Friday, 10 January 2014

कहानी :जूठी पत्तल

Sudha Raje wrote a new note: Sudha
Raje15--06--2013//10:38AM//
कहानी**झूठी पत्तल**★★★★★★★★★★★★★★★क्या कह
रहे हौ चौबे!!!!क्या सचमुच...
Sudha Raje
15--06--2013//10:38AM//
कहानी**झूठी पत्तल**
★★★★★★★★★★★★★★★
क्या कह रहे हौ चौबे!!!!
क्या सचमुच वो इतनी सुंदर है?
ल्यो म्हाराज का हमाओ मूँङ सटक गओ।
केरा जैसो गाभ सुपेत पिंड धरौ फक्क ।
कँकरा मारें लोऊ बगर जै ऐसी कौँरी नरम
काया ।
लाला जू !!
ऐसी जनींमांसें तौ लखबै खौं कितऊँ
टिपतींयईँ नईँयाँ ।
लालाजी सोच में पङ गये । पत्नी पागल
मिली थी । ससुराल वालों ने धोखे से
विवाह कर दिया । दहेज के लालच और खुद के नाटे कद से चुप रहे।
पता लगते लगते देर
हो गयी दो बच्चे हो गये ।प्रारंभ में बहू
चुप रहती । साथ आयी हुयी छोटी बहिन
चुपचाप सुबह शाम
दवाईयाँ खिलाती थी ये
पता भी नहीं चला । एक दिन
देखा तो सिर दर्द
का बहाना बना दिया । उस समय के
हिसाब से छोटे बाल स्त्री के दोष माने
जाते थे । जब कटे बालों की बात
पूछी तो रटा रटाया ज़वाब मिला चोट
लग गयी थी डॉक्टर ने पट्टी करते बाल
काट दिये थे । बढ़ा लूँगी। माथे के
दोनों बगल निशान थे ।
लालाजी आश्वस्त हो गये । मायके वाले
जल्दी जल्दी लिवा ले जाते
पता ही क्या चलता । जचगी मायके में
हुयी । उस ज़माने में दिन भर घूँघट डाले
स्त्रियाँ घर के काम करतीं और पुरूष
प्रातः से देर रात्रि तक बाहर
कामकाज़ में व्यस्त रहते । पत्नी के कमरे
में देर रात को ही जाना होता ।
दूसरे बच्चे की जचगी के बाद लंबे समय तक
जब नहीं भेजा तब लालाजी बिन बुलाये
अचानक चले गये लिवाने । अब तक ससुर
जी खुद ही लिवा जाते छोङ जाते ।
सुबह को दिशा मैदान जाते एक परिचित
ग्राहक मिल गया जो लाला जी के गाँव
का जँवाई और किराने का फुटकर
व्यापारी था ।
कुशल मंगल के बाद जब बताया कि किस के
घर जामाता हैं तो चकित् रह गया ।।
जो बताया अविश्वसनीय किंतु सत्य था।
लाला जी की पत्नी भयंकर पागल थीं ।
किशोरावस्था से ही पागलखाने
की चिकित्सा चल रही थी। बिजली के
शॉक् लगवाये जाते तो कुछ महीने शान्त
रहतीं । नशे की गोलियों के प्रभाव में
रखा जाता । युवा होने पर भयंकरता बढ़
गयी थी । घर से भाग जातीं आक्रमण कर
देतीं और कपङे फाङकर निर्वस्त्र तक
हो जाती। तब जंजीरों से बाँधकर
रखा जाने लगा । कुछ चिकित्सकों ने
लाइलाज़ घोषित कर दिया था तो कुछ
का मानना था कि अभी भी आशा की जा
कोई चमत्कार हो जाये ।
निम्फोमेनिया नामक रोग
भी बताया कि विवाह हो जाये तो ये
उग्रता तोङ फोङ आक्रमण घर से
भागना और कपङे फाङना बंद
भी हो सकता है । पुरूष का प्यार मिले
तो लङकी ठीक हो सकती है किंतु
आशा निराशा दोनों के अवसर बराबर हैं

