Saturday, 30 March 2013

नाद और बिंदु

अपने भीतर ही एक
स्त्री एक पुरूष छुपाये जनमे
दोनों
नाद और बिंदु
नाद के भीतर लास्य
था लालित्य था ललक
थी और लचक थी ।
बिंदु के भीतर साहस था ।
जिजीविषा थी ।
सहनशक्ति और उत्साह था
समान था दोनों में आनंद
रति रमण प्रेम आकर्षण और
काम
फिर??????
दोनों ने विस्तार किया
और एक दिन नाद को पुरूष
होना भा गया ।
क्योंकि सृजन सिर्फ बिंदु
के पास था
आनंद के पार पीङा के पार
उपलब्धि के पार दुख
का सारा विस्तार
जो दोनो में होता बिंदु
ने सहर्ष ले लिया । नाद
मुक्त हो गया विस्तार
को । बिंदु सूक्ष्म
होता गया समर्पण को वह
जीवित रहा
नाद मर गया खोखले
अहंकार की खाल पर
गूँजता नाद बिंदु से
मुक्ति पाने की छटपटाहट
में निरंतर भीतर
को मारता गया । उसके
कण कण में ठसाठस्स बिंदु
ही बिंदु था
कोमलता से
छुटकारा पाने को कठोर
परूष रूक्ष होता नाद अपने
ही शोर से बधिर
हो गया । तब
जब सब सो रहे थे नाद
रो रहा था
बाकी सब फौलाद
हो चुका था लेकिन हृदय में
बिंदु
अपनी पूरी कोमलता से
विराजमान था
तब से आजतक वह
विपरीत हठयोग में स्वयं
का हृदय दबोचे फिर रहा है
क्योंकि
यही अंतिम कोना है
जहाँ वह बिंदु का दास है
वह कमजोर
स्त्री का विनाश स्वयम्
पुरूष का विनाश लिखकर
वह लगातार सोचता है कैसे
मारे स्वयम् को बचाकर
Sudha Raje
©®©¶©®

Friday, 29 March 2013

कङवे सत्य विषैले घूँट ।

घर में चहल पहल थी बङे
दाऊ सा
का विवाह था और
मेहमानों का ताँता लगा हुआ
था जो पुरानी परंपरा के
अनुसार कई दिन पहले से आ
जाते थे और कई दिन बाद
तक रूकते थे
परंपरा थी कि सभी मानदान
अर्थात् बुआ बहिन
भतीजी भांजी बेटियाँ ""शगुन
डलिया""लेकर लग्न लिखे
जाने के पहले ही आ जायें
और ये भी नियम
था कि एक चंद्रपक्ष में लग्न
चढ़ाते तो विवाह दूसरे
चंद्रपक्ष में
ही होता था "सीधा छूने
से अर्थात् सात
कन्या सात
सुहागिनों द्वारा सात
अन्न सात सूप
छलनी टोकरी कलशों में
साफ करके रखने से विवाह
भोज
की तैयारियाँ होती गेँहू
चने चावल सब धोये सु
खाये जाते
हर समय रसोईघर में भोजन
पकता रहता हर समय
महिलायें गीत
गातीं रहती हर रस्म के
विशेष गीत विशेष धुन
बुंदेली परंपरायें और
अलका पुरी हो जाता घर
लङकियों को होश
ही नहीँ मिलता सिर्फ
फलानी राजा रज्जू
फलाने को जल
पहुँचवा दीजिये
कामगारों की हालत पस्त
भी मौज भी कि हर तरफ
से निछावर
घङी घङी रूपया और हर
अतिथि के लिये स्वागतम्
कलश लेकर खङे होने पर नकद
रुपया और उबटन मालिश से
मिलते वस्त्र
हम सब बेहद प्रसन्न कि एक
करीबी रिश्तेदार भाई
भाभी मेहमान आ गये
जो हमेशा आते रहते थे और
विशेषकर रक्षाबंधन भाईदूज
पर उनकी अपनी कोई
सगी बहिन नहीँ थी पाँव
छूते और पैसे देते हमें
पता नहीँ क्यों कुछ
दयाभाव भी था लगभग
पंद्रह वर्ष बङे रहे होंगे आयु में
कुछ वर्षों से हमें एक
परिवर्तन लग
रहा था कि हमारी पीठ
बाँहें पैर अक्सर वे बंधु विशेष
स्पर्श से छूते हैं
हम तब कवि रूप में एक मंचीय
हस्ती हो चुके थे
हाँलाकि तब मात्र
हाईस्कूल किया था हमें
भीङ से कुछ देर बाद ऊब
हो जाती है सो जब सब
लोग तिलकोत्सव
वाली शाम पंडाल में थे हम
तीसरी मंजिल पर अपने बङे
निजी शय़नकक्ष में आ गये
और उंनीदे हो गये कदाचित
आसपास कोई
नहीँ था
तभी चेहरे पर
दाङी के बाल चुभे
बुरी तरह हमारे हाथ जकङे
हुये वही चेहरा
मेरे चेहरे से
अपने चेहरे को रगङने
की कोशिश में पागल
वहशी!!!
हम चौंके परंतु यकीन
करना मुश्किल था ये
वही हाथ हैं जिनपर चार
साल की आयु से
राखी बाँधी!!
माँ की सख़्त ताक़ीद
रहती तलवार सिरहाने
कुल्हाङी द्वार पीछे और
लुहाँगी कोने में बंदूक
उसदिन
पूरी ताकत से धकेलकर
कुल्हाङी उठायी
हजारों मेहमान भाई पर
अभी 307चल
रही थी
!!
कहीँ खून
खराबा ना हो
लङकी वाले
बसभऱ कर आये हैं
पैर पकङ
लिये उस घिनौने जीव ने
।।जा और
कभी हमारी नजर के आगे न
आना
कई बरस बाद
माँ को बताया माँ अंगारा हो गयीँ
फिर
शाबास मेरे शेर पुत्तर कह कर
रो पङी
लाशें गिर
जातीँ हैं लङकियों के होंठ
यूँ सिले रहते हैं
दुख तो है रिश्तों से यकीन
उठने का
©®¶©®¶
sudha Raje

