Saturday, 30 November 2013

कहानी ""आई हेट इंडियन मूवीज

""आई हेट इंडियन मूवीज""
--------------------कहानी -----सुधा राजे
30/11/2013//1:51AM..
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चंद्रिका अब तुम्हारी बारी है चलो शुरू हो जाओ

ओह नहीं मुझे कहाँ आता है गाना वाना? कबड्डी प्लेयर हूँ हुतूतूतूतू बोले
देती हूँ बस या फिर देशी गालियाँ सुननी हो तो बोलो दोस्तो?

ये तो बेईमानी है चंद्रिका!! तुम्हीं ने प्रस्ताव रखा था सबको एक एक गाना
सुनाना पङेगा और अब तुम्हीं नहीं सुनाओगी?

एन एस एस कैम्पमार्शल सुभद्रा ने कहा तो सब लङके लङकियाँ ताली पीटने लगे
। चंद्रिका को विवश होकर अपनी भारी परुष आवाज़ में गीत सुनाना ही पङ गया

आवाज़ भले ही भारी थी किंतु गीत सुरताल लय में होने से रोचक लग रहा था ।
---बलम मोहे बंबई शहर घुमाय ल्याओ बलम मोहे टमटम में बैठाय ल्याओ । बलम
मैं ऐसी करम की हीना। मैंने कभऊँ न देख्यौ सनीमा । मोरे लाङले बलम
तुम्हें मोरी कसम मोहे लैला मजनू दिखाय ल्याओ'''''''''

