Friday, 10 January 2014

कहानी :इतना तो सह ही लूँगी

Sudha Raje wrote a new note:
Sudha RajeSudha Rajeइमरतिया!!!!
अरी ओ कलुमँही!!!! कहाँ मरगयी राँड!!!!
इस आवारा लौंडिया ने भी जी दिक्...
Sudha Raje
Sudha Raje
इमरतिया!!!! अरी ओ कलुमँही!!!! कहाँ मर
गयी राँड!!!!
इस आवारा लौंडिया ने भी जी दिक् कर
रखा है ।
जब देखो तब 'छूटी धाई घोङी भुसौरे पै
ठाङी'
आने दो आज टाँगें तोङती हूँ ।
ओ छिद्दू!!! छिद्दू बेटा!!!
इमरतियाँ की अम्माँ की हाँक सुनकर एक
किशोर लङका आ खङा हुआ । चेचक के
दागों से भरा चेहरा और गुटके से रंग दाँत
। वह दुछत्ती में बैठा अश्लील किताबें
पढ़
रहा था और रेडियो पर गाने सुनता हुआ
बीड़ी में सुलफा भर के पी रहा था ।
अम्माँ की चीख पुकार सुनकर मिट्टी से
लिपे पुते कच्चे घर के कच्चे आँगन में नीम के
नीचे मिर्च का अचार
भरती अम्माँ की खाट पर आ बैठा ।
और पनडिब्बा से सरौता निकालकर
छाली कतरने लगा । अम्माँ बोली
""चल दो पान लगा और
इमरतिया को देख
के आ तो कहाँ उङ गयी भूरी बिल्ली । ""
लङके ने इत्मिनान से पान लगाये एक
अम्माँ को दिया एक शान से अपने जबङे के
हवाले किया और गुर्राया
""
का है अम्माँ काँयें काँयें फिर शुरू??? ""
अब का हम हर वखत
इमरतिया की रखवाली में बैठे रहें???
इम्तिहान सिर पर हैं पढ़न देओ तौ ठीक
है
नहीं फेल हो गये तो नाक
तो तुम्हारी कटेगी ।बाउजी तो जैसे
जनम जनम का खार खाये बैठे हैं ।
लङका बङबङाता खपरैल के घर से बाहर
धूल उङाती गली में बने मिट्टी के चबूतरे
पर जा खङा हुआ तनकर और पूरी ताकत से
चीखा
--""इमरती sssssssssssss
घर चल मुंडी फोङ दूँगा
दूर मास्टर साहिब की बिटिया के
साथ पाईथागोरस की प्रमेय
समझती इमरती की चोटियों से
एङियों तक पसीना छूट गया ।।
वह किताबें समेटती भाभी बेतहाशा दम
छोङकर ।
""आयी दादा ""
लङका विजयी भाव से मुस्करा उठा ।
लङकी अपराधी की तरह सिर झुकाये
खङी थी ।
लङके ने उन मूँछों पर ताव
दिया जो अभी निकली ही नहीं थीं
"""फिर उस मास्टर की लौंडिया से
मिलने चल पङीं???
कित्ती बार रोका है!!!! वे लोग अच्छे
लोग नहीं हैं!!!
वो लौंडिया तो पक्की बदमाश है । पूरे
स्कूल में बदनाम ।!!!
