Thursday, 9 January 2014

हे मेरे उत्तर प्रदेश?????

हे मेरे उत्तर प्रदेश!!!!!
मुझे मुक्ति दे दो ताकि मैं अपनी उस भूल
का सुधार कर सकूँ कि मुझे एक दिन
लगता था यही भारत का सर्वोत्तम
प्रदेश है और यहीं सब कुछ सुंदर ।
किंतु देख लिया कि सङकों के किनारे
किनारे के सारे शीशम साल नीम बरगद
पीपल कट गये और बचा है पॉलिथीन
का नरक ।
खेतों में बाढ़ के बाद भर गयी है रेत और
दलदल और जो खेती बची है वहाँ नहीं है
अब खेती करने से लाभ
क्योंकि गर्मियों में आ जाते हैं भेङिये
गीदङ तेंदुए और जाङों में नीलगाय सुअर
हाथी अजगर और बरसात में दुर्गम
हो जाता है खेतों तक जाना भयंकर
विषैले जीवों से प्राण बचानाऊपर से आ
जाती है हर साल बाढ़ और रह जाता है
विकराल विनाश ।
क्योंकि नगर के प्रवेश पर बने है
करोङों की लागत के भव्य द्वार किंतु
नहीं है रैन बसेरे यात्री विश्रामगृह
बेघरों को आसरा और नहीं है
बच्चों को खेलने के लिये मैदान
स्त्रियों को टहलने चहलकदमी करने
को सुरक्षित वृक्षपथ ।
क्योंकि लगा रहता है हर पल डर घर से
कहीं भी जाते समय ताले कट जाने और
गृहस्थी चोरी हो जाने का ।
नहीं होती कभी रात्रिकालीन गश्त
और नहीं कभी रात में घूमती है पुलिस
जागते रहो की सीटी पर ।
कभी नहीं देखे गश्ती सिपाही बस्ती में
रात या दिन में घूमते । हाँ अकसर
लोगो के घरों में रातों को मचते हैं शोर
चोर चोर चोर ।
डर ही डर है कि हर तरफ चिपके हैं
अशलील पोस्टर अकसर सीडी वाले
की दुकान पर भऱे पङे है अशलील
चलचित्र गीत और बजते रहते हैं हर तरफ
कानफोङूँ बाजे ध्वनिस्तारक और कोई
भी नहीं है दर्द निवारक ।
नहीं होती कोई सुनवाई जब
नहीं होती देने को कङक
कागज़ी पत्तियाँ और नहीं लेना होता है
वोट ।
रिश्ते तक तो माँगते हैं हर कदम हर
खुशी मदद मुलाक़ात के बदले नोट
अगर लग गयी कोई गंभीर चोट
तो नहीं है कोई अस्पताल नहीं है
दवा नहीं है सही पहचान को चिकित्सक
उपचार और तीमारदारी ।
अकसर मौत ही बनकर आती है गरीब और
आम आदमी को चोट या बीमारी।
डर डर डर
हर समय दाङी वालों से भगवों से
त्रिशूलों चापङों खंज़रों लाठियों तमंचों

मेले में बाज़ार में मंदिर पे मज़ार पे ।
अस्पताल थाने
पाठशाला कचहरी गली मुहल्ले खेत जंगल
दरबार पंचायत और घर घेर बाऱ् ह में
डर डर कर मर मर जीतीं है न जाने
कितने कङवे सच पीतीं हैं स्त्रियाँ
कोई नहीं सुनवाई
क्योंकि गरीब की लुगाई जगत
की भौजाई
आम आदमी की जोरू डंगर ना गोरू।
घर की जनानी औक़ात से नान्हीं
चुप रहे तो सहे ।
बोले तो जगहँसाई
डर डर
सिपाही से डर
नेता से डर
गुंडे से डर
मौलवी से डर
साधु से डर
धनवान से डर
भगवान से डर
शैतान से डर
नहीं डरते तो लोग नहीं डरते संविधान
से कानून से जेल हवालात कचहरी नरक
पाप परपीङा से नहीं डरते
एक
तरफ भूख बीमारी ठंड बाढ़ गरमी जहर
दंगे आग सङक दुर्घटना से मरते रहते हैं
लोग
दूसरी तरफ
उत्सव ही उत्सव
नाच गाना शराब कबाब शबाब नबाब।
बेहिसाब लाजवाब
जो जिस जाति का नेता सत्ता में
आजाता है गली गली उसकी जात
वालों का ही रौब ग़ालिब
हो जाता है।
हर
महकमें बंद हो जाती है उनके
विपक्षियों की सुनवाई.
