Thursday, 19 December 2013

स्त्री और समाज

कोई आदमी आपका लंगोटिया यार है।
पिता
बाबा
मामा
समाज का महान
लेखक पत्रकार साहित्यकार या मंत्री
सेना नायक
साधु संत पादरी मौलवी उपदेशक
समाज सुधारक
या
बहुत दान पुन्य करने वाला धनिक है


तो??????

क्या ये इस बात की गारंटी है कि उसके भीतर निजी जीवन में

विकृत आदतें नहीं हैं????

क्राईम का रिकॉर्ड उठाकर देखें

हर सफेदपोश अपराधी किसी का मित्र भाई पिता पति पुत्र दोस्त और शरणदाता होता है ।

एक अज़ीब मनोग्रंथि है यौनविकार
लोग बाहरी जीवन में बङी बङी बातें करते हैं और बहुत विद्वान होते हैं
किंतु जीवन के निजी क्षणों में जैसा कि खुशवंत सिंह ने कहा कि वह हर वक्त
खूबसूरत कम उम्र जवान औरतों और शराब से घिरा रहा लेकिन आज अंतिम पलों में
महसूस हो रहा है आत्महीनता आत्मग्लानि बोध कि वह सदा ही सबऔरतों को वासना
भरी कामुक नजर से ही देखते छूते रहे ।

यही दोहरा पन बङे बङे कवि गीतकार पत्रकार निर्माता निर्देशक संत पादरी
मौलवी किसी में भी देखने को मिल सकता है ।

हर आदमी पूरा का पूरा खलनायक नहीं हो सकता ।

वह सैकङा भर लोगों का नायक हो सकता है । और किसी दो चार का खलनायक ।


जब पैसा पास में हो पावर के सहारे हो लोगों में इमेज और समर्थन बढ़िया हो
पढ़ाई लिखाई खूब गहरी हो तब भी ।

लङकियों से दोस्ती उनसे आधुनिकता के नाम पर सारी की सारी वर्जनायें तोङ
कर मुक्त हो जाने की बातें। जरा जरा बात पर हाथ मिलाना गले लगाना
हुल्लङबाजी के बहाने द्विअर्थी बातें करना और एक स्त्री से दूसरी सहेली
की निन्दा करके परखना कि वह कितनी सहमत असहमत होती है उस के प्रभाव से ।
स्त्री जीवन की आम पीङाओं पर गहरी सहानुभूति दिखा जताकर विश्वास हासिल
करना लगातार तारीफ करना और एक भरोसा जीत लेना


ये अनुभवी लोगों के बङे प्राचीन हथियार हैं।

दुःख तो इस बात का होता है कि माँ दादी नानी मौसी मामी भाभी दीदी के लाख
चेतावनी देते जाने पर भी पढ़ी लिखी लङकियाँसम्मोहन से जैसे मंत्रबिद्ध
होकर खुद ही शिकार होती चलीं जाती हैं ।

कितनी बार समझाया होगा माँ ने कि हमउम्र स्त्रियों की बजाय जो व्यक्ति
पुत्री पौत्री की उमर की लङकियों से लाईनक्रॉस्ड बातें करते करते बार बार
छू छू कर अपनापन दरशाता है उससे सावधान ।

क्योंकि उसकी हमउम्र स्त्रियाँ परिपक्व होतीं हैं और पर्याप्त दूरी बनाकर
भी नौकरी और कामकाजी नाते निभाना उनको आता है ।
आप अभी अविवाहित हैं । विवाह के दो चार साल बाद तक भी सामाजिक पुरुष
स्त्री का अंतःसंबंधसंजाल समझ में नहीं आ पाता ।
अक्सर बङी उमर के लोग इसी बात का फायदा उठाते हैं । लङकी बङी उमर तक
अविवाहित है तो ज़ाहिर सी बात है शारीरिक और मानसिक तनहाई की भी तकलीफ
होगी ही । कोई सही पुरुष साथी नहीं मिला या दहेज कुंडली और परिवार की
लापरवाही से शादी नहीं हो सकी या लङकी का प्रेम असफल सिद्ध हो गया या कोई
प्रेम में धोखा खा गयी या फिर घरेलू प्रताङना की शिकार रही है ।या वह
इतनी स्वतंत्र रहना ही चाहती है कि विवाह बच्चे बोझ लगते हैं ।
जिस किसी कारण से भी बङी आयुवतक लङकी जॉब पाकर पढ़ी लिखी होकर भी अकेली
है । वहीं एक सहानुभूति और खुलापन बङा जाल है परिपक्व खिलाङी के लिये ।

