Friday, 12 September 2014

सुधा राजे का लेख :- स्त्री'' सारी बीच नारी है कि सारी की ही नारी है।" (2.)

एक बात साफ साफ कह दें ',
कि अगर हम बुरके पहनाने
की जबरदस्ती का विरोध करते हैं ',
तो
आपको ये भ्रम नहीं पालने देगें
कि "आपकी महान
संस्कृति की "साङी "को आज
भी ढोया जाना चाहिये ",,
यह तो बुरके से भी वाहियात और
बेकार का कपङा है ',।
अगर स्त्रियों को मसजिद में जाने
का हक होना चाहिये
ऐसी हमारी सोच है ',
तो हम उस सोच का भी विरोध करते
है '''जिसमें पति के पाँव पत्नी से
पुजवाना हक समझा जाता है पुरुष
स्त्री के कुदरती नैसर्गिक जोङे में :।
अगर बहुविवाह प्रथा को पर्सनल
लॉ से हटाने के लिये कहते हैं तो कतई
मतलब नहीं कि "बदले में पोंगे
पंथियों की "अधिक औलाद और
बहुविवाह प्रथा को पुनर्जीवित
करने का समर्थन करने वाले है ।
अगर 'सप्ताह में एक बार नहाने
की परंपरा गलत है ',तो गलत है यह
परंपरा कि हर ससुराल ये उम्मीद कर
कि बहू हर हाल में सबसे पहले उठकर
सुबह सुबह नहा धो कर नाश्ता बनाये
और सब पङे पङे चरते रहें ।
कुरीतियाँ है अगर "तीन तलाक
की परंपरा तो बदलने की बात
करनी भी जरूरी है ',
किंतु यह सोच
भी क्यों नहीं बदलनी चाहिये
कि ',एक बार खराब
शादी हो गयी तो "तलाक दिलाकर
सही घर वर खोजकर उस
लङकी का सही विवाह
करवाया जाना भी जरूरी है ।
दरअसल जैसे ही
एक ""मजहब
""की गलतियाँ दिखानी शुरू करते है
',
दूसरे मजहब के कट्टरवादी
अपनी
कट्टरताओं को जारी करवाने
का ""पिटारा ""खोल डालते है
बङी सी बिंदी नथ
साङी लंबी चोटी की अनिवार्यता भी उतनी ही दकियानूसी है
"
और तत्काल त्यागने लायक
जितना
बुरका ',
इबादत के समय औरत का जमीन से
चिपकना
हिलाला
तीन शब्द में तलाक
और
मेहर के रूप में वधू मूल्य की परंपरा
'"
कोई भी प्रथा जिसका कोई
""लॉजिक नहीं ""
कोई भी पहनावा जो ""मूवमेंट में
बाधक हो ",
अनिवार्य थोपा गया नियम
जो ""स्त्री होने की वजह से
ही थोपा जाता है '""""
धर्म के नाम पर हो या संस्कृति के
नाम पर """सिवा ढकोसले के कुछ
नहीं,,,
कट्टरपंथी
स्त्री का भला नहीं चाहते
केवल
अपना अपना
धर्म
थोपना चाहते हैं।
न तो हिंदू स्त्री को आज तक
आसानी से कुछ मिला है ',न कद्र किसी ने
खैरात में की है """"लंबा संघर्ष है
""""जिस दिन उनमें से आवाज
उठेगी """वहाँ भी """हाहाकार
मचेगा """"रही कदर? कोई कोई सीखा है
"""बाकी दहेज प्रथा,? परदा,,
पुत्रीहत्या,?? साङी घूँघट और घरेलू
जुल्म?? करवा चौथ और तीज???