तांत्रिकों ने बताया कि इस पर भयंकर
प्रेत का साया है । विवाह
नहीं किया तो ये मरकर पिशाच
बनेगी और पिता को पाप लगेगा ।।
किंतु कोई दूसरा पुरूष इससे विवाह
करेगा तो ये प्रेत भी इसके साथ फेरे लेकर
सदा साथ रहेगा ।अतः विवाह की हवन
वेदी पर कन्या को अकेले एक मटके से फेरे
दिलाकर मटके में सारे विवाह सामान
रख कर मटका कसकर बंद करें और दूसरे
नगर पुल पार करके श्मशान के पीपल के
नीचे गाङ दें ।फिर कन्या को विधवा करें
सारी चूङियाँ तोङ दें और किसी कुँवारे से
विवाह करा दें तो कन्या ठीक हो जाये
।समस्या थी विवाह करे कौन?
ऐसा हो कहीं पता लगा तो ?
तब चिकित्सक की सहायता ली गयी ।
लाला जी ठहरे रात दिन व्यस्त
आदमी घर में बूढ़ी अनपढ़
माँ तो दुनियाँ की अफवाहों का पता क्य
छाया चित्र देख कर हाँ कर दी ।
करना ही क्या था घर में
ही तो रहनी थी घूँघट में ।
लालाजी को काटो तो ख़ून न
बचा हो जैसे । एक एक करके सारी बातें
ढाई साल में से मात्र छह महीने साथ रह
पाने की मसतिष्क में मँडराने लगीं ।
जो विचित्र तो लगतीं थीं किंतु
सेवा इतनी शांति से करती सुंदर थी चुप
रहती और कोई फ़रमाईश
नहीं करती बेटा बेटी दो बच्चे दे दिये ।
छोटी बहिन आकर पूरा काम सँभाले
रहती । लाला को उलाहने प्रतिवाद
का अवसर ही कहाँ था ।वह ठीक हो चुकी थी लगभग।लालच में
लालाजी ने ससुर जी से साफ साफ
जा पूछा । बात खुल गयी ससुर जी ने
पगङी रख दी पैरों में जामाता के ।रकम बढ़ गयी।
अबकी बार लालाजी बहू तो लाये किंतु
साली को नहीं भेजा सास ने डर के मारे ।
एक हफ्ते तक सब सही रहा ।
लालाजी डर के मारे कमरे में नहीं गये ।अकेलेपन ने बहू की सोच
बिगाङ दी
उस दिन
लालाजी दुकान पर आये ही थे कि नौकर
भागा हुआ
आया बताया कि लाला की माँ को बहूजी
रहीं हैं और दरवाज़ा अंदर से बंद है।
लाला जी भागे दुकान पर ताला लगाकर

