Friday, 10 January 2014

कहानी :-अतृप्त आत्मा /भाग 1-&-2

Sudha Raje wrote a new note:
13-07-2013///11:53///AMअतृप्त
आत्मा ::कहानी ::********मैं जब
भोपाल से चरखारी पहुँचा तो रात होने
लगी...
13-07-2013///11:53///AM
अतृप्त आत्मा ::कहानी ::
********
मैं जब भोपाल से
चरखारी पहुँचा तो रात होने
लगी थी । कार से मैं और सब इंस्पेक्टर
संभाजी काळे डाक बंगले पर पहुँचे । रात
को एगकरी और चपातियाँ खाकर जब हम
दोनों सोने गये तो कुक की तारीफ
करनी पङी । छोटे से कस्बे में
इतना स्वादिष्ट खाना मिलने हमें
उम्मीद नहीं थी
लेकिन काळे कहता
""ड्यूटी के लिये तो मैं घास खाकर
भी रह सकता हूँ ""
जबकि मैं हमेशा कुछ रेडीफूड बैग में लेकर
चलता । मिल्क पाउडर कॉफी पाउच ।
सत्तू चने और बिस्किट।
एक सत्यकथा लेखक । जो इत्तेफाक से
इंटेलीजेन्स ब्यूरो का अदना सेवक
भी था किंतु जाहिरा तौर पर पुरातत्व
खोजी शोधार्थी था ।
काळे को विभाग से मेरे साथ आने के आदेश
मिले थे सुरक्षा के लिये ।
लेकिन मुझे खोजनी थी परतें रहस्यमय
मौतों के सिलसिले की ।
बाहर दो कांस्टेबिल बरामदे में सो रहे
थे बरामदा पूरी तरह ग्रिलों से बंद
था।
रात ही मेरी संगिनी थी । टेबल पर अब
भी आधा खाली बैगपाईपर सोडामिक्स
रखा था लेकिन मैं होश में
रहना चाहता था ।
सिगरेट ऐश ट्रे में बुझाकर मैं कोट
डालकर बाहर आ गया । लॉन में चाँद
चमक रहा था । बाऊण्ड्री के दूसरे छोर
पर दो कमरों में से खर्राटों की आवाजें आ
रहीं थी । तभी लालटेन लाठी टॉर्च
लिये चौकीदार कमरे से निकला ।
""कौन??
साब आप!!! ये इलाका परदेशियों के लिये
खतरनाक है साब आप अंदर जाओ। मैं बंगले
के चक्कर लगाकर आता हूँ। ""
रूको शेरसिंह मैं भी साथ चलता हूँ ।
चलिये बाबू मोशाय!
वह हँस पङा ।
चाँदनी में चक्कर लगाते जब हम लोग छत
पर पहुँचे तो दूर शांत सफेद
काली चट्टानों के झुंड
सी तनी खङी हवेली चमक रही थी।
शायद स्ट्रीट लाईट की वजह से
आधा भाग चमक रहा था।
शेर सिंह!!!