सती से विधवा विवाह को गले
उतारना तक की यात्रा तो """नरक से
गुजरी है।
सच्चे दिल से अब तक """कोई भी हिन्दू
गले नहीं उतार पाया ""नथ
'''छोङना तक? मंडप में अभी ',दुल्हन
का दान होता है।
आपके "मानने में 'योद्धा होना शामिल
नहीं आप न पायलट हैं न सैनिक न आप
कमांडो न आप अकेले यात्रा करने
वाली महिला """"""तमाशा देखना है
तो बस में हाथ ऊपर करे
खङी भिंची दबी स्त्री देखो और
पता करो कि कितनी स्त्रियाँ साङी पहिन
कर रस्सी पर चढ़ सकतीं है।
कोई भी कपङा जो ""रक्षक
नहीं पुरुषों ने त्यागा क्योंकि वह
कार्यकुशलता घटाता है ''''फेमिनाईन लुक
""""ग्लैमर सुंदरता केवल """पुरुष
को लुभाने वाली मानसिकता '''''न
तो स्त्री का भला कर सकी है न
ही रक्षा।
साङी प्राथमिक युग का कपङा है जब
सिलाई कला का आविष्कार नहीं था तब
पुरुष भी धोती पहिनते थे ''''वह पेन्ट
में????? औरत अब तक साङी पर विवश??
क्योंकि "स्त्री सुंदर लगती है!!!!! और
कार्यकुशलता???
तकनीक "मानव ने विकसित की ',मानव
परंपरा का गुलाम नहीं होना चाहिये
''''''''जो तकनीक सुविधाजनक है कम समय
लेती है आरामदायक है रक्षक है
"""वही लेटेस्ट और सही है """""जिन
औरतों को घर बैठना है या मेहनत
नहीं करनी वे सजधजकर """फेमिनाईन
बनी रह सकती है """""किंतु जब एक
ग्रामीण स्त्री जंगल घास काटने
लकङी काटने ईंटें पाथने में लगती है तब?
वही साङी आफत लगती है
मजबूरी भी '''''अगर उनको सलवार कमीज
दिये जायें तो? देखनी है तो बस से आते
जाते ',पेट पीठ उघङे बदन पर
चिपकी नजरें और सङक किनारे
साङी का लाँग बाँधे मजदूरनी देखो।

साङी ',व्यक्ति मसला किसी को लगे
तो लगे किंतु """"""पेट पीठ न ढँके जिस
कपङे में वह चीज है ब्लाऊज
""""जिसको पहिन कर दौङा न जा सके
और रस्सी पर चढ़ा या ऊँचाई से कूदा न
जा सके या चौङे में बेधङक सोया न जा सके
वह है साङी।
ट्रक पर चढ़ना पङे तो घुटनो तक झलक
मारे साङी।

रास्ता चलता लफंगा खींच दे
तो "पेटीकोट ब्लाऊज में खङी स्त्री!!!
रात में घर से बाहर ट्रेन में बस में मैदान
में सोना पङे तो सारा बदन
प्रदर्शनी करे साङी।

बैठकर घास काटती औरत के पेटीकोट में
जहरीले कीङे चढ़ जाने
की हजारों घटनाये खेत खलिहानों में
होती है।
तत्काल कहीं जाना है तो पहनने को एक
'खास' समय ले साङी।
हर स्त्री आपकी तरह 'दिल्ली में
नहीं रहती ',मिल कारखाने फैक्ट्री में
मशीनों पर काम करती है औरते है
''पहाङों पर चढ़ती है और रेगिस्तान में
दौङती है बरफ पर रहती है।
साङी की वकालत आप करते रहिये
""""""लेकिन न तो यह भारत
का प्रतिनिधि वस्त्र है """"न ही आज
की स्त्री की रफ्तार का।

मणिपुर आसाम सिक्किम सिंध पंजाब
कश्मीर गोवा राजस्थान गढ़वाल
यहाँ का वस्त्र साङी नहीं।
साङी केवल ',अंग्रेजी शासन काल में
प्रचलित हुयी बंगाली भद्र बालाओं
की देन है '''आज भी लांग बाँधकर
मरदाना धोती ही पहनती है
मराठी वीरांगना।

साङी, 'न तो केरल का पहनावा है न
कबीलों का।

वीर नारियाँ '''मरदानी धोती वह
भी बिना पेटीकोट की पहनती थी।
पेटीकोट अंग्रेजी गाउन और ब्लाऊट
अंग्रेजी टॉप था जो बंगाली ग्रेजुएट
महिलाओं ने ''साङी से मिलाकर पहिना।
ब्लाऊज नहीं पहनती थीं पुरानी औरते
"आज भी मरदाना शर्ट ही पहनती है
हरियाणी और
पश्चिमी यूपी की ग्रामीण औरतें ।
फिल्मों से ये चोली नुमा ब्लाऊज
तथाकथित "धनिक फैशनेबल स्त्रियों तक
पहुचे और आज साङी जो टाँगों के बीच
लांग बाँधने की बजाय खोल कर
पहनी जाने लगी """यह राजनैतिक
उत्तरप्रदेशियों का फैशन था ''''।
न तो हिन्दी पूरे भारत
की मातृभाषा थी न साङी पूरे भारत
का पहनावा '''दिल्ली और
यूपी को ""राजनीति ने पूरे भारत पर
थोप दिया।