चंद्रिका स्त्री पुरुष दोनों का अभिनय करके गाती सबको हँसा रही थी ।
शाम गहरी हो गयी शहर से दूर उस पहाङी कसबे की रियासत कालीन कारीगरी से
सजी धजी बस्ती में नगर से बाहर थाने के सामने बने कॉलेज में राष्ट्रीय
सेवा योजना यूनिट का शिविर लगा हुआ था जिसके छात्र छात्रायें दिन भर
करीबी गाँव में साफ सफाई और साक्षरता पर समाज सेवा में जुटे रहते शाम को
कैंप पर मनोरंजन के दो घंटे होते फिर प्रोफेसर लेक्चर देते रात देर तक
ड्नर होता। और डिनर के बाद प्रोजेक्टर पर फिल्मे चलायीं जाती जो देश की
जानकारी और समस्याओं पर रहतीं।
सुभद्रा कैंप नायिका थी । एकदम अनुशासित और कम बोलने वाली स्वयम तक सीमित
हॉबीज वाली लङकी।
अब सुभद्रा की बारी आयी तो सब फिर चीखने और तालियाँ पीटने लग गये।
सुभद्रा को कोई भी फिल्मी गीत याद ही नहीं था। उन दिनों घरों में
टेलीविजन नहीं होते थे। बङा सा टीवी साईज का रेडियो परिवार के मुखिया के
कक्ष में कढ़ाईदार कवर से ढँका रहता था।महीने में एक बार परिवार के लोग
जोङे में जाकर फिल्म देखकर आते। लङकियाँ सिनेमा देखने नहीं जातीं थीं।
कोई धार्मिक या बाल फिल्म या राष्ट्रवादी फिल्म हो तो स्कूल कॉलेज की तरफ
से चंदा जमाकरके बच्चे देख आते । भाभियाँ जब फिल्में देखकर आतीं तो
स्टोरी सुनाई जाती । जमकर बैठजातीं सब लङकियाँ और भाभी के डायलॉग शुरू हो
जाते। साल में दो चार फिल्में पारिवारिक फिल्में घोषित होने पर पूरा
परिवार देखकर आता। और महीनों डायलॉग गीत चलते रहते । सुमित्रा अकसर छोटो
बहिन भाई के साथ एक कॉमिक्स के बदले घर पर रूक जाती ।
सब ताली पीट रहे थे और सुभद्रा को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या गाये ।
उसने हथेली पर चंद लाईने लिखीं और सुनादी।
सन्नाटा छा गया सब गंभीर हो गये।
आठ दिन बाद कैंप फायर और मंत्री जी के हाथों पुरस्कार वितरण के बाद सब
लङके लङकियों की ज़िद पर प्राध्यापक ने टॉकीज में चल रही एक फिल्म दिखाने
की इज़ाजत दे दी और शाम के शो में पूरी बाल्कॉनी बुक हो कर सब लङके
लङकियाँ फिल्म देख रहे थे। एक रोमांटिक प्रेम कथा जो साफ सुथरी कहानी थी
। उसकी खास बात थी नायक नायिका का बार बार थियेटर में नाच और नाटक देखने
जाना और बगल बगल की सीटों पर प्रेम की बढ़ता अहसास । सुभद्रा ने अचानक
अँधेरे में आस पास ध्यान दिया कि बहुत सी लङकियाँ जोङी बनाकर बैठी है
अपने अपने पुरुष मित्र या किसी सहेली के साथ जबकि सिर्फ उसके ही दोनों
तरफ की सीट खाली है । अनायास ही एक मानव सुलभ कल्पना तैर गयी मन में कि
बगल में कोई खबबसूरत स्वस्थ पुरुष बैठा है उसका अपना पुरुष और वह तल्लीन
होकर उसके कंधे पर सिर धरे सिनेमा देख रही है । बिलकुल फिल्म की कहानी की
तरह वह पुरुष कॉफी पॉपकॉर्न लाता है और जब गीत चल रहा होता है तो उसको
थपकता शरारती हो जाता है । बालों में उंगलियाँ फिराता हुआ उसका अपना सपना
कब फिल्म से अधिक प्रबल हो गया पता ही नहीं चला । तीन घंटे बाद जब सब
उठकर बाहर जाने लगे तो कुछ लङकियों ने सुभद्रा को झिंझोङकर जगाया ।
ओ हो तुम तो सो रही हो!!!!!!!
ओ माय गॉड इतनी अच्छी फिल्म भी मिस कर दी!!!! क्या तुम बोर हो रहीं थीं?
न न नहीं तो वो बस यूँ ही पता नहीं कब आँख लग गयी।
सुभद्रा चुपचाप आकर कैंप के अपने रूम में सो गयी लङकियाँ देर रात तक
फिल्म के बारे में ही बातें करती रहीं संवाद कहानी और गीत ।
सुभद्रा के मन में एक सपना पल गया चुपके से । कहीं भी किसी मनोरंजन
थियेटर फिल्म मंच होली दीवाली पिकनिक को अपने भावी पुरुष साथी के साथ
सेलीब्रेट करने जी लेने मनाने और महसूस करने का। कुछ साल बाद सब लङकियों
की एक एक करके शादियाँ होती गयीं और सुभद्रा की भी शादी हो गयी। पूरी
शिद्दत और तवज्जो से सुभद्रा ने घर सँभाल लिया । वह रोज़ अखबार में देखती
कहाँ किस टॉकीज में कौन सी फिल्म लगी है और कौन से ऑडिटोरियम में कौन सा
नाटक या डांस शो मंचित होने वाला है । कई सप्ताह महीने फिर साल बीत गये ।
सुभद्रा न तो मायके आने पर टॉकीज जाती न कभी पति के साथ जाने का कोई मौका
आया । पति का स्वभाव ही ऐसा था जिसमें आऊटिंग मनोरंजन रोमांस को कोई
स्थान नहीं था। रोज सुबह नहा धोकर खाकर घर से निकलना और शाम को नहा धोकर
खाकर सो जाना एक बेड पर सोने के पलों की रुटीन दिनचर्या में भी धीरे धीरे
एक उदासीनता बोरियत और संवादहीनता सी बढ़ा दी । सालों बीत गये न कभी
सुभद्रा ने कहा न ही कभी सुभद्रा के पति ने कोई पहल की पिकनिक सिनेमा
मॉर्निंग वॉक थियेटर और कोई भी पब्लिक मनोरंजन स्थल यहाँ तक कि मेला
मंदिर या करीबी शादियों की पार्टी तक में बहुत ही कम साथ जाना हो सका ।
धीरे धीरे सुभद्रा केवल घर तक ही सीमित रह गयी । बच्चे बढ़े हो गये और घर
में टी वी आ गया डी वी डी प्लेयर भी । किंतु सुभद्रा को कोई रुचि नहीं
रही थी। बच्चे अपनी पसंद की फिल्में लाते और पसंद के कार्टून देखते । न
सुभद्रा को वक्त मिलता बैठने का ना ही उसके पति को। सपना कब का भूल ही
गयी थी कि एक दिन बरसों बाद मायके में भतीजी की शादी में पुरानी सहेलियाँ
मिल गयीं जो पारिवारिक मित्रता के कारण बुलाईं गयीं थीं ।
लङकी की विदाई के बाद भाभियों और सहेलियों सहित सब महिलाओं का प्रोग्राम
बन गया चलो फिल्म देखने चलते हैं ये उदासी तो दूर हो ।
सुभद्रा के पति भी आये हुये थे । शाम को सब तैयार होकर चल दिये ।