Thursday, 28 March 2013

होली का हुर्राटा ।

CABINET MINISTERS
1. K. Rahman Khan -
Minority Affairs
बंद मिलें करघे लुटैँ भाङ में
जायेँ किसान
हज और जनसंख्या रहे
क्या कर लैँ रहमान
2. Dinsha J. Patel - Mines
कोयले सी किस्मत
भयी चूने सो सब खेल
खनिक मरें उद्योगपति
जीबेँ कहैँ पटेल
3. Ajay Maken - Housing &
Urban Poverty Alleviation
घर के काजे तरस
रयी झुग्गी में दयी आग
होटल मॉल बनाईये
माकन खेलेँ फाग
4. M.M. Pallam Raju -
Human Resource
Development
पानी हवा जमीन गुम
जंगल भये श्मशान
पालम राजू सोचते
कुरसी मिली महान्
5. Ashwani Kumar - Law &
Justice
औरत भूँजे खायेँगे बच्चे कर
नीलाम
कहो अश्विनी जी कहाँ है
कानून का धाम??
6. Harish Rawat - Water
Resources
शॉवर गीजर फाउंटेन और
चहिये स्वीमिंग पूल
रावत पीबेँ
बिसलरी जनता चाटै धूल
7. Chandresh Kumari
Katoch - Culture
MINISTERS OF STATE
(INDEPENDENT CHARGE)
संस्कृतियों के नाम पर
भौङे फिल्मी वेश
खाँये दलाली भद्रजन
ऐश करेँ चंद्रेश
Happy Holi
BURA NA MAANO HOLI HAI
©®sudha raje

बुरा न मानो होली है ।

पेटरोल के नाम पे लेबे नोट
डकार
तब लिखने दे रपट
जो असली थानेदार
¶©®¶©®¶
वाहन रोके पूछबे हैलमेट
अनुज्ञप्ति
ट्रैफिक दस के नोट पर हवल
दार उन्मुक्ति
¶©®¶©®¶
डाँट डपट दे दीन कौ धनिकन
कौ सत्कार
पुलिस अधीक्षक
वो सुधा "जिलाधीश हुशियार
¶©®¶©®¶
बुकरा सौ बक बक करै कुक्कुट
सौ सब खाये
होय गङैँता गेँहुअन
सुधा वकील कहाय
©®¶©®¶
वरदी वाला टुल्ल है कुत्ता चाटे
गाल
कहैँ सुधा जी भद्रजन!!! खेलौ खूब
गुलाल
©®¶©®¶
घिची खैँच सौ धौल दै
गारी देबै साठ
आरक्षी साँचौँ सुधा "होय
जिया सौँ काठ
©®©¶©®
वाकई ही व्यापार है सहज
सूचना तंत्र
टाँय हों फिस्स वे पत्रकार गयेँ
यंत्र
कलम नहीँ कागज नहीँ नहिँ ओलम
कौ ज्ञान
थाने में ठर्रा पियेँ पत्रकार
की शान
खबर बनायी जात है
होती नईँयाँ रोज
छेङछाङ खौँ रेप लिख ।
सुधा यही है खोज
©®¶¶©®¶
पत्रकार सब टुल्ल हैँ ठप्प हुये
अखबार
विज्ञापन से चल रहा
सुधा खबर का प्यार
©®¶¶©®¶
शुद्ध बुद्धिजीवी वही पैसा ले
चटकाय
कहे सुधा जी व्यर्थ हैँ
आदर्शन ढिँग जाये
©®¶©®
अद्धी खीसे में पङी एटीएम के
नोट
चमचा चाँटेँ तश्तरी
सुधा माँग रये बोट
नेता की जयकार मैँ गरौ बैठ
गयी भाँस
कहे सुधा जी शुभ सुनो
चमचे का आकाश
खी खी कर हर बात पै खीसेँ देय
निपोर
नेता करे डकार वो
"जय हो "कयेगो जोर
चमचा घी में तर रहै
मंत्राणी को मीत
भाभी जी कौ देवरा
लेय सुधा जी जीत
©®¶©®
जुकरबर्ग की फेसबुक
वनिता ही की मीत
हङ गये चिक्कर गये सुधा"कैसे
बाँधेँ भीत
पिया गये परदेश
खौँ त्रिया लिखेँ नहिँ पत्र
व्यस्त सुधा अपडेट्स में
दसहजार हैँ मित्र
©®¶©®
घरवारी बाशन घिसे बे
कबिता के नेह
कहैँ सुधा जी सत्य कवि पर
तिरिया पै मेह
©®¶©®¶
सौ सौ जूते खाय तमाशा घुस के
देखे
सच्चा नेता वही सुधा जी!!
हमरे लेखैं
©®¶©®¶
पर तिरिया खौं देख कैं
कूलै जिउ बॆचैन
पदमशिरी लेखक वही
कहैं सुधा जी बैन
©®¶©®¶
होरी की जोरी गयी गये
सब रंग किलोल
रिश्वत घोटाले
सुधा "नेता पी गये घोल
©®¶©®©¶
sudha raje

The essentials of civilization.

