Monday, 5 October 2015

फुफ्फू के टोंचने :- "वोट के लिए कुछ भी करेगा।"

लज्जा नहीं आती तो धिक्कार लानत्त
और निंदा,,,,,,
चारा घोटाले के आरोपी नेता से और
क्या आशा की जा सकती है!!!!!!
लालू यादव काटजू और शोभा डे ।
जैसे लोग केवल ""मुसलिम समुदाय में
अपनी वाहवाही समर्थन और धारा के
विपरीत चलकर खुद को महामॉडर्न
साबित करने के लिए ही,,,,,,,
स्वयं को "गौ भक्षक कहने तक से गुरेज
नहीं कर रहे है ।
!!!!!!! ये पब्लिक है सब जानती है!!!
अपराधी वे लोग है जे किसी के मौलिक
अधिकारों का हनन करते हैं और बजाय
शिकायत करके न्यायप्रक्रिया से इंसाफ
माँगने के कानून अपने हाथ में ले लेते है ।
ऐसों को संविधान और कानून के मुताबिक
दंड मिलना चाहिये ।
किंतु
वे लोग सिर्फ मौका परस्त हैं जो ''''दो
समुदायों को नफरत की आग भङकाकर
लङवाते हैं और फिर एक की पीठ पर हाथ
रखकर खुद को ''क्रांतिकारी साबित
करने की कोशिश करते हैं!!!!
जबकि
कोई मूढ़ महामूर्ख भी समझ सकता है कि
"""ऐसा बयान केवल "मुसलिम या कभी
हिन्दू या कभी दलित या कभी जनरल
कास्ट का समर्थन हासिल करने के लिये
दिया गया है,,,,
बिहार के विकास की बात करने वाले
पहले राज्य फिर केन्द्र मंत्री रह चुके
का होनहार बेटा नौंवी पास!!!!!!!!!!!
परिवार नियोजन के खिलाफ,,,,, नौ
संताने!!!!!!!
प्रजातंत्र के राज में जेल जाते समय
"अत्यल्प शिक्षित घरवाली को
मुख्यमंत्री बना देना!!!!!!
और स्वयं को कृष्ण के धर्मिपता नंदबाबा
का वंशज बताकर क्षत्रिय होने का
दावा करने वाले """यादव??????
जो भारत के सबसे बङे गौरक्षक रहे!!!!!!!
कृष्ण और गौपूजकों ने गौजयराष्ट्र
गौधरा
गौकुल
गौ नाम से अनेकानेक नगर बसाये और
'''दूध दही घी से भरा रहा भारत तो
""यादवों गूजरों जाटों ग्वालों और
गौपालकों की वजह से??!!!!!!
आज
बिहार चुनाव के लिये
मुसलिम वोट लेने के लिये!!!!!!!!!
स्वयं के """"गौ भक्षक घोषित कर
दिया?????
'''तो इसी मुँह से कभी गौ ग्रास न
निकालना? कभी गौदान न करना? कभी
गौ वत्स द्वादशी गौवर्धन पूजा न
करना??
लालू यादव की पत्नी जिऊतिया पूजती
है "
जो "आज है ""
लालू स्वयं घर में और नदी पर जाकर
""छठ पूजा करते दिखते हैं!!!!!
आने ही वाली है ।
लालू ने ही कॉग्रेस के ""मीसा ""कानून
के खिलाफ जाकर अपनी बेटी का नाम
"""ही मीसा भारती ""रख दिया
था!!!!!!!
चरवाहा विद्यालय की अवधारणा देकर
पशुपालक होने का दावा करने वाले लालू
क्या समझते हैं कि बिहार का मुसलिम
इतना बेवकूफ है कि ""ऐसे बयान देने से
वोट की बरसात लालू के लिये कर
देगा?????
ये कोई संतुलित कथन नहीं हो सकता!!!
बल्कि ये कहते कि "मुसलिम परिवार पर
हमला करने वालों को दंड मिले,,
कहते कि हत्यारों को हर जगह जहाँ भी
चाहे हिंदू की मुसलिम करे या मुसलिम
की हिंदू करे ""मजहबी नफरत के कारण
उसे ""फाँसी हो ।
कहते कि "गौ वध निषेध करने को
मुसलिम भाई बहिन मित्र आगे आयें
ताकि """"आस्था और विश्वास के कारण
गौ को पूजनीय मानने वाले उनके मित्र
कलीग भाई बंधु पङौसी और देशवासी
"""आहत न हों
ताकि देश में समरसता रह सके ।
और कोई बहुत बङी चीज तो है नहीं कि
"मजहब की शर्त हो? """मुसलिम तब तक
मुसलिम हो ही नहीं सकता जब तक
"""गाय नहीं खायेगा?????
हजारों मुसलिम खोजो तो ऐसे निकल ही
आयेगे कि """वे चाहते हैं कि अगर अमन
क़ायम होता है और आपसी विश्वास
बढ़ता है एक थाली में खाने पीने के पल
बढ़ते हैं तो ""
"गाय का मांस कोई बङी चीज नहीं जो
त्यागी जा सके!!!!!!!!
यह अपील शायद ज्यादा कामयाब
होती ।
उस गाँव में जो हुआ वह गलत है ।
और किसी भी हिंदू ने कदाचित ही
समर्थन किया हो!!!!!
सब चाहते हैं कि ऐसी कोई घटना कहीं
ना हो ।
शायद उस गाँव के उन बेवकूफ मुलजिमों मे
भी ""हत्या का इरादा न रहा हो और
मारपीट कर ही दंड देने का इरादा
रहा हो ',जबकि किसी को भी किसी
भी तरह से कानून अपने हाथ में लेने का
हक नहीं है 'अधिक मारपीट से कई बार
ऐसा हुआ कि गाँव का बटुआ चोर या कोई
लैगिंक अपराधी भी मारा गया ।
बजाय इस घटना पर दुख और आईन्दा
ऐसी कोई घटना कहीं न हो का प्रबंध
करने के ""
लेखक
बुद्धिजीवी
नेता
अगर इस तरह के बयान देते है तो यह
शर्मनाक स्थिति है ।
क्योंकि ""रातों रात ये चमत्कार नहीं
हो सकता कि """मुसलिम "सूअर खाने लग
पङे और हिंदू गाय का मांस!!!!!!!
जब तक """सब के सब नास्तिक न हो
जायें तब तक "
जब ये बातें ""1857की क्रांति की वजह
बन गयीं तो,
क्या था ब्रिटिश कारतूसों में? गाय और
सूअर की चरबी!!!
अब विवाद की वजह क्यों नहीं
बनेगी????
जब कि आज नेता ही बाँट रहे हैं??
शरारती तत्व दो
समुदायों को लङवाने के लिये मसजिद के
आसपास "सूअर "फेंक देते रहे हैं और मंदिर
में गौ मांस या माँस,,,,
दोनों ही हरकते लानत्त और धिक्कार के
ही कार्य है
न तो एक का समर्थन होना चाहिये न
ही किसी "दूसरे मजहब के विरोध में
नफरत बढ़ाई बयानबाजी ।
लानत उन सब लोगों पर जो कि यह
जानते हैं कि
हिंदू पहला कौर ""गौ ग्रास
""निकालते हैं और पितृपक्ष में पितरों के
लिये गौ भोज गौदान करते हैं ।
लोग मरते समय गौ की पूँछ पकङ कर
गौलोक जाने की बात करते है ''तीर्थ
पर जाते समय गौदान करते हैं ।
और """"गौ गंगा तुलसी वेद गायत्री
मंत्र ""हिंदू की आस्था के मूल हैं ।
गौ के शरीर में देवताओं का वास कहकर
अनपढ़ ग्रामीण शकुन मनाता अगर गाय
बछङा यात्रा के समय दिख जाये ।
गौ की सौगंध झूठी नहीं खाता ''''''''
ये बात भारतीय हिंदू मुसलिम पारसी
ईसाई जैन सब जानते है ।
भारतीय जैन सिख और हिंदू तीनों ही
नहीं खा सकते गौमांस ।
और
मुसलिम भी खूब जानते हैं कि गौ हिंदू के
लिये क्या मायने रखती है ।
तो सवाल उठता है कि सीधा सीधा एक
""फतवा खुद ही समझदार मुसलिम ही
जारी कर दें कि गौ मत काटो मत
खाओ,,,,
बाकी है तो तमाम माँसप्रद पशु!!!!!!!