बचा वही जितने सत्ता की पगधूल माथे
लगाई
कहीं बनते हैं करोङों के हार हीरे
हाथी और प्रतिमायें।
कहीं केवल एक ही मजहब
को बाँटी जाती हैं रेवङियाँ
और सिसक कर घुट घुटकर
दम तोङती रहती हैं
आम मामूली हैसियत के घर विलक्षण
प्रतिभायें।
करते रहते हैं लोग पलायन
सत्ता करती रहती है जात मजहब
भाषा का विषैला गायन
बाहर भी होते हैं अपमानित
ओहह भइये ! !ये वासी हैं उत्तरप्रदेश के
बीज हैं ईर्ष्या कलह कुंठा कलेश के
मैं ये सब सह नहीं पा रही हूँ
बहुत कुछ ऐसा है जो कह नहीं पा रहीं हूँ
छोङकर जाऊँ कहाँ
और चैन से रह भी नहीं पा रही हूँ
काश मिल जाये सपरिवार बाहर
कहीं रोजी दाना पानी ठौर सुरक्षित
समुचित पर्याप्त ठिकाना सच कहती हूँ
कभी नहीं चाहती हूँ
पर्यटन तक को उत्तरप्रदेश आना
एक तरफ करोङो रुपये फूँककर
ठुमकों का आनंद लेती सरकार एक तरफ
-4°पर मरते लाचार!!!
प्रायवेट अस्पताल में नॉर्मल
डिलीवरी चार्ज पाँच हजार और
जानबूझकर सीजेरियन करके
वसूलती डॉक्टर तीस हजार और नहीं है
इनके पास पर्याप्त सुविधायें ऑक्सीजन
एसी ऑपरेशन थियेटर ब्लड बैंक और
रहा सरकारी अस्पताल??????? मत
पूछिये डिलेवरी रूम में हर तरफ गंदगी और
लालटेन की रोशनी अँधेरा और दुष्ट
घूसखोर दाईयाँ ।।इसीलिये घर पर
ही जचगी कराने में
कभी बच्चा कभी जच्चा मर मर जाते है
कई घर बसने से पहले उजङ जाते हैं।
अकबरपुर और सैफई की चकाचौंध के पीछे है
काला सच कि आजादी के पहले अंग्रेजों के
बनाये राजपथ पुल सब उखङ चुके है मंदिर
मस्जिद गुरूद्वारे उजङ चुके है नही रहते
नर्स और डॉक्टर कभी भी गाँव कसबे के
असपाल में कोई अंतर नहीं बचा है
स्वास्थ्य केन्द्र और घुङसाल में
रास्तों पर बङे बङे खड्डे है और गायब है
पुलों की रैलिंग रात दिन
बांगलादेशियों विदेशियों को नागरिकता प्रमाण
पत्र जुटाने के लिये स्थानीय नेता और
कर्मचारी करते हैं ब्लैकमेलिंग
कोई भी चुनाव होता है जगह जगह
पानी का नहीं हरयाणवी और जंगली अवैध
कच्ची शराब का भराव और दबंगी के कंबल
साङी कपङे बिरियानी कबाब मिठाई
शीतल पेय नकद प्रति व्यक्ति वोद दर
बढ़ाकर जीतने का दबाब होता है
जिसकी लाठी में दम होता वही काट
लेता है कमजोर किसान के खेत की मेङ और
डौल । घरों के आँगन भीतर
छतों की नाली पङौसी ने कमजोर
पङौसी के आँगन में खोल आबचक के नाम पर
जिसके घर में पुरुष ज्यादा ताकतवर होते
है वही कब्जा कर लेता है नाली पर
न्याय तो क्या होता रपट भी कब
जल्दी लिखी जाती है कोतवाली पर
श्मशान के पेङ काट कर घर को चार
मंजिला बनवा लेते है परिषद और
समिति वाले । दूसरी तरफ गरीब
की मौत पर कफन और लकङी तक के लाले
अधजली चितायें भँभोङते स्वान और तुरत
फुरत बाप बाबा को जलाकर कर लेते है
तेरहवीं गंगास्नान
गंगा में बहता है बूचङखानों का और
शौचालयों का नर्क क्या है अब
सुरसरि और वैतरणी में फर्क़?