हवेली में पिछला जो कांड हुआ है उसके
बारे में कुछ जानते हो बताओ!!! मुझे एक
कहानी मिल जायेगी । पापी पेट
का सवाल है । "
शेर सिंह ने रजिस्टर में
यही लिखा देखा था 'सत्यकथा लेखक'
वह हिचकिचाया लेकिन पचास रुपये ने
उसकी ज़ुबान खोल दी ।
संक्षेप में जो पता चला वह ये कि -
मुंबई का सारा बिजिनेस चौपट होने के
बाद रैम्जे भाई के पास वापस
चरखारी लौटने के और कोई
चारा नहीं था । बम बलास्ट
की ताबङतोङ दुर्घटनाओं में
इलेक्ट्रॉनिक्स का उनका सारा सामान
ही नहीं पूरी दुकान उस इमारत सहित
नष्ट हो गयी थी जहाँ दादर में
उनका कमरा भी दुकान के ठीक पीछे
था तीसरी मंजिल पर । सैकङों दुकाने
जल गयीं थीं अफरा तफरी मची थी ।
सरकार ने मुआवज़े की मामूली रकम
अदा कर दी थी जिसमें
किसी खोली की पगङी तक
अदा नहीं की जा सकती थी । मुंबई
जहाँ के बारे में सही विख्यात है
"नौकरी मिलेगी छोकरी मिलेगी लेकिन
रहने की जगह!!!!! न बाबा न ।
रैम्जे! यानि रामजीलाल ।
कई साल पहले अपने साथ पढ़ने वाली एक
मास्टर की शहरी लङकी को लेकर मुंबई
भाग गये थे ।
कुछ दिन दोनों परिवारों ने
थाना कचहरी और लंबी लंबी पंचायतें
कीं फिर एक मुकाम पर बोलचाल बंद और
मामला ठंडा ।शहरी परिवार दूसरे
शहर चला गया।
रामजीलाल नाबालिग लङकी भगाकर ले
गये थे सो मुंबई पहुँच कर रैम्जे हो गये ।
गायत्रीदेवी ""ग्रेसिया "हो गयीं। एक
ड्रामाकंपनी वाले दोस्त के मेहमान रहे
जब तक घर से चुराये हुये पैसे रहे और जब
कंगाली छाने लगी तो उसकी कंपनी में
बिजली मिस्त्री हो गये ।
ग्रेसिया को दिन भर बल्बों की झालरें
बाँधने में अच्छे खासे पैसे मिल जाते रात
को दफ्तर की चौकीदारी में
बङी सी मेज पर सोते सोते एक दिन एक
बिल्डिंग की चौथे माले की दुकान
किराये पर मिल गयी और रैम्जे मैकेनिक
से प्रोपराईटर ऑफ
"ग्रेसिया इलेक्ट्रॉनिक्स"" हो गये जेवर
काफी चुराये थे दोनों ने घर से
सो बिजली के सामान को पूँजी मिल
गयी । चौदह साल में धंधा चल
निकला और एक कमरे के फ्लैट सहित
निजी दुकान के मालिक हो गये ।
बरबादी कहकर
नहीं आती अलबत्ता दुबारा आबाद होने
के लिये तिल तिल मरना खटना और
सोचना पङता है। बारह साल
का बेटा साथ में लिये रैम्जे भाई जब
चरखारी के छोटे से जनशून्य स्टेशन पर
उतरे तो शाम हो चुकी थी । कस्बे में
सरदी का मौसम था और हर तरफ गेंहूँ चने
के खेत।मन में डर के साथ उम्मीदें
भी थी रैम्जे के भाई प्यारेलाल ने फोन के
ज़वाब में तसल्ली दी थी भैया आ जाओ कुछ
न कुछ रास्ता मिल ही जायेगा।
घर
घर के नाम पर छह कमरों का एक
छोटा सा मकान था आगे से पक्का और
पीछे से कच्चा । पक्के कमरे छोटे के थे
कच्चे कमरों में बूढ़े माता पिता शिफ्ट
हो गये और दो आधे कच्चे आधे पक्के
यानि फर्श पर गोबर दीवारें सीमेन्टेड
कमरे रैम्जे भाई ग्रेसिया और
ग्रेगरी को मिल गये।
मुआवजे की रक़म से तङातङ कलर
टीवी फ्रिज कूलर गैस स्टोव और एक
सेकेण्ड हैण्ड मारुति वैन खरीद ली ।
गैसकिट लगायी और छोटे के छोटे से स्कूल
के छोटे से ग्राउण्ड में खङी कर दी।
बच्चे कम थे और ज्यादातर पैदल
ही मीलों दौङकर जाने वाले
देसी छोकरे। खरचा कैसे निकले ।
ब्यूटी पार्लर और रेडीमेड बेकरी फूड