और
वैसे तो जिद ही है वरना तो सदियों
पहले मुगलकाल तक में गौवध कई
बादशाहों तक ने निषेध कर रखे थे ।
हमें ""वे सब मुद्दे खोजने चाहिये जिनपर
हम सब एक साथ रहकर खुश रह सकते हैं ।
और कोशिश करनी चाहिये कि वे सब
"""मुद्दे जिन पर पटती ही नहीं बल्कि
बहुत अधिक विरोध है ""
थोङा हम झुके थोङा तुम झुको और
विवाद की जङ उखाङ फैंक दो """
पूरे भारत से, ही गौवध खत्म क्यों नहीं
हो सकता,,,
????????????
क्या एक बहुत बङी आबादी की आस्थाओं
के लिये मामूली सी चीज नहीं की जा
सकती????
नीतेश कुमार की रैली में ""उनका
हैलीकॉप्टर देखने आया अबोध बच्चा """
लाठी चार्ज का शिकार होकर मर
गया,,,,,,,
वह परिवार सदमे में है
और
""""""सवाल मन में इधर है कि ""मुआवजा
"कितना मिलेगा???
क्या मुआवजा मजहब जाति धर्म देखकर
होना चाहिये???
या परिवार की ""माली हालत और आगे
की जीवितो की जीवन यापन
प्रत्याशा से??
मौत का मुआवज़ा यानि एक मृतक व्यक्ति
के आश्रित परिवार के लिये फौरी राहत
"""""ये कोई ''''ख़ूं -बहा ""का रिवाज
नहीं।
किसी भी राशि की रकम ''''कभी किसी
परिवार के सदस्य की जगह नहीं ले
सकती """क्योंकि जो गया वह एक दिल
का टुकङा एक जीवन का जीने का मकसद
रहता है परिवार का जरूरी सदस्य चाहे
बङा हो या छोटा """"""किंतु
उत्तरभारत के अनेक राज्यों में
"""मुआवजा एक राजनीति बन चुका है।
सावधान रहने की आवश्यकता है फिर से
हर वतनपरस्त हिन्दू मुसलिम और अन्य
किसी भी धार्मिक या नास्तिक को ।
उप्र सपा के एक मंत्री
(#### # न )जैसे लोग उस बहू की तरह हैं
जो मायके में अपनी ऐबदारियों के कारण
पिताभाई से डाँट खाती है और सासरे में
इसलिये ससुर जेठ पति को धमकाती
रहती है ताकि कोई काम न कराये और
रोके टोके नहीं ।
:
:
ऐसा हर नेता अभिनेता लेखक और
छुटभइया नायक खलनायक
भर्त्सना का पात्र है जो '''बनी
बनायी समरसता को बौखलाहट में
बदलकर तोङ रहा है ।
:
ये वही लोग है जो '''मजहब के नाम पर
लोगों को झुंड बनाकर पृथक पृथक रहने
को उकसाते हैं ताकि न मेलजोल बढ़े न
कोई अमन शांति भाईचारा ।
:
:
जब तक अजनबी होते हैं आमने सामने सब
एक नैतिक आधार से जुङे रहकर मदद करने
को तत्पर रहते हैं ::
ऐसे ही 'खटाई डालने वाले नेताओं ने मीठे
जहरबुझे शब्दों से लोगों के दिमाग में एक
फीडिंग भरी है सदियों से कि दूसरा
मजहब मतलब "काफिर ''दूसरा मजहब
मतलब मलेच्छ और ऐसी बातें अचेतन में दब
कर पङी रहतीं है ।
लोग समरसता से जीने लगते है ।
पढ़ने खेलने रोजी रोजगार और तमाम आते
जाते लङके लङकियाँ धर्मभाई बहिन बन
जाते हैं चाचा मौसा बन जाते हैं और कई
तो विवाह भी कर ही लेते हैं ।
मांसाहारी तो एक परिवार भी होता
है उसी परिवार में एक बहू शाकाहारी
एक बुजुर्ग तो लहसुन प्याज तक नहीं
खाता, और बढ़िया निभ जाती ।
हमारी अनेक कजिन बहिन भाभियाँ
रॉयल और नॉनरॉयल घरानों में हैं जो
मांसाहारी है और उनके साथ होटल भी
आना जाना पङता ही रहा टेबल एक ही
रहती और पूरा कुनबा जब मजे से
हड्डियाँ चूस रहा होता तब :
हम आराम से पालक पनीर और मटर
पुलाव के साथ तंदूर की रोटी मख्खन
खाते होते ।
कई बार तो व्रत उपवास रहता और
हमारी कॉफी विद काजू के समक्ष
मांसहारी दावत रहती :
जब हम परिवार में इस तरह एडजस्ट
करते हैं ।
कई बार पति मांसाहारी और वाईन भी
पीते हैं किंतु पत्नी लहसुन प्याज तक
नहीं खाती ',तो क्या बच्चे नहीं होते?
सब "प्यार "का कर्त्तव्य का
एडजस्टमेन्ट है ।
:
:
ये कोई एक मजहब का देश नहीं ':
प्रागैतिहासिककाल से मानव
मांसाहारी और शाकाहारी दोनों रहा
है ।
शाकाहारी चाहते हैं कि लोग
जीवहत्या न करें,
किंतु जीवहत्या रोकने का समझाना और
कन्विंस करना "बस वोट माँगने जैसा ही
तो है ।
मानना न मानना तो सुनने समझने वाले
पर ही निर्भर है न!!!
:
हम सब जो जिस मजहब को मानते है जन्म
से ही संस्कार भर दिये जाते हैं और उन्हीं
के साथ हमारी आस्था जुङ जाती है ।
कोई मुसलिम सूअर नहीं खा सकता और
ना ही बिना "हलाल किया हुआ मांस "
लेकिन ऐसे तमाम हिंदू हैं जो मुसलिम
दोस्तों के घर बकरा मुर्गा मछली हिरन
खरगोश खा चुके होगे '
अनेक राजघरानों में तो मुसलिम
खानसामा तक रहे हैं ।
यानि हिंदू ""हलाल किया मांस मजे से
खा लेते हैं ।
ईद पर शीर सिवईयाँ भी खूब खाते है और
दीवाली पर मिठाईयाँ भी खिलाते हैं ।
फिर गङबङ कहाँ होती है??
ये होती है ""कट्टरवादी मजहब मनवाने
को विवश करने और आसमानी भय
दिखाकर डराने वाले धर्मोपदेशकों और
नेताओं की वजह से ।
ये नहीं चाहते कि लोग मजहब को भूल
जायें पल भर भी ये भूल जाये कि उनका
दोस्त पङौसी उनके मजहब का नहीं है ।
:
ऐसे लोगों को जवाब दूसरे मजहब के नहीं
खुद उन्हीं के मजहब से उठे वतनपरस्तों
देश के सपूतों से मिलना चाहिये ।
:
भारतीय कभी हिंसा पसंद नहीं करते
हिंसा और नफरत भारतीय चिंतन और
संस्कार नहीं है ।
किंतु तरह तरह के धरमोपदेशकों और
नेताओं ने अलग अलग तरह के भय दिखाकर
लोगों में सौतिया डाह पैदा कर दिया
है ।
:
लोग अंदर से भले हों तो भी ये लोग
उनको हाँकते है """झुंड बनाओ मेरी शरण
में आओ वरना """"
:
अपराध कहीं होता है तो दंड भी है ।
और अनैतिकता मानव में जब तक संस्कार
अच्छे हो आ ही नहीं सकती ।
बङी चालाकी से लोगों को ""मानव से
गिरकर हिंदू मुसलमान की पहचान देने
की कोशिश हर चुनाव के आसपास "मंत्री
से मुख्यमंत्री और कौमी लीडर बनकर
अपने गलत कारनामे छिपाने हेतु ऐसे
बयान आग में पेट्रोल डालने के लिये किये
जाते है ।
:
हम सबका एकजुट प्रयास होना चाहिये
कि "न तो किसी भी की व्यक्तिगत
आस्था को ठेस पहुँचाने वाला कुछ भी कहें
न लिखे और न आसपास घटित होने दें ।
:
क्योंकि आखिर हम सबका देश भारत है
जन्मभूमि भारत है और हम सबका
ब्लडग्रुप भी उतनी ही सीमित
प्रकारों का है ।
सब भारतीयमूल के लोग 'भारत को
स्वतंत्र संप्रभु लोकतंत्र बनाने के लिये
जूझे हैं और आज उत्तरदायी है ।
घर के झगङे कितने भी बङे हों ',कभी भी
दूसरे गाँव के राही को नहीं बताये जाते

और जो बहू बेटा बूढ़ा ऐसे करता है वह
घर तोङने का अपराधी उतना ही है
जितना बिगङैल पोता जो गलत हरकतें
करते पिटाई खाता है ।
बंधु हम इस संस्कार के भारतीय हैं जहाँ
बुजुर्गों के लहसुन प्याज रहित भोजन
बनवाने का ध्यान रखा जाता है और
युवक मटन चिकन खाते हैं तो बेटियाँ
बहुएँ शाकाहार 'और तब भी कायम
रहता है परिवार प्यार और
अधिकार!!!!!