कहते कहते भेङिये की सी गुर्राहट के
साथ
लङके ने लङकी को पीटना शूरू कर
दिया । लङकी जमीन पर गिर पङी ।
चोटियाँ पकङ कर फिर उठाया और फिर
पीटना शुरू कर दिया ।।
""नहीं दादा अब कब्ही कब्ही भी नईँ
जाऊँगी """
लङकी चीख रही थी मार
खाती जाती और हाथ जोङती जाती ।
लङके ने अब नीम की झुकी डाली से
टहनी तोङी और साँय साँय हवा में
भाँजी । लङकी का हलक़ सूख गया वह
आतंक से चिल्लायी ।
""दादा नईँ नईँ दादा नईँ
अम्माँ बचा लो अम्माँ अब
कभी नहीं जाऊँगी ""।
अम्माँ ने चोटी पकङ कर दोहत्थङ पीठ
पर ठोके और गालियाँ देनी शुरू कर दी
"""कुतिया रंडी छिनाल हरामखोर
आवारा!!!!!!! मैं यहाँ अचार
का मसाला कूटने को कबसे बैठी हूँ तू
वहाँ उस बदमाशन के साथ मौज ले
रही है। """
लङकी के होंठों से खून बह
रहा था चोटी खुल गयी बाल बिखर गये
और वह खटिया के नीचे घुसी पङी थर थर
कांप रही थी ।
लङके ने अहसान दिखाया ।
"""देख लो अम्माँ कहे देता हूँ अबके घर से
बाहर मिली तो टँगङी तोङ दूँगा ।एक
तो इंटरमीडियट की पढ़ाई ऊपर से
ट्यूशन
मास्टर को कुछ समझाना नहीं आता और
क्लास टीचर है उस बदमाशन मीनू
का बाप । जो लौंडिया तो सँभाल
नहीं सकता मैथ का खाक़ पढ़ायेगा ।
हमने
तो कहा था आर्ट लिये लेते हैं बाउजी के
मारे चले तब न!!!! अरे आर्ट पढ़के भी आई

एस बन गया मंटुआ का भाई । """
अम्माँ अहसान मानती भारी भरकम
जिस्म को ठेलती उठी और अंदर घी दूध
मलाई डालकर सत्तू घोलकर ले आयीं ।
लङके ने कटोरा भर सत्तू खाया । आँख
बचाकर अम्माँ के कूल्हे पर
धोती की लपेट
में रखे रुपये जेब के हवाले किये और
गुनगुनाता हुआ घर से बाहर निकल
गया कहके कि जा रहा है नोट्स बनाने ।
इमरतिया खाट से बाहर निकली हाथ
मुँह
धोये और अमचूर राई हल्दी मिर्ची कूटने
बैठ गयी । लोहे का भारी "खल -बट्टा"
चलाते वह कल्पना कर रही थी कि ये
मोटी गाँठें हल्दी की नहीं छिद्दू
की खोपङी है । और हाथ तेजी से चलने
लगे
दाँत भींचकर । सारा काम निबटा कर
लालटेन माँजी और अटारी में रखने
गयी तो देखा छिद्दू की टेबल पर
किताबों के बीच अश्लील किताबें दबी हैं
। रंग देकर उत्सुकता वश खोल ली और
पढ़ना शुरू किया तो सनसनी रहस्य
रोमांच का सन्नाटा खिंच गया ।
""तो यो पढ़ते हैं छिद्दू दादा!!!! मैं
अभी बाऊजी को बताती हूँ ।
सोचते सोचते वह
मिट्टी की बनी सीढ़ियाँ उतरती जा
रह
तभी आँगन से बाऊजी की पुकार
सुनायी दी ।
""इमरत!!!
बेटा पानी लाना तो ।
वह जल्दी से पीतल का लोटा माँजकर
गुङ
चने और भूजा लेकर बाऊजी के आगे
जा पहुँची ।
हाथ पाँव धोकर बाऊजी ने गुङ चने
भूजा खाकर
पानी पिया वरदी उतारी और खपरैल
वाले पौर की लकङी की एक
बङी सी खूँटी पर टाँग दी ।
इमरती ने हाथ में
थमी किताबों का बंडल
बाऊजी के आगे रख दिया ।
""पढ़ते हैं छिद्दू दादा ""
बाऊजी लुटे पिटे ठगे से देख रहे थे । साथ
में बटोर लायी थी बीङियों और
सिगरेटों के टोटे ।
छिद्दू हमेशा ऐसी चीजें संदूक में
ताला लगाकर बंद करके जाता था । उस
दिन धोखे से वह भूल गया ।
इमरती दसवीं में पढ़ती थी । छिद्दू हर
कक्षा में दो साल कभी सपली मेंट्री से
निकलता जबकि बिना ट्यूशन के
रोटी चौका बाशन मसाला अचार
पापङ
झाङू सँभालती इमरती हर साल पास