की आदत कम की गयी मगर बात
नहीं बनी।
मुंबई रिटर्न बाबू
को खासी प्रसिद्धि और स्वीकृति मिल
गयी थी रहन सहन और शक्ल सूरत से
फॉरेन रिटर्न लगते तीनों । हर कोई
बात करने को उतावला रहता । आखिर
छोटे से मिलकर तय किया कि स्कूल
पार्टनरशिप पर चलाया जाये और
बङी इमारत बङे ग्राउण्ड वाली जगह
शिफ्ट कर लें ताकि कुछ साईड बिजनेस
किताबें ड्रैस वाहन किराया और डांस
आदि के कोर्स से भी कमाई हो सके ।
वहाँ से कुछ मील दूर एक
हवेली थी "नवरतन पैलेस"
वीरान इस हवेली में कोई
नहीं रहता था। हवेली भुतही विख्यात
हो चुकी थी । किसी समय शानशौक़त
वैभव का नायाब नमूना रही होगी।
रैम्जे भाई बीबी को कस्बा घुमाते घुमाते
जब वहाँ से निकले तो ग्रेसिया ने पेशकश
कर दी हवेली को पट्टे पर लेकर स्कूल
खोलने की ।
चालीस कमरे विशाल आँगन सामने
खुला मैदान और मैदान से आगे तालाब
पीछे प्राचीन मंदिर बावङी और उसके
पीछे दूर तक हरे भरे खेत उसके भी पीछे
घने जंगल करधई कीकर बबूल पलाश
सागौन बेर नीम शिरिष सलईय़ा औऱ खैर
के ।
रैम्जेभाई को पता था कि बचपन में धोखे
कभी इस ओर निकल आते तो दादी और
अम्माँ तमाम राई नमक धूनी गूगल
लौहबान गंधक जलातीं भूत भगातीं थीं ।
डर से कुछ सिहरन सी फिर गयी रीढ़ में
। ग्रेसिया ने सारी बातें सुनकर
बङा मजाक बनाया । मुंबई में तो लोग
कब्रों तक पर रह रहे हैं ।
हवेली की शान और मालकिन होने
का ख्वाब पाले ग्रेसिया ने जब सुझाव
दिया कि
""मुंबई से जान पहचान के आर्टिस्ट
यहाँ आकर शूटिंग करेगे तो करोङों मिलेंगे
ऐसी लोकेशन मिलती कहाँ है!!!!
रैम्जे भाई की समझ में सब आ गया ।
दो चार दिन में ही उन्होने हवेली के
वारिस औऱ
स्वामियों का पता लगा लिया ।
पता चला कि मालिकों का परिवार
तो खत्म हो गया जङ मूल सहित लेकिन
मरने से पहले
हवेली पुजारी को गिरवी रखी थी फिर
कई हाथों से गुजरता हुआ
बैनामा वर्तमान में एक पंडा जी के कब्जे
में है ।
उन्होने इसमें किरायेदार भऱ दिये थे ।
जो रहस्यमयी मौतों का शिकार हो गये
। बचे खुचे भाग गये । तब से जो किस्से थे
और पुख्ता हो गये ।
रैम्जे भाई ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे लेकिन
ग्रेसिया के सामने कायर और बैकवार्ड
नहीं कहलाना चाहते थे । पंडा जी खुश थे
कि भागते भूत
की लँगोटी ही मिली वरना अब तक
पछता ही रहे थे। हवेली दस साल के लिये
किश्तों में मूल्य अदायगी की शर्त के
साथ दे दी।
छोटे की बीबी ने लाख समझाया मगर
दौलत का लालच बङे डर से भी बङी चीज
है।
स्कूल हवेली में शिफ्ट हो गया ।
दूसरे ही दिन दो दरजन स्थानीय
बच्चों ने नाम कटवा लिया ।
लेकिन ग्रेसिया रैम्जे भाई ग्रैगरी के
साथ वैन से गाँव गाँव प्रचार को गये
आसपास के पचास किलोमीटर व्यास
का दायरा उनके प्रभाव में आ गया स्कूल
चल पङा । नारियल तोङ फीता काट
तहसीलदार साब उद्घाटन कर गये। कुछ
रिक्शे लग गये।
घर के कच्चे कमरों की तुलना में हवेली के
''गच"के फर्श और तीन तीन फीट आसार
की चौङी दीवारे भव्य रहन सहन लुभाने
लगा और ग्रेसिया एक दिन जिद करके
हवेली के बायें तरफ ईशान कोण में बने
अतिथि गृह कहलाते तीन कमरों वाले
पोर्शन में रहने आ गयी ।
सुख और आराम के पल पूरे सोलह साल बाद