सपा के एक नेता जो चीफमिनिस्टर बनने
का ख्वाब सजाये बैठे है
"# अखिलेशयादवजी '
आज जो कुछ बोल रहे हैं सुना आपने?
ये मरने के बाद जन्नत में हूरों का ख्वाब
दिखाकर, घर गिराने को उकसाने वाले
लोग है ताकि इनका खुद का महल उन
गिरे घरों की ईँटों से बन सके।
जिस देश का हिंदू """कन्यावध करता
हो "
उसको गौवध पर बिलबिलाहट
क्यों?????
बेशक हम हृदय से चाहते हैं कि जीवमात्र
की हत्या न हो,
विशेषकर भैंस गाय बकरी भेङ और ऊँटनी
याक की ताकि ""दूध सस्ता और
सर्वसुलभ हो ।
न कि इसलिये कि हमारा धर्म हिंदू है!!!
परंतु
जिस जिस घर में ""कन्या गर्भ जाँचकर
गिराये गये "
वे सब तो गौवध से भी बङे "पाप के
भागी है ''
न मानो तो देवीभागवत पढ़ लो "
या पढ़ लो कोई भी शास्त्र, '
???
कन्यावध पर मौन??
तो
गौवध पर मुखर तु हो कौन??
बरेली के जफर ने अपनी चार पाँच साल
की बेटी को पटक पटक कर मार डाला
क्योंकि उसका दुपट्टा सिर से सरक गया
था ''''कोई पूछे क्या उसकी जान की
कोई कीमत नहीं?????
ये जो हिंसा है यह "मजहब जीत और लिंग
भेद की कूट कूट कर भरी जहरीली बातों
की ही फल है ''''वरना इंद्राणी बेटी
की हत्या न करती ।
हरियाणा पंजाब यूपी राजस्थान ही
सबसे अधिक ''गर्भस्थ कन्यावधिक प्रांत
हैं और अधिकतर हिंदू।
काश गौवध रोकने की मुहुम के साथ
कन्या भी वध से बच सके ''''''''ये रोक
""कानून की देन है "और विश्व दबाब
की?? या पाप पुण्य की?? या
जनलिंगानुपात की सरकारी चिंता
की?? ये भी सोचने की बात है।
"""हम इसको गौहत्या से
कतई नहीं जोङ रहे है """""
गौ हम सबके लिये माँ की तरह पूजनीय है
''वैसे ही
हर लङकी कन्या और भावी माता होने
से भी "अवध्य है "
हमें चेतना ही होगा "।
सामाजिक चेतना """लाकर ही हिंसा
रोकी जा सकती है दादा ""देश की छवि
की भी हमको ही चिंता करनी पङेगी ।
अपने ही भीतर फैली बीमारियों दहेज
हत्या कन्यावध और स्त्री मात्र पर
लैंगिक हिंसा भी रोकनी होगी ।
भारतीय विदेश में एक स्वस्थ लोकतंत्र के
लोग हैं यह कहकर सिर उठा सकें यही
सपना पीएम महोदय का है और हर
प्रकार का अतिवाद उसमें बाधा है ।
चाहे वह जीवहत्या हो या वैचारिक
भेदभाव और मानसिक भय फैलाने का
षडयंत्र,,,
गौ कन्या और विद्यावान ब्राह्मण
जाति नहीं अपितु ज्ञान से पंडित
सनातन धर्म के सदा पूज्य हैं ।
तो अब ये पुनर्विचार का समय है कि हम
देश के वैश्विक मान के लिये क्या कर रहे
हैं!
हम हर ईद पर भी जीवहत्या
छोङने की अपील करते हैं और दुधारू पशुओं
का वध तो सदैव हमारे विरोध का
कारण है ही ""भैंस माता बचाओ से हमने
लेख भी लिखे हैं "
परंतु
यहाँ मन सवाल तो करता ही है कि क्या
केवल पङौसी के बच्चे की गलती गलती
है?? हमारी अपनी संतान को हम नहीं
रोकेगे??
भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ हर
धर्म के लोग अपने धर्म का प्रचार पूजा
आराधना कर पाते हैं और उनके बीच अगर
उनका अपना सगा भी कोई "गलत
"निकले तो धिक्कारा और बहिष्कृत भी
किया जाता है दंडित भी होता है ।
किंतु अफसोस ये है कि छद्मसेकुलरिज्म के
नाम पर लोगों का भावनात्मक शिकार
करके उनको सुलगाने का काम लगभग हर
मजहब में छिपे देश के गद्दार करते है ।
परंतु सुकून इस बात का है कि ""भारत
हर बार फिर सारे घाव झाङकर उठ
खङा होने वाला अमर देश है "
आज फिर इसी तरह के लोग देश को शांति
और राष्ट्रीय हित के मार्ग पर रखेगे
ये साजिश है कि विश्व में भारत को
"कम्युनल वायोलेंस "वाला देश साबित
करके बदनाम किया जाये ताकि वैश्विक
संदेह के कारण भारत का आर्थिक विकास
और शक्तिशाली होना रोका जा सके ।
जो जो ऐसा साबित करेगे सब देश के
दीमक ही खुद को साबित करेगे इसलिये
रुको ठहरो और सोचो
सही क्या है और आवश्यक क्या है ।
हर बार दोनों एक हों जरूरी तो नहीं!!!
जय हिंद !!!
(नोट :::ये एक निजी विचार है जो
समुदायों में प्रेम बढ़ाने के लिये क्या करें
की सोच के तहत लिखा है ''
जिनको बुरा लगा हो क्षमा करे
©® सुधा राजे


Sunday, 4 October 2015

सुधा राजे का संस्मरण:- एक थी सुधा "यादें ऐसी भी" :- ससुराल में पहला कदम और एक - 2 पल जंग। imp

बात उन्नीस साल पुरानी है और कुछ पत्रकार जो तब मेरठ बिजनौर मुरादाबाद
में रहते थे कदाचित उनको याद भी हो ',,
विवाह के बाद ससुर जी की गंभीर बीमारी के दौरान लगातार घर रहना पङा और,
कदाचित ऐसी कोई बहू हो जो तुरंत उतरी हो गाङी से और घर के काम काज में लग
गयी हो 'विवाह के बाद घर तत्काल ही खाली हो गया रह गये तीन जीव 'एक अजनबी
जोङा और एक वृद्ध बीमार ',।
पहली ही थाली के बाद भोजन की तैयारी में जुटना पङा और रिशेप्सन दो दिन
बाद था तो उसके लिये भी लगे कैटरर्स और हलवाईयों को सर सामान देना पङा
',। जब भी जिस भी कमरे में जाते तमाम आडंबर गैरजरूरी चीजें और खाली
डिब्बे पॉलिथिन बोतलें रैपर्स और अनुपयोगी उतरनें पङी मिलतीं ',अतिथि सब
विदा हो गये 'एक दूर के रिश्ते की लङकी आठ दिन रुकी 'उसी की सहायता से
स्थानीय बोली और परंपरायें समझने का प्रयास करते ।
भयंकर बारिश और दिन भर सन्नाटा शाम को ही दो घंटे की चहलपहल सी लगती ।
कहाँ पचास साठ आदमियों की रोज की भीङ और भरी बस्ती की चहलपहल कहाँ ये
एकदम सूना घर!!
