Saturday, 8 February 2014

एकान्त और शान्ति।

एकान्त और शान्ति
ये
मेरे अपने पुनर्वरण पुनर्चयन
और चयन जो रहे शेष हो गये अवशेष ।
ये हस्तक्षेप ही रहा जो जो तुमने मुझपर
रीझकर कहा ।
एक हिस्सा चलता रहा तुम्हारे साथ ।
और एक रह गया शेष स्थिर अविचल
अचयनित ।
जिसे न तुम सुन सके न चुन सके ।
मुझे उसके बिना रहने पर हर बार
लगा अपना होना इतना अधूरा कि तुम्ह
अविभाजित एकाकीपन मेरे एकान्त चयन
के बाद भी नहीं हो सका पूरा ।
सुषुम्ना क्रियाओं की तरह आदी हो गये
तुम मेरे होने के और मुझे हर बार दाखिल
करनी पङी तुम्हारी हाज़िरी ।
कुबूल कर भी लूँ तो क्या तुम नहीं समझोगे
कि मैंने ही दुबारा चुन लिये है तुम्हारे
करीब रहकर भी नितान्त एकांन्त और
विराट शान्ति ।
©®सुधा राजे

No comments:

Post a Comment