जीवन में आये ।
ग्रेसिया भूल गयी कि वह एक
मामूली परिवार की मामूली मजदूर
स्त्री रही है ।
हवेली की पुरानी पेंटिंग्स देखकर पुराने
रहन सहन जीवन वैभव में
खोती जा रही थी वह मन ही मन
कल्पना करती कि वही इस आलीशान
महल की रानी है ।उसने ठीक
चित्रशैली के कपङे पहनने की कोशिश शुरू
कर दी । चंदेरी से साङिया महोबा से
नकली मोती और पॉलिश वाले गहने ले
आयी ।
हवेली के चालीस में से सिर्फ बीस कमरे
ही खोले गये थे। बाकी दस में
सारा कबाङ औऱ फर्नीचर भरा था ।
शेष दस कमरों का एक पोर्शन
जहाँ हमेशा ताले पङे रहते कोई
वहाँ जाता ही नहीं ।
ग्रेसिया को एक दिन लगा कि हवेली में
बॉयज हॉस्टल चलाया जा सकता है ।
तो उसने कबाङ वाले कमरे खुलवा डाले ।
वहाँ कोई कीमती सामान
नहीं था लेकिन प्राचीनता की वजह से
हर चीज संग्रणीय थी । छोटे के
मना करने के बावज़ूद सारी चीजें
झाँसी ग्वालियर आगरा की एंटीक
की दुकानों पर जा पहुँची । उस दिन
ग्रेगरी तालाब में डूबते डूबते बचा ।
पूछने पर बचाया कि वह सीढ़ियों पर
बैठा मछलियों को 'लाई'
खिला रहा था कि किसी ने पीछे से
धक्का दे दिया । वहाँ कोई
था ही नहीं । जरूर कोई लङका भाग के
किसी पेङ के पीछे छिप गया होगै ।
बात आई गई हो गयी । छोटे के मन में
खटका लग गया । उसने दो चार दिन में
प्रस्ताव रख
दिया कि भैया पूरा ही स्कूल
तुम्हारा मेरी तो लागत और मेहनत
का पैसा दे तो पास के कस्बे में
किताबों की दुकान खोल कर एक
टैक्सीकार भी डाल दूँ ।
छोटे के अलग होने से ग्रेसिया खुश थी।
अगले हफ्ते उसने पंडा जी से शेष दस
कमरों की चाभियाँ माँगी । पंडा जी ने
ताक़ीद की कि वे कमरे खुलते ही अनिष्ट
होता है । ग्रेसिया ने तसल्ली दी औऱ
चाव से हवेली आकर ताले खोल डाले । वह
चकित रह गयी । सारे कमरे एक पृथक
मकान नुमा पोर्शन बनाते थे जिसके आँगन
में पाँच कमरे नीचे फिर तीन ऊपर फिर
दो कमरे सबसे ऊपर की मंजिल पर थे ।
पूरी हवेली इस तरह चार सर्वथा पृथक
आँगनों से जुङे विशाल आँगन में
मिलती थी जो एक स्थानीय
चौकचितेउऱ की रंगोली का डिजायन
होता था। जिसे सुरांती कहते हैं।
कमरे सजे धजे औऱ नये के नये थे । सबमें पलंग
सोफे टेबल औऱ फानूस लगे हुये थे ।
कीमती कालीन दीपाधार
फायरप्लेस तक सही सलामत थे ।
कमरों में अजीब सी खुशबू फैली थी।
ग्रेसिया पागलों की तरह नाच
सी उठी ।
भागी भागी रैम्जेभाई को पकङ कर ले
आयी । एक पलंग से दूसरे पर लोटती वह
रानियों महारानियों की तरह अकङ
कर चलने का अभ्यास करने
लगती कभी हँस पङती । सारे सपने यूँ पूरे
हो जायेंगे कभी सोचा भी नहीं था।
ग्रेसिया ने उस रात वहीं सबसे ऊपर
वाले सबसे आलीशान कमरे में सोने
का फैसला किया । रैम्जे का डर निकल
चुका था । एक खंड में चालीस लङके दस
कमरों में रहने लगे थे ।
आधी राज के बाद जब
सारा कस्बा सन्नाट में डूबा था तेज
चीख सुनी
शेष
14-7-13//3:07AM--*कहानी*
""अतृप्त आत्मा::द्वितीय भाग::
==========
चीख की आवाज़ से सारा क़स्बा जाग
गया ।
सारा क़स्बा जाग गया ।
कुछ बुजुर्गों के मना करने के बावज़ूद
उत्साही नौजवाव लाठी डंडे टॉर्च
लेकर हवेली की तरफ दौङ गये । मैं
भी तब ज़वानी को जोश में
था बनर्जी साब!!!!