अगली सुबह ही झाङू उठायी और लग गये काम पर, 'आठ दस गाय भैंस बैल और
गौशाला से लेकर नये बने मकान तक सारा तीन बीघे जितना मैदान साफ करते रोज
और 'थककर चूर हो जाते, 'बरसों से रीती हवेली में केवल जरूरत भर के काम की
जगह साफ करके सब सुबह निकल जाते रात को आते, '।
एक सप्ताह बाद एक ठीक ठाक लॉन और किचिनगार्डेन तैयार हो गया :फिर जब तक
कुछ न कुछ खरीदने के लिये बाजार जाना चूकिं एलाउ नहीं था सो दूसरे कसबे
जाकर बाईक से घरेलू सामान 'खरीदकर लाते लगातार शॉपिंग, और कई हजार रुपये
जो विभिन्न रस्मों में निजी बटुए में मिले थे व्यय हुये तब जाकर एक ठीक
ठाक गृहस्थी जुङी जिसमें न तवा था न चायदानी छन्नी न ही मसालदानी न मटका
स्टैण्ड न ही ट्रे और न छुरी काँटे चम्मच और कङछी बेलन चमचा सँड़सी, '।
क्योंकि एक लङकी पङौस की भोजन पकाती थी केवल रोटियाँ 'चावल और सब्जी होटल
से आती रहती थी या होटल में ही खाना खा लिया जाता था ।चाय पीता ही कौन था
यदा कदा आवश्यकता पङी तो करीब के कैंटीन से आ जाती थी '
गौशाला की देखभाल 'तसलीम' और उसका भाई हबीब करता था 'वही जैसी तैसी सानी
कुट्टी पानी करता और दूध निकाल कर रख जाता, 'जितना पिया जाता पितापुत्र
पी लेते बाकी 'शाम सुबह दूधवाला भर ले जाता '
एक पखवारा बीतते बीतते सर सामान की पूरी तरह छँटनी होकर जब ""कबाङ इकट्ठा
हुआ और फालतू कपङे बकसे मटके डिब्बे बोतलें रैपर्स तो लगभग दस फीट ऊँचा
अंबार लग गया मैदान में, और जब आग लगायी तो दो दिन तक धुआँ अंगार सुलगते
रहे ।
फिर बचा खुचा सामान कबाङी को बेचा तो, 'पूरे घर के लिये बढ़िया परदे और
डिनरसैट उसी पैसे से आ गया ।
दूसरे नगर आते जाते पीछे बाईक पर बैठे बैठे ही जो देखा उसे बदलने की ठानी
और एक सैकङा भर पोस्टकार्ड लिख मारे विभिन्न विभागों को, 'कुछ महीनों बाद
जब घर घर नोटिस आने लगे ""झङाऊँ पाखाने "बंद करो तो लोग परेशान हो गये ।
क्या मंदिर क्या मसजिद ',यूपी का ये इलाका ''सन दोहजार तक लगभग हर गली
में ""गली नाम से ही कही जाती कच्ची शौचालय व्यवस्था से ही चलता था ।
झाङने वाली सब औरतें आती और झाङकर सारी गंदगी उसी गली सङक पथ के किसी
खंडहर पङे मकान या कोने मैदान में ढेर लगाती रहती ',बच्चे खेलते रहते
औरतें आती जाती और गंदगी की दुर्गंध से सारा नगर भभकता रहता ',।
एक दिन नाम खुल ही गया ',क्योंकि काररवाही जल्दी न होने पर पत्र मीडिया
में भेजना पङा और लगभग हर स्थानीय पेज पर छप भी गया ',कलेक्टर तहसीलदार
और नगरपालिका, से लेकर राजधानी तक पत्र लिखे, कि ""सिरबोझ मैला परंपरा
बंद करायी जाये ""
किसी ने हमारा नाम बता दिया "सफाईकरने वाली महिलाओं को 'अगले ही दिन
"सोमो "जो सिरबोझ ढोती थी हमारी गलियों के उन औरतों की मुखिया थी ',आकर
डलिया दरवाजे पर धरकर कई दरजन महिलाओं के साथ झगङने लगी, '
,,,बहूजी पेट पे लात तो न मारो ""
कई घंटे की बहस समझाईश के बाद सोमो "समझने को तैयार हुयी तो बस्ती में दो
'दल बन गये ।
एक दल सिरबोझ मैला बंद करके सूअर पालन मुर्गीपालन ब्रुश कारीगरी
अस्पतालों और नगरपालिकाओं तथा स्कूलों में जॉब के लिये 'राजी हो गया तो '
दूसरा दल टस के मस नहीं हुआ अपनी "यजमानी और इलाका की उगाही छोङने को
"मजदूरी और खाद के साथ त्यौहारी भी बङी वजह थी ।
अंततः कुछ परिवार हमारे साथ कचहरी गये और लॉन मंजूर हुआ किसी का किसी ने
घर से ही धन संग्रह करके नया रोजगार शुरू किया ',
क्योंकि, 'नोटिस से परेशान उनके सदियों पुराने ''यजमान लोगों के घर धीरे
धीरे आधुनिक फ्लश शौचालय बन चुके थे और बाकी के घर बनते जा रहे थे "पचास
रुपया महीना और त्यौहारी विवाह के नेग आदि से उतना लाभ नहीं था जितना
"खाद "से होता था ।
आखिरकार, दूसरे दल के लोगों की भी संख्या घटने लगी जब 'उनके भी कस्टमर
नोटिस से परेशान होकर शौचालय बनवाने लगे '।
एक दिन उन लोगों को भी पता चल ही गया और अनेक पङौसी जिनसे सबसे अधिक
रिश्तेदार थे 'हमारी बैठक पर चढ़ आये और हमें तो कम परिवार के बुजुर्ग
हमारे ससुर जी को हमारे खिलाफ भङकाने में कामयाब हो गये ।
शाम को घर में पहली बार बहस हो गयी, '''और बहू लक्ष्मी से हम बङे शहर की
ज्यादा पढ़ी ज्यादा दिमाग खराब लङकी कहलाये ""
।अब परिवार से कैसे लङें???
नतीजा हमने कोट पहना और अदालत जा पहुँचे वहाँ अपना पूर्व का परिचय दिया
और आदेश पारित होने की सारी काररवाही करवाकर घर आये 'यह बिना आज्ञा पहला
कदम था घर से बाहर "।
हालांकि कह दिया था कि कोर्ट देखने जा रहे है यहाँ का और साथ में चूँकि
कोई नहीं था सो अकेले ही जाना पूछताछ करना और सारी कागजी प्रक्रियायें
पूरी की, '
अगले सप्ताह मासिक आखिरी मंगलदिवस होने से 'सोमो और कुछ अन्य सिरबोझ मैला
ढोने वाली स्त्रियों को साथ लेकर गये और 'वहाँ मौजूद तत्कालीन सांसद "कोई
''रवि "सरनेम धारी से बहस हो गयी '।
आखिर कार एक एक करके ''झङाऊ शौचालय ढहाये जाने लगे रास्तों पर से "मल के
ढेर हटाये जाने लगे और 'इसके लिये हम कलेक्टर
#लीना जौहरी कलेक्टर पाठक जी और कुछ तहसील अधिकारियों को आज भी धन्यवाद
करते है 'जहाँ भी हो ।
फिर घर में डाँट पङी "आपके हाथ का खाना नहीं खायेगें सबको छू लिया और
सबके साथ एक ही जीप में बैठकर घूमने गयी, जाओ गंगाजल से नहाओ, '
।नहाते तो रोज ही सुबह शाम हम पश्चिमी यूपी वाले गंगाजल से ही तो हैं
कहते ही फिर डाँट पङी और वैचारिक मतभेद में पीढ़ी अंतराल सामने आ खङा हुआ

एक ही साल भीतर लगभग हर स्कूल में हम गये और वहाँ ''लङकियों के लिये अलग
तो क्या किसी तरह का कोई टॉयलेट ही नहीं था!!!!! ',मीडिया का फिर सहारा
लिया और आवाज उठा दी, 'स्कूल की प्रबंधक रुपयों का दुखङा ले बैठीं, 'और
स्थानीय विधायक को विवश होकर बजट देना पङा जिससे बालिकाओं के लिये पृथक
टॉयलेट बना और बाउण्ड्री भी ऊँची हुयी ।
फिर भी जंग जारी थी "खास खास नागरिकों की श्रेणी में बुलावा आया जब
नगरपालिका से तो वहाँ भी पहला भाषण जो ससुराल में दिया था ""सङक न होने
और गली गली कूङा ढेर लगे होने पर था ।
मुसलिम बुजर्गों की बहुलता वाली नगरपालिका के भीङ भरे समारोह में य़े कौन
"बलकटी "किस तरह खटखट चढ़ कर मंच पर बोल रही है सुगबुगाहट शुरू हो गयी और
सवालों की बौछार सग पङी 'जहाँ आज भी औरतों सिर ढँके नकाब बाँधे बिना नहीं
निकलतीं वहाँ पूरे नगर को माईक से लाऊडस्पीकर पर गंदा और अव्यवस्थित एक,,
नयी उमर की बहू कह दे????