हर किसी को कर दिया जाता है बे वज़ह
मुचलका पाबंद!!! कहीं पटवारी निकाल
देता ग्राम
की कटौती का बहाना तो कहीं घर
कुनबा ही हो जाता है विरोध में गोलबंद
। जिनके घर नहीं है पाँच जवान बेटे
वहीं माँ बाप बे क़दर पग पग की धूल समेटे
। हर तरफ है त्राहि त्राहि परंतु कोई
नहीं देता आँखों देखे अन्याय की गवाही
यहाँ ज़िन्दा ही नहीं रहता ज़मीर
वाला । जिसकी जितनी लाठी और
चालाकी मक्कारी उसका उतना ही बोल
बाला
रामलीला और नुमाईश पर नाचती है
नचनियाँ । और जुये शराब लालबस्ती जाने
को बेची जाती घरवाली की नथ और
पैजनियाँ ।जमकर हुङदंग मचाते है
शराबी । रुपया रुपया रुपया और जिसके
पास नहीं है
रुपया उसकी ही तबाही उसी की खराबी
बूचङखाने बन चुके हैं जनाने अस्पताल
जहाँ हर रोज होती है कन्यायें हलाल ।
जिसको जो ना भी हो बीमारी बस लग
जायेगी हज़ार चली जाये डिलेवरी कराने
अस्पताल सरकारी या खा ले सङक
किनारे बनता लुभावना मिलावटी आहार
जिसके पास नहीं है देने को दहेज
उसकी बिटियाँ रहेगी बुढ़ापे तक
क्वाँरी या तो बेमेल
होगी शादी वरना ससुराल में
जायेगी मारी
उच्चशिक्षा के लिये नहीं है
सरकारी कॉलेज नकल घूस और गुंडई है
व्यवहारिक नॉलेज । प्रायवेट
महाविद्यालयों की आम आदमी कैसे
चुकायेगा लाखों की फीस इसीलिये
प्रतिभाशाली मामूली मजदूर किसान
का रह जाता है माथा पीट दाँत पीस
चल रही है कागजों पर
सैकङों सरकारी योजनायें कभी आते
ही नहीं मंत्री नेता कलेक्टर गाँव में लोग
सच्चाई कहीं न दे सुनाये
सङकों बसों रेलगाङियों में घूमते रहते है
ज़हरखुरानी ग़िरोह । । बहुत
बङा तबका है ऐसा जिसे बुजुरगों की ज़ान
से ज्यादा है मुआवज़े का मोह ।
कहीं भी कभी भी कोई भी मार देता है
लङकियों की पसलियों कमर पीठ पर
टहोके ।। प्रेम के नाम पर अकसर धोके
।। खिंचने के डर से नहीं पहनती सुहागिने
मंगलसूत्र ।कोई भी कहीं भी सरे आम
उत्सर्जित करने बैठ जाता है मल मूत्र
हर गाँव सङक कसबे नगर में है
मूर्तियाँ ही मूर्तियाँ । नहीं बची हैं
तो बस सरकारी दफतरों में कामकाज
की स्फूर्तियाँ
बढ़कर गाँव तक आ गये हैं नदियों के कटान
और झगङे की जङ है कब्रिस्तान खेत
खलिहान
सार्वजनिक जगहों पर सरेशाम फिरते हैं
गँजेङी भँगेङी जुआरी शराबी ।
लङकियों की पढ़ाई और नौकरी को आज
भी समझा जाता है ज़माने की खराबी।
नहीं है अनाथ आश्रम वृद्धाश्रम और
नारी निकेतन । लाखों लोग कचरे पर
निरभर फटेहाल बीमार अनिकेतन।
यातायात के नियमों का पालन
समझा जाता है तौहीन ।नाबालिग
ड्राईवर कुचल जाते है कभी बबलू
कभी जॉन कभी मोबीन।
अपहरण के बाद यदा कदा ही मिलती है
लङकी की लाश । कौन है
सगा सौतेला अपना पराया कठिन है
विश्वास
।।।
विधायक सांसद मंत्री फटाफट बन जाते
है धनकुबेर । तुझको परायी पीर
की क्या पङी रे अपनी अपनी निबेर।
©®सुधा राजे
511/2, Peetambara Aasheesh
Fatehnagar
Sherkot-246747
Bijnor
U.P.
9358874117
sudha.raje7@gmail.com
यह रचना पूर्णतः मौलिक है।

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