Monday, 25 November 2013

बाल कहानी- डब्बू बीङी लाया कि नहीं। (लेखिका ""सुधा राजे)दतिया मप्र

Sudha Raje
25-11-2013/1:52pm.सोमवार।
★कहानी★डब्बू बीड़ी लाया कि नहीं?
------लेखिका-"सुधा राजे "
पूर्णतः मौलिक रचना
all right ©®™सुधा राजे
_________
**********
चौं रे लला तैं फिर आ गऔ?
अभई तौ ले गऔ तौ तैं मुतकी बीङी?
का तेओ भज्जा बिङियई बिङी खातु ए?
के तैऊँ पिअन लगौ रे?तोय काजें काल
सौं आड़त बारे सें कैनो परेगो मोय ।""
दुकानदार तसलीम
खाँ की मज़ाकिया आवाज़ से वह दस साल
का लङका सिटपिटा कर झेंप गया और
जल्दी से बोला
-""नही चचा मैं बीङी नईं
पीता कभी नईँ
विद्या कसम!! वो तो दद्दा ने मँगाई है
।वहाँ दिनभर उनके दोस्त यार ताश
खेलते रहते हैं या कुछ और तो हर समय
कोई
न कोई बीङी पीता ही रहता है।
जल्दी से दो बिंडल शेर बीङी देदो और
दो बिंडल गुप्ता बीङी स्कूल को देर
हो रही है मास्टर जी फिर डाँटेगे
नहीं तो""
लङके ने बीङी ली और घर की तरफ दौङ
लगा दी ।
पीछे से दुकानदार तसलीम खाँ चिल्लाया
ओ रे बावले छोरे ओ ssssडब्बू!!!!
ये पैसे तो लेता जा नई अभैई कुटम्मस
होबेगी तोयी ""
लङका हाँक सुनते ही थरथरा गया ।और
अहसान मानता सा वापस लौटकर पैसे
लेतर फिर वापस दौङ गया ।
घर के भीतर पाँव रखते ही जम
गया देहलीज पर ।
भीतर से भेङिये की सी गुर्राहट में
बङा भाई पूछ रहा अपनी पत्नी से
""कहाँ मर गया वो तुम्हारा लखनलाल?
अब तक नहीं आया?
दरवाजे पर बेचैनी से झाँकती एक बारह
साल की लङकी खङी थी उसने दीवार के
पीछे छिपते छोटे भाई को देखा और
झपटकर बाहर आकर बीङियाँ हाथ से
लेकर भागकर स्कूल चले जाने को कहकर ।
बिंडिल अंदर लाकर बङे भाई के हाथ में
थमा दिये ।
""डब्बू कहाँ गया? तुम बीङी लेने
गयी थी क्या? "
"नहीं दद्दा! वो डब्बू स्कूल
चला गया तो मैं लेने चली गयी थी। "
'आने दो उसे आज टाँगें तोङ दूँगा । बहुत
हरामपंथी देने लग गया मेरे काम में । '
युवक ने दाँत पीसे और बंडल लेकर फिर
बाहर बैठक के बगल में बने मेहमानकक्ष में
जाकर दोस्तों के साथ बैठ कर ताश खेलने
लग गया।
लङकी ने बस्ता उठाया और पिछले
दरवाज़े से स्कूल की तरफ दौङ लगा दी ।
डब्बू अपनी क्लास में क्लास में मैथ पढ़
रहा था लेकिन गुड्डी की क्लास छूट
चुकी थी। वह स्कूल के पिछवाङे जाकर
खिङकी के पास खङी होकर लेक्चर सुनकर
नोट करने लगी । तभी एक
सहेली गोपिका की नज़र पङ गयी ।
गोपिका की नज़र का पीछा करते
मास्टर श्रीवास्तव जी की नजर
खिङकी के किनारे चिपकी गुड्डी पर
पङी तो कङक कर बोले -
-"यू आर लेट अगेन गुड्डी!!