अरे तुम तैयार नहीं हुयीं?
लगता है नंबरिंग चुका दोगी । चलो फटाफट बस कपङे बदल लो ।

कल्पिता चीखी

नहीं तुम लोग जाओ ।

लेकिन क्यों सुभद्रा? तुम्हें तो कितनी पसंद हैं फिल्में!!! और ये तो
तुम्हारे फेवरेट एक्टर्स की मूवी है!!

तभी छोटी भाभी चहकी जो अकसर स्टोरी सुनाती थीं और कभी कभार गीत भी।

नहीं भाभी मैं नहीं जा रही हूँ।

अब चलो भी
कजिन बहिन बोली ।

मैं रीयली कभी फिल्म नहीं देखने जाती मिन्नी!!

ओ बनो मत हर समय गुनगुनाती रहती हो फिल्मी गीत और तुमने कभी फिल्म नहीं
देखी!!!या ये कहो कि हम से अलग जीजू के साथ कहीं बॉक्स में बैठकर दूसरी
टॉकीज में जाने का प्लान है मेम?

अच्छा ये तो कहो कि फिल्म देखते समय किसकी बाँहों में बैठना पसंद है ?
कुरसी की या जीजू की? भई मुझे तो इनका डिस्टर्ब पसंद नहीं सारा मज़ा
किरकिरा हो जाता है।

नहीं हम लोग फिल्म कभी नहीं गये ।

किसे बना रही हो!! ऐसा भी कोई होगा जिसने फिल्में ना देखी
हों!!!!!!अमेज़िंग आई कांट बिलीव । मैं शर्त लगा सकता हूँ ।

तभी सहेली के पति बोले

तो फिर आप शर्त हार गये क्योंकि मैंने वाकई कभी टॉकीज जाकर फिल्में नहीं देखी ।

कभी नहीं!!!!! अनबिलीवेबल!!!

हाँ पापा की बाँहों में बैठकर देखी हैं जब तक कि घर पर अकेले रूकने लायक नहीं थे ।

कभी नहीं??
हैरत से बोली बङी भाभी । हाँ भाभी आप बताओ कभी देखा है??

उँ उँ न नहीं तो कभी नहीं । मगर मेरे आने से पहले ससुराल में और सहेलियों
के साथ तो गयी ही होगी? हनीमून पर?? कभी नहीं?

नहीं हम कहीं नहीं गये बाहर साथ

बट व्हाई?

बिकॉज आई हेट इंडियन मूवीज?!

ये दिमाग़ खराब कर देतीं हैं । जिंदगी के झूठे सपने रंग और अहसास जगाती
हैं । जबकि ऐसा कुछ भी नहीं होता । सब कुछ एकदम अलग होता है । और ये
फिल्में उस हकीकत को नॉर्मल नहीं रहने देती कङवा बनाती हैं । हर सामान्य
सी बात ये चुभन बना देती हैं ।

आई हेट
आई हेट इंडियन मूवीज
आई हेट इंडियन मूवीज।
!!!!!
सुभद्रा हाँफने लगी

और सुभद्रा के पति तेज स्वर में बोलते देखकर पहली बार चौंककर बाहर निकले
तो सुमेधा की आँखें भरीं थीं ।

क्या हुआ??

क क कुछ नहीं ।

तुम रो रही हो!!!

नहीं

चीखी क्यों थी?

सब चुप चाप एक एक करके बाहर अपनी अपनी कार में जा बैठे जोङे से

तुम नहीं चल रही हो सुभद्रा?
मैं तो तैयार हो कर भी आ गया सब ने कहा कि आज सब फिल्म देखने जा रहे हैं?
चलो फिर तब तक मैं वापसी के लिये पैकिंग ही कर लेता हूँ।

सुभद्रा के पति ने एक आश्चर्य से कहा

शी हेट इंडियन मूवीज बिकॉज दे मेक टू ड्रीम्स अन एचीवेबल थिंग्स!!!!


छोटी भाभी ने सिर झुकाकर दाँत भींचकर कहा और बाहर निकल गयीं पलकें पोंछती हुयीं ।

©®सुधा राजे
पूर्णतः मौलिक कहानी
all right reserved

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