पङौसी की छत के सहारे घर में
झाँका तो कलेजा फटने लग गया देख कर ।
बहू ने सास के बाल पकङ रखे थे और भयंकर
गालियाँ बकती हुयी पीटे जा रही थी ।
बूढी सास सहायता को पुकार रही थी ।
लाला जी थर्रा गये यह रूप देखकर ।
गाँव के लङके छत के रास्ते लाला जी के
साथ रस्सी लेकर आँगन में उतरे बहू
को हाथ पाँव बाँध कर डाल
दिया गया ।पता चला पहले सास ने पीटा था।
ससुर जी को खबर भिजवाई बच्चे छुङाकर
बहू को ससुर के साथ लानत्त मलामत करते
हुये भेज दिया कभी कोई रिश्ता न रखने
की कहकर ।
सोचते सोचते लालाजी व्याकुल हो उठे ।
बच्चे दादी सँभालती और नौकर । रात
काटने को दौङती और ढाई साल
का चुपचाप का साथ हृदय में कभी प्रेम
भरता कभी घृणा । कभी मन करता उङकर
जायें लिवा लायें । कभी आतंक से कंठ सूखने
लगता ।
पाँच साल निकल गये ।लाला कभी कभी शहर की कायामंडी हो आते
लालाजी को सब सलाह देते
दूसरा विवाह कर लो किंतु कद से नाटे
और आयु से प्रौढ़ हो चले दो बच्चों के
पिता को जाति का कोई भी परिचित
अपनी बेटी देने को तैयार नहीं था ।
लालाजी को जब
पता चला कि पङौसी गाँव के चौबे
जी हर तरह के विवाह करवाते हैं
तो जा पहुँचे जन्मपत्री दक्षिणा लेकर ।
अगले महीने चौबे जी कुछ
कुंडलियाँ छायाचित्र और विवरण लेकर
लाला जी की बैठक में लड्डू खाने आ धमके ।
दरजन भर विवरण देखकर
आखिरी दो चित्रों पर
चर्चा जा टिकी ।
एक लङकी विधवा थी और बहुत ही सुंदर
पढ़ी लिखी सुशील मातृ पितृ विहीन
थी जो भाई के साथ रहती थी ।
दूसरी साधारण रंग रूप की थी बङी आयु
की कुँवारी थी क्योंकि बहुत निर्धन
परिवार की सातवीं बेटी थी बूढे
पिता की संतान जिसने पुत्र चाहने के
लालच में प्रौढ़ होने तक बेटियाँ जनने तक
विवश किया पत्नी को और पत्नी चल
बसी । घर वर खोजे कौन बूढ़ा असमर्थ
और जामाताओं ने संपत्ति बाँट ली थी ।
लालाजी को चौबे जी ने
बताया कि पिता को कई दुहेजू नाते
बताये किंतु वह कुँवारा वर चाहता है
कन्या के लिये । बूढ़ा मरने वाला है
शीघ्र ही । हिस्से में बचा घर और
गेंवङा छोटी बेटी के होंगे ।
लालाजी की आँखें भटक
रहीं थीं विधवा लङकी इतनी सुंदर थी ।
फिर ध्यान आता वह दो वर्ष किसी पर
पुरूष की भोग्या रही है ।
अंततः पुरूषवाद हावी हुआ और
लालाजी ने चौबे जी से साँवली लङकी से
विवाह की बात चलाने की कह दी ।
विवाह हुआ और बहू घर आ गयी ।
लाला जी घर आते ही बच्चे दादी के
हवाले छिपा दिये गये ।
अतिथि विदा हुये तो बहू के कमरे में
लालाजी जा पहुँचे । धङकते दिल से बैठे
ही थे सात साल बाद स्त्री के निकट थे ।
किंतु ये क्या दुल्हन घूँघट फेंककर उठ
खङी हुयी ।
""हाथ मत लगाना लालाजी! "
इतना बङा धोखा??
तुम्हारी पत्नी जीवित है दो बच्चे हैं बङे
बङे । तलाक़ तक नहीं हुआ और तुमने ये सब
कुछ भी बताये बिना शादी कर ली मुझसे!!!
बहू ने जोर जोर से रोना प्रारंभ कर
दिया ।
लालाजी पत्थर की प्रतिमा की तरह
खङे थे हाथ जोङे ।
सुबह बहू जिद करके शोर गुल मचाकर
मायके चली गयी । लाला जी की बहुत थू
थू हुयी ।
बूढ़े ने धोखाधङी का मुक़दमा ठोक
दिया । ले देकर प्राण बचाये ।
अबकी बार चौबे जी चार महीने बाद आये
। लालाजी को फिर दरजन भर चित्रों में
से वही चित्र दिख गया ।पं से बोले-"लुगाई और चिलम
का भी क्या दोष अब कौन से औलाद करनी
बोले
"""चौबे यार बात पक्की कराओ ""
अगले ही दिन सब परिवार के बीच
लालाजी और चौबे जी दावत उङा रहे थे
। बात पूरी होने
को ही थी कि लङकी बोल पङी ।
"" ये विवाह नहीं हो सकता भैया!!
क्योंकि पिछली जिस लङकी से इन्होने
धोखा देकर इन्होंने विवाह
किया था वह मेरी सहपाठी रही है ।
उस दिन मैं भी वहाँ । जब
लालाजी फेरों के बाद चौबे जी से बातें
कर रहे थे । अचानक मेरा नाम आया तो मैं
रूक गयी । लालाजी कह रहे थे कि,
--लङकी तो गोविन्दपुर
की गौरा ही दिल को भा गयी थी ।
बङी क़यामत चीज़ है चौबे जी । मगर
क्या करें ये मर्द का दिल है
नहीं मानता कि जूठी पत्तल चाटें । चाहे
दो ही कौर खाया पर है तो पराये मर्द
की जूठन ही ।इनसे
पूछो कि दो बच्चों का बाप ढाई साल
एक औरत के साथ रहा ये
कितनी परायी औरतों की थूकन है
कि नहीं । इतनी घटिया सोच के इंसान
किसी की उजङी जिंदगी नहीं बसा सकते
। सिर्फ खिलवाङ कर सकते हैं ।आज ये हारकर मादा समझकर आया
लङकी तमतमायी हुयी खङी थी ।
साक्षात् रति की मूर्ति । लाला जी ने
चुपचाप लड्डू वापस थाली में रखा और
टोपी सँभालते थके हारे बाहर निकल आये

चौबे जी लङकी के भाई को दूसरी तसवीरे
विवरण कुंडली दिखाने में लगे पङे थे ।
©®¶©®¶©®
Sudha Raje
सुधा राजे ।
Oct 12, 2013
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