कम इन ।
गुड्डी चुपचाप अंदर आ गयी
पूरी दीवार
घूमकर और चुपचाप कान पकङकर बेंच पर
खङी हो गयी। अकसर यही होता ।
गुड्डी कभी डब्बू को पिटने से बचाने के
चक्कर में लेट हो जाती तो कभी सुबह
की झाङू चाय नाश्ता और सफाई करने में

माँ अकसर बाऊजी के आतंक और बङे
भाईयों के झगङे सुलझाने में लगी रहती ।
नयी दुलहन भाभी से अभी तक रसोई
छुवाई नहीं गयी थी और बङे भाई पढ़ाई
के बहाने अलग अलग कमरों पर
कब्ज़ा किये
दोस्तों के जमघट में बीङी गाँजा चिलम
पीते रहते । भाईयों के दोस्त
गुड्डी को अज़ीब से ढंग से घूरते रहते ।
उसको जरा भी अच्छा नहीं लगता लेकिन
कर भी क्या सकती थी। डब्बू और
गुड्डी दोनों साथ स्कूल जाते साथ सोते
साथ साथ खाना खाते और साथ साथ
खेलते
।खेलना कोई अलग से समय नहीं था ।
अक्सर बीङी लाने या कोई
छोटा बङा सामान लाने में दोनों जब
साथ जाते तो रेलवे की रेजीडेंस लाईन के
फाटक से बाहर निकलते ही खेल चालू
हो जाता । गुड्डी बाऊजी की साईकिल
कैंची चलाकर डब्बू
को सिखाती तो कभी मिल लाईन पर
पङी रेत के ऊपर घरौंदे बनाते रहते सारे
रेलवे मजदूरों के बच्चे।
इंटरवल जब हुआ तो डब्बू चुपचाप क्लास
से
बाहर आ गया । वह आज भी लंच
नहीं ला पाया था । गुड्डी ने दौङकर
बस्से में से घी नमक शक्कर
लगी हुयी दो रोटियाँ निकाली और
रूमाल डब्बू के हाथ पर रख दिया ।
थेक्यू जिज्जी!!
डब्बू ने रूमाल से रोटियाँ निकाल कर
जल्दी जल्दी खा लीं और पानी पीने
भागा ।
भूख तो गुड्डी को भी लगी थी । लेकिन
वह जल्दी जल्दी बस दो ही रोटी सेंक
पायी थी। अगर खुद खा लेती तो डब्बू
भूखा रह जाता । गुड्डी ने मन ही मन
हँसकर डब्बू को देखा ।
डब्बू दौङकर उसके पास ही आ रहा था ।
जिज्जी तुमने खाना खाया?
हाँ खा लिया डब्बू!
तो चलो बेर तोङने चलते हैं चले?
चलो अभी तो बीस मिनट की रेसेस है ।
गुड्डी को भूख लग रही थी । सुबह पाँच
बजे से सात बजे तक झाङू बरतन रसोई
करते फिर आधा किलोमीटर पैदल आते वह
थक गयी थी।
दोनो बच्चे स्कूल के पिछवाङे पहुँचे और
बाऊंड्री फलाँगकर बाहर निकल आये ।
जरा सी दूरी पर
पहाङी थी नहीं झरबेरी का जंगल
था अकसर दोनों भाई बहिन स्कूल के
इंटरवल या प्रेयर से पहले यहीं आ जाते ।
बेर खाते तोङते और बस्ते में जेबों में
भी भरते जाते ।
जिज्जी मैं बङा कब होऊँगा?
जब खूब सारा खाना खायेगा डब्बू!
लेकिन कैसे खाऊँगा जिज्जी? जब भी खाने
बैठता हूँ बङे दद्दा मँझले दद्दा किसी न
किसी काम से दुकान पर दौङा देते है!!
और अब तो तसलीम
चच्चा भी हँसी उङाते
है कहते है "बीङी तैं भी पियन लगौ का रे
छोरे?
डब्बू! ये बीङी गंदी चीज होती है । तुम
कभी नहीं पीना ।
देखा नहीं जबसे दद्दा बीङी पीने लगे
सबको मारते डाँटते रहते हैं ।
हाँ जिज्जी वे तो बीङी में चूरन भरकर
पीते हैं
डब्बू ने बङी बङी आँखें फैलायी
गुड्डी का चेहरा भी ऱुआँसा हो गया।
हाँ डब्बू पता है। मैंने भाभी से
कहा कि रोक
लो दद्दा को तो बेचारी भाभी को भी दद्दा ने
तमाम डाँटा और तमाचा जङ दिया ।
हमने अगर
बाऊजी को बता दिया तो भी पिटाई
खानी पङेगी। दद्दा तो बच जायेगे
जरा सा मुर्गा बन बनाकर मगर हम
लोगों को मार ही डालोगे बाऊजी के
ड्यूटी पर जाते ही फिर कौन बचायेगा?