जबरन पहनाया जाने वाला हर वस्त्र
एक गुलामी है ''''''स्वेच्छा से कोई
नहीं रोक
सकता किसी को बुरका पहिनने से
"""""किंतु इसका मतलब यह नहीं है
कि कोट पैंट टाई पहिनने वाला पुरुष
स्त्री बगल में पाँच हजार साल पुराने
वस्त्र पहिनने पर विवश करे।
सवाल "मॉडर्न "शब्द का नहीं है सवाल
जबरन """""केवल स्त्रियों का ब्रेनवॉश
किये जाने से है """"""कि वे साङी में
ही सुंदर लगती है और साङी बहुत महान
परंपरा है """"""वैज्ञानिक डॉक्टर
इंजीनियर पायलट "पैराग्लाईडर और
एस्ट्रोनॉट स्त्रियों से """यह शर्त कोई???
हर वह चीज जो ""आरामदायक सुरक्षित
और वर्क में सुविधा देने वाली है पुरुष
अपनाता चला गया """"""छोटे बाल
'''पेन्ट शर्ट """बाईक """मशीने और रहन
सहन '''किंतु स्त्री की तरफ नजर
डालो """"""आज भी आदर्श
स्त्री की उसकी कल्पना बिना सिले
धान में लिपटी कोमल परजीवी स्त्री?

क्यों नहीं """"जब ये खाप पंचायतें
लङकियों पर आज इतना थोपती है तो घर
घर क्या हाल होता होगा तब जब
"""स्त्रियों को जरा भी सांविधानिक
हक नहीं थे??? बिलकुल फर्क पङता है
''''कम से हम यह करते है और
जो भी परिवार रूढ़वादी "बहू पर
थोपा थापी करता है सामने पङने पर हम
टोकते है """""जिओ और जीने दो " कैसे रखेगा???
लोग चोटी जनेऊ खड़ाऊ तिलक
धोती लंगोट ', जब खुद पहने तब
जो लङकी विवाह करना चाहे समझ ले
कि उसे साङी बिंदी चोटी ब्लाऊज
सैंडिल में जीना है।
हर स्त्री अपनी लङाई खुद नहीं लङ
सकती ',चार साहसी औरतें आगे बढ़कर
उदाहरण रखतीं है तब चार
सौ को प्रेरणा मिलती है।
जब किरण बेदी आगे आयीं तब
सिलसिला जारी हुआ ',जब
इंदिरा जी बढ़ीं तब सिलसिला बढ़ा जब
सुनीता विलियम
हुयी तो सिलसिला बढ़ा ', एक
दबी कुचली बेबस स्त्री अपनी आवाज
नहीं बन सकती इसलिये कानून बनाये
उन्होने जिनमे समझ थी ताकत थी।

सौन्दर्य का पैमाना """"असुविधा जनक
बंधनकारी गहनों कपङों को बनाया ही इसलिये
गया कि """मोहताजी बनी रहे """कोई
ताकतवर चुस्त तंदुरुस्त कमांडो टाईप
लङकी का पति बनना किसी """लल्लू पंजू
के बस की बात नहीं ''''तो वह
तो "कोमला और डरपोक लजालु 'नथ
साङी चोटी वाली के ही गुण गायेगा।
जमाना ताकत और अक्ल से चलता आया है
जिनमें ताकत थी वे मुगल थे जिनमें अक्ल
थी वे अंगरेज """""खैरात में घूँघट और
रसोई से
आजादी नहीं मिली """"""परंपरा का क्रूर
रूप
यही था कि आपकी माताजी दादी नानी को डेढ़
हाथ के घूँघट में चादर ओढ़कर घर में
रहना पङता था और ये संघर्ष जिन
औरतों ने किया उनको उस जमाने
को ""पोंगे """गालियाँ देते थे।
' मानव नग्न रहता था आदिकाल में वस्त्र
""न फैशन था "" न ही लाज का ढक्कन
",वह केवल "ठंड और धूप से बचाने
का साधन था आग की तरह का आविष्कार
आज भी वस्त्र """""हर आदमी के कामकाज
मौसम शरीर और रूचि का मामला है
"परंपरा मतलब विकास से पलायन और
शक्ति बढ़ाने का नाम प्रगति है विकास
है और विज्ञान है ',,नियम बदलते है
मशीने बदलती है वस्त्र भी कार्य शरीर
मौसम और रुचि के अनुसार क्यों नहीं बदल
सकती स्त्री रहा मन
तो किसी को बाईस गज का थान पसंद है
तो पहिने कौन रोकता है?????किंतु
उसकी तारीफ नहीं की जाती इस आधार
पर कि इसमें ""नारीत्व झलकता है!!!
या सुंदर लगती है???सुंदर लगना मैटर है
अपनी सोच का जिस साङी में एक पुरुष
को उसकी पत्नी सुंदर लगती है
उसी साङी को एक शौहर बदन दिखाऊ
अश्लील मँहगा और समय खपाऊ ओल्ड
टाईप कहता है उसे अपनी पत्नी सेम टू
सेम अपने जैसे पेन्ट शर्ट में "प्रिय
"लगती है।