Do you know-some things are
essential for civilization,
some of them are :-Art,
Culture, Protection of
Creation
,Freedom from Tyranny,
Ugliness,and Poverty;the
Oppurtunities for Creation,
Development, and peaceful
atmosphere of dwelling :-
i.e.~ the Creation of Beautiful
things, Comfortable Life, and
and most important the
Respect of PRIVACY ,is
essential. There should be
and must be Suitable
Environment for the
'Innocents' both indoors in
Home and outdoors in the
Society for dwelling Happily
and Peacefully
©® sudha raje

सुधा दोहावली

डिंपल ने दये लट्ठ दो चित्त गिरे
अखिलेश
हा हा कप रये छोङ दे
सौपू इत्र प्रदेश
कहें मुलायम दाउ सुन
बैनी आज़मख़ान
पक्को कर्रो है हरौ भगवा है
शैतान
पिटे कुटे फिर सैं जुटे
अन्ना केजरिवाल
रामदेव लुटिया डुबी
गयो यार नेपाल
मनमोहन मन में कहैँ
मैडम बाबा आयेँ
पिंड छुटे कछु बोल ले
संसद प्रान खिंचाये
शिंदे अब तौ सीख लो
बिटियन को सम्मान
मौङी सब स्यानी कहें
ताज नगर प्रस्थान
शीला की लीला भली दिल्ली भयी मशहूर
हनीसिंह सँग नाच के
पछता रयीँ अब हूर
राहुल भैया ब्याह में काये लगा रये
देर
काँगरेस की का कही आ ये
बुढ़ौती घेर
भगवत के वचनन सुनी नारी नर
की दास
पढ़बौ लिखबौ छोङ के
कुठरी कर उपवास
कहैँ
आडवाणी सुनो साँची आछी बात
जसवंती कल्याणवी राग
गुप्त रये रात
सुधा कहै होरी भयी बुरौ न
मानो आज
हम ठहरे टटपूजियाँ
है खिचङी कौ राज़
©®¶©®¶
Sudha Raje
Datia//Bijnor

वो बदनसीब औरत

बाहर जली है
लकङी वो घर पिघल
रही है
वो बदनसीब औरत हर रोज
जल रही है
अर्थी को अपने काँधे लेकर
निकल रही है
पहने कफन चिता पर
वो लाश पल रही है
वो बदनसीब औरत हर रोज
जल रही है
उजङी है
जिंदगानी बिखरी है इक
कहानी
खुशियों की एक डोली
शीशे की एक गोली
बारूद के धमाके
सब ले गये उङाके
चीखों से सिसकियों से
दुनियाँ दहल रही है
वो बदनसीब औरत
हर रोज जल रही है
बाबुल की वो परी थी
भैया की फुलझरी थी
मैया की सुख पहेली
भाभी की वो सहेली
बहिना की राजदारी
किस्मत की एक मारी
कोई ना रोक पाया
मर मर के ढल रही है
वो बदनसीब औऱत
हर रोज जल रही है
¶®¶©®¶
Sudha raje

Sunday, 24 March 2013

बुरा मानो कि होली हमारी भी है सिर्फ तुम्हारी नहीं।

मैंने आज जमकर उन फूहर
लोगो को unfriend किया
जो होली है
बुरा न मानो की आङ में
केवल
महिलाओं का सूक्ष्म
विश्लेषण करने में लगे पङे हैं
फिर लिखते है
बुरा न मानो होली है
I HATE HOLI
सिर्फ
पुरूषों की कमीनगी का चरम
दिखावा है
साल
भऱ जिस नीचता को दिल
में दबाये बैठे रहते हैं
वह मजाक के बहाने
गीत के बहाने
रंग लगाने के बहाने
क्यों?????
ये त्यौहार एक अघोषित
मानसिक बलात्कार
बनकर रह जाता है
राधा
कृष्ण के बहाने
अपनी शैतानी वहशी हवस
भरी सोच निकालने वाले
होली का सही अर्थ
जानते ही नही
बृज में
लाठी पीटती औरतों के
हाथ नही पकङता
शाम होते सिर भूमि पर
रखकर पाँव छूकर जाते है
राजपूताने में होली पर
स्त्री को स्पर्श नहीँ करते
गुलाल पिचकारी
सिर्फ देवर जीजा ननदोई
भाभी के भाई लगाते हैं
पति के अलावा हाथ से
छूना किसी की हिम्मत
नहीं
लेकिन देखा
यू पी
साल भऱ पाँव छू ने वाले
लङके होली के दिन
चाची मामी भाभी ताई
साली सढ्यानी सलहज
सबको पटक कर
कहीँ भी हाथ लगाते हुये
काला
नीला
बैंगनी रंग
सफेदा
औऱ मोबिल
कीचङ
पोतनी
गोबर
मल रहे है
दारू में धुत्त और गंदे पन
की चरम सीमा तक फूहङ
बोल रहे हैं
स्त्री कमरे में बंद डरके मारे
औऱ खीच के ले जा रहे है
पति मूक देख रहा है
हमने इस कुप्रथा को खत्म
कर दिया अपने कुनबे से औऱ
इसके लिये पहले ही साल
हुरियारों को कङक सुर में
औक़ात में रहने
को कहा गया ।
तब से अब सिर्फ सूखे गुलाल
चलने लगे
लेकिन ये केवल हमारे कुनबे में
बस
बाकी वही हाल है
बुरा मानो होली है औऱ
केवल पुरूषों की नहीँ हम
महिलाओं की भी है
जो गाल रगङने
को परायी औरत खोजे
वो कमीना ही तो है
औऱ गंदे गाली गलौज
मजाक शराब अश्लीलता
जिसे अपनी बहिन बेटी के
साथ बर्दाश्त
नहीँ वो हवा में मजाक के
नाम पे
पूरी स्त्री जाति मातृशक्ति को हवस
की दृष्टिभोगी नजर से
देखता है तो सामाजिक
नही समाज का दीमक है
होली मन का मैल हटाकर
बंद रिश्ते शुरू करने गाने
नाचने औऱ बिना स्पर्श के
रंग लाल पीले हरे
गुलाबी केसरिया डालकर
झूमकर मन का औदास्य
हटाने का पर्व है
hAPPY HOLI
©®¶©®¶
सुधा राजे