हो जाती । बाऊजी चपरासी की पोस्ट
पर आठवीं करके भर्ती हुये
सो बङा अरमान था बेटे को इंजीनियर
बनाने का । मास्टर की बिटिया मीनू
ने
बताया था कि छिद्दू दादा बदमाश है
और उसको छेङता था । उसने पापा से कह
दिया तो उसके साथियों सहित
प्रिंसिपल ने मुर्गा बनाया था सबको ।
इमरती लङकियों के स्कूल में
पढ़ती थी जहाँ साईंस नहीं थी । वह
गणित पढ़ने मीनू के पास
चली जाती थी वे लोग अभी चार साल
पहले किरायेदार बनकर आये थे पंडित
जी के मकान में वहाँ झूला था गुड्डे
गुङियाँ और कैरम
भी जो कभी कभी इमरती भी सब
सहेलियों के बीच खेल लेती । हर पिटाई
के बाद एक दो सप्ताह वह जाना छोङ
देती थरथरा कर । फिर जैसे
ही अम्माँ लापरवाह होतीं सतसंग में
जातीं या सो जातीं वह पाँव दबाकर
बेंड़ा खोलकर चुपके से निकल जाती ।
मीनू
समझाती मत आया कर जब इतनी मार
पङती है । इमरती बताती मार
तो रोज
ही किसी न किसी बात पर पढ़नी है ।
बस जब तुम्हा
घर आऊँ तो जानलेवा पङनी है । तो फिर
पढ़ाई ही जो पूरी कर लूँ । मीनू का घर
प्यार का मंदिर लगता । माँ चाय दे
जाती दोनों को अक्सर नमकीन और
बिस्किट भी । मीनू को लगता काश
मेरी माँ ऐसी होती ।तब झुरझुरी छूट
जाती गालियाँ और दुहत्थङ याद आ जाते
।,
*******
रात को आँगन में उपन्यासों का ढेर जल
रहा था । अश्लील
किताबों की होली जला दी थी इमरती
बाऊजी ने । अम्माँ हा हा कर करतीं रह
गयी मगर छिद्दू की जमकर
पिटायी हुयी । इमरती पर जब नीम
की टहनी से मार खाते छिद्दू की नजर
पङी वह मुस्कुरा रही थी । छिद्दू ने
ठान लिया इस मुस्कान का हिसाब
जल्दी चुकाऊँगा ।
इमरती बाऊजी के साथ ज़िद करके
चली गयी कस्बे में किराये के कमरे पर
रहने जहाँ बाऊजी और कुछ पुलिस
वालों के
परिवार रहते थे ।
वहाँ गोपी पढ़ने में मदद कर देता छोटे
दरोगा जी का बेटा ।
इमरती के सपने जवान होने लगे । उस
दिन जो किताबें पढ़ीं थी दो तीन पेज
सब दिमाग में थरथरा जाते ।
गोपी की माँ नहीं थी इमरती कभी कभी
बनाकर दे आती । सपने गोपी के
भी जवान होने लगे थे । एक दिन
चिट्ठी लिख दी गोपी ने इमरती को ।
छिद्दू जब पैसे लेने आया गाँव से
तो इमरती की क़िताब देखने लगा ।
इमरती को पता ही नहीं था कि उसमें
गोपी ने कुछ रखा है वह अभी सिर्फ
सोचने तक ही डर डर कर लौट जाती ।
छिद्दू हँसा बङी जोर से ।
चिट्ठी बाऊजी के हाथ में थी ।
बाऊजी ने आव देखा न ताव कमर से बेल्ट
निकाली औऱ चोरों मुज़रिमों की तरह
इमरती को पीटकर अधमरा कर दिया ।
*****
इमरती की शादी हो गयी । रो धोकर
इमरती ससुराल आ गयी । बूढ़ा ससुर
खटिया पर बैठा हर वक्त
इमरती को घूरता रहता । घूँघट डाले
कई
दिन हो गये घर में सास ननद
नहीं इमरती सारे काम करती ।
सोचती पति कैसा मिला??? सुबह
ही निकल जाता दुकान पर रात देर
को आता सो जाता ।
धनिया मिरची बसाते रहते । शहर में
किराने की दुकान थी पक्का घऱ गाँव में
बिना दहेज इकलौता गोरा लङका ।
एक महीना बीत गया । एक रात को
इमरती ने पति के सो जाने पर कमरा बंद
किया किताबी अंदाज़ में काले
अंतः वस्त्र पहने औऱ पति की पीठ से
जा चिपकी ।
उसकी उंगलियाँ जहाँ तहाँ भटक
रहीं थीं
आदमी की नींद खुल गयी ।
"""बावली हो गयी क्या?? ये क्या कर
रई है??