किंतु तमाम आलोचनाओं के बीच भी नगरपालिकाअध्यक्ष से पृथक मुलाकात में हम
समझा पाने में कामयाब रहे और लखनऊ दिल्ली तक पत्रों से बात उठायी वहाँ
कुछ दूर पास के नातेदारों से भी मदद मिले कागज आगे बढ़ाने में और ''लोग
एक दिन चकित थे आजादी के बाद पहली बार """नगर के भीतर ''खड़ंजा उखङने लगा
और हर चौराहे पर बङे बङे कूङेदान रखवाये गये ।
ये कूङेदान हमारी गलत सलाह ही साबित हुये, क्योंकि लोगों को आदत जब तक न
हो साफ सफाई की तब तक सफाई हो ही नहीं सकती ''।
मलिन बस्तयों और मजदूर किसान बस्तियों के जो लोग अँधेरे में नदी नाले के
किनारे जाते थे शौच को वे लोग बच्चे और बूढ़े उन कूङेदानों में पॉलिथीन
में मल भर कर फैंकने लगे और कूङा आसपास अगलबगल पङा रहने लगा 'कूङेदान
गजबजाने और बेहद दुर्गंध मारने लगे ',आखिर कार सब के सब हटवाये गये ।
और हमारे सामने सवाल आया ""गरीब मलिन बस्तियों और मजदूरों गरीब कृषकों
भिखारियों और खानाबदोश वनवासी जातियों की बस्ती में जब तक 'शौचालय सरकार
नहीं बनवायेगी वे लोग तो नहीं ही बनवायेगे,,,,, स्थानीय नेताओं से मिले
राजधानियों को लिखा और फिर मीडिया में, अंततः एक बस्ती में शौचालय बनवाया
गया ।फिर तो दूसरी और तीसरी करते करते लगभग हर मलिनबस्ती और गरीब बस्ती
में ""सार्वजनिक शौचालय बन गये ।
किंतु ये क्या लोग तो अब भी बाहर ही जाते है!!!!!
आखिरकार एक एनजीओ गठित हो गया और रजिस्टर्ड भी ।
उसकी मासिक बैठकें हम लगातार अलग अलग जगहों पर करते और वहाँ की महिलाओं
को साफ सफाई जचगी की सावधानियाँ और रोजगार के उपायों पर बताते ",,वहीं
फिर औरतें घरेलू हिंसा की शिकायतें लाने लगीं और एनजीओ ने सैकङों
परिवारों के घरेलू विवाद सफलतापूर्वक सुलझाये और महिलाओं को अस्पताल में
प्रसव कराने की जानकारी अस्पताल में मीटिंग करके दी "लङकियों को स्कूल
भेजने की जानकारी अशिक्षित महिलाओं को स्कूल में मीटिंग करके दी वहाँ
पुलिस तहसील और ब्लॉक के अधिकारी भी बुलाते और एक एक करके अनेक गाँवों
में लहर चल पड़ी ।
इसी बीच पता चला कि एक मलिनबस्ती में बीचों बीच देशी शराब की हट्टी है और
वहाँ दूर पास के गाँव तथा ड्राईवरों की भीङ देर रात तक लगी रहती है डैक
बजता रहता है और लङकियों को फिकरे औरतों को घरों में मारपीट सहनी पङती है
।पियक्कङ इस कदर अंधे हो गये कि दारू के लिये औरतों के गहने जब नहीं मिले
तो साङियाँ और बरतन गिरवी रखकर पीने लगे :एक रात ऐसी ही औरतें दरवाजे पर
रोने लगी,, मन करुणा और क्रोध से भर गया तब रात को लैंडलाईन से तीन चार
गाँवों की औरतों को इकट्ठा होने को संदेश भेजा और रात में ही औरतों ने
शराब की दुकान पर ताला डालकर अड्डा जमा दिया कुछ दिन जमे रहे 'शराबी दिन
में कुछ न कहते परंतु रात में जब बूढ़ी औरतें और समर्थक लङके रह जाते तब
धमकाते "अंततः डिप्टीकलेक्टर और स्थानीय लोगों की रोज बढ़ती समर्थन की
भीङ से एक दिन शराब ट्रकों में भरकर बस्ती से बाहर दूरn रखी गयी ।औरतें
नाचती गाती आयी और हमें घर पर जब हम रात का खाना बना रहे थे फूल मालाओं
से लाद दिया ।
तब तक हमारे पङौसियों को कुछ पता ही नहीं था ।और फिर एक डाँट पङी ""परायी
आग में जलना पढ़ाना लिखाना बेकार गया ""
तब पता चला कि शिक्षा की तो हालत ही सबसे खराब है!!!!!!! और क्या करते??
तब याद आया कि ग्रेजुएशन के बाद हमने पोस्टग्रेजुएशन के साथ साथ यू ही
समाज सेवार्थ एन एस एस लीडर होने केस दौरान गाँव गाँव कैंप लेकर साक्षरता
में पढ़ाया और ""कुशल प्रशिक्षक की ट्रैनिंग लेकर टीचर्स को पढ़ाकर
प्रमाणपत्र भी लिया है ।
और फिर घर पर ही चालू हुयी परदानशीन बुरकेवाली लङकियों की शिक्षा, 'जब
पहली खेप पढ़ गयी तब, एक प्रोग्राम आया है का पता चला औऱ साक्षरता केंद्र
खोल दिया, । सुबह से शाम तक कचहरी और घर की सेवा के बाद जब थक जाते तब,
दो पीरियड लेने पङते लैंप की रोशनी में पहला परदानशीन औरतो लङकियों का
जिनके पिता भाई पति अरब
और खाङी देशों में थे '"दूसरे वे मदरसों के लङके जो हिंदी इंगलिश सीखकर
मौलवी बनना या अरब जाकर कमाना चाहते थे ।
कुछ सालों तक 'यही दिनचर्या रही फिर एक भीषण हादसे ने हमें अस्पताल
पहुँचा दिया । पति की रीढ़ का ऑपरेशन और अपनी टूटी टाँग के साथ घर से ही
फिर कलम तो चली हम नहीं कई साल तक, 'फिर लगा कि काफी कुछ बदल चुरा है अब
कूङा रोज उठाने ट्रेक्टर आते है ',कच्चेशौचालय नहीं है । एक बार सफाई
करने वाली सहेलियाँ अपनी बस्ती में ले गयी एक सभा में तो देखा सब बदल गया
सबके मकान पक्के हैं घरों में टॉयलेट्स हैं और सङकें पक्की हर मोङ पर
सरकारी नल लगा है औऱ कहीं भी मल के ढेर नहीं अलबत्ता सूअऱ जरूर घूम रहे
हैं बाङों में ।
©सुधा राजे


सुधा राजे का संस्मरण:- एक थी सुधा "यादें ऐसी भी" :- ससुराल में पहला कदम और एक -2 पल जंग।

बात उन्नीस साल पुरानी है और कुछ पत्रकार जो तब मेरठ बिजनौर मुरादाबाद
में रहते थे कदाचित उनको याद भी हो ',,
विवाह के बाद ससुर जी की गंभीर बीमारी के दौरान लगातार घर रहना पङा और,
कदाचित ऐसी कोई बहू हो जो तुरंत उतरी हो गाङी से और घर के काम काज में लग
गयी हो 'विवाह के बाद घर तत्काल ही खाली हो गया रह गये तीन जीव 'एक अजनबी
जोङा और एक वृद्ध बीमार ',।
पहली ही थाली के बाद भोजन की तैयारी में जुटना पङा और रिशेप्सन दो दिन
बाद था तो उसके लिये भी लगे कैटरर्स और हलवाईयों को सर सामान देना पङा
',। जब भी जिस भी कमरे में जाते तमाम आडंबर गैरजरूरी चीजें और खाली
डिब्बे पॉलिथिन बोतलें रैपर्स और अनुपयोगी उतरनें पङी मिलतीं ',अतिथि सब
विदा हो गये 'एक दूर के रिश्ते की लङकी आठ दिन रुकी 'उसी की सहायता से
स्थानीय बोली और परंपरायें समझने का प्रयास करते ।
भयंकर बारिश और दिन भर सन्नाटा शाम को ही दो घंटे की चहलपहल सी लगती ।
कहाँ पचास साठ आदमियों की रोज की भीङ और भरी बस्ती की चहलपहल कहाँ ये
एकदम सूना घर!!