मिशन और सरोकार के नाम पर बुद्धिजीवी(???? )भावुक लङकियों को पहले भावुक
करो फिर खुद की दर्द भरी दास्तान सुनाओ और कोई दुखद कथा जिसमें खुद का
दिल टूटा और फिर समाज की सब दुष्ट रवायतों और रूढ़ियों को कोसों ।

बढ़िया शेर शायरी कविता गीत कहानी लिखकर मन के सारे दरवाजे खुलवाओ ।
और जगह बन गयी ।
आदर चाहती है स्त्री
प्रेम चाहती है स्त्री निःस्वार्थ
जहाँ स्त्री की देह पर जरा भी ध्यान नहीं देकर मन को ही छूने की जगह
बनायी जाती है वहीं पर सबसे आसान शिकार बनती है स्त्री ।

खुद ही सम्मोहन में जकङ जाती है ।
यहाँ
एक ही चीज़ मदद करती है कठोर और सख्त निजी उसूल और सामाजिक सीमा रेखा ।
स्त्री पुरुष विचार शेयर करें बातें करें और कामकाज में हाथ बँटायें
मुहिम साथ चलायें किंतु ।

सीमा है लाईनक्रॉस्ड बातचीत कभी नहीं करना ।
कभी एकांत में नहीं बैठना ।
वर्जित स्पर्श कतई किसी हालत में नहीं बर्दाश्त करना ।
संबोधन में जी और सरनेम के साथ आदर से बुलाना ।
आयु के अनुसार ही सामाजिक नाता बनाकर बोलना
यथा जो व्यक्ति पिता का हमउम्र है उसे चाचा ताऊ अंकल और काका कहना ।
जो बङे भाई का हम उम्र है उसे दादा भाईसाब या बङे भैया जी कहना या

सर कहिये
किंतु किसी भी हालत में अपने से बङी आयु के किसी पुरुष को केवल नाम से
पुकारना मतलब???
आप अनौपचारिक बातचीत को खुद ही न्यौता दे रहीं हैं????

जो व्यक्ति आपको तुम तुम कह कह कर संबोधित करता है वह या तो सगा भाई पिता
परिवारी हो सकता है या ससुराल का बङा ।

बाकी किसी को भी हमउम्र या बङी छोटी स्त्री को "तुम "कहकर संबोधित करना
भारतीय परंपरा नहीं है ।

आप अपनी क्रांति से एकदम से समाज की सोच नहीं बदल सकतीं ।

आप के नाम के आगे ""जी""टाईप करने में केवल एक सेकेंड लगता है ।

अगर कोई इतना लंबा मैटर तो हजार बार टाईप कर रहा है कि एक सेकेंड केवल
""जी""टाईप करने से कोताही करता हिचकता है तो सावधानी से टोक दीजिये ।

हर बार सावधानी ही सबसे बङा कवच है ।
इस भ्रम में मत रहिये कि कोई आपके नगर नहीं आ सकता आपको व्यक्तिगत रूप से
नहीं जानता आपका नंबर पता ठिकाना नहीं जानता तो सब कुछ कह सुन कर मन की
छूट का पूरा पूरा लाईनक्रॉस्ड बातव्यवहार आप कर सकतीं हैं ।
नहीं
कदापि नहीं ।

