Thursday, 12 December 2013

बच्चे समाज और बचपन।

बच्चे __समाज और हम --अंक
15---लेख माला नवंबर से जारी ।
*********
परिवार संस्था केवल परिवार ही एक बच्चे को नमूना समाज नमूना देश नमूना
शासन न्याय और अनुशासन देते हुये भी प्यार ममता वात्सल्य और सुरक्षा
सहयोग क्षतिपूर्ति दे सकते हैं ।
वजह है माँ । पेट फाङकर बच्चा हो प्राकृत प्रसव पीङा से नौ माह कोख में
रखने का जो अनुभव है पल पल रात दिन सारे मौसम । और सब हालातों में । वह
कोई भी व्यक्ति संस्था या गवर्मेंटल निकाय कभी नहीं बन सकता ना ही कोई एन
जी ओ या गोद लिये हुये संरक्षक उस हद को छू भी सकते हैं ।
दूसरी कतार में पिता चाचा बाबा नाना मामा बङे भाई दादी काकी नानी मामी
मौसी बुआ बङी दीदी भाभी ।
जैसे रिश्ते वैकल्पिक रूप में मौज़ूद होते हैं माँ की मदद के लिये ।
माँ के दस हाथ बनकर परिवार में पाँच रिश्ते मिलकर बच्चा सँभालते है ।
जो कोई बेबी सिटर या आया नहीं दे सकती ।
एक व्यवहारिक अध्ययन किया जाये तो यही सच सामने आता है कि विवाह भले ही
स्त्री पुरुष के बीच होता है ।
परंतु वास्तव में लगभग सौ से पचास नये रिश्ते उस विवाह से जुङ जाते हैं ।
जब तक सब ठीक है सब ठीक रहता है । किंतु परंपरा जो रही है उसके मुताबिक
संकट काल में इन सौ परिवारों में से कोई तो आगे बढ़कर साथ देता है ही हर
खुशी हर गम में । हर भटकन पर टोकता और हर हार पर तसल्ली देता । कभी दीदी
तो कभी जेठानी कभी भाई तो कभी साला कभी काका तो कभी मामा कभी कजिन तो कभी
परिवार के पुराने दोस्त ।

ये सब रिश्ते दवाब भी हैं नैतिक रहने का और लगाम भी है उन्नति के साथ
समाज को जोङे रखने को।

बच्चा इस छोटे से मकान से पूरे कुटुंब का सदस्य होकर हर तरह की प्रेरणा
और शिक्षा पाता है ।
ये सब कोई अनाथालय और आश्रम नहीं दे सकता है।

सपने में डरने पर गले लगाना और गलती पर पीट देना रोने पर सिरहाने बैठकर
थपकना ही नहीं रात दिन बच्चे पर ही सोचना क्या खाया? क्या पहना क्या
पिया? कैसा महसूस किया।
बच्चा अकेला कहीं नहीं महसूस करता तब भी जब वह अकेला खेल रहा होता है ।
कोई वॉचिंग कर रहा होता है।
आखिर जन्म देना एक माँ के अलावा फिलहाल संभव तकनीक नहीं है ।लैब के
परखनली मिक्सिंग के बाद भी आखिर कार माँ का पेट चाहिये परवरिश को नौ
महीने और माँ के दूध से बङा कोई पोषण वैक्सीन या पेय नहीं।
माँ के स्पर्श से बङा कोई आसरा नहीं।
ये कोरी भावुक बातें नहीं हैं । साईंस कहता है। शोध कहती है।

तब सवाल यही है कि विवाह केवल दो व्यक्तियों के बीच दैहिक संबंध और
यौनाचार का लायसेंस मात्र नहीं है । एक परिवार गठन की प्रक्रिया के
सैकङों भागों में से एक महत्तवपूर्ण भाग है।

