Friday, 5 September 2014

सुधा राजे का लेख:- रजस्वला ' जननी या अपवित्रा???

स्त्री ::रजस्वला ',जननी या अपवित्रा?
"""""""""सुधा राजे "का लेख '
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नारी हो, नर हो, किन्नर हो, मानव मात्र का शरीर, मज्जा अस्थि मांस वसा
रक्त नाङियाँ सब बिलकुल सब जिस मूल पदार्थ से निर्मित है वह है माता का
रजरक्त ',',और कैसी विडंबना आज भी गरीब के घर जब लङकी रजस्वला होती है तो
माता दादी ताई माथा ठोंक कर पछताती है ""हाय दईया अब तो 'कथरी, दुताई,
गुदङी, दरी, खोल, लिहाफ, थैले, पोंछे बिछौने को भी चींथङा नहीं बचेगा!!!
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दुनिया रॉकेट साईंस की बात करे या बुलेट मेट्रो ट्रेन की, 'हम बात करना
चाहते हैं उस क्रूर सच की ',जिसमें आज इक्कीसवीं सदी तक म में भी
"स्त्रियाँ कमर में एक धज्जी बाँधकर, एक चिंथङे में कभी मैले रद्दी कपङे,
कभी बेकार पङी कतरन, कभी रद्दी अखबार कागज, कभी खराब पङी रुई, कभी सूखी
घास पत्ते राख और कभी, बेकार पङे स्पंज टाट जूट आदि को जाँघों के बीच
बाँध लेती हैं ताकि ',हर महीने होने वाला "रजस्राव का रक्त सोखा जा
सके!!!!!!!
हैं बेशक ढेर सारे ब्रांड बाजार में किंतु 'खरीदने की औकात? ""जिस देश के
माननीय, पच्चीस से पैंतीस रुपये दिहाङी कमाने वाले को गरीबी रेखा से ऊपर
मानते हैं ',उस के परिवार की पाँच स्त्रियों के लिये पच्चीस पैड हर महीने
हर स्त्री मतलब एक सौ पच्चीस पैड औसत आठ सौ रुपये प्रतिमाह!!!!!!
कितने परिवारों के बजट में स्त्रियों के प्रतिमाह के सेनेटरी नैपकिन हैं?
दाङी ब्लेड हेयर कटिंग, दारू अंडा, सब संभव है, किंतु आज भी अनेक लङकियाँ
सिर्फ इसलिये घर से बाहर नहीं निकलती पाँच सात दिन क्योंकि सेनैटरी
नैपकिन नहीं और जो पैड वे बाँधकर समय काटतीं है उसको हर घंटे बदलना पङता
है और डंप करना पङता है ',। कई कई बार धो धो कर सुखा कर फिर फिर वही वही
चिंथङा बाँध लेती हैं और ये दो चार टुकङे कपङे के बार बार सैकङों बार धो
कर रख दिये और उपयोग किये जाते रहते हैं साल साल भर तक भी!!!!!!
स्कूल दूर हैं, 'नाव से जाना बस से ऑटो से रेलगाङी से बैलगाङी
भैंसाबुग्गी ताँगे से या कई जगह तो तैरकर जाना पङता है ',!!ऐसी हालत
में कोई कैसे जाये ',??ऊपर से चाहे चाय सब्जी पसीने या कपङे का रंग ही
लग गया हो 'दाग 'देखते ही अजीब सी नजरें, 'ग्लानि अपमान लज्जा और
शर्मिंदगी का बोध कराते शब्द हाव भाव?? जैसे जानबूझ कर फस स्त्री ने ये
दुर्दान्त अपराध कर डाला हो?? रजस्वला होना स्त्री का गुनाह है? तो
रजस्वला हुये बिना जननी कैसे मिलेगी मानव को?
ये भयंकर रिवाज आज तक जारी है कि अनेक समुदायों में रजस्वला स्त्री को घर
के कोने में दरी चटाई डालकर अकेला छोङ दिया जाता है ',कोई पुरुष परिजन
नहीं देख बोल सकता, वे रसोई में भंडार में पूजा में भोज की कतार में,
पवित्र आयोजन में, नहीं जा सकतीं ।अनेक लोग घर की लङकियों को रजस्वला
होने पर घेर बाङी या करीब के बगीचे खेत या पिछवाङे कहीं फूस के छप्पर में
पाँच सात दिन तक रखते है, 'नेपाल झारखंड उङीसा आदि कई जगह ऐसा है कि लङकी
रजस्वला होने पर मामा छप्पर बनाता है नातेदार चादर देते है और विवाह