Wednesday, 20 March 2013

मैं अपने आप सेमिलता गया दिलटूट जाने स

चली आयी मेरी ही याद
मुझको इक़ तराने से
मैं अपने आप से
मिलता गया दिल टूट
ज़ाने से
न पूछो किस तरह
ग़ुज़री कहाँ गुजरी कहाँ था मैं
चला हूँ उम्र भर
निकला नहीँ उसके
ठिकाने से
नशा भी एक रहमत
था अगर
वो दर्द में देता
दिया मुझको अँधेरों में
रखा
वहशत छुपाने से
ये रोज़ो शब अँधेरे औऱ्
उजाले रोज़ अफ़ज़ूं ग़म (daily
growing)
न ज़ाने ज़ी गयी कैसे
रियाज़त faithजख़्म खाने से
जरीं मौका (golden
chance)
जो खोया ज़िंदग़ी भर
फिर नहीँ लौटा
जिंदानीं शौक़ औ उल्फ़त
दिल
जिंदा दर ग़ोर ख़ाने
से
चले गये साख्तः रिश्ते दफ़न
करके न फिर देखे
मैं साक़िन बे शहर सामां
कहूँ किस आस्ताने से
सुनायी रौनकें
पुरखों की ज़ीदारी नियाज़ी यूँ
छिपाये गये हम अपनी ग़ुरबतें
ऐसे ज़माने से
तुझे पहचान
तो लेता चला आया मैं
महफ़िल से
तुझे
शर्मिन्दग़ी ना हो मेरा रिश्ता बताने
से
कलेज़ा काट के
जिनको खिलाते गये
वही अपने
मुझे इकरोज
तश्ना बेअमां कर गये सयाने
से
वो बच्चा जो अकेला सो नहीं सकता था ख़्वाबों में
हकीक़त में
मरा इतना नहीँ डरता डराने
से
मैं टूटा इस कदर
बिखरा समेटा बारहा फिर
भी
न रोके रोक पाया ख़ुद
को
उससे दिल लगाने से
सुधा "ये ग़म मुहब्बत का है
या फिर दोस्ती हस्ती
ये किस्सा बेबसी सरशक़
ज़हाँदारी फ़साने से
©®¶¶®¶
Sudha Raje
Dta//Bjnr

Tuesday, 19 March 2013

पगली पतोहू, परदेसी भतार

काली चौरे पर भीङ जमा थी वरदी वाले सिपाही और मैले कपङों वाले किसान
मजदूर बीच बीच में झपलियाये जाते बच्चे और कुत्ते
स्त्रियाँ लंबे लंबे घूँघट पर तीन उँगलियों से दो अंगुल का झरोखा बनाये
दूर से देख कर वापस घरों में लौट लौट जा रहीँ थी चारों ओर कानाफूसी होते
होते आवाज़ तेज होने लगती लाल फीते वाला हवलदार जोर से डंडा फटकारता और
सन्नाटा खिंच जाता एक बङे से कच्चे पक्के घर के अंदर एक झुंड में औरतों
के रोने की आवाज़ आ रही थी
इतने में दोहरे बदन की मोटी सी प्रौढ़ स्त्री ने आकर सबको जोर से डाँटा
का है रे!!! काहें इन्ना गटई फाङ फाङ कै चिंचिंयावत बाटू तुहन पचन????
जावा आपन आपन घरै
बुझात बा कौनो महामारी आ गईल बा
कौनो कार परोजन नाईँ बा का तुहरे घराँ उराँ का हो!!!!
तुरंत बङबङाती हुयी अधिकाँश औरतें उठ कर चलीँ गयीँ और कुल चार औरतों के
साथ लीला मौसी एक अँधेरी कोठरी में घुसी जहाँ एक स्त्री जमीन पर पङी बुरी
तरह रो रही थी और करीब ही दो नवयुवतियाँ बैठी कभी उसे पानी तो कभी हवा कर
रहीँ थीँ
मौसी के आते ही बहुयें भी उठकर बाहर निकल आयीँ जैसे उन्हें पता था कि अगर
नहीँ हटी तो डाँटकर भगा दी जायेंगी
---का रे!! का भईल??? काहैँ कौनो परानी मुअल बा का तोहरे पीहर कै????
अरी ओ मंझरिया वाली
तनि सुरती देबू हो गोङवा पिराये लगल घुमले घुमले --
अब रोती हुयी स्त्री चीखकर लीला मौसी के पैरों में जा पङी और एक बार फिर
दहाङ मारकर रोने लगी
लेकिन जब मौसी ने धीरे धीरे थपकना शुरू किया तो चुप होकर रह रह कर सिसक उठती
मौसी चुपके से गीली आँखें पोंछ रहीँ थी और
समझा रहीँ थी
--देख पतोहिया!!
तुहार भतार बा परदेश मा सासू रहबै नाईँ कईली अरूर देवर बाङैंन लईके
कैसे तू कोरट कचहरी जईबू कैसे थाना अस्पताल सिपाही वकील कईबू????
कपार फूटल नै होत त इहि घरै नाई अऊती
जै जरि गईल फूटि गईल टूटि गईल ऊ बतिया फिन नाईँ आई
बकि ई हा कि फजीहत जौन तुहार होई तू नाँई बूझति आटू
हमार बतिया माना चुप रहा और ऊ बोला जै में तोहार तमाशा छीछालेदर न होखे
कई घंटों बाद मौसी विजयी मुस्कान से आँसू पोंछती हुयी बाहर निकली
काली चौरे से सिपाही और हवलदार डंडा सिरहाने रखकर आम के नीचे खाट पर सो
रहे थे दो आदमी पैर दबा रहे थे और करीब ही आम क् छिलके ढेर में पङे थे
कुछ बोरियाँ बँधी रखीँ थीँ आम चावल दाल शहद के डिब्बे और जेबें फूली फूली
थीँ तभी एक आदमी हाँफता आया