ये भारत है । यहाँ ऐसे लाखों परिवार हैं जहाँ एक युवा स्त्री विधवा हो
गयी और संतान के पालन पोषण पर पूरी कामनायें कुरबान करके परिवार चलाती
रही अवसर और दवाब के होने पर भी दूसरा विवाह नहीं किया ।ताकि बच्चे के
बाबा दादी चाचा ताऊ ताई बुआ ना छूट जायें ।
ये हिंदुस्तान है जहाँ लाखों परिवार विवाह के तुरंत बाद अलग अलग शहरों
में रहने लगते हैं पति फौज में है अरब देश में मजदूर है मेट्रोपॉलिटन
सिटी में काम करने चला जाता है । साल में एक महीने को रहने आता है फिर भी
विवाह कायम है कायम है जोङे की अवधारणा और दंपत्ति की संतान परिवार में
पलती है।
यह वह देश है जहाँ सेक्स प्रधान नहीं है विवाह की अवधारणा में बल्कि
परिवार गठन की एक प्रक्रिया का अंग है। जहाँ लाखों जोङे महीनों तक एक
दूसरे की सूरत भी नहीं देखते फिर भी प्रेम करते है वफादारी कायम रहती है
और तमाम परेशानियाँ झेलकर भी परिवार कायम रखते हैं।
यानि???? विवाह के पूरे औसत पच्चीस से पचासी तक के औसत सफर में दैहिक
संबंध अमूमन लाखों जोङों के बीच दसवीं बारहवी नंबर की वजह बन जाते है समय
के साथ । रस्में कस्में और परंपरा धर्म और भरोसा फिर भी निभाया जाता है।
विकलांगता बीमारी जेल जाना और कमाने जाना ये सब हो जाये तो भी विवाह
परिवार कायम रहता है ।
यानि?
भारतीय विवाह केवल और केवल दैहिक संबंध पर एकमात्र नहीं टिके रहते हैं।
बच्चे बङे और विवाह की गरिमा भी अपनी पूरी ठसक दमक और धमक के साथ विवाह
कायम रखने परिवार बनाये रखने की वजह होते हैं।
परिवार का कोई विकल्प ही नहीं ।
आप हार कर आओ या जीत कर जरा सी खटपट के बाद परिवार आपके साथ धमनियों
शिराओं की तरह मौजूद ।

एक बच्चा इसी अटूट महासंजाल में ही कूदता खेलता जीवन की पाठशाला से फिर
नया परिवार गठित करता है।
किंतु,,,,,,,,,
सब बच्चे नॉर्मल बच्चे नहीं होते ।
कुछ मंदबुद्धि
कुछ जन्मांध
कुछ मूक बधिर
कुछ विकलांग पंगु
कुछ मानसिक विकृत
कुछ रोगी
कुछ यौन विकलांग और नपुंसक या उभयलिंगी या यौन असमर्थ ।

किंतु कोई बात नहीं ।
परिवार है न!!!!!!!!!!

रो धो कर पलेगें परंतु फिर सबको आदत हो जायेगी और परिवार की छाया में ये
कटे वृक्ष भी कोंपल कोंपल फल फूल ही लेंगे ।

इलाज प्यार देखभाल और साथ सब मिलेगा परिवार है न!!!!!!!!!!

एक बच्चा जब तक बालिगता को प्राप्त नहीं कर लेता वह नहीं जानता कि उसमें
स्त्रीत्व है या नहीं । उसमें पुरुषत्व है या नहीं । उसकी रूचि विपरीत
लिंग के प्रति है या नहीं ।

रहा प्रेम । तो माँ पिता भाई बहिन बाबा नाना दीदी ताई काकी बुआ मौसी वाला
प्रेम तब तक जब तक वह परिवार के साथ है बना रहता है । कहीं मुखर कहीं मौन
मगर रहता जरूर है।