अगली सुबह ही झाङू उठायी और लग गये काम पर, 'आठ दस गाय भैंस बैल और
गौशाला से लेकर नये बने मकान तक सारा तीन बीघे जितना मैदान साफ करते रोज
और 'थककर चूर हो जाते, 'बरसों से रीती हवेली में केवल जरूरत भर के काम की
जगह साफ करके सब सुबह निकल जाते रात को आते, '।
एक सप्ताह बाद एक ठीक ठाक लॉन और किचिनगार्डेन तैयार हो गया :फिर जब तक
कुछ न कुछ खरीदने के लिये बाजार जाना चूकिं एलाउ नहीं था सो दूसरे कसबे
जाकर बाईक से घरेलू सामान 'खरीदकर लाते लगातार शॉपिंग, और कई हजार रुपये
जो विभिन्न रस्मों में निजी बटुए में मिले थे व्यय हुये तब जाकर एक ठीक
ठाक गृहस्थी जुङी जिसमें न तवा था न चायदानी छन्नी न ही मसालदानी न मटका
स्टैण्ड न ही ट्रे और न छुरी काँटे चम्मच और कङछी बेलन चमचा सँड़सी, '।
क्योंकि एक लङकी पङौस की भोजन पकाती थी केवल रोटियाँ 'चावल और सब्जी होटल
से आती रहती थी या होटल में ही खाना खा लिया जाता था ।चाय पीता ही कौन था
यदा कदा आवश्यकता पङी तो करीब के कैंटीन से आ जाती थी '
गौशाला की देखभाल 'तसलीम' और उसका भाई हबीब करता था 'वही जैसी तैसी सानी
कुट्टी पानी करता और दूध निकाल कर रख जाता, 'जितना पिया जाता पितापुत्र
पी लेते बाकी 'शाम सुबह दूधवाला भर ले जाता '
एक पखवारा बीतते बीतते सर सामान की पूरी तरह छँटनी होकर जब ""कबाङ इकट्ठा
हुआ और फालतू कपङे बकसे मटके डिब्बे बोतलें रैपर्स तो लगभग दस फीट ऊँचा
अंबार लग गया मैदान में, और जब आग लगायी तो दो दिन तक धुआँ अंगार सुलगते
रहे ।
फिर बचा खुचा सामान कबाङी को बेचा तो, 'पूरे घर के लिये बढ़िया परदे और
डिनरसैट उसी पैसे से आ गया ।
दूसरे नगर आते जाते पीछे बाईक पर बैठे बैठे ही जो देखा उसे बदलने की ठानी
और एक सैकङा भर पोस्टकार्ड लिख मारे विभिन्न विभागों को, 'कुछ महीनों बाद
जब घर घर नोटिस आने लगे ""झङाऊँ पाखाने "बंद करो तो लोग परेशान हो गये ।
क्या मंदिर क्या मसजिद ',यूपी का ये इलाका ''सन दोहजार तक लगभग हर गली
में ""गली नाम से ही कही जाती कच्ची शौचालय व्यवस्था से ही चलता था ।
झाङने वाली सब औरतें आती और झाङकर सारी गंदगी उसी गली सङक पथ के किसी
खंडहर पङे मकान या कोने मैदान में ढेर लगाती रहती ',बच्चे खेलते रहते
औरतें आती जाती और गंदगी की दुर्गंध से सारा नगर भभकता रहता ',।
एक दिन नाम खुल ही गया ',क्योंकि काररवाही जल्दी न होने पर पत्र मीडिया
में भेजना पङा और सगभग हर स्थानीय पेज पर छप भी गया ',कलेक्ट्र तहसीलदार
और नगरपालिका, से लेकर राजधानी तक पत्र लिखे, कि ""सिरबोझ मैला परंपरा
बंद करायी जाये ""
किसी ने हमारा नाम बता दिया "सफाईकरने वाली महिलाओं को 'अगले ही दिन
"सोमो "जो सिरबोझ ढोती थी हमारी गलियों के उन औरतों की मुखिया थी ',आकर
डलिया दरवाजे पर धरकर कई दरजन महिलाओं के साथ झगङने लगी, '
,,,बहूजी पेट पे लात तो न मारो ""
कई घंटे की बहस समझाईश के बाद सोमो "समझने को तैयार हुयी तो बस्ती में दो
'दल बन गये ।
एक दल सिरबोझ मैला बंद करके सूअर पालन मुर्गीपालन ब्रुश कारीगरी असपतालों
और नगरपालिकाओं तथा स्कूलों में जॉब के लिये 'राजी हो गया तो '
दूसरा दल टस के मस नहीं हुआ अपनी "यजमानी और इलाका की उगाही छोङने को
"मजदूरी और खाद के साथ त्यौहारी भी बङी वजह थी ।
अंततः कुछ परिवार हमारे साथ कचहरी गये और लॉन मंजूर हुआ किसी का किसी ने
घर से ही धन संग्रह करके नया रोजगार शुरू किया ',
क्योंकि, 'नोटिस से परेशान उनके सदियों पुराने ''यजमान लोगों के घर धीरे
धीरे आधुनिक फ्लश शौचालय बन चुके थे और बाकी के घर बनते जा रहे थे "पचास
रुपया महीना और त्यौहारी विवाह के नेग आदि से उतना लाभ नहीं था जितना
"खाद "से होता था ।
आखिरकार, दूसरे दल के लोगों की भी संख्या घटने लगी जब 'उनके भी कस्टमर
नोटिस से परेशान होकर शौचालय बनवाने लगे '।
एक दिन उन लोगों को भी पता चल ही गया और अनेक पङौसी जिनसे सबसे अधिक
रिश्तेदार थे 'हमारी बैठक पर चढ़ आये और हमें तो कम परिवार के बुजुर्ग
हमारे ससुर जी को हमारे खिलाफ भङकाने में कामयाब हो गये ।
शाम को घर में पहली बार बहस हो गयी, '''और बहू लक्ष्मी से हम बङे शहर की
ज्यादा पढ़ी ज्यादा दिमाग खराब लङकी कहलाये ""
।अब परिवार से कैसे लङें???
नतीजा हमने कोट पहना और अदालत जा पहुँचे वहाँ अपना पूर्व का परिचय दिया
और आदेश पारित होने की सारी काररवाही करवाकर घर आये 'यह बिना आज्ञा पहला
कदम था घर से बाहर "।
हालांकि कह दिया था कि कोर्ट देखने जा रहे है यहाँ का और साथ में चूँकि
कोई नहीं था सो अकेले ही जाना पूछताछ करना और सारी कागजी प्रक्रियायें
पूरी की, '
अगले सप्ताह मासिक आखिरी मंगलदिवस होने से 'सोमो और कुछ अन्य सिरबोझ मैला
ढोने वाली स्त्रियों को साथ लेकर गये और 'वहाँ मौजूद तत्कालीन सांसद "कोई
''रवि "सरनेम धारी से बहस हो गयी '।
आखिर कार एक एक करके ''झङाऊ शौचालय ढहाये जाने लगे रास्तों पर से "मल के
ढेर हटाये जाने लगे और 'इसके लिये हम कलेक्टर
#लीना जौहरी कलेक्टर पाठक जी और कुछ तहसील अधिकारियों को आज भी धन्यवाद
करते है 'जहाँ भी हो ।
फिर घर में डाँट पङी "आपके हाथ का खाना नहीं खायेगें सबको छू लिया और
सबके साथ एक ही जीप में बैठकर घूमने गयी, जाओ गंगाजल से नहाओ, '
।नहाते तो रोज ही सुबह शाम हम पश्चिमी यूपी वाले गंगाजल से ही तो हैं
कहते ही फिर डाँट पङी और वैचारिक मतभेद में पीढ़ी अंतराल सामने आ खङा हुआ

एक ही साल भीतर लगभग हर स्कूल में हम गये और वहाँ ''लङकियों के लिये अलग
तो क्या किसी तरह का कोई टॉयलेट ही नहीं था!!!!! ',मीडिया का फिर सहारा
लिया और आवाज उठा दी, 'स्कूल की प्रबंधक रुपयों का दुखङा ले बैठीं, 'और
स्थानीय विधायक को विवश होकर बजट देना पङा जिससे बालिकाओं के लिये पृथक
टॉयलेट बना और बाउण्ड्री भी ऊँची हुयी ।
फिर भी जंग जारी थी "खास खास नागरिकों की श्रेणी में बुलावा आया जब
नगरपालिका से तो वहाँ भी पहला भाषण जो ससुराल में दिया था ""सङक न होने
और गली गली कूङा ढेर लगे होने पर था ।
मुसलिम बुजर्गों की बहुलता वाली नगरपालिका के भीङ भरे समारोह में य़े कौन
"बलकटी "किस तरह खटखट चढ़ कर मंच पर बोल रही है सुगबुगाहट शुरू हो गयी और
सवालों की बौछार सग पङी 'जहाँ आज भी औरतों सिर ढँके नकाब बाँधे बिना नहीं
निकलतीं वहाँ पूरे नगर को माईक से लाऊडस्पीकर पर गंदा और अव्यवस्थित एक,,
नयी उमर की बहू कहदे????