--मौसी बुलवली है सरकार
और चारों उठकर चल पङे। एक पक्की दालान पर ऊँचे तख्त पर मौसी चेहरा थोङा
ढँके बैठी थी और बिना उस और देखे
-बैठिये-
सुनते ही सब सामने पङे मूँढ़ों पर बैठ गये पानी और मिठाई के साथ लस्सी
दही और कई सारे व्यञ्जन मेज पर एक आदमी रख कर ज़मीन पर बैठ गया दरवाजे के
पास
--देखिये दरोगा साहेब
कौन आपको खबर दिये रहा ई तौ बताये कै परी । हमरै गऊँआ कै नकिया कटौले
बाङा काम कईलस ओखे तौ बाद में देखब ई तफ़तीश तुहार पूरा भईल कि नाहीँ???
अरे मौसी कैसन बतिया रउरे कहलीँ हम पूरा कईलीँ
हम तै अईबै नाई चाहत रहलीँ बकि ई है बङका साहिब बहूत कङक बाङैं हुकुम
दिहलैं तुरंत जाबा तौ आयके परी ऱाउर बतिया ठीकै होई नै बस हमरै पीछे कौनो
बात बङका साहिब लगे नाहिँ जा पाये ई हमका गारंटी चाहीँ
एक ठौ मजूर गईल लहल कहलस
हमार मालिक ओकर पतोहू कै बङा पीटत मारत बाङेँ बुझात बा परान ले ले लेबेँ __
मौसी बोली
कौनो मुँहझौँसा दाङीजार होयी जरै मरे वाला
जावा तू लोगन
एक सिपाही बोला मौसी ई मेहरारू लोगन काहेँ इन्ना रोबत रहलिन???
मौसी से पहले ही हवलदार बोल उठा
-चुप बुढ़बक
अरे पुलिस देख कै -
औरू काँहैं!!!!
देखला नाँही
मौसी डँटलीँ तै ओरा गईलीँ सभ्भ!!!
और शाम मौसी फिर उस कच्चे पक्के बङे से घर में खाने का टोकरा उठाये पीछे
पीछे चली आ रही एक स्त्री के साथ छङी उठाये पहुँच गयीँ
कहाँ बाङू हे पतोहू हई खयका धय ला हो
लईके भुखाईल बाँटे
तीन बालक थोङी देर बाद खाना खा रहे थे और मौसी गरम पानी में काढै डालकर
उससे रह रह कर सिसकती स्त्री को नहला रहीँ थी । गंगाजल पानी में था ।और
रक्तरंजित कपङों से लहू बह बह कर नाली में जा रहा था ।
मौसी की भरी आँखें बहती जा रहीँ थीँ और अब मौसी धूँआधार गालियाँ बक रहीँ थीँ
शैतान भी चार घर छोङ देता है
किन्ना खसोटले बा है ददई कलजुग आ गईल बा मोर ईशुर!!!! केकर भरोसा करीँ हे
राम पतोहू के छुअतैं रँडुआ कै हथवा नाहीँ जरल हे भवानी
।। राक्षस बसओले बा हे महामाई!! तू काहे मेहरारू बनउली है काली माई
बहू को कोरी साङी देकर मौसी के इशारे पर साथ आयी मजदूर स्त्री फटे कपङों
का कूङा समेटकर ले जा रही थी दूर गङहिया में फेंकने
बहू अचेत पङी थी ।
मौसी थपक रहीँ रोती और बद्दुआयें दे रहीँ थी
©®¶©®¶
कुछ दिन बाद
एक बङे खानदान की इज्जत
सही सलामत चमक रही थी ।
कुछ दिन बाद चौपाल पर एक भीमकाय व्यक्ति बैठा मजदूरों पर दहाङ रहा था ।
पुरानी बहू मायके थी हमेशा को ।और आज्ञाकारी बेटा नयी बहू लाया था । पागल
औरत को छोङकर ।
Sudha Raje
©®¶©®¶
सुधा राजे Sudha Raje
काली चौरे पर भीङ
जमा थी वरदी वाले
सिपाही और मैले
कपङों वाले किसान मजदूर
बीच बीच में झपलियाये
जाते बच्चे और कुत्ते
स्त्रियाँ लंबे लंबे घूँघट पर
तीन उँगलियों से दो अंगुल
का झरोखा बनाये दूर से
देख कर वापस घरों में लौट
लौट
जा रहीँ थी चारों ओर
कानाफूसी होते होते
आवाज़ तेज होने
लगती लाल फीते
वाला हवलदार जोर से
डंडा फटकारता और
सन्नाटा खिंच जाता एक
बङे से कच्चे पक्के घर के अंदर
एक झुंड में औरतों के रोने
की आवाज़ आ रही थी
इतने में दोहरे बदन
की मोटी सी प्रौढ़
स्त्री ने आकर सबको जोर
से डाँटा
का है रे!!! काहें इन्ना गटई
फाङ फाङ कै चिंचिंयावत
बाटू तुहन पचन????
जावा आपन आपन घरै
बुझात
बा कौनो महामारी आ
गईल बा
कौनो कार परोजन नाईँ
बा का तुहरे
घराँ उराँ का हो!!!!
तुरंत
बङबङाती हुयी अधिकाँश
औरतें उठ कर चलीँ गयीँ और
कुल चार औरतों के साथ
लीला मौसी एक
अँधेरी कोठरी में
घुसी जहाँ एक
स्त्री जमीन पर
पङी बुरी तरह
रो रही थी और करीब
ही दो नवयुवतियाँ बैठी कभी उसे
पानी तो कभी हवा कर
रहीँ थीँ
मौसी के आते ही बहुयें
भी उठकर बाहर निकल
आयीँ जैसे उन्हें
पता था कि अगर
नहीँ हटी तो डाँटकर
भगा दी जायेंगी
---का रे!! का भईल??? काहैँ
कौनो परानी मुअल