लेकिन जो देखा उसे याद करके आज
भी झुरझुरी छूट जाती है ।
हॉस्टल की वार्डेन हवेली के विशाल
आँगन में गिरी पङी थी धङ पर सिर
नहीं बचा था कई टुकङों में बिखर
गया था दूर दूर तक । हॉस्टल के लङके
सब एक कमरे में इकट्ठे होकर कुंडी अंदर से
बंद करके चुपचाप डरे सहमे बैठे थे ।
हम सब ऊपर पहुँचे तो ग्रेसिया कमरे के
बाहर बरामदे में बेहोश पङी थी और
रैम्जे बेधङक सो रहा था ।
हम सब लगभग बीस नौजवानों की आवाज़
से भी जब वह
नहीं उठा तो पता चला वह नशे में है
या बेहोश है ।
उनका बच्चा ग्रैगरी लङकों के साथ
ही हॉस्टल में पढ़ाई करने सोता था।
पुलिस सुबह तङके ही आयी और साफ
सफाई की गयी ।
ग्रेसिया और रैम्जे दोनों को दूसरे
शिक्षक अस्पताल ले गये ।
और लौटकर
बताया कि ग्रैसिया हृदया और
पैरालायसिस अटैक से मर गयी । रैम्जे ने
उस रात जमकर शराब पी थी कि वह
बेसुध था ।
लङके दहशत में एक एक करके हॉस्टल
छोङते चले गये और मजबूर रैम्जे बेटे के साथ
हवेली में अकेला रह जाता हर रात
क्योंकि घर का हिस्सा वह छोटे को बेच
चुका था। हवेली के
अंदरूनी दसों कमरों में फिर से ताले डाल
दिये गये थे । दो साल तक कोई
अनहोनी नहीं हुयी। लोग उस रात
को हादसा समझ कर भूलने लगे । रैम्जे ने
सादगी पूजापाठ और प्रोटोकोल
अपना लिये थे दिन को दो बजे स्कूल के
बच्चों के जाने के बाद ताले लगा कर वह
सिर्फ अतिथिशाला तक सीमित रह
जाता । हर कक्षा और दफ्तर में उसने सब
धर्म की तसवीरें लगा रखीं थीं ।
एक दिन एक लङका चोरी के इरादे से बंद
भाग में चला गया । पता नहीं उसने
क्या चुराया या नहीं लेकिन लेकिन उसने
घर जाकर दूसरे ही दिन
फाँसी लगा ली।
लोगों ने इस बात को हवेली से
जोङा लेकिन रैम्जे
नहीं माना घटना दूसरे गाँव में
घटी थी।
कुछ जुगाङ से रैम्जे ने वहाँ एक
दंपत्ति को किरायेदार बनाकर रख
लिया जो शहरी थे लेकिन
आदमी की ड्यूटी गाँव की पुलिस
चौकी होने से परिवार कस्बे में
रहता था। उसकी किरायेदारिन
की कजिन से एक दिन रैम्जे ने धूमधाम से
शादी कर ली ।लङकी अनाथ थी और
ग्रैसिया से ज्यादा महातत्वाकांक्षी ।
उसने स्कूल में तरह तरह के प्रशिक्षण शुरू
कर दिये । एक दिन स्कूल का एक
लङका गाँव जाकर पेट दर्द से मर
गया जो बेहद मेधावी लङका था। छह
महीने बाद ही रैम्जे की माँ और
दो चाचा एक मामा मर गये
ग्रैगरी की नानी एक
मौसा का भी देहांत हो गया ।
किरायेदारिन भी बीमार
पङी तो फिर नहीं उठी । कम किराये
ज्यादा आराम के लालच ने
सिपाही को हटने नहीं दिया जब
हटा तब बीबी मर गयी और एक भाई मर
गया ।
ये सब वे लोग थे जो कभी न
कभी हवेली गये और रैम्जे को हवेली अपने
कब्जे में करके ठाठबाट से रहने की सलाह
