Tuesday, 11 February 2014

टुकङे-टुकङे खत।

एक पत्र जो कभी नहीं लिखा गया ।
लिखता रहा मन टुकङों टुकङों में
कभी प्रेस किये गये कोट पर टँके काढ़े गये
रूमाल की इबारत में ।
कभी सुबह सुबह सोते हुये गुलाबी चेहरे
पर जानबूझकर टपकायीं गयीं भीगे
बालों की बूँदों की शरारत में ।
एक खत
जो लिखना था जो कभी नहीं लिखा गया
टुकङों टुकङों में
भेजा जाता रहा कभी एक एक फंदे बुने गये
ऊन के नमूने और स्वेटर मफलर दस्तानों में

कभी बङी बुजुर्ग
जेठानियों ननदों काकियों से पूछ पूछ कर
बनाये गये अजनबी पकवानों में ।
एक खत जो लिखना था फिर
भी कभी नहीं लिखा गया पूरा ।
वही खत टुकङों टुकङों में
बँटता रहा अधूरा ।
कभी सरप्राईज के लिये बनवायी कमीज
पतलून और घङी में ।
कभी
बेबसी से निभाये गये कोंचते
रिश्तेदारों की हथकङी में ।
एक खत जो तुमने कभी नहीं पढ़ा जो मैंने
कभी नहीं लिखा वही जो लिखना ज़रूरी
टुकङों टुकङों में लिखा गया ।
कहीं भी तुमसे दूर जाने की इच्छा पर रूठ
जाने पर मनाने के लिये लिखी गयी चिट
"सॉरी "औऱ दिये गये किसी अय़ाचित
उपहार के बाद कॉफी के प्याले के नीचे
रखे परचे पर लिखे "थैक्स" में ।
अब तक मुझे इंतिज़ार है उन ख़तों के ज़वाब
का जो मैंने कभी नहीं लिखे और तुमने हर
बार बिना पढ़े रख दिया ।
एक उदास चेहरा
एक फीकी मुसकान
एक गुमसुम सवेरा
एक बेस्वाद नाश्ता
एक बिना प्रेस की कमीज ।
एक खामोश शाम
एक एकांत चहलकदमी ।
मुझे एक खत लिखना था
जो मैंने कभी नहीं लिखा
क्योंकि कभी पहले लिखे गये अलिखित
किसी खत का ज़वाब नहीं आया ।आज
फिर एक टुकङा तहरीर लिखती हूँ "आई
विल कीप माई एव्हरी प्रॉमिस एट
एनी कॉस्ट"
©®सुधा राज

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