बा का तोहरे पीहर कै????
अरी ओ मंझरिया वाली
तनि सुरती देबू
हो गोङवा पिराये लगल
घुमले घुमले --
अब
रोती हुयी स्त्री चीखकर
लीला मौसी के पैरों में
जा पङी और एक बार फिर
दहाङ मारकर रोने लगी
लेकिन जब मौसी ने धीरे
धीरे थपकना शुरू
किया तो चुप होकर रह रह
कर सिसक उठती
मौसी चुपके से गीली आँखें
पोंछ रहीँ थी और
समझा रहीँ थी
--देख पतोहिया!!
तुहार भतार बा परदेश
मा सासू रहबै नाईँ
कईली अरूर देवर बाङैंन लईके
कैसे तू कोरट कचहरी जईबू
कैसे थाना अस्पताल
सिपाही वकील कईबू????
कपार फूटल नै होत त
इहि घरै नाई अऊती
जै जरि गईल फूटि गईल
टूटि गईल ऊ बतिया फिन
नाईँ आई
बकि ई हा कि फजीहत
जौन तुहार होई तू नाँई
बूझति आटू
हमार बतिया माना चुप
रहा और ऊ बोला जै में
तोहार
तमाशा छीछालेदर न
होखे
कई घंटों बाद
मौसी विजयी मुस्कान से
आँसू पोंछती हुयी बाहर
निकली
काली चौरे से
सिपाही और हवलदार
डंडा सिरहाने रखकर आम
के नीचे खाट पर सो रहे थे
दो आदमी पैर दबा रहे थे
और करीब ही आम क्
छिलके ढेर में पङे थे कुछ
बोरियाँ बँधी रखीँ थीँ आम
चावल दाल शहद के डिब्बे
और जेबें
फूली फूली थीँ तभी एक
आदमी हाँफता आया
--मौसी बुलवली है सरकार
और चारों उठकर चल पङे।
एक पक्की दालान पर ऊँचे
तख्त पर
मौसी चेहरा थोङा ढँके
बैठी थी और बिना उस
और देखे
-बैठिये-
सुनते ही सब सामने पङे
मूँढ़ों पर बैठ गये पानी और
मिठाई के साथ
लस्सी दही और कई सारे
व्यञ्जन मेज पर एक
आदमी रख कर ज़मीन पर बैठ
गया दरवाजे के पास
--देखिये दरोगा साहेब
कौन आपको खबर दिये
रहा ई तौ बताये कै परी ।
हमरै गऊँआ कै
नकिया कटौले
बाङा काम कईलस ओखे
तौ बाद में देखब ई तफ़तीश
तुहार पूरा भईल
कि नाहीँ???
अरे मौसी कैसन
बतिया रउरे कहलीँ हम
पूरा कईलीँ
हम तै अईबै नाई चाहत
रहलीँ बकि ई है
बङका साहिब बहूत कङक
बाङैं हुकुम दिहलैं तुरंत
जाबा तौ आयके
परी ऱाउर बतिया ठीकै
होई नै बस हमरै पीछे
कौनो बात
बङका साहिब लगे
नाहिँ जा पाये ई
हमका गारंटी चाहीँ
एक ठौ मजूर गईल लहल
कहलस
हमार मालिक ओकर पतोहू
कै बङा पीटत मारत बाङेँ
बुझात बा परान ले ले लेबेँ __
मौसी बोली
कौनो मुँहझौँसा दाङीजार
होयी जरै मरे वाला
जावा तू लोगन
एक
सिपाही बोला मौसी ई
मेहरारू लोगन काहेँ
इन्ना रोबत रहलिन???
मौसी से पहले ही हवलदार
बोल उठा
-चुप बुढ़बक
अरे पुलिस देख कै -
औरू काँहैं!!!!
देखला नाँही
मौसी डँटलीँ तै
ओरा गईलीँ सभ्भ!!!
और शाम मौसी फिर उस
कच्चे पक्के बङे से घर में खाने
का टोकरा उठाये पीछे
पीछे चली आ रही एक
स्त्री के साथ छङी उठाये
पहुँच गयीँ
कहाँ बाङू हे पतोहू हई
खयका धय ला हो
लईके भुखाईल बाँटे
तीन बालक थोङी देर
बाद खाना खा रहे थे और
मौसी गरम पानी में काढै
डालकर उससे रह रह कर
सिसकती स्त्री को नहला रहीँ थी ।
गंगाजल पानी में था ।और
रक्तरंजित कपङों से लहू बह
बह कर नाली में
जा रहा था ।
मौसी की भरी आँखें
बहती जा रहीँ थीँ और अब
मौसी धूँआधार
गालियाँ बक रहीँ थीँ
शैतान भी चार घर छोङ
देता है
किन्ना खसोटले बा है ददई
कलजुग आ गईल बा मोर
ईशुर!!!! केकर भरोसा करीँ हे
राम पतोहू के छुअतैं रँडुआ कै
हथवा नाहीँ जरल हे
भवानी
।। राक्षस बसओले बा हे
महामाई!! तू काहे मेहरारू
बनउली है काली माई
बहू को कोरी साङी देकर
मौसी के इशारे पर साथ
आयी मजदूर स्त्री फटे
कपङों का कूङा समेटकर ले
जा रही थी दूर
गङहिया में फेंकने
बहू अचेत पङी थी ।
मौसी थपक
रहीँ रोती और बद्दुआयें दे
रहीँ थी
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कुछ दिन बाद
एक बङे खानदान की इज्जत
सही सलामत चमक
रही थी ।
कुछ दिन बाद चौपाल पर
एक भीमकाय
व्यक्ति बैठा मजदूरों पर
दहाङ रहा था ।
पुरानी बहू मायके
थी हमेशा को ।और
आज्ञाकारी बेटा नयी बहू
लाया था । पागल औरत
को छोङकर ।
Sudha Raje
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सुधा राजे

