Monday, 13 January 2014

अकविता :-डायरी एकांत और भीगे पन्ने

Sudha Raje
पर्वतों के उस पार घाटियों से परे दूर
बहुत दूर झरबेरियों के जंगल के बार
बबूलों के बीहङों से दख्खिन
की पठारी से पहले वाले जामुन पलाश
आम नीम पीपल वाले गाँव में एक दिन
बिलकुल ऐसा ही सन्नाटा था बिलकुल
ऐसी ही शांति बिलकुल ऐसा ही एकांत
और इसी तरह गूँज रहीं थी दूर राजपथ से
आते जाते वाहनों की लयबद्ध आवाजें ।
किसी को सहन नहीं हो रहे थे सपनों के
शांत निर्विकार एकरस रंग न
किसी को भा रहा था गीतों का तरल
एकांत ।
सात गाँव पाँच देश नौ नदी पंद्रह
पहाङ तक खोज कर कोलाहल के हवाले
कर दिये गीत और सब लौट गये अपने अपने
घर सबने सोच लिया और छंदों ने मान
लिया गीतों को सुर साज और
श्रोता मिले एकांत खत्म हो गया ।
कागज़ों से बाहर गीतों ने झाँककर
देखा और दहशत से मुँह छिपा लिया ।
अब इस पार पहाङ की तराई में ईखों के
मैदानों में धानों की महक के पास
भूविखंडन की वादियों से ऊपर बरफ के
करीब न अब सपने उग सकते थे न
ही एकांत गा सकता सकता था ना गीत
नाच सकते थे ।
ये सूखी नदी के बाढ़ वाले दिनों की बात
है जब से वहीं रह गया एकांत बचा है
तो शोर का मुखर सन्नाटा औऱ
एकाकी बीहङों के विस्तार में पसरे
दोआब तक अब कोई
नहीं जानता कि यहाँ शोर ही शोर है
और गीत गाने के लिये
चीखना नहीं गुनगुनाना होता है । अब
भी वही सन्नाटा है उस पार सपने थे बस
वे वहीं चुपचाप रख कर छोङ दिये थे ।
एकाकी पन न जाने किसने भूल से उपहार
में रख दिया और भीङ में अकसर लगता है
मेरे साथ मैं तो हूँ ।
कभी कभी खिङकियाँ खुली छूट जातीं हैं
और कभी कभी भीतर का शोर बाहर ले
जाता है लेकिन नहीं मिला तब से
गुमशुदा एकांत हर तरफ अजनबी चीजों के
नगर में वही एक परिचित गीत था जिसे
मैं रोज
थोङा थोङा गा सकती थी सुरबहार
का तार कब से टूटा पङा है और सप्तक
की मींड़ बेताल ही बजती है
उंगलियाँ दुखने लगीं है और बिना रोये
करुणगीत गाने से कंठ दुखता है अब समझ
आयी गाने के लिये किताब नहीं हलक
खोलना पङता है पेट से नहीं नाभि से सुर
लेना पङता है पता नहीं मैं कुछ
कहना चाहती हूँ मगर
शब्दों वाली डायरी के सब पन्ने भीग
चुके हैं
©®सुधा राजे
47 minutes ago

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