किंतु तमाम आलोचनाओं के बीच भी नगरपालिकाअध्यक्ष से पृथक मुलाकात में हम
समझा पाने में कामयाब रहे और लखनऊ दिल्ली तक पत्रों से बात उठायी वहाँ
कुछ दूर पास के नातेदारों से भी मदद मिलॅ कागज आगे बढ़ाने में और ''लोग
एक दिन चकित थे आजादी के बाद पहली बार """नगर के भीतर ''खड़ंजा उखङने लगा
और हर चौराहे पर बङे बङे कूङेदान रखवाये गये ।
ये कूङेदान हमारी गलत सलाह ही साबित हुये, क्योंकि लोगों को आदत जब तक न
हो साफ सफाई की तब तक सफाई हो ही नहीं सकती ''।
मलिन बस्तयों और मजदूर किसान बस्तियों के जो लोग अँधेरे में नदी नाले के
किनारे जाते थे शौच को वे लोग बच्चे और बूढ़े उन कूङेदानों में पॉलिथीन
में मल भर कर फैंकने लगे और कूङा आसपास अगलबगल पङा रहने लगा 'कूङेदान
गजबजाने और बेहद दुर्गंध मारने लगे ',आखिर कार सब के सब हटवाये गये ।
और हमारे सामने सवाल आया ""गरीब मलिन बस्तियों और मजदूरों गरीब कृषकों
भिखारियों और खानाबदोश वनवासी जातियों की बस्ती में जब तक 'शौचालय सरकार
नहीं बनवायेगी वे लोग तो नहीं ही बनवायेगे,,,,, स्थानीय नेताओं से मिले
राजधानियों को लिखा और फिर मीडिया में, अंततः एक बस्ती में शौचालय बनवाया
गया ।फिर तो दूसरी और तीसरी करते करते लगभग हर मलिनबस्ती और गरीब बस्ती
में ""सार्वजनिक शौचालय बन गये ।
किंतु ये क्या लोग तो अब भी बाहर ही जाते है!!!!!
आखिरकार एक एनजीओ गठित हो गया और रजिस्टर्ड भी ।
उसकी मासिक बैठकें हम लगातार अलग अलग जगहों पर करते और वहाँ की महिलाओं
को साफ सफाई जचगी की सावधानियाँ और रोजगार के उपायों पर बताते ",,वहीं
फिर औरतें घरेलू हिंसा की शिकायतें लाने लगीं और एनजीओ ने सैकङों
परिवारों के घरेलू विवाद सफलतापूर्वक सुलझाये और महिलाओं को अस्पताल में
प्रसव कराने की जानकारी अस्पताल में मीटिंग करके दी "लङकियों को स्कूल
भेजने की जानकारी अशिक्षित महिलाओं को स्कूल में मीटिंग करके दी वहाँ
पुलिस तहसील और ब्लॉक के अधिकारी भी बुलाते और एक एक करके अनेक गाँवों
में लहर चल पड़ी ।
इसी बीच पता चला कि एक मलिनबस्ती में बीचों बीच देशी शराब की हट्टी है और
वहाँ दूर पास के गाँव तथा ड्राईवरों की भीङ देर रात तक लगी रहती है डैक
बजता रहता है और लङकियों को फिकरे औरतों को घरों में मारपीट सहनी पङती है
।पियक्कङ इसकदर अंधे हो गये कि दारू के लिये औरतों के गहने जब नहीं मिले
तो साङियाँ और बरतन गिरवी रखकर पीने लगे :एक रात ऐसी ही औरतें दरवाजे पर
रोने लगी,, मन करुणा और क्रोध से भर गया तब रात को लैंडलाईन से तीन चार
गाँवों की औरतों को इकट्ठा होने को संदेश भेजा और रात में ही औरतों ने
शराब की दुकान पर ताला डालकर अड्डा जमा दिया कुछ दिन जमे रहे 'शराबी दिन
में कुछ न कहते परंतु रात में जब बूढ़ी औरतें और समर्थक लङके रह जाते तब
धमकाते "अंततः डिप्टीकलेक्टर और स्थानीय लोगों की रोज बढ़ती समर्थन की
भीङ से एक दिन शराब ट्रकों में भरकर बस्ती से बाहर दूर रखी गयी ।औरतें
नाचती गाती आयी और हमें घर पर जब हम रात का खाना बना रहे थे फूल मालाओं
से लाद दिया ।
तब तक हमारे पङौसियों को कुछ पता ही नहीं था ।और फिर एक डाँट पङी ""परायी
आग में जलना पढ़ाना लिखाना बेकार गया ""
तब पता चला कि शिक्षा की तो हालत ही सबसे खराब है!!!!!!! और क्या करते??
तब याद आया कि ग्रेजुएशन के बाद हमने पोस्टग्रेजुएशन के साथ साथ यू बी
समाज सेवार्थ एन एस एस लीडर होने के दौरान गाँव गाँव कैंप लेकर साक्षरता
में पढ़ाया और ""कुशल प्रशिक्षक की ट्रैनिंग लेकर टीचर्स को पढ़ाकर
प्रमाणपत्र भी लिया है ।
और फिर घर पर ही चालू हुयी परदानशीन बुरकेवाली लङकियों की शिक्षा, 'जब
पहली खेप पढ़ गयी तब, एक प्रोग्राम आया है का पता चला औऱ साक्षरता केंद्र
खोल दिया, । सुबह से शाम तक कचहरी और घर की सेवा के बाद जब थक जाते तब,
दो पीरियड लेने पङते लैंप की रोशनी में पहला परदानशीन औरतो लङकियों का
जिनके पिता भाई पति अरब और खाङी देशों में थे '"दूसरे वे मदरसों के लङके
जो हिंदी इंगलिश सीखकर मौलवी बनना या अरब जाकर कमाना चाहते थे ।
कुछ सालों तक 'यही दिनचर्या रही फिर एक भीषण हादसे ने हमें अस्पताल
पहुँचा दिया । पति की रीढ़ का ऑपरेशन और अपनी टूटी टाँग के साथ घर से ही
फिर कलम तो चली हम नहीं कई साल तक, 'फिर लगा कि काफी कुछ बदल चुरा है अब
कूङा रोज उठाने ट्रेक्टर आते है ',कच्चेशौचालय नहीं है । एक बार सफाई
करने वाली सहेलियाँ अपनी बस्ती में ले गयी एक सभा में तो देखा सब बदल गया
सबके मकान पक्के हैं घरों में टॉयलेट्स हैं और सङकें पक्की हर मोङ पर
सरकारी नल लगा है औऱ कहीं भी मल के ढेर नहीं अलबत्ता सूअऱ जरूर घूम रहे
हैं बाङों में ।
©सुधा राजे


Thursday, 1 October 2015

सुधा राजे का लेख :- ग्राम्य जीवन और गऊ

गौमांस खाना भारत में 'अब कोई बङी अनोखी बात नहीं है '
किसी जमाने में बल्कि आज भी जिन गाँवों नगरों में ग़ैर हिंदू जैन और गौ
मांस खानेवाले नहीं रहते या बहुत कम रहते हैं वहाँ गौएँ झुंड के झुंड
गौचारण के लिये घरों से निकल कर चरवाहों के आगे आगे चरती हुयीं जंगलों तक
जातीं हैं और देर साँझ को घंटियाँ टनटनाती हुयी आती है ।
अपने बचपन के अनेक सुमधुर दृश्यों में से एक दृश्य यह भी था टनटनटन की
ध्वनियों के साथ घर में गौशाला के नन्हे बछङे रँभाने लगते और गाएँ भी जोर
से ''अंबाह "की सी आवाज निकालतीं रँभाती तब हम बच्चे तालियाँ बजाकर छतों
पर से चढ़कर गगन तक उङती पीली धूल को देखते और देखते कि हमारी गैया
लक्षमी गौरा भूरी और यमुना के साथ बङे बछङे मंगल और बुध भी अपना दरवाजा
आते ही गौशाला की तरफ झपटते और फाटक पर गरदन रगङने लगते जब तक कि
'तुलसीकाका दरवाजा खोलते गायें और बङे बछङे अपने अपने खूँटे पर अपनी अपनी