अम्माँ तो दद्दा की ही मानती हैं ।
तभी घंटी की आवाज़ सुनकर दोनों बच्चे
दुबारी दीवार चढ़कर स्कूल में आ गये।
डब्बू!!!
जी दद्दा!!
जरा चार बिंडिल लेकर आ तो!!
दद्दा रात हो गयी अब तो तसलीम
चचा की दुकान तो बंद
हो गयी होगी वो तो सात बजे अपने
गाँव चले जाते हैं ।
अबे बातें मत बना । चार कदम पर होटल
इंद्रलोक है वहीं पर मिल
जायेगी जा भागकर ले आ ।
दद्दा मुझे डर लगता है वह तो पूरा एक
मील दूर है ।
अबे डर मरने से लगता है तो ला मैं
ही मार डालूँ डरपोक
कहीं का लङका होकर डरता है?
जा जल्दी वरना अभी उधेङ दूँगा ।
जी दादा
लङका पैसे मुट्ठी में दबाये दरवाजे पर
भरी आँखें लिये खङी गुड्डी के पास आकर
रो ही पङा ।
जिज्जी वहाँ मरघट पङता है सङक
किनारे और कुत्ते भौंकते रहते हैं
अँधेरा भी है ।मुझे बहुत डर लगता है।
चल डब्बू मैं चलती हूँ तेरे साथ ।जब तू
बङा हो जायेगा न तब तुझे कोई
नहीं पीट सकेगा ।
जिज्जी!
कल से तुम दो रोटी ज्यादा ले
चलना स्कूल मैं
जल्दी बङा होना चाहता हूँ।
इस दद्दा का ग़ुलामी से तो पीछा छूटे।
ठीक डब्बू! पर तू
जिज्जी को तो नहीं पीटेगा ना ।
ऐ ऐ ऐ क्या कह रही हो जिज्जी!!!!!
सारी दुनियाँ रूठे चाहे भाङ में जाये बस
मेरी जिज्जी मेरे साथ रहे ।
सच डब्बू?
एकदम सच्च जिज्जी । अब देखो न
अम्माँ बाऊजी के साथ दद्दा भाभी और
मँझले दद्दा के तो दरजन भर दोस्त हैं
छुटकी के लिये
अम्माँ दद्दा भाभी सबको फिकर है।
एक बस मैं हूँ किसी को मतलब
ही नहीं कहाँ हूँ कौन हूँ।तुम
वहीं होगी तो मुझे कौन पढ़ाये कौन
रोटी दे कौन नहलाये और किसके पास
सोऊँगा मैं । मुझे तो रात को चारपाई
पर अकेले डर लगता है।
डब्बू तेरे तो फिर भी दस पाँच दोस्त हैं
मेरा तो कोई भी नहीं । डर तो मुझे
भी लगता है लेकिन तेरी तरह भूत प्रेत
और पिटने से नहीं बस पढ़ाई छूटने से और
ससुराल से ।अम्माँ दद्दा रोज ही कहते है
कि फेल हो गयी या कोई काम काज ठीक
से नहीं किया तो अबके
अक्ती या देवठान
पर ब्याह करके ससुराल भेज देगे फिर
कभी नहीं बुलायेंगे।
अरे वाह कैसे फेल हो जाओगी तुम
जिज्जी!!!
मास्टर हो तुम तो पूरी!! और फिर मैं हूँ

बङा होकर सबको ठीक कर दूँगा ।
बस तुम मुझे जल्दी जल्दी बङा कर
दो दद्दा और बाऊजी से भी लंबा और
तगङा।
दद्दा खुद क्यों नहीं जाते जिज्जी?
कोई बाऊजी से ना कह दे इसलिये डब्बू ।
रास्ता लंबा था और रेलवे क्वार्टरों से
दूर चलते ही अँधेरा होने लगा गाढ़ा।
कुत्ते भौंक कर पीछे लगे
तो दोनों बच्चों ने दौङना शुरू कर
दिया।
होटल पर चारपाईयों पर पसरे ट्रक
ड्राईवर शराब की फैली भभक और अंडे
मुरगे चाय पेट्रोल की मिली जुली बदबू
और महक से डरे सहमे बच्चों ने बिंडल
लिया और घूरती आँखों से बचते हुये तेज तेज
कदमों से घर की तरफ चल पङे ।
गुड्डी लङकों वाले कपङों में
लङका ही लगती थी । लेकिन न जाने कैसे
एक प्रौढ़ ड्राईवर को शक हो गया और
उसने खरखरी आवाज़ को यथासंभव मधुर
बनाने की कोशिश करके पूछा-"ओय तू
छोरा है कि छोरी?