Friday, 15 March 2013

ह्रदय धधकते दावानल

1. भीतर दहका दावानल है 
ऊपर हराभरा जंगल 
दिलवाला जो भी देखा बस 
जलते देखा 
तू भी जल 
प्यास एक ही प्यास पालने 
से मरघट तक धधक रही 
प्यार इश्क़ दीवानापन 
क्यों करता पगले खुद से छल 
हर रिश्ते में 
वही पूर्णता 
खोज 
रहीं छलकीं आँखें 
टूटा दिल टूटे सपने ले 
टूटी हिम्मत अब तो चल 
दैरो-हरम दुनियाँ के मसले 
मखलूक़ाती फिक्रो-हुनर 
दर्द वही आवाज़ है दिल 
की 
लोग न बदले तु ही बदल 
चैन से 
तेरी नहीँ बनेगी फ़ितरत 
शायर वाली है 
ऊपर ऊपर हँसती 
दुनियाँ कहती रोज़ मिलेंगे 
कल 
लब पर आते आते बेबस रह 
जाते शिक़वे किस्से 
,अंदाज़े सब ग़लत लगाते 
सच रह जाता होंठ कुचल 
कौन तबाबत 
करता तेरी रोज 
कलेज़ा नोचे है 
ख़ुद ग़नीम के लश्कर में तू 
दोस्त कहाँ से करें पहल 
जो तेरे दिल में बसता है 
उसको पाना नामुमकिन 
जो तेरी हसरत में जलता 
रहता रोज हथेली मल 
बङी खुशी के इंतिज़ार 
में 
सारी सिन यूँ बीत गयी 
कितनी ही मुस्काने 
छोङी 
नादानी में सुंदर पल 
प्यासा जन्मा और 
जियेगा तङप तङप कर 
भूखा ही 
प्यास तेरी किस्मत है 
पपीहे 
स्वाति जलद क्यों माँगे 
फल 
रोज चाँद को देख 
चकोरा आँखें भर भर 
चीखेगा 
तनहाई का राही कैसे चाँद 
मिलेगा लाख मचल 
काली दुनियाँ के कुरते पर 
छींटे रंगबिरंगी हैं 
रंग दूधिये में कुछ काला 
समझ तो ले पर चुप्प टहल 
कारिस्तानी जिन जिन 
की है नहरें बाँध बनाने की 
जान लिया चुपचाप भरे 
जा रौशन 
करया villageखङी फसल 
बर्क़ चमकती सीने में 
जो कैसे लिखें कहाँ गायेँ 
कुरबानी की ईद के रिश्ते 
काट के 
अज़्हा दिल और ढल 
घबरा के मरने वाले 
भी पीछे क्या छोङ गये 
मंज़िल पर तनहा रूहें हैं 
मौत ज़िंदगी सफ़र निकल 
सुधा हमारे हाथ में रख 
कर 
सभी फ़ैसले दर्द कहे 
या तो जी ले 
अपनी खुशिया 
या फिर मेरी आग दहल 
सुधा राजे 
Joyrney by train 
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SudhaRaje 
Dta/Bjnr