नाँद पर जा खङे होते जहाँ पानी के बङे बङे "बाल्टे भरे रखे होते ''दूसरे
वाले बाङे में छोटे बछङे कुदक रहे होते जो "माँ के आने का पता चलते ही
खिलंदङी पर उतर आते और मुँडेर से चढ़ने की कोशिश करते ',
हम बच्चे उनको खोल देते और तुलसीकाका ''हल्ला मचाते भागते ''अरे चोंख लओ
चोंख लओ ''काये बिन्नू राजा हरौ जौ का करौ अपुन ने 'अबई नन्नासाब हमें
डाँटन लगहें '
और हम लोग भाग जाते तुलसीकक्का की 'बेशरम बेल की छङी देखकर '
हालांकि पता था कभी मार नहीं पङेगी फिर भी ।
बछिया बाँधते बाँधते ढेर सारा दूध पी जाती और कई बार अफारा हो जाता, तब
कोंसा बाई और वैद्यजी की 'दवाईयाँ 'हिमालयन बत्तीसा और न जाने क्या क्या
घोलकर नन्हीं बछिया बछङों को पिलाया जाता बाँस की नली में भरकर '।
नगर कसबे गाँव में कोई भी घर ऐसा न था जहाँ गाएँ खङी होकर ''हुंकार न
भरती हो, 'बहुयें निकल कर पहली रोटी गुङ और मुट्ठी भर दूब या पालक चना
आदि की पत्ती लाकर गौमुख में रखती और गौ माता की गरदन पीठ खुजलाती ',
अगर गोबर मिल जाता यदा कदा तो घर भीतर ले जाती ',
गोवर्धन पूजा 'गौवत्स द्वादशी गुरुवार पितृपक्ष और लगभग हर त्यौहार पर गौ
माता को तिलक लगता आरती होती और सींग खुर पर वार्निश रंग गेरू केल रँगे
जाते ',ग्वालों को कपङे और रुपये पैसे दिये जाते और गौमाता के लिये हर
साल जाङों में ''कपङों में कपङों की परतें बिछाकर ओढ़ने हेतु "झूल "नामक
पहरावन कपङा सिला जाता 'पाँव में गोल खोखले पीतल के पैजना और सीगों पर
रंगीन मोती गले में घुँघरू और घंटी ।
कोई कोई गाय बहुत तेज भागती तो बङी भी भारी लकङी गले में टाँग दी जाती
जिससे गाय धीरे चलती और फसलों में नहीं जा पाती ।
लोग जब कटाई करते तो ''बालिश्त भर खूँटिया छोङकर काटते कटे खेतों में
',गरीब परिवार "सिलौ "बीनते यानि गिरी हुयीं बालियाँ उठाते 'जो कई
क्विंटल तक हो जाती इकट्ठी होने पर और बरसात आने तक गौएँ सबके खेतों में
निर्बाध चरतीं ।
बरसात की पहली फुहार पङते ही 'हरे हो जाते चारागार और गोबर पाथना बंद
करके खाद के लिये पङने लगता ।
कोई धोखे से भी गौ को डंडे से नहीं पीटता, 'बस ऐसे ही आवाजें लगाकर हटा
देते या बुलाते ।
गाएँ सङक के एकदम किनारे चलतीं किसी दक्ष मानव की भाँति ',और चरवाहे की
आवाज पर रुक जाती मुङ जाती, 'तालाब में पानी पीती नहातीं और पीली सफेद
लाल कत्थई भूरी चितकबरी गौएँ, 'घर घर दूध दही घी माखन छाछ मट्ठा पनीर
मावा ''की मटकियाँ भरे रखती ।
स्मृतियों का दूसरा चित्र बहुत धुँधला नहीं है, 'कि हम सब बच्चे रात को
बङे बङे नक्काशीदार पीतल के गिलासों में दूध पीकर सोते थे और सुबह दही की
लस्सी या दूध रोटी खाते, अकसर परांठे देशी घी से ही बनते या नैनू (नवनीत)
रोटी का नाश्ता होता, खीर महेरी दलिया और मावों से बनी घर की मिठाईयाँ
सदा ही अदल बदल कर घर के किसी न किसी बुखारी आलमारी या लकङी के संदूकनुमा
जाली में रखी ही रहती 'नाम बदल जाते अतिथियों के किंतु पकवान सारे हम लोग
ही खाते विशेषकर ''मगद के लड्डू मालपुआ और लौकी की बरफी तथा कत्थई वाले
पेङे ""
एक दो घटनायें सुनी और समझी सुधि आतीं है कि किसी ने जंगल में ज्वार
बाजरा के खेत मे घुसी गौ को हटाने के लिये उलटी कुल्हाङी की बेंट मारी और
लोहे का फाल लग गया, या किसी से लाठी लग गयी गुस्से में 'गौहत्या का कोई
इरादा नहीं था फिर भी ""पाप ""हो ही गया तो, घर के भीतर नहीं गया बागर से
ही ''दो कपङे और "भीख माँगकर ''तीर्थ पर चला गया "प्रायश्चित्त का सप्ताह
बिताने '। वहीं रहकर अनेक घरों से भीख माँगकर ""पूँछ के बाल दिखाकर लाठी
पर ""दोषी है भाई,,,
लोग चुपचाप भीख दे देते और 'उससे गौदान करके हवन यज्ञ करके तब घर आते और
फिर गौ सेवा में लग जाते ।
चौथ के दिन ग्वाले दूध नहीं बेचते ',बच्चों को हर पंद्रहदिन पर मुफ्त दूध
मिलता, 'जी भरकर ।
ये तब की बातें है जब "इंटरनेट मोबाईल कलरटीवी नहीं थे और '
लोग शैम्पू से बाल नहीं धोते थे पेस्ट और ब्रुश नहीं करते थे और हर घर
में यूरोपियन कमोड भी नहीं थे तब, जन्मदिन पर केक नहीं कटते थे और लोग
दहेज में लैपटॉप बाईक कार नहीं माँगते थे ',तब बारातघरों में शादियाँ
नहीं होती थी और झूले बालकॉनी में नहीं बाग में होते थे ।
तब लङकियों को कोई इतना घूरता नहीं था और पानी फ्रिज से नहीं घङे और
डंडीवाले लोटे से निकालकर "गंगासागर से पिया जाता था 'तब थालियों में
कटोरियाँ होती थी और तब 'मील "को भोजन कहा जाता था ।
जनमानस के भीतर गौ 'धरती कृषिभू राष्ट्र जन्मभूमि माता पिता गुरु और अपने
परिवार के प्रति 'अपनत्व के संस्कार थे ।
तब गाय बिआने पर 'सात दिन तक 'तेलू (खीस) बाँटी जाती थी गुङ सोंठ मिलाकर
पकाकर ',तब घर में दूध पीने से पहले 'अनाज में पकाकर खीर बनाकर और घी
निकालकर दिये देवस्थल पर चढ़ाकर ही लोग घर में दूध पीते ।
ग्रामीण जीवन की रीढ़ रहा है पशुपालन "कृषक के जीवन की कल्पना भी बिना
पशुओं के की ही नहीं जा सकती ।
गाय कोई मांस या दूध मात्र का जानवर न होकर एक परिजन होती ''अम्मा के बाद
गौ माता का ही दूध दही घी मावा छाछ पीकर लङके पट्ठे हो जाते और अखाङों
में लंगोट के झंडे बनाकर मुकाबिले जीते जाते अखाङा "ब्रह्मचारी होने की
पहली सीख से प्रारंभ होता और विवाह होते ही बंद हो जाता ',किंतु नयी
पीढ़ी आकर जगह ले लेती ।
लङके केवल हुल्लङ नहीं करते थे तब,, दम साध कर घंटों कसरत करते खेतों को
सोना उगलने पर विवश कर डालते और देश की सेवा में सीमा पर जा भिङते ।
गाँव नगर कसबे के बङे बुजुर्ग सबके बङे होते थे और किसी का भी बच्चा गलती
कर ही नहीं पाता क्योंकि कोई न कोई बङा बुजुर्ग तो देख कर टोक ही देता था

तब लोग टीवी नही देखते थे कबड्डी और खोखो के मुकाबले जीतते और तैराकी की होङ लगती ।
गौ बचेगी तो भारत फिर से बचेगा
©®सुधा राजे