दी । रैम्जे की नई बीबी एक दिन
सीढ़ियों से गिरी और टाँग तुङा बैठी ।
छोटे का बेटा छत से गिरा और मरते मरते
बचा। ये उस दिन हुआ जब वह ताई के
कहने पर हवेली दावत खाकर लौटा।
आखिर कार रैम्जे के वृद्ध पिता ने
अपना हिस्सा और छोटे से खरीदकर
दो कमरे रैम्जे को देकर नई बहू को वापस
मकान में बुला लिया। लेकिन सुना है
रैम्जे की बहू का अबॉर्शन होने के बाद
उसे सदाबाँझ घोषित कर
दिया डॉक्टरों ने । सब कहते हैं जिसने
भी हवेली हथियाकर उस पर राज करने
की सोची या वहाँ की कोई भी चीज
चुराकर लाया मर गया या बर्बाद
हो गया। अब हवेली में ताला पङा है और
रैम्जे ने शहर के स्कूल में नौकरी कर ली ।
ग्रैगरी एक आवारा बदमाश
लङका बनकर घूमता रहता है। नई
बीबी अब रात दिन कलह करती और
बीमार रहती है । अनेक तांत्रिकों से
धागे ताबीज करवाती रहती है । कोई
हवेली की तरफ सूरज ढलने और उदय होने
के बीच नहीं जाता न कोई सुगंधित
क्रीम पाउडर इत्र लगाकर गुजरता है न
घी दूध खाकर न ही पीले चावल
या कढ़ी खाकर । जो भी जाता है हींग
प्याज कोयला चाकू लेकर जाता है
वो भी सिर्फ दिन में ।
शेरसिंह की कथा से कुछ भी खास बात
पता नहीं चली थी ।
सुबह होने वाली थी और मुझे
इतनी कहानी से पहला भाग लिखने
की सामग्री मिल गयी थी । मैं कमरे में
आकर सोया तो नौ बजे सब इंस्पेक्टर
काळे ने कॉफी लाकर जगाया ।
""उठिये शरलॅक होम्स साहब!!!!
कहानियाँ और पुरातत्व पुकार रहे हैं ।
""
जब हम लोग तैयार होकर शेरसिंह और
कांस्टेबिलों के साथ हवेली पहुँचे दस बज
चुके थे । जनवरी की सुहानी धूप
खिली थी ।
मेरा ध्यान
महलनुमा हवेली की नामपट्टिका पर
गया । जो किसी समय पत्थर कुरेद कर
उसमें रंगघुले मीना काँच आदि भरकर
म्यूरल से लिखा गया था । ""न व र त न
म ह ल"
मैंने ग़ौर किया कि '"व '"अक्षर
कटा फटा धुँधला हो गया है लोग
अभ्यास वश नवरतन महल पढ़ते हैं
जबकि ""न _र त न म ह ल"
ही शेष बचा है ।
अक्षर काफी बङे थे लगभग एक वर्गफुट में
एक अक्षर लिखा था।
शेर सिंह परंपरानुसार हमें पहले पिछले
हिस्से में बने कालीमंदिर ले
गया जहाँ नटराज की एक अद्वितीय
ताम्र प्रतिमा थी और दूसरे कक्ष में
दसभुजा काली की ।
मंदिर के तीसरे कक्ष में बहुत
छोटी मूर्ति महारास करते कृष्ण
की थी ।
मुझे जाने क्यो "नरतन महल "याद आ
गया । मंदिर का हर कक्ष में
देखना चाहता था । सारे कमरे निवास
करने लायक थे और
लगता था पुजारी यात्री साधु
कभी यहीं रहते होंगे । अज़ीब बात
थी हर मंदिर का शिखर कलश गायब
था । पूछने पर शेर सिंह ने
बताया कि छोटे राजा अरिदमन के
निसंतान मरने के बाद उनके गोद लिये
लङके ने सारे कलश उतरवाकर बेचकर