स्त्री का मतलब ही मर्यादा की कसौटी है ।

और ये कसौटी बङी बङी कुरबानियाँ देकर पूर्वज स्त्रियों ने क़ायम की है ।

डिगई न शंभु शरासन ऐसें
कामी वचन सती मन जैसें ।

ये कामी वचन बङे सम्मोहक तरीके से दोस्त मित्र कलीग शुभचिंतक रूप में दबे
मिल जाते हैं ।

कहावत है अतिशय मिठास में कुछ छल छिपा होता ही है।

तो जब जब मीठा ज्यादा होने लगे छल की भी संभावना से सावधान होना ही पङेगा।

कोई क्यों चाहता है कि सारे नियम उसूल वर्जनायें तोङ दो?
याद रखें
हर बात का नियम है
चाहे विज्ञान हो या समाज तकनीक हो या संस्कृति
आप सही नंबर डायल किये बिना सही कॉल नहीं लगा सकते
तब सही नियम का पालन किये बिना सही परिणाम की उम्मीद कैसे रख सकते हैं ।
विचार शेयर कीजिये व्यक्तिगत बातें नहीं ।
और उनसे तो कतई नहीं जिनको आप लंबे समय और व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते समझते ।
याद रखें ""समझना " और जानना दो अलग अलग बातें है ।
आप किसी को जानते हैं ये एक बात है
आप किसी को समझते है ये दूसरी बात है।
लोग कहने लगे है कि स्त्रियाँ भी झूठ बोलतीं हैं और कानून की आङ में झूठे
इलज़ाम लगाती हैं त्रिया चरित्तर दिखातीं हैं ।
एकदम सही नहीं है ये बात । क्योंकि ऐसे मामलों का प्रतिशत बिलकुल ना के
बराबर और नगण्य है जिसमें स्त्री ने किसी पुरुष पर झूठा आरोप लगाया और वह
सज़ा काट रहा हो!!!!!!
बेशक सैकङो हजारों और लाखों औरतें किसी मामले में इनवॉल्व हेकर भी बाद
में पकङी जाने पर समाज परिवार या बदनामी के डर से झूठ बोलती रहती आई हो
सकती हैं ।
किंतु ये झूठ अकसर पुरुष को अजनबी बताने का रहता है अकसर ।
लङकी कह देती है अमुक अमुक से मेरा कोई संबंध नहीं ।
या वह तो मेरे भाई जैसा है ।
या यही मुझे छेङ रहा था।
ये सोचने वाली बात है कि कोई भी मामला अब तक ऐसा प्रकाश में नहीं आया जब
एक लङकी ने साज़िश खुद रची हो और पूरा प्लान बनाकर पुरुष के बेडपर जा
पहुँची हो और सारी वर्जनायें खुद तोङी हों फिर सुबह होते ही शोर मचा दिया
हो उस कांड का जिसका कोई ग़वाह नहीं सुबूत नहीं प्रमाण नहीं कि
उसका शोषण हुआ????