प्रस्ताव चालू हो जाते हैं । बेहद पढ़े लिखे लोग तक अनेक रजस्वला स्त्री
के हाथ का छुआ भोजन नहीं करते ', किंतु उसे अवकाश देने की बजाय घर के
निम्नकोटि के समझे जाने वाले कार्यों पर लगा देते हैं । रजस्वला के रक्त
को लेकर तमाम जादू टोने टोटके किये जाते हैं ।और रजस्वला को भूत प्रेत
बाधा होने के डर से भयभीत कराया जाता है । ऐसा माहौल बना दिया गया है कि
रजस्वला होना गंदी बात घोर पाप गुनाह और बोलने बतियाने समझने समझाने नहीं
वरन छिः छिः कहकर दुत्कारे जाने वाली बात है ',। प्याज पर सरकार गिराने
और पेट्रोल पर जाम लगाने वाले क्रांतिकारी देश की लङकियाँ ",,सेनेटरी
नैपकिन अंडवीयर और टॉयलेट के अभाव में ''श्वेत प्रदर, ल्यूकोरिया,
अंडाशय, बच्चेदानी, फैलोपिन ट्यूब के कैंसर, खुजली, संक्रमण "गुप्तरोग,
और मौत तक का शिकार हो जाती है ",,बाँझ तक हो जाती है, 'कोई बोलना तक
नहीं चाहता!!!!! क्यों?? क्योंकि ये कोई जरूरी मुद्दा नही?? माता स्वस्थ
नहीं होगी तो स्वस्थ पीढ़ी के नर नारी होंगे कहाँ से? सरकार चाहे जो भी
दावे करे आँखों देखा सच यही है, 'कि बाढ़ पीङित शिविर में जब गाँव वालों
के बीच पुकारने पर भी कुछ बच्चियाँ स्त्रियाँ भोजन पैकेट लेने महीं आयीं
तब करीब जाकर पूछने पर कान में बम फटा "रुआँसी आवाज में वे बच्चियाँ पूछ
रहीं थी 'आंटी/ दीदी! कपङा है? जब डॉक्टर से पूछा तो लाचारी से हाथ खङे
कर दिये, 'कलेक्टर से पूछा एसडीएम से पूछा तो पता चला ""ये तो सोचा ही
नहीं?? क्यों नहीं सोचा साब!!!! लैपटॉप सोचा और सैनेटरी नैपकिन अंडरवीयर
टॉयलेट नहीं सोचा??? चादरें चंदा करके कैंप में भिजवाने के बाद आज तक
हृदय बेचैन है, 'इस देश में स्त्री देवी कामाख्या के रजस्राव को ताबीज
में धरने वाले लोग, लङकियों को आज तक नैपकिन मुहैया नहीं करा सके? जरूरी
नहीं कि ये ब्रांडेड हों, 'एन एस एस के गाँव सेवा के दौरान लङकियों को
देशी लँगोट पहनना और चौकोर रुमाल की तिकौनी बनाकर धुले साफ निःसंक्रमित
इस्तरी करे गये पुराने कपङे कतरन आदि से पैड बनाकर बाँधना सिखाया जो
'कमलाराजा हॉस्पिटल की
नर्सों से सीखा था । गाँव गाँव लघु कुटीर उद्योग की तरह सरल सस्ती तकनीक
से स्त्रियों के स्वयं सहायता समूहों, स्कूल, कॉलेज, आँगन बाङी, आशा,
प्रसूतिकेन्द्, और समाजसेवियों द्वारा हर स्त्री तक ये पैड नैपकिन
अंडरवीयर पहुँचाये जा सकते हैं । किंतु इसकी क्या गारंटी है कि पोषाहार
मनरेगा और चारा मिडडेमील की तरह घोटाला नहीं होगा?? भले ही रजिस्टर कुछ
बोलें अस्पताल के किंतु कुछ मँहगे प्राईवेट और महानगरीय अस्पतालों को
छोङकर, 'हर प्रसूति केन्द्र का यही आलम है कि, 'फिंगर चैकअप एक ही
दस्ताने से अनेक स्त्रियों का कर दिया जाता है ',गंदगी में प्रसव कराया
जाता है, और बोरी भरके कपङे ले जाने पङते हैं, 'आसन्न प्रसवा स्त्री को
जिनमें से भी आधे तो ',दाई रख लेती है स्ट्रेचर साफ करने के नाम पर ।
अकसर संक्रमण और समस्याये लेकर लौटतीं है स्त्रियाँ वहाँ से ।
जिस रज से मानव बना है उस रजस्वला से ऐसा भीषण बरताव????
कब तक सहमी अपमानित और ग्लानिग्रस्त रहेगी रजस्वलायें? आपकी अपनी बेटी,
माता बहिन भाभी,
कब तक????
आखिर कब तक??
©®सुधा राजे


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