उसने बत्ती जलाई
सजा धजा कमरा जगमगा उठा ।
काले अंतः वस्त्रों में
इमरती का मेहनती ठोस बदन
पुरानी चोटों के दागों सहित दम
दमा उठा ।
किताबी अंदाज़ में उसने अँगङाई ली।
आदमी आगे बढ़ा इमरती को बाँहों में भऱ
लिया उसके हाथ इमरती के ज़िस्म पर
भटकने लगे ।
वह हाँफ गया ।
इमरती के सपने जल कर खाक हो गये
उसके मुरदा जिस्म में जान नहीं पङी ।
लेकिन थोङी ही देर बाद वह
इमरती की छाती पर पाँव रखकर जूते से
उसे पीट रहा था ।
हर्रामजादी बदन में इतनी आग लगी है
तो कोठे पे जा के बैठ जा ।
जी भऱ के पीट कर जब वह थक
गया तो इमरती के पैर पकङ कर फूट फूट
कर रो पङा ।
!"मुझे छोङ के चली जा तू ""
अपने किसी पसंद के लङके के साथ ...
मैं तेरे लायक नहीं हूँ । वो तो बापू ने
जबरन शादी करा दी ।।मन में सोचके
गरीब
की लौंडिया है । खाने पहनने
को तरसी हुयी है।पङी रहेगी दूध
घी सोना देख के ।मैने सोचा बापू
को रोटी तो तमीज की मिलन
लगेगी बस
जाईसे ब्याह कर लियो ।
इमरती चुपचाप उठी ।कपङे पहने कमरे के
कोने में रखी मच्छर
दानी की लाठी उठा लायी ।
"""लेओ लाला जी रोज
की सौ लाठी मारियो इमरती उफ्
भी नहीं करेगी । पर अब जे घर छोङ के
दूसरा करबे वारी बात कतई सें बी कतई
तक मती बोलियो ।""
आदमी ने लाठी हाथ में ले ली और तोङ
दी ।
"""ये घर तेरो ।मैं तेरो नौकर।
कभी कानी उंगली से भी चोट लगाऊँ
तो साँप काटे ।""
इमरतिया बच्चे की तरह पति का सिर
गोद में रखे सोच रही थी ।
सौदा बुरा नहीं सुना है चंपा का मरद
दारू पी के हाथ पाँव तोङ के मायके पटक
गया दहेज में राजदूत माँगी है ।
^^^^
इमरतिया मायके आयी है ।
अम्माँ को कलकतिया साङी । छिद्दू
को जीन्स टी शर्ट और बाऊजी के लिये
चमङे का दरोगा जी जैसा बैग लायी है ।
बायने में टिपारे की सब मिठाई मावे
की बादाम वाली ।
शाम को सब मुहल्ले की औऱतों से
अम्माँ कह रहीं थीं
""ऱानी बनाकर रखते
है पहुना ।"
छिद्दू बोल पङा
"""औऱ हार नहीं देखा इमरती का पूरे
सात तोले का ""
वापस ससुराल आकर जब इमरतिया ने
बटुआ
खोला तो मुसकुरा पङी उसमें रखी एक
जोङी पायलें गायब थीं ।
आदमी से कहा तो बोला । गिर गई
तो गिर जाने दो दूसरी ला दूँगा ।
इमरती पायलें पहनकर बार बार पैर
बजा रही थी ।
इतनी मार खायी देवा अब दर्द
नहीं होता ।
गाय रँभा रही थी वह पानी पिलाने
चल
पङी ।धोती के छोर से आँसू पोंछे गर्व से
सिर उठाया माँग में सिंदूर दमक उठा ।
ससुर की खाट अगले दिन से पौर
में बाहर डाल दी।
चाभियाँ कमर पै खनक रहीं थी ।
इतनी चोट सह लूँगी©¶©®¶
sudha Raje
सुधा राजे ः
Jun 13

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