अगर कोई दूसरा यौन'विकलांग या समलैंगिक व्सक्ति उस बच्चे के बालिग होने
तक उसके संपर्क में कभी नहीं आता है । और ना ही कभी उसको ऐसा भी कुछ होता
है कि जानकारी देता है ।
वह एक सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहा होता है ।
समय के साथ उसे अहसास हो जाता है कि वह पौरुषविहीन है या स्त्रीत्वविहीन
। तब परिवार साथ होता है । वह विवाह नहीं करता है तब भांजे भतीजे और बाकी
बहिन भाई रहते है ।
लाखों लोग ऐसे है जिन्होंने ऐसे कारणों से विवाह नहीं किया और परिवार के
साथ बुढ़ापे तक आराम से एक मुख्यधारा का जीवन जिया।

उनके अलावा ऐसे विकृतांग बच्चे हैं जिनकी पहचान बचपन में ही हो जाती है
कि वे स्त्री होकर स्त्री नहीं । या पुरुष होकर पुरुष नहीं । या दोनों ही
हैं ।
तब भी परिवार है न!!!!!!!!!!!
अगर कोई समलैंगिक व्यक्ति उनके संपर्क में ना आये तो तमाम विकलांग
पोलियोग्रस्त और नेत्रहीन मूक बधिर आदि बच्चों की तरह ये विकृत यौनांग
बच्चे भी परिवार के साथ मुख्यधारा का सामान्य जीवन जी सकते हैं। और टीचर
डॉक्टर वैज्ञानिक किसान मजदूर लेखक पत्रकार दुकानदार वकील दरजी कुछ भी
काम करते हुये परिवार के साथ आराम से बुढ़ापे तक रह सकते हैं ।

तो समस्या क्या है????????

अकसर तमाम कुतर्कों के बाद समलैंगिक जोङे दीर्घकाल तक कायम नहीं रहते ।
किंतु तमाम आधुनिकताओं के बाद भी भारतीय परिवार अनंत काल तक कायम रहते
हैं । बहुत कम मामलों में तलाक होता है ।
तलाक के बाद भी जैविक पिता माता की संपत्ति पर बच्चे का हक रहता है । और
बाबा नाना दोनों तरफ का परिवार जोङा अलग होने के बाद भी बच्चे के कुटुंब
के रूप में मौजूद रहता है।

जबकि समलैंगिक जोङे के साथ साथ रहने का इकलौता और एकमात्र कारण होता है यौनाचार ।

ये यौनाचार ही सबसे बङा संबंध और इसके लिये जोङी बदलती रहती है

एक समलैंगिक के कितनों से दैहिक संबंध जोङा बनाने से पहले बने और जोङा
टूटने के बाद कहना मुश्किल है ।
हो सकता है अपवाद स्वरूप कोई जोङा मिल जाये जिसके संबंध पारंपरिक भारतीय
विवाह की तरह आजीवन स्थायी और एकनिष्ठ रह सके हों ।
किंतु अकसर समलैंगिक जोङा बनाने के बाद सबसे पहला काम होता है जन्मदाता
परिवार से सदा को संबंध तोङकर अलग और गुप्त दुनियाँ बसा लेना।
ये जोङा समाज के बीच एक परिवार कुटुंब विहीन यौनाचारी जीव के सिवा कुछ
नहीं समझा जाता ।
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि बुढ़ापा सबको आता है और जहाँ निसंतान
दंपत्ति के कुटुंबी साथ होते हैं वहीं समलैंगिक जोङे के पास दूसरे समूह
समलैंगिक दोस्त ।
और जब दैहिक ताकत खत्म हो जाती है तब जो भी करीब आता है पैसा पाने के
लालच में आता है ।
प्रेम की परादैहिक और बिना दैहिक संबंध बनाये भी प्रेम करने दोस्ती
निभाने की रीति शायद ही ऐसे समलैंगिक जोङों के समूह में मिल पाये।

ये भारत है जहाँ खुशी के अवसर मुख्यधारा के समाज में किन्नर आकर वापस
जाकर गुम हो जाते हैं अपनी दुनियाँ में ।

हर समय ओवर स्त्रीपन!!!!!
हर समय केवल सेक्स टॉकिंग!!!!
हर समय केवल आक्रामक खानपान रहन सहन!!!!!