आज जो जो ""संक्रमण काल दिख रहा है
उस सब के लिये कई पीढ़ी के स्त्री पुरुष
""""खप गये ""संघर्ष में और आज भी सत्तर
प्रतिशत स्त्रियाँ गाँव में है विवश औऱ
गुलाम है और स्कूल तक नहीं आ पायी है अब
तक हर लङकी।
जिस तरह आप
',किसी दादी नानी काकी माताजी को अब
आयु के तीसरे चौथे दौर में
नहीं """समझा सकते कि """वे घर में अगर
मैक्सी गाऊन नाईटी या ट्राऊजर कमीज
पहिन लें
"""""क्योंकि पूरी जिंदगी उन्होने
साङी ब्लाऊज पहिना है ""आदत ""बन
गयी है वे अटपटा और लज्जित महसूस
करतीं है दूसरे कपङों में """""वैसे
ही """एक लङकी जो पच्चीस साल तक
सलवार कमीज ""कुरता पाजामी ""पैन्ट
शर्ट """जीन्स टीशर्ट """नाईट सूट
ट्राऊजर शॉर्ट्स जैकेट कोट ओवरकोट
"""पहनती रही हो """अचानक एक सुबह
कह दिया जाये कि अब बस
""""चलो साङी बाँधो और इसे ही पहिन
कर सोना है सारे कामकाज करने है,,,,,,,,,
वह खुश नहीं हो सकती।
बंद गले फुल बाँहों वाला गरम कपङे
का कुरता पाजामा सलवार
पाजामी पेन्ट """और स्कार्फ
दुपट्टा जितना ढँकता है
उतना ही आजादी देता है शरीर
को """"फिर साङी ही पहिननाने
की जिद क्यों बहू पर??? बेटी होने पर
लङकी सब कुछ अपनी पसंद
का पहनती है!!!!! एक लङका पूरा जीवन
सब कुछ अपनी पसंद का पहिनता है
",,शादी होते ही कोई प्रोटोकोल
नहीं कि ""ले बेटा अब से तू
परदनी धोती ही बाँध अब तू
शादी शुदा है!!!!!!!!!
स्त्री की सेक्सुअलिटी से
"""साङी को जोङकर ""सलवार कमीज
और पेंट शर्ट में बहू न बरदाश्त करने वाले
परिवार """"कितने महान होते होगे???

ये बहू """"साङी ""में रहेगी की सोच
बङी घिनौनी सोच से जन्म लेती है
जिसपर अभी कहना अजीब लगेगा किंतु
सोच """वही रहती है अब वह
स्त्री """""कुमारी नहीं """"विवाहिता होने
पर सारे दास चिह्न चस्पां कर दिये जाने
की कुप्रथा के सिवा क्या है???????
सिलाई कला और सिलने की मशीनों के
अविष्कार के बाद """"अगर "थान लपेटे
बिना संस्कृति घायल होती है """"तो यह
सोच केवल विकास पथ का रोङा ही है।
चूल्हे की जगह मॉड्यूलर गैस ओवेन
वाला किचिन!!!!! और कपङे?? पुरुष सब
पहिने """"बस औरते
वहीं की वहीं रहेगी घूम फिर कर दस
मीटर के थान में!!!!!!

आधुनिकता का मतलब है क्या???? जो लोग
नग्नता से लगाते हैं वे भी गलत है तो """वे
भी गलत है जो स्त्री को ""लिंग
स्त्री विंग होने से """"यह मानकर चलते
हैं कि उसको """"कोमल नाजुक छुई मुई और
साङी दुपट्टे घूँघट पल्लू में
ही रहना चाहिये """"""बेटी और बहू में
ससुर जेठ के लिये अंतर क्यो है????
©®सुधा राजे

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