Saturday, 23 August 2014

सुधा राजे का लेख - हिंसा के बीज और स्त्री।

प्रकृति ने नर और मादा बनाये
जोङा बनाकर प्रजनन और धरती पर
जीव बरकरार रखने और सहजीवन में
परस्पर सहयोगी प्रेमी समर्थक
सहचर होकर संतानों को पालने के
लिये ',
किंतु
भारतीय समाज में बदलते बदलते
"हैबिट सोशल प्रैक्टिस "ऐसे बदल
गयी कि
""सेक्स पार्टनर और
सहजीवी जोङा होने की बजाय "पुरुष
"पति परमेश्वर दुनियावी खुदा और
''भर्ता कर्ता पति देव हो गया!!!!!!!
जामाता?
बेटी का सहजीवन साथी होकर सास
ससुर के पुत्रवत होकर सेवा सम्मान
करने की बजाय
"जामाता दशम ग्रह "
होकर
ससुर साले साली '
शब्द गाली हो गये!!!!!
रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं
',और तेरी नानी मरी ''कहने
का रिवाज़ ',
इसी तरह की लपेटकर वाचिक
हिंसा ही तो है ।
कोई भी परस्त्री को "माताजी "
कह देगा
किंतु परपुरुष को ""मेरे बाप
"तभी कहेगा जब वह
आत्महीनता का बोध कर
चुका होगा ।
स्त्री और पुरुष
लाईफ पार्टनर सहजीवी जीवन
साथी न होकर
""कन्यादान लेने वाला महान पुरुष ""
और
लङकी
""पति स्वामी मालिक
की '''दासी सेविका और
परिचारिका!!!!
गृहकिंकिरी???
भारतीय स्त्री पुरुय़ यौवन
का जोङा नहीं बनाते है ',
बल्कि ""मिलने वाले दाम रंग
की गोराई बाप का रुतबा और जीवन
भर अविरल धन दोहन की उम्मीद के
आधार पर लङके वाले चुनते है कि उन
छाँटी गयी डेढ़ लङकियों में से किससे
"""मेरा बेटा विवाह सेक्स प्रेम
करेगा ""!!!!!
सीधे हाथ से नहीं तो उलटे हाथ से
पकङ कर बोल दें कुल मिलाकर,
लङके की कीमत चुकायी जाती है
उसको लङकी को घर में लाकर रखने के
बदले जो जो सामान धन चाहिये यह
उसका हक है ।और लङकी के सब के सब
नाते दार लङके को देगें!!!! और लङके
वाले मजे से सब गङप करते जाते है
आखिर लौण्डा पैदा करने का महान
काम जो किया है!!!
भारतीय पुरुष स्त्री जोङे से सेक्स
नहीं करते ',या यूँ कहें कि उनकी सोच
है ऐसी कि, बहुत प्रेम का दावा करने
वाले जोङे तक में, पुरुष की सोच
रहती है कि वह स्त्री को भोगता है
",
और ये सब वैसे ही ऐशो आराम के
सामान में शामिल है जैसे स्कॉच बीयर
वाईन वोदका शैम्पेन
टकीला व्हिस्की मार्टिनी या ब्लडी मैरी!!!
भारतीय जोङे में गृहस्थी के काम काज
करना मतलब बेरोजगार बेकमाऊ और
निठल्ली स्त्री है । क्योंकि उस
स्त्री को अपनी मेहनत के बदले "कोई
पैसे नहीं देता!!! जबकि पुरुष दूसरों के
काम करता है और हर काम के पैसे
लेता है इसलिये वह घर के काम
नहीं करता क्योंकि वह कमाता है और
स्त्री को पैसा खरचने का हक नहीं है
बिना हिसाब दिसे क्योंकि वह
करती ही क्या है पैसे कमाने को!!!
भारतीय जोङा संतान
पैदा नहीं करना चाहता, बल्कि केवल
नर
लङका ही पैदा करना स्त्री की जिम्मेदारी है,
चाहे बार बार लङकियाँ जान से मार
डालना पङे लङकों का जोङा होने तक
उससे संताने
पैदा करवामा पति ही नहीं ससुरालियों का मामला है
और खूब बोलते हैं इस मामले में दूर पास
के सब नाते रिश्तेदार
ही नहीं पङौसी मित्र तक!!
मतलब संतान
लङका ही होनी चाहिये और ये केवल
जोङे के स्त्री पुरुष
का न्जी मामला नहीं बीस साल पहले
ससुराल जा बसी ननद और साठ साल
पहले घर से निकल गयी फुआसास
का भी मामला है घर के नौकरों और
नेगियों तक का मामला है!!!
©®सुधा राजे।

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Sudha Raje
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