क्या पुरुष पुरुष का एक समलैंगिक जोङा एक कन्या शिशु को गोद लेकर एक सही
परवरिश दे सकता है????????

क्या स्त्री स्त्री का समलैंगिक जोङा एक कन्या या पुरुष शिशु को सही
परवरिश दे सकता है????

पेट से दर्द लेकर बच्चे को दूध पिवाकर पाले बिना क्या ममता वात्सल्य की
अलौकिक अदृश्य डोर से समलैंगिक परिवार में जहाँ पिता पिता ।
या माता माता है ।

वहाँ
बहिन भाई दादी नानी मौसी बुआ मामी काकी ताई दीदी भाभी चाचा ताऊ नाना बाबा
मामा फूफा मौसा जीजा की ।

पूरी थीम केवल कल्पित माने गये नातो के आधार पर खङी की जा सकती है????

सवाल और भी हैं कि जिस जोङे का सारा प्यार ओरल सेक्स एनल सेक्स और एक मान
लिये नर मान ली गयी नारी के कल्पना पात्र के अभिनय पर टिका हो वहाँ बच्चा
गोद लेकर कब तक असुरक्षित नहीं????

क्या पुरुष पिता पुरुष माता का अभिनय करके बच्चे को वैसा माँ बाप जैसा
उसके स्कूल के दोस्तों के है दे सकेगे????

क्या किसी दिन बच्चा ही ऐसी ही समलैंगिग वृत्ति का प्रवृत्ति का या ।
कल्पित पिता पुरुष या माता पुरुष की ही वासना का शिकार तो नहीं हो
जायेगा?????

मानना पङेगा कि समाज में अपराध परिवार में हो रहे हैं । कितु बच्चा जैसा
कि हमने पहले भी कहा एक पूरा कुनबा कुटुंब परिवेश पङौस में जुङता है और
अगर अपवाद से पीङित होता है तो परंपरा से राहत और अपराधी को दंड भी दिया
जाता है ।

किंतु जहाँ अभिभावक समलैंगिक हों वहाँ पूरी पूरी आशंका रहती है कि बच्चा
सामान्य स्वस्थ होने पर समलैंगिगकता की आदतों का शिकार होकर वही फिर
परिवार विहीन होने की दौङ में शामिल हो जायेगा ।

और एक बात कि बच्चा गोद लेकर पिता माता की तरह पालने का दावा करने वाले
समलैंगिक जोङे क्यों भूल जाते हैं कि बच्चे कोई न कोई माँ पैदा करेगी तभी
तो होंगे!!!!! और तभी गोद लिये जा सकेगे!!!!!! और बच्चा पैदा होने के
लिये एक सर्वांग स्वस्थ स्त्री पुरुष जोङा तो जरूरी है ।चाहे परखनली विधि
से हो या सीमेन और एग डोनेशन से या सेरोगेसी से ।

तब यह तय हुआ कि दुनियाँ चलाने के लिये एक स्त्री एक पुरुष तो जरूरी है
ही । चाहे वे दैहिक संबंध कभी न बनाये परंतु संतान के लिये उनके अंडे और
बीज चाहिये ही

ये एक मातृत्व पितृत्व की पजेसिव भावना "मेरा बच्चा "

यहीं इसी बीज सृष्टि नियम से ही जुङी है। और शकल गुण आदतों के जेनेटिक कोड भी

तभी कोई खुद अपने बच्चे को कभी नहीं कह पाते जाने किस की औलाद है किसका
खून किसकी नसल किस हालत का रोपा कि ऐसा निकल गया ©®सुधा राजे
511/2, peetambara aasheesh
Fatehnagar
Sherkot 246747
bijnor
U.P.
7669489600
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

No comments:

Post a Comment