरण हैं
बस हम स्वीकार नहीं करके
उनको अपमानित करते हैं यही गलत है ।
तलाकशुदा माँये कुँवारी विधवायें
छली प्रेमिकायें और अविवाहित रह
गयी दीदियाँ सवाली है ।
मतलब यही कि चाहे पुरुष चबाकर कोख
पर थूक दे???? परंतु सक्षम होकर भी बेमेल
और अनचाही शादी जरूर करो चाहे
जीवन दोज़ख जहन्नुम बन जाये ।।लेकिन
अगर सही मैच नहीं तो अकेले ही शान से
सिर उठाकर जीने का फैसला मत करो??
चाहे तलाकशुदा विधवा या घर
की कैदी रहो!!!! इनकी संख्या लाखों है ।
सवाल सामंजस्य का नहीं है एक
स्वावलंबी समर्थ लङकी बेमेल बिना प्रेम
बिना सम्मान की शादी क्यों करे??बच्चे
तो वह अकेले ही पैदा कर सकती है और
गोद ले सकती है तो किसी निकम्मे
नालायक और
कपटी आदमी लालची की दासता गुलामी करने
की बजाय अच्छा है अगर सही मैच
ना हो तो अकेली रहे ।सामंजस्य
का मतलब नब्बे परसेंट मामलों में
लङकी की कुरबानी है कैरियर शरीर
परिश्रम और
पिता की तथा अपनी पहचान और दौलत
की कुरबानी ।जबकि कोई
गारंटी नहीं बेमेल विवाह के निभने की।
समाज को बनाये रखने के नाम पर
अत्याचार जारी रखने की परंपरा कब
तक?? झुकना स्त्री होने भर की वजह से??
तब वह तो मोहताज नहीं!!! जब प्रेम और
मान नहीं और मन का मेल नही तो केवल
शादी सिवा ढोंग के कुछ नहीं औरत
की यातना सहने की ताकत पर बने ऐसे
नाते सिवा छल के कुछ नही।
सामंजस्य कभी परंपरा से नहीं रहा पुरुष
के हिस्से ।जनमभूमि छोङना घर रहकर
घरेलू सेवायें करना किचिन सँभालना बच्चे
पालना और पुरुष के नखरे
उठाना परिचारिका बनकर उन
ससुरालियों के नखरे झेलना जो बहू
को फूटी आँखों पसॆद नहीं करते केवल
गलतियाँ खोजते रहते हों । ये सब
वहाँ तक ठीक ठाक चल
गया जहाँ लङकी के पिता दहेज देते रहे
और लङकी चरणों में पङी रोती रही अब
जब लङकी मोहताज नहीं है तब?
रिश्ता परंपरा मजहब के नाम पर
नहीं निभेगा वहाँ तो कुदरती प्रेम और
सम्मान ही होगा तभी क्यों मजबूर
किया जाये उस
लङकी को जो अकेली रहना चाहती है और
महसूस करती है कि वह किसी पुरुष
की दासी नहीं बन सकती और
ना ही इतना समझौता करने की उसमें
गुंजाईश है??रहने दो न उसे अकेला रहकर
बच्चे पालकर रहने दो कमाती खाती खुश
माँ क्या परेशानी है???क्या सब
पति वाली औरते खुश है????बेशक नहीं तब
ये फैसला क्यों नहीं ले सकती एक सक्षम
लङकी कि वह किसी से
शादी नहीं करेगी बल्कि बच्चा गोद ले ले
लेगी और या खुद का क्लोन शिशु जनम दे
कर अकेली रहेगी यहाँ न हम
शादी की बात कर रहे है न परिवार
की ।केवल लङकी की कि उसे हक है
बिना पुरुष की दासी बने
अकेली सुखी जिंदगी जीने का बस्स।
ये सबके बस का है ही नहीं और सबके लिये
है ही नहीं सिर्फ समर्थ स्वावलंबी सशक्त
महिला ही ये फैसला ले सकती है और वे
बिना किसी मास्टर
की उपदेशावली की परवाह के ये फैसले ले
रही है
ममता बनर्जी जयललिता गिरिजा व्यास
उमा भारती मायावती अगाथा शैलजा कुमारी सुष्मिता सेन
रेखा एकता कपूर और लाखों ताकतवर
महिलायें जिनको किसी पुरुष के समर्थन
की परवाह नहीं उनके अपने फैसले और
परिवार है ये विवाह की मरी लाश
घसीटती बेबस औरतें और घर में
बीबी को कैद करके अन्याय करने वाले
ढोगी नहीं समझ सकत
क्यों करें?????????! क्या स्वछंद महिलाओं
को जीने का हक नहीं??? स्वछंद पुरुष
क्या कर रहे हैं पुरुषों के लिये??? महिलाओं
की बेहतरी है दासता और घरेलू हिंसा से
मुक्ति और ये तभी मिलेगी जब विवाह तब
किया जाये जब मन माफिक
जोङी हो वरना अकेले रहा जाये ।स्वछंद
से जो आपका अभिप्राय है वह
सङी गली दिमागी हालत का नमूना है
एक हफ्ते बाद विधवा को ससुराल वाले
त्याग दें वह जीवन भर पङी रहे भाई
की चौखट पर लेतिन एक
कुँवारी लङकी रह तो वह आप को स्वछंद
लगती है परंतु आपकी परवाह किसे है??

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