क्योंकि अगर प्री प्लान एक पढ़ी लिखी तो क्या अनपढ़ लङकी भी करके किसी
बङी हस्ती को साज़िश में फँसाना चाहती हो!!!!!!
तब कोई रंज़िश कोई प्रतिशोध या लाभ कमाने का मक़सद रहा होना चाहिये ।
एक मूरख साज़िशकर्ता तक साज़िश रचने के लिये प्रमाण जुटाकर रखता है ।
यूज किये गये कपङे चादर मेडिकल रिपोर्ट्स हिडन कैमरा वीडियो फिंगर प्रिंट
बातचीत के रिकॉर्ड किसी साथी सहयोगी की ग़वाही और तत्काल बाद की डी एन ए
सीमेन आदि की सैंपलिंग!!!!!!!!
जबकि लङकी ये सब सुबूत नहीं रखती तब जबकि वह कोई मकसद नहीं रखती प्रतिशोध
य़ा लाभ का ।
तब
केवल दो ही बातें आती हैं
एक या तो कोई उसको ब्लैकमेल करके विवश कर रहा है कि वह वही सब कहे ।
या फिर उसको आरोप लगाने को लालच तगङा धन पद लाभ रिश्ते आदि का दिया गया है।
ऐसे मामलों में लङकी केवल मोहरा होती है अपराधी नहीं बंधुआ मजदूर या
रोबोट यंत्र की तरह ।
तब जबकि वह खूब जानती है उसके पास कोई प्रमाण नहीं अपने लगाये आरोप के
सिद्ध करने का और आरोप लगाने से उलटे उसकी ही बदनामी बेइज्जती और
जगहँसाई होकर कानून से भी उलटा झूठा आरोप लगाने वाली साबित होकर दंड
मिलने वाला है।
याद रखें कि झूठा आरोप और झूठी गवाही साबित होने पर आरोपी और गवाह दोनों
को पूरे वाद व्यय के साथ मानहानि और कोर्ट का समय बरबाद करने तथा
मिथ्यासाक्ष्य गढ़ने के अपराध का दंड मिलता है ।
मुआवजा आरोप लगाने वाले से ही वसूला जाता है ।
स्त्री द्वारा मिथ्या आरोप लगाने के बाद कितनों को सजा हुयी ये एक रिसर्च
का विषय है ।
क्योंकि अब तक अंत में हर अपराधी ने स्वीकार किया
स्त्री की तसवीर तक लोगों को एक अहसास और कल्पना देती है ।
लोग
मॉडल्स और अभिनेत्रियों की तसवीरें पब होटल बेडरूम बाथरूम में क्यों
लगाये फिरते हैं???????

लोग स्त्रियों के नाच मुजरे कैबरे देखने क्यों जाते हैं ।

रामलीला तक नहीं चलती जब तक कि पतुरिया नहीं नाचती!!!!!

बङी बङी क्रांति और मिशन का दावा करने वाली पत्रिकायें तक कवर पर और भीतर
किसी स्टोरी के बहाने और विज्ञापन पर खूबसूरत अर्धनिर्वस्त्र स्त्री के
कामुक चित्र क्यों छापतीं हैं???? क्या उनकी गरिमा मय खबरें और साहित्य
नहीं बिकेगा????

ये अधिकांश विज्ञापन एक दो कामुक पोज देती द्विअर्थी संवाद बोलते पुरुष
के साथ कम से कम कपङों वाली छरहरी लङकियाँ ही क्यों बेचती है साबुन हो या
दवाई??????

लाडो समझो

समझो लाली।

ये समाज स्त्री का दृष्टिभोगी मानसिक दूषित कल्पना के साथ भी जीता समाज है ।

इंटरनेट पर लाखों लोग केवल चित्र देखने में घंटों लगे रहते हैं ।ये सच है ।

एक बङा तबका स्त्री के केवल चित्र उतारने बेचने खरीदने पेंटिंग बनाने और
देखने सजाकर कल्पनायें करने में जुटा है।

औरत की तो प्रतिमायें ही संसार भर में सबसे ज्याद बनायी गयीं ।
पुरुष पुरुष की जिस समलैंगिकता की वकालत बङा बुद्धिजीवी वर्ग कर रहा है
उसमें भी एक पुरुष दूसरे पुरुष में स्त्री की ही कल्पना आरोप -भावना करता
हुआ जोङा बना लेता है ।

बुरखा पहन रखा हो तो केवल आँखें नाखून - आवाज से समूची कल्पना ।
घूँघट में स्त्री ही सबसे ज्यादा रोमांचित एनथ्रिल्ड करती है आज भी लाखों
पुरुषों को वही सदी पुरानी साङी लँहगे और लंबे बालों वाली आधी ढँकी आधी
उघङी स्त्री सबसे ज्यादा रोमांचित करती है।
©®सुधा राजे

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