2.कर न दिल की बात कोई 
भी समझ ना पायेगा 
और जो समझेगा पगले 
वो किसे समझायेगा 
हद हुयी अब तक 
नहीं तो आज ये हद तोङ दे 
टूटके रो यूँ कि देखे 
क्या बचा रह जायेगा 
ज़ाम के दो घूँट य़े दो क़श 
धुँये के क्या करें 
क्या कोई देगा दुआ 
भी जब ज़हर तू खायेगा 
इक सदी की चुप्पियाँ कैसे 
तुझे आवाज़ दे 
ग़ुमशुदा नातों को मत छू 
फिर से धोखा खायेगा 
तू जिन्हें अहबाब कहता बस 
तमाशाई हैं ये 
एक दिन तू रूठ जा फिर 
कौन कहने आयेगा 
ये हथेली पर जमी सरसों के 
पौधे चाहते 
दर्द की फसले है बंदे 
कौन ये बो पायेगा 
मत किसी को याद कर 
ना हाथ दे ना ख़त 
ही लिख 
तू ही इक फ़ानी निशानी 
क्या भला रख पायेगा 
रो सुधा इतना कि दिल 
की 
हिमनदी सैलाब हो 
या तो साकित चुप ही रह 
हर दर्द दिल सह जायेगा 
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Sudha Raje 

3. ये समंदर रेत के आगोश में
दर्द के दरिया पिये
तरसा कभी
जलजले
जलती सुनामी ग़म भँवर
बेबसी बादल हुये
बरसा कभी
हो गया खारा कि आँसू
पी गया
कई सदी का दर्द लेकर
ज़ी गया
ये समंदर आह के टापू लिये
सूखते पर्वत लिये डर
सा कभी
इस समंदर की तली में आग है
दिल में जलते गीत हैं
अनुराग
है
चाँद को छूने
को बढ़ता ज्वार है
सिर पटकती पीर बंजर
सा कभी
ये समंदर जल रहा
चिघ्घाङता
खुद हृदय ज्वालामुखी भर
फाङता
ये कलेजा चाक ले
अर्रा रहा
सूखती फसलों पे निर्झर
सा कभी
हद से ज्यादा बढ़
गयी पीङायें सब
चुभ रही दुनियावी ये
क्रीङायें सब
अपनेपन की प्यास में
जमता हुआ
ये तङपते ध्रुव शिखर भर
सा कभी
डूब गये इसमें सफ़ीने पार भी
इसमें गंज़ीने हैं जलता प्यार
भी
ये समंदर जिसमें
बरमूदा त्रिभुज
राज़ है डर है क़हर घर
सा कभी
हैं कई धारायें अंधे पर्त
हैं
ये सुधा क़िरतास राज़े
गर्त
है
लफ़्ज में कैसे भरेगा ये सदा
आबे आतश है ज़हर ज़र
सा कभी
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Sudha Raje
Dta†Bjnr

4. श्रवणमेघ मधुमास फाल्गुन
कैसे आ गये??*
पी बसंत परदेश देवरा
मन बहका गये*
झरी मंजरी जरी कनक
क्यों राई फूल गयी*
जीजी आगें
जिज्जा की रस बात कूल
गयी*
हरी भरी चूनरिया ओढ़ै
पीरी धरती
जैसें नयी दुलहनियाँ दरपन
रोज सँवरती
कोयल कूके बाग आम
की कच्ची कैरी
ग्राम बालिका
चटकी चोरी देखें बैरी
इमली की खट्टी चटनी
बेझर की रोटी
ससुरा रॅग लये केश हुलस
रयीँ सासू मोटी
ईख मधुप मधुमाख मधूकन टपके
महुऐ
देख परायी नार ललच मन
लपके रङुये
ढोलक आधी रात
बजी आँगन दे ताली
गौने वाली बहू जेठ
को गाबै गाली
सजी रोज बारात रतजगे
करें चिरैयाँ
बूढ़ी दादी हुलस नाच रईँ
नातिन गुईयाँ
तालन फूले फूल पात तरूवर के
झर गये
भारी हो गये पाँव बहू के
रूप निखर गये
हो रयी विदा शीत कंबल
सब धरे रजाई
नये ब्याह की अखर
लिवाने
आ गये भाई
ऋतु भर लगी सुहावन
अरसी काटन लागे
भयें लरकौरी नार
पिया अब डाँटन लागे
मीन मराली तीतर
सुखी सुआ पिक मैना
आये कमाई ले ले सैयाँ छलके
नैना
©®¶
Sudha Raje
Dta★Bjnr


5. जाने किससे मिलने आतीं '
सर्द हवायें रात गये
बस्ती से आतीं हैं सिसकती
दर्द कराहें रात गये
दूर पहाङों के दामन में
छिपकर सूरज रोता है
वादी में जलतीं जब
दहशतग़र्द निग़ाहें रात गये
चाँद को लिख्खे चिट्ठी
ठंडी झील बरफ के
शोलों से
ख़ामोशी से कोहरे की
फैली जब बाँहे रात गये
परबत के नीचे तराई में
हरियाली की चादर पर
फूलों की कलियों की गूँजी
गुमसुम आहें रात गये
कितने आदमखोर मुसाफिर
रस्ते से गुजरे होंगे
मंज़िल तक जाने से डर गयीं
लंबी राहें रात गये
पेङ तबस्सुम नोंच के खा गये
नाजुक नन्ही बेलों के
धरती रोती शबनम भरके
मौत की चाहें रात गये
प्यार वफ़ा के गाँव में
अमराई
पर लटकी लाश मिली
सुधा" मुहब्बत छोङ के चल
दी
पीपल छाँहे रात गये
©®¶©®¶SudhaRaje