तुमसे मतलब??
डब्बू अकङते हुये गुड्डी को पीछे धकेल कर
आगे आया ।
चल डब्बू!!
गुड्डी ने खींचा ।
और दोनों ने दौङ लगा दी ।
आदमी ने उठकर
पीछा करना चाहा कि कुत्ते आदमी के
पीछे दौङ पङे ।
नशे में होने से वह लङखङाकर वहीं एक बेंच
पर लुढ़क गया।
घर पहुँच कर दोनों ने बैठक से ही बाहर
से
मेहमान कक्ष में बंडल फेंके और आवाज़
लगायी
"दद्दा बीङी।
दो दिन बाद ।
डब्बू जा भागकर बीङी ला तो ।
नहीं जाऊँगा दद्दा!! खुद जाकर ले आओ
क्या? क्या बोला तू!
होश में तो है?
नहीं जाऊँगा दद्दा मार डालो फिर
भी नहीं जाऊँगा ।
तङाक तङाक तङाक एक के बाद एक कई
तमाचे पङते ही डब्बू ज़मीन पर गिर
पङा ।
गुड्डी जा तू ले के बीङी
नहीं जाऊँगी दद्दा आप जाओ चाहे
भाभी को भेज दो ।
क्या!!!!!! बित्ते भर की छोरी और गज भर
की ज़ुबान?
नहीं जायेगा डब्बू बीङी लेने और
ना ही मैं । आप मारोगे तो हम
बाऊजी अम्माँ को बता देगें ।
तुम लोग बता तो दोगे फिर बाद में हम
कितने हाङ कूटेगे ये भी पता है!
गुड्डी को बाल युवक की मुट्ठी में थे ।
और
उंगलियों के निशान गाल पर छपे थे ।
क्यों मार रहे हो बचचों को आप खुद चले
जाओ न? य़ा फिर छोङ दो पीना
।तभी भाभी बोली किवाङ की आङ से ।
अभी बात पूरी भी नहीं हुयी थी कि एक
लात पीठ पर पङी और वह अचकचाकर बैठ
गयी।
पेट में चार माह का गर्भ था और
बङी देर
तक फिर पेट
दबाये कराहती रही।
बाऊजी न जाने कब आकर बरामदे में खङे थे
बैग अटैची होलडाल लिये आज दो हफ्ते
बाद घर आये थे तनखाह लेकर ।
डब्बू गुड्डी बहू ने सोचा अब
मुक्ति मिली और डाँट पङेगी बङे
दद्दा पर ।
लेकिन बाऊजी जैसे अनजान बनकर सीधे
अम्माँ के कमरे में चले गये ।
आज गुड्डी छुटकी डब्बू कोई
नहीं लिपटा टाँगों से किलक कर ।
ना बहू ने आखर पाँव छुये । ना दद्दा ने
बढ़कर सामान थामा।
डब्बू गुड्डी सुबह चुपके से मेहमान कक्ष में
झाँकने गये कि देखें दद्दा क्या कर रहे हैं

वहाँ दद्दा नहीं थे ।
लेकिन बाऊजी ने पूरा बंडल का पैकेट
टेबल
पर माचिस के साथ नजर चुराकर
रखा और
चुपचाप बाहर निकल कर अपने कमरे में
चले
गये ।
गुड्डी और डब्बू अवाक् से देख ऱहे थे ।
शाम को दद्दा के बुलावे पर
दोनों पिटने
के इंतजार में खङे
पैसे कहाँ से आये इत्ते सारे बंडल एक साथ
पटककर क्या सोचते हो अब
कभी दुबारा नहीं जाना पङेगा बीङी लेने!!!
डब्बू गुड्डी बीङी लेने नहीं जायेंगे ।
मैं लाया हूँ इतने सारे बंडल
और जितने चाहिये उतने सारे बंडल मैं
ही लाकर रखूँगा । आखिर डब्बू
को भी तो तुम
मेरा ही कमाया पैसा देकर मँगाते
हो बंडल!!!
अब शादी जो हो गयी तुम्हारी और कुछ
दिन बाद बाप भी बन ही जाओगे ।
दद्दा चुपचाप कमरे में चले गये ।
डब्बू और गुड्डी बाऊजी की टाँगों से
जा चिपके ।
©®™सुधा राजे
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यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

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