खा उङा डाले जो कभी अष्टधातु के थे।
मंदिर का आखिरी कमरा बहुत बङा हॉल
था जो हर दिशा में तीन
दरवाजों वाला सभागार था ।
वहाँ से जब मैंने महल की तरफ देखा तो मैं
पूछ बैठा कि वह दस कमरों कोणभवन
कौन सा है? और जैसा मेरा अनुमान
था वह सत्य निकला । कोण भवन मंदिर
के ठीक कोने था और उसके हर कमरे
की बङी सी खिङकी बारजे
बालकॅनी सहित मंदिर के सभागार से
साफ दिखती थी । यानि कोणभवन के
दसों कमरों से हर मंजिल से मंदिर
पूरा पूरा दिखता था ।
हॉल से सटी कोठरी में धूल से सने टूटने
की कगार पर पङे सितार वीणा तबले
हारमोनियम ढोलक पखावज घुँघरू मंजीरे
झाँझ ढफ रखे थे ।
मैंने कल्पना की महल की खिङकी में
राजा अरिदमन बैठे हैं और सुंदर
स्त्री यहाँ चबूतरे पर नृत्य कर रही है
हॉल में सफेद गद्दों पर साज बज रहे हैं ।
दस फीट ऊँचे चबूतरे से नीचे प्रजा खङी है
और जय जयकार हो रही है । सब प्रसाद
लेकर जा रहे है तभी कोण भवन से
मोतियों की माला गिरती है
सीधी नर्तन करती स्त्री पर । वह
प्रणाम करके पीछे हटती जाती है ।
शेर सिंह देख कर चकित
हो रहा था कि मैं नृत्य की मुद्रायें
बनाकर क्यों फिरकियाँ लगा रहा हूँ।
बाबू मोशाय!!!
कोई बंगाली पूजा है क्या ये???
काळे ने पूछा व्यंग्य से ।
जब मैंने
अपनी कल्पना बतायी तो शेरसिंह
चकित रह गया ।
साब!!!!आप तो अंतर्यामी हैं । मेरे
दादाजी ने मुझे बचपन में लगभग
ऐसा ही हूबहू वर्णन
बताया था हवेली के मँझले राजा का।
जो अपनी स्टेट छोङकर यहाँ इतनी दूर
आ बसे थे । पिता से नाराज होकर
जबकि छोटे को सेनापति और बङे
को राजा बनाकर मँझले को ये सिर्फ एक
सौ एक गाँव जागीर में दिये जाकर
दरबार में कोई पद नहीं मिला।
सुनते है तब यहाँ सिर्फ साधु
या शिकारी आते थे ।
मैंने हवेली का सरसरी भ्रमण किया और
कुछ तसवीरें लीं । जहाँ जहाँ दुर्घटनायें
हुयीं थीं ।
लंच के समय जब हम सब डाकबंगले पर पहुँचे
पुजारी हाजिर था ।
सारे उपलब्ध दस्तावेज़ों सहित । महल के
एक के बाद एक यह पाँचवा मालिक था ।
जिसे रैम्जे ने पाँच साल किश्तें दी थी और
अब किराया काटकर वापस माँग
रहा था । पुजारी पर मुकदमा करने
की धमकी दे रहा था।
हम लोग शाम तक रजिस्ट्रार ऑफिस से
एक के बाद एक पाँचों मालिकों का नाम
पता निकालने में सफल हो गये । पहले
तो क्लर्क ने रुपये माँगे बाद में
नाश्ता मँगाकर माफी । क्योंकि हम
लोग सफेद और रंगीन कपङों में थे ।
शाम सात बजे हम लोग राजपुरोहित के
आलीशान खंडहर होते जा रहे मकान के
एक दुरुस्त कमरे में बैठे चाय पी रहे थे ।
पीले कपङों में जर्जर वृद्ध
की कहानियों और दिखायी गयी कुछ
चिट्ठियों तसवीरों और राजपत्रों से
पता चली कहानी एक
घिसी पिटी राजकथा थी । कि जब
मँझले राजा अरिदमन यहाँ आये
तो शिकारगाह को ही महल बनवाकर
रहने लगे । राज्य और जागीर से
पर्याप्त धन मिल जाता था । मँझले
राजा मनचले रसिक व्यक्ति थे संगीत और
नृत्य ही नहीं चित्रकला में भी महारत
थी उन्हें । पिता को उनमें वीरोचित
गुणों का अभाव भले
ही दिखता रहा किंतु वे शस्त्र और
शास्त्र दोनों में निपुण थे । निसंतान
होने की वजह से एक के बाद एक तीन
विवाह किये और जब प्रौढ़ हुये
तो युवती रानी के गरीब भाई की सात
में से संतान को गोद ले लिया। ये बात
गुप्त रखी गयी किंतु खुल ही गयी।
छोटी रानी बेहद सुंदर थी किंतु
किसी हारे हुये सामंत की बेटी होने
की संधि में विवाह करके
लायी गयीं थीं । सम्मान और वैभव
भी उनको शांति न दे सके ।
राजा बलशाली रसिक सुंदर सहृदय
होकर भी आयु में पिता के बराबर थे और
पुत्रोत्पत्ति में निष्फल ।
रानी को माँ बनने
की लालसा थी या हमउम्र
की प्रीतेच्छा कि राजपुरोहित से
आकर्षित हो बैठीं । राजा हर उपाय
करते उनके दिल बहलाने का लेकिन मन
की आग दबाये रानी और और और प्रबल
होती जाती अंततः इस दुर्व्यवहार
का कारण खोजने पर राजा ने एक
दूती को लगाया । और शीघ्र
ही पता चला कि रानी का अचानक
समय मंदिर में बढ़ गया है आने जाने का ।
युवा राजपुरोहित ने जब से
पिता की गद्दी सँभाली है मंदिर में
रौनक होने लगी । शाम
को राजनर्तकी का नृत्य होता गिरधर
के महारास और नटराज
की आरती को तो जनता जुट
जाती राजपुरोहित का वीणावादन और
राजनर्तकी का नृत्य देखने।
रानी तब कोण भवन के झरोखे में
टकटकी बाँधे बैठी रहती । दत्तक पुत्र
गयंद को दास दासी सँभालते और जब
शरारते करता तो अफीम चटाकर
सुला देते ।
राजा कई कई सप्ताह
राजधानी दरबार और जागीर भ्रमण
पर रहते तो अचानक शांतिपाठ हवन
ग्रहाराधन और कुंडली देखना बढ़
जाता । राजपुरोहित आनंद
की वीणा तो केवल मुरलीधर के सामने
ही बजती लेकिन वीणा से भी मधुर
प्रवचन कोण भवन में चलते रहते ।
बङी रानी और मँझली रानी एक
ही कुटुंब से थीं जो ये सब कतई बर्दाश्त
नहीं कर सकती थीं वे ऊँची संपन्न
रियासतों से थीं। नतीज़ा राजा के आते
ही बङी रानी के आदेश से राजपुरोहित
को आगे पढ़ने काशी भेज दिया गया। और
उनकी जगह अस्थाई तौर पर दूसरे
पुजारी लगा दिये गये । राजा खुद
संध्या आरती के समय झरोखे पर विराजने
लगे ।
होनहार बलवान् है
सो राजनर्तकी का जादू राजा पर चल
गया। जो नहीं होना था वही हुआ ।
राजनर्तकी महल में आने लगी।
जो परंपरा के खिलाफ
था हतहृदया रानी राजा के भी प्रेम
और शैया से वंचित रहने लगी ।
राजनर्तकी पर मोती न्यौछावर।
Jul 13, 2013
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