Saturday, 9 August 2014

सुधा राजे की कविता :- "" बोलती कलाइयाँ।""

कुछ लोग डरते हैं कि लोग क्या कहेंगे ',
और कुछ लोग इसी बात
का फायदा उठाकर नर्कदूत की तरह
हर रोज एक नयी साजिश करके सताते
हैं '
न जाने इंसान
कितना गिरेगा कभी ज़मीर
अंतर्मात्मा जागेगी कि नहीं ऐसे
दोहरे तिहरे व्यक्तित्व के
लोगों की कि नहीं,
ईश्वर कहाँ है???????
अब तक जागा क्यों नहीं,
कितने कंठ रो रो कर फट चुके है
कितने जिस्म दाग पर दाग नीले काले
कत्थई निशान लिये लहू धोकर सिसक
रहे हैं ।
किसी आत्महंत्री की लाश देखने से
पहले कोई
उसकी कलाईयाँ क्यों नहीं देखता जहाँ होते
है साल दर साल बने निशान ज़ख्मों के
और क्यों नहीं मिलाता तसवीरे
पुरानी जहाँ केवल आयु नहीं वेदना के
भी पंजे छप छप कर दरपन
को डरावना बना चुके होते हैं ।हर
बार बगावत करते कदम थाम लेती हैं
जहाँ कभी बूढ़ी जिंदा लाशें
कहीं बचपन की आशा भरी पुकारें ।
मरने और जीने के बीच देहरी के बाहर
और आँगन से भीतर के बीच
कितनी सुकन्याओं के जले हाथ छले छिले
और हाहाकारी रुदन पर ताल देते रहे
विहाग के शब्द बिना कंठ में उतरे,
कोई नही बस सन्नाटे के बीच रह
जाती हिलकियाँ और तीखी कर्कश
आवाजों के घाव देह के दर्द पर
टपकती हङकूटन की कसक के साथ तुम
कभी देखना किसी आत्महंत्री को तो उसकी कलाईयाँ देखना
©®सुधा राज

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