Sunday, 9 February 2014

प्रेम का होना ही परम था।

प्रेम!!!!!
इतने बङे सपने और इतने ऊँचे पैमाने
बना लिये गये इस एक शै के
कि जो प्रेमपथगामी हुआ वह नाकाम
होकर रह गया संसार के जीवन में ।
जबकि जितने सांसारिक तौर पर
क़ामयाब रहे वे प्रेमाभाव के दर्द से
व्यथित रहे ।
प्रेम एक शै जो रहा किसी के पास
भी नहीं ना सांसारिक सफल के पास और
ना ही प्रेमपथगामी सांसारिक विफल
के पास ।
सुख को दो भागों में चीर दिया हो जैसे
प्रकृति की योजना ने कि एक को प्रेम
मिलेगा बस और कुछ नहीं । बाकी सब के
लिये वह दुखी रहे और एक को सांसारिक
उपलब्धियाँ मिलेगी किंतु प्रेम नहीं ।
फिर भी अपवाद बनकर रहे क्योंकि हर
छाया पर प्रकाश भाग से आती वायु ने
आलोक डाले और हर आलोक में रखे
पदार्थों की छाया बन गयी।
इन्हीं में पनप गये वे मन जो संसार में
होकर वीतरागी रहे और प्यार में होकर
भी सांसारिक ।
किंतु बावले हो ही गये प्रकाश के
फोटॉन कण और ऊर्जा के परमाणु जब जब
प्रेम ने पदार्थ का अभाव महसूस
किया और पदार्थ ने प्रेम
पाना चाहा यहाँ विभाजन की चरम
परिभाषा सार्थक हो गयी ।इसलिये
ही प्रेम पर पहला हक़ सिर्फ
उसका रहा जो जीता रहा वांछित
को पाने की क्षमता रखकर भी उससे दूर
रहा पाने की कामना किये बिना प्रेम
में रहा त्याग भी खुश रहा पीङा में
नहाता कि बस उसे प्रेम है
तो यही विडंबना है कि प्रेम सिर्फ उसे
मिला जिसने प्रेम तो किया किंतु प्रेम
पाना कभी लक्ष्य नहीं रहा।
यह पारस केवल उसे
ही दिखता रहा मिलता रहा जो इसे
पाना नहीं चाहता था प्रेम
का होना ही परम था पाना जानबूझकर
छोङ दिया गया कि वहाँ अनुभव ऐसे हुये
कि छोङने में ही सुख
रहा उसका जिसको प्रेम ने चुना पाने के
लिये बिना हक जताये जब कोई बहुत
करीब से सब कुछ चुपचाप धरकर लौट
जाये । और मैं जब कहती हूँ कि प्रेम पर
मेरा पहला हक़ है तो तो अपने अर्थों में
सही तो ही कहती हूँ